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Jan 1, 2023

दोहेः सुबह सुहानी धूप

 - शील कौशिक

चकाचौंध है शहर में, पर चुप हैं मनमीत।

हवा शहर की ले गई, गौरैया के गीत।।

 

सोई है संवेदना, सोए हैं सम्बन्ध।

वासंती अहसास का, कैसे हो अनुबन्ध।।

 

चिड़िया बैठी डाल पर, रस्ता रही निहार।

बिछुड़े साथी जब मिलें, आए तभी बहार।।

 

हवा निगोड़ी गुम हुई, कहाँ गयी बदजात।

बढ़ी निराशा वृक्ष की, चुप बैठे हैं पात।।

 

ऋतुपति की पदचाप सुन, उपवन करे पुकार।

कोयल-भँवरे, गुल-कली, दौड़े बाँह पसार।।

 

हुलस-हुलसकर कह रही, गेहूँ की हर बाल।

सखी! सयानी हम हुईं, कब पहुँचें ससुराल।।

 

पवन बसंती छू गई, जब से मेरा गात।

चंचल मन उड़ता फिरे, कहने को निज बात।।

 

रंग और मकरंद की, हुई खूब बरसात।

मद में डूबे सब करें, ऋतु बसंत की बात।।

 

पीत चुनरिया ओढ़कर, निखरा सरसों वेश।

हरियाला परिधान है,  दुल्हन- सा परिवेश।।

 

त्याग-भावना फूल की, देती है संदेश।

कुछ दिन का जीवन मिला, महकाओ परिवेश

 

ठिर-ठिर सर्दी आ गई, जमी धूप में खाट।

तेज हवा ज्यों ही चली, लगी धुंध की बाट।।

 

था-थैया कत्थक करे, सुबह सुहानी धूप।

कौतुक यह सब देखते, कैसा रूप अनूप।।

 

करके माथे पर तिलक, सकुचाती है धूप।

मैं भी भैया क्या करूँ, मैका लगे अनूप।।

 

कुहरे का पहरा लगा, प्रकृति हो गई मौन।

सूरज दादा हैं छुपे, टक्कर ले अब कौन।।

धरोहरः छत्तीसगढ़ के सिरपुर में है विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध विहार


 - डॉ. रत्ना वर्मा
छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों में सिरपुर का विशेष स्थान है।महासमुंद ज़िले में स्थित सिरपुर प्राचीन बौद्ध परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ स्थित विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध विहार आज भी छत्तीसगढ़ की समृद्ध विरासत की कहानी कहता है।

इस बार जब सिरपुर की यात्रा पर जाना हुआ तो लक्ष्मण मंदिर, राम मंदिर और के अलावा जिन स्थानों पर अधिक समय हमने बिताया, वह यहाँ अलग- अलग जगह पर मिले विभिन्न बौद्ध विहारों की यात्रा थी जो अपने आप में बेहद रोमांचक और यादगार रही। मेरे लिए यह गौरव का विषय है कि मैं उस प्रदेश की निवासी हूँ जहाँ सिरपुर है और इसी सिरपुर में विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध विहार है।

पिछले अनेक वर्षों से की जा रही सिरपुर की खुदाई में हर बार कुछ नया देखने को मिलता है यही कारण है कि सिरपुर की यात्रा मेरे लिए हमेशा एक अलग और नया अनुभव देने वाला होता है।  बस यहाँ एक कमी बहुत खलती है और वह है ठहरने और भोजन की समुचित व्यवस्था का न होना। इतनी भव्यता समेटे होने के बावजूद भी पर्यटन के रूप में इस क्षेत्र का जैसा विकास होना चाहिए नहीं हो पा रहा है। शायद हम इसके विश्व धरोहर में शामिल होने की बाट जोह रहे हैं।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 85 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सिरपुर में छठवीं शताब्दी के 184 टीलों को खुदाई के लिए तय किया गया था,  खुदाई अभी भी जारी है जिसमें शिवमंदिर, विष्णु मंदिर, बौद्ध विहार, लक्षमण मंदिर, जैन विहार, राजमहल, सुरंग टीला, बाजार के साथ यज्ञशाला, स्तूप और रहवासी मकानों के अवशेष मिले हैं। आगे की खुदाई में न जाने और क्या क्या  मिलेगा।

केंद्र सरकार ने देश के पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बौद्ध सर्किट तैयार किया है। इसी बौद्ध सर्किट में छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल सिरपुर को शामिल कर लिया गया है।। सिरपुर को बौद्ध सर्किट-3 में जगह दी गई है। ज्ञात रहे कि बौद्ध सर्किट एक में गया, वाराणसी, कुशीनगर, और लुंबनी (नेपाल) की यात्रा  शामिल है। लुम्बिनी - जहाँ भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था, बोधगया- जहाँ उन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त किया, सारनाथ, जहाँ उन्होंने प्रचार किया, कुशीनगर जहाँ उन्हें मुक्ति मिली।

जैसा कि इतिहास में दर्ज है ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग सिरपुर आए थे। उन्होंने अपने यात्रा वृतांत में जिस राजधानी का जिक्र किया है वह सिरपुर ही है। चीनी यात्री ह्वेनसांग की भारत यात्रा पर थामस वार्ट्स ऑन युवांग चांग की ट्रेवल्स इन इंडिया नामक पुस्तक भी प्रकाशित हुई थी। व्हेन सांग की यात्रा वृत्तांत में सिरपुर का उल्लेख है। ह्वेनसांग ने सन्‌ 618 में छत्तीसगढ़ की पहली यात्रा की थी।  जब इस स्थान की खुदाई की गई तो वे सभी बातें सत्य पाई गई जिनका उल्लेख ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा वृत्तांत में किया है। उनके अनुसार यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि भगवान बुद्ध के चरण भी छत्तीसगढ़ में पड़े थे।

ह्वेनसांग ने श्रीपुर के दक्षिण की ओर एक पुराने बिहार एवं अशोक स्तूप का वर्णन किया था, जहाँ भगवान बुद्ध ने शास्त्रार्थ में विद्वानों को पराजित कर अपनी आलौकिक शक्ति का प्रदर्शन किया था। इतिहासकारों के अनुसार यह बात भी प्रमाणित होती है कि जहाँ- जहाँ भगवान बुद्ध के चरण पड़े वहाँ वहाँ अशोक स्तूप का निर्माण कराया गया था। ह्वेनसांग के यात्रा वृतांत में यह बात प्रमाणित भी होती है।

सिरपुर में अब तक 10 बौद्ध विहार और लगभग 10000 बौद्ध भिक्षुओं के अध्ययन के पुख्ता प्रमाण मिल चुके हैं। इसके अलावा यहाँ कई बौद्ध स्तूप और बौद्ध विद्वान नागार्जुन के आने के प्रमाण मिले हैं। यह स्थल गया के बौद्ध स्थल से भी बड़ा है। अभी तक यह माना जाता रहा है कि नालंदा, तक्षशिला और पाटिल पुत्र ही शिक्षा के स्तंभ रहे है तथा नालंदा का बौद्ध विहार ही सबसे बड़ा है। लेकिन सिरपुर में प्राप्त बौद्ध विहारों ने इस बात को गलत साबित कर दिया है। क्योंकि अब तक नालंदा में चार बौद्ध विहार मिले हैं, जबकि सिरपुर में दस बौद्ध विहार पाए गए हैं। जहाँ  छह- छह फुट की बुद्ध की मूर्तियाँ भी मिली हैं। सबसे खास बात है कि सिरपुर के बौद्ध विहार दो मंजिल वाले हैं जबकि नालंदा का विहार एक मंजिला ही हैं । इन विहारों में घूमते हुए आप इस स्थल की भव्यता को महसूस कर सकते हैं। मैं तो सोचने पर मजबूर हो गई कि वाह क्या  दौर रहा होगा और क्या उस दौर के लोग रहे होंगे जिन्होंने ऐसी संरचना रची।

खुदाई में प्राप्त अवशेषों और उनके अध्ययन के बाद यह प्रमाणित हुआ है कि प्राचीन समय में सिरपुर एक अतिविकसित और समृद्ध राजधानी थी, यहाँ से विदेशों के साथ व्यापार किया जाता था। अवशेष बताते हैं कि यहाँ सोने-चाँदी के गहने बनाने के साँचे थे।  अस्पताल, था। इस स्थान पर बंदरगाह होने के प्रमाण भी मिले हैं जो हजारों साल पहले यहाँ जहाज चलने की बात को प्रमाणित करते हैं।

तीवर देव बौद्ध विहार

दक्षिण कोसल में 2002-03 के उत्खनन में प्राप्त अब तक के सबसे बड़े विहार के रूप में तीवर देव बौद्धविहार का नाम लिया जाता है। तीवर देव महाविहार विशाल और भव्य है। इसकी शिल्पकला अद्भुत है। यह बौद्ध विहार लगभग 902 वर्ग मीटर में फैला है। इसे दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम विहार के मध्य में 16 अलंकृत प्रस्तर स्तंभों वाला मंण्डप है। इन पर ध्यान मुद्रा में बुद्ध, सिंह, मोर, चक्र आदि का उकेरे गए हैं।

गर्भ गृह के पश्चिम में भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है। इन इस विहार में चारों ओर भिक्षुओं के रहने के लिए कमरे हैं। बीच में आंगन है। गर्भगृह है। गर्भगृह के सामने वाले मंण्डप के चारों ओर गलियारा है। इस विहार में जल निकासी के लिए भूमिगत नालियों के अवशेष मिले हैं। इस विहार के प्रवेश द्वार हाथी तथा युगल मूर्तियों से सज्जित द्वार बेहद खूबसूरत है। सिरपुर से बौद्धधर्म से संबंधित पाषाण प्रतिमाओं के अतिरिक्त धातु प्रतिमाएँ तथा मृण्मय पुरावशेष भी उपलब्ध हुए हैं।

मध्यप्रदेश के स्थित साँची के स्तूप की तरह बौद्ध विहारों में जातक कथाओं का अंकन है और पंचतंत्र की चित्रकथाएँ जैसे मगरमच्छ, वानर आदि की कथाएँ उकेरी गई है। एक स्तंभ में कुम्हार द्वारा चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाने का दृश्य उस दौर के व्यवसाय एवं उसके महत्त्व को दर्शाते हैं। सिरपुर की सभी मूर्तियाँ पत्थर से बनी हुई है। यहाँ हंस और मयूर के चित्र बहुतायत से मिलते हैं। शिव पार्वती और गणेश की प्रतिमा तथा महिषासुरमर्दिनी की मूर्तियों के साथ गंगा की मूर्तियाँ भी है।

इस स्थान में विहार के साथ एक बौद्ध भिक्षुणी विहार भी स्थित है। कहते हैं कि जब वज्रयान संप्रदाय का उद्धव हुआ तब से भिक्षुणियों के लिए अलग विहार बनाकर उनके रहने की व्यवस्था की गयी। उत्खनन में वज्रयान का प्रतीक धातु का वज्र भी प्राप्त हुआ है। साथ ही यहाँ बड़ी संख्या में सीपी तथा काँच की चूडियाँ मिली है। प्राप्त मुद्राओं पर बौद्ध धर्म से संबंधित सूक्तियाँ अंकित है। बुद्ध के अलावा अन्य मूर्तियों में सातवीं शताब्दी के बौद्ध बीजमंत्र उत्कीर्ण है। गंधेश्वर मंदिर में मिली बुद्ध की प्रतिमा में आठवीं शताब्दी के अक्षरों में बौद्धमंत्र उत्कीर्ण है। बताया जाता है कि आनंद प्रभु कुटी विहार का उपयोग बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों द्वारा आवास हेतु किया जाता था।

इस विहार में सीढ़ियाँ भी मिली हैं, जिससे अनुमान लगाया गया कि यह विहार दो मंजिला रहा होगा। क्योंकि ह्वेनसांग ने 10,000 बौद्ध भिक्षुओं के सिरपुर में निवास करने का जिक्र किया है। हर मठ में एक सीढ़ी है। जिससे ऊपर जाया जा सकता है। यहाँ एक प्रवेश द्वार है। इससे लगा कमरा कोषागार लगता है। इसलिए कि कोषागार में जाने के लिए समीप ही एक कमरे की दीवार के आधार के साथ खिड़कीनुमा पल्ला होने का संकेत मिलता है। अन्न भंडार और कोषागर की व्यवस्था हर मठ में देखने को मिलती है। सामूहिक अध्ययन के लिए एक बड़ा कमरा है। कुछ कमरे छोटे तथा कुछ बड़े हैं।

सिरपुर में सभी बौद्ध विहार उच्चकोटि की ईटों से निर्मित हैं। विहारों की तल योजना में गुप्तकालीन मंदिर तथा आवासीय भवन का निर्माण किया गया है। विहार में भिक्षुओं के ध्यान, निवास, स्नान के अलावा अध्यापन की सुविधाएँ थी। खुदाई में 43 रिहायशी कमरों के अवशेष मिले हैं। प्रत्येक विहार के सामने बरामदा और सभागृह है। पीछे की ओर भिक्षुओं के निवास स्थल है। कुछ कमरे बड़े हैं, कुछ बहुत ही छोटे हैं। महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासन काल में आनंद प्रभु नामक बौद्ध भिक्षु ने विहार का निर्माण कराया था। आनंद प्रभु कुटी विहार में 16 पत्थर के स्तंभ हैं। सभा मंडल, छज्जा और मूर्तियाँ इसी पर आधारित हैं। बुद्ध की एक प्रतिमा है जो बंद कमरे में है। इस प्रतिमा के दक्षिण दिशा में पद्मपाणि की पूर्ण आकार की प्रतिमा है। देव मंदिर के दक्षिण में गंगा की और वाम में यमुना की प्रतिमा है। मठ के बरामदे में 14 कमरे हैं। सभी में आले हैं। एक आला दरवाजे की सांकल के लिए, दूसरा दीपक के लिए, तीसरा ताले के लिए और चौथा वहाँ निवास करने वाले भिक्षुओं के सामान रखने के लिए था।

स्वस्तिक विहार

पास ही एक और ध्वस्त विहार भी उत्खनन से प्रकाश में आया है। तल योजना के आधार पर इसे स्वस्तिक विहार के नाम से जाना जाता है। यहाँ भी भूमिस्पर्श मुद्रा में बुद्ध की प्रतिमा प्रस्थापित है। यह विहार भी बौद्ध भिक्षुओं के रहने की व्यवस्था, उनके ध्यान के लिए अलग अलग कमरे की व्यवस्था दिखाई देती है।

सबसे बड़ा बाजार

सबसे अनोखा है उत्खनन में प्राप्त विश्व के सबसे बड़े सुव्यवस्थित बाजार को देखना, जो यह बताता है कि छठी-सातवीं शताब्दी में सिरपुर एक अति विकसित राजधानी थी जहाँ देश- विदेश से व्यापार होता था। खुदाई में अष्टधातु की मूर्तियाँ बनाने के कारखाने के प्रमाण मिले हैं। इस कारखाने में धातुओं को गलाने की घरिया और मूर्तियों को बनाने में प्रयुक्त होने वाली धातुओं की ईटें प्राप्त हुई हैं।  सिरपुर के पास ही महानदी पर नदी बंदरगाह आज भी विद्यमान है। इन प्रमाणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि पहले महानदी में पानी की मात्रा ज्यादा होती होगी कि उसमें जहाज आया जाया करते थे।

 सातवीं शताब्दी के पश्चात इस क्षेत्र में जबरदस्त भूकंप आया, जिसके कारण पूरा सिरपुर ध्वस्त हो गया। यहाँ के पुरातात्विक उत्खनन में इस बाढ़ और भूकंप के प्रमाण के रूप में सुरंग टीले के मंदिरों में सीढ़ियों के टेढ़े होने और मंदिरों व भवनों की दीवालों पर पानी के रुकने के साथ बाढ़ के महीन रेत युक्त मिट्टी दीवारों के एक निश्चित दूरी पर जमने के निशान मिलते हैं।

संस्मरणः पचासी पतझड़

- निर्देश निधि
 उस बार जब मैंने उसे देखा, तो लगा जैसे वह पचासी वसंतों में खिले फूलों की महक के स्थान पर सिर्फ पचासी पतझड़ों की वीरानी ओढ़े बैठी थी बुआ। घर में बेटा- बहू, पोती- पोते, धेवती- धेवते सबकी उपस्थिति में भी वह घर से अलग- थलग घेर में बनी एक एकांत कोठरी में अकेली पड़ी थी। देखकर दिल धक से रह गया था बस। पचासी पतझड़ों ने उसकी आँखें बुढ़ा दी थीं। मेरी वह सौन्दर्य- भरी बुआ एक झुर्रीदार बूढ़ी में परिवर्तित हो गई थी । कोसों पैदल चल लेने के अभ्यस्त उसके पाँव घर का आँगन पार करते भी डगमगा रहे थे । भंडारे की साफ- सफाई करते वक्त मन- मन भर की बोरियाँ इधर से उधर पटक देने वाली वह बलिष्ठ बुआ अब धड़ी भर धान की पोटली भी क्या ही उठा पाती होगी। खैर, अब तो उसे इस सबकी ज़रूरत भी नहीं थी। पर इस उम्र में थका देने के लिए अपने शरीर की सेवा में क्या कुछ कम ऊर्जा खर्च होती है । अब बुआ बुढ़ापे और बीमारी के मेल- जोल से पूरी तरह थक गई थी । जीवन के साथ मिली ऊर्जा चुक गई थी और जीवन शेष रह गया था । शायद उसने ऊर्जा का खर्चा अधिक कर दिया था, बुढ़ापे के लिए शेष कुछ रखा नहीं था । कह सकते हैं कि ऊर्जा और जीवन का अनुपात गड़बड़ा गया था ।

मैंने एक- दूसरे के लिए इतनी जान देने वाले भाई- बहन कभी देखे ही ना थे, जैसे अपनी बुआ और अपने पिता। मेरे पिता अपने परिवार की ज़िम्मेदारी के साथ- साथ मेरी बुआ के परिवार की ज़िम्मेदारी भी शिद्दत से उठाते रहे थे। यूँ बुआ को किसी मरे- गिरे परिवार में तो ब्याह कर नहीं गए थे मेरे दादा; पर उसके ननद- देवरों की अधिक जिम्मेदारियों के कारण गाहे- बगाहे उसे मेरे पिता की, मेरे पिता क्यों अपने भाई की  सहायता की आवश्यकता पड़ ही जाती, और भाई मुस्तैदी से सहायता में जुट जाता। 

एक– दूसरे के परिवार और बच्चों के लिए जान कुर्बान रहती दोनों की । उनके इसी व्यवहार के रहते मैंने भी अपने बचपन से लगाकर युवावस्था तक अपनी प्यारी बुआ के गाड़े स्नेह का आसव छककर पिया था। किशोरावस्था मुझे माँ और पिता विहीन कर गई। बुआ तड़प उठी, उसके मन का दुःख- ताप बुझाए ना बुझता था। जैसे सघन कोहरे वाली रातों में धुआँ ऊपर ना उठ पाए वैसे ही बुआ का दुःख फिर - फिर उसके सीने में लौट आता । बड़े कठोर शब्द निकाले उसने अपने मुँह से, “मेरे भैया के जाने से उसका और मेरा, दोनों परिवार अनाथ हुए, इससे तो महेंदर के पिता जी ना होते तो मेरा भैया दोनों परिवारों को आराम से पाल लेता।”  जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि सैकड़ों बीघा के मालिक मेरे फूफा जी यूँ इतने गए गुजरे भी ना थे, पर ना जाने कैसे उन्हें मेरे पिता की सहायता की आवश्यकता रहती ही थी। और बहन के परिवार के भी फ़िकरमंद मेरे पिता सारे काम- काज त्यागकर उन्हें सहायता देने दौड़ पड़ते। मेरे पिता नहीं रहे थे, और नहीं रहा था मेरी बुआ का लाड़ला इकलौता और प्यारा भाई भी। मैं तो अनाथ हो ही गई थी;  पर मुझसे अधिक अनाथ तो बुआ हो गई थी । उसके पास तो भाई- भावज, भतीजी- भतीजों के किस्सों के सिवा कुछ और था ही नहीं।

अंततः पिता जी के न होने से गाँव घर- बार सब कुछ एक झटके में छूट गया था। जैसे ध्वनि -तरंगों में कोई बल आ गया था और जीवन का संगीत कानों तक पहुँचता ही ना था । आठ अक्तूबर उन्नीस सौ छियत्तर की सुबह - सुबह यह दुर्घटना घटी, कैसा विचित्र संयोग है कि आज ठीक तेंतालीस बरस बाद आठ अक्तूबर दो हज़ार उन्नीस के दिन मैं इस दुर्घटना का उल्लेख पहली बार तिथि के साथ कर रही हूँ। हमारा गाँव छूट गया, अनाथ हुए हम सब बहन- भाई बिजनौर चले आए।  

बुआ का गाँव कंबौर, बिजनौर से तीन या चार किलोमीटर ही है;  अतः वह अब हमारे पास की निवासी हो गई । जब भी उसका मन हमसे मिलने को उमड़ता वह बिना सोचे - विचारे घर से निकल पड़ती । जाड़ों में ऐसी करारी मूँगफलियाँ भूनकर लाती, जो बादाम को भी मात दे दें । कभी आम ले आती, कभी अमरूद लाती, कभी गन्ने के टुकड़े छील - छीलकर लाती, कभी गन्ने का रस ही पिरवाकर ले आती । कभी ताजा बना गुड़ - शक्कर, कभी राब, कभी झड़बेरी के देसी बेर ही रास्ते से तोड़कर ले आती, मसलन किसी सीजन की कोई ऐसी चीज़ ना थी, जो बुआ की पहुँच में होती और हम ना खाते - पीते ।    

कोई बैल गाड़ी या भैंसा - बुग्घी कभी मिल जाती, तो बुआ उसमें बैठकर बिजनौर तक आ जाती अन्यथा पैदल – पैदल ही चल देती । ना अघन – फूँस के जाड़े से ठिठुरन की परवाह करती, ना शरीर का सारा पानी उलीचकर रख देने वाली गर्मी से डरती, ना मूसलाधार बरसते सावन - भादों की रौ में बहती और ना ही बसंत की महकती बयार उसे बहकाकर आने से रोक पाती । एक निश्चित अंतराल के बाद एक- आध दिन के हेर- फेर से उसका आना निरंतर होता। अगर घर तक आने का समय ना होता, तो वह मेरे स्कूल ही पहुँच जाती । आकर स्कूल के लॉन में बैठ जाती, धैर्यपूर्वक इंटरवल की प्रतीक्षा करती और घंटी बजते ही चपरासी के हाथ मुझे बुला भेजती । मैं अपना खाना भी वहीं बुआ के पास ही बैठकर खाती । अकसर वह मेरे लिए भी खाना लाती और हम दोनों बुआ - भतीजी वहीं लॉन की घास के हरे कालीन पर बैठकर खाना खाते । मेरे पिता के ना होने ने उस पर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी डाल दी थी जैसे ।

आधे घंटे के दौरान उसका हाथ दसियों बार मेरे सिर पर चला जाता । उस समय मुझमें आज - कल की लड़कियों की तरह बालों में स्टाइल बनाने का ना होश था ना हुनर ही, जो बुआ के हाथ से हेयर स्टाइल बिगड़ जाने का जोखिम हो । वह आशीष देती और मेरा कपाल उसे भीतर तक सोखकर आश्वस्त होता । मन शांति और स्नेह के बख्तरबंद सी सुरक्षा और संतुष्टि से भर उठता । माँ- पिता जी के असमय चले जाने से हुआ गहरा घाव बुआ के प्यार के मरहम से थोड़ा कम टीसता ।

बुआ कई- कई दिनों तक हमारे साथ रहने आ जातीं। बचपन में अंग्रेजों के समय के जो तमाम किस्से उनसे सुने थे, मैं उन्हें अपनी किशोर स्मृति में सदा के लिए सुरक्षित कर लेने के लिए फिर से सुनती। वे अपने बचपन में अपने भाई से हुए अपने बाल सुलभ झगड़ों से लेकर अपने संघर्षों में एक - दूसरे के साथ बिना किसी शर्त खड़े रहने के किस्से भी खूब सुनाती। और उनका भाई किस तरह उन्हें निरापद कर देता वे उसके यशोगान भी सुनाया करतीं । धीरे - धीरे माँ - पिता के चले जाने के घाव भरने लगे, पर उदासी तो सदा के लिए मन पर अंकित हो गई और मैं चुलबुली चहकती लड़की से गंभीर सी और कम हँसने- बोलने वाली लड़कियों में शामिल हो गई, या कर दी गई ।

बड़ी हुई, पढ़ी - लिखी, फिर ब्याह होकर डॉ. साहब के साथ बुलंदशहर आ गई । बड़े से संयुक्त परिवार में व्यस्तता हदें पार कर गई । पढ़ाई - लिखाई को चूल्हे - चौके ने रिप्लेस कर दिया। सासू माँ भी एक व्यस्त डॉक्टर थीं;  अतः मैं एक पूर्णकालिक गृहिणी  के संकुचित माने जाने वाले विस्तृत दायरे में कैद होकर रह गई। कैद भी हुई इतनी कि फ्रस्ट्रेट होने की याद भी नहीं आई कि मैंने अपना बना - बनाया कैरियर छोड़ा था और यहाँ दो पंक्तियाँ पढ़ने तक की मोहलत नहीं थी। जो स्थिति रही उसमें बुआ से मिलना भी कहाँ हो पाता। बरसों तक उससे ठीक से मिलना संभव हुआ ही नहीं ; क्योंकि बिजनौर यानी पीहर जाना ही बहुत कम समय के लिए हो पाया । सही मायनों में असन्तुष्ट या फ्रस्ट्रेट होने की याद भी तब आई, जब खुले शब्दों में मुझे घर की परिचारिका घोषित कर दिया। खैर यह पीड़ादायी किस्सा फिर सही, अभी तो बस बुआ। ऐसे में मैं और बुआ एक- दूसरे से अपने - अपने संवेगों के माध्यम से जुड़े रहे । बुआ के घर जाकर कुछ घंटों के लिए ही मिलना संभव हो पाता, वह भी कभी- कभार। उसका भी बिजनौर आना काफी कम हो गया था। 

उस बार मैं, भाभी मेरा बड़ा भतीजा राज भास्कर और मेरा बेटा वरुण, बुआ से मिलने उसके गाँव गए थे । इस बार मुझे उसकी आँखों से गुजरे हुए पचासी वसंतों की जगह उनमें पचासी पतझड़ झड़े हुए ज़रूर दिखाई दिए थे । अपनी बुढ़ाई आँखों को थोड़ा सिकोड़कर उसने, बड़े होते वरुण को देखा और पल में उसे पहचानकर उत्तर जानते हुए भी, बात को प्रश्न बनाकर बोली, “दिशु है ?” वह वरुण को उसके बचपन के इसी नाम से पुकारती थी। “हाँ बुआ दिशु ही है ।” वरुण को बुआ ने अपने पास बैठा लिया मेरे हिस्से के आशीषों की पोटली भी उसी के सिर पर खोलती रही। वरुण को हँडिया में हारे में उबलता हुआ गुलाबी दूध बहुत पसंद है; अतः उसके लिए लुटिया भर दूध हारे में से निकलवा लिया गया । मलाई न खाने पर खूब देर तक बोली । तेरा नाना तो हँडिया की सारी मलाई खा जाता था,  देखा नहीं तूने कितना लईम - शईम था; अगर देखता तो देखता ही रह जाता । खैर वह कितना भी बोली पर वरुण मलाई नहीं खाता, सो उसने नहीं खाई ।

घेर में बनी कोठरी के एकांत से ऊब गई होगी शायद;  इसीलिए भाभी को देखते ही उनके साथ बिजनौर उनके घर आने की हठ करने लगी थी, बच्चों की तरह । अपनी पोती से बोली, मेरे कपड़े रख दे चार - पाँच धोती, कुर्ते रख और एक मेरा नया वाला तौलिया रख दे । और हाँ मेरी वे दोनों नई धोती ज़रूर रखना जो मुझे सुरेखा ने दी थीं, जब मैं गई थी पिछली बार । मैं जाऊँगी अपने भैया इंदरबीर (इंद्रवीर) के पास । वे बड़े भैया का नाम लेकर बोलीं। मैं मन ही मन सोच रही थी कि स्त्री कितनी भी बूढ़ी क्यों ना हो जाए उसका नई साड़ियों के प्रति मोह कहाँ छूटता है, वह तो बरकरार रहता है सदा, जैसे पचासी बरस की बुआ का बरकरार था। बुआ उस समय बहुत अस्वस्थ और अशक्त थीं अतः उसके बेटे ने उसे ले जाने की सलाह नहीं दी । भाभी भी हिम्मत नहीं बटोर पाईं । पर बुआ तो बिलकुल वैसी ही ज़िद पर अड़ गई जैसी ज़िद उसने कभी तब की होगी जब ग्यारह बरस की नादान उम्र में ब्याह कर ससुराल आई थी और उसके पिता कभी यूँ ही उससे मिलने चले आए होंगे और वह घर चलने की ज़िद पर अड़ गई होगी और उसके पिता को उसे जबरन छोड़कर जाना पड़ा होगा । हम भी उसे छोड़कर चले आए थे।

भास्कर (मेरा बड़ा भतीजा) उन्हें ले चलने के लिए ज़िद करने लगा कि जब उनका इतना मन है, तो लेकर ही जाऊँगा। भास्कर का क्या वह एक बार जून की छुट्टियों में मेरी ससुराल आया । घर में तमाम मेहमान आए हुए थे करीब बारह - पंद्रह  लोग रहे होंगे कुल मिलाकर। पहले रिश्तेदारियों में जाने का खूब समय था लोगों के पास । मेरी ननदें, उन ननदों के ननद - देवर, मेरे सगे देवर, फुफेरे देवर, एक मेरी सासू माँ, एक उनकी बड़ी बहन और भी कोई जन, और खाना बनाने वाली अकेली मैं । तब भास्कर बच्चा ही था आठवीं या नौवीं कक्षा में पढ़ता रहा होगा, थोड़ा सा नासमझ पर कुछ - कुछ समझदार भी । जब रात में पचासियों चपातियाँ बनाते रहकर भी सबका खाना न निपटा तो जून की भीषण गर्मी के कारण मुझे उल्टियाँ आ गईं। निर्दयता यह कि बची हुई चपातियाँ बनाने के लिए भी कोई नहीं हिला। पाँच मिनिट सुस्ताकर वे भी बनानी मुझे ही पड़ीं । यह देखकर भास्कर नाराज़ हो गया और डॉक्टर साहब सहित मेरे सारे ससुरालियों के सामने ही बोला, “बुआ जी कल सामान लगा लेना मैं कल जाऊँगा और आपको भी लेकर ही जाऊँगा। इस बारात का खाना बनाने के लिए यहाँ छोड़कर नहीं जा सकता ।”  मैं सुन्न और सब शून्य रह गए, कोई कुछ नहीं बोला। वही भास्कर अब बड़ा होकर अपने पिता की बुआ को भी अपने घर ले जाने की ज़िद करने लगा। पर बुआ वाकई बहुत अशक्त थी उसे लाया नहीं जा सकता था उसकी बाल सुलभ हठ से घबराकर उसके बेटे ने हमें सुझाया कि आप लोग चुपचाप निकल जाओ, माँ को मैं पीछे घेर में लिए जा रहा हूँ । और हमने उसकी यह निकृष्ट सलाह मान भी ली और हम चुपचाप चले आने की भूल कर बैठे।

अगले ही दिन मैं बुलन्दशहर लौट आई । मेरे लौट आने के ठीक चौथे दिन बुआ ने शरीर छोड़ दिया । खिन्न होकर बोली होगी जाओ तुम। मुझे नहीं ले जाते, तो मैं खुद ही चली जा रही हूँ, वो भी कभी ना आने के लिए। उसके बेटे ने बताया कि बहुत नाराज़ हुई थी उस दिन वह। इतनी नाराज़ हुई कि हमेशा के लिए ही नाराज़ हो गई। वह नाराज़ हुई और हमें अपनी नाराजगी के अनुपात से कहीं ज़्यादा पश्चाताप से भर गई । सोचती हूँ उसे धोखा देकर चले आने और उसके इस तरह नाराज़ होकर चले जाने के सघन पश्चाताप से क्या मेरा जीवन कभी रिक्त हो पाएगा…

सम्पर्कः विद्या भवन, कचहरी रोड, बुलंदशहर (उप्र)-203001, ईमेल-  nirdesh.nidhi@gmail.com, मो. 93584-88084

चोकाः मैं सूरज हूँ


- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ 

मैं सूरज हूँ

अस्ताचल जाऊँगा

भोर होते  ही

फिर चला आऊँगा

द्वार तुम्हारे

किरनों का दोना ले

गीत अर्घ्य दे

मैं गुनगुनाऊँगा

रोकेंगे लोग,

न रुकूँगा  कभी मैं

मिटाना चाहें

कैसे मिटूँगा भला

खेत-क्यार में

अंकुर बनकर

उग जाऊँगा

शब्दों के सौरभ से

सींच-सींच मैं

फूल बन जाऊँगा

आँगन में आ

तुमको रिझाऊँगा

छूकर तुम्हें

गले लग जाऊँगा

दर्द भी पी जाऊँगा।

आलेखः युवा भारत का अमृत महोत्सव

– डॉ. जेन्नी शबनम

भारत की स्वतन्त्रता का 75वाँ साल इस वर्ष पूरा हुआ है। यूँ कहें कि साल 2022 आज़ादी के नाम है। आज़ादी के इस अमृत महोत्सव की तैयारी हर तरफ़ बहुत ज़ोर-शोर हुई। हर जगह ख़ुशहाली का माहौल है। हर एक व्यक्ति अपने-अपने तरीक़े से आज़ादी के इस पर्व को मना रहा है। देश की अधीनता, स्वतंत्रता-आंदोलन, स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान, हमारा इतिहास, आज़ादी के बाद देश के विकास में योगदान आदि चलचित्र की भाँति ज़ेहन में चल रहा है। हमारे लिए गर्व की बात है कि अधीनता से मुक्ति के समय के कुछ लोग अब भी हमारे बीच हैं और उनके सुनाए क़िस्से हममें जोश भर देते हैं। हर घर तिरंगा फहराने का जोश है।

देश की स्वतंत्रता के वर्ष की गिनती के अनुसार हमारा देश प्रौढ़ हो चुका है; लेकिन मेरा मानना है कि जबतक देश विकासशील अवस्था में था, तो देश बालक था। अब हम विकसित देश की श्रेणी में आ चुके हैं, तो हमारा देश युवा माना जाएगा। युवा-शक्ति देश की धरोहर है और देश को आगे बढ़ाने की ऊर्जा भी। देश का युवा बने रहना देश के युवाओं पर निर्भर करता है और देश कब तक युवा रहेगा यह हमारे युवाओं की कर्मठता पर निर्भर है।

जब हमें आज़ादी मिली, देश बहुत विकट परिस्थितियों से गुज़र रहा था। एक तरफ़ हुकूमत बदल रही थी, देश का विभाजन हो गया था, तो दूसरी तरफ़ दंगा शुरू हो गया। देश की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक स्थितियाँ अस्थिर थीं। जाति, धर्म, शिक्षा, प्रांत, भाषा, बोली आदि कई तरह के मसले से हमारा समाज टूट चुका था। समाज पूर्णतः विभाजित हो चुका था। ऐसे में उस समय पूरे देश को एकजुट कर विकास कार्य करना इतना सहज नहीं था; परन्तु हमारे राजनीतिज्ञों, समाज सेवियों, चिन्तकों, प्रबुद्ध वर्ग तथा युवाओं के कठिन प्रयास से देश की स्थिति बदली और आज हम आज़ादी का जश्न मन रहे हैं हैं।  

हमारे कर्मठ नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सम्मिलित प्रयास से देश की स्थिति सुधरी और हमारा देश विकासशील देश से विकसित देश की श्रेणी में आ गया। भारत पूरी तरह अब आत्मनिर्भर है। इन संघर्षों और सुधारों में हमारे बुज़ुर्ग नेताओं और समाज सेवियों के अलावा युवा-शक्ति का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। संघर्षशील पूर्वजों और बलिदानियों को विस्मृत न कर उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए कि संघर्ष और विपरीत समय में साहस को कैसे संगठित कर मानसिक सम्बल बनाया जाए और आगे बढ़ा जाए।

देश की सुरक्षा की मुहिम में हिस्सा लेना हो या बलिदान देना, फ़ौज़ में शामिल होकर देश की सेवा करनी हो या खेत-खलिहान से लेकर राजपथ तक युवाओं की भागीदारी अचम्भित करती है। सत्ता में हों या विपक्ष में, युवाओं के जोश में कहीं कमी नहीं दिखती है। शिक्षा, कला, खेल, राजनीति, व्यवसाय इत्यादि हर क्षेत्र में युवा बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं और देश का नाम स्थापित करते हैं। युवा-शक्ति को अगर सार्थक तरीके से देश के उत्थान में लगाया जाए, तो निःसंदेह भारत विश्वगुरु बन सकता है। हालाँकि कुछ राजनीतिक दल युवा-शक्ति का ग़लत तरीके से उपयोग कर भारत में अशांति और अराजकता फैला रहे हैं, जिसपर अंकुश लगाकर उन्हें सही दिशा देना हर एक भारतवासी का कर्त्तव्य है।

एक बात जो मेरे ज़ेहन में सदैव रहती है कि दर्द के सभी दंश को झेलते हुए आज़ादी में विस्थापित हुए परिवार ने ख़ुद को कितनी कठिनाई से सँभाला होगा। लोगों ने छोटा-से-छोटा काम कर अपने परिवार की देखभाल की होगी। जो कार्य कभी नहीं किया होगा वक़्त की विवशता ने वह काम भी कराया। मेहनत और हौसला के बल पर कई लोगों ने बाद में समृद्धि हासिल की; लेकिन मंज़िल पाने तक की राह कितनी कठिन रही होगी, इस बात की कल्पना ही हम कर सकते हैं। यह बात काबिले-ग़ौर है कि अगर हममें जज़्बा हो,  तो हम किसी भी परिस्थिति में संतुलित रहकर अपनी राह बनाते हैं और एक मुक़ाम हासिल कर सकते हैं।

नवम्बर 2017 में एक दिन मेरे मन में आया कि कुछ सामाजिक कार्य मैं पुनः प्रारम्भ करूँ, क्योंकि छात्र जीवन में मैं सक्रिय राजनीति में रह चुकी हूँ। लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर सब कुछ असंभव लगने लगा है। मन में विचार आया कि किसी गैर सरकारी संस्था से जुड़कर कुछ काम करूँ। कई संस्थाओं का पता चला। दिल्ली के सरिता विहार में एक ग़ैर सरकारी संस्था है जहाँ ई-मेल के द्वारा मेरी बात हुई और उन्होंने आकर उनका केंद्र देखने को कहा। हाँ, मुझे कोई कार्य तो वहाँ भी न मिला, जो वैतनिक हो, पर आश्वासन मिला कि अगर मेरे लायक कोई कार्य हुआ तो वे सूचित करेंगे। जब मैं वहाँ गई, तो उनके कार्य देखकर दंग रह गई। डोनेशन में मिले पुराने सामान का उपयोग और प्रयोग बहुत सार्थक रूप से किया जाता है। हर छोटे-से-छोटे बेकार सामान से बहुत सुन्दर और उपयोगी सामान तैयार होता है। मुझे बेहद सुखद आश्चर्य हुआ कि जिन चीज़ों को लोग बेकार समझकर फेंक देते हैं उससे न सिर्फ उपयोगी सामान बन रहा है, बल्कि देश के जिस हिस्से में जहाँ ज़रूरत हो वहाँ पहुँचाया भी जा रहा है।

मैं सोचने लगी कि अगर हमारे सोच का विस्तार हो तो समाज में बहुत से ऐसे कार्य हैं जो किए जा सकते हैं। कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं है। सूझ-बुझ की ज़रूरत है। न जाने ऐसी कितनी संस्थाएँ हैं, जो युवाओं के द्वारा संचालित हैं, जिससे समाज का कार्य भी हो रहा है और उससे जुड़े लोगों का जीवन यापन भी। सिलाई केंद्र, पशुपालन, शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्य, अलग-अलग तरह के व्यवसाय आदि में भारत का युवा बहुत बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता है।

एक दिन टी. वी. पर ख़बर देखी कि एक शिक्षित लड़की चाय का ठेला लगाकर हर दिन सैकड़ों रुपये कमा रही है। विदेश से शिक्षा प्राप्त नौजवान अपने गाँव में रहकर वैज्ञानिक तरीके से जैविक खेती कर रहा है। किसी ने कोचिंग सेंटर खोलकर न सिर्फ़ शिक्षा का प्रसार किया है;  बल्कि बड़ी कमाई करके उच्च वर्ग का जीवन जी रहा है। वेबसाइट के द्वारा मार्केटिंग, फ़ूड डिलीवरी, दवा या घर के सामान की होम डिलीवरी आदि जितने भी कार्य हैं लगभग सभी में युवा ही कार्य करते हैं।  एयरपोर्ट पर युवतियों के द्वारा अलग से टैक्सी चालन की व्यवस्था है।     

मुझे याद है जब मैं कॉलेज में पढ़ती थी, तब डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, सरकारी अधिकारी का पेशा अपनाने पर ज़ोर दिया जाता था। जो पढ़ाई में ज़ियादा अच्छा हो, उनसे उम्मीद रहती थी कि वे यू. पी. एस. सी. या राज्य प्रशासन या बैंक अधिकारी के पद पर ज़रूर पहुँचेंगे। धीरे-धीरे समय के बदलने और भूमंडलीकरण के बाद अन्य पेशा पर भी ध्यान गया। अब तो युवाओं द्वारा ऐसे- ऐसे कार्य हो रहे हैं, जिससे पैसा और शोहरत दोनों मिल रहा है। लोगों के सोचने का नज़रिया काफी बदल गया है। अब हर काम को इज़्ज़त के रूप में देखा जा रहा है। 

आज जब देश अपने युवावस्था में है, देश के युवाओं से उम्मीद बहुत बढ़ गई है। समाज के सरोकार से जुड़कर समय, शक्ति और संसाधनों का सही उपयोग कर देश को समृद्ध, सक्षम एवं शक्तिशाली बनाए रखने के लिए युवा-शक्ति को चिन्तनशील और कर्तव्यपरायण बनना होगा। तभी देश का वर्तमान और भविष्य जो युवा-शक्ति के हाथ में है, सुरक्षित रहेगा और विश्व के माथे पर भारत चाँद-सा चमकता रहेगा।

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