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Apr 19, 2010

राजा विक्रम और हिंदी का पिशाच

- जवाहर चौधरी
राजा विक्रमादित्य सुबह की सैर के लिए वन से होकर गुजर रहे थे कि अचानक पेड़ से एक पिशाच ठीक उनके सामने टपक पड़ा और उछलकर उनके कंधे पर लटक गया। राजा पहले चौंके लेकिन दूसरे ही क्षण झिड़कते हुए उन्होंने पिशाच को नीचे पटक दिया। चीखते हुए बोले- ये क्या बदतमीजी है, पेड़ पर लटककर सोते नहीं बनता तो नीचे जमीन पर क्यों नहीं सोते हो? इस तरह किसी राहगीर पर गिरते तुम्हें शरम नहीं आती है? पिशाच कहीं के! मार्निंग वाक पर हूं, तलवार नहीं है वरना तुम्हारी गर्दन उड़ा देता। ईडियट!
नाराज न हों राजन, हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है...। पिशाच ने मुस्कराते हुए राजा को याद दिलाया।
तो? राजा ने बेरुखी से पूछा।
मैं हिंदी का पिशाच हूं... ग्लैड टू मीट यू सर। पिशाच ने शेक हैंड के लिए हाथ बढ़ाया।
तुम!! तुम हिंदी के पिशाच कैसे हो? राजा ने हाथ मिलाए बगैर पूछा!
हिंदी के पेड़ पर लटका हूं इसलिए हिंदी का पिशाच हूं... हिस्ट्री के पेड़ पर होता तो हिस्ट्री का पिशाच होता ... हें- हें...हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है... ग्लैड टू मीट यू सर ...! पिशाच ने एक बार फिर हाथ बढ़ाया।
राजा ने एक नजर पेड़ पर डाली। पेड़ काफी पुराना और बड़ा दिख रहा था। पत्तियां कम थीं लेकिन डालियां बहुत। प्राय: हर डाल पर छोटे- बड़े पिशाचगण औंधे लटके सो रहे थे। जो सो नहीं रहे थे वे एक दूसरे की टांगें खींचकर अपनी सक्रियता बनाए हुए थे। चकित राजा के मुंह से बोल फूटे- ओह! तो ये है हिन्दी का पेड़!
मैं इसका सीनियर पिशाच हूं। पिशाच बोला।
सीनियर मोस्ट? राजा ने उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए पूछा।
नहीं, काफी सारे हैं जो मुझसे सीनियर हैं। लेकिन वे तो अब प्राय: सोते रहते है। मैं एक्टिव हूं... ग्लेड टू मीट यू सर। पिशाच ने दोनों हाथ आगे बढ़ाए लेकिन राजा ने इस बार भी अनदेखा कर दिया।
इस पेड़ के लिए कुछ करते हो या यूं ही लटके रहते हो?
मैं इसका पेड़-सेवी हूं... आप रूकें तो मैं ऊपर से फोटो और अखबार की कतरनों वाली फाइल लाकर दिखाता हूं। पिशाच ने राजा को विश्वास दिलाना चाहा।
ठीक है, माना कि तुम पेड़-सेवी हो, पर करते क्या हो इस पेड़ के लिए? राजा को अभी तक माजरा समझ में नहीं आया था।
आप देख रहे हैं राजन, पेड़ काफी सूख गया है... अब इसकी वो शोभा नहीं रही जो पहले थी। नये पत्ते नहीं आ रहे है। लेकिन आप देखिए, अब इस पर बहुत से पत्ते हैं! दरअसल ये पत्ते नहीं पिशाच हैं?
ऐंं! ये पत्ते नहीं पिशाच हैं?
जी हां देखिए हरे पिशाचों से लदा ये पेड़ कितना हरा-भरा लग रहा है। यह मेरी पेड़ सेवा है... ग्लैड टू मीट यू सर। पिशाच ने हाथ बढ़ाया लेकिन राजा ने कोई रिस्पॉन्स नहीं दिया।
इससे तो पेड़ पर बहुत बोझ बढ़ गया होगा?... मैं राज्य की ओर से इस पेड़ के लिए काफी सारा अनुदान देता हूं, उसका क्या होता है? राजा को याद आया।
वो अनुदान तो कम पड़ता है सर। सेमीनार, कांफ्रेंस होते हैं, टीए, डीए दिया जाता है, और भी बहुत से खर्च है। इन्हीं सब चीजों का तो आर्कषण है वरना क्या मतलब है, कोई क्यों अपना समय बर्बाद करेगा इस पेड़ पर लटक कर। ... अब हम पेड़ सेवियों का महासंघ बनाना चाहते हैं, उसका बजट काफी है, बताऊं? पिशाच ने योजना पर प्रकाश डालना चाहा।
लेकिन इससे तो पेड़ पर वजन और बढ़ेगा! राजा ने चिंता व्यक्त की।
आप तो सिर्फ अनुदान देते रहिए सर, बाकी काम पिशाचों पर छोड़ दीजिए। कहते हुए पिशाच दोबारा उचक कर राजा के कंधों पर चढ़ गया। बोला- आज हिंदी दिवस है राजन... आपके कंधों पर लटका मैं आपके महल तक जाऊंगा और रास्ते में समय काटने के लिए आपको एक कथा भी सुनाऊंगा।
राजा के पास समय नहीं था। रोज मार्निंग वाक के बाद वे कम्प्यूटर पर अपनी मेल चेक करते हैं। अंग्रेजी के कारण उसमें काफी समय लग जाता है। राजा ने उसे फिर से पटक दिया। अगले हफ्ते ले चलूंगा तुम्हें, अभी मेरे पास समय नहीं। हटो रास्ते से।
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है राजन! मैं आप पर लदकर जाऊंगा तो जनता देखकर यह सोचेगी कि आप मुझे लादकर ला रहे हैं। इससे आपका और मेरा दोनों का सम्मान बढ़ेगा, लोग पूजा करने लगेंगे। आप जानते हैं कि राजा और पिशाच पूजा पर ही जिंदा रहते आए हैं। पिशाच ने राजा को अपने प्रभाव में लिया।
इतनी सी बात के लिए तुम्हें उठाकर ले जाऊं? राजा राजी नहीं हुए।
आज आप मेरा सार्वजनिक अभिनंदन करेंगे, शाल, श्रीफल देंगे, आरती और वंदना भी करेंगे और मुझसे आशीर्वाद लेंगे। आज हिंदी दिवस है, यह सब करवा कर मैं वापस उड़ जाऊंगा और पेड़ पर लटक जाऊंगा। इससे आपको और राज्य को महानता मिलेगी। चलो राजन, अब देर न करो। पिशाच ने राजा का कंधा मजबूती से पकड़ लिया। राजा के पास तलवार नहीं थी, दूसरा कोई रास्ता नहीं देखकर राजा चल पड़ा।
राजा को पता था कि अब पिशाच उसे कथा सुनाकर बोर करेगा, इसलिए उसने पहले दांव मारते हुए कहा- पिशाच हमेशा तुम मुझे कथा सुनाते हो, आज रास्ता काटने के लिए मैं तुम्हें कथा सुनाता हूं, सुनो- बलिहारपुर में एक गरीब ब्राम्हण रहता था। एक वर्ष नगर में अकाल पड़ा, लोगों को खाने के लाले पड़ गये। ब्राम्हण को कई दिनों से भिक्षा भी नहीं मिली। भूखों मरने की स्थिति देख उसने बलिहारपुर से पलायन कर दूसरे राज्य की शरण ली। वहां लोग शिक्षा के आग्रही थे, ब्राम्हण ने हिंदी को एक महान भाषा बताया और पढ़ाना आरंभ किया। शीघ्र ही विद्यार्थी आने लगे साथ में शुल्क और दक्षिणा भी लाने लगे। ब्राम्हण की हालत सुधरने लगी। धन-धान्य आया, भवन बनाया, दूसरे सुख-साधन भी जुटाए। हिंदी की महानता का हर व्याख्यान स्वयं उसे महान बनाता गया। कुछ ही वर्षों में वह हिंदी, देव घोषित कर दिया गया। इस बीच उसके तीन पुत्र बड़े होकर शिक्षा प्राप्त करने के योग्य हुए। ब्राम्हण ने तीनों पुत्रों को चुपके से अंग्रेजी भाषा पढऩे के लिए दूसरे स्थान पर भेजना आरंभ कर दिया। घर में भी वह अपने बच्चों से स्वयं अंग्रेजी में बात करने का प्रयत्न करता। हिन्दी बोलने पर प्राय: बच्चों को फटकार भी लगाता। किंतु इन सबके चलते वह दूसरों को हिंदी की महानता के व्याख्यान देता रहा। हे पिशाच प्रमुख! तुम बताओ कि ब्राम्हण ने जिस भाषा के माध्यम से अपना सब कुछ निर्माण किया उसने अपने पुत्रों को उसी भाषा में शिक्षा क्यों नहीं लेने दी? उसे अपनी सिद्ध और अनुभूत भाषा पर विश्वास क्यों नहीं था? यदि तुमने इस प्रश्न का जवाब जानबूझ कर नहीं दिया तो मैं आज तुम्हें यहीं पटक दूंगा और हिंदी दिवस पर तुम्हारा सम्मान नहीं करूंगा।
पिशाच कुछ देर चुप रहा, फिर अपने संकोच को दबाकर उसने जवाब दिया- हे राजन! आपकी कथा का वह ब्राम्हण मैं ही हूं! आज हिंदी का बड़े-से- बड़ा पिशाच अंग्रेजी के भूत से डरता है। एक अकेला भूत पिशाचों के पूरे डिपार्टमेंट पर भारी पड़ता है। अगर हम हिंदी के साथ बीच-बीच में भूतों की भाषा नहीं बोलें तो लोग हमें गंवार समझकर उपेक्षा करते हैं। हर पिशाच के साथ पहचान का संकट पैदा हो गया है। पिशाचहीन- भावना से ग्रसित हैं। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे भूतों की तरह पूरी दुनिया में विचरण करें, पिशाचों की तरह सिर्फ एक पेड़ पर लटके नहीं रहे।
उत्तर सुनकर राजा को बहुत क्रोध आया और उसने पिशाच को पटक देना चाहा। लेकिन पिशाच में आत्मसम्मान भी नहीं था, उसने हंसते हुए कहा- राजन मैंने सही उत्तर दिया है। और अब वादे के अनुसार न तुम मुझे यहां पटक सकते हो और न ही मेरा सम्मान करने से मना कर सकते हो। आज हिंदी दिवस है... हा... हा... हा.... कहते हुए उसने राजा की जेब में हाथ डालकर पर्स टटोला।
संपर्क - 16 कौशल्यापुरी, चितावद रोड, इन्दौर - 452001 , फोन - 098263 61533
व्यंग्यकार के बारे में ...
व्यंग्य की शैली में जब कोई कथा कही जाती है तब वह व्यंग्यकथा कहलाती है। इस तरह की व्यंग्य कथाएं जब फंतासी में कही जाती हैं तब वे और भी सरस व प्रभावकारी हो जाती हैं। ऐसे फंतासी कथा लेखन में शरद जोशी को महारत हासिल थी। यहां जवाहर चौधरी की प्रस्तुत व्यंग्य रचना 'राजा विक्रम और हिंदी का पिशाच' फंतासी में लिखी गई एक ऐसी ही व्यंग्य कथा है। लेखक ने विक्रम और बेताल जैसे चरित्र के माध्यम से कुछ ऐसे संवाद रचे हैं जिसमें अंग्रेजी के अंधड़ में भारतीय भाषाओं की पताकाएं कहां उड़ी जा रही हैं इस दशा का चित्रण है। हिंदी के विज्ञजनों द्वारा अंग्रेजी बोलने का लोभ संवरण नहीं कर पाना, रोजगार जन्य परिस्थितियों के कारण हिंदी हिंदी का हल्ला बोलकर अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाने को विवश होना, हिंदी के नाम पर सरकार से भारी भरकम अनुदान की राशि झोंककर राजभाषा विभागों द्वारा येन-केन-प्रकारेण अपने कर्तव्यों की इतिश्री करना। इस प्रकार हिंदी के पिशाचों पर किस तरह अंग्रेजी का भूत सवार रहता है, इन हास्यास्पद स्थितियों की ओर व्यंग्यकार की भृकुटि तनी हुई है। यहां हाजिर रचना में लेखक की इस अदायगी को बखूबी महसूस किया जा सकता है।
- विनोद साव



किताबें

माँ पर केंद्रित अंक
डॉ. परदेशी राम वर्मा द्वारा संपादित अव्यवसायिक त्रैमासिक पत्रिका अगासदिया अपने आरंभिक काल से लेकर किसी न किसी विशेष विषय पर केंद्रित रहती है, जो छत्तीसगढ़ की संस्कृति, साहित्य एवं लोककला पर आधारित होती है। आगासदिया का जुलाई- सितंबर 2009 का अंक मां पर केंद्रित किया गया है। जिसमें संपादक ने अपने समकालीन मित्रों और वरिष्ठ जनों से आग्रह कर मां पर उनके विचारों को लिपिबद्ध करवाया है। अंक में उनके अपने कुछ लेखों के साथ गजानन माधव मुक्तिबोध, आचार्य सरोज द्विवेदी, आनंद मूर्ति आत्मानंद, डॉ. खूबचंद बघेल, पं. श्यामाचरण शुक्ल, संत पवन दीवान, केयूर भूषण, श्यामलाल चतुर्वेदी जैसे म के संस्मरण तथा उनके समकालीन मित्रों के आलेख, कहानी, कविता भी शामिल हैं। भिलाई दुर्ग से प्रकाशित इस विशेष अंक की कीमत 150/- रुपए है।
बच्चों की समस्याएं
श्री प्रकाशन दुर्ग छत्तीसगढ़ से प्रकाशित पुस्तक बच्चों की हरकतें प्रो. अश्विनी केशरवानी द्वारा 1980 से 2000 तक विभिन्न पत्रिकाओं जैसे धर्मयुग, नवनीत तथा अनेक समाचार पत्रों में प्रकाशित बच्चों पर केंद्रित उनके 27 लेखों का संकलन है। इन लेखों के माध्यम से प्रो. केशरवानी ने जन्म लेने से लेकर बच्चों के पालन- पोषण, संस्कार, आदतें, माता-पिता की जिम्मेदारी, शिक्षा जैसे मनोवैज्ञानिक प्रश्नों के साथ बाल मजदूरी जैसी समस्या को भी उठाया है। किताब की कीमत 150/- रुपए है।
तपती धूप में...
गम में भीगी खुशी और चरागे दिल के बाद देवी नागरानी का यह तीसरा गज़ल संग्रह है। देवी नागरानी के गज़लों में संवेदना और भाषा की काव्यात्मकता के साथ जीवन के विभिन्न उतार चढ़ाव का समावेश होता है। गज़ल कहने की अपनी अलग शैली के कारण उनकी गजलों की रंगत कुछ और हो जाती है।
'हमें पहुंचाये मंजिल तक, कोई ऐसी डगर देना,
जो तपती धूप में साया घना दे, वो शज़र देना।'
जिंदगी की जटिलताओं के बीच अपने संघर्ष का इजहार करने के लिए देवी गजलों का सहारा लेती हैं। गज़लों में उन्होंने सुनामी जैसी घटनाओं पर भी लिखा है-
'सुनामी ने सजाई मौत की महफिल फिजाओं में
शिकारी मौत बन कर चुपके- चुपके से कफन लाया।'
संयोग प्रकाशन मुम्बई से प्रकाशित किताब की कीमत 150/-रुपए है।

नामालूम सी एक खता


- आचार्य चतुरसेन शास्त्री
गर्मी के दिन थे। बादशाह ने उसी फागुन में सलीमा से नई शादी की थी। सल्तनत के झंझटों से दूर रहकर नई दुल्हन के साथ प्रेम और आनंद की कलोल करने वे सलीमा को लेकर कश्मीर के दौलतखाने में चले आए थे।
रात दूध में नहा रही थी। दूर के पहाड़ों की चोटियां बर्फ से सफेद होकर चांदनी में बहार दिखा रही थीं। आरामबाग के महलों के नीचे पहाड़ी नदी बल खाकर बह रही थी। मोतीमहल के एक कमरे में शमादान जल रहा था और उसकी खुली खिड़की के पास बैठी सलीमा रात का सौंदर्य निहार रही थी।
खुले हुए बाल उसकी फिरोजी रंग की ओढऩी पर खेल रहे थे। चिकन के काम से सजी और मोतियों से गुंथी हुई फिरोजी रंग की ओढनी पर, कसी कमखाब की कुरती और पन्नों की कमरपेटी पर अंगूर के बराबर बडे मोतियों की माला झूम रही थी। सलीमा का रंग भी मोती के समान था। उसकी देह की गठन निराली थी। संगमरमर के समान पैरों में जरी के काम के जूते पड़े थे, जिन पर दो हीरे दक-दक चमक रहे थे।
कमरे में एक कीमती ईरानी कालीन का फर्श बिछा हुआ था, जो पैर रखते ही हाथ-भर नीचे धंस जाता था। सुगंधित मसालों से बने शमादान जल रहे थे। कमरे में चार पूरे कद के आईने लगे थे। संगमरमर के आधारों पर सोने-चांदी के फूलदानों में ताजे फूलों के गुलदस्ते रखे थे। दीवारों और दरवाजों पर चतुराई से गुंथी हुई नागकेसर और चम्पे की मालाएं झूल रही थीं, जिनकी सुगंध से कमरा महक रहा था। कमरे में अनगिनत बहुमूल्य कारीगरी की देश-विदेश की वस्तुएं करीने से सजी हुई थीं।
बादशाह दो दिन से शिकार को गए थे। इतनी रात होने पर भी नहीं आए थे। सलीमा खिड़की में बैठी प्रतीक्षा कर रही थी। सलीमा ने उकताकर दस्तक दी। एक बांदी दस्तबस्ता हाजिर हुई।
बांदी सुंदर और कमसिन थी। उसे पास बैठने का हुक्म देकर सलीमा ने कहा-'साकी, तुझे बीन अच्छी लगती है या बांसुरी?'
बांदी ने नम्रता से कहा- 'हुजूर जिसमें खुश हों।'
सलीमा ने कहा- 'पर तू किसमें खुश है?'
बांदी ने कम्पित स्वर में कहा- 'सरकार! बांदियों की खुशी ही क्या!'
सलीमा हंसते-हंसते लोट गई। बांदी ने बंशी लेकर कहा- 'क्या सुनाऊं?'
बेगम ने कहा- 'ठहर, कमरा बहुत गरम मालूम देता है, इसके तमाम दरवाजे और खिड़कियां खोल दे। चिरागों को बुझा दे, चटखती चांदनी का लुत्फ उठाने दे और वे फूलमालाएं मेरे पास रख दे।'
बांदी उठी। सलीमा बोली- 'सुन, पहले एक गिलास शरबत दे, बहुत प्यासी हूं।'
बांदी ने सोने के गिलास में खुशबूदार शरबत बेगम के सामने ला धरा। बेगम ने कहा- 'उफ! यह तो बहुत गर्म है। क्या इसमें गुलाब नहीं दिया?'
बांदी ने नम्रता से कहा- 'दिया तो है सरकार!'
'अच्छा, इसमें थोड़ा सा इस्तम्बोल और मिला।'
साकी गिलास लेकर दूसरे कमरे में चली गई। इस्तम्बोल मिलाया और भी एक चीज मिलाई। फिर वह सुवासित मदिरा का पात्र बेगम के सामने ला धरा।
एक ही सांस में उसे पीकर बेगम ने कहा- 'अच्छा, अब सुनो। तूने कहा था कि तू मुझे प्यार करती है, सुना, कोई प्यार का ही गाना सुना।'
इतना कह और गिलास को गलीचे पर लुढ़काकर मदमाती सलीमा उस कोमल मखमली मसनद पर खुद भी लुढक गई और रस-भरे नेत्रों से साकी की ओर देखने लगी। साकी ने बंशी का सुर मिलाकर गाना शुरू किया -
'दुखवा मैं कासे कं मोरी सजनी...'
बहुत देर तक साकी की बंशी कंठ ध्वनि कमरे में घूम-घूमकर रोती रही। धीरे-धीरे साकी खुद भी रोने लगी। साकी मदिरा और यौवन के नशे में चूर होकर झूमने लगी।
गीत खत्म करके साकी ने देखा, सलीमा बेसुध पड़ी है। शराब की तेजी से उसके गाल एकदम सुर्ख हो गए हैं और और ताम्बुल-राग रंजित होंठ रह-रहकर फड़क रहे हैं। सांस की सुगंध से कमरा महक रहा है। जैसे मंद पवन से कोमल पत्ती कांपने लगती है, उसी प्रकार सलीमा का वक्षस्थल धीरे-धीरे कांप रहा है। प्रस्वेद की बूंदें ललाट पर दीपक के उज्ज्वल प्रकाश में मोतियों की तरह चमक रही हैं।
बंशी रखकर साकी क्षणभर बेगम के पास आकर खड़ी हुई। उसका शरीर कांपा, आंखें जलने लगी, कंठ सूख गया। वह घुटने के बल बैठकर बहुत धीरे-धीरे अपने आंचल से बेगम के मुख का पसीना पोंछने लगी। इसके बाद उसने झुककर बेगम का मुंह चूम लिया।
फिर ज्यों ही उसने अचानक आंख उठाकर देखा, तो पाया खुद दीन-दुनिया के मालिक शाहजहां खड़े उसकी यह करतूत अचरज और क्रोध से देख रहे हैं।
साकी को सांप डस गया। वह हतबुद्धि की तरह बादशाह का मुंह ताकने लगी। बादशाह ने कहा- 'तू कौन है? और यह क्या कर रही थी?'
साकी चुप खड़ी रही। बादशाह ने कहा- 'जवाब दे!'
साकी ने धीमे स्वर में कहा- 'जहांपनाह कनीज अगर कुछ जवाब न दे, तो?'
बादशाह सन्नाटे में आ गए- 'बांदी की इतनी हिम्मत?'
उन्होंने फिर कहा- 'मेरी बात का जवाब नहीं? अच्छा, तुझे निर्वस्त्र करके कोडे लगाए जाएंगे!'
साकी ने अकम्पित स्वर में कहा- 'मैं मर्द हूं।'
बादशाह की आंखों में सरसों फूल उठी। उन्होंने अग्निमय नेत्रों से सलीमा की ओर देखा। वह बेसुध पड़ी सो रही थी। उसी तरह उसका भरा यौवन खुला पड़ा था। उनके मुंह से निकला- 'उफ! फाहशा! और तत्काल उनका हाथ तलवार की मूठ पर गया। फिर उन्होंने कहा- दोजख के कुत्ते! तेरी यह मजाल!'
फिर कठोर स्वर से पुकारा-'मादूम!'
एक भयंकर रूप वाली तातारी औरत बादशाह के सामने अदब से आ खड़ी हुई। बादशाह ने हुक्म दिया- 'इस मरदूद को तहखाने में डाल दे, ताकि बिना खाए-पिए मर जाए।'
मादूम ने अपने कर्कश हाथों से युवक का हाथ पकड़ा और ले चली। थोडी देर बाद दोनों एक लोहे के मजबूत दरवाजे के पास आ खड़े हुए। तातारी बांदी ने चाभी निकाल दरवाजा खोला और कैदी को भीतर ढकेल दिया। कोठरी की गच कैदी का बोझ ऊपर पड़ते ही कांपती हुई नीचे धसकने लगी!
प्रभात हुआ। सलीमा की बेहोशी दूर हुई। चौंककर उठ बैठी। बाल संवारने, ओढनी ठीक की और चोली के बटन कसने को आईने के सामने जा खड़ी हुई। खिड़कियां बंद थीं। सलीमा ने पुकारा- 'साकी! प्यारी साकी! बड़ी गर्मी है, जरा खिड़की तो खोल दे। निगोड़ी नींदने तो आज गजब ढा दिया। शराब कुछ तेज थी।'
किसी ने सलीमा की बात न सुनी। सलीमा ने जरा जोर से पुकारा- 'साकी!'
जवाब न पाकर सलीमा हैरान हुई। वह खुद खिड़की खोलने लगी। मगर खिड़कियां बाहर से बंद थीं। सलीमा ने विस्मय से मन-ही-मन कहा क्या बात है दासियां सब क्या हुईं?
वह द्वार की तरफ चली। देखा, एक तातारी बांदी नंगी तलवार लिए पहरे पर मुस्तैद खड़ी है। बेगम को देखते ही उसने फिर झुका लिया।
सलीमा ने क्रोध से कहा- 'तुम लोग यहां क्यों हो?'
'बादशाह के हुक्म से।'
'क्या बादशाह आ गए।'
'जी हां।'
'मुझे इत्तिला क्यों नहीं की?'
'हुक्म नहीं था।'
'बादशाह कहां हैं?'
'जीनतमहल के दौलतखाने में।'
सलीमा के मन में अभिमान हुआ। उसने कहा- 'ठीक है, खूबसूरती की हाट में जिनका कारोबार है, वे मुहब्बत को क्या समझेंगे? तो अब जीनतमहल की किस्मत खुली?'
तातारी स्त्री चुपचाप खड़ी रही। सलीमा फिर बोली- 'मेरी साकी कहां है?'
'कैद में।'
'क्यों?'
'जहांपनाह का हुक्म।'
'उसका कुसूर क्या था?'
'मैं अर्ज नहीं कर सकती।'
'कैदखाने की चाभी मुझे दे, मैं अभी उसे छुड़ाती हूं।'
'आपको अपने कमरे से बाहर जाने का हुक्म नहीं है।'
'तब क्या मैं भी कैद हूं?'
'जी हां।'
सलीमा की आंखों में आंसू भर आए। वह लौटकर मसनद पर गड़ गई और फूट-फूटकर रोने लगी। कुछ ठहरकर उसने एक खत लिखा-'हुजूर! कुसूर माफ फर्मावें। दिनभर थकी होने से ऐसी बेसुध सो गई कि हुजूर के इस्तकबाल में हाजिर न रह सकी। और मेरी उस दासी को भी जां बख्शी की जाए। उसने हुजूर के दौलतखाने में लौट आने की इत्तला मुझे वाजिबी तौर पर न देकर बेशक भारी कुसूर किया है। मगर वह नई कमसिन, गरीब और दुखिया है।'
'कनीज'
सलीमा
चिट्ठी बादशाह के पास भेज दी गई। बादशाह ने आगे होकर कहा- 'लाई क्या है?'
बांदी ने दस्तबस्ता अर्ज की- 'खुदावन्द! सलीमा बीबी की अर्जी है!'
बादशाह ने गुस्से से होंठ चबाकर कहा- 'उससे कह दे कि मर जाए! इसके बाद खत में एक ठोकर मारकर उन्होंने उधर से मुंह फेर लिया।'
बांदी सलीमा के पास लौट आई। बादशाह का जवाब सुनकर सलीमा धरती पर बैठ गई। उसने बांदी को बाहर जाने का हुक्म दिया और दरवाजा बंद करके फूट-फूटकर रोई। घंटों बीत गए, दिन छिपने लगा। सलीमा ने कहा- हाय! बादशाहों की बेगम होना भी क्या बदनसीबी है। इंतजारी करते-करते आंखें फूट जाएं, मिन्नतें करते-करते जबान घिस जाए, अदब करते-करते जिस्म टुकड़े-टुकड़े हो जाए फिर भी इतनी सी बात पर कि मैं जरा सो गई, उनके आने पर जग न सकी, इतनी सजा! इतनी बेइज्जती! तब मैं बेगम क्या हुई? जीनत और बांदियां सुनेंगी तो क्या कहेंगी? इस बेइज्जती के बाद मुंह दिखाने लायक कहां रही? अब तो मरना ही ठीक है। अफसोस- मैं किसी गरीब किसान की औरत क्यों न हुई!
धीरे-धीरे स्त्रीत्व का तेज उसकी आत्मा में उदय हुआ। गर्व और दृढ प्रतिज्ञा के चिन्ह उसके नेत्रों में छा गए। वह सांपिन की तरह चपेट खाकर उठ खड़ी हुई। उसने एक और खत लिखा-
'दुनिया के मालिक! आपकी बीवी और कनीज होने की वजह से मैं आपके हुक्म को मानकर मरती हूं। इतनी बेइज्जती पाकर एक मलिका का मरना ही मुनासिब भी है। मगर इतने बड़े बादशाह को औरतों को इस कदर नाचीज तो न समझना चाहिए कि एक अदना-सी बेवकूफी की इतनी कड़ी सजा दी जाए। मेरा कुसूर सिर्फ इतना ही था कि मैं बेखबर सो गई थी। खैर, सिर्फ एक बार हुजूर को देखने की ख्वाहिश लेकर मरती हूं। मैं उस पाक परवरदिगार के पास जाकर अर्ज करूंगी कि वह मेरे शौहर को सलामत रखे। -सलीमा'
खत को इत्र से सुवासित करके ताजे फूलों के एक गुलदस्ते में इस तरह रख दिया कि जिससे किसी कि उस पर फौरन ही नजर पड़ जाए। इसके बाद उसने जवाहरात की पेटी से एक बहुमूल्य अंगूठी निकाली और कुछ देर तक आंखें गड़ा-गड़ाकर उसे देखती रही। फिर उसे चाट गई।
बादशाह शाम की हवाखोरी को नजरबाग में टहल रहे थे। दो-तीन खोजे घबराए हुए आए और चि_ी पेश करके अर्ज की- 'हुजूर गजब हो गया! सलीमा बीबी ने जहर खा लिया है और वह मर रही हैं!'
क्षण-भर में बादशाह ने खत पढ़ लिया। झपटे हुए सलीमा के महल पहुंचे। प्यारी दुलहिन सलीमा जमीन पर पड़ी है। आंखें ललाट पर चढ़ गई है। रंग कोयले के समान हो गया है। बादशाह से न रहा गया। उन्होंने घबराकर हा- हकीम, हकीम को बुलाओ! कई आदमी दौड़े।
बादशाह का शब्द सुनकर सलीमा ने उसकी तरफ देखा और धीमे स्वर में कहा- 'जहे-किस्मत!'
बादशाह ने नजदीक बैठकर कहा- 'सलीमा! बादशाह की बेगम होकर क्या तुम्हें यही लाजिम था?'
सलीमा ने कष्ट से कहा- 'हुजूर! मेरा कुसूर बहुत मामूली था।'
बादशाह ने कड़े स्वर में कहा- 'बदनसीब! शाही जनानखाने में मर्द को भेष बदलकर रखना मामूली कुसूर समझती है? कानों पर यकीन कभी न करता, मगर आंखों-देखी को भी झूठ मान लूं?'
तडफ़कर सलीमा ने कहा- 'क्या?'
बादशाह डरकर पीछे हट गए। उन्होंने कहा- 'सच कहो, इस वक्त तुम खुदा की राह पर हो, यह जवान कौन था?'
सलीमा ने अचकचाकर पूछा- 'कौन जवान?'
बादशाह ने गुस्से से कहा- 'जिसे तुमने साकी बनाकर पास रखा था।'
सलीमा ने घबराकर कहा- 'हैं! क्या वह मर्द है?'
बादशाह- 'तो क्या तुम सचमुच यह बात नहीं जानतीं?'
सलीमा के मुंह से निकला- 'या खुदा!'
फिर उसके नेत्रों से आंसू बहने लगे। वह सब मामला समझ गई। कुछ देर बाद बोली- 'खाविन्द! तब तो कुछ शिकायत ही नहीं, इस कुसूर को तो यही सजा मुनासिब थी। मेरी बदगुमानी माफ फर्माई जाए। मैं अल्लाह के नाम पर पड़ी कहती हूं, मुझे इस बात का कुछ भी पता नहीं है।'
बादशाह का गला भर आया। उन्होंने कहा- 'तो प्यारी सलीमा! तुम बेकुसूर ही चलीं? - बादशाह रोने लगे।'
सलीमा ने उनका हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रखकर कहा-'मालिक मेरे! जिसकी उम्मीद न थी, मरते वक्त वह मजा मिल गया। कहा-सुना माफ हो और एक अर्ज दासी की मंजूर हो।'
बादशाह ने कहा- 'जल्दी कहो सलीमा!'
सलीमा ने साहस से कहा- 'उस जवान को माफ कर देना।'
इसके बाद सलीमा की आंखों से आंसू बह चले, और थोड़ी ही देर में वह ठंडी हो गई।!
बादशाह ने घुटनों के बल बैठकर उसका ललाट चूमा और फिर बालक की तरह रोने लगे।
गजब के अंधेरे और सर्दी में युवक भूखा-प्यासा पड़ा था। एकाएक घोर चीत्कार करके किवाड़ खुले। प्रकाश के साथ ही एक गंभीर शब्द तहखाने में भर गया- 'बदनसीब नौजवान! क्या होश-हवास में है?'
युवक ने तीव्र स्वर में पूछा- 'कौन?'
जवाब मिला- 'बादशाह।'
युवक ने कुछ भी अदब किए बिना कहा- 'यह जगह बादशाहों के लायक नहीं है। क्यों तशरीफ लाए हैं?'
'तुम्हारी कैफियत नहीं सुनी थी, उसे सुनने आया हूं।'
कुछ देर चुप रहकर युवक ने कहा- 'सिर्फ सलीमा को झूठी बदनामी से बचाने के लिए कैफियत देता हूं। सुनिए, सलीमा जब बच्ची थी, मैं उसके बाप का नौकर था। तभी से मैं उसे प्यार करता था। सलीमा भी प्यार करती थी, पर वह बचपन का प्यार था। उम्र होने पर सलीमा पर्दे में रहने लगी और फिर वह शहंशाह की बेगम हुई। मगर मैं उसे भूल न सका। पांच साल तक पागल की तरह भटकता रहा, अंत में भेष बदलकर बांदी की नौकरी कर ली। सिर्फ उसे देखते रहने और खिदमत करके दिन गुजारने का इरादा था। उस दिन उज्ज्वल चांदनी, सुगंधित पुष्पराशि, शराब की उत्तेजना और एकांत ने मुझे बेबस कर दिया। उसके बाद मैंने आंचल से उसके मुख का पसीना पोंछा और मुंह चूम लिया। मैं इतना ही खतावार हूं। सलीमा इसकी बावत कुछ नहीं जानती।'
बादशाह कुछ देर चुपचाप खड़े रहे। इसके बाद वे बिना दरवाजा बंद किए ही धीरे-धीरे चले गए।
सलीमा की मृत्यु को दस दिन बीत गए। बादशाह सलीमा के कमरे में ही दिन-रात रहते है। सामने नदी के उस पार पेड़ों के झुरमुट में सलीमा की सफेद कब्र बनी है। जिस खिड़की के पास सलीमा बैठी उस दिन-रात को बादशाह की प्रतीक्षा कर रही थी, उसी खिड़की में उसी चौकी पर बैठे हुए बादशाह उसी तरह सलीमा की कब्र दिन-रात देखा करते हैं। किसी को पास आने का हुक्म नहीं। जब आधी रात हो जाती है, तो उस गंभीर रात्रि के सन्नाटे में एक मर्मभेदिनी गीतध्वनि उठ खड़ी होती है। बादशाह साफ-साफ सुनते हैं, कोई करुण-कोमल स्वर में गा रहा है.. 'दुखवा मैं कासे कहूं मोरी सजनी...'

क्या पुन: जीवित हो सकेगी एलीफैन्ट बर्ड

आपने हाथी चिडिय़ा (एलीफैन्ट बर्ड) का नाम सुना है? नहीं? तो यह जान लीजिए कि हाथी चिडिय़ा वास्तव में तीन सौ वर्ष पहले तक एशिया और अफ्रीका के बीच समुद्र से घिरे द्वीप मैडागास्कर की धरती पर विचरती थी। दस फीट ऊंची विशालकाय यह हाथी चिडिय़ा उडऩे में असमर्थ थी। वे शाकाहारी थीं और जंगल में प्राप्त फल, फूल, पत्तियां खाया करती थी। इस विलक्षण पक्षी के लुप्त होने का प्रमुख कारण था समुद्री नाविकों द्वारा उनके मांस के लिए बेहिसाब शिकार। लेकिन खोजी वैज्ञानिकों ने गुफाओं और चट्टानों में दबे फंसे हाथी चिडिय़ा के 13 इंच लंबे और 3 फीट गोलाई वाले अंडो के खोल ढूंढ़ निकाले हैं।
आस्ट्रेलिया के मरडाक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक का दावा है कि उन्होंने हाथी चिडिय़ा के अंडे के खोल से डीएनए निकालने की विधि खोज ली है अत: उनका विश्वास है कि हाथी चिडिय़ा का पुर्नजन्म संभव है। तो क्या जुरासिक पार्क फिल्म की रोमांचित करने वाली कल्पना को साकार करने की ओर यह पहला
कदम है?

आपके पत्र मेल बॉक्स

स्त्रियों की दशा
मार्च अंक के अनकही में आपने स्त्रियों की दशा पर वल्र्ड इकानामिक फोरम के सर्वे के आधार पर प्रकाश डाला है। यह अध्ययन वाकई आंखें खोल देने वाला है। कहीं न कहीं लगता है अन्य सभी वर्गों के उत्थान के समान ही पनप चुकी असमानता की तरह ही महिलाओं में आंतरिक असमानता काफी बढ़ चुकी है। इस ओर यदि ध्यान आकर्षित किया जाए तो अधिक कारगर होगा।
- अंजीव पांडेय, समाचार संपादक, मेट्रो 7, नागपुर
Email-panjeev@gmail.com
निजी स्वार्थ के लिए वैराग्य
राठौर जी, आपने एकदम सही लिखा आजकल गृहस्थों से ज्यादा संयासी धनी हैं और उन्हें ही धन की जरूरत है। आज तो उन्होंने अपने निजी स्वार्थ के लिए वैराग्य की भी नई-नई परिभाषाएं शुरु कर दी हंै। इस बार की हरद्वार यात्रा से मेरा मन भी अत्यंत ही विचलित हो गया सन्यासियों की भोग लिप्सा देखकर।
- वेदना
बहुआयामी पत्रिका
उम्दा, बहुआयामी तथा सृजनात्मक क्षमता से पूर्ण मासिक पत्रिका उदंती हेतु आपको कोटिश: बधाई।
- सुरेश यादव, नई दिल्ली
sureshyadav55@gmail.com
रचनात्मक कला
एक स्वस्थ एवं संपूर्ण उदंती का अंक मिला। पत्रिका की सामग्री रोचक, ज्ञानवर्धक और पठनीय है। देवमणी पांडेय की रचनात्मक कला उत्तम है। इस अंक में प्रस्तुत लघुकथा और कविता का भरपूर आनंद लिया।
- देवी नागरानी, यूके
dnangrani@gmail.com
उदंती के बेबाक और विचारोत्तेजक लेख
उदंती के दिसंबर अंक में राहुल सिंह के लेख के जरिए हमें पता चलता है कि हमारे जीवन में तालाब कितना महत्व रखते हैं, आज मानव को यह जान लेना बेहद जरुरी हो गया है। हमारी पुरानी संस्कृति हमें प्रकृति के संवर्धन की शिक्षा देती है लेकिन हम इस धरती की लूट- खसोट में लगे हुए हैं... प्राकृतिक आपदाएं किसी न किसी रुप में हमें सचेत करती हैं, किन्तु इन्सान के लालच ने उसे इतना गिरा दिया कि उसकी सोचने की शक्ति क्षीण हो चुकी है।
जनवरी- फरवरी संयुक्तांक में अनकही एक विचारणीय लेख है। आज भी रक्षक के भेष में कई कथित भक्षक समाज में मौजूद हैं। जरुरत है तो इनके खिला$फ आवाज उठाने की और अराधना की तरह दिलेरी दिखाने की। पिछले दिनों ही अराधाना गुप्ता मुम्बई आईं थीं, उन्होंने जब पूरे घटना क्रम को सुनाया तो दिल दहल उठा। सुन कर हम सभी स्तब्ध रह गये। अराधना से मिलकर हमें बहुत अच्छा लगा साथ ही लडऩे का बल भी मिला। प्रताप सिंह राठौर के लेख में सही कहा गया है कि बाजारीकरण की हवा आज के तथाकथित बाबाओं को लग गयी है... इन्होंने असली संतों तथा आस्था पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। आपने सच ही कहा है कि आज सच्चे सन्तों को पहचानना मुश्किल हो गई है। पिछले दिनों इच्छाधारी बाबा के कारनामे सुनकर तो होश ही उड़ गए। सबसे बड़ी बात तो यह कि इन्हें राजनेताओं का आश्रय प्राप्त है, और ये बहुत जल्दी छूट भी जायेंगे। कवि कुलवंत की रचनाएं हमेशा नयापन लिए होती हैं। उदंती के मार्च अंक में होली पर उनकी कविता उतनी ही सुन्दर है... बधाई कुलवन्त जी!
उदंती के पिछले अंकों में बेबाक और विचारोत्तेजक लेखों के लिए उदंती परिवार को बधाई!
- सुमीता केशवा, मुम्बई , sumitakeshwa@yahoo.com