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Nov 2, 2025

कविताः सच सच बताना युयुत्सु

 -  निर्देश निधि

मैं राधा

अपने अलौकिक प्रेम को

तथाकथित धर्मयुद्धों के

लौकिक दावानलों में झुलसते

परित्यक्त होते देख,

खड़ी ठगी-सी आज

युद्ध के अंतिम दिन

कुरुक्षेत्र की धरा पर

तुम एकमात्र शेष कौरव से

पूछती हूँ युयुत्सु

चले थे थाम कर तथाकथित धर्मध्वजा

मार डाले अपने कितने ही सहोदर

धर्म के नाम पर तुमने

महल के अतीत से आतीं 

उनकी जीवन- किलकारियाँ

और नृशंस कुरुक्षेत्र के 

वर्तमान से गूँजती चीत्कारें उनकी

निर्जन महल के गलियारों में होते गुत्थमगुत्था

तुम्हारे युद्धरत, पर भयभीत कान

सुनते तो ज़रूर होंगे युयुत्सु

मैं राधा,

अपने परित्यक्त प्रेम को सीने में दबाए

आज युद्ध के अंतिम दिन

तुमसे पूछती हूँ-

कितना पछताए तुम युयुत्सु?

क्या उतना?

जितना मैं पछताई उसी छलिये से प्रेम कर

जिसने तुम्हें भी छला,

क्या करोगे अब विजेता बनकर

विनाश के गड्ढे में पड़े तुम

जीर्ण-शीर्ण हुई, कांतिहीन धर्मध्वज थामकर?

तुमसे कितना रोष होगा आज

गांधारी धृतराष्ट्र को,

जान सकते हो युयुत्सु?

क्या आज सराह पाए होंगे वे

तुम्हारे इस विजेता रूप को

खड़े होकर निर्वंशता के कूप की ढाँग पर

उनकी अंधी देह, अंधी सोच को

जिस धर्म के लिए त्यागा था तुमने

क्या वह किंचित् भी उपस्थित था

सारथी कृष्ण के पीछे खड़ी सेना में

देखा तो ज़रूर होगा तुमने भी

जिसके लिए अपनों ही से लड़े थे तुम

उस धर्म को सुबकते हुए कृष्ण की काँख में

फिर सामने देखकर ख़ुद रणछोड़ को

क्यों छोड़ नहीं सके थे तुम रण

सहोदर दुर्योधन के लिए?

या मुग्ध हो गए थे तुम भी

कृष्ण के लच्छेदार शब्दों पर

ठीक अर्जुन की तरह?

या बहक गए थे मेरी ही तरह

और सुन नहीं सके थे

कृष्ण की काँख में पड़े 

विवश धर्म की सुबकियाँ?

आज अभिमानी भीम द्वारा सताए जाने पर

कितना पछताए तुम

सच सच बताना युयुत्सु

इस ओर या उस छोर अंत तो मृत्यु ही होती न

सोचा तो होगा तुमने भी आज

मैं राधा, अपने प्रेम को

इन्हीं तथाकथित धर्म युद्धों की भेंट चढ़ते देख

ठगी-सी खड़ी, तुमसे पूछती हूँ-

क्या तुम भी ठगे नहीं गए मेरी तरह?

सच सच बताना युयुत्सु।

(युयुत्सु एक मात्र कौरव थे जो धर्म का साथ देकर पांडवों की ओर से लड़े और वही एकमात्र कौरव जीवित बचे। अपने सम्पूर्ण कुल को खो देने की पीड़ा सही। राधा ने भी धर्मयुद्धों के नाम पर अपने प्रेमी कृष्ण से अलग होने की पीड़ा सही।)


कुण्डलिया छंदः कहाँ अब आँगन तुलसी

 -  परमजीत कौर 'रीत'

1.

सुख के पल उत्सव लगें, दुख में बँधती आस ।

अपनों के जब साथ में, बीतें बारह मास ।।

बीतें बारह मास, रहे सबका मन खिलता ।

नहीं सताती धूप, शीत का जोर न चलता ।

कलरव करती साँझ, निशा की गोदी से कल ।

जन्मे उजली भोर, सुहाने दे सुख के पल ।।

2.

आशाओं के ओज से, डरे निराशा यक्ष ।

इक नन्ही- सी किरण भी,उजला करती कक्ष ।।

उजला करती कक्ष, तिमिर में राह दिखाती ।

बढ़े किरण की ओर, रोशनी बढ़ती जाती ।

रखते भरकर नीड़, नहीं अभिलाषाओं के ।

पंछी के दिनमान, सहारे आशाओं के ।।

3.

तुलसी आँगन बीच तब, शीशम भी थे द्वार ।

वट-वृक्षों की छाँव में, पलते थे संस्कार ।।

पलते थे संस्कार, समय था वह कुछ ऐसा ।

मन थे बहुत विशाल, भले था थोड़ा पैसा ।

साँझे थे दुख-दर्द, नजर थी रहती हुलसी ।

नहीं रहा वह काल, कहाँ अब आँगन, तुलसी ।।

4.

दफ्तर घर-परिवार सँग, सपनों का संसार ।

धार रही हैं नारियाँ, चतुर्भुजी अवतार ।।

चतुर्भुजी अवतार, घूमती चकरी ऐसे ।

यहाँ-वहाँ हर छोर, अछूता रहे न जैसे ।

कहती ‘रीत’ यथार्थ,कहीं नौकर या अफ़सर ।

खूब निभाये ‘रोल’, मिले जो भी, घर-दफ्तर ।।

5.

घर-बाहर की दौड़ में, छूटे एक न काम ।

ढूँढ रही है मानवी, जीवन के आयाम ।।

जीवन के आयाम, कभी तो पा जायेगी ।

उसका क्या अस्तित्व, कभी दिखला पायेगी ।

कहती ‘रीत’ यथार्थ, खुशी के खोज जवाहर ।

चलती रहती दौड़, मानवी की घर-बाहर ।।

6.

कितना भी कुचलो उसे, फैलेगी वो खूब ।

अपने तप-गुण-कर्म से, वन्दनीय है दूब ।।

वन्दनीय है दूब, ’ग्रहण’ में शुचिता लाती ।

पूजन वाली थाल, पूर्णता इससे पाती ।

दूर्वादल से लाभ, मधुर-फल पाने जितना ।

धैर्य, नम्रता ‘रीत’, सिखाती दूर्वा कितना ।।



किताबेंः गद्य की विभिन्न विधाएँ: एक अनिवार्य पुस्तक

 - प्रो. स्मृति शुक्ला

पुस्तकः गद्य की विभिन्न विधाएँ- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, मूल्य :260, पृष्ठ :120 संस्करण : 2022, प्रकाशक : अयन प्रकाशन, 19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

हिन्दी साहित्य में कवि, उपन्यासकार, लघुकथाकार, बाल साहित्यकार, व्यंग्यकार, आलोचक और हिन्दी चेतना जैसी अन्तरराष्ट्रीय साहित्यिक पत्रिका सहित कई पुस्तकों के संपादक के रूप में ख्यात रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ प्रतिष्ठित रचनाकार हैं।

अयन प्रकाशन, नई दिल्ली से उनकी सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘गद्य की विभिन्न विधाएँ’ को केन्द्र रखकर लिखी गई एक स्तरीय पुस्तक इस अर्थ में है कि यह रचनात्मक लेखन की विभिन्न विधाओं के स्वरूप को बखूबी प्रस्तुत करती है। पुस्तक में हर विधा के सभी आयामों पर सम्रगता से विचार किया गया है। किसी भी विधा के रचनात्मक लेखन की उत्कृष्टता उसकी भाषा के निर्धारण में अहं भूमिका होती है। एक साहित्यकार के रूप में रामेश्वर काम्बोज जी यह बात बहुत अच्छी तरह से जानते हैं; इसलिए इस पुस्तक का प्रारंभ ही उन्होंने रचनात्मक लेखन और भाषिक प्रयोग से किया है। वे लिखते हैं - ‘‘जब हम अच्छी रचना (सभी विधाओं) की बात करते हैं, तो अच्छी भाषा की बात अनायास सामने आ जाती है। .... भाषा जड़ नहीं होती, क्योंकि वह प्रवहमान समाज की जीवनी शक्ति है। एक बात और रेखांकित करने योग्य है कि शब्दकोशीय भाषा की एक सीमा है, वाक्-भाषा इससे कहीं इससे कहीं और आगे है, कहीं अधिक बहुवर्णी और नवीनतम भावबोध की अनुचरी है। यह वही गोमुख है, जिसका जल शब्दकोश में आकर मिलता है और उसको सागर बनाता है।’’ आगे उन्होंने प्रत्येक रचनाकार को अपनी भाषा और शैली निर्मित करने का मशविरा दिया है। सामाजिक परिवर्तनों का प्रभाव भाषा पर भी होता है। साहित्यकारों को सकारात्मक चीजों को ग्रहण करना पड़ेगा। लेकिन भाषा का भ्रष्ट प्रयोग नहीं करना चाहिए। उन्होंने लिखा है - ‘‘हड़बड़ी में लिखना, छपने के लिये तुरंत प्रेषित कर देना, किसी भी लेखक की बड़ी दुर्बलता है। जो लिखा जाए, उसे शांत मन से कई-कई बार पढ़ा जाए। वर्तनी की अशुद्धियाँ लेखक को पाठकों में सम्मान नहीं दिला सकतीं।’’ यह बात सच है हिन्दी के जितने महान साहित्यकार हुए हैं उन सभी ने अपनी भाषा पर बहुत काम किया है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी के बड़े-बड़े लेखकों की भाषा का परिष्कार किया है। मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, पंत, निराला से लेकर अज्ञेय तक सभी ने अपनी काव्यभाषा निर्मित करने हेतु अथक परिश्रम किया है, तभी वे श्रेष्ठ साहित्यकारों में परिगणित हुए हैं।

गद्य की रचनात्मक विधाओं में आत्मकथा, जीवनी, संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, यात्रा-संस्मरण, पुस्तक समीक्षा, डायरी-लेखन, साक्षात्कार, परिचर्चा, फीचर तथा प्रतिवेदन, गद्यकाव्य, लघुकथा और व्यंग्य जैसी विधाओं के स्वरूप के साथ विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं को शामिल करते हुए रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ने इन विधाओं पर सम्यक् विचार करते हुए स्वयं के मत भी प्रस्तुत किए हैं। इन विधाओं की विकास यात्रा पर भी गंभीर चर्चा की है। यहाँ काम्बोज जी का प्रयास यह रहा है कि वे हर विधा में प्रकाशित नई से नई पुस्तकों को इसमें शामिल करें और इसमें वे पूर्णतः सफल भी हुए हैं।

इस पुस्तक में ‘आत्मकथा’ विधा पर बात करते हुए काम्बोज जी ने लिखा है - ‘‘आत्मकथा कोई स्वप्न सृष्टि न होकर जीवन के मधुर-तिक्त अनुभवों का स्मरण और उनकी प्रस्तुति है। आत्मकथा जीवन की वह फिल्म है, जिसमें कल्पना की गुंजाइश नहीं, यथार्थ का खुरदरापन हर कदम पर है। आत्मकथा लेखन अतीत की समस्याओं के लिए भावी समाधान के बारे में कल्पना ज़रूर कर सकता है।’’ हिन्दी की चर्चित आत्मकथाओं के विषय में भी लेखक ने महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ पुस्तक में दी है।

पुस्तक की सबसे खास बात यह है कि रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ का गहन अध्ययन उनके लेखन में झलकता है। सभी रचनात्मक विधाओं की सैकड़ों पुस्तकें उन्होंने पढ़ी हैं; इस कारण उन्होंने ‘गद्य की विभिन्न विधाएँ’ पुस्तक में नए से नए रचनाकार की पुस्तकों का जिक्र भी ख्यात साहित्याकारों की पुस्तकों के साथ किया है। विभिन्न विधाओं की ऐसी श्रेष्ठ पुस्तकें प्रायः हिन्दी साहित्य में अलक्षित रह जाती है, जिनके लेखक स्वयं उनका प्रचार-प्रसार नहीं करते या किसी लेखकीय गुट के सदस्य नहीं होते, पर रामेश्वर काम्बोज जी की गुण ग्राहकता तथा जौहरी की- सी पारखी दृष्टि इन पुस्तकों पर गई है और आपने विभिन्न रचनात्मक विधाओं की ऐसी पुस्तकों को उल्लेखित किया है।

पुस्तक चार अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में रचनात्मक लेखन के सोपान के अन्तर्गत ‘भाषा एक संस्कार है’, ‘साहित्य और काव्य-भाषा’ तथा ‘कहानी की कहानी’ के अन्तर्गत तीन लेख हैं। अध्याय दो गद्य की विभिन्न रचनात्मक विधाओं का संक्षिप्त परिचय है तथा अध्याय तीन में विभिन्न रचनात्मक विधाओं का विस्तार से परिचय दिया गया है। अध्याय चार में रामेश्वर काम्बोज जी ने हिन्दी के सुधि पाठकों, जिज्ञासुओं और विद्यार्थियों के लिए कुछ विधाओं की परिचायात्मक अध्ययन सामग्री शामिल की है, जो विभिन्न विधाओं की स्तरीय रचनाओं से पाठक का परिचय कराती है। इसमें डॉ. सुषमा गुप्ता की डायरी ‘दुनिया को प्यार से ही बचाया जा सकता है’, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की बहुपठित, बहुचर्चित और पठनीयता के रिकॉर्ड तोड़ने वाली पर्यावरण संरक्षण को केन्द्र में रखकर लिखी गई पुस्तक ‘हरियाली और पानी’ पर समीक्षा है। यह समीक्षा हिन्दी की चर्चित साहित्यकार विभिन्न विधाओं की विदुषी लेखिका डॉ.कविता भट्ट द्वारा की गई है। रश्मि शर्मा का यात्रा-वृत्तांत ‘गरुड़ पीढ़ी : अपनेपन की खुशबू’ भी पुस्तक में शामिल है।

प्रियंका गुप्ता का संस्मरण ‘उन आँखों का भूलना आसान है क्या’ और निर्देश निधि का संस्मरण ‘टहनी सचमुच माँ को बुला लाई’ ऐसे संस्मरण हैं, जिनमें अनुभूति का ताप और स्मृतियों का प्रत्यक्षीकरण पूरी जीवंतता से हुआ है। ‘अनुवाद भी सृजन होता है’ इस विषय पर डॉ. कुँवर दिनेश सिंह एवं रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की सार्थक बातचीत परिचर्चा के उदाहरण के रूप में रखी गयी है। कुँवर दिनेश ने हाइकु का हिन्दी से अंग्रेजी अनुवाद और इसमें आने वाली कठिनाइयों का जिक्र करते हुए कहा है - ‘‘प्रत्येक विधा में अनुवाद का मेरा अपना एक अलग अनुभव रहा है। हाइकु को हिन्दी से अंग्रेजी में इसके प्रतीप क्रम में अनुवाद करना बहुत ही जटिल और श्रमसाध्य कार्य है। इसका सबसे बड़ा कारण है- हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं में हाइकु के छंद, स्वरूप एवं संरचना में मूलभूत अंतर।’’ उन्होंने हाइकु अनुवाद के कुछ सुंदर उदाहरणों से अपनी बात स्पष्ट की है। गोपालबाबू शर्मा के हाइकु - ‘जीता या हारा/अकेला पड़ गया/ भोर का तारा’ का अनुवाद- victory or defeat/ solitary in the sky/ The bright morning star जैसे कई उदाहरण इस परिचर्चा में दिये हैं। डॉ. कुँवर दिनेश ने अनुवाद को पुनःसृजन माना है। निःसंदेह रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की यह पुस्तक हिन्दी गद्य की रचनात्मक विधाओं की समग्रता में पहचान कराने वाली अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। पाठक पुस्तक को पढ़कर विधा और शैली के अन्तर को बखूबी समझ सकता है।

लेखक का यह मानना उचित है कि ज्ञान-विज्ञान का, भाषा का और विचार का निरंतर विकास हो रहा है; इसलिए विधाओं का स्वरूप भी स्थिर नहीं है। यह भी एक तथ्य है कि एक ही विधा में दो-तीन विधाओं की आवाजाही हो सकती है या वे एक-दूसरे में घुलमिल सकती हैं। प्रायः संस्मरण और रेखाचित्र विधा में यह बात देखी जा सकती है।

गद्य की विभिन्न विधाएँ पुस्तक प्रत्येक विद्यालय और महाविद्यालय के पुस्तकालयों में होनी चाहिए, ताकि विद्यार्थी हिन्दी गद्य की विभिन्न विधाओं की रचनात्मकता से परिचित हो सकें और लेखन में भाषा के महत्त्व को जान सकें। भाषा के प्रयोग में प्रायः जो अशुद्धियाँ और असावधानियाँ हम करते हैं, उन पर भी रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी ने हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। ‘हिमांशु’ जी लम्बे समय तक केन्द्रीय विद्यालयों में प्रवक्ता और प्राचार्य पद पर कार्य करते हुए हिन्दी भाषा और साहित्य के अध्ययन को सदैव महत्त्व देते रहे हैं तथा इस दिशा में विद्यार्थियों की अभिरुचि में अभिवृद्धि करने के सार्थक प्रयास करते रहे हैं; इसलिए पुस्तक उनके व्यावहारिक जीवन के अनुभवों से संपृक्त होकर और मूल्यवान् हो गई है।

व्यंग्यःअफ़सरनामा

 - डॉ मुकेश असीमित 

अफ़सर नाम का प्राणी वह है, जो दफ्तरों में पाया जाता है। वैसे तो सरकारी, अर्ध-सरकारी, और गैर-सरकारी सभी दफ्तरों में यह पाया जाता है। कुछ अर्जित, कुछ जबरन, कुछ जुगाड़ू, और कुछ कबाड़ी - हर प्रकार के अफ़सर होते हैं। अफ़सर काम नहीं करते, काम की चिंता करते हैं। गधे की तरह जिम्मेदारियों का बोझ ढोते हैं- जिम्मेदारी काम करवाने की और साथ में काम की चिंता का बोझ उठाने की।

इनका कोई समय नहीं होता; ये समय और स्थान से परे, ब्रह्मस्वरूप होते हैं। ये ऑफिस के कण-कण और जड़-चेतन में विराजमान रहते हैं। इसलिए कुर्सी पर दिख सकते हैं, नहीं भी दिख सकते हैं, या दिखते हुए भी नहीं दिख सकते हैं और नहीं दिखते हुए भी दिख सकते हैं।

अफ़सर को कभी भी नौकर मत समझिए। इनके चाल-ढाल और रंग-ढंग सब अलग और जुदा-जुदा होते हैं। ये तो सारी जनता को अपना नौकर समझते हैं। नौकर के साथ चाकर जुड़ा होता है, लेकिन अफ़सर के साथ क्लब, विदेशी दौरे, महँगी शराब, और अनगिनत मीटिंग्स जुड़ी होती हैं।

अफ़सर का मुख्य भोजन रिश्वत है। ये सर्वाहारी होते हैं। वैसे तो रिश्वत में विविधता की परवाह नहीं करते, जो भी मिले खा सकते हैं। कुर्सी, टेबल, फाइल, पेन, पेंसिल, कूड़ा-कचरा, यहाँ तक कि सड़कें और पुल तक निगल सकते हैं। इनका पेट बहुत बड़ा होता है। इनके जूते भी बड़े आकार के होते हैं, जो हर समय इनके अधीनस्थ कर्मचारियों पर चलते रहते हैं। ये जूते कभी थकते नहीं, कभी रुकते नहीं।

ये सोचते बहुत हैं- दफ्तर के बारे में, काम के बारे में। सोचते-सोचते इन्हें अक्सर झपकी लेनी पड़ती है। बिना झपकी के, इनके ख्याल बेलगाम हो जाते हैं। पलकों में ख्यालों को बंद कर लेते हैं और फिर ख्यालों की 'वोमिट' करने के लिए मीटिंग बुलाते हैं। दफ्तरों में, फाइलों के ढेर के पीछे, आपको ये अक्सर झपकी लेते हुए मिलेंगे।

इनका मुख्य काम मीटिंग करना है। हर समस्या का हल मीटिंग ही होती है। किसी भी काम को टालने का, और कोई उपाय न हो तो मीटिंग; न करने का कोई और बहाना न हो तो मीटिंग। ये कोई भी काम अपने कंधे पर नहीं लेते और क्रेडिट से कोसों दूर रहते हैं। किसी भी निर्णय से पहले ये मीटिंग जरूर करते हैं, ताकि किसी भी असफलता का ठीकरा दूसरों के माथे पर फोड़ा जा सके।

अगर मीटिंग से समय मिले,  तो ये दौरे पर निकल जाते हैं। दौरे कई प्रकार के होते हैं, जो ज्यादातर मौसम के अनुसार तय किए जाते हैं। गर्मी हो, तो किसी ठंडे स्थान पर और सर्दी हो, तो किसी गर्म स्थान पर।

इनको ऑटोग्राफ देने का कोई शौक नहीं होता; फाइलों में इनके ऑटोग्राफ माँगे जाते हैं। ये शान से कहते हैं, जैसे दीवार फिल्म में अमिताभ बच्चन ने कहा था—"जाओ, पहले उसके ऑटोग्राफ लाओ, फिर उसके, फिर उसके... तब मेरे पास आना तुम... आखिर में मेरे ऑटोग्राफ!"

बड़े अफ़सर बड़े दौरे पर होते हैं, कभी-कभी विदेश तक चले जाते हैं। सेमिनार, जिमखाना, डाक बंगला और रेस्ट हाउस में इन्हें बहुतायत से देखा जा सकता है। अफ़सर को सबसे ज़्यादा डर यूनियन वालों से लगता है। इन्हें मालूम है कि इनसे बड़ा अफ़सर इनका तबादला कराए न कराए, यूनियन का अध्यक्ष ज़रूर करवा सकता है। डर इस कदर है कि अगर यूनियन अध्यक्ष की सलामी का भी जवाब नहीं दिया, तो इन्हें डर है कि यूनियन हड़ताल पर जा सकती है।

हर अफ़सर के ऊपर एक अफ़सर होता है, जो उसे हड़काता है। यह इस हड़कन को अपने पास नहीं रखते, तुरंत निर्लिप्त भाव से नीचे वाले को ट्रांसफर कर देते हैं। नीचे वाला बाबू को, और बाबू उसे अपनी जेब में रखकर हाथों से मसल देता है, जैसे चींटी को मसल रहा हो।

हर अफ़सर के ऊपर एक जासूस होता है, और वो इसकी बीवी के सिवा कोई दूसरा नहीं होता। और हर अफ़सर के नीचे दो-चार जासूस होते हैं, जो दिन भर ऑफिस की सभी जायज़-नाजायज़ गतिविधियों की गंध इन्हें सुँघाते रहते हैं।

अफ़सर को घर जेल लगता है और दफ्तर एक पिकनिक स्पॉट। अफ़सर के दफ्तर में घड़ी भी अफ़सर के हिसाब से चलती है। सर्दियों में धूप में मूँगफली खाते हुए दिखेंगे, और गर्मियों में ए.सी. की ठंडी हवा खाते हुए। अफ़सर जहाँ होता है, वहीं दफ्तर लग जाता है, बिल्कुल शहंशाह की तरह। जब तनाव होता है, तो मीटिंग होती है। मूड फ्रेश हो, तो मीटिंग होती है। कुछ नहीं हो रहा हो, तब एक मीटिंग तो ज़रूर आयोजित करनी होती है, सिर्फ इसलिए कि पता करें कि आज कुछ क्यों नहीं हो रहा दफ्तर में।

बाबू से पूछते रहते हैं, "अच्छा, बताओ, आज मैं कैसा लग रहा हूँ?" बाबू कहते हैं, "साहब जी, इस बात पर तो एक मीटिंग आयोजित कर ली जाए। सबकी सर्वसम्मति से पता भी लग जाएगा कि आप कैसे लग रहे हैं। अब मैं अकेला कहूँगा, जनाब, तो छोटे मुँह बड़ी बात होगी।" बस, इसी बात पर एक मीटिंग आयोजित करनी पड़ती है।

अफ़सर की नई टाई की प्रशंसा के लिए भी एक मीटिंग आयोजित की जाती है। नीचे ओहदे वाले दफ्तर में किसी कर्मचारी की खुशी बाँटने को पार्टी करते हैं, तो अफ़सर उस खुशी को काफूर करने के लिए मीटिंग करते हैं। अफ़सर होना मतलब कुर्सी और उस पर टँगा उनका कोट। कोट के अंदर अफ़सर का होना ज़रूरी नहीं है। जैसे भरत ने अयोध्या का राज्य चलाने के लिए राम जी की खड़ाऊँ ली थी, वैसे ही इनका कोट दफ्तर का राज्य चलाता है। इससे बढ़िया रामराज्य आपको देखने को नहीं मिलेगा।

ये कहीं भी जाएँ, अपना कोट कुर्सी पर टाँग देना नहीं भूलते। अगर बड़ा अफ़सर भी आ जाए, तो कोट देखकर कोई भी कह सकता है - "अफ़सर तो हैं; लेकिन किसी ऑफ़िशियल काम से इधर-उधर गए होंगे।" 

सम्पर्कः गर्ग हॉस्पिटल ,स्टेशन रोड गंगापुर सिटी राजस्थान 322201 mail ID drmukeshaseemit@gmail.com

कथाः फैसला

 - पूजा अग्निहोत्री

मैं नीरव, अड़तीस वर्षीय एक सुदर्शन और सौम्य स्वभाव का प्रौढ़ पुरुष, आज अपने लिए लड़की देखकर आया हूँ।

आठ साल पहले मेरी शादी आरती से हुई थी। दो साल बीते, कोई संतान नहीं हुई। डॉक्टरों की सलाह से इलाज शुरू हुआ, और आखिरकार, चार साल बाद हमारा बेटा ‘आरव’ इस दुनिया में आया। पर खुशियाँ ठहरी नहीं। आरती ने बेटे को जन्म देकर हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

मैंने एक महीने तक खुद बेटे की परवरिश की, पर घर चलाने के लिए नौकरी ज़रूरी थी और नौकरी के लिए घर से बाहर निकलना भी। खास रिश्तेदारों से मदद मांगी, पर कोई भी तैयार नहीं था। सलाहें खूब मिलीं- माँ ने कहा, "मैं कब तक रहूँगी, दूसरी शादी कर ले, मेरा भी सहारा हो जाएगा।"

बहन ने अपने झुँझलाहट- भरे स्वर में कहा, "दो-दो बच्चे पाल रही हूँ, भाभी के मायके क्यों नहीं छोड़ देते बच्चे को?"

समय बीता, माँ भी साथ छोड़ गई। पिछले साल से आरव क्रैच में पल रहा था और मैं बस समय के हाथों खुद को ढो रहा था।

तभी एक मित्र ने शादी डॉट कॉम पर मेरी प्रोफ़ाइल बना दी। कई प्रस्ताव आए। पर जैसे ही लड़कियों को पता चलता कि मैं विधुर हूँ और एक छोटे बच्चे का पिता भी, वे धीरे से किनारा कर लेतीं।

एक बार एक लड़की बोली- "आप अच्छे हैं; लेकिन मैं किसी और के बच्चे की माँ बनने का मानसिक बोझ नहीं उठा सकती।"

दूसरी ने खुलकर कहा—"मैं एक नए जीवन की शुरुआत करना चाहती हूँ, न कि पहले से बनी ज़िम्मेदारियों में उलझना।"

एक तीसरी लड़की ने व्यंग्य से पूछा- "आपको बीवी चाहिए या बेटे के लिए आया?"

इन अनुभवों ने मेरी हिम्मत को तोड़कर रख दिया। मैं खुद से सवाल करने लगा- क्या मेरे बेटे का होना ही मेरी सबसे बड़ी कमी है? 

तभी मृदुला का प्रस्ताव आया। वह भी विधवा थी, उम्र लगभग बत्तीस साल, रंग-रूप साधारण, पर बातचीत में गंभीर और संतुलित लगी। दो-तीन दिन बाद मैं बेटे को लेकर अचानक उसके घर पहुँच गया। वहाँ कोई नहीं था। आस-पड़ोस से पता किया, तो किसी ने मृदुला के बारे में कुछ संदेहजनक बातें बताईं कि उसके पहले पति की मौत आग में झुलसने से हुई थी और वह मायके लौट आई थी।

मैं भीतर तक हिल गया। लगा जैसे चलती राह में कोई बड़ा गड्ढा सामने आ गया हो। मन बना लिया कि रिश्ता नहीं जोड़ना है।

लेकिन तभी मृदुला और उसका परिवार आ गया। मृदुला ने आत्मीयता से मेरा स्वागत किया। खाने का सुंदर प्रबंध था, पर मेरा बेटा सिर्फ दूध-बिस्किट ही खाता था। मृदुला ने बिना किसी औपचारिकता के उसे अंदर ले जाकर दूध-बिस्किट दिए और उसके सिर पर हाथ फेरकर उसे शांत किया।

मैं वापसी की राह पर था, मन में एक ‘न’ के साथ। पर घर पहुँचकर रात को आरव ने पूछ लिया-"पापा, आप नई मम्मी को कब लाओगे?"

"अभी नहीं बेटा।"

"पापा, आज जिन आंटी से मिलने गए थे, उनसे शादी कर लो न।"

"क्यों?"

"उन्होंने मुझे बिना कुछ कहे दूध-बिस्किट दे दिए और सिर पर हाथ रखकर प्यार किया... उन्हें कैसे पता चला कि मुझे बहुत भूख लगी है?"

बस उस क्षण मुझे एहसास हुआ, जो संवेदना एक माँ की हो सकती है, वही किसी में फिर से जन्म ले सकती है। मुझे यह भी समझ आया कि शायद मृदुला ने भी एक यातना से गुज़रकर वही ममता अर्जित की है, जो मेरे बेटे को चाहिए।

अब मैं मृदुला से विवाह के लिए ‘हाँ’ कहने जा रहा हूँ।

"मेरा फैसला सही तो है न?" - मैं मन ही मन विचार करने लगा, लेकिन इस बार, जवाब खुद मेरे अंदर से आया-

"हाँ, ये सिर्फ मेरा नहीं, आरव का भी फैसला है।"

सम्पर्कः रूम नंबर- 1236, उर्जानगर 'C' ब्लॉक, बिजुरी, अनूपपुर (म. प्र.) 484440, मो. – 7987219458

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