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Jan 1, 2022

लघुकथाः भविष्य में

- पवन शर्मा

वो एक छोटा-सा टपरीनुमा होटल है। साफ-सुथरा। भट्टी पर चाय उबल रही है। दो तरह का नमकीन और बिस्कुट के पैकेट काँच की बरनियों में बड़े करीने से रखे हुए हैं।

‘अभी कहाँ पोस्टिंग है तुम्हारे बेटे की?’ मैंने बात जारी रखी।

 ‘नाम तो याद नहीं, पर इंदौर के पास किसी तहसील में...वहाँ।’ उसने कहा। कोई अट्ठावन- साठ के बीच की उम्र होगी- मैंने सोचा।

‘तुमने खूब पढ़ाया-लिखाया अपने बेटे को... काबिल बनाया।’ जब वह मुझे चाय दे रहा था, तब मैंने कहा।

‘हाड़तोड़ मेहनत की थी उसने, पढ़ाई में अव्वल रहता।’ वह बोला, ‘वहाँ उसे सरकारी बंगला मिला है।’

‘बच्चे काबिल निकल जाएँ,  तो इससे बड़ी बात किसी माँ-बाप के लिए और क्या होगी।’

‘ये बात तो है बाबूजी। हमने भी उसे पढ़ाने-लिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी... हमने अपना पेट काट-काटके उसे पढ़ाया।’ वाला कह रहा है, ‘सारे इलाके में उसने हमारी मूँछें ऊँची कर दीं।’

‘अच्छा हुआ... अब तुम्हारी तकलीफें दूर होंगी।’ चाय पीते हुए मैंने कहा।

‘सब ऊपर वाले की मर्जी है।’

‘अब तुम्हें ये होटल का धंधा छोड़ देना चाहिए... बेटा तहसीलदार बन गया है!’ मैंने चाय का आखिरी घूँट भर कर खाली कप रख दिया।

‘ये नहीं हो सकता बाबूजी।’

‘तहसीलदार के पिता हो!’ मैं मुस्कुराया।

होटल वाला भी मुस्कुराया, ‘हमें हमारे हाल पे छोड़कर वह चलता बना, तब?’

‘नहीं, ऐसा नहीं होगा।’

‘मान लो बाबूजी, ऐसा ही हुआ तो?’

‘तब तो...’ मैं और कुछ बोलना चाह रहा था, पर लगा कि जुबान तालू से चिपक गई हो।

होटल वाला मुझे देखते हुए मंद-मंद मुस्करा रहा था।

सम्पर्कः विद्या भवन, वार्ड नंबर 17,  सुकरी चर्च, जुन्नारदेव- 480551, जिला- छिंदवाड़ा (म. प्र.), मो. 9425837079 / 8319714936, pawansharma7079@gmail.com

किताबें : भाव जगत को झंकृत करता; लम्हों का सफर

-डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

समीक्ष्य कृति- लम्हों का सफर, कवयित्री- डॉ. जेन्नी शबनम. पृष्ठ संख्या- 112, संस्करण-प्रथम 2020, मूल्य- ₹120/- प्रकाशक-हिन्द युग्म ब्लू,सी-31, सेक्टर 20, नोयडा (उ.प्र.)- 201301

 
    
डॉ. जेन्नी
शबनम की काव्य-कृति
'लम्हों का सफर'..संवेदनशील अनुभव-यात्रा को कविता में अभिव्यक्त करती हुई कृति है।सात शीर्षकों में विभक्त इस पुस्तक का हर शीर्षक जीवन का एक यादगार लम्हा है...एक एक लम्हे की अपनी कई कहानियाँ है,कवयित्री ने विविध लम्हों की विविधअनुभूतियों को बड़े सलीके से कविताओं में पिरोया है।

प्रथम खण्ड -'जा तुझे इश्क हो'की कविताएँ प्रेम की घनी अनुभूति की, प्रेम करने की,और प्रेम में होने की कविताएँ हैं।'प्रेम करने' में और 'प्रेम में होने' में बड़ा फ़र्क है,जो प्रेम में होता उसका समग्र व्यक्तित्व प्रेममय होता है,..'क्या बन सकोगे एक  इमरोज'.. में इमरोज के प्रेम के माध्यम से इसी भाव को बहुत खूबसूरती से व्यक्त किया गया है-'..ये उनका फ़लसफ़ा था/एक समर्पित पुरुष/जिसे स्त्री का प्रेमी भी पसन्द है/इसलिए कि वो प्रेम में है।'इसी खण्ड की कविता 'जा तुझे इश्क हो' में भाषा की व्यंजना चमत्कृत करती है शायद ही कभी किसी ने किसी को ये शाप दिया होगा कि 'जा तुझे इश्क हो'।

  दूसरे खण्ड 'अपनी कहूँ'- में कवयित्री ने अपनी उन अनुभूतियों/पीड़ाओं को अभिव्यक्ति दी है, जो निजी होते हुए भी प्रत्येक संवेदनशील मन की हैं,यथा 'मैं भी इंसान हूँ' कविता में हर नारी  मन की पीड़ा देखी जा सकती है-'मैं एक शब्द नहीं,

एहसास हूँ, अरमान हूँ/साँसें भरती हाड़-मांस की,मैं भी जीवित इंसान हूँ।'..'बाबा,आओ देखो!तुम्हारी बिटिया रोती है' -कविता में व्यक्त निजी पीड़ा भी हर उस व्यक्ति की है जिसने अल्प वयस में अपने पिता को खोया हो। इस खण्ड में प्रबल अतीत-मोह भी है, बड़ी होती हुई स्त्री बार-बार अतीत में लौटती है और वहाँ से स्मृतियों के कुछ पुष्प ले आती है।

   तीसरे खण्ड 'रिश्तों का कैनवास' की कविताएँ नितांत निजी रिश्तों के इर्द गिर्द बुनी गई हैं, पर ये 'निजी' होते हुए भी सभी को अपनी लगती हैं।'उनकी निशानी' सहेज कर रखी गई पिता की पुरानी चीजों की कविता है, इसमे बड़ी खूबसूरती से पिता को याद किया गया है।पिता के न रहने पर माँ की वेदना को 'माँ की अन्तः पीड़ा' में व्यक्त किया गया है।'इसी प्रकारअपने पुत्र एवं पुत्री के विविध जन्मदिवसों पर रची विविध कविताओं में कोरी भावाकुलता नहीं है; अपित कुछ उपदेश/शिक्षाएँ है जो हर युवा के जीवन-रण में संघर्ष के लिए अनिवार्य हैं।

   चौथे खण्ड 'आधा आसमान'- में समाज मे स्त्री की स्थिति/पीड़ा द्वंद्वों और वेदनाओं को स्वर मिले हैं। ये कविताएँ गम्भीर प्रश्न भी उपस्थित करती हैं।'मैं स्त्री हूँ' 'फॉर्मूला','झाँकती खिड़की',

'मर्द ने कहा','बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' इत्यादि नारी नियति और समाज के दुहरे मानदंडों की कविताएँ हैं।

    अगले खण्ड'साझे सरोकार'में सामाजिक विषमताओं और मूल्यहीनता की चिंताएँ हैं।' शोषण और शोषक के चरित्र, नैतिक मूल्यों के ह्रास की चिंता, वर्तमान के प्रति आक्रोश और विद्रोह भी कई कविताओं में देखा जा सकता है, 'भागलपुर दंगा' (24.10.1989)'कवयित्री के

जीवन में आए भयानक दुःस्वप्न की तरह है उसकी भयावहता को भी उन्होंने इस कविता में व्यक्त किया है। इसी पीड़ा को 'हवा अब खून-खून कहती है' कविता में भी देखा जा सकता है।

  संग्रह के छठवें खण्ड 'जिंदगी से कहा सुनी' तथा अंतिम सातवें खण्ड 'चिंतन'  की कविताएँ कहीं दार्शनिक भाव-बोध के प्रश्नों के उत्तर तलाशने की चेष्टा करती हैं तो कभी वैराग्य भाव और कभी अवसाद ग्रस्त होते मन के द्वंद्व को चित्रित करती हैं। गूढ़ विषयों के चयन और जटिल मनःस्थितियों के चित्रण के कारण इन कविताओं में उलझाव अधिक है सहजता कम,कुछ कविताओं के तो शीर्षक भी जटिल हैं, यथा- 'देह, अग्नि, और आत्मा...जाने कौन चिरायु','अज्ञात शून्यता',इत्यादि।

  समग्रतःभाव-जगत को झंकृत करते इस उत्कृष्ट संग्रह के एक अंश से ही अपनी बात को विराम देता हूँ- 'अपने-अपने लम्हों के सफ़र पर निकले हम/वक्त को हाज़िर नाज़िर मानकर/अपने हर लम्हे को यहाँ दफ़न करते हैं/चलो अब अपना सफ़र शुरू करते हैं।'

   Email. Shivji.sri@gmail.com

सेहत: हल्दी के औषधीय गुण

 - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

भारत के हर रसोईघर में पकने वाले भोजन में हल्दी किसी न किसी रूप में इस्तेमाल होती है। हमारे दैनिक भोजन में या तो कच्ची हल्दी या हल्दी पाउडर के रूप में डाली जाने वाली हल्दी में लगभग तीन प्रतिशत करक्यूमिन नामक सक्रिय घटक होता है। करक्यूमिन एक पॉलीफिनॉल डाइकिटोन है (यह स्टेरॉयड नहीं है)। शोधकर्ता बताते हैं कि हल्दी में पाइपेरीन नामक एक और घटक होता है, जो क्षारीय होता है। हमारी रसोई में उपयोग होने वाले एक अन्य मसाले, कालीमिर्च, के तीखेपन के लिए पाइपेरीन ही ज़िम्मेदार है। पाइपेरीन शरीर में करक्यूमिन का अवशोषण बढ़ाता है। यह हल्दी को उसके विभिन्न उपचारात्मक और सुरक्षात्मक गुण देता है।

हल्दी से भारतीय उपमहाद्वीप, पश्चिम एशिया, बर्मा, इंडोनेशिया और चीन के लोग 4000 से भी अधिक सालों से परिचित हैं। यह हमारे दैनिक भोजन का महत्त्वपूर्ण अंग है। सदियों से इसे एक औषधि के रूप में भी जाना जाता रहा है। इसमें जीवाणु-रोधी, शोथ-रोधी और एँ टी-ऑक्सीडेंट गुण होते हैं। हर्बल औषधि विशेषज्ञ हल्दी का उपयोग गठिया, जोड़ों की जकड़न और जोड़ों के दर्द के पीड़ादायक लक्षणों के उपचार में करते थे। उनका यह भी दावा रहा है कि हल्दी गुर्दे की गंभीर क्षति को ठीक करने में मदद करती है। इनमें से  कुछ दावों को नियंत्रित क्लीनिकल परीक्षण कर जांचने की आवश्यकता है।

https://www.healthline.com पर हल्दी और उसके उत्पादों के कुछ साक्ष्य-आधारित लाभों की सूची दी गई है, जिनका उल्लेख यहां आगे किया गया है। इन लाभों के अलावा, हल्दी का सक्रिय अणु करक्यूमिन एक शक्तिशाली शोथ-रोधी और एण्टी-ऑक्सीडेंट है; यह एक प्राकृतिक शोथ-रोधी है। लगातार बनी रहने वाली हल्की सूजन (शोथ) हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, और हृदय रोग और चयापचय सिंड्रोम को बढ़ावा देती है। शुक्र है कि करक्यूमिन रक्त-मस्तिष्क अवरोध को पार कर जाता है। (रक्त-मस्तिष्क अवरोध ऐसी कोशिकाओं की सघन परत है जो तय करती है कि रक्त में मौजूद कौन से अणु मस्तिष्क में जाएँगे और कौन से नहीं।) रक्त-मस्तिष्क अवरोध को पार करने की इसी क्षमता के चलते करक्यूमिन अल्ज़ाइमर के लिए ज़िम्मेदार एमीलॉइड प्लाक नामक अघुलनशील प्रोटीन गुच्छों के निर्माण को कम करता है या रोकता है। (हालाँकि

, इस संदर्भ में उपयुक्त जंतु मॉडल पर और मनुष्यों पर प्लेसिबो-आधारित अध्ययन की ज़रूरत है)। करक्यूमिन ब्रेन-डेराइव्ड न्यूरोट्रॉफिक फैक्टर (BDNF) को बढ़ावा देता है। BDNF एक ऐसा जीन है जो न्यूरॉन्स (तंत्रिका कोशिकाओं) को बढ़ाता है। BDNF को बढ़ावा देकर करक्यूमिन स्मृति और सीखने में मदद करता है। कुछ हर्बल औषधि विशेषज्ञों का कहना है कि यह कैंसर से भी बचा सकता है। कैंसर कोशिकाओं के मरने के साथ कैंसर का प्रसार कम होता है, और नई ट्यूमर कोशिकाओं का निर्माण रुक जाता है। गठिया और जोड़ों की सूजन में करक्यूमिन काफी प्रभावी पाया गया है। हर्बल औषधि चिकित्सक भी यही सुझाव देते आए हैं। यह अवसाद के इलाज में भी उपयोगी है। 60 लोगों पर 6 हफ्तों तक किए गए नियंत्रित अध्ययन में पाया गया है कि यदि अवसाद की आम दवाओं (जैसे प्रोज़ैक) को करक्यूमिन के साथ दिया जाए तो वे बेहतर असर करती हैं।

युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के गैरी स्मॉल और उनके साथियों का एक पेपर अमेरिकन जर्नल ऑफ जेरिएट्रिक साइकिएट्री में प्रकाशित हुआ है (doi: 10.1016/j.jagp.2017.10.10)। इस परीक्षण में शोधकर्ताओं ने 50 से 90 वर्ष की उम्र के 40 ऐसे वयस्कों पर अध्ययन किया जिन्हें भूलने की थोड़ी समस्या थी। उन्होंने 18 महीनों तक दिन में दो बार एक समूह को प्लेसिबो और दूसरे समूह को 90 मिलीग्राम करक्यूमिन दिया। अध्ययन की शुरुआत में और 18 महीने बाद सभी प्रतिभागियों का मानक आकलन परीक्षण किया गया, और उनके रक्त में करक्यूमिन का स्तर जांचा गया। इसके अलावा, अध्ययन के शुरू और 18 महीने बाद सभी प्रतिभागियों का पीईटी स्कैन भी किया गया, ताकि उनमें अघुलनशील एमीलॉइड प्लाक का स्तर पता लगाया जा सके। अध्ययन में पाया गया कि करक्यूमिन का दैनिक सेवन ऐसे लोगों में स्मृति और एकाग्रता में सुधार कर सकता है जो मनोभ्रंश से पीड़ित न हों।

हाल ही में, मुंबई के एक समूह ने काफी रोचक अध्ययन प्रकाशित किया है, जो बताता है कि हल्दी कोविड-19 के रोगियों के उपचार में मदद करती है। शोधकर्ताओं ने कोविड-19 के 40 रोगियों पर अध्ययन किया और पाया कि हल्दी रुग्णता और मृत्यु दर को काफी हद तक कम कर सकती है। के. एस. पवार और उनके साथियों का यह पेपर फ्रंटियर्स इन फार्मेकोलॉजी में प्रकाशित हुआ है जिसका शीर्षक है: कोविड-19 के सहायक उपचार के रूप में पाइपेरीन और करक्यूमिन का मुख से सेवन: एक रैंडम क्लीनिकल परीक्षण। इसे नेट पर पढ़ा जा सकता है। अध्ययन महाराष्ट्र के एक 30-बेड वाले कोविड-19 स्वास्थ्य केंद्र में किया गया था। लाक्षणिक कोविड-19 के सहायक उपचार के रूप में पाइपेरीन के साथ करक्यूमिन का सेवन रुग्णता और मृत्यु दर को काफी हद तक कम कर सकता है, और स्वास्थ्य तंत्र का बोझ कम कर सकता है। (वैसे बैंगलुरू स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के जी. पद्मनाभन द्वारा किए गए विस्तृत अध्ययन में पता चला है कि करक्यूमिन एक बढ़िया प्रतिरक्षा सहायक है)। यह वास्तव में एक उल्लेखनीय प्रगति है। इसे देश भर के केंद्रों में आज़माया जा सकता है जहाँ महामारी अभी भी बनी हुई है। (स्रोत फीचर्स)

दोहे: साल नया गुलजार हो

- डॉ. उपमा शर्मा

1.

नए वर्ष में लें सभी, मिलकर यह संकल्प।

लगन और परिश्रम का, दूजा नहीं विकल्प।

2.

मिटे कष्ट का कोहरा, खुशियाँ मिले सहर्ष

सौगातों की धूप से , भाये फिर नववर्ष।

3.

साल नया गुलजार हो, मिले सभी को प्यार।

मुख पर हो मुस्कान ही, कभी न मानो हार।

4.

आते- जाते हैं बरस, भूलो बीती बात।

नए वर्ष का आगमन, मिलें नई सौगात।

5.

जाने वाला साल भी, बाँट गया है प्यार।

आने वाले साल में, खुशियाँ मिलें अपार।

6.

नया वर्ष भाये तभी, कृपा करें करतार।

कोरोना की अब प्रभु , पड़े नहीं फिर मार।

7.

खट्टी- मीठी याद का, वर्ष गया यह बीत।

नए साल में बस बने, जीवन सुंदर गीत।

8.

अभिनन्दन नव वर्ष का, नया करो आगाज।

छूटे कोई भी नहीं, पूरे हों सब काज।

9.

नए वर्ष का आगमन, मिले खुशी भर थाल।

ऋद्धि-सिद्धि सुख संपदा, मंगलमय हो साल।

10.

नए साल में हर दिशा, छाया है उल्लास।

दुख की कभी न धूप हो, हर पल मिले उजास।

जीवन दर्शनः दयालु बनें

-विजय जोशी   ( पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

दया मानव को ईश्वर प्रदत्त श्रेष्ठ गुण है। दया ही वह गुण है जो हमारे सारे रिश्तों को परिभाषित करता है। उन्हें ठोस आधार प्रदान करते हुए स्थायित्व देता है। यह सभी जगहों पर हमारी स्थिति व स्वीकार्यता को स्थापित करता है। इसके अभाव में हम न तो जीवन को सही तरीके से जी सकते हैं और न ही इच्छित लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। आखिरकार किसी भी कार्य की सफलता के लिए हमें अपने सहयोगियों पर निर्भर तो होना ही पड़ता है और उसके लिए हृदय का विशाल होना नितांत आवश्यक है। साथियों की छोटी- मोटी गलतियों को नजरअंदाज करते हुए भूल जाने की प्रवृत्ति हमें तनाव रहित हो काम करने की कला सिखाती है। कठिन से कठिन परिस्थिति में भी वांछित सफलता प्राप्ति के मार्ग में बाधा की स्थिति में भी यही गुण हमें मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ रख सकता है।

द्वापर में कृष्ण से जुड़ा एक प्रसंग है। कौरवों और पांडवों की सेनाएँ आमने -सामने आ गई। शंख बजने लगे, घोड़े खुरों से जमीन खूँदने लगे और हाथी चिंघाड़ने लगे। कुरुक्षेत्र के समरांगण में सर्वनाश तैयारी पूरी हो चुकी थी। ठीक तभी एक टिटहरी का आर्तनाद गूँज उठा।

दोनों शिविरों के बीच एक छोटी_ सी टेकरी थी। उसकी खोल में उसका घोंसला था। उसकी आँखें अपने बच्चों की ओर लगी थीं और कान धनुषों की टंकार पर। उसे चिंता स्वजीवन की नहीं अपने बच्चों की थी और नि:सहाय पुकार के रूप में आकुल मातृत्व सारे घोंसले में बिखर गया था।

कृष्ण के कानों तक यह पुकार पहुँची। असंख्य वीरों की बलि और युद्ध के कोलाहल के बीच भी जिनकी बाँसुरी के स्वर कभी विचलित नहीं हुए थे, उन्हीं कृष्ण को इस टिटहरी के स्वर ने झकझोर डाला। वे दौड़े गए। एक पत्थर उठाकर घोंसले के द्वार पर सहेज दिया ओर वापस आकर अपना स्थान ग्रहण करते हुए सेनापति भीम से कहा - महावीर भीम, अब तुम युद्ध का बिगुल बजा सकते हो।

उपर्युक्त उदाहरण का संदर्भ यही है कि हम कठिन से कठिन परिस्थिति में भी ईश्वर प्रदत्त दयालुता के भाव का हृदय से लोप न होने दें। यह कठिनतम कर्म में रत होने की स्थिति में भी हमारे मन के कोमल भावों को पूरी तरह सहेज कर रखता है तथा हम अपनी आत्मा पर किसी भी प्रकार का अनावश्यक भार ढोने से बचे रहते हैं।

दया  धर्म  का  मूल है , पाप  मूल  अभिमान।

तब तक दया न छांड़िये, जब लौं घट में प्राण॥

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641, E-mail- v।joshi415@gmail।com