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Mar 7, 2024

लघुकथाः अथ विकास कथा

 - सुकेश साहनी

बड़े साहब के चेम्बर में बड़े बाबू विकास सम्बंधी कार्यों के बिल पारित करवा रहे थे। ब्रीफिंग के लिए छोटे साहब भी वहाँ मौजूद थे।

"यह बिल किस काम का है?" बीस लाख के एक बिल पर हस्ताक्षर करने से पहले बड़े साहब ने जानना चाहा।

"सर, यह बिल उस पीरियड से सम्बंधित कार्यों का है, जब माननीय मंत्री जी क्षेत्रीय निरीक्षण पर आए थे।"

"ग्राम मेवली में कुछ ज़्यादा ही ख़र्च नहीं हो गया?" अगले बिल को देखते हुए बड़े साहब ने पूछा।

"नहीं सर! दीवाली पर प्रमुख सचिव महोदय से आपकी जो वार्ता हुई थी, उसी के अनुसार बिल तैयार कराए गए हैं।"

" ये छोटे-छोटे कई बिल......?

"ये सभी बिल चीफ साहब से सम्बंधित है, जब नैनीताल से लौटते हुए उन्होंने तीन दिन हमारे क्षेत्र में आकस्मिक निरीक्षण हेतु हाल्ट किया था।"

"हमारी बेटी की शादी भी करीब आ गई है।" बड़े साहब ने अर्थपूर्ण ढंग से छोटे साहब की ओर देखा।

"पूरी तैयारी है, सर!" छोटे साहब ने उत्साह से बताया और बड़े बाबू ने तत्काल एक बिल बड़े साहब के सामने हस्ताक्षर हेतु रख दिया।

"इन बिलों को शामिल करते हुए क्षेत्र के विकास के लिए प्राप्त कुल धनराशि के विरूद्ध खर्चे की क्या स्थिति है?"

"शत प्रतिशत!" छोटे साहब ने चहकते हुए बताया।

"एक्सीलेंट जॉब!" बड़े साहब ने शाबाशी दी।

                                  ■


व्यंग्यः अर्थों का दिवंगत होना

 

  - डॉ . गिरिराजशरण अग्रवाल

बाबू चंडीप्रसाद अपने ज़माने के बड़े ही अद्भुत आदमी थे। और सब, तो अपनी माई के लाल होते हैं, वह रज़ाई के लाल थे। 'रज़ाई' शब्द हमने जानबूझकर प्रयोग किया है, क्योंकि चंडीप्रसाद स्वयं भी प्रचलित शब्दों और मुहावरों के कट्टर विरोधी थे। फिर चंडीप्रसाद जैसे माई के लाल पर 'रज़ाई का लाल' मुहावरा ही फिट बैठता है, 'गुदड़ी का लाल' नहीं। इस बात को आप जानते ही हैं कि रज़ाई यदि अपने-आपमें मध्यम वर्ग की द्योतक है, तो गुदड़ी निम्न वर्ग की। साथ ही यह बात भी आप भली-भाँति जानते हैं कि गुदड़ीवाला निम्नवर्ग राजनीतिक खिला़ड़ियों की खेल-प्रतियोगिता में फुटबाल का काम करता है। एक पक्ष के खिलाडि़यों द्वारा किक मारी गई, तो इधर, दूसरे खिलाडि़यों के द्वारा ठोकर मारी गई, तो उधर। भारी गुत्थम-गुत्था के बाद अगर कोई पक्ष गोल दागने में सफल हो जाए, तो सफल पक्ष सत्ताधारी, असफल रह जाने वाली टीम विपक्ष की मारा-मारी। रह गई फुटबाल, तो अगली प्रतियोगिता तक उसका कोई काम, कोई महत्त्व नहीं। वह या, तो क्रीड़ा-सामग्री के भंडार में चुपचाप पड़ी रहेगी अथवा समय-समय पर फूँक भरने के काम आएगी। फुटबाल और जनता फूँक भरने के लिए और खेल-प्रतियोगिता के दौरान किक मारने के लिए ही होती है।

क्षमा कीजिए, हमने जनता बनाम फुटबाल की यह व्याख्या अपनी बुद्धि से नहीं की है। चंडीप्रसाद जी की बुद्धि सक्रिय रही है इस कार्य में। चंडीप्रसाद बेचारे अपने अंतिम दिनों में एक नया शब्दकोश संकलित कर रहे थे कि समय से पहले ही भगवान् को प्यारे हो गए। आपको यह बात भी याद दिलाना अच्छा रहेगा कि ऐसे ‘रज़ाई के लाल’, जिन्हें समाज दिखावे के लिए भी प्यार नहीं करता, समय से पहले ही भगवान् को प्यारे हो जाते हैं। यह बात अलग है कि प्यार , तो उन्हें भगवान् भी नहीं करता, पर वे वन-वे वाला इश्क़ करते हुए भगवान् की झोली या उसकी खोली में पहुँच ही जाते हैं।

अब आपको यह जानकर दुख या आश्चर्य नहीं होगा कि चंडीप्रसाद जी ने शब्दकोश लिखते-लिखते अचानक आत्महत्या कर ली और धींगामुस्ती करके ज़बरन भगवान को प्यारे हो गए।

   जब तक चंडीप्रसाद जीते रहे, ट्यूशन पढ़ाकर गुज़ारा करते रहे; लेकिन हमें अंत तक यह आश्चर्य रहा कि चंडीप्रसाद जी को ट्यूशन मिल कैसे जाते थे? यह आश्चर्य उस वक़्त भी है, जब चंडीप्रसाद धाँधली से भगवान् को प्यारे हो चुके हैं। यह भी अजीब बात है कि आदमी लोक से परलोक चला जाता है; लेकिन आश्चर्य छोड़ जाता है। बाबू चंडीप्रसाद भी विरासत में दो चीज़ें छोड़ गए। एक, तो आश्चर्यचकित कर देनेवाला अपना अधूरा शब्दकोश और दूसरा हाफ़ कोट यानी बंडी। चंडीप्रसाद जब तक जीवित रहे, बंडी जुड़वाँ बच्चों की तरह उनके साथ चिपकी रही। सच कहें,  तो चंडी और बंडी एक-दूसरे के पूरक थे, बंडी के बग़ैर चंडीप्रसाद चंडीप्रसाद नहीं लगते थे। ऐसा लगता था जैसे वह चंडीप्रसाद होकर भी चंडीप्रसाद होने का ढोंग कर रहे हों। यही कारण था कि लोग चंडीप्रसाद की जगह उन्हें बंडीप्रसाद कहने लगे थे; लेकिन सामने नहीं, पीछे-पीछे, क्योंकि हमारे यहाँ सच्ची बात सिर्फ़ पीठ-पीछे कही जाती है, सामने सच्ची बात कहने वाले या तो पागल होते हैं या मूर्ख अथवा दोनों का मिश्रण।

  चंडीप्रसाद जी पागल थे या मूर्ख या दोनों का मिश्रण, यह , तो हम नहीं कह सकते, पर इतना अवश्य कह सकते हैं कि और बहुतों की तरह चूँकि वह भी मुँह-दर-मुँह होकर सच नहीं बोल सकते थे, इसलिए लिखकर सच बोलते थे। इस सच बोलने में चंडीप्रसाद की बंडी हमेशा उनकी सहायक बनी रही। बंडी की बगली ज़ेबों से काग़ज़ों का जो पुलिंदा प्राप्त हुआ, वह दो बातें सिद्ध करता है, एक, तो यह कि घाघ टाइप के लोग सच को बगल में दबाकर रखते हैं और उनके मरने पर सच का जो पुलिंदा सामने आता है, वह भयंकर विस्फोट करने के लिए काफी होता है।

उदाहरण के लिए चंडीप्रसाद जी ने अपने अपूर्ण शब्दकोश की भूमिका बाँधते हुए लिखा था कि अब समय आ गया है कि हिंदी का पूरा शब्दकोश संशोधित करके दोबारा लिखा जाए। संशोधित करने की बात को सिद्ध करते हुए चंडीप्रसाद ने लिखा कि जब भारत का संविधान एक बार नहीं दर्जनों बार संशोधित किया जा सकता है , तो शब्दकोश में आवश्यक संशोधन क्यों नहीं हो सकते? चंडीप्रसाद जी ने अपनी भूमिका में लिखा है कि मातृभूमि के अतिरिक्त कभी कोई और भूमि मेरे पास नहीं रही, इसलिए सदा भूमिकाओं पर ही सं, तोष करना पड़ा। चंडीप्रसाद जी ने लिखा है कि मैंने जीवन-भर कभी कोई किताब पूरी तरह नहीं पढ़ी, किताबों की भूमिकाएँ पढक़र ही अपनी भूमिहीनता की संतुष्टि करता रहा। पर जीवन के अंतिम चरण में मैंने इस रहस्य को समझा कि भूमि अपनी हो, तो जैसी भी हो, जोतनेवाले को फसल मिल ही जाती है, किंतु यह जो भूमि का पॉकिट एडीशन भूमिका है, इससे तो भ्रम और भटकाव के अतिरिक्त कोई और फसल मिलती ही नहीं। हमारा विचार है कि चंडीप्रसाद को भूमिकाएँ पढ़ते-पढ़ते ही एक नया शब्दकोश लिखने का विचार आया था; लेकिन उन्हें इस ख़तरे का भी पूरी तरह अनुमान था कि उनके द्वारा लिखे जा रहे शब्दकोश को देश के धनकोश वाले महापुरुष स्वीकार नहीं करेंगे, क्योंकि प्रचलित अर्थों वाले शब्दों से उनके स्वार्थ जुड़े हैं।

चंडीप्रसाद ने अपनी भूमिका में यह भी लिखा है कि प्रचलित शब्दों की नई व्याख्या इसलिए भी ज़रूरी हो गई है कि शब्द अब सच को छिपाने अथवा सुननेवालों को भ्रमित करने अथवा धोखा देने के लिए प्रयुक्त होने लगे हैं। उनके अनुसार यह त्रासदी गुदड़ीवाले यानी जनसाधारण अधिक झेल रहे हैं। वे अपनी अज्ञानता और अज्ञानता से भी अधिक सरलता के कारण शब्दों के आज भी ठीक वही अर्थ लेते हैं, जो पुराने शब्दकोशों में लिखे हैं। इसलिए पछताते हैं और उस समय पछतावे से कुछ होता नहीं, जब चिड़ियाँ खेत चुगकर चली जाती हैं। चंडीप्रसाद ने चिड़ियों का खुलासा नहीं किया। चिड़ियों से शायद उनका अभिप्राय बिना पंख के उड़नेवाले उन जंतुओं से है, जो उड़ते,  तो हैं, किंतु उड़ते हुए दिखाई नहीं देते।

लंबी भूमिका के अतिरिक्त चंडीप्रसाद जी की जेब से जो एक छोटा-सा पुर्जा बरामद हुआ, उसमें पुराने शब्दों की नई लेकिन विस्तृत व्याख्या की गई है। उदाहरण के रूप में कुछ शब्दों के सच्चे-सही अर्थ आप भी देखिए-

 प्रेम : व्यक्तिगत स्वार्थ का एक अटपटा शब्द, जिसमें दोनों ही अपना- अपना सुख लाभ एक-दूसरे के जीवन में खोजने और प्राप्त करने के लिए सदैव एक-दूसरे को भ्रमित करते रहते हैं। ब्रैकिट में चंडीप्रसाद ने लिखा है, मानव-जाति के पास इससे ज़्यादा दिखावटी और बनावटी शब्द और कोई नहीं है।

 धर्म : विधि-विधान की एक ऐसी व्यवस्था, जिसे अपने सामयिक हितों के लिए मन-मरज़ी के अनुसार , तोड़ा-मरोड़ा जा सकता हो। यह धर्मात्माओं, समाज-सुधारकों, राजनेताओं के हाथ की लाठी भी है, जिसके द्वारा वे हम सबको हाँकने का सफल प्रयास करते हैं। यह मानव-प्रेम के नाम से दानव-प्रेम की ओर ले जाता है ; लेकिन इसके प्रेमी-प्रेमिकाएँ समझते यही हैं कि वे धर्म- प्रेम का प्रचार कर रहे हैं। इसे सरल भाषा में हाथी के दाँत भी कहा जा सकता है, जो खाने के और होते हैं, दिखाने के और।

राजनीति : नीति शब्द इसमें केवल सुंदरता बढ़ाने के लिए जोड़ दिया गया है। जैसे अँगूठी में लाल-नीला नग जोड़ दिया जाता है। वैसे यह राज+काज ही है, नीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि नीति क्षण-क्षण बदलती रहती है, जबकि राज स्थायी रूप से सदा चलता रहता है। इसलिए नीतिविहीन राज का अर्थ होता है-निराज। कुल मिलाकर राजनीति को संशोधित कर निराजनीति कर दिया जाना चाहिए। यह अति आवश्यक है।

देशप्रेम: निर्वस्त्र होकर देश को नंगा करना। वैसे भी प्रेम की वासना अपने अंतिम चरण में एक-दूसरे को निर्वस्त्र करने पर उतारू हो जाती है, इसी अनिवार्यता पर चलते हुए अधिकतर देशप्रेमी देश के कपड़े उतारकर अंत में स्वयं भी निर्वस्त्र होकर नृत्य करते दिखाई देते हैं।

 लोकतंत्र: आधुनिक दुनिया का सबसे लोकपि्रय खिलौना, जो कई देशों को ख़ून की भेंट देकर प्राप्त हुआ। यह बच्चों को दिए जाने वाले झुनझुने से अलग प्रकार का एक झुनझुना है। टीन से बने झुनझुने से बच्चे तथा शब्दों से बने इस झुनझुने से सभी प्रौढ़ पुरुष-नारियाँ एवं वृद्ध लोग खेलते हैं और मदारी के इशारे पर जमूरों की तरह नाचते हैं। इसमें समस्याएँ उत्पन्न की जाती हैं, हल नहीं की जातीं। सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र वह होता है, जिसमें लोगों को गाली देने और गोली खाने की आज़ादी है। फिर भी लोग झुनझुना बजाते रहें और खेलकर दिल बहलाते रहें।

मानव-अधिकार: अधिकारहीन लोगों द्वारा खड़ा किया गया ऐसा बखेड़ा, जिसका वास्तव में कोई अर्थ नहीं है। पिछले लंबे समय से इस शब्द को नया अर्थ देने का प्रयास किया जा रहा है; लेकिन यह अर्थ को ग्रहण नहीं कर पा रहा है। इसलिए मानव-अधिकार का मतलब है-चीख़-पुकार, शोर-शराबा, हाहाकार।

 मंत्रिमंडल: राजा-महाराजाओं का संग्रह। सामंतशाही में राजा एक होता था, लोकशाही में अनेक राजा होते हैं। पहले एक अकेला राजा खाता था, अब कई मिल-बैठकर खाते हैं। खाने की क्रिया एक-जैसी है। बस खानेवालों की संख्या बढ़ गई है।

 विपक्ष: सिर्फ़  ग़लत को ही ग़लत नहीं, सही को भी ग़लत सिद्ध करके अपनी उपस्थिति दर्ज करानेवाला महा अनुभवियों का वह गिरोह, जिसका अपना कोई चूल्हा नहीं होता। वह हमेशा दूसरों के चूल्हों पर अपनी रोटियाँ सेंकता है। अगर देश में कहीं कोई और बढि़या चूल्हा उपलब्ध न हो, तो वह सीता मैया की रसोई में भी घुसने से नहीं चूकता।

  स्पष्टवादिता: चापलूसी की एक अद्भुत प्रणाली। कहा जाता है कि एक सज्जन किसी बहुत बड़े धन्नासेठ के पास कोई आवश्यक काम लेकर पहुँचे। वह जानते थे कि सेठ जी बहुत कट्टर सिद्धांतवादी आदमी हैं, मक्खनबाज़ी से चिढ़ते हैं और दुत्कारकर निकाल देते हैं। यह सज्जन ठहरे एक काइयाँ आदमी, आए और अभिवादन के उपरांत तुरंत बोले-'सेठ जी, ये गुण , तो लाख टके का है आपमें कि आप ख़ुशामदियों को पास नहीं फटकने देते। आप दूर से ही उन्हें फटकार देते हैं।' सेठ जी ने अपनी प्रशंसा सुनी , तो गद्गद् हो उठे और आगंतुक का कार्य चुटकी बजाते कर दिया। स्पष्टवादिता की यह प्रणाली लाभदायक भी है और सम्मानजनक भी।

नमूने के इन शब्दों और उनके नवीनतम अर्थों को देखते हुए अब हम आपको यह बताना चाहेंगे कि बाबू चंडीप्रसाद ने अपने शब्दकोश की चर्चा करते हुए यह भी लिखा था कि मानवजाति के उपयोग में आनेवाले सारे ही शब्द पिछली एक शताब्दी से झूठ की लंबी खूँटी पर उलटे लटके हुए थे, जैसे आपने देखा होगा कि पुराने घरों में चिमगादड़ें उलटी लटकी रहती हैं। मैंने और कुछ नहीं किया, बस शब्दों के अर्थों को उनकी खूँटियों पर सीधा लटका दिया है। चंडीप्रसाद ने यह भी लिखा है कि झूठ को एकदम सच की तरह बोलने की प्रयोगात्मक कला, जो वर्तमान आदमी की अद्भुत विशेषता बन गई है, गहरे शोध और अनुसंधान का विषय है। अगर यह अनुसंधान न किया गया , तो शब्दों के असली अर्थ इसी तरह दिवंगत हो जाएँगे, जिस तरह मृत आदमी की आत्मा दिवंगत हो जाती है।  

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किताबें - अनुवाद मूल रचनात्मकता से बड़ा काम होता है

 

  - सुभाष नीरव

लघुकथा डॉट कॉमः भाषान्तरः गढ़वाली अनुवाद- डॉ. कविता भट्ट, ISBN – 978-81-964701-7-3, प्रथम संस्करण – 2024, मूल्यः220 रुपये (पेपर बैक), पृष्ठ:88, प्रकाशक; शैलपुत्री फ़ाउण्डेशन, ग्लोबल  सिन्जेंटिक फ़ाउण्डेशन, नई दिल्ली

  ‘लघुकथा डॉट कॉम’ वेबसाइट आज जिस गरिमामय मुकाम पर आ पहुँची है, उसके पीछे जाने-माने कथाकार सुकेश साहनी और बहुआयामी वरिष्ठ साहित्यकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की अटूट लगन के साथ-साथ इनकी ईमानदारी, निष्ठा, कर्मठता और इनके श्रम का बहुत बड़ा योगदान है। लघुकथा की एकमात्र श्रेष्ठ वेबसाइट स्थापित करने और उसे लोकप्रिय बनाने में इनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज यह वेबसाइट श्रेष्ठ और मानक लघुकथाओं की डिजिटल पत्रिका बन गई है। लघुकथा के उत्तरोत्तर विकास और उसके संवर्धन के लिए इस वेबसाइट को केवल हिन्दी लघुकथाओं तक ही सीमित नहीं किया गया, बल्कि इसे भारतीय भाषाओं, लोक भाषाओं और विश्व की अन्य भाषाओं से भी जोड़ा गया। यों तो इस वेब पत्रिका के सभी स्तम्भ बेजोड़ हैं, पर ‘मेरी पसंद’ और ‘भाषांतर’ स्तम्भों ने पाठकों में अपनी अलग पहचान बनाई है।

 लोक भाषाओं के संरक्षण में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत विवधताओं से भरा एक बहुभाषी देश है। भाषाओं को संरक्षित करने और उन्हें विलुप्त होने से बचाने में अनुवाद विधा का भी बहुत बड़ी भूमिका होती है, जिसे दुर्भाग्य से उस रूप में समझने का प्रयास नहीं किया गया है, जिस रूप में समझा जाना चाहिए। जो लोग आज भी अनुवाद को दोयम दर्जे का काम समझते हैं, वह भूल जाते हैं कि अनुवाद मूल रचनात्मकता से भी बड़ा काम होता है। दो भाषाओं के ज्ञान के साथ साथ उसकी संस्कृति, प्रकृति और परंपरा का ज्ञान होना भी आवश्यक होता है। अनुवाद केवल शब्दों को दूसरी भाषा में रूपांतरित कर देना भर नहीं है, यह एक विशद ज्ञान और संवेदनशीलता इसकी कुंजी है।

ज्ञान के प्रसार में भाषा के अवरोध को दूर करने में अनुवाद की बहुत बड़ी भूमिका होती है। विद्वानों का मत है कि भाषा जल के समान है, जल को सदैव प्रवहमान रहना चाहिए। प्रवाह का रुकना उसे विलुप्ति के कगार पर ले जाता है। इसे विलुप्त होने से बचाने में अनुवाद की महती भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।

 कई लोक भाषाएँ अपनी स्वतंत्र लिपि न होने के बावजूद हिन्दी (देवनागरी) में अपने अस्तित्व को कायम रखे हैं। अवधी, ब्रज, मैथिली, गढ़वाली, हरियाणवी आदि अनेक लोक भाषाएँ दरअसल हिन्दी जैसी महानदी की सहायक नदियाँ ही हैं, जो अपने थोड़े-थोड़े योगदान से महानदी को निरंतर समृद्ध करती रहती हैं, और अपने अस्तित्व का अहसास कराती रहती हैं।

‘लघुकथा डॉट कॉम’ ने अनुवाद की अनिवार्यता और उसके महत्त्व को समझते हुए ही ‘भाषांतर’ स्तम्भ शुरू किया होगा जो जुलाई 2007 से निरंतर जारी है और इस स्तम्भ के अंतर्गत उर्दू, संस्कृत, गुजराती, मराठी, सिन्धी, जर्मन, अंग्रेजी, तेलुगु, मलयालम, उड़िया, बांग्ला, नेपाली भाषाओं के साथ-साथ लोकभाषाओं को भी तरजीह दी है- जैसे गढ़वाली और अवधी। हिन्दी-गढ़वाली की विदुषी डॉ. कविता भट्ट ने ‘भाषांतर’ के माध्यम से हिन्दी की अनेक श्रेष्ठ लघुकथाओं को अपनी लोकभाषा में ले जाने का बीड़ा उठाया और उसमें वह सफल भी हुईं। अब इनके इस श्रम को पुस्तक का रूप दिया गया है – ‘लघुकथा डॉट कॉम : भाषांतर’ (अनुवाद : डॉ. कविता भट्ट)। में गढ़वाली अनुवाद के लिए हिन्दी के नए-पुराने कुल 45 लेखकों की लघुकथाओं का चयन किया गया। इसमें जहाँ हिन्दी के अग्रज एवं वरिष्ठ लेखक भी शामिल हुए, वहीं बिलकुल नए लेखकों को भी इसका हिस्सा बनाया गया है। पुस्तक में अच्छी बात यह की गई है कि लघुकथाओं के गढ़वाली अनुवाद से पहले उनके मूल पाठ को भी रखा गया है। मूल और अनुवाद को एक साथ पढ़ते हुए मूल भाषा की खुशबू, अनुवाद की मौलिकता और प्रामाणिकता के दर्शन सहज ही हो जाते हैं।

‘लघुकथा डॉट कॉम’ के विद्वान् संपादक-द्वय अनुवाद की शक्ति और उसकी महत्ता को बखूबी समझते हैं, यही वजह है कि उनका उद्देश्य स्पष्ट और साफ़ रहा है कि अच्छी लघुकथाएँ भाषाओं की सीमाओं को , तोड़ते हुए अन्य भाषाओं, लोकभाषाओं में भी विचरण करें; पर यह उद्देश्य बिना अच्छे अनुवादकों की मदद के फलीभूत नहीं हो सकता। इस काम के लिए हमें अच्छे अनुवादक भी तैयार करने होंगे और उन्हें प्रोत्साहित भी करना होगा।

‘लघुकथा डॉट कॉम’ के ‘भाषांतर’ स्तम्भ से भविष्य में हमें और अच्छे कार्य अनुवाद के क्षेत्र में देखने-पढ़ने को मिलेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है।  

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दोहेः उड़त अबीर गुलाल

 


-  ज्योतिर्मयी पंत

 1

जली होलिका अग्नि में, बचे भक्त प्रह्लाद।

रंगोत्सव के पर्व में, मस्ती संग आह्लाद।।

2

यमुना तट पर गोपियाँ, खेलन आई रास।

कृष्ण प्रेम में रंग गईं, नाचें भर उल्लास।।

3

भर पिचकारी रंग से, भीग रहे सब संग।

ग्वाल बाल की टोलियाँ, मस्ती भरे उमंग।।

4

नभ में रंगी मेघ हैं, उड़त अबीर गुलाल।

सत रंगी धरती हुई, जन जन रंगे भाल।।

5

टेसू सरसों दे रहे , रंगों की सौगात।

बगिया फूलों से सजी, होली की शुरुआत।।

6

ढोल मंजीरे बज रहे, गाएँ फगुआ राग।

घर आँगन रौनक बढ़े, पर्व मिलन अनुराग।।

7

 रंग भरे सब चेहरे, मुश्किल है पहचान।

भेद भाव सब मिट रहे, सब हैं एक समान।।

8

शर्बत ठंडाई मिले, गुजिया संग पकवान।

रंग अबीर गुलाल से, सबका हो सम्मान।।


रपटः बस्तर के साथी गुरुकुल विद्यालय का रंगारंग वार्षिक उत्सव

 संस्कृति, परंपरा से जुड़े रहने के साथ 

रोजगारमूलक शिक्षा मुख्य उद्देश्य 

पिछले दिनों बस्तर कोण्डागाँव के कुम्हारपारा में ‘साथी समाज सेवी संस्था’ द्वारा संचालित स्कूल ‘साथी राउंड टेबल गुरुकुल’ के 20 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में भव्य रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किया गया था। जो पद्मश्री धरमपाल सैनी जी के मुख्य आतिथ्य एवं पद्मश्री हेमचंद मांझी वैद्यराज जी के विशेष आतिथ्य में तथा किसान नेता डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी जी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। 

गुरुकुल के बच्चों द्वारा शिक्षकों के नेतृत्व में शानदार सांस्कृतिक कार्यक्रमों की एक से बढ़कर एक बेहतरीन प्रस्तुतियाँ दी गई। इस उत्सव की खास बात यह थी कि स्कूल में पढ़ने वाले नर्सरी से लेकर आठवीं तक के सभी बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लिया था। 

 इस भव्य कार्यक्रम में कोंडागाँव जिले के 3 नेशनल अवॉर्ड प्राप्त शिल्पकारों श्री तिजुराम विश्वकर्मा, श्री पंचूराम सागर तथा श्री राजेंद्र बघेल को शिल्प शिरोमणि सम्मान से सम्मानित किया गया तथा 2 शिक्षको ठाकुर राजेंद्र सिंह राठौर एवं श्री आर के जैन जी को शिक्षा गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया। बस्तर संभाग की दो महान विभूतियों पद्मश्री धरमपाल सैनी जी को उनके द्वारा किए गए कार्यों के लिए विनोबा सम्मान तथा पद्मश्री हेमचंद मांझी जी को धनवंतरी सम्मान से सम्मानित किया गया।  कोंडागाँव के प्रख्यात किसान डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी जी को बस्तर भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया। 

 इस अवसर पर स्वागत भाषण में साथी समाज सेवी संस्था के सचिव श्री हरिलाल भारद्वाज ने उपस्थित आगंतुकों तथा अभिभावकों का स्वागत किया।  डॉक्टर रत्ना वर्मा संस्थापक सदस्य साथी संस्था ने गुरुकुल विद्यालय की वर्तमान स्थिति पर अपने विचार रखे । उन्होंने स्कूल के साथ अपने अनुभव को सबके साथ साझा करते हुए कहा कि  20 वर्ष पहले, जब साथी गुरुकुल की रूपरेखा तैयार हो रही थी, तब यह एक सपने की तरह था,  परन्तु साथी समाज सेवी संस्था के तीन आधार स्तंभ भूपेश भाई, हरि भाई, और सदैव हम सबके दिलों में रहने वाले स्व. भाई भूपेंद्र बंछोर के दृढ़ निश्चय और लगन का ही परिणाम है कि आदिवासी क्षेत्र के उन बच्चों के लिए, जो स्कूल जाने में असमर्थ थे, स्कूल स्थापित करने का यह सपना साकार हो सका।  मैंने इस स्कूल को उस समय से देखा है, जब एक छोटे से कमरे में 13 छोटे- छोटे बच्चों के साथ इसका शुभारंभ हुआ था। 

डॉ. रत्ना ने आगे कहा कि  गुरुकुल स्कूल की शिक्षा पद्धति ही इस स्कूल को खास बनाती है,  परन्तु स्कूल के इस 20 साल के सफर में संस्था के सामने कई मुसीबतें आईं,  जिसमें सबसे मुश्किल घड़ी थी - कोविड का वह कठिन दौर, जब पूरा विश्व इससे लड़ाई लड़ रहा था । साथी गुरुकुल ने भी इस कठिनाइयों का सामना किया। एक दौर तो ऐसा भी आया कि लगने लगा क्या स्कूल बंद हो जाएगा? पर इस कठिन समय में भी संस्था ने हार नहीं मानी। डॉ. वर्मा ने यह भी बताया कि स्कूल के इस कठिन दौर में उनके परिवार के सदस्यों के साथ उनकी मासिक पत्रिका उदंती के माध्यम से देश के अनके प्रबुद्ध लेखकों ने बड़ी संख्या में आगे आकर स्कूल को संचालित करने में अपना महत्त्वपूर्ण  योगदान दिया था और आज भी दे रहे हैं। 

साथी के सूत्र वाक्य  - “अकेले हम बहुत कम कर सकते हैं, पर साथ मिलकर हम बहुत कुछ कर सकते हैं।” को उदघृत करते हुए उन्होंने उपस्थित जनसमुदाय से अनुरोध किया कि स्कूल का भविष्य उज्ज्वल हो और आपके बच्चे एक बेहतर नागरिक बनकर आपका नाम रोशन करें यही मनोकामना है; परंतु यह तभी संभव है जब आप सबका प्यार और साथ मिले। उन्होंने इस भगीरथ प्रयास में सबको सहभागी बनने की अपील करते हुए अपनी बात समाप्त की। 

तदुपरांत संस्था के अध्यक्ष भूपेश तिवारी ने विद्यालय की 20 वर्षों की यात्रा के साथ विद्यालय की उपलब्धियों, चुनौतियों सहित भविष्य की कार्य योजना की 

जानकारी देते हुए बताया कि वर्ष 2004 में ग्रामीण एवं वंचित समुदाय के जरूरतमंद बच्चों को रोजगारमूलक शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से साथी संस्था द्वारा गुरुकुल की स्थापना की गई थी, जहाँ बच्चों को सीखने का अवसर देने के साथ- साथ उनकी प्रतिभा को तराशा जाता है। सिर्फ 13 बच्चों से शुरू किए गए विद्यालय में वर्तमान में लगभग 250 बच्चे अध्ययनरत हैं।  

उन्होंने आगे कहा कि संस्था ने अपने अनुभव से महसूस किया कि ग्रामीण बच्चे बाहरी लोगों के सामने अपनी झिझक एवं शर्म के कारण अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन ठीक से नहीं कर पाते तथा शिल्पी समुदाय के बच्चे अपने परिवार के परंपरागत काम से दूर भी होते जा रहे हैं, ऐसे में संस्था ने महसूस किया कि बच्चो में अपनी संस्कृति, परंपरा, कौशल के प्रति सम्मान का भाव पैदा होना आवश्यक है। इन्ही सब उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए यह स्कूल प्रारंभ किया गया, जो आज अपने 20 वर्ष पूर्ण कर रहा है।  अब तक कुल 1200 से अधिक बच्चे, जो इस स्कूल से शिक्षा प्राप्त कर निकले हैं, उच्च शिक्षा प्राप्त कर आज विभिन्न क्षेत्रों में अपना परचम लहरा रहे हैं। कोई सफलतापूर्वक व्यवसाय कर रहा है, तो कई  उच्च शिक्षा प्राप्त कर सम्मानजनक नौकरी कर अपने परिवार की आर्थिक सहायता कर रहे हैं। 

 भूपेश जी ने पिछले वर्षों में स्कूल के सामने आई कई चुनौतियों  के बारे में बताते हुए कहा कि हर मुसीबत का सामना करते हुए यह विद्यालय अपने मूल उद्देश्यों को पूरा करने में आज भी लगा हुआ है। आर्थिक परेशानियों के समय साथी परिवार से जुड़े लोग अपनी सामर्थ्य अनुसार विद्यालय को दान भी दे रहे हैं, जिसके कारण हम विद्यालय का सफलता पूर्वक संचालन कर पा रहे हैं।  

इसके बाद कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री धरमपाल सैनी जी ने बच्चों की अद्भुत प्रतिभा की प्रशंसा करते हुए कहा कि बिना भय के भरपूर आत्मविश्वास के साथ इस स्कूल के बच्चे जैसा प्रदर्शन कर रहे हैं वह काबिले तारीफ है। डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी जी ने साथी संस्था के संस्थापकों के बारे में बताया कि  मैंने जब अपनी बैंक की जॉब छोड़ी, तो उसके लिए प्रेरणा मुझे भाई भूपेश तिवारी और उनके साथियों से मिली।

सांस्कृतिक कार्यक्रम आरंभ होने के पूर्व सभी अतिथियों ने बच्चों द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया एवं बच्चों का उत्साहवर्धन भी किया।  कार्यक्रम के अंत में स्कूल की प्राचार्य  श्रीमती प्रभा कुंभकार ने  उपस्थित आदरणीय अतिथियों के साथ सभागार में कार्यक्रम का आनंद ले रहे अभिभावकों एवं क्षेत्र के उपस्थित सम्माननीय जनसमुदाय का आभार व्यक्त किया। चार घंटों तक चले इस भव्य कार्यक्रम का संचालन मधु तिवारी एवं संतोष तिवारी ने बहुत ही कुशलता से किया। 

वार्षिक उत्सव के पहले दिन गुरुकुल में बच्चों द्वारा बनाई गई कलाकृतियों, कबाड़ से जुगाड़, बस्तर की संस्कृति से संबंधित वस्तुओं के साथ बस्तर की समृद्धि को दर्शाती एक शानदार प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था।  प्रदर्शनी का उद्घाटन कोंडागांव के विख्यात किसान डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी जी के हाथों संपन्न हुआ।  अध्यक्ष भूपेश तिवारी ने बच्चों द्वारा बनाई गई कलाकृतियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी, साथ ही त्रिपाठी जी ने बच्चों के साथ संवाद कर उन्हें बेहतर इंसान बनाने के लिए प्रोत्साहित किया।  बच्चों ने भी अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए कई प्रकार के सवाल उनसे पूछे।  इसके साथ ही बच्चों द्वारा इस अवसर पर स्वादिष्ट आनंद मेले का भी आयोजन किया गया था जिसमें बच्चों ने विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बना कर बना कर सबका मन मोह लिया, अलग अलग व्यंजनों का स्वाद लेकर बच्चों के साथ उनके परिवारजनों ने भरपूर आनंद उठाया। 

 इस दो दिवसीय कार्यक्रम में विद्यालय के सभी शिक्षकों सहित संस्था के समस्त कार्यकर्ताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ■ ( उदंती फीचर्स)