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Jan 18, 2013

माँ तुम सुन रही हो न?



माँ तुम सुन रही  हो न?
-गिरिजा कुलश्रेष्ठ
माँ तुम मेरी सुनो
मत सुनो अब उनकी
जो कहते हैं कि ,
बेटी को आने दो
खिल कर मुस्काने दो।
बेटे-बेटी का भेद मिटा कर
समानता की सरिता लहराने दो
वे लोग तो कहते हैं बस यों ही
नाम कमाने
कन्या-प्रोत्साहन के नाम पर
इनाम पाने।
माँ, उनकी कोई बात मत सुनना
मुझे जन्मने के सपने मत बुनना।
सब धोखा है
प्रपंच भरा लेखा-जोखा है।
एक तरफ कन्या प्रोत्साहन
दूसरी तरफ घोर असुरक्षा
अतिचार और शोषण।
माँ, पहले तुम सुनती थीं ताने
बेटी को जन्म देने के और फिर
उसे कोख में ही मारने के।
लेकिन माँ इसे तुम्ही जानती हो कि
कितनी मजबूरियाँ और कितने बहाने
रहे होंगे तुम्हारे सामने
कोई नही आता होगा
बेटी की माँ को थामने
समझ सकती हूँ माँ ..
तुम गलत नहीं थी।
जानतीं थीं कि जन्म लेकर भी
मुझे मरना होगा
आँधियों में,
बेटी को पाँखुरी की तरह
झरना होगा।
हाँ..हाँ..मरना ही होगा मुझे
एक ही जीवन में कितनी मौतें
जैसे तुम मरतीं रहीं हर रूप में
कितनी बार कितनी मौतें
शायद जिन्दगी ने
तुम्हें समझा दिया था कि,
लड़की औरत  ही होती है
हर उम्र में सिर्फ एक औरत
औरत, जिसे दायरों में कैद रखने
बनानी पड़तीं हैं कितनी दीवारें
कितनी तलवार और कटारें
क्योंकि उसे निगलने को
बेताब रहता है अँधेरा जहाँ-तहाँ
कुचलने को बैचैन रहते हैं
दाँतेदार पहिये... यहाँ-वहाँ
कोलतार की सड़क बनाते रोलर की तरह
और...मसलकर फेंकने बैठे रहते हैं
लोहे के कितने ही हाथ
फेंक देते हैं तार-तार करके
उसका अस्तित्व
बिना अपनत्व और सम्मान के
कभी तन के लिए ,कभी मन के लिए
तो कभी धन के लिए
झोंक देते हैं तन्दूर में।
खुली सड़क पर ,भरे बाजार में
बस में या कार में..
कैसे सुरक्षित रहे  तुम्हारी बेटी, माँ
इस भयानक जंगल में
पहले तुमसे नाराज थी व्यर्थ ही
कोख में ही अपनी असमय मौत से।
पर अब मैं नाराज नही हूँ
जानती हूँ कि
मेरी सुरक्षा के लिए
नहीं है तुम्हारे पास कोई अस्त्र या शस्त्र
तभी तो तुम्हारी बेटी कर दी जाती है
'निर्वस्त्र
सच कहती हूँ माँ
मैं सचमुच डरने लगी हूँ
दुनिया में आने से।
अपनी ही दुनिया के सपने सजाने से
इसलिए अब तुम सिर्फ मेरी सुनो माँ,
हो सके तो अब मार देना मुझे
कोख में ही
कम से कम वह मौत
इतनी वीभत्स तो न होगी
पंखनुची चिड़िया की तरह
खून में लथपथ..घायल पड़ी सड़क पर
जीवन से हारी हुई..बुरी तरह..।
दो दिन सागर उबलेंगे
पर्वत  हिलेंगे, मुद्दे मिलेंगे
बहसों और हंगामों के
और फिर दुनिया चलेगी पहले की तरह
नहीं चल पाऊँगी तो सिर्फ मैं
हाँ माँ, सिर्फ मैं।
तुम्हारी असहाय, अकिंचन बेटी
सिर उठा कर, सम्मान पाकर।
कब तक शर्मसार होती रहोगी??
बेटी की माँ होने का बोझ
ढोती रहोगी !!
इसलिये मुझे जन्म न दो माँ !
मैं तो कहती हूँ कि
तुम जन्म देना ही बन्द कर दो
नहीं सम्हाल सकती हो अगर
अपनी सन्तान को
सुरक्षा व सुसंस्कारों के साथ
माँ तुम सुन-समझ रही हो न?

संपर्क: मोहल्ला- कोटा वाला, खारे कुएँ के पास ग्वालियर (म.प्र)  Email- girija.kulshreshth@gmail.com

परिवार

खत्म होते घर-आँगन
- संजय कुमार

घर-आँगन, परिवार, रिश्ते-नाते और हमारे संस्कार बदलते समय के साथ धीरे-धीरे बदलते जा रहे हैं! अब हमारे घर- परिवार में वो बात नहीं रही जो पहले कभी हुआ करती थी! पहले हम घर-परिवार से जाने जाते थे और अब ....?  कहा जाता हैं एकता में जो शक्ति है वो किसी अकेले इन्सान में नहीं होती और ये बात बिलकुल सही है क्योंकि हमने अपनी आँखों से एकता, एकजुटता की शक्ति को देखा है! फिर चाहे वह युवा संगठन हो या फिर 'अन्नाका समर्थन करने वालों का संगठन, हम सब इसकी ताकत को जानते हैं और हमारे देश की सरकार भी एकता की ताकत से भली-भाँति परिचित है! किन्तु मैं यहाँ बात कर रहा हूँ, अपने पारिवारिक संगठन की, या संयुक्त परिवार की जो अब नाम के बचे हैं! एक समय था जब हम किसी के घर जाते थे, तो वहाँ पर हमारी मुलाकात एक ही परिवार के कई सदस्यों से होती थी! घर में मौजूद घर का सबसे मजबूत स्तम्भ जिस पर पूरा घर-परिवार टिका हुआ होता है और वो हैं उस घर के बुजुर्ग दादाजी-दादीजी, अगर ये नहीं होते तो ऐसा लगता है जैसे हमें सही राह दिखाने वाला कोई  नहीं है! दूसरा मजबूत स्तम्भ माता-पिता जो जीवनभर अपने बच्चों के साथ रहना चाहते हैं, किन्तु अब ऐसा समय आ गया है कि, आज के बच्चे ही अपने माता-पिता के साथ नहीं रहना चाहते! माता-पिता उन्हें किसी बंदिश से कम नहीं लगते! आज घर-घर में, हर घर में चार बर्तन खनकने की आवाजें तेज होती जा रही हैं! हर इंसान के साथ माता-पिता का साथ लम्बे समय तक होना अत्यंत जरुरी होता है! जिन लोगों के लिए माता-पिता बोझ होते हैं उन्हें ये मालूम होना चाहिए जिनके सिर पर माता-पिता का साया नहीं रहता वो बच्चे या तो बहुत अच्छे बनते हैं या फिर? .. वही अन्य रिश्तों में चाचा-चाची,भैया-भाभी ऐसे कई रिश्ते एक ही परिवार में देखने को मिलते थे जिनसे कोई भी घर एक परिवार बनता है ! ऐसे परिवार में जाने से,उनसे मुलाकात करके मन को एक अनूठी खुशी मिलती है  और ऐसे परिवार से मिलता है घर का प्यार, अपनापन, मान-सम्मान, और सच्चे रिश्तों की महक! किन्तु जैसे-जैसे समय तेजी से गुजर रहा है और जब से  इन्सान अपने आप से मतलब रखने लगा है, सिर्फ अपने बारे में सोचने लगा है, परिवार के अन्य सदस्यों की परवाह नहीं उनके लिए मान-सम्मान नहीं तो ऐसी स्थिति में शुरू हो जाता है विघटन और बदलाव उस परिवार की एकता में ! आज की भागमभाग में अगर इंसान के पास कुछ नहीं है तो वो है सब्र और संयम, जो किसी भी इंसान की सबसे बड़ी ताकत होती है ! किन्तु आज हम देख रहे हैं कि, इंसान आज कितनी जल्दी अपना सब्र खो देता  है, जिस कारण से आये दिन घर परिवार में लड़ाई झगड़े की स्थिति बन रही है और यही स्थिति आयेदिन होने वाले  झगड़ों के कारण इंसान अपनों से अपने परिवार से दूर होता जा रहा है या मजबूरी बश अपने ही घर परिवार के बीच दीवारें खींच रहा है! जब किसी परिवार के बीच दीवारें खींचती है तो क्या स्थिति होती है उस घर परिवार की? एक बड़ा सा घर बदल जाता है  चिड़ियों के छोटे-छोटे घोंसलों के जैसा, जिसे हम घर नहीं  पत्थर से निर्मित एक मकान कहते है! आज इस विघटन और बदलाव से हमारा कितना अहित हो रहा है शायद हम  यह सब जानते है फिर भी जानकार अनजान हैं! हमें परिवारों में हुए विघटन और बदलाव का असर अब देखने को मिल रहा है!  अपने बच्चों में क्षीण होते संस्कार के रूप में, माता-पिता के खोते हुए सम्मान के रूप में, बदलती रिश्तों की परिभाषा और उनकी महक के रूप में, खत्म होती अपनों के प्रति अपनत्व की भावना के रूप में, पथभ्रष्ट होती युवा पीढ़ी के रूप में, और ये सब कुछ हुआ हमारे घर-परिवार के बँटने से उनके बीच मनमुटाव की दीवार से! जब से इंसान ने अकेले रहना शुरू किया है, सिर्फ अपने बारे में सोचा है तब से बदल गयी हर  घर-परिवार की कहानी! आज घर-परिवार की बात करना बड़ी बेमानी सी लगती है ...... और ऐसा लगता है जैसे हमें अपना जीवन सिर्फ अपने लिए जीना है ...... किन्तु जब हम अपने भरे-पूरे परिवार के साथ बिताए लम्हों को याद करते हैं तो मन बड़ा ही दुखी होता है और महसूस होता है कि, जो मजा अपनों के साथ है वो अकेले में नहीं ....... किन्तु आज ये संभव भी तो नहीं है क्योंकि माता-पिता अपना घर नहीं छोड़ना चाहते और बच्चों को अपना भविष्य बनाने के लिए घर से बाहर निकलना ही होता है ....... क्या उचित है क्या अनुचित, क्या सही है क्या गलत?  इस बात का जवाब शायद ही किसी के पास हो, सभी के पास अपने-अपने तर्क हैं जिन पर बहस करना बेकार है!  फिर भी एक कटु सत्य हमारे सामने हैं, और वो ये है की ....... हमारे घर-आँगन खत्म हो गए या फिर आज बदल रहे हैं  छोटी-छोटी कोठरियों में ।


लेखक के बारे में- बचपन से लेकर आज तक जीवन के हर पहलु को बहुत करीब से देखा है मैंने ! आज भी लगा हुआ हूँ 'जीवन की आपाधापी  में! मेरे एक अजीज हैं, जिन्होंने मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया! मैं शिवपुरी मध्य-प्रदेश का रहने बाला हूँ! पिछले 15 वर्षों से शेयर मार्केट से जुड़ा हुआ हूँ!
संपर्क: c/o कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग लिमिटेड, एक्सिस बैंक के पास आगरा- बोम्बे मार्ग, शिवपुरी (म. प्र.) 473551, मो. 09993228299, Email-sanjaystock07@gmail.com

आशा के फूल



आशा के फूल
- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
1
वल्लरियाँ विश्वास की, हों आशा के फूल ।
नूतन वर्ष मनाइए , तज तृष्णा के शूल ।।
2
अनाचार का अन्त हो, सत्पथ का निर्माण ।
करें सुमंगल शारदा, कलम रचे कल्याण ।।
3
शीश चुनरिया सीख की, मन में मधुरिम गीत ।
बाबुल तेरी लाडली, कभी न भूले रीत ।।
4
खुशबू के मिस फूल ने, भेज दिया सन्देश ।
हाल हमारा पूछने, आओ तो इस देश ।। 
5
तितली ने छुपकर पढ़े ,सभी सुमन के पत्र ।
'सोच समझ उडऩा सखी, वन, उपवन सर्वत्र।।
6
सृजनहार नव वर्ष में, सिरजो ऐसा गीत ।
मन से मन सबके मिलें, बजे मधुर संगीत । ।
7
कल किरणों की कुहर से, हुई बड़ी तक़रार ।
धूप उमंगों -सी खिले, चहुँ दिशि हो उजियार  । । 

संपर्क: टॉवर-एच,मकान नं 604, प्रमुख हिल्स, छरवडा रोड,
वापी जिला- वलसाड (गुजरात)- 396191
Email- jyotsna.asharma@yahoo.co.in