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Aug 12, 2015

विचार

अहं पर नियंत्रण करना सीखें...

 -भावना सक्सैना

एक सहेली धूप में बैठी रो रही थी,
उसका साथी कोई नहीं था।
उठो सहेली आँखें पोंछो,
 मुँह धो लो, अपना साथी ढूँढ लो।


... बचपन का यह खेल आज बहुत याद आ रहा है। काश कि ऐसा ही आसान होता मन का साथी ढूँढना। आज हम सब एक ऐसे समाज में हैं, विशेषकर  शहरों में जहाँ एक बड़ा सामाजिक दायरा होते हुए भी हम नितांत अकेले हैं! यह सामाजिक दायरा हँसने- बोलने का मौका भले ही देता हो उसके साथ-साथ एक ऐसी कुंठा को भी जन्म देता है जो भीतर ही भीतर इंसान को खा जाती है। आदर्श के रूप में देखे जाने की चाह, सब कुछ परफेक्ट रखने की चाह, सबसे ऊँचा उठने की चाह। अजब प्रतिस्पर्धा है; कि जिंदगी एक दौड़ से अधिक कुछ बची ही नहीं! मन के सच्चे साथी, जिनके सामने अपना दिल खोलकर रख दिया जाए, एक दुर्लभ प्रजाति से हो गए है।
जिस तरह से पिछले कुछ समय से न सिर्फ आत्महत्या, बल्कि अपने पूरे परिवार को समाप्त कर आत्महत्या करने के भी बढ़ते मामले सामने आ रहे हैं; वह वास्तव में चिंता का विषय है। हाल ही में कई ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं , जिनमें से अधिकतर संभ्रांत समाज में ही हुई हैं। यह देख स्वत: ही प्रश्न उठता है कि आज हमारा समाज आखिर जा किधर रहा है? क्या कारण है कि सुशिक्षित, संपन्न व प्रतिष्ठित व्यक्ति , जिन्हें ऊपरी तौर पर देखने से कोई समस्या नहीं है अचानक ऐसा कदम उठा लेते हैं? क्या देह के अंत से सभी समस्याओं का अंत हो जाता है? क्यों एक व्यक्ति अपने प्रियजनों को दर्दनाक मृत्यु प्रदान कर स्वयं का अंत करता है और सम्पूर्ण विश्व के समक्ष कौतूहल का विषय बन जाता है?
शायद इसका सबसे बड़ा कारण है -अपनी भावनाओं, अपनी शिकायतों और अपने दर्द को किसी से साझा न करना उसे तब तक अपने अंदर समेटते जाना जब तक कि पक कर वह लावा न बन जाए और जब बाहर निकले तो सब कुछ जलाकर राख कर दे। महानगरों के सम्भ्रान्त समाज में रिश्ते सिकुड़ गए हैं, अपने को सुपर दिखाने की चाह में अपनी तकलीफों को अपने अंदर बंद करते जाते हैं लोग। आधुनिकता का ही असर है कि चाह कर भी कुछ कह नहीं पाते। बस इसी फिक्र में उलझे रहते हैं कि अमुक व्यक्ति हमारे बारे में क्या सोचेगा। मुस्कुराहट का लबादा ओढ़े अपनी तकलीफों से जूझते रहते हैं, यहाँ तक कि अपने सबसे करीबी, अपने हमसफर, अपने दोस्तों से भी अपने मन की बात नहीं कह पाते, अपनी भावनाओं को प्रकट नहीं कर पाते। जाने अनजाने अपनों से भी शिकायतें इकट्ठा करते जाते हैं। बस एक ही विचार कि अपने आप को किसी के सामने कमज़ोर नहीं पडऩे देना है। यह रवैया एकदम गलत है। इंसान एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहने के लिए ही बना है, अपनी अच्छाइयों, बुराइयों, सकारात्मकता और नकारात्मकता के साथ। उसे साथ चाहिए, दिल की बात कह लेने को, तो कभी भी यह न सोचें कि यदि हमने अपने दिल की बात किसी से की तो वह व्यक्ति क्या सोचेगा। अपने विचारों को प्रकट करें, अपनी भावनाओं को बाँटें।
कनाडा के अग्रणी मनोवैज्ञानिक, सिडनी जुरर्ड के अनुसार अपनी भावनाओं को प्रकट करना मानसिक स्वास्थ्य का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मानसिक रूप से स्वस्थ लोगों/व्यक्तियों के महत्त्वपूर्ण विचारों और भावनाओं को साझा करने के लिए कम से कम एक ऐसा व्यक्ति होता है जिस पर वह पूर्ण रूप से विश्वास करते हैं। आज महानगरीय जीवन में हर किसी के जीवन में ऐसे एक विश्वासपात्र की कमी है। हम में से हर किसी को वह व्यक्ति ढूँढना होगा। अपने आसपास, परिवार में, मित्रों में, पड़ोसियों में। परिवार के सदस्यों, सहयोगियों या करीबी दोस्तों के साथ अपने विचारों, चिंताओं और भावनाओं को साझा करके हम स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं। इससे हमारे विचार और भावनाएँस्पष्ट हो जाते हैं। दूसरों के साथ खुला संचार हमें हमारे घर के आस-पास की दुनिया के बारे में हमारी समझ को बढ़ाने का एक बहुत महत्त्वपूर्ण रास्ता है।
अब प्रश्न यह उठता है कि अपने मन का साथी खोजे कहाँ और कैसे? तो वास्तव में बहुत दूर जाने की आवश्यकता भी नहीं है। हमारे इर्द-गिर्द हमारे बहुत से हितैषी होते हैं, जो हमारी ही तरह संकोच के कारण हमसे खुल नहीं पाते। ऐसे बहुत कम व्यक्ति होते हैं ; जो आपकी खामोशी को पहचानें, यदि आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है , जो आपकी खामोशी को पहचानता है;  तो सच मानिए आप बहुत भाग्यशाली हैं। आम तौर पर व्यक्ति को स्वयं आगे बढ़कर ही अपने मन की बात कहनी होगी। आप अपने मन की बात नहीं बताएँगे तो किसी को पता नहीं चलेगा कि आप किन परिस्थितियों से गुज़र रहे हैं। हाँ यह ध्यान जरूर रखना होगा कि अपनी भावनाओं को किस सीमा तक और किसके सामने उजागर करें। यह एक संवेदनशील मामला है ; क्योंकि व्यक्ति की प्रकृति पर निर्भर है कि वह दूसरे की बातों को सिर्फ अपने तक ही सीमित रखता है या जाकर उसकी ढिंढोरा पीट देता है। इसलिए अपने भावों को उजागर करने से पहले आप सामने वाले व्यक्ति की संवेदनशीलता से परिचित रहें।
हमारे म्बन्ध हमारे आसपास ही पनपते हैं, घर पर व घर के बाहर के रिश्ते दोनों ही बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और हमारी संतुष्टि व खुशी इन सम्बन्धों के स्वरूप से अभिन्न रूप से जुड़ी है। कार्यस्थल पर हमारा कार्य- निष्पादन इस बात पर निर्भर है कि हमारे अपने अधिकारी, सहकर्मी अथवा ग्राहक के साथ कैसे सम्बन्ध हैं। घर-परिवार में हमारा व्यवहार हमारे सम्बन्धों के अनुसार होता है और व्यक्तिगत जीवन में हमारा सुख और दु:ख हमारे सबसे करीबी व्यक्तियों के साथ हमारे सम्बन्धों पर निर्भर है। हमें यह समझना होगा कि चाहे हम स्वयं को कितना भी महत्त्वपूर्ण क्यों न मानें दुनिया हमारे चारों ओर नहीं घूमती है। सम्बन्धों  में सफलता की कुंजी एक दूसरे से सीखने में है। इंसान की सबसे मूल्यवान अनुभूति उसकी सोच है। इंसान की योग्यता उसकी सोच पर ही टिकी है । सम्बन्धों को मधुर बनाए रखने के लिए जहाँ अपना हाथ आगे बढ़ाना जरूरी है वहीं अपने अहं को दबाना भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। महाभारत की एक कथा है।
अर्जुन को अपनी धनुर्विद्या पर बहुत अहंकार था। वह समझते थे कि कौरवों और पांडवों की सेना में उनके जैसा धनुर्धर व योद्धा कोई दूसरा नहीं था। भगवान कृष्ण से उनका यह अहं भाव छिपा नहीं था। उनका अहंकार दूर करने के लिए उन्होंने एक उपाय किया। जब अर्जुन कर्ण से लड़ रहे थे तो श्री कृष्ण बार-बार वाह कर्ण! वाह कर्ण! पुकारने लगे। अर्जुन को उनका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा। उन्होंने कृष्ण से पूछा- आप बार-बार कर्ण की प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? जब वह बाण चलाता है , तो हमारा रथ मात्र चार-पाँच कदम पीछे जाता है, जबकि जब मैं बाण चलाता हूँ ,तो उसका रथ चार-पाँच सौ कदम पीछे चला जाता है। आप यह देख कर भी वाह कर्ण कहते हैं? अर्जुन की बात सुन कृष्ण मुस्करा कर बोले- मैं सब देख रहा हूँ अर्जुन, मुझसे कुछ नहीं छिपाकिन्तु जो मैं देख रहा हूँ एक बार तुम भी देख लो। यह कहकर वे रथ से नीचे उतर गए। उन्होंने हनुमान को भी पताका से नीचे उतर आने को कहा। अब जब कर्ण ने बाण मारा तो अर्जुन का रथ हवा में उड़कर गायब हो गया। तब हनुमान ही उसे खोज कर लाए। अर्जुन का घमंड चूर हो गया था। तब कृष्ण दोबारा बोले-  देखो, यह मेरे और हनुमान के कारण था कि तुम्हारा रथ चार-पाँच कदम पीछे ही जाता था। तुमने अपने अहं के रथ का हाल देख लिया। तुम्ही बताओ मैं कर्ण की प्रशंसा नहीं करूँ ,तो क्यों नहीं करूँ?
यह कथा दर्शाती है कि व्यक्ति स्वयं पर मिथ्या अहं करता है, उसके कार्य, उसका सामर्थ्य सभी अन्यत्र आश्रित होते हैं, परिस्थितिजन्य होते हैं। तो अपने अहं पर विजय प्राप्त करें और अपने मन का साथी ढूँढ लें। मधुर जीवन के लिए जरूरी है कि सम्बन्धों में मधुरता हो, सहजता हो जो अपने अहं को नियंत्रित करके ही लाई जा सकती है। एक सामान्य बालक बचपन से लेकर युवावस्था तक दिन में न जाने कितनी बार 'सुनता है और यही नकारात्मकता उसके भीतर भर जाती है, इसलिए नकारात्मकता से बचने व उबरने का सायास प्रयास करें। परमपिता परमात्मा में आस्था रखें और अपना ध्यान सकारात्मकता पर केन्द्रित करें , फिर भी यदि कोई समस्या है तो पहले स्वयं शान्त हो जाएँ। यदि कोई समस्या है तो अपने आप को उसके बारे में सोचने के लिए समय और स्थान दें। इससे आपके विचार और भावनाएँ वास्तविक समस्या पर केन्द्रित होंगी और आपको सोचने के लिए समय मिलेगा। भावुकता में लिए निर्णय पर अकसर बाद में पछताना पड़ सकता है।

सम्पर्क: 64, प्रथम तल इंद्रप्रस्थ कॉलोनी सेक्टर 30-33 फरीदाबाद, हरियाणा-121003 मो. 9560719353, Email- bhawnavsaxena@gmail.com

बोधकथा

दर्द का अहसास

-श्याम सुन्दर अग्रवाल

 बगदाद के ख़लीफा का एक ही बेटा था। खलीफा के बाद उसे ही गद्दी सँभालनी थी। अत: खलीफा अपने इस शहजादे को राजकार्य की शिक्षा दिलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने शहजादे को एक वृद्ध काज़ी के पास भेज दिया। काज़ी के पास रहकर वह शिक्षा ग्रहण करने लगा। काज़ी ने उसे हर तरह की शिक्षा दी, एक-एक बात समझाई।
एक दिन ख़लीफा काज़ी के पास पहुँचे और पूछा, 'हज़रत! क्या शहजादे ने सब कुछ सीख लिया?’
काज़ी ने कहा, 'बादशाह सलामत! लगभग सारी शिक्षा इसने ग्रहण कर ली है। बस एक आखिरी सबक शेष रह गया है।  इतना कह कर उसने शहजादे को वस्त्र उतारने के लिए कहा। शहजादे ने वस्त्र उतारे तो काज़ी ने उसकी पीठ पर दो कोड़े मारे।
शहजादे की पीठ पर कोड़ों की मार से ख़लीफा हैरान रह गए। उन्होंने पूछा, 'यह आपने क्या किया?’
काज़ी ने कहा, 'जब यह बादशाह बनेगा तो लोगों को कोड़े मारने की सज़ा सुनाया करेगा। मैंने इसे कोड़े मार कर दर्द का एहसास करवा दिया है। अब सज़ा सुनाते वक्त इसे तकलीफ का एहसास रहेगा। गुनाह देखकर ही सज़ा देगा।

सम्पर्क:  बी- 757, गली नं. 5, प्रताप सिंह नगर, कोट कपूरा (पंजाब) 151204, मो. 09888536437, Email- sundershyam60@gmail.com


किस उम्र में शुरू हो स्कूल?

खेलकूद से ज्यादा सीखते हैं बच्चे

हमारे देश में स्कूली शिक्षा शुरू करने की उम्र लगातार कम होती जा रही है। कहीं-कहीं तो बच्चे को दो-ढाई साल की उम्र में ही स्कूल में डाल दिया जाता है और ये स्कूल नाममात्र के प्ले-स्कूल होते हैं। यहाँ बच्चों को वर्णमाला, गिनती, अंग्रेज़ी के शब्द सिखाने का औपचारिक सिलसिला शुरू कर दिया जाता है। मगर दुनिया भर में किए गए कई अध्ययन दर्शाते हैं कि ऐसा करना हानिकारक हो सकता है। कम से कम इतना तो स्पष्ट है कि जल्दी स्कूल भेजने से बच्चे को कोई फायदा नहीं होता।
इस संदर्भ में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के विकास मनोवैज्ञानिक डेविड व्हाइटब्रेड और प्रारम्भिबचपन की शिक्षा की सलाहकार स्यू बिंगहैम ने वे तमाम प्रमाण प्रस्तुत करते हुए यू.के. सरकार से माँकी है कि स्कूल प्रारम्भ करने की उम्र को बढ़ा दिया जाए। फिलहाल इंग्लैण्ड में औपचारिक स्कूली शिक्षा की शुरुआत 4-5 साल की उम्र में हो जाती है।
ताज़ा बहस की शुरुआत प्रारंभिक शिक्षा के 130 विशेषज्ञों द्वारा प्रेषित एक पत्र के माध्यम से हुई है। इस पत्र में औपचारिक स्कूली शिक्षा की उम्र को 4 साल से बढ़ाकर 7 साल करने की माँ की गई है। दरअसल, इंग्लैण्ड में स्कूली शिक्षा की उम्र को घटाने का निर्णय 1870 में किसी शैक्षणिक वजह से नहीं; बल्कि इसलिए लिया गया था ताकि महिलाओं को काम पर लाया जा सके। आज भी सरकारी तौर पर यू.के. में साक्षरता व गणित शिक्षा की औपचारिक शुरुआत जल्दी से जल्दी करने और इन चीज़ों को बच्चों के मूल्यांकन में शामिल रखने का काफी ज़ोर है। हाँ तक कि शिक्षा विभाग तो कह रहा है कि 2 वर्ष के बच्चों को ही स्कूल में दाखिल कर देना चाहिए।
मगर बच्चों की दृष्टि से देखें तो प्रमाण यह है कि कम उम्र में उन्हें स्कूल में धकेलने से काफी नुकसान हो सकता है। इस बात के प्रमाण मानव वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक, तंत्रिका वैज्ञानिक और शैक्षिक अध्ययनों से मिले हैं। मसलन, वर्तमान शिकारी-संग्रहकर्ता समाजों में बच्चों के खेलकूद और अन्य स्तनधारी प्राणियों में बच्चों पर किए गए अध्ययन दर्शाते हैं कि खेलकूद ने मनुष्य को बेहतर सीखने-वाला और गुत्थियाँ सुलझाने वाला बनाने में मदद की है।
तंत्रिका वैज्ञानिक अध्ययन भी इस बात का समर्थन करते हैं कि सीखने में खेलकूद केन्द्रीभूमिका निभाते हैं। मसलन, 2009 में प्रकाशित पुस्तक 'दी प्लेफुल ब्रेन- वेन्चरिंग टु दी लिमिट ऑफ न्यूरोसाइन्समें उन तमाम अध्ययनों पर गौर किया गया है जो यह दर्शाते हैं कि खेलकूद की गतिविधियाँ तंत्रिकाओं के बीच ज़्यादा जुड़ाव बनाने में मददगार होती हैं। खास तौर से तंत्रिकाओं के बीच जुड़ाव बनने की यह क्रिया मस्तिष्क के अगले भाग में देखी गई है जो उच्चतर मानसिक कार्यों में शामिल होता है।
इसी प्रकार से प्रायोगिक मनोविज्ञान ने दर्शाया है कि प्रारंभिक शिक्षा में अध्यापन की विधि की अपेक्षा खेलकूद से सीखने की प्रेरणा ज़्यादा मिलती है। वर्ष 2002 में स्कूल स्तर पर किए गए एक अध्ययन में स्कूल में छठे वर्ष के अंत में बच्चों की उपलब्धियों की तुलना की गई थी। पता चला कि जिन बच्चों का स्कूल-पूर्व जीवन 'शिक्षाकी ओर उन्मुख था उनकी उपलब्धियाँ उन बच्चों से काफी कम रहीं ,जिन्हें खेलकूद का माहौल मिला था।
इसी प्रकार का एक अध्ययन 2004 में यू.के. में किया गया था। 3000 बच्चों के इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि ज़्यादा देर तक खेलकूद आधारित स्कूल-पूर्व अवधि का बच्चों की उपलब्धियों पर सकारात्मक असर होता है। न्यूज़ीलैण्ड में एक अध्ययन में पता चला है कि 5 साल की उम्र में शुरू करें या 7 साल की उम्र में, बच्चों की पठन क्षमता में 11 वर्ष की उम्र में कोई अंतर नहीं होता। और तो और, 5 साल की उम्र में शुरू करने वाले बच्चों का पढऩे के प्रति उत्साह जाता रहता है। इसी प्रकार का एक अध्ययन 55 देशों के 15-वर्षीय बच्चों पर किया गया था और इसमें भी पता चला था कि जल्दी औपचारिक शिक्षण शुरू करने से उपलब्धि में कोई अंतर नजऱ नहीं आता।

लगता है कि बचपन का स्कूलीकरण करने में बहुत जल्दी करने से फायदा तो दूर, नुकसान ही होने की आशंका ज़्यादा है। (स्रोत फीचर्स)

मृत्यु को रख मन में

जियो तो ऐसे...

सीखो तो ऐसे जैसे...

  - विजय जोशी

महात्मा गाँधी ने कहा था - जियो तो ऐसे जैसे कल मर जाना हो और सीखो तो ऐसे जैसे- अनंतकाल तक जीना हो ( Live as if you have to die tomorrow and learn as if you have to live for ever )
प्रबंधन के संदर्भ में यह शीर्षक कुछ अटपटा लग सकता है, पर इसमें बहुत सार छुपा है। जीवन एक स्टेज है जिस पर ऊपरवाले ने हमें भेजा है तमाम बुद्धि, विवेक, संस्कार की दौलत के साथ यह देखने के लिये कि हम अपना पार्ट कैसे अदा करते हैं। समय सीमा समाप्त हो जाने के बाद पर्दा गिर जाता है, तब ईश्वर फैसला करता है जिसे इतनी शिद्दत से संवार कर ढेर सारी खूबियों के साथ भेजा था वह धरती पर क्या करके आया। और तब हमारा फैसला होता है। एक बात और- विवेक की थाती सौंपने के साथ ही ईश्वर ने हमें परखने के लिए मोह, माया का जाल भी साथ ही सौंपा है। यह देखने के लिये हम अंदर से कितने ईमानदार तथा मजबूत हैं।
इंसान के जीवन में जन्म के बाद का एक मात्र शाश्वत सत्य यदि कोई है तो वह है मृत्यु। जीवन एक अनिश्चितता है। एक बार ईश्वर ने देह त्याग पश्चात् स्वर्ग हुँचे ऋषि से धरती पर गुजरे जीवन के अनुभव के बारे में पूछा तो ऋषि ने बेहद सटीक उत्तर दिया कि धरा पर उनके पल कुछ ऐसे बीत गए ,जैसे वे एक कमरे में प्रथम द्वार से प्रवेश कर दूसरे से निकल गए हों। इसके बाद भी हम जीवन के अस्थायित्व से मोहग्रस्त होकर जुड़े रहते हैं।
हम सब जानते हैं कि शरीर एक न एक दिन समाप्त हो जाना है। सभी कुछ यहीं छूट जाना है, केवल अच्छे कामों की दौलत हमारे साथ जाएगी, फिर भी आदमी ताउम्र लोभ, मोह, लालच में मशगूल होकर धन दौलत जोडऩे में लगा रहता है।
यक्ष से प्रश्नोत्तर प्रसंग के दौरान युधिष्ठिर ने इसकी   श्रेष्ठ व्याख्या की। जब उनसे पूछा गया कि धरती पर सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है तो धर्मराज ने कहा- इस मूढ़मति मानव के अतिरिक्त भला क्या हो सकता है, जो हर दिन किसी न किसी को मृत्यु के मुख में जाता देखकर भी सोचता है कि मृत्यु टाली जा सकती है। और जैसे- जैसे समय कम होता जाता है उसकी लालसा तीव्रतर होती जाती है। सब कुछ छोड़कर जाना है यह सत्य एवं तथ्य जानते हुए भी वह येन केन प्रकारेण संग्रह में लिप्त बना रहता है। अत: इतने बड़े सत्य से नेत्र होते हुए भी अन्धे बने रहने वाले मानव से बड़ा आश्चर्य भला क्या हो सकता है।
हिंदू दर्शन में संन्यास का एक प्रकार श्मशान वैराग्य है। आदमी जब भी अपने किसी अंतरंग की अंतिम यात्रा हेतु वहाँ पहुँचता है तो उसके मन में एक वीतराग और वैराग्य का भाव पूरी शिद्दत के साथ उभरता है। जीवन की क्षण भंगुरता से भिज्ञ हो वह उस पल से पाप कर्म त्यागकर सन्मार्ग पर चलने की प्रासंगिकता को पूरे मनोयोग से स्वीकारता है, किंतु उसकी स्मृति इतनी अल्पकालीन है कि वहाँ से बाहर निकलते ही वह फिर उसी जोड़ -तोड़ और हेरा -फेरी में लिप्त हो जाता है.
अनेक महापुरुषों ने सत्य के मार्ग के अनुसरण हेतु हमें ज्ञान प्रदान किया, किंतु व्यर्थ। सिकंदर महान ने मृत्यु पूर्व अपने अनुयायियों को बुलाया और उन्हें मृत्योपरांत तीन आज्ञा पालन हेतु आदेश दिया।
पहली यह कि उनका निजी उपचारकर्ता शव के साथ साथ चले, दूसरी यह कि युद्ध द्वारा अर्जित सारे माणिक, मोती, रत्न, हीरे, जवाहरात इत्यादि मार्ग में बिखेर दिये जाएँ।
और आखरी यह कि अंतिम यात्रा के दौरान  सिकंदर के दोनों हाथ ताबूत से बाहर निकाल कर रखे जाएँ।
आश्चर्यचकित अनुयायियों ने इन सबका कारण पूछा तो सिकंदर उन्हें गूढ़ बात समझाई। सर्व प्रथम यह कि मृत्यु सुनिश्चित एवं अवश्यंभावी है। उसके आने पर अच्छे से अच्छा डॉक्टर या वैद्य भी लाचार हो जाता है. दूसरी बात यह कि  जो माणिक, मोती, रत्न, हीरे, जवाहरात आदि मैंने लोगों को लूटकर, युद्ध में मार काट कर पूरी निर्ममता के साथ एकत्र किये उनका मोल भी इस मृत्यु बेला में कंकड़ पत्थर से अधिक नहीं है, और अंतिम यह कि मेरे दोनों हाथ ताबूत से बाहर निकाल कर रखना, ताकि लोग जान सकें कि अंतिम पल में मनुष्य को खाली हाथ ही प्रयाण करना होता है। वह खाली हाथ ही इस धरती पर आता है तथा खाली हाथ ही जाता है।
याद रखें मृत्यु जीवन की अंतिम परिणिति नहीं है, यह तो जन्म जन्मांतर की अगली यात्रा का प्रवेश द्वार है।
राज कुमार सिद्धार्थ ने रोग, वृद्धावस्था व मृत्यु रूप में जब दुख एवं जीवन की निस्सारता को देखा तो वे अंदर तक हिल गए। जीवन की प्रासंगिकता के प्रति जागरूक होकर शेष जीवन संन्यास के माध्यम से दीन दुखियों की सेवा हेतु समर्पित कर दिया। जीवन एक चुनौती है तो मृत्यु कर्म की पराकाष्ठा अर्थात जो भी अच्छा या बुरा हमने ताउम्र किया उसका आकलन।
कालांतर में गौतम बुद्ध रूपी सिद्धार्थ ने मोह को दुख व पीड़ा का एकमात्र कारण बतलाया। जब एक महिला अपने मृत बालक को पुनर्जीवित करने की कामना लेकर उनके समक्ष उपस्थित हुई तो तथागत ने उसकी मनोकामना पूर्ति हेतु वचन भी दिया, लेकिन इस शर्त के साथ कि वह उन्हें केवल एक मुट्ठी चावल उस घर से लाकर दे जिस घर में कभी कोई मृत्यु को प्राप्त न हुआ हो।
दर असल मोह ही आदमी को मारता है। जब आप स्वार्थ में लिप्त होते हैं,तो केवल अपने फायदे की बात सोचता है। सामने वाला केवल आपके ऊँचे चढऩे में सहायक सीढ़ी के समान होता है, जिसे काम निकलते ही हम हटा देते हैं। यह ठीक नहीं, जिन सहयोगियों की मेहनत के दम पर आप प्रगति की सीढ़ी चढ़ते हैं, उनके उपकार रूपी ऋण को जीवन भर याद रखना तथा मुसीबत के समय उनका साथ देना आपका नैतिक कर्तव्य है। पर अमूमन आगे बढ़ते समय हम पीछे मुड़कर नहीं देखते तथा आदमी को वस्तु मात्र मान उसका पूरा दोहन या शोषण करते हैं। तब उनके मन में भी आपके लिये श्रद्धा नहीं उपजती ; बल्कि वे काम को मन लगाकर करने के बजाय एक तटस्थ भाव से करते हैं। इससे संस्था को अपने कर्मचारियों का श्रेष्ठ योगदान नहीं मिलता। यह नेतृत्व का दोष है। बड़े आदमी को उदार बनना ही चाहि। कहा भी गया है-
मुखिया मुख सो चाहिये, खान पान में एक
पाले पोसे सकल जग, तुलसी सहित विवेक
सिख धर्म के प्रवर्तक गुरुनानक को एक बार गरीबों के शोषण से अर्जित संपदा के स्वामी एक घमंडी मींदार ने अपने निवास पर स्वयं के वैभव प्रदर्शन हेतु आमंत्रित किया। नानक अपने साथ कुछ कंकड़, पत्थर ले गए तथा उस मींदार के हाथ में इस शर्त के साथ देकर बोले कि इन्हें दूसरी दुनिया में लौटाना होगा। इस पर मींदार को हँसी आ गई और बोला- भला यह भी कहीं संभव है।
गुरुनानक ने तुरंत उतार दिया- तो फिर गरीब मासूम लोगों को कष्ट देकर उनकी हया से अर्जित इस म्पत्ति का भी भला क्या मूल्य है।
 रेगिस्तान निवासी  एक सूफी संत के दरवाजे एक दिन मौत ने दस्तक दी और कहा तेरा वक्त आ गया है। फकीर ने उत्तर दिया - स्वागत है तुम्हारा, लेकिन मैं अधनंगा फकीर हूँ और नहीं चाहता कि मौत के बाद नंगा पड़ा रहूँ। अत: मुझे तीन दिन की मोहलत दो,ताकि अपने कफन का इंतज़ाम कर सकूँ।
मौत ने कहा - तूने तमाम उम्र खुदा की इबादत की है- जा तूझे मोहलत दी।
कहते हैं वह बुज़ुर्ग फकीर पास के एक शहर से तीन गज लंबा चोगा खरीद लाया और शांतचित्त होकर मौत की प्रतीक्षा करने लगा। तय समय मौत आई और प्राण लेकर चली गई। मृत शरीर वहीं पड़ा रहा। तभी एक काफिला हाँ से गुजरा। लोगों ने लाश देखकर उसे दफनाना चाहा, लेकिन समस्या कफन की आ गई।  तभी किसी की नज़र उसके सर पर लिपटे कपड़े पर पड़ी, जो खोलने पर पूरे तीन गज निकला। लोग वाह वाह कर उठे कि फकीर को अपनी मौत का इल्हाम  था तभी उसने तो कन का इंतज़ाम पहले से कर लिया था।
कहते हैं तभी से अरब का हर आदमी अपना सिर तीन गज कपड़े से ढककर रखता है। लोग उसे लिबास या धूल, धूप व आँधी से बचने का साधन समझते हैं, लेकिन वस्तुत: वह उसे मौत की असलियत से वाकि रखता है।
सुकरात ने कहा था मृत्यु से बड़ा कोई सत्य नहीं है। इसे याद रखना बहुत सी बुराइयों से दूर रहना है।
एक बहुत ही सिद्ध और सच्चे भक्त थे। वे सदैव प्रसन्न रहते थे। एक दिन उनके एक शिष्य ने जब उनसे प्रसन्नता के मूलमंत्र के बारे में पूछा तो संत ने अगले सात दिनों में शिष्य की मृत्यु को प्राप्त हो जाने की घोषणा कर दी।
भविष्यवाणी सुनकर शिष्य सन्न रह गया। गहरे अवसाद से उसके व्यवहार में आश्चर्यजनक परिवर्तन आ गया। वह छोटी-मोटी बातों से ऊपर उठ गया और सभी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करने लगा। उसके मन में उदारता ने जन्म ले लिया।
ठीक एक सप्ताह बाद संत ने उसे बुलाकर पूछा- कहो कैसा लग रहा है।
शिष्य ने कहा - पूरे सप्ताह मुझे किसी पर क्रोध नहीं आया। किसी को कड़वा नहीं बोला और सबके साथ प्रेमपूर्वक रहा। क्यों थोड़े समय के लिये बुराई का टोकरा सिर पर उठाऊँ
संत ने कहा - मैंने यह भविष्यवाणी केवल इसलि की थी ; ताकि तुम जान सको कि मन में मृत्यु की अवधारणा को धारण करने वाला क्रोध, र्ष्या, लोभ इत्यादि सब बुरायों से ऊपर उठ जाता है। यही मेरी प्रसन्नता का भी कारण है। जाओ प्रसन्न रहो। तुम्हारी काफी आयु अभी शेष है।
अत: यह अत्यावश्यक है कि हमारा जीवन निष्पाप हो। धन याम्पदा केवल जीने के साधन मात्र हैं, उसका उद्देश्य नहीं। महात्मा गाँधी ने तो कहा ही है कि- मेरे लिये साधन की पवित्रता भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी कि साध्य की। अपावन साधन साध्य की गरिमा को भी नष्ट कर देता है।
इसलि साधन को साध्य मत बनने दीजि। यह सत्य है कि हमें जीने के धन चाहि, लेकिन केवल धन के लिये जीना तो एक अपराध। धन को यह अवसर कदापि न दें कि वह आपके उद्देश्य का अपहरण ही कर ले। मन में मृत्यु का भाव न केवल हमें जीवन यात्रा में सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है ; अपितु हमारे ह्रदय को भी स्वच्छ एवं निर्मल रखता है।
याद रखि मन में मृत्यु की सच्चाई को जिंदा रखना भी एक प्रकार का वरदान है। असुरक्षा की यह भावना आपको बुरा काम करने से रोकेगी। समस्त विद्वानों ने हमें इस सत्य से अवगत कराया है कि जीवन मात्र एक रंगमंच है, जिस पर हमारे द्वारा किये गये क्रिया -कलाप को ईश्वर देख रहा है। एक दिन पर्दा गिर जाएगा और हम अपने कर्मों की थाती के साथ लौट जाएँगे अपना हिसाब देने के लि। याद रखिये मृत्यु एक अटल सत्य है।  यह एक न एक दिन अवश्य आएगी और हमारे लि परम आनंद के संसार की द्वार खोलेगी। 
इसलि यह याद रखना आवश्यक है कि स्नेह एवं उदारता का यही भाव आपको दयालु बनाता है। इसको आचरण में ढाल लेने के बाद आप पाएँगे कि आपके संगी, साथी और सहयोगी न केवल आपके प्रति समर्पित होंगे वरन सौंपे गए कार्य को भी पूरी मेहनत, लगन तथा ईमानदारी के साथ सम्पन्न करेंगे। नेतृत्व को सफलता के साथ ही साथ जीवन की सार्थकता के लिए ये गुण आपके लिये आवश्यक हैं। इनसे आपका व्यक्तित्व और निखरेगा तथा सब ओर आपका नाम आदर के साथ लेकर आपके कदम चूमेगी। आमीन।

 सम्पर्क: 8/ सेक्टर- 2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास) भोपाल- 462023, मो. 09826042641 Email- v.joshi415@gmail.com

सत्यवादी

    धर्म की परिभाषा
    - डॉ. बच्चन पाठक 'सलिल

सन् 1964 ईस्वी में जमशेदपुर में साम्प्रदायिक दंगा हुआ। लोग हिंसा, आक्रोश, भय और संदेह के साये में पल रहे थे। सैकड़ों लोगों की जानें गईं । रात में पूरी तरह कर्फ्यू लागू थे। बिष्टुपुर के एक मंदिर में पंडित रामानंद जी पुजारी थे। वे सत्यवादी और पक्के सनातनी थे। मंदिर में बीसों कच्चे घर थे जिनमे किरायेदार रहते थे।  मंदिर मैटी की ओर से पंडित जी ही कमरे आवंटित करते थे और किराया वसूलते थे।
एक दिन उनके गाँव का रहमान नाम का एक मुसलमान आया। वह शास्त्रीनगर से भाग कर आया था जहाँ दर्जनों हत्याएँ हो चुकी थी ।
उसने पंडित जी से पनाह माँगी । पंडित जी ने उसे एक कमरा दे दिया और कहा कि अपना नाम रघुवर बताना । असली नाम बताओगे तो बवाल खड़ा हो जागा ।
दो दिनों के बाद किसी तरह भेद खुल गया कि वह मुसलमान है। रात को करीब एक दस बजे कुछ लोग आए और बोले कि यहाँ एक मुसलमान छिपा है। हम उसे मैदान में ले जाकर काट डालेंगे।
पंडित जी घबराए। बोले- यहाँ सभी पुराने लोग हैं। एक रघुवर आया है, वह नया है , मैं उसे जानता हूँ। 
रघुवर बुलाया गया। वह थर- थर काँप रहा था। पंडित जी ने कहा- यह रघुवर है और यादव है। मैं इसे जानता हूँ । एक यादव पहलवान ने कहा- अगर पंडित जी इसका छुआ पानी पी लेंगे तो हम लोग मान जायेंगे।
पंडित जी धर्म-संकट में पड़े। उन्हें मानस की याद आई - पर हित सरिस धर्म नहि भाई। उन्होंने रघुवर के हाथ का पानी पी लिया। लोग चले गए।
दो चार दिनों के बाद दंगा शान्त हुआ। पंडित जी आश्वस्त थे कि मैंने धर्म का सही पालन किया है। जीव-रक्षा रुढ़ी पालन से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है।