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Dec 25, 2016

बूँद की कीमत

आओ करें बादलों से प्यार
- अनुपम मिश्र

राजस्थान के रेगिस्तान में बादल बहुत कम आते हैं। पर यहाँ के लोग बादलों से बहुत प्यार करते हैं। दरअसल वे पानी की हर बूँद की कीमत समझते हैं। इसलिए वे बारिश के पानी को बहुत करीने से बचाकर पूरे साल काम चलाते हैं।
पानी का व्यापार
आप सभी उद्यमी हैं। आप व्यापार की बारीकियों को अच्छी तरह समझते हैं। अच्छा उद्यमी वही है, जो छोटी पूँजी से बड़ा व्यापार करे। आज मैं आपसे राजस्थान के रेगिस्तान में होने वाले एक व्यापार के बारे में बात करुँगा। यह पानी का व्यापार है। उद्योग में दो चीजें अहम हैं- उत्पादक और उपभोक्ता। लेकिन, यहाँ तस्वीर अलग है। यहाँ उपभोक्ता और उत्पादक एक ही हैं।
जमीन के अन्दर का पानी खारा है और बारिश बहुत कम होती है। मतलब यह कि यहाँ कच्चा माल नहीं है। पानी में निवेश के लिए आपको लोन भी नहीं मिलने वाला। लेकिन रेगिस्तान के लोग बड़ी शिद्दत से सैकड़ों साल से पानी का व्यापार करते आए हैं। ये रेनवाटर हार्वेस्टिंग के जरिए पूरे साल के लिए पानी का प्रबन्ध करते हैं। आप यह व्यवस्था देखेंगे ,तो आपको आश्चर्य होगा कि वे इतने बड़े पैमाने पर कैसे करते हैं पानी का संचय ? इनका सीईओ कौन है, उनके वालंटियर कौन हैं।
कम बारिश
इस इलाके में विकास के नाम पर बनाई जाने वाली सड़कें, पुल, बिजली, अस्पताल कुछ भी नहीं हैं। यहाँ सबसे कम बारिश होती है। साल में सिर्फ 16 सेंटीमीटर बारिश होती है। यहाँ भूजल 300 फीट की गहराई में है। ज्यादातर जगहों पर इस पानी में सेलाइन मिला है, इसलिए यह पीने योग्य नहीं है। लिहाजा यहाँ न तो आप हैण्डपम्प लगवा सकते हैं और न ही कुआँ खुदवा सकते हैं।
इन इलाकों में बादल बहुत कम आते हैं। लेकिन यहाँ के लोगों ने बादलों को बड़े प्यार से ढेर सारे नाम दिये हैं। स्थानीय भाषा में यहाँ बादलों के कम-से-कम चालीस नाम हैं। आखिर क्यों बादलों से इतना प्यार करते हैं यहाँ के लोग। दरअसल वे पानी की कीमत समझते हैं। वे जानते हैं कि जीवन चलाने के लिए पानी सबसे बड़ी जरूरत है, शायद इसीलिए वे बादलों से इतना प्यार करते हैं।
रेनवाटर हार्वेस्टिंग
इन इलाकों में बारिश के पानी के संचय (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) की तकनीक हैं। हम सबके लिए रेनवाटर हार्वेस्टिंग एक नया कार्यक्रम है लेकिन रेगिस्तान में रहने वाले समाज के लिए यह कोई कार्यक्रम नहीं है, यह तो उनका जीवन है। वे सालों से इसे करते आए हैं। वे बारिश के पानी को संचय करने के लिए कई तरीके अपनाते हैं। वे जमीन पर कुण्ड बनाकर पानी संचय करते हैं। कई बार पढ़े-लिखे इंजीनियर भी बाथरूम में स्लोप बनाने में लापरवाही कर जाते हैं पर गाँवों के ये लोग रेनवाटर हार्वेस्टिंग कुण्ड बनाते समय बेहद सतर्क रहते हैं ताकि पानी की एक बूँद भी बर्बाद न जाए।
इनका नियम
जब आप कहीं उद्योग लगाते हैं तो आपको रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना पड़ता है। यह नया नियम है। ज्यादातर लोग इसे नजरअन्दाज करते हैं। कई लोग तो झूठ बोल देते हैं कि उन्होंने यह सिस्टम लगा लिया है, जबकि असल में वे इसका कोई प्रबन्ध नहीं करते हैं। लेकिन रेगिस्तान के गाँव वालों के लिए किसी ने कानून नहीं बनाया। इन्होंने अपने लिए खुद नियम बनाया है।
यहाँ हर घर में एक रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम मिलेगा। परम्परागत ढंग से बने इस सिस्टम को टांका या कुण्ड कहते हैं। वे छत और आँगन के जरिए बारिश का पानी संचय करते हैं। वे जल संचय प्रक्रिया में सफाई का पूरा ध्यान रखते हैं। यह पानी पूरी तरह से मीठा, साफ और पीने योग्य है। आप में से ज्यादातर लोग घरों में वाटर फिल्टर लगवाते हैं लेकिन इनके पानी को फिल्टर की जरूरत नहीं होती।
जयगढ़ किला
जयपुर के पास जयगढ़ किले में रेनवाटर हार्वेस्टिंग का विशाल प्लांट है। यहाँ हर मौसम में करीब 60 लाख गैलन पानी के संचय की व्यवस्था है। यह प्लांट चार सौ साल पुराना है। आजकल नई सड़कें कुछ साल में ही टूट जाती हैं, लेकिन यह प्लांट सही सलामत है। गाँव वालों की कई पीढिय़ाँ इस प्लांट की रखवाली करती आई हैं। इसका पानी पूरी तरह से शुद्ध है।
योजना फेल
सरकार ने बीकानेर में करीब 25-30 साल पहले कई सौ किलोमीटर दूर से नहर के जरिए लोगों को पानी उपलब्ध कराने का फैसला किया। हालाँकि लोगों को सरकार की योजना पर ज्यादा भरोसा नहीं था, इसलिए उन्होंने अपनी परम्परागत जल संचयन व्यवस्था जारी रखी। सरकार ने योजना पर करोड़ों खर्च किए, पर योजना फेल हो गई। दूसरी तरफ हजार साल पहले से चली आ रही रेनवाटर हार्वेस्टिंग की सुविधा अब भी कारगर है। इस इलाके में पानी की जरूरत बारिश के पानी से ही पूरी होती है।
टाउन प्लानिंग
अब मैं आपको जैसलमेर की तस्वीर दिखाता हूँ। ये शहर टाउन प्लानिंग, सिविल इंजीनियरिंग और आर्किटेक्ट का बेहतरीन नमूना है। 800 साल पहले बसाए गए इस शहर के हर घर की छत के ऊपर रेनवाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था है। दिल्ली और मुम्बई में लोग टाउन प्लानिंग में खामियों की वजह से बहुत सारी दिक्कतों से जूझते हैं। लेकिन, सालों पहले बसाए गए जैसलमेर में लोगों की जरूरतों का ख्याल रखा गया है। यहाँ 52 तालाब हैं। पानी का स्तर कम हो या ज्यादा, हर मौसम में इन तालाबों की खूबसूरती बरकरार रहती है। ये तालाब पूरे साल लोगों को मीठा पानी उपलब्ध कराते हैं। बस इतना सा था रेगिस्तान का सन्देश। (पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ने नवम्बर 2009 में टेड के मंच पर यह भाषण दिया था।)

रहिमन पानी राखिए...

अच्छे-अच्छे काम करते जाना
 तालाब बनाते जाना
- अनुपम मिश्र
कादम्बिनी, जून 2012

आज हम पानी की समस्या से जुझ रहे हैं। पूरी तरह सूखे से हम छुटकारा नहीं पा सके हैं। सूखा कहीं भी और कभी भी पड़ सकता है। सूखा या अकाल पहली बार नहीं आएगा। लेकिन उस अकाल में कुछ ऐसा होने वाला है जो पहले कभी नहीं हुआ। इस दौर में सबसे सस्ती कारों के साथ सबसे महँगी दालें मिलने वाली हैं यही इस अकाल की सबसे भयावह तस्वीर होगी।


महाभारत युद्ध के समाप्त हो जाने के बाद श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र से अर्जुन को साथ लेकर द्वारिका जा रहे थे। उनका रथ मरुप्रदेश पार कर रहा था। आज के जैसलमेर के पास त्रिकुट पर्वत पर उन्हें उत्तुंग ऋषि तपस्या करते हुए मिले। श्रीकृष्ण ने उन्हें प्रणाम किया और फिर वर माँगने को कहा। उत्तुंग का अर्थ है ऊँचा। सचमुच ऋषि ऊँचे थे। उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। प्रभु से प्रार्थना की कि यदि मेरे कुछ पुण्य हैं ,तो भगवान वर दें कि इस क्षेत्र में कभी जल का अभाव न रहे। एक दौर था जब मरुभूमि को इस तरह के आशीर्वाद की जरूरत थी। मरुभूमि के अलावा पानी की कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन हमने पानी की अहमियत नहीं समझी। आज पानी हमें परेशान कर रहा है। आज हमारे समाज के बड़े हिस्से को इस आशीर्वाद की जरूरत पड़ती है। हमारा समाज अपने-अपने देवताओं से प्रार्थना करता रहता है कि उसके जीवन में पानी की कमी न रहे। आज हालत यह है कि हम पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। पूरी तरह सूखे से हम छुटकारा नहीं पा सके हैं। सूखा कभी भी और कहीं भी पड़ सकता है। सूखा या अकाल कोई पहली बार नहीं आएगा। लेकिन उस अकाल में ऐसा कुछ होने वाला है, जो पहले कभी नहीं हुआ। इस दौर में सबसे सस्ती कारों के साथ सबसे महंगी दाल भी मिलने वाली है- यही इस अकाल की सबसे भयावह तस्वीर होगी। यह बात औद्योगिक विकास के विरुद्ध नहीं कही जा रही है। लेकिन इस महादेश के बारे में जो लोग सोच रहे हैं, उन्हें इसकी खेती, इसके पानी, अकाल, बाढ़ सबके बारे में सोचना होगा।


कई बातें बार-बार कहनी पड़ती हैं। इन्हीं में एक बात यह भी है कि अकाल कभी अकेले नहीं आता। उससे बहुत पहले अच्छे विचारों का अकाल पडऩे लगता है। अच्छे विचार का अर्थ है, अच्छी योजनाएँ, अच्छे काम। अच्छी योजनाओं का अकाल और बुरी योजनाओं की बाढ़। पिछले दौर में ऐसा ही कुछ हुआ है। देश को स्वर्ग बना देने की तमन्ना में तमाम नेताओं ने स्पेशल इकॉनमिक जोन सिंगूर, नंदीग्राम और ऐसी ही न जाने कितनी बड़ी-बड़ी योजनाओं पर पूरा ध्यान दिया। इस बीच यह भी सुना गया कि इतने सारे लोगों का खेती करना जरूरी नहीं है। एक जिम्मेदार नेता की तरफ से यह भी बयान आया कि भारत को गाँवों का देश कहना जरूरी नहीं है। गाँवों में रहने वाले शहरों में आकर रहने लगेगें, तो हम उन्हें बेहतर चिकित्सा, बेहतर शिक्षा और बेहतर जीवन के लिए तमाम सुविधाएँ आसानी से दे सकेंगे। इन्हें लगता होगा कि शहरों में रहने वाले सभी लोगों को ये सभी सुविधाएँ मिल ही चुकी है। इसका उत्तर तो शहर वाले ही देंगे।
लेकिन इस बात को यहीं छोड़ दीजिए। अब हमारे सामने मुख्य चुनौती है अपनी फसलों को बचाना और आने वाली फसल की ठीक-ठीक तैयारी। दुर्भाग्य से इसका कोई बना-बनाया ढाँचा सरकार के हाथ फिलहाल नहीं दिखता। देश के बहुत बड़े हिस्से में कुछ साल पहले तक किसानों को इस बात की खूब समझ थी कि मानसून के आसार अच्छे न दिखें, तो पानी की कम माँग करने वाली फसलें बो ली जाए। इस तरह के बीज पीढिय़ों से सुरक्षित रखे गए थे। कम प्यास वाली फसलें अकाल का दौर पार कर जाती थी; लेकिन आधुनिक विकास के दौर ने, नई नीतियों ने किसान के इस स्वावलंबन को अनजाने में ही सही, पर तोड़ा जरूर है। लगभग हर क्षेत्र में धान, गेहूँ, ज्वार, बाजरा के हर खेत में पानी को देखकर बीज बोने की पूरी तैयारी रहती थी। अकाल के अलावा बाढ़ तक को देखकर बीजों का चयन किया जाता था। पर 30-40 साल के आधुनिक कृषि विकास ने इस बारीक समझ को आमतौर पर तोड़ डाला है। पीढिय़ों से एक जगह रहकर वहाँ की मिट्टी, पानी, हवा, बीज, खाद-सब कुछ जानने वाला किसान अब छह-आठ महीनों में ट्रांसफर होकर आने-जाने वाले कृषि अधिकारी की सलाह पर निर्भर बना डाला गया है।
किसानों के सामने एक दूसरी मजबूरी उन्हें सिंचाई के अपने साधनों से काट देने की भी है। पहले जितना पानी मुहैया होता था, उसके अनुकूल फसल ली जाती थी। अब नई योजनाओं का आग्रह रहता है कि राजस्थान में भी गेहूँ, धान, गन्ना, मूँगफली जैसी फसलें पैदा होनी चाहिए। कम पानी के इलाके में ज्यादा पानी माँगने वाली फसलों को बोने का रिवाज बढ़ता ही जा रहा है। इनमें बहुत पानी लगता है। सरकार को लगता है कि बहुत पानी देने को ही तो हम बैठे हैं। ऐसे इलाकों में अरबों रुपयों की लागत से इंदिरा नहर, नर्मदा नहर जैसी योजनाओं के जरिए सैकड़ों किलोमीटर दूर का पानी सूखे बताए गए इलाके में लाकर पटक दिया जाता है। लेकिन यह आपूर्ति लंबे समय तक के लिए निर्बाध नहीं चल पाएगी।


इस साल, हर जगह जितना कम पानी बरसता है, उतने में हमारे स्वनामधन्य बाँध भी पूरे नहीं भरते हैं। तब उनसे निकलने वाली नहरों में सब खेतों तक पहुँचाने वाला पानी कैसे बहेगा? सरकार घोषणा करती रहती है कि किसानों को भूजल का इस्तेमाल कर फसल बचाने के लिए करोड़ों रुपये की डीजल सब्सिडी दी जाएगी। यह योजना एक तो ईमानदारी से लागू नहीं हो पाती और अगर ईमानदारी से लागू हो भी गई तो अगले अकाल के समय दोहरी मार पड़ सकती है-मानसून का पानी नहीं मिला है और जमीन के नीचे का पानी भी फसल को बचाने के मोह में खींचकर खत्म कर दिया गया। तब तो अगले बरसों में आने वाले अकाल और भी भयंकर होंगे।
असल में सरकारों को अपने-अपने क्षेत्रों में ऐसे इलाके खोजने चाहिए, जहाँ कम पानी गिरने के बाद भी अकाल की उतनी काली छाया नहीं दिखती, बाकी क्षेत्रों में जैसा अंदेशा होता है। पूरे देश के बारे में बताना तो कठिन है। लेकिन राजस्थान में अलवर ऐसा इलाका है, जहाँ साल में 25-26 इंच पानी गिरता है। कभी-कभी तो उसका आधा ही गिरता है।
अभी दो साल पहले की बात है। देश भर में अकाल की काली छाया मँडरा रही थी ; लेकिन अलवर पर उसका असर नहीं था। वहाँ के एक बड़े हिस्से में पिछले कुछ साल में हुए काम की बदौलत अकाल की छाया उतनी बुरी नहीं पड़ी। कुछ हिस्सों में तो अकाल को भर चुके सुंदर तालाबों की पाल पर बिठा दिया गया है। जयपुर और नागौर में भी ऐसी मिसालें हैं। जयपुर के ग्रामीण इलाकों में भी बड़ी आसानी से ऐसे गाँव मिल जाएँगे, जहाँ कहा जा सकता है कि अकाल की परिस्थितियों के बावजूद फसल और पीने के लिए पानी सुरक्षित रखा गया है। जैसलमेर और रामगढ़ जैसे और भी सूखे इलाकों की ओर चलें, जहाँ चार इंच से भी कम पानी गिरा। लेकिन वहाँ भी कुछ गाँव के लोगों की 10-20 साल की तपस्या के बूते पर आज इतना कह सकते हैं कि हमारे यहां पीने के पानी की कमी नहीं है। उधर महाराष्ट्र के भंडारा और उत्तराखंड के पौड़ी जिले में भी कुछ हिस्से ऐसे मिल जाएँगे। हरेक राज्य में ऐसी मिसालें खोजनी चाहिए और उनसे अकाल के लिए सबक लेने चाहिए। नेतृत्व को अकाल के बीच भी इन अच्छे कामों की सुगंध न आए तो वे इनकी खोज में अपने खुफिया विभागों को लगा ही सकते हैं।


पिछले सालों में कृषि वैज्ञानिकों और मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों व नेताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि कृषि अनुसंधान संस्थानों में, कृषि विश्वविद्यालयों में अब कम पानी की माँग करने वाली फसलों पर शोध होना चाहिए। उन्हें इतनी जानकारी तो होनी चाहिए थी कि ऐसे बीज समाज के पास बराबर रहे हैं। उनके लिए आधुनिक सिंचाई की जरूरत ही नहीं है। इन्हें बारानी खेती के इलाके कहा जाता है। 20-30 सालों में बारानी खेती के इलाकों को आधुनिक कृषि की दासी बनाने की कोशिशें हुई हैं। ऐसे क्षेत्रों को पिछड़ा बताया गया, ऐसे बीजों को और उन्हें बोने वालों को पिछड़ा बताया गया। उन्हें पंजाब-हरियाणा जैसी आधुनिक खेती करके दिखाने के लिए कहा जाता रहा है। आज हम बहुत दु:ख के साथ देख रहे हैं कि अकाल का संकट पंजाब-हरियाणा पर भी छा सकता है। एक समय था जब बारानी इलाके देश का सबसे स्वादिष्ट अन्न पैदा करते थे। दिल्ली-मुंबई के बाजारों में आज भी सबसे महँगा गेहूँ, मध्य प्रदेश के बारानी खेती वाले इलाकों से आता है। अब तो हमें चेतना ही चाहिए। बारानी की इज्जत बढ़ानी चाहिए।
भगवान न करे कि सूखा या अकाल पड़े। लेकिन अगली बार जब अकाल पड़े तो उससे पहले अच्छी योजनाओं का अकाल न आने दें। उन इलाकों, लोगों और परंपराओं से कुछ सीखें जो इस अकाल के बीच में भी सुजलाम् सफलाम् बने हुए थे। अंग्रेजों के आने से पहले अपने समाज में पानी की उतनी कमी नहीं थी। समाज अपने स्तर पर ही पानी का इंतजाम कर लेता था। वह राज का मुँह नहीं ताकता था। अकेले मैसूर राज्य में ही 39 हजार तालाब थे। लेकिन उस गुणी समाज के हाथ से पानी का प्रबंध किस तरह छीना गया। उसकी एक झलक तब के मैसूर राज में देखने को मिलती है। सन् 1800 में मैसूर राज दीवान पूर्णैया देखते थे। कहा जाता था कि वहाँ किसी पहाड़ी की चोटी पर एक बूँद गिरे तो आधी इस तरफ जाती थी। और आधी उस तरफ जाती थी। दोनों तरफ उस बूँद को सहेज कर रखने वाले तालाब मौजूद थे। समाज के अलावा राज भी उसमें दिलचस्पी लेता था और इन उम्दा तालाबों की देखरेख के लिए हर साल कुछ लाख रुपये लगाता था।
राज बदला। अंग्रेज आए। 1831 में उन्होंने तालाबों को दी जाने वाली राशि को काटकर आधा कर दिया। किसी तरह 32 सालों तक तालाब चलते रहे लेकिन फिर 1863 में पीडब्ल्यूडी बनी और सारे तालाब लोगों से छीनकर उसे दे दिए गए। प्रतिष्ठा पहले हर ली थी। फिर धन, साधन छीने और अब स्वामित्व भी ले लिया। सम्मान, सुविधा और अधिकारों के बिना समाज लाचार होने लगा। ऐसे में उससे सिर्फ अपने कर्तव्य निभाने की उम्मीद कैसे की जाती? मैसूर के 39 हजार तालाबों की दुर्दशा का किस्सा बहुत लम्बा है। पीडब्ल्यूडी से काम नहीं चला , तो फिर पहली बार सिँचाई विभाग बना। उसे तालाब सौंपे गए। वह भी कुछ नहीं कर पाया। तब वापस पीडब्ल्यूडी के पास आ गए तालाब। विभागों की अदला-बदली के बीच तालाबों से मिलने वाला राजस्व बढ़ाते गए अंग्रेज और रख-रखाव की राशि छाँटते-काटते गए। अंग्रेज इस काम के लिए चंदा तक माँगने लगे। वह फिर जबरन वसूली तक चला गया।
अंग्रेजों से पहले करीब 350 तालाब दिल्ली में थे। उन्हें भी राजस्व के लाभ और हानि की तराजू पर तौला गया और कमाई न दे पाने वाले तालाब राज के पलड़े से बाहर फेंक दिए गए। उसी दौर में दिल्ली में नल लगने लगे थे। बीसवीं सदी के शुरुआत में ही तब के विवाह गीतों में उसका विरोध दिखाई देता है। बारात जब पंगत में बैठती तो स्त्रियाँ गीत गाती थीं, ‘फिरंगी नल मत लगवाय दियो।’ लेकिन नल लगते गए और जगह-जगह बने तालाब, कुएँ और बावडिय़ों के बदले अंग्रेजों के वॉटर वर्क्स से पानी आने लगा। पहले सभी बड़े शहरों में और फिर धीरे-धीरे छोटे शहरों में भी यही स्वप्न साकार किया जाने लगा। पर केवल पाइप बिछाने और नल की टोंटी लगा देने से पानी नहीं आता। यह बात उस समय नहीं लेकिन आजादी के बाद धीरे-धीरे समझ में आने लगी थी। सन् 70 के बाद तो यह डरावने सपने में बदलने लगी थी। तब तक कई शहरों के तालाब उपेक्षा की गाद से पट चुके थे और उन पर नए मुहल्ले, बाजार और स्टेडियम खड़े हो चुके थे। पर पानी अपना रास्ता नहीं भूलता, तालाब हथियार कर बनाए गए नए मोहल्लों में वर्षा के दिनों में पानी भर जाता। और फिर वर्षा बीती नहीं कि इन शहरों में जल संकट के बादल छाने लगते। जिन शहरों के पास फिलहाल थोड़ा पैसा है। थोड़ी ताकत है। वे किसी और के पानी को छीन कर अपने नलों को किसी तरह चला रहे हैं। पर बाकी की हालत तो हर साल बिगड़ती ही जा रही है। कई शहरों के कलेक्टर फरवरी महीने में आस-पास के गाँवों के बड़े तालाबों का पानी सिंचाई के कामों से रोक कर शहरों के लिए सुरक्षित कर लेते हैं।
शहरों को पानी चाहिए, पर पानी दे सकने वाले तालाब नहीं। तब पानी ट्यूबवेल से ही मिल सकता है। पर इसके लिए बिजली,डीजल के साथ-साथ उसी शहर के नीचे पानी चाहिए। एक बात साफ है कि लगातार गिरता जल स्तर सिर्फ पैसे और सत्ता के बल पर थामा नहीं जा सकता। कुछ शहरों ने दूर बहने वाली किसी नदी से पानी उठा कर लाने के बेहद खर्चीले और अव्यावहारिक तरीके अपनाए हैं। पानी के मामले में निपट बेवकूफी के उदाहरणों की कोई कमी नहीं है। मध्य प्रदेश के ही सागर शहर को देखें। कोई छह सौ बरस पहले लाखा बंजारे के बनाए सागर नामक एक विशाल तालाब के किनारे बसे इस शहर का नाम सागर ही हो गया था। आज यहाँ नए समाज की पाँच बड़ी प्रतिष्ठित संस्थाएँ हैं। एक बंजारा आया और विशाल सागर बना कर चला गया। लेकिन नए समाज की ये साधन संपन्न संस्थाएँ इस सागर की देखभाल तक नहीं कर पाईं। आज सागर तालाब पर दर्जनों शोध प्रबंध पूरे हो चुके हैं। डिग्रियाँ बँट चुकी हैं। पर एक अनपढ़ माने गए बंजारे के हाथों बने सागर को पढ़ा-लिखा माना गया समाज बचा नहीं पा रहा है। लेकिन उपेक्षा की इस आँधी में कई तालाब खड़े हैं। देश भर में कोई दस लाख तालाब आज भी भर रहे हैं और वरुण देवता का प्रसाद सुपात्रों के साथ-साथ कुपात्रों में भी बाँट रहे हैं। कई तरह से टूट चुके समाज में तालाबों की स्मृति अभी भी शेष है। स्मृति की यह मजबूती पत्थर की मजबूती से ज्यादा मजबूत है।


एक लोककथा याद आती है। कूडऩ, बुढ़ान, सरमन और कौराई थे चार भाई। चारों सुबह जल्दी उठकर अपने खेत पर काम करने जाते। दोपहर को कूडऩ की बेटी आती, पोटली में खाना लेकर।
एक दिन घर से खेत जाते समय बेटी को एक नुकीले पत्थर से ठोकर लग गई। उसे बहुत गुस्सा आया। उसने अपनी दरांती से उस पत्थर को उखाडऩे की कोशिश की। पर लो, उसकी दरांती तो पत्थर पर पड़ते ही लोहे से सोने में बदल गई और फिर बदलती जाती हैं, इस लम्बे किस्से की घटनाएँ बड़ी तेजी से। पत्थर उठा कर लड़की भागी-भागी खेत पर आती है। अपने पिता और चाचाओं को सब कुछ एक साँस में बता देती है। चारों भाइयों की साँस भी अटक जाती है। जल्दी-जल्दी सब घर लौटते हैं। उन्हें मालूम पड़ चुका है कि उनके हाथ में कोई साधारण पत्थर नहीं है पारस है। वे लोहे की जिस चीज को छूते हैं, वह सोना बनकर उनकी आँखों में चमक भर देती है। पर आँखों की यह चमक ज्यादा देर तक नहीं टिक पाती। कूडऩ को लगता है कि देर-सवेर राजा तक यह बात पहुँच जाएगी और तब पारस छिन जाएगा। तो क्या यह ज्यादा अच्छा नहीं होगा कि वे खुद जाकर राजा को सब कुछ बता दें। किस्सा आगे बढ़ता है। फिर जो कुछ भी घटता है, वह लोहे को नहीं, बल्कि समाज को पारस से छुआने का किस्सा बन जाता है।

राजा न पारस लेता है न सोना। सब कुछ कूडऩ को वापस देते हुए कहता है, ‘जाओ इससे अच्छे-अच्छे काम करते जाना। तालाब बनाते जाना।’ यह कहानी सच्ची है या ऐतिहासिक, नहीं मालूम, लेकिन देश के मध्य भाग में एक बहुत बड़े हिस्से में यह इतिहास को अँगूठा दिखाती हुई लोगों के मन में रमी हुई है। कुल मिलाकर अच्छा काम करते जाना है। पानी का अभाव नहीं होने देना है।

एक कालजयी कृति

एक कालजयी कृति
- सुरेन्द्र बंसल, 8 सितंबर 2008

पुस्तक: आज भी खरे हैं तालाब ःरचनाकार: अनुपम मिश्र
प्रकाशक: गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, पृष्ठ - 120
मूल्य: 75 रुपये
प्राप्ति-स्थल: गाँधी शांति प्रतिष्ठान,
221 दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली-110 002

ऐसी विरली ही पुस्तकें होती हैं जो न केवल पाठक तलाशती हैं, बल्कि तलाशे पाठकों को कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में तराशती भी हैं। अपनी प्रसन्न जल जैसी शैली तथा देश के जल स्रोतों के मर्म को दर्शाती एक पुस्तक ने भी देश को हज़ारों कर्मठ कार्यकर्ता दिए हैं। पुस्तक का नाम है ‘आज भी खरे हैं तालाब’। श्री अनुपम मिश्र द्वारा लिखित तथा गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक का पहला संस्करण 1993 में छपा। पाँचवा संस्करण 2004 में छपा और कुल प्रतियाँ 23000 छपीं। लेकिन 93 से 2004 के बीच पुस्तक ने देश भर में आवारा मसीहा की तरह घूम-घूम कर अपने-अपने क्षेत्र के जल स्रोतों को बचाने की अलख जगा दी और यह सिलसिला आज भी जारी है।
अपने देश में बेजोड़ सुंदर तालाबों की कैसी भव्य परंपरा थी, पुस्तक उसका पूरा दर्शन कराती है। तालाब बनाने की विधियों के साथ-साथ अनुपम जी की लेखनी उन गुमनाम नायकों को भी अँधेरे कोनों से ढूँढ़ लाती है, जो विकास के नए पैमानों के कारण बिसरा दिए गए हैं।
पुस्तक के बारे में मूर्धन्य पत्रकार प्रभाष जोशी ने इसके छपने के तुरंत बाद ही जो लिखा था वही शायद इस पुस्तक को सही स्थान देने की सही कोशिश कर पाता है।
पुस्तक के पहले संस्करण के बाद देशभर में पहली बार अपने प्राचीन जल स्रोतों को बचाने की बहस चली, लोगों ने जगह-जगह बुजुर्गों की तरह बिखरे तालाबों की सुध लेनी शुरू की। इसकी गाथा बेशक लंबी है, लेकिन फिर भी देखने का प्रयास करते हैं।
मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित जल राणा राजेंद्र सिंह बताते हैं कि राजस्थान की उनकी संस्था तरुण भारत संघ के पानी बचाने के बड़े काम को सफल बनाने में इस पुस्तक का बहुत बड़ा हाथ है। मध्यप्रदेश के सागर जिले के कलेक्टर श्री बी. आर. नायडू, जिन्हें हिंदी भी ठीक से नहीं आती थी, पुस्तक पढऩे के बाद इतना प्रभावित हुए कि जगह-जगह लोगों से कहते फिरे, ‘अपने तालाब बचाओ, तालाब बचाओ, प्रशासन आज नहीं तो कल अवश्य चेतेगा।’ श्री. नायडू की ये मामूली अलख सागर जिले के 1000 तालाबों को निरंजन कर गई। ऐसी ही एक और अलख के कारण शिवपुरी जिले के लगभग 340 तालाबों की सुध ली गई। मध्यप्रदेश के ही सीधी और दमोह के कलेक्टरों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में इस पुस्तक की सौ-सौ प्रतियाँ बाँटी।
पानी के लिए तरसते गुजरात के भुज के हीरा व्यापारियों ने इस पुस्तक से प्रभावित होकर अपने पूरे क्षेत्र में जल-संरक्षण की मुहिम चलाई। पुस्तक से प्रेरणा पाकर पूरे सौराष्ट्र में ऐसी अनेक यात्राएँ निकाली गईं। पानी बचाने के लिए सबसे दक्ष माने गए राजस्थान के समाज को भी इस पुस्तक ने नवजीवन दिया। राजस्थान के प्रत्येक कोने में पुस्तक के प्रभाव के कारण सैकड़ों जल-यात्राओं के साथ-साथ हज़ारों पुरातन जल-स्रोत सँभाले गए। ऐसी अनेक यात्राएँ आज भी जारी हैं।
जयपुर जिले के ही सालों से अकालग्रस्त लापोडिय़ा गाँव ने इस पुस्तक को आत्मा में बसाया। लापोडिय़ा गाँव ने पुस्तक से प्रेरणा पाकर न केवल अपनी जलगाहें बचाईं, बल्कि अपने प्रदेश की चारागाहें तथा गोचर भी बचाए। लापोडिय़ा के सामूहिक प्रयासों का नतीजा यह रहा कि आज 300 घरों का लापोडिय़ा, जयपुर डेयरी को चालीस लाख वार्षिक का दूध दे रहा है। जल-जंगल संरक्षण के ऐसे ही आंदोलनों से लापोडिय़ा को लक्ष्मण सिंह जैसा नेतृत्व क्षमता वाला नायक मिला। उनकी इन्हीं क्षमताओं के कारण आज लापोडिय़ा के आसपास के 300 गाँव अपने पैरों पर खड़े हो रहे हैं। शहरों की ओर पलायन में निरंतर गिरावट आई है।
पुस्तक का प्रभाव उत्तरांचल में भी हुआ। यहाँ पौड़ी-गढ़वाल के उफरेखाल क्षेत्र के दूधातोली लोक विकास संस्थान के श्री सच्चिदानंद भारती ने पुस्तक से प्रेरणा पाकर पहाड़ी क्षेत्रों की विस्तृत चालों (पानी बचाने के लिए पहाड़ी तलाई) को पुनर्जीवित करने का काम शुरू किया। इस दौरान पिछले 13 सालों में उन्होंने 13 हज़ार चालों को बचाया-बनाया। उनके इन्हीं प्रयासों से उजड़े हिमालय के शीश पर फिर से हरियाली का मुकुट दिखने लगा है।
गैर हिंदी भाषी राज्य कर्नाटक में इस पुस्तक का सीधा प्रभाव राज्य सरकार पर पड़ा। कर्नाटक सरकार ने तालाब बचाने का काम सीधे अपने ही हाथ में ले लिया और वहाँ एक जल ‘संवर्धन योजना संघ’ बनाया गया तथा विश्व बैंक की मदद से पूरे राज्य के तालाब बचाने की योजना तैयार की गई है। इसी राज्य की ही इंफोसिस कंपनी के मालिक श्री नारायणमूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति ने इस पुस्तक का कन्नड़ में अनुवाद किया है और 50 हज़ार प्रतियाँ छपवाकर कर्नाटक की प्रत्येक पंचायत में भिजवाने की योजना बनाई है।
हरित क्रांति के जेहादी नारे के बाद निरंतर रेगिस्तान की ओर अग्रसर पंजाब में इस पुस्तक का नाद सुनाई दिया। सर्वप्रथम इसका पंजाबी अनुवाद मालेरकोटला से प्रकाशित ‘'तरकश’ नामक पत्रिका में शुरू हुआ। फिर इसका एक संक्षिप्त पंजाबी संस्करण छपा जो मुफ्त में बाँटा गया। कुछ वर्षों बाद इसके अनुवाद के साथ पंजाब के सुख-दुख जोड़कर एक पुस्तक की शक्ल दी गई। इस नए अनुवाद का व्यापक प्रभाव रहा। पंजाब के साहित्यकारों, आलोचकों, लोकगायकों, सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं के साथ-साथ प्रमुख संतों, यहाँ तक कि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्यों पर भी इसका खासा प्रभाव पड़ा। पंजाबी अनुवाद का श्री गुरुनानक देव जी की नदी का उद्धार करने वाले संत बलवीर सीचेवाल जी ने बेहद रचनात्मक उपयोग किया। वे अब नदी किनारे होने वाले वार्षिक साहित्यिक सम्मेलनों में पुस्तक खऱीद कर रचनाधर्मियों को भेंट करते हैं। पंजाब के लोकगायकों ने इस पुस्तक को पढऩे के बाद अपने तरीके से जलस्रोतों को बचाने की मुहिम शुरू की है। देश के अधिकतर लेखक तथा प्रकाशक पुस्तकें न पढऩे वाले पाठकों का रोना रोते हैं। पर वे शायद ये भूल जाते हैं कि पुस्तकों का सच्चा अर्थ समाज के नाम लिखा प्रेम-पत्र होता है। और कितनी पुस्तकें ऐसी होती हैं, जिनमें समाज के लिए प्रेम भरा होता है? श्री अनुपम मिश्र की इस कृति ने यही काम किया है। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पुस्तक न केवल धरती का, बल्कि मन-माथे का अकाल भी दूर करती है।
बंगाल का किस्सा भी मज़ेदार है। जहाज़ से हथियार गिराए जाने के बाद सुर्खियों में आए पुरुलिया नामक कस्बे की एक घुमक्कड़ पत्रकार निरुपमा अधिकारी वहाँ के एक अकाल क्षेत्र का दौरा करती-करती अचानक हरियाली देखकर ठिठक गईं। गाँव वालों से पता चला कि उस गाँव में कुछ तालाब ज़िंदा थे, इसलिए वहाँ धरती के भीतर की नमी अभी शेष थी। तालाबों की उपयोगिता के बारे में निरुपमा की दृष्टि साफ़ होती चली गई। इसी बीच निरुपमा के एक मित्र ने उन्हें तालाब पुस्तक भेंट की। निरुपमा का जीवन पुस्तक पढ़ते-पढ़ते बदलता गया। रोजी-रोटी का पक्का प्रबंध न होने के बावजूद निरुपमा ने इसका बांग्ला अनुवाद किया। अब इस अनुवाद का दूसरा संस्करण भी छप चुका है।
कई राज्यों से गुजरते हुए पुस्तक के किस्से महाराष्ट्र भी पहुँचे। कभी जलसंसाधन मंत्रालय के सचिव रह चुके औरंगाबाद के प्रसिद्ध इंजीनियर माधव चितले की आँखों के सामने से जैसे ही यह पुस्तक गुजरी, उन्होंने इसके मराठी अनुवाद की तत्काल ज़रूरत महसूस की। बेशक यह पुस्तक आज की इंजीनियरिंग शिक्षा पद्धति को आईना दिखाता है, फिर भी माधव जी ने इसका मराठी अनुवाद ‘औरंगाबाद संस्कृति मंडल’ के सौजन्य से छापा।
भूकंप में ध्वस्त हो चुके गुजरात में भी इस पुस्तक का अनुवाद किया गया। श्री दिनेशभाई संघवी ने पुस्तक का अनुवाद किया तथा गुजराती समाचार पत्र ‘जन्मभूमि प्रवासी’ ने इसे धारावाहिक रूप में छापा।

देशभर में अमृत छिड़कने के बाद यह पुस्तक  फ्रांस की एक लेखिका एनीमोंतो के हाथ लगी। एनीमोंतो ने इसे दक्षिण अफ्रीकी रेगिस्तानी क्षेत्रों में पानी के लिए तड़पते लोगों के लिए उपयोगी समझा। फिर उन्होंने इसका फ्रेंच अनुवाद किया। ताज़ा जानकारी के अनुसार पुस्तक के प्रभाव के कारण इस क्षेत्र में पानी की सँभाल में काफी तेज़ी आई है।
भारत ज्ञान-विज्ञान परिषद ने इसकी 25 हज़ार प्रतियाँ छापकर मुफ्त में बांटी। मध्यप्रदेश जनसंपर्क विभाग ने भी 25 हज़ार प्रतियाँ छापकर प्रदेश की प्रत्येक पंचायत तक पहुँचाया। भोपाल के राज्य संसाधन केंद्र ने इसकी 500 प्रतियाँ 500 गाँवों में बाँटी। अहमदाबाद की ‘उत्थान माहिती’ नामक संस्था ने 500 प्रतियाँ छापकर सामाजिक संस्थाओं में मुफ्त बाँटी। नागपुर के स्वराज प्रकाशन ने 5 हज़ार प्रतियाँ छापकर मुफ्त में बाँटी। बिहार के जमालपुर की संस्था ‘नई किताब’ ने भी इसकी 11 सौ प्रतियाँ बाँटी। देशभर के 16 रेडियो स्टेशन पुस्तक को धारावाहिक रूप में ब्रॉडकास्ट कर चुके हैं। कपार्ट की सुहासिनी मुले ने इस पुस्तक पर बीस मिनट की फिल्म भी बनाई है। सीमा राणा की बनाई फिल्म दूरदर्शन पर आठ बार प्रसारित हो चुकी है।
भोपाल के शब्बीर कादरी ने पुस्तक का उर्दू अनुवाद किया और मध्यप्रदेश के मदरसों में मुफ्त में बाँटी। उर्दू तथा पंजाबी अनुवाद पाकिस्तान भी पहुँच चुके है।
गुजरात की एक संस्था ‘समभाव’ के श्री फरहाद कांट्रेक्टर पर इस पुस्तक का गहरा प्रभाव पड़ा। श्री फरहाद राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, अलवर, जोधपुर, महाराष्ट्र तथा गुजरात के कई हिस्सों में पुराने जल स्रोतों को बचाने के एक विराट काम में जुटे हैं। गुजरात की ही श्रीमती डेजी कांट्रेक्टर इस पुस्तक के अंग्रेज़ी अनुवाद कर रही हैं।
सदियों से ऐसी मान्यता है कि मनुष्य जाति का विकास मीठे जल-स्रोतों के मुहानों पर ही हुआ। जीवन के राग-विराग मनुष्य ने वहीं पर सीखे, लेकिन विकास की अंधी होड़ में मनुष्य के चारों ओर अंधेरा बढ़ता जा रहा है। इस अंधेरे की बाती को हम सब तथा हमारी तरह-तरह की नीतियाँ-प्रणालियाँ दिन-ब-दिन बुझाने की कोशिश में लगी हुई हैं।
देश के अधिकतर लेखक तथा प्रकाशक पुस्तकें न पढऩे वाले पाठकों का रोना रोते हैं। पर वे शायद ये भूल जाते हैं कि पुस्तकों का सच्चा अर्थ समाज के नाम लिखा प्रेम-पत्र होता है। और कितनी पुस्तकें ऐसी होती हैं, जिनमें समाज के लिए प्रेम भरा होता है?
श्री अनुपम मिश्र की इस कृति ने यही काम किया है। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पुस्तक न केवल धरती का, बल्कि मन-माथे का अकाल भी दूर करती है।

मन और माथा

भाषा और पर्यावरण
- अनुपम मिश्र
किसी समाज का पर्यावरण पहले बिगडऩा शुरू होता है या उसकी भाषा- हम इसे समझकर सँभल सकने के दौर से अभी तो आगे बढ़ गए हैं। हम ‘विकसित’ हो गए हैं।
भाषा यानी केवल जीभ नहीं। भाषा यानी मन और माथा भी। एक का नहीं, एक बड़े समुदाय का मन और माथा जो अपने आसपास के और दूर के भी संसार को देखने-परखने-बरतने का संस्कार अपने में सहज सँजो लेता है। ये संस्कार बहुत कुछ उस समाज की मिट्टी, पानी, हवा में अंकुरित होते हैं, पलते-बढ़ते हैं और यदि उनमें से कुछ मुरझाते भी हैं तो उनकी सूखी पत्तियाँ वहीं गिरती हैं, उसी मिट्टी में खाद बनाती हैं। इस खाद यानी असफलता की ठोकरों के अनुभव से भी समाज नया कुछ सीखता है।
लेकिन कभी-कभी समाज के कुछ लोगों का माथा थोड़ा बदलने लगता है। यह माथा फिर अपनी भाषा भी बदलता है। यह सब इतने चुपचाप होता है कि समाज के सजग माने गए लोगों के भी कान खड़े नहीं हो पाते। इसका विश्लेषण, इसकी आलोचना तो दूर, इसे कोई क्लर्क या मुंशी की तरह भी दर्ज नहीं कर पाता।
इस बदले हुए माथे के कारण हिंदी भाषा में 50-60 बरस में नए शब्दों की एक पूरी बारात आई है। बारातिये एक-से एक हैं पर पहले तो दूल्हे राजा को ही देखें। दूल्हा है विकास नामक शब्द। ठीक इतिहास तो नहीं मालूम कि यह शब्द हिंदी में कब पहली बार आज के अर्थ में शामिल हुआ होगा। पर जितना अनर्थ इस शब्द ने पर्यावरण के साथ किया है, उतना शायद ही किसी और शब्द ने किया हो। विकास शब्द ने माथा बदला और फिर उसने समाज के अनगिनत अंगों की थिरकन को थामा। अंग्रेजों के आने से ठीक पहले तक समाज के जिन अंगों के बाक़ायदा राज थे, वे लोग इस भिन्न विकास की ‘अवधारणा’ के कारण आदिवासी कहलाने लगे। नए माथे ने देश के विकास का जो नया नक्शा बनाया, उसमें ऐसे ज्यादातर इलाके ‘पिछड़े’ शब्द के रंग से ऐसे रँगे गए, जो कई पंचवर्षीय योजनाओं के झाडू-पोंछे से भी हल्के नहीं पड़ पा रहे। अब हम यह भूल ही चुके हैं कि ऐसे ही ‘पिछड़े’ इलाकों की संपन्नता से, वनों से, खनिजों से, लौह-अयस्क से देश के अगुआ मान लिये गए हिस्से कुछ टिके से दिखते हैं।
कुछ मुट्ठी भर लोग पूरे देश की देह का, उसके हर अंग का विकास करने में जुट गए हैं। ग्राम विकास तो ठीक, बाल विकास, महिला विकास सब कुछ लाइन में है।
अपने को, अपने समाज को समझे बिना उसके विकास की इस विचित्र उतावली में गज़ब की सर्वसम्मति है। सभी राजनैतिक दल, सभी सरकारें, सभी सामाजिक संस्थाएँ, चाहे वे धार्मिक हों, मिशन वाली हों, या वर्ग संघर्ष वाली- गर्व से विकास के काम में लगी हैं, विकास की इस नई अमीर भाषा ने एक नई रेखा भी खींची है- गरीबी की रेखा। लेकिन इस रेखा को खींचने वाले संपन्न लोगों की $गरीबी तो देखिए कि तमाम कोशिशें रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या में कमी लाने के बदले उसे लगातार बढ़ाती जा रही हैं।
पर्यावरण की भाषा इस सामाजिक-राजनैतिक भाषा से रत्ती-भर अलग नहीं है। वह हिंदी भी है यह कहते हुए डर लगता है। बहुत हुआ तो आज के पर्यावरण की ज्यादातर भाषा देवनागरी कही जा सकती है। लिपि के कारण राजधानी में पर्यावरण मंत्रालय से लेकर हिंदी राज्यों के कस्बों, गाँवों तक के लिए बनी पर्यावरण संस्थाओं की भाषा कभी पढ़कर तो देखें। ऐसा पूरा साहित्य, लेखन, रिपोर्ट सब कुछ एक अटपटी हिंदी से पटा पड़ा है।
कचरा- शब्दों का और उनसे बनी विचित्र योजनाओं का ढेर लगा है। इस ढेर को ‘पुनर्चक्रित’ भी नहीं किया जा सकता। दो- चार नमूने देखें। सन् 80 से आठ-दस बरस तक पूरे देश में सामाजिक वानिकी नामक योजना चली। किसी ने भी नहीं पूछा कि पहले यह तो बता दो कि असामाजिक वानिकी क्या है? यदि इस शब्द का, योजना का सम्बन्ध समाज के वन से है, गाँव के वन से है तो हर राज्य के गाँवों में ऐसे विशिष्ट ग्रामवन, पंचायती वनों के लिए एक भरा-पूरा शब्द-भंडार, विचार और व्यवहार का संगठन काफ़ी समय तक रहा है। कहीं उस पर थोड़ी धूल चढ़ गई थी तो कहीं वह मुरझा गया था, पर वह मरा तो नहीं था। उस दौर में कोई संस्था आगे नहीं आई इन बातों को लेकर। मरूप्रदेश में आज भी ओरण (अरण्य से बना शब्द) हैं। ये गाँवों के वन, मंदिर देवी के नाम पर छोड़े जाते हैं। कहीं-कहीं तो मीलों फैले हैं ऐसे जंगल। इनके विस्तार की, संख्या की कोई व्यवस्थित जानकारी नहीं है। वन विभाग कल्पना भी नहीं कर सकता कि लोग ओरणों से एक तिनका भी नहीं उठाते।
अकाल के समय में ही इनको खोला जाता है। वैसे ये खुले ही रहते हैं, न कटीले तारों का घेरा है, न दीवारबंदी ही। श्रद्धा, विश्वास का घेरा इन वनों की रखवाली करता रहा है। हज़ार- बारह सौ बरस पुराने ओरण भी यहाँ मिल जाएँगे। जिसे कहते हैं बच्चे-बच्चे की ज़बान पर ओरण शब्द रहा है पर राजस्थान में अभी कुछ ही बरस पहले तक सामाजिक संस्थाएँ, श्रेष्ठ वन विशेषज्ञ या तो इस परंपरा से अपरिचित थे या अगर जानते थे तो कुछ कुतूहल भरे, शोध वाले अंदाज़ में। ममत्व, यह हमारी परंपरा है, ऐसा भाव नहीं था उस जानकारी में।
ऐसी हिंदी की सूची लम्बी है, शर्मनाक है। एक योजना देश की बंजर भूमि के विकास की आई थी। उसकी सारी भाषा बंजर ही थी। सरकार ने कोई 300 करोड़ रुपया लगाया होगा पर बंजर-की-बंजर रही भूमि। फिर योजना ही समेट ली गई। और अब सबसे ताज़ा योजना है जलागम क्षेत्र विकास की। यह अंग्रेजी के वॉटरशेड डेवलपमेंट का हिंदी रूप है। इससे जिनको लाभ मिलेगा, वे लाभार्थी कहलाते हैं, कहीं हितग्राही भी हैं। ‘यूज़र्स ग्रुप’ का सीधा अनुवाद उपयोगकर्ता समूह भी यहाँ है। तो एक तरफ़ साधन -सम्पन्न योजनाएँ हैं, लेकिन समाज से कटी हुई। जन भागीदारी का दावा करती हैं पर जन इनसे भागते नज़र आते हैं तो दूसरी तरफ़ मिट्टी और पानी के खेल को कुछ हज़ार बरस से समझने वाला समाज है। उसने इस खेल में शामिल होने के लिए कुछ आनंददायी नियम, परंपराएँ, संस्थाएँ बनाई थीं। किसी अपरिचित शब्दावली के बदले एक बिल्कुल आत्मीय ढांचा खड़ा किया था। चेरापूंजी, जहाँ पानी कुछ गज़ भर गिरता है, वहाँ से लेकर जैसलमेर तक जहां कुल पाँच-आठ इंच वर्षा हो जाए तो भी आनंद बरस गया-ऐसा वातावरण बनाया। हिमपात से लेकर रेतीली आँधी में पानी का काम, तालाबों का काम करने वाले गजधरों का कितना बड़ा संगठन खड़ा किया गया होगा। कोई चार-पाँच लाख गाँवों में काम करने वाले उस संगठन का आकर इतना बड़ा था कि वह सचमुच निराकार हो गया। आज पानी का, पर्यावरण का काम करने वाली बड़ी-से-बड़ी संस्थाएँ उस संगठन की कल्पना तो करके देखें। लेकिन वॉटरशैड, जलागम क्षेत्र विकास का काम कर रही संस्थाएँ, सरकारें, उस निराकार संगठन को देख ही नहीं पातीं। उस निराकार से टकराती हैं, गिर भी पड़ती हैं, पर उसे देख, पहचान नहीं पातीं। उस संगठन के लिए तालाब एक वॉटर बॉडी नहीं था। वह उसकी रतन तलाई थी। झुमरी तलैया थी, जिसकी लहरों में वह अपने पुरखों की छवि देखता था। लेकिन आज की भाषा जलागम क्षेत्र विकास को मत्स्य पालन से होने वाली आमदनी में बदलती है।
इसी तरह अब नदियाँ यदि घर में बिजली का बल्ब न जला पाएँ ,तो माना जाता है कि वे ‘व्यर्थ में पानी समुद्र में बहा रही है।’ बिजली जरूर बने, पर समुद्र में पानी बहाना भी नदी का एक बड़ा काम है। इसे हमारी नई भाषा भूल रही है। जब समुद्रतटीय क्षेत्रों में भूजल बड़े पैमाने पर खारा होने लगेगा- तब हमें नदी की इस भूमिका का महत्त्व पता चलेगा।
लेकिन आज तो हमारी भाषा ही खारी हो चली है। जिन सरल, सजल शब्दों की धाराओं से वह मीठी बनती थी, उन धाराओं को बिल्कुल नीरस, बनावटी, पर्यावरणीय, पारिस्थितिक जैसे शब्दों से बाँधा जा रहा है। अपनी भाषा, अपने ही आँगन में विस्थापित हो रही है, वह अपने ही आँगन में पराई बन रही है।
(पुस्तक: ‘साफ़ माथे का समाज’ से )

शोध से ज्यादा श्रद्धा की जरूरत

शोध से ज्यादा श्रद्धा की जरूरत
- अनुपम मिश्र

रुड़की इंजीनियरिंग, बहुत कम लोगों को पता होगा कि भारत ही नहीं एशिया का पहला इंजीनियरिंग कालेज कहाँ बना था? आप जानते हैं वह कब और क्यों बना?
यह जानना इसलिए भी जरूरी है, कि आज तकनीकी का जो हमारा थोड़ा पढ़ा लिखा समाज है उसकी नींव में हमारे वे अनपढ़ लोग रहे हैं जिनको हमने दुत्कार कर अलग कर दिया। लेकिन शायद ही इसके बारे में किसी को पता हो। मुझे चार-पाँच आईआईटी में जाने का मौका मिला है। मैंने वहाँ के फैकल्टी से भी यह जानने की कोशिश की कि क्या उन्हें पता है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई कहाँ से शुरू होती है। आप उन्हें दोष न दें, लेकिन उनको भी नहीं पता। आज हम मानते हैं कि जितने सुविधा सम्पन्न शहर में रहेंगे उतनी अच्छी पढ़ाई होगी। लेकिन देश का पहला इंजीनियरिंग संस्थान कोई दिल्ली, मुंबई या कोलकाता मद्रास में नहीं बना। और जब बना तो उसमें प्रवेश के लिए कोई कैट टेस्ट भी नहीं देना होता था। जिसने बनाया वह भी देश में कोई उच्च शिक्षा का काम करने नहीं आए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी वाले साफ-साफ व्यापार करने आए थे या शुद्ध हिन्दी में कहें तो लूटने के लिए आए थे; इसलिए उनको उच्च शिक्षा का कोई केन्द्र खोलने की जरूरत नहीं थी।
लेकिन 1847 में उसने हरिद्वार के पास रूड़की नामक एक छोटे से गाँव में पहला इंजीनियरिंग कालेज खोला था। उस समय शायद रूड़की गाँव की आबादी 700-750 रही होगी। वह हमारे देश का पहला इंजीनियरिंग कालेज था। और उसे बनाने का एकमात्र कारण था लोकज्ञान का उपयोग। जिस लोकबुद्धि को हम भूल चूके हैं, और अनपढ़ गँवार समझ बैठे हैं रूड़की इंजीनियरिंग कालेज बनाने में उन्हीं लोगों की प्रेरणा थी। प्रसंग यह था कि अकाल चल रहा था। लोग मर रहे थे। लोग मरें इससे ईस्ट इंडिया कंपनी को कोई फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन एक सहृदय अंग्रेज अधिकारी ने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक डिस्पैच भेजकर कहा कि जो लोग मर रहे हैं उनमें तो आप लोगों को कोई दिलचस्पी नहीं होगी ; लेकिन अगर यहाँ आप एक नहर बनाएँगे तो आपको सिंचाई का कर मिलना शुरू हो जाएगा और अकाल से लोग निपट लेंगे। लेकिन मुश्किल यह थी कि उस समय कोई पीडब्लूडी नहीं था। पब्लिक वर्क की ऐसी अवधारणा उस समय नहीं थी इसलिए कोई विभाग भी नहीं था।
अंग्रेज महोदय ने स्थानीय लोगों को इकट्ठा किया। उनसे पूछा कि तुम लोग पानी का बहुत अच्छा काम जानते हो ,तो क्या नहर बना सकते हो? तो लोगों ने कहा कि हाँ बना सकते हैं। 200 किलोमीटर लंबी नहर बनानी थी ,लेकिन दो टुकड़े कागज भी नहीं प्रयोग किया गया। बिना ड्राईंग बोर्ड और बिना किसी यंत्र के उन्होंने यह नहर बनाई। मन पर उकेरा और जमीन नहर उभरती चली गयी। उसमें बीच में नहर को एक नदी पार करानी थी जिसमें नदी से ज्यादा पानी गंगा का निकाल कर ले जाना था। आज हम अंग्रेजी में इसे अक्वाडक कहते हैं। वह भी उन लोगों ने ही डिजाइन किया था।
इन देहाती और गँवार लोगों ने चूने गारे की मदद से 200 किलोमीटर की नहर बनाई। आज इस नहर को 200 साल हो गए, लेकिन अभी भी यह नहर बराबर चलती है। लेकिन अंग्रेज अधिकारी ने ऐसा काम देखा तो फिर से उसने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक पत्र लिखा। उसने सुझाव दिया कि ऐसे गुणीजन लोगों के बच्चों को पढ़ाने-चमकाने के लिए एक छोटा- सा इंजीनियरिंग कालेज यहाँ होना चाहिए। यह इन अनपढ़ लोगों की देन थी या उनका ये चमत्कार था कि अंग्रेज अधिकारी जो लूटने आया था ,उसको एक इंजिनीयरिंग कालेज खोलकर देना पड़ा। जिन देशों को आज हम तरक्की का सूरमा मानते हैं ,उन जापान और कोरिया में भी तब तक कोई इंजीनियरिंग कालेज नहीं बना था। तब हमारे यहाँ इंजीनियरिंग कालेज खुला, जो कि अनपढ़ लोगों की देन थी।
लेकिन दस साल बाद ही गदर शुरू हो गया। 1847 के बाद 57। जो उदार गिने-चुने अधिकारी इस तरह के प्रयोगों को बढ़ावा दे रहे थे कि यहाँ के जो लोग अनपढ़ माने जाते हैं वे बाकायदा इंजीनियर हैं और उससे ये देश चलना चाहिए, गदर से वह धारा एकदम से कट गयी। सबको ब्लैक लिस्ट किया गया और साफ-साफ कहा गया कि जो ईस्ट इंडिया कंपनी के वफादार हैं ,उन्हें ये सब पढ़ाई पढ़नी चाहिए। उनको और कोई चीज आती हो तो आए, हमारे लिए वे अनपढ़ हैं। इस तरह से वह रस्सी तब कटी ;लेकिन फिर कभी वह रस्सी हम जोड़ नहीं पाए।
30-35 साल में काम करते हुए मैंने यह सब शोध के नजरिए से नहीं देखा। इसको मैंने श्रद्धा से देखा। शोध में तो पाँच साल का प्रोजेक्ट होगा। मुझे मंत्रालय से पैसा मिलेगा , तो करूँगा नहीं मिलेगा तो नहीं करूँगा। लेकिन अगर हम श्रद्धा रखेंगे, तो हम उस काम को सब तरह की रुकावटों के बाद भी करके आगे जाएँगे। इसके लिए विशेषज्ञ बनना जरूरी नहीं। हमें समाज का मुंशी बनना होगा। समाज के अच्छे काम को मुंशी की तरह लोगों के सामने रखना होगा। तब शायद हमारी यह चिंता थोड़ी कम हो सके कि जिस समाज को हम पिछड़ा और अनपढ़ कहते हैं उनको साक्षर करने की जरूरत नहीं है बल्कि उनसे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। (इंडिया वाटर पोर्टल से)