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Feb 2, 2014

सबसे बेहतर ये साल रहे

         सबसे बेहतर ये साल रहे
                                               - गिरीश पंकज
        वो जैसा भी था चला गयाअब जो आए खुशहाल रहे,
        बस यही दुआ हम करते हैं, सबसे बेहतर ये साल रहे।।
        बदले मन हर इक पापी का, ये बलात्कार अब रुक जाए
        क्यों तने रहें हम अपनों से, ये सर थोड़ा-सा झुक जाए
        ये दिल अपना घर पावन हो, क्यों जीवन में जंजाल रहे
        बस यही दुआ हम करते हैं सबसे बेहतर ये साल रहे।।
        न धोखा दे कोई हमको, ना झूठे वादे करें कभी 
        हम सच की राह पे चलें सदा, जुल्मी से क्यों कर डरें कभी,
        सबके हिस्से में हो थाली, हर इक जन मालामाल रहे
        बस यही दुआ हम करते हैं, सबसे बेहतर ये साल रहे।
        जो अपने सेवक हैं उनको, सेवा का कुछ तो फन आए
        उनके जीवन में सच्चाई, थोड़ा-सा अपनापन आए
        ये लोग रहें सच्चे मन से, क्यों कर कोई नक्काल रहे
        बस यही दुआ हम करते हैं  सबसे बेहतर ये  साल रहे।
        दुनिया में प्रेम रहे जि़दा, नफ़रत की कोई ना धारा हो,
        ये देश हमे प्यारा लेकिन सारा संसार हमारा हो
        ही दुआ हम करते हैं  सबसे बेहतर ये साल रहे
        हम सही राह के राही हों, सबको नव राह दिखाएँगे,
        जो भटक रहे है उन सबको, हम बार-बार समझाएँगे।
        जीवन हो एक सीधा रस्ता, क्यों अपनी टेढ़ी चाल रहे।
        बस यही दुआ हम करते हैं सबसे बेहतर ये  साल रहे।
 सम्पर्क:  संपादक, सद्भावना दर्पण (मासिक), 28 प्रथम तल, एकात्म परिसर, रजबंधा मैदान रायपुर. छत्तीसगढ़. 492001
मो. 09425212720  पूर्व सदस्य, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली (2008-2012)छ: उपन्यास, बारह व्यंग्य संग्रह सहित बयालीस पुस्तके प्रकाशित, Email-girishpankaj1@gmail.com

निष्ठा का चमत्कार

निष्ठा का चमत्कार 
- विजय जोशी
नये साल के इस अंक से हम एक नया स्तंभ जीवन-दर्शन आरंभ कर रहे हैं। इस स्तंभ के लिए अपने जीवन भर के अनुभवों को प्रति माह सिलसिलेवार साझा करेंगे भोपाल भेल के पूर्व ग्रुप महाप्रबंधकश्री विजय जोशी । पहले स्तंभ में निष्ठा का चमत्कार और सहनशीलता सहेजें शीर्षक के अंतर्गत उन्होंने जीवन के दो पहलुओं पर बड़ी सहजता और सरलता के साथ हमारे समक्ष रख दिया है। विश्वास है पाठकों को यह नया स्तंभ पसंद आयेगा - संपादक
जीवन में किसी भी कार्य के आरंभ से समापन तक जो गुण व्यक्तित्व में आवश्यक हैं उनमें से एक महत्त्वपूर्ण अवयव है निष्ठा। अवसरवादी समय के अनुसार अपना मुखौटा एवं निष्ठाएँ बदल लेते हैं और यह उनके अस्थिर मन और स्वार्थपरायणता की सूचक होने के साथ ही साथ उनके मार्ग से भटककर पतनगामी होने का कारण भी बनती हैं। सिद्धांतप्रिय व्यक्ति न तो अपने पथ से विचलित होता है और न अपने व्यक्तित्व में अवसरवदिता को अंगीकार करते हुए अपनी निष्ठा बदलता है।
गोस्वामी तुलसीदास राम के अनन्य भक्त थे और आजीवन रहे भी। उसी प्रकार सूरदास की निष्ठा अपने आराध्य कृष्ण के प्रति थी। दोनों एक दूसरे के परम मित्र होने के साथ ही साथ आराध्य अलग-अलग होने के बावजूद परस्पर पूरा सम्मान, स्नेह और श्रद्धा रखते थे।
एक बार सूरदास ने गोस्वामी तुलसीदास को वृंदावन आमंत्रित किया। वे उन्हें आरंभिक आवभगत के पश्चात् कृष्ण दर्शन हेतु बाँके बिहारी मन्दिर में ले गए। वहाँ पर भाव विभोर सूर भक्ति रस में रम गए; लेकिन तुलसी ने सूर का साथ देने में असमर्थता व्यक्त की।
तुलसी जैसे सज्जन संत के संदर्भ में यह बात उपस्थित वृंदजन के लिए आश्चर्यकारी और अनहोनी थी। पूछे जाने पर गोस्वामी ने भव्य रूपी कृष्ण के समक्ष सम्मान तो पूरा व्यक्त किया; लेकिन भक्ति समर्पण में असमर्थता प्रस्तुत करते हुए यह दोहा दोहरा दिया-
कहा कहो छवि आपकी, भले पधारो नाथ।
तुलसी मस्तक तब नमे, धनुष बाण लो हाथ।।
बात बहुत मार्मिक और सटीक थी। एक निष्कामकर्मी निस्वार्थ भक्त की बात ने समस्त उपस्थितजनों को अंदर तक छू लिया।
आगे की बात बहुत संक्षिप्त है। भक्ति के इस गूढ़ अर्थ को कृष्ण भली भाँति समझ गए और कहा जाता है कि तभी एक चमत्कार हुआ और उपस्थित भक्तों ने देखा कि एक पल के लिए बाँके बिहारी की मूरत धनुर्धारी राम के रूप में रूपांतरित हो गई। तुलसी ने सविनय अपना माथा झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। यह सारी घटना एक क्षण में घटित होकर समाप्त हो गई। अगले ही पल भगवान कृष्ण पूर्ववत् मोर मुकुट और बाँसुरी के साथ विद्यमान थे। सूर ने नेत्रहीन होने के बावजूद इस पल को अपनी अंतरात्मा में पूरी शिद्दत और श्रद्धा के साथ अनुभव किया और उसी पल में उनके मुखारविंद से जो शब्द अचानक निकले वे कुछ इस प्रकार थे -
कहँ बँसी, कहँ पीत पट, कहँ गोपिन को साथ।
अपने जन के कारणे कृष्ण बने रघुनाथ।।
अर्थात सूर की लाज रखने और तुलसी की निर्मल निस्वार्थ भक्ति ने भक्त वत्सल भगवान कृष्ण को अपना स्वरूप बदलने पर विवश कर दिया।
मित्रों यही है निष्ठा का चमत्कार। सत्य के मार्ग पर चलते हुए जब आप सिद्धान्तपूर्वक अपने लक्ष्य के मार्ग पर डटे रहते हैं, तो तमाम कठिनाइयों और बाधाओं के बावजूद आपको उद्देश्य प्राप्ति से कोई नहीं रोक सकता। बस आवश्यकता है मार्ग की बाधाओं और प्रलोभन से पार पाने हेतु दृढ़ निश्चय की। इसलिए पथ से भटके नहीं कभी भी।
सहनशीलता सहेजें
व्यक्तित्व में सहनशीलता एक ऐसा अद्भुत गुण है जो न केवल उसमें निखार लाता है, अपितु चार चाँद लगा देता है। इस गुण से व्यक्ति में स्थिरता, शान्ति, सरलता की प्राप्ति के साथ ही साथ यह उसे स्थितप्रज्ञ बना देती है। वह मान, अपमान के बोध से ऊपर उठकर- सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का पर्याय बन जाता है।
पूर्ण नाम के एक शिष्य को जब बुद्धत्व प्राप्त हो गया तो महायान बुद्ध ने उससे कहा- जाओ और संसार को ज्ञान दो, इन्हें ज्ञान के मार्ग पर प्रवर्त कर सुख का संसार दो।
पूर्ण ने कहा- तो हे भगवान मुझे बिहार के उस क्षेत्र में भेजें जहाँ सूखा पड़ा है।
गौतम ने कहा- वहाँ न जाओ, क्योंकि वहाँ के लोग बहुत कठिन और कठोर हैं। वे तुम्हें गालियाँ देगें। तुम्हारा अपमान करेंगे।
पूर्ण- तब तो मैं वहाँ अवश्य जाऊँगा। चिकित्सक की भाँति। उन्हें मेरी जरूरत है।
बुद्ध ने कहा- तो फिर पहले मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर दो। अगर वे गालियाँ दे, अपमान करें, तो तुम्हें कैसा लगेगा और क्या होगा।
पूर्ण ने कहा- मैं कहूँगा भले लोग हैं। सिर्फ अपमान करते हैं। मारते नहीं। मार भी तो सकते थे।
बुद्ध ने दूसरा प्रश्न पूछा- अगर वे मारें, पत्थर फेंके। तो फिर तुम्हारी प्रतिक्रिया क्या होगी? तुम क्या करोगे?
पूर्ण ने कहाँ- मैं कहूँगा कितने भले लोग हैं। सिर्फ मारते हैं, मार नहीं डालते।
बुद्ध का अंतिम प्रश्न था- अगर वे मार ही डालें तो फिर तुम क्या करोगे?
पूर्ण ने उत्तर दिया- मैं सोचूँगा कितने भले लोग हैं। इस जीवन से छुटकारा दिला दिया, जिसमें कोई भूल चूक हो सकती थी। किसी का मान अपमान, हित अहित मेरे द्वारा हो सकता था।
  बुद्ध ने कहा- जाओ तुम पूर्ण भिक्षु हो गए।
  तात्पर्य यह कि स्वभाव में सहनशीलता अपनाए बगैर आप कभी सुखी नहीं हो सकते, यह सहनशीलता ही है जो पग- पग आ रही बाधाओं को पार कर पाने की आपकी क्षमता में अभिवृद्धि करती है। एक स्थिर, शान्त मनोवृत्ति के साथ जीवन यात्रा अधिक सुगम है, बनिस्बतन उत्तेजनापूर्ण, अप्रासंगिक एवं अनुचित व्यवहार के।
यदि बाधाएँ मिली हमें तो, उन बाधाओं के ही साथ
जिनसे बाधा बोध न हो, वह सहनशक्ति भी आई हाथ।

अपनी बात: जीवन में सबसे सहज और सरल कार्य है परजन हिताय, परजन सुखाय कुछ सुंदर, सुखद एवं सार्थक लिख पाना, खास तौर पर तब जब हमारे अपने आस पास अनेकों सामयिक एवं उपयोगी उद्धरण उपस्थित हों आवश्यकता है सिर्फ उन्हें यथा समय कागज पर उकेर पाने की
अत: यह स्वयंसिद्ध है कि बूँद- बूँद विचार रूपी इन संकलनों में नया कुछ भी नहीं है। बिखरे मोती की माला बनने का सुख भी किसी प्रार्थना से कम नहीं और लेखन के पलों मैंने उसी सुख को पूरी श्रद्धा और शिद्दत के साथ अनुभव किया है। आमीन।   
लेखक के बारे में: चार दशक के औद्योगिक परिवेश में अंतस् के कोमल भावों को सहेजने की कोशिश का छोटा मोटा प्रयास करने वाले भेल के पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक विजय जोशी ने यात्रा की शुरुआत तो कविताओं से की, लेकिन बाद में संगी -साथियों (और खास तौर पर प्रकाशकों के आग्रह) पर लेखन की नैया प्रबंधन की धारा में छोड़ दी। उनके पहले और आखिरी कविता संग्रह 'भला लगता है'पर श्री गुलज़ार की भूमिका रूपी उपकार  के बाद से वे अनवरत जीवन से लेकर कारपोरेट प्रबंधन पर इसलिए लिख पा रहे हैं, क्योंकि आज के दौर में वही बिकता है। उनकी इन पुस्तकों की भूमिका पद्मश्री मार्क टुली, गांधीवादी चिंतक डा. एस. एन. सुब्बाराव, पर्यावरणविद श्री राजेन्द्र सिंह द्वारा लिखी गई है। इन सबमें नया कुछ भी नहीं, वही सब दुहराया गया है, जो सदियों से उपलब्ध है।
संप्रति: कौंसिल मेंबर, इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स (इंडिया)।   
सम्पर्क:8/ सेक्टर- 2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास) भोपाल- 462023, मो. 09826042641

सिक्किम

सुन्दरतम अनुभूतियों की यात्रा
- पद्मा मिश्रा

बारिश थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी, सड़कों पर, गलियों में, पानी उफन-उफन कर बह रहा था। होटल के कमरे में बैठे-बैठे मन उब रहा था। बारिश रुके तो गंगटोक तक जाने की कोई व्यवस्था हो पाएगी। वह भी जब रास्ता खुला हो, कल सिक्किम के बार्डर तक जाकर लौट आना पड़ा था। रास्ते में पहाड़ का एक बड़ा टुकड़ा टूट कर गिर पड़ा था। रास्ता जाम हो गया तो सेना के जवानो ने उसे बन्द कर सबको वापस लौट जाने का निर्देश दिया। निराश, मायूस बारिश में भींगते हुए सिलीगुड़ी के इस होटल में शरण मिली थी। किसी तरह रात कटी, पर आज गंगटोक पहुँचना बहुत जरूरी था। वहाँ बुक किये गए टाटा गेस्ट हॉउस में पैसे कट रहे थे, और हम यहाँ बुरी तरह फँसे हुए थे। सुदूर जमशेदपुर से चल कर हावड़ा, सियालदह, जलपाईगुड़ी होते हुए सिलीगुड़ी में रुकना पड़ा था. ..निरुद्देश्य मेरे साथ आये मेरे गाँव के देवर और उनका बेटा राजा भी निराश हो चुके थे। बरदंग पहुँचना मुश्किल लग रहा था। वहाँ ए.टी.टी, सी, अडवांस टेक्निकल सेंटर में उसका नामांकन कराना जरूरी था; पर यहाँ तो होटल के कमरे में बैठे हुए काम पूरा न हो पाने की निराशा व हताशा के पल काटने मुश्किल हो रहे थे। तभी मैनेजर ने आकर सूचना दी कि एक नेपाली दम्पती भी गंगटोक जा रहे हैं, यदि आप चाहें तो उनके साथ जा सकते हैं, हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था, वे बड़े भले लोग थे। उन्होंनेकहा कि यदि रास्ता बन्द भी रहा; तो मै जरूर कुछ करूँगा। अभी अभी खबर मिली है कि बन्द रास्ता खुल गया है, और एक कोशिश करने में कोई हर्ज़ नहीं है। हम लोग फिर एक कठिन यात्रा पर चले। बारिश और भी तेज हो गई थी, पर वे पति- पत्नी बिलकुल निश्चिन्त थे, वे बड़ी कुशलता से अपनी सुमो ड्राइव करते हुए बढ़ रहे थे, सिलीगुड़ी की सीमा पार करते ही जैसे हम सीकिम की सीमा पर पहुँचे एक बार फिर नियति ने अपना खेल दिखाया, रास्ता अभी भी जाम था और पहले से भी बड़ा एक भूखंड किनारों को तोड़ता, नष्ट- भ्रष्ट करता आ गिरा था, जिसे हटाने का कार्य चल रहा था, जिसमें लगभग चार घंटे लगते। हम हतप्रभ और निरुपाय थे। फिर उन सज्जन ने ही एक उपाय सुझाया कि -देखिये, मै गंगटोक होते हुए दार्जिलिंग जाता पर अब सीधे दार्जिलिंग होते हुए गंगटोक पहुँचा दूँगा; क्योंकि वहाँ मेरा घर है, मुझे वहाँ जाना ही है, पर किराया चार हजार लगेगा। मजबूरन हमें उनकी बात माननी पड़ी।पर सिलीगुड़ी वापस  पहुँचने के बाद जब हमारी गाड़ी दार्जिलिंग की और मुड़ी तो धीरे-धीरे जैसे प्रकृति की किताब के रहस्यमयी पृष्ठ खुलते जा रहे थे। प्रकृति अपने कई रूपों में, कई रंगों में, बाहें फैलाए हमारा स्वागत कर रही थी। हमारे मन से दुविधा, निराशा, और हताशा के बादल छँट गए थे, और नीले आकाश में उमड़ते-घुमड़ते ,बरसते बादल मानों हमारे आस-पास मँडराकर कह रहे हों- स्वागतम् हरी-भरी वादियाँ दूर -दूर तक बिछे चाय के बागान और ऊपर से रसधार गिराती मेघमालाएँ तन-मन और आँखों को अनोखा सुख प्रदान कर रही थीं। बादल हमारे आगे-पीछे ऊपर-नीचे, आ जा रहे थे। कभी गाड़ी के आगे आकार अँधेरा कर जाते, तो कभी खिड़की के रास्ते मेरे गालों, बालों, और चेहरे को भिगोकर तुरन्त उडऩ छू हो जाते। मेरे पति  की यह पहली पर्वतीय यात्रा थी, वे रोमांचित थे, हर्षित भी इन अनूठे दृश्यों को देख कर, परन्तु इन सँकरे, घुमावदार सर्पीले मोड़ वाले रास्तों को देख कर हम सभी भयभीत भी हो रहे थे। रास्ते भी कहीं कटे हुए थे तो कहीं उबड़ -खाबड़ पथरीले जहाँ दो गाडिय़ाँ सामने आतीं तो एक को रुक जाना पड़ता था। रास्ते में भू-स्खलन से दुर्घटना ग्रस्त हुई गाडिय़ों की क्षति ग्रस्त कतारें देख, हम डर गए थे। हमारे साथी ड्राइवर ने बताया कि वे आते-जाते इनकी संख्याओं को देखकर अनुमान लगाते हैं कि आज कौन सी दुर्घटना हुई? मूसलाधार बरसते बारिश के बीच गाड़ी चलाना कितना मुश्किल होता होगा उनके लिए, यह समझा जा सकता था।
पर प्रकृति का सौन्दर्य उसके उग्र रूप पर भारी पड़ रहा था। वह सुन्दरता चारो और बिखरी हुई थी। आँखें तृप्त नहीं हो पा रही थीं। हम इन्हीं खूबसूरत दृश्यों को आत्मसात् करते, और फिर नीचे उतर कर कैमरे में उन पलों को कैद करते जा रहे थे। कर्सियांग में रुककर हमने चाय पी बारिश में भींगे  मन और शरीर को बहुत राहत मिली । यहीं पर हमने प्रसिद्ध टाय ट्रेन भी देखी, जो दार्जिलिंग की पहचान है। इसे अंग्रेजों ने 1869, में प्रारंभ किया था अपने चाय बागानों की देखभाल के लिए चाय पीकर हमारा कारवाँ फिर आगे बढ़ा। इस बार केवल चाय बागान से होकर गुजरना था, बारिश रुक रही थी, हम जैसे ही एक दो दृश्य कैमरे में लेते अचानक कही से बादलों का एक समूह आकर हमें भिगो जाता, जैसे आँख- मिचौनी खेलते बच्चे चाय के हरे-भरे खेत अत्यंत लुभावने लग रहे थे। यहाँ चारो तरफ पाइन के वृक्ष बहुतायत में नजर आ रहे थे और अन्य औषधीय पौधे भी। हमने खूब तस्वीरें खींची । हम सब बच्चों की तरह उल्लसित थे। उन दृश्यों में मुझे नैनीताल में बिताया अपना बचपन दिख रहा था, आज सचमुच मै बहुत पीछे लौट गई थी। दार्जिलिंग का सौन्दर्य हमारे मन -प्राणों पर छा गया था। मोहित कर गया था। मै यहाँ पर स्थानीयता, वेशभूषा, परम्पराओं की तलाश कर रही थी, पर आधुनिकता का रंग इन पर भी चढ़ चुका है। पर्वतीय बालाओं की मोहक पोषक और खूबसूरत परिधानों ने जींस, पैंट और टॉप धारण कर लिया है। चाय बागान में काम करने वाली रेजाओं को मैंने धूप का चश्मा लगाए, हाथ में मोबाइल थामे काम करते देखा है। पर मेरी नज़रों की अधूरी तलाश खिलखिलाकर कुछ ग्रामीण-श्रमिक युवतियों के गाने की आवाज से ही तृप्त हो गई।हमारी गाड़ी में गाना बज रहा था- ये कहाँ आ गए हम, यूँ ही साथ-साथ चलते... अपनी यात्रा तय करते हुए हम गंगटोक आ पहुँचे थे, यहाँ का नजारा तो कुछ और ही था, ऊँची-ऊँची पहाडिय़ाँ, उन पर मँडराते बादल, हरी-भरी गहरी घाटियाँ सभी आकर्षित कर रहे थे। चाइना- सिक्किम की सीमा युमथांग से निकल कर पूरे सिक्किम प्रदेश के बीचो-बीच बहती हुई, सिक्किम की जीवन रेखा, पवित्र तीस्ता नदी, हमारे साथ लगातार चल रही थी। इसकी लहरों में तीव्र करेंट था, लहरें कभी उछाल मारती, कभी शान्त होतीं, कभी चट्टानों के बीच से सर्पिल आकार लेती बराबर हमसे बातें करती जा रही थी। एक और ऊँचे पहाड़ तो दूसरी तरफ घाटी में बहती तीस्ता नदी दोनों ही कभी मन मोहते तो कभी भय उत्पन्न कर रहे थ। तीस्ता जैसे मानव की जिजीविषा की प्रतीक है, जो हर बाधाओं, मुश्किलों, तूफानों से टकराकर आगे बढ़ते जाने का सन्देश देती है, मैंने तीस्ता को मन ही मन प्रणाम किया।
अब शाम हो गयी थी, पहाड़ों में अँधेरा भी आकर्षक लगता है, दूर तक जुगनुओं सी जलती बुझती रोशनियाँ बहुत प्यारी लग रही थीं, सच कहूँ तो आज इस सुहानी शामने  मेरे जीवन के मधुरतम रिश्ते को भी असीम स्नेह-प्रेम से भर एक नई ताजगी दे दी थी। इन रास्तों की तरह ही जीवन के दुर्गम रास्तों पर भी जब हमसफ़र
का साथ हो तो हर मुश्किल आसान हो जाती है। हम रांगपो आ पहुँचे, अब हमारे सहयात्रियों को भी हमसे विदा लेनी थी। हमने दूसरी गाड़ी लेकर अपने दोस्तों का धन्यवाद  कर उन्हें विदा किया और फिर सफ़र पर चल पड़े। इस बार हमारी राहों से गुजरने वाले  हर एक पेड़, पत्ता, फूल, पहाड़, सबसे एक लगाव-सा महसूस हो रहा था। एक ऐसा आकर्षण जो हमें बाँध रहा था प्रकृति के अटूट बंधन में ।यहाँ बने लकडिय़ों के, और पक्के घरों की सुन्दरता मोहक थी। वे लोग घरों को रंगने में पक्के चटक रंगों का प्रयोग करते हैं। विशेष रूप से नीले, लाल, हरे और पीले रंग। जहाँ तहाँ बौद्ध मठों और गुम्पाओं की उपस्थिति, आस्था भी उत्पन्न कर रही थी। बुद्ध के उपदेशों को प्रसारित करती धार्मिक पताकाएँ ऊँचे तारो पर, वृक्षों पर लहरा रही थीं। बौद्ध मठों के अतिरिक्त कहीं-कहीं शिव, हनुमान के मन्दिर भी सुखद आश्चर्य उत्पन्न कर रहे थे। सिक्किम में मात्र सत्तात्मक परिवार की परंपरा  होने के कारण वहाँ व्यापार से लेकर दुकान तक और शिक्षा, व्यवस्था तक सब महिलाएँ ही सँभाल रही थीं। वहाँ। उन्मुक्त घूमती महिलाएँ अपने सशक्त होने का प्रमाण थीं। हँसती, खिलखिलाती, साथियों  से हास -परिहास करती वे प्रबुद्ध, कर्मठ, परिश्रमी, एवं शालीन लगीं गंगटोक के सौन्दर्य का यह दूसरा पहलू भी कम आकर्षक नहीं था। हमारी टैक्सी आगे बढ़ रही थी, तीस्ता अभी भी हमारे साथ थी। हमारी मंजिल टाटा स्टील का गेस्ट हॉउस होलीडे होम पास आ रहा था। जो तमांग गुम्पा के नजदीक था। इतनी लम्बी यात्रा के बाद मिला आश्रय आह्लादकारी था। रूम न. 108 में हमारा बसेरा था। आज रात भर के लिए सामान रख मुँह हाथ धोकर  वहाँ से मिली गर्म चाय ने थकान मिटा दी। गर्म गर्म खाना भी तुरंत आ गया था-दाल, चावल, दो सब्जियाँ, सलाद और अचार अत्यंत स्वादिष्ट लगे अमृतोपम घर छोडऩे के बाद पहली बार भरपेट खाना तृप्त कर गया था। हम तो यात्रा में अल्पाहार चिप्स, काफी, चाय, और कोल्ड ड्रिंक्स लेकर चल रहे थे, एक निश्चिन्त, खुशनुमा, उम्मीदों भरी रात बीती। सुबह होते ही सामने जो दृश्य दिखाई दिया, वह अकल्पनीय था। ठीक सामने कंचनजंघा की चोटी दिखाई दे रही थी, मैंने जल्दी से कैमरे में उसे कैद करना चाहा पर बादलों ने उसे ढक लिया। बस पल भर की एक झलक ही मिल सकी, लेकिन मौसम साफ़ होने से गंगटोक का सौन्दर्य निखर आया था। यह सुन्दरता अभिभूत कर रही थी। हमें बरदंग अपने भतीजे राजा के नामांकन के लिए निकलना था। ए .टी.टी.सी. एडवांस ट्रेनिंग सेंटर सिंगतम के पास ही था। नामांकन की प्रक्रिया पूरी होते होते दोपहर हो आई थी। हमें सिलिगुड़ी  पहुँच कर सियालदह के लिए ट्रेन पकडऩी थी, अत; हम एक बार फिर से वापसी की यात्रा पर निकल पड़े लौटते हुए वही सारे दृश्य फिर आँखों के सामने साकार थे, पीछे शोर करती तीस्ता का पानी छोटी बड़ी चट्टानों से टकराता अनोखे  संगीत की सृष्टि कर रहा था, तो किनारे-किनारे ऊँचाई पर स्थित एकमात्र सड़क पर गाडिय़ों की आवाजाही जारी थी। ऊँचे पहाड़ थे, दूर तक बिछी असीमित हरियाली और चहचहाते पंछी बहुत ही सुहावना दृश्य था, आँखे उन्हें निहारती थक नहीं रही थी, कालिदास की शकुंतला -सा क्षण-क्षण परिवर्तित प्रकृति का रूप मनोहारी था। क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैती... तदैव रूपं रमणीयातायाएक बात गंगटोक में मुझे बहुत अच्छी लगी कि वहाँ म्यांमार, दामन, लक्षद्वीप, नेपाल सभी जगहों से लोग आए थे, वहाँ के सौन्दर्य को आत्मसात् करने पर वे सभी हिन्दी बोल रहे थे, यद्यपि उच्चारण में विभिन्नता थी, पर वे सब केवल भारतीय थे, मुझे अपनी राष्ट्रभाषा और अपने देश पर गर्व हो रहा था। चाइना की संस्कृति से प्रभावित प्रदेश में अंग्रेजी या अन्य भाषा की जगह हिन्दी। बहुत ही सुखद अहसास था। आज उन बहुमूल्य पलों, वहाँ फैली हरीतिमा को छोड़ते बहुत दु:ख हो रहा था। मेरी सखी के रूप में तीस्ता फिर मेरे साथ थी, बातें करती गुनगुनाती खिलखिलाती, और कभी शोर मचाकर प्रतिवाद करती, समय बीतता जा रहा है, उन यादों को कैमरे में कैद कर रही हूँ, साथ ही नेत्रों की प्यास और अंतरतम के एक एक बिंदु पर उन्हें आत्मसात करती हुई। यह यात्रा जीवन की सबसे सुन्दरतम अनुभूतियों की यात्रा बन गयी है, दो पंक्तियाँ कहना चाहती हूँ।                               
अक्षरों में गूँथती हूँ,
प्रकृति की सौंदर्य माला,
प्यार बरसाता रहा नभ,
भीगती  यह काव्य-बाला।

लेखिका के बारे में- शिक्षा- एम.ए.हिंदी, प्रकाशन- कादम्बिनी, परिकथा, वर्तमान साहित्य, जटायु, स्वर मंजरी हिंदुस्तान, दैनिक जागरण,प्रभात खबर, दैनिक भास्कर आदि अनेक राष्ट्रीय व स्थानीयपत्र- पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। प्रथम कहानी संग्रह- साँझ का सूरज, काव्य संग्रह- सपनों के वातायन। पठार की खुशबू (झारखण्ड की पच्चीस महिला साहित्यकारों की कहानियों का संकलन), जो दिल में है- (झारखण्ड की पच्चीस महिला कवयित्रियों की कविताएँ)। बहुभाषीय साहित्यिक संस्था-सहयोग एवं अक्षर कुम्भ से सम्बद्ध।
सम्पर्क: जमशेदपुर-झारखण्ड Email- padmasahyog@gmail.com

प्रेरक

मछली पकडऩे की कला
लाओ-त्ज़ु ने एक बार मछली पकडऩा सीखने का निश्चय किया। उसने मछली पकडऩे की एक छड़ी बनाई, उसमें डोरी और हुक लगाया। फिर वह उसमें चारा बाँधकर नदी किनारे मछली पकडऩे के लिए बैठ गया। कुछ समय बाद एक बड़ी मछली हुक में फँस गई। लाओ-त्ज़ु इतने उत्साह में था कि उसने छड़ी को पूरी ताक़त लगाकर खींचा। मछली ने भी भागने के लिए पूरी ताक़त लगाई। फलत: छड़ी टूट गई और मछली भाग गई।
लाओ-त्ज़ु ने दूसरी छड़ी बनाई और दोबारा मछली पकडऩे के लिए नदी किनारे गया। कुछ समय बाद एक दूसरी बड़ी मछली हुक में फँस गई। लाओ-त्ज़ु ने इस बार इतनी धीरे-धीरे छड़ी खींची कि वह मछली लाओ-त्ज़ु के हाथ से छड़ी छुड़ाकर भाग गई।
लाओ-त्ज़ु ने तीसरी बार छड़ी बनाई और नदी किनारे आ गया। तीसरी मछली ने चारे में मुँह मारा। इस बार लाओ-त्ज़ु ने उतनी ही ताक़त से छड़ी को ऊपर खींचा जितनी ताक़त से मछली छड़ी को नीचे खींच रही थी। इस बार न छड़ी टूटी न मछली हाथ से गई। मछली जब छड़ी को खींचते-खींचते थक गई तब लाओ-त्ज़ु ने आसानी से उसे पानी के बाहर खींच लिया। उस दिन शाम को लाओ-त्ज़ु ने अपने शिष्यों से कहा- आज मैंने संसार के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत का पता लगा लिया है। यह समान बलप्रयोग करने का सिद्धांत है। जब यह संसार तुम्हें किसी ओर खींच रहा हो तब तुम समान बलप्रयोग करते हुए दूसरी ओर जाओ। यदि तुम प्रचंड बल का प्रयोग करोगे तो तुम नष्ट हो जाओगे, और यदि तुम क्षीण बल का प्रयोग करोगे तो यह संसार तुमको नष्ट कर देगा। (हिन्दी ज़ेन से)

प्राकृतिक वैभव से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ में श्रीराम

प्राकृतिक वैभव से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ में श्रीराम
- प्रो. अश्विनी केशरवानी
01 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य पृथक अस्तित्व में आया और देश का 26वाँ राज्य बना। 135194 वर्ग कि. मी. में फैला और लगभग दो करोड़ आबादी को 27 जिलों में समेटे छत्तीसगढ़ प्राकृतिक वैभव से परिपूर्ण, वैविध्यपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना तथा अपने गौरवपूर्ण अतीत को गर्भ में समाए हुआ है। प्राचीन काल में यह दंडकारण्य, महाकान्तार, महाकोसल और दक्षिण कोसल कहलाता था। दक्षिण जाने का मार्ग यहीं से गुजरता था इसलिए इसे दक्षिणपथ भी कहा गया और ऐसा विश्वास किया जाता है कि अयोध्यापति दशरथ- नंदन श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ इसी पथ से गुजरकर आर्य संस्कृति का बीज बोते हुए लंका गए। इस मार्ग में वे जहाँ-जहाँ रुके, वे सब आज तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध स्थल हैं। उस काल के अवशेष यहाँ आज भी दृष्टिगोचर होता हैं। सरगुजा का रामगढ़, श्रीराम की शबरी से भेंट, उनके बेर खाने का प्रसंग का साक्षी शबरी-नारायण, खरदूषण का स्थल खरौद, कबंध राक्षस की शरणस्थली कोरबा, बाल्मीकि आश्रम जहाँ लव और कुश का जन्म हुआ-तुरतुरिया, राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने वाले शृंगि ऋषि के साथ अन्य सप्त ऋषियों का आश्रम सिहावा, मारीच खोल जहाँ मारीच के साथ मिलकर रावण ने सीताहरण का षडयंत्र रचा, आज ऋषभतीर्थ के नाम से जाना जाता है। धमतरी जिलान्तर्गत चंद्रखुरी जहाँ माता कौशल्या का एकमात्र मंदिर है। सुदूर चित्रकोट (बस्तर) और चित्रकोट का वनांचल श्रीराम और लक्ष्मण के दक्षिणपथ गमन के साक्षी हैं।
श्रीरामचंद्र को भगवान विष्णु का पूर्ण अवतार माना गया है। अवतार के प्रयोजन और उसके महत्त्व विशद विवेचन विभिन्न पुराणों में मिलता है लेकिन भगवद्गीता में इसका स्पष्ट उल्लेख हुआ है। उसमें बताया गया है कि भगवान विष्णु के अवतारों में सृष्टि के विकास का रहस्य छिपा माना गया है। भगवान विष्णु के अवतारों की तीन श्रेणियाँ क्रमश: पूर्ण अवतार, आवेशावतार और अंशावतार है। श्रीराम और श्रीकृष्ण को पूर्णावतार और भगवान परशुराम को आवेशावतार माना गया है। विभिन्न ग्रंथों में उनके 24 और 10 अवतारों का उल्लेख है जिसमें मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, और कल्कि प्रमुख हैं। भगवान विष्णु के अवतारों का सामूहिक या स्वतंत्र निरूपण कुषाण काल के पूर्व नहीं मिलता। इस काल में वराह, कृष्ण और बलराम की मूर्त्तियाँ बननी प्रारंभ हुई। गुप्तकाल में वैष्णव धर्मावलंबी शासकों के संरक्षण में अवतारवाद की धारणा का विकास हुआ। गुप्तकाल के बाद 7 से 13 वीं शताब्दी के मध्य लगभग सभी क्षेत्रों में दशावतार फलकों तथा अवतार स्वरूपों की स्वतंत्र मूर्त्तियाँ बनीं। इसमें वराह, नृसिंह और वामन स्वरूपों की सर्वाधिक मूर्त्तियाँ बनीं। ये मूर्त्तियाँ महाबलीपुरम्, एलोरा, बेलूर, सोमनाथपुर, ओसियाँ, भुवनेश्वर, खजुराहो तथा अन्य अनेक स्थलों से प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त राम, बलराम और कृष्ण की मूर्त्तियाँ पर्याप्त मात्रा में मिली हैं। भगवान विष्णु के एक अवतार के रूप में दशरथी राम की लोकमानस से जुड़े होने के कारण ब्राह्मण देवों में विशेष प्रतिष्ठा रही है। यह सत्य है कि भारतीय शिल्प में दशरथनंदन राम की मूर्त्तियाँ अन्य देवों की तुलना में गुप्तकाल में लोकप्रिय हुई; किन्तु विष्णु के एक अवतार के रूप में इनकी कल्पना नि:संदेह प्राचीन है और ब्राह्मण देवों में इनकी विशेष प्रतिष्ठा रही है। यह सत्य है कि भारतीय शिल्प में दशरथनंदन राम की मूर्त्तियाँ अन्य देवों की तुलना में बाद में लोकप्रिय हुई। प्रतिमा लक्षण ग्रंथों में आभूषणों और किरीट(मुकुट) से सुशोभित द्विभुज श्रीराम के मनोहारी और युवराज के रूप का निरूपण मिलता है। द्विभुज राम के हाथों में धनुष और बाण प्रदर्शित होते हैं, जैसा कि शिवरीनारायण के श्रीराम जानकी मन्दिर और खरौद के शबरी मन्दिर में मिलता है। कहीं-कहीं श्रीराम लक्ष्मण जानकी के साथ भरत और शत्रुघन की मूर्त्तियाँ श्रीराम पंचायत के रूप में मिलती है। श्रीराम पंचायत की मूर्त्तियाँ रायपुर के दूधाधारी मठ में स्थित हैं।
श्रीराम की प्रारंभिक मूर्त्तियाँ देवगढ़ के दशावतार मन्दिर में उत्कीर्ण हैं। इसमें श्रीराम धनुष और बाण से युक्त हैं। देवगढ़ में श्रीराम कथा के कई दृश्यों का शिल्पांकन हुआ है। एलोरा के कैलास मन्दिर और खजुराहो के मन्दिरों से श्रीराम की मूर्त्तियाँ मिली हैं। खजुराहो के पार्श्वनाथमन्दिरकी भित्ति में सीताराम की एक नयनाभिराममूर्त्तिउत्कीर्ण है और पास में हनुमान की मूर्त्ति भी है जिनके मस्तक पर श्रीराम का एक हाथ पालित मुद्रा में अनुग्रह के भाव में है। यह मूर्त्ति भक्त और आराध्य के अंतर्संबंधों का सुखद शिल्पांकन है। श्रीराम की स्वतंत्र मूर्त्तियाँ तुलनात्मक दृष्टि से दक्षिण भारत में अधिक लोकप्रिय रही हैं। उत्तर भारत में राम की मूर्ति मुख्यत: विष्णु के अवतार के रूप में उत्कीर्ण है। कर्नाटक में राम का एक प्राचीनतम मंदिर 867 ई. का हीरे मैगलूर में है। श्रीराम के दोनों ओर लक्ष्मण और सीता स्थित हैं। चोलकालीन कांस्य मूर्तियों में भी श्रीराम का मनोहारी अंकन उपलब्ध है। स्वतंत्र मूर्तियों के अतिरिक्त रामकथा के विविध प्रसंगों के उदाहरण खजुराहो, भुवनेश्वर, एलोरा, बरम्बा, सोमनाथपुर, खरौद, जांजगीर और सेतगंगा जैसे पुरास्थल में दृष्टिगोचर होता है। इन उदाहरणों में भारतीय जीवन मूल्यों को उद्घाटित करने वाले प्रसंगों जैसे-सीता हरण, जटायु वध, बालि-सुग्रीव युद्ध की सर्वाधिक मूर्त्तियाँ हैं। कदाचित् इसी कारण छत्तीसगढ़ गौरव में पंडित शुकलाल पांडेय ने भी गाया है-
  रतनपुर में बसे रामजी सारंगपाणी
  हैहयवंशी नराधिपों की थी राजधानी
  प्रियतमपुर है शंकर प्रियतम का अति प्रियतम
  है खरौद में बसे लक्ष्मणेश्वर सुर सत्तम
  शिवरीनारायण में प्रकटे शौरिराम युत हैं लसे
  जो इन सबका दर्शन करे वह सब दुख में नहीं फंसे।
श्री शिवरीनारायण माहात्म्य में श्रीराम जन्म के संबंध में उल्लेख है जिसमें विष्णु भगवान रामावतार के पूर्व देवताओं को कहते हैं-
  मैं निज अंशहि अवध में, रघुकुल हो तनु चार
  राम लक्ष्मण भरत अरू शत्रूहन सुकुमार।
  कौशल्या के गर्भ में जन्महु निस्संदेह
  महात्मा दशरथ नृपति मो पर करत सनेह। 02/128-129
हे देवों! मैं अयोध्यापति दशरथ के घर जन्म लेने जा रहा हूँ। आप लोग भी वहाँ जन्म लेकर अपना जीवन सार्थक बनाएँ। मैं वहाँ माता कौशल्या के गर्भ से जन्म लूँगा; क्योंकि राजा दशरथ का मेरे ऊपर बहुत स्नेह है। लोमश ऋषि आगे कहते हैं कि श्रीरामचंद्र जी के अनेक अवतार हुए हैं। उनके विस्तार, जन्म-कर्म का लेखा लगाना बड़ा कठिन है। इसमें तिल मात्र भी संदेह नहीं कि हरि माया बलवती है। उससे ज्ञानी, अज्ञानी और गुणवान् भी मोहित हो जाते हैं-
  परमात्मा श्रीराम के भये विविध अवतार
  जन्म कर्म के भेद अति हैं विविध विस्तार
  यामे नहिं संदेह कछु हरि माया बलवान
  अज्ञानी गुनवान हूँ मोहि रही जग जान।। 04/5-6
  परमात्मा श्रीराम के जब जब भये अवतार
  किये राज्य नगरी अवध बल बंधि नीति विचार
  तब तब मैं तोहि कुंड में डारे शालिगराम
  रत्नमयी उज्ज्वल तहाँ है अनन्त छबिधाम।। 04/7-8
शृंगि ऋषि के पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने पर जो चारू प्राप्त हुआ था उसे महाराजा दशरथ अपनी तीनों रानियों को खिला दिया। कालान्तर में माता कौशल्या के गर्भ से श्रीराम, माता कैकेयी के गर्भ से भरत और माता सुमित्रा के गर्भ से लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। चारों राजकुमारों के जन्म से मानों अयोध्या नगरी को आनन्द से भर दिया। सभी अयोध्यावासी आनंद से नाचने गाने लगे जैसे उनकी मुराद पूरी हो गई हो। देवलोक में भी सभी देवता नाचने-गाने लगे और पुष्प-वर्षा करने लगे।
प्राकृतिक वैभव से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ का वैविध्यपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना और अपने गौरवमयी अतीत को गर्भ में समाया हुआ है। दक्षिण जाने का मार्ग छत्तीसगढ़ से गुजरने के कारण इसे दक्षिणापथ भी कहा जाता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि अयोध्यापति दशरथ नंदन श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ इसी पथ से होकर आर्य संस्कृति का बीज बोते हुए लंका गए थे। इस मार्ग में वे जहाँ-जहाँ रुके वे सब आज तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध स्थल हैं।
सहस्राब्दियों पूर्व घटित त्रेतायुग का प्रमाण मिलना दुर्लभ ही नहीं असंभव भी है। नदियों ने अपने मार्ग बदले, पर्वतों ने अपने स्वरूप और अरण्यों ने दिशाएँ बदलीं, नहीं बदली तो केवल मनुष्यों की आस्था और उनका विश्वास। रामायण के विविध प्रसंग, उस काल की घटनाएँ और पात्रों के उपाख्यान तब से लेकर आज तक जनमानस में वाचिक परंपरा के रूप में आज भी विद्यमान हैं। मनुष्य अपनी अनुभूतियों के साथ जनश्रुतियों को जोड़कर इतिहास की रचना करता है। लोककथा, लोकगीत, लोककला, कहावतें और मुहावरें एक दिन लोकवाणी बनकर इतिहास बन जाती है। इनमें जन मान्यताओं और आस्थाओं को स्थापित करने के लिए मन्दिरों, गुफाओं आदि का निर्माण करके धन्य होता है। ऐसा ही प्रयास छत्तीसगढ़ में सदियों से होता आ रहा है। आज भी उस काल की अनेक स्मृतियाँ यहाँ देखने- सुनने को मिलती है। बस्तर के लोकगीत, लोकनाट्य, शिल्पकला आदि में श्रीराम की झलक मिलती है। समूचा छत्तीसगढ़ रामनवमी बड़ी श्रद्धा के साथ मनाते हैं। इस दिन शुभ लग्न मानकर सभी शुभकार्य करते हैं। शादियाँ और गृह -प्रवेश आदि शुभ कार्य सम्पन्न होते हैं। छत्तीसगढ़ के राम रमिहा लोग अपने पूरे शरीर में राम नाम गुदवाकर श्रीराम नाम की पूजा-अर्चना करते हैं। वे निर्गुण राम को मानते हैं। उनका कहना है के राम से बड़ा राम का नाम है।  
सम्पर्क:'राघव ' डागा कालोनीचाम्पा-495671 (छत्तीसगढ़) Email-ashwinikesharwani@gmail.com