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Mar 5, 2021

उर्दू व्यंग्य- एक मुर्दे से बातचीत

 – अताउल हक कासमी ( कराँची )अनुवाद – अखतर अली
समोसा- चाय की चाह में मैं एक छोटे से मामूली होटल में दाखिल हुआ और सड़क की तरफ़ पीठ कर के एक टेबल पर बैठ गया। मेरी पीठ की तरफ़ जो सड़क थी उस पर लोगों का हुजूम जिनकी कोई मंज़िल नहीं थी भागा जा रहा था। टेबल पर पहले से बिखरे कप- प्लेट और ग्लास थे, टेबल साफ़ करने के लिए कहा तो एक गंदा सा लड़का आया और कप- प्लेट और ग्लास को लेकर सामने दरवाज़े की तरफ गया और दरवाज़े को एक लात मारी तो दरवाज़ा पूरा खुल गया। दरवाज़ा खुला तो मेरी नज़र दरवाज़े के पार गई, तो मेरे को वहाँ बहुत सी कब्रे नज़र आईं। मैं  समझ गया यह होटल कब्रस्तान की ज़मीन पर कब्ज़ा कर बनाई गई है। तभी मेरे ऑर्डर का समोसा और चाय मेरी टेबल पर आ चुका था और मैं समोसा खाते- खाते कब्रस्तान को देख रहा था।

तभी एक मुर्दा अपनी कब्र में से निकला और सीधा होटल के अंदर आकर मेरे सामने बैठ गया। मेरे को काँटों तो खून नहीं, मैं उसको ताज्जुब से देखने लगा। बात उसने ही शुरू की, और मेरे से कहा– प्लीज़ एक प्लेट समोसा मेरे लिए भी मँगवा दीजिये।

मैंने कहा– तुम तो मरे हुए हो तुम समोसा कैसे खा सकते हो, बेकार में मेरे पैसे बर्बाद मत करवाओ।

मेरी बात सुनकर मुर्दे को हँसी आ गई बोला– अगर मै मुर्दा हूँ तो तुम भी कौन जिंदा हो? यहाँ हर मरे हुए आदमी को यही ग़लतफ़हमी है कि वह जिंदा है।

मैंने कहा– आपका परिचय ?

मुर्दा बोला– परिचय जीवित आदमी का होता है, मरने के बाद सब की एक ही पहचान है बाडी, शेक्सपियर ने कहा है नाम में क्या रखा है फिर भी जब मैं जिंदा था तब मेरा एक नाम था ग़मगीन अंधेरपुरी, दोस्त मेरे को ग़मगीन ही कहा करते थे।

मैंने कहा– नाम तो तुम्हारा ग़मगीन है लेकिन बाते तो ज़िदादिली की करते हो।

उसने कहा– असल ज़िन्दगी में वही खुश है जिसे हम ग़मगीन समझते है।  

मैंने कहा– ग़मगीन साहब आप जब जिंदा थे तब क्या किया करते थे ?

उसने कहा– वही करता था जो अभी कर रहा हूँ यानि मुफ्त का माल खाया करता था।

मैंने कहा– फिर तो लोग आप को सख्त नापसंद करते होगे ?

मुर्दे को बुरा लग गया कहने लगा– कैसी बात कर रहे हैं आप, हमारी सोसायटी में तो उसे बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है जो दूसरे की खून- पसीने की कमाई खाते हैं। यहाँ तो सभी दूसरे की मेहनत का ही खा रहे हैं। ये जो बड़े- बड़े पूंजीपति हैं वो क्या मेहनत करते है ? नहीं उनके लिए मेहनत कोई और करता है और ये उसकी मेहनत की खाते है। मेरे को इस बात का बहुत दुःख है कि आपने मेरे लिए अच्छे शब्द इस्तेमाल नहीं किया।

मैंने कहा– अगर मेरी बात से आपका दिल दुखा है तो मैं माफ़ी चाहता हूँ।

मुर्दे ने कहा– माफ़ी- वाफ़ी छोड़िये आप तो मेरे लिए एक प्लेट समोसे का ऑर्डर कर दीजिये , दही में बना कर लाए, नमक मिर्ची तेज़।

मैंने मुर्दे के लिए समोसे का ऑर्डर दे दिया तो मुर्दे ने कहा– एक बार और ऑर्डर दीजिए, ताकि वो समझ जाये की ऑर्डर की पूर्ति भी करनी है, क्योंकि यहाँ सरकार जो आम जनता की सुविधाओं के लिए जब सामानों का ऑर्डर देती है तो साथ में एक ऐसा इशारा भी होता है कि ऑर्डर का माल सप्लाई नहीं करना। आम आदमी सरकार की जय- जय और सप्लायर को गाली देता रहता है।

मैंने कहा– आप मेरे ऑर्डर पर शक क्यों कर रहे है ?

उन्होंने कहा– शक करना निहायत ही ज़रूरी है, क्योंकि इस मुल्क की सरकार पिछले सत्तर सालों से लोगों को इसी तरह बेवकूफ़ बना रही है। माइक पर चिल्ला- चिल्ला कर घोषणा की जाती है पब्लिक के लिए रोटी और कपड़े का ऑर्डर दिया जा चुका है। मैं ज़मीन के ऊपर रोटी का इंतज़ार करते- करते ज़मीन के नीचे आ गया पर आज तक वो आर्डर वाले समान की सप्लाई नहीं हुई है।

तभी टेबल पर ऑर्डर किया गया दही में बना समोसा आ गया तो मैंने राहत की साँस ली, क्योंकि अपने शक से पूरी तरह मर चुके ग़मगीन ने मेरे को भी अधमरा कर दिया था।

मैंने बात आगे बढ़ाते हुए पूछा– यह बताइये इन दिनों आप लोगों यानि मुर्दों की दुनिया में क्या हो रहा है ?

मुर्दे ने कहा– इन दिनों हम हड़ताल पर हैं। 

मैं चौका– कब्र के अंदर आन्दोलन ? इसकी वजह क्या है ?

मुर्द्र ने कहा– आज कल मुर्दे को बिना कफ़न के ही दफ्न कर दिया जा रहा है।

मैंने ताज्जुब से कहा– तुम्हारी बात समझा नहीं।

मुर्दे ने कहा– मैंने कौन सा ग़ालिब की तरह फ़ारसी में शेर कह दिया जो आप समझे नहीं। बात ये है कि इन दिनों पाकिस्तान में इलेक्शन के दिन हैं। बाज़ार में जितना भी सफ़ेद कपड़ा था सब सियासी पार्टियों ने खरीद लिया है। अब बाज़ार में कफ़न तक के लिए सफ़ेद कपड़ा नहीं है। अगर कहो कि हमारे अब्बा का इन्तेकाल हो गया है हमको कफ़न के लिए कपड़ा दे दो तो हमें डाँटते हैं और कहते हैं– ये कोई मरने का वक्त है, तुम्हारे अब्बा को इतना भी नहीं मालूम की डेमोक्रेसी में एक- एक वोट की कीमत होती है, वोट देने के बाद नहीं मर सकते थे ? जाहिल- गँवार, मरने के लिए मरे जा रहे है, मानो आज नहीं मरेंगे तो फिर कभी मरेंगे ही नहीं, जानते हैं कि यहाँ कदम- कदम पर मरने के सामान मुहय्या हैं लेकिन क्या करें अवाम को सरकार पर भरोसा ही नहीं है। सफ़ेद कपड़े की किल्लत के कारण मुर्दे बिना कफ़न के दफ्न कर दिए जा रहे हैं।

मैंने कहा– यह वाकई परेशानी की बात है ?

मुर्दे ने कहा– परेशानी यहीं खत्म नहीं हो जाती है, असल परेशानी तो वे मुर्दे हैं जिन्हें चुनावी बैनर में लपेट कर दफना दिया गया है, अब वो पूरे कब्रस्तान में अपनी- अपनी पार्टी के झंडे और बैनर लिए घूम रहे हैं और इसके चलते पूरे कब्रिस्तान का मौहोल ख़राब हो रहा है।

मेरे को उस मुर्दे से हमदर्दी होने लगी और मैंने कहा– यह तो आप लोगों के साथ बहुत ज्यादती हो रही है। मैं आप लोगों की हड़ताल का समर्थन करता हूँ।

मुर्दे ने धन्यवाद देते हुए कहा– पहले हमारी पूरी समस्याएँ तो सुन लीजिए। बात यहीं खत्म नहीं हो गई। कब्रों के अंदर उन मुर्दों ने अपनी अलग पार्टी बना ली है जिन्हें उन्हीं कपड़ों में दफ्न कर दिया गया था जो उन्होंने मरते वक्त पहने थे, इनके फैशन शो ने अलग नाक में दम कर रखा है। कोई खान ड्रेस में है तो कोई कोर्ट पेंट में है, कोई कुरता पाजामा में है तो कोई लुंगी बनियान में है। एक साहब तो फटी चड्डी में धूम मचा रहे हैं, सोचिए ये कितने शर्म की बात है, आखिर इन कब्रों के अंदर निहायत ही शरीफ़ और पर्दानशी औरतें भी दफ्न हैं उनका तो ख्याल रखना चाहिए।

मैंने कहा– यह तो सच में बहुत ही खराब बात है, ऐसे लुच्चों को तो कब्र के बाहर कर देना चाहिए।

मुर्दे ने मेरी बात का समर्थन करते हुए कहा– बिलकुल ठीक कह रहे हैं आप, लेकिन इसके लिए वे मुर्दे तो ज़िम्मेदार नहीं हैं। असली ज़िम्मेदार तो वे जिंदा लोग हैं जिन्होंने उन्हें उन्ही कपड़ों में दफना दिया जो वे उस वक्त पहने थे।

मैंने कहा– ये बात भी दुरुस्त है, लेकिन उन ज़िन्दा लोगों के सामने ऐसी क्या मज़बूरी थी जो उन्हें उसी कपड़ों में दफन कर दिया, जो उन्होंने मरते वक्त पहने थे ?

मुर्दे ने रहस्य की बात बताई– ये सब दंगे में मारे गए लोग हैं। आप तो जानते हैं अपने यहाँ के दंगे कितने हाई टेक होते हैं। मिनटों में सैकड़ों लाशें बिछ जाती हैं, अब इतने मरे लोगों का हिसाब कौन रखे सो उन्हें फटाफट जो जिस हाल में है उसे वैसे के वैसे दफना कर मामला रफ़ा दफ़ा कर दिया जाता है।

मुर्दे के मुँह से यह रहस्य सुन कर मैं तो हक्का- बक्का रह गया। मैंने जानना चाहा ये जिस दंगे में मारे गए हैं उन दंगों की वजह क्या थी ?

मेरे सामान्य ज्ञान पर मुर्दे को हँसी आ गई, कहने लगा– पिछले दस सालों में हमने दंगों में कई रिकार्ड कायम किये है, दंगों के मामले में हम अब इतने सक्षम हो चुके हैं कि अब हम दंगे के लिए किसी वजह के मोहताज नहीं है, हम दंगे रच देते हैं अब यह आपका काम है कि आप उसमें क्या वजह जोड़ते हैं। यहाँ अक्सर दंगे इस वजह से भी हो जाते हैं कि बहुत दिनों से हुए नहीं हैं। दंगा हमारा अघोषित राष्ट्रीय खेल है, हमारे यहाँ दंगो के एक से बढ़कर एक कलात्मक किस्में हैं। दंगा प्रशिक्षण केन्द्र  , दंगों के आधुनिक तरीके, दंगों के बाद स्थति पर नियंत्रण, ये सब हमारी वे किताबें हैं जिसे बेस्ट सेलर कहा गया है।

उस मर चुके आदमी ने मेरे जनरल नॉलेज को काफी बढ़ा दिया था। मैंने उसका सफ़ेद झक कफ़न देख कर कहा– आपको तो कफ़न नसीब हुआ है।

उस मुर्दे ने मेरी बात सुनी तो उसकी आँख में आँसू आ गए, उसने कहा – आपने मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया है। मेरी दर्द भरी कहानी सुनोगे तो आप रो पड़ेंगे, इतना कह कर वह सिसक -सिसक कर रोने लगा।

मैंने उसको हिम्मत देते हुए कहा– मेरे को बताओ तुम्हारे साथ क्या अत्याचार हुआ है ? बताने से दुःख कम होता है।

उसने कहा– मेरे को अच्छे से याद है मेरे घर वालों ने मेरे को गुस्लो- कफन के साथ रोते- रोते दफ़न किया था, लेकिन उनके पलटते ही कफ़न-चोरों ने मेरी कब्र खोद मेरा नया कफ़न चोरी कर लिया।

मैं चौका– क्या इस मुल्क में कफ़न भी चोरी हो जाते हैं ?

मुर्दे ने कहा– ये शराब की लत जो कराए कम है। बस तब से कब्र में नंगा पड़ा हुआ हूँ। ये जो आप मेरे बदन पर देख रहे हैं ये मेरा कफ़न नहीं है, मैं पड़ोस वाले मुर्दे से थोड़ी देर के लिए उधार माँग कर लाया हूँ। वहाँ सबको अपना कफ़न प्यारा है, जल्दी से कोई किसी को अपना कफ़न देता नहीं है। इसने भी रात को बढ़िया चम्पी मालिश के वादे पर अपना कफ़न दिया है और कहा है कि जल्दी आ जाना क्योंकि अगर इस दरम्यान फ़रिश्ते हिसाब करने आ गए तो बहुत शर्मिंदगी हो जाएगी

अब तक ग़मगीन अन्धेरपुरी ने समोसा- चाट चट कर लिया था, मैंने भी चाय- समोसा खत्म कर अब उनसे इजाज़त लेना चाहा तो उसने कहा–आप से कुछ कहना था।

मैंने कहा– हाँ कहिये।

मुर्दे ने झिझकते हुए कहा– मेरे को एक हज़ार रुपये उधार चाहिए थे।

मैंने कहा– कब्र के अंदर एक हज़ार रुपये का करोगे क्या ?

मुर्दे ने सीना तान कर कहा– अपने लिए नया कफ़न खरीदूँगा। दो दिन पहले ही मोहम्मद हुसैन कपड़े वाला मर कर इसी कब्रस्तान में शिफ्ट किये गए हैं, वो अपने साथ सफ़ेद कपड़े के तीन चार थान भी लेते आए हैं अब कब्र में कफ़न की ब्लेक मार्केटिंग कर रहे हैं।

मैं तो उसकी बात सुन कर सन्न रह गया– कब्र में भी ब्लेक मार्केटिंग ?

मुर्दे ने कहा– इस ब्लेक मार्केटिंग में है ही इतना मज़ा की इसके लिए इंसान मरने के लिए भी तैयार है।

मैंने उस मुर्दे को एक हज़ार रूपये देते हुए कहा– इसे वापस कैसे करोगे ?

उसने कहा– एक न एक दिन तो आपको भी ये जहाँ छोड़ कर हमारी दुनिया में आना ही है, जिस दिन आएँगे हिसाब कर लेंगे।

मैं और कुछ कहता तभी ग़मगीन अन्धेरपुरी वहाँ से गायब हो चुके थे। कब्रिस्तान का दरवाज़ा उसी तरह खुला हुआ था। अब मैंने अपनी पीठ घुमाकर अपना मुँह सड़क की तरफ कर लिया था जहाँ सैकड़ों लोग तेज़ी सी अनजानी मंज़िल की तरफ भागे जा रहे थे।

सम्पर्कः निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल, आमानाका, रायपुर, मो.न. 9826126781, Email – akhterspritwala@gmail.com

लघु व्यंग्यः कच्चा माल

-महेश राजा

 इधर हमारे एक लेखक मित्र इसलिए परेशान थे कि उन्हें अपनी लघुकथाओं के लिये कच्चा माल नहीं मिल रहा था, अपने आपको वरिष्ठ और लघुकथा के क्षेत्र मे स्थापित कथाकार मानने वाले मित्र ने हमसे कहा-भाई राजा, तुम अपनी लघुकथाओं के लिये कच्चा माल कहाँ से भिड़ाते हो? कोई ईमानदार कच्चे माल का सप्लायर हो तो हमें भी उसका पता बताओ....पत्र पत्रिकाओं के ढेर सारे पते हमारे पास है, लेकिन किसी कच्चे माल वाले का पता मिल जाए, तो हम पचीस- पचास लघुकथाएँ रगड़ कर भेज दे... कुछ पैसे तो बन ही जाएँगे।

      मैंने कहा- लघुकथा के क्षेत्र मे आप इतने कच्चे तो नहीं है कि आपको कच्चे माल का शार्टेज पड़ जाये...जिधर हाथ मारेंगे वहीं से दो तीन लघुकथाओं के लायक मिट्टी निकाल लेंगे।

      वह बोले,याने कि तुम हम पर तंज कस रहे हो....कच्चे माल का मतलब तो हम भी समझते है...ये कोई मिट्टी या कोयला नहीं है....नहीं बताना है तो मत बताओ यार, लेकिन टॉण्ट तो मत मारो।

      मैंने कहा- इसे आप टांट समझ रहे हैं, तो इसे ही कच्चा माल समझ कर दो चार लघुकथाएँ  बना डालिये... मैं तो आपके वरिष्ठ होने के सम्मान में ही ऐसी बात कर रहा हूँ कि जब आप जैसे वरिष्ठ लघुकथाकार को कच्चे माल कीशॉर्टेज पड़ जाएगी, तो हम जैसे छोटे लघुकथाकार कहाँ जाएँगे।

     जब मैंने उनके सामने स्वयं को छोटा कहा ,तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता झलकने लगी। उनकी यह आदत है कि वह अपने सामने हर कथाकार को छोटा ही समझते हैं।

    उन्होंने बहुत जिद की तो मैने उन्हें टालने के लिये अपने एक मित्र का पता दे दिया। दूसरे दिन वह उसके पास पहुँच गए कच्चा माल लेने।

      मित्र मुँहफट थे, बोले,-आजादी के बाद भी आपको  लघुकथा लेखन के लिये कच्चा माल तलाशना पड़ रहा है....यह तो लघुकथा साहित्य का दुर्भाग्य है..। आजाद देश की इस उर्वरा भूमि आपके भार से नतमस्तक है। इतनी विसंगतियों के बावजूद भी आपको कच्चा माल नहीं मिल रहा हो तो आप मेहरबानी कर लघुकथाएँ लिखना बंद कर मोमबत्ती बनाना शुरु कर दीजिए,फिर आपको कच्चे माल की चिंता नहीं रहेगी।..

सम्पर्कः वसंत 51, कालेज रोड, महासमुंद छत्तीसगढ़

सूचना एवं संचार टेक्नॉलॉजी के प्रमुख पड़ाव

-डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

जिन दिनों मैं स्कूल में पढ़ा करता था उन दिनों कम्प्यूटर एक गैराज के बराबर जगह घेरने वाली मशीन थे, जिनका उपयोग सिर्फ इंजीनियर करते थे। और अब 50 वर्षों बाद, मैं और 50 करोड़ अन्य भारतीय मोबाइल स्मार्ट फोन के रूप में इसे अपनी जेब में रख सकते हैं! यह क्रांति कैसे हुई?

क्या आप जानते हैं कि सूचना एवं संचार टेक्नॉलॉजी (या आईसीटी) के ये महत्त्वपूर्ण आविष्कार किसने किए? हाल ही में वी. राजारामन द्वारा लिखी गई एक उल्लेखनीय सूचनाप्रद और शिक्षाप्रद पुस्तक का विषय यही है। राजारामन बैंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के सुपरकम्प्यूटर एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर में पढ़ाते थे। उनकी यह किताब पीएचआई लर्निंग, दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई है।

इस किताब में प्रो. राजारामन ने 15 उन महत्त्वपूर्ण आविष्कारों और आविष्कारकों का इतिहास बताया है, जिनसे छोटे, द्रुत, बहु-उपयोगी कंप्यूटर बनाना संभव हुआ। मुझे लगता है कि अब जब कम्प्यूटर आधारित शिक्षा नई शिक्षा नीति (एनईपी) का हिस्सा बन गई है, तो यह महत्त्वपूर्ण है कि छात्र और शिक्षक इन 15 आविष्कारों और आविष्कारकों की कहानी ना केवल इन आविष्कारों के इतिहास और विकास के रूप में पढ़ें बल्कि इन्हें प्रेरणा के रूप में भी देखें।

प्रो. राजारमन के अनुसार किसी भी आविष्कार में कुछ ज़रूरी गुण होने चाहिए:

1. आइडिया नया होना चाहिए;  

2. वह किसी ज़रूरत को पूरा करे;

3. उत्पादकता में सुधार हो;

4. कम्प्यूटिंग के तरीके और कंप्यूटर के उपयोग में बदलाव आए;

5. इससे नवाचार हो;

6. आविष्कार लंबे समय के लिए हो, निरंतर उपयोग किया जाए और क्षणिक न हो;

7. इसे ऐसे नए उद्योगों को जन्म देना चाहिए जो आगे चलकर नवाचार करें और इस प्रक्रिया में कुछ पुराने उद्योग में शायद ठप हों;

8. इनसे हमारी जीवन शैली में बदलाव होना चाहिए, परिणामस्वरूप सामाजिक परिवर्तन होना चाहिए।

यह ज़रूरी नहीं है कि एक बेहतरीन आविष्कार इन सभी बिंदुओं को पूरा करे, इनमें से अधिकांश बिंदुओं को पूरा करना पर्याप्त होगा।

दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई आविष्कार पिछले 55 वर्षों के दौरान हुए हैं - 1957 में बनी कम्प्यूटर भाषा FORTRAN से लेकर 2011 की डीप लर्निंग तक। इस किताब में आविष्कारों का संक्षिप्त इतिहास, उनका विवरण और आविष्कारकों के बारे में बताया गया है। इस लेख में हम इन नवाचारों में से पहले सात नवाचार देखेंगे, और बाकी सात अगले लेख में।

इनमें पहला नवाचार है कंप्यूटर भाषा FORTRAN या फॉर्मूला ट्रांसलेशन, जो वर्ष 1957 में जॉन बैकस और उनकी टीम द्वारा विकसित की गई थी। यह डिजिटल कंप्यूटरों की बाइनरी भाषा (दो अंकों - 0 और 1 - पर आधारित भाषा) को हमारे द्वारा समझी और उपयोग की जाने वाली भाषा में बदलती है। शुरुआत में इसका उपयोग आईबीएम कम्प्यूटर और बाद में अन्य कम्प्यूटर में भी किया गया। मुझे याद है, आईआईटी कानपुर में प्रो. राजारामन ने किस तरह हम सभी छात्रों और शिक्षकों (और अन्य कई लाख लोगों को अपने व्याख्यानों और पुस्तकों के माध्यम से)  FORTRAN सिखाई थी। FORTRAN ने गैर-पेशेवर लोगों के लिए भी कम्प्यूटर का उपयोग संभव बनाया - प्रोग्रामिंग करने और समस्या-समाधान करने में। अन्य लोगों ने विशेष उपयोग के लिए इसी तरह की अन्य प्रोग्रामिंग भाषाएँ बनार्इं लेकिन वैज्ञानिक आज भी FORTRAN उपयोग करते हैं।

दूसरा है, एकीकृत परिपथ (इंटीग्रटेड सर्किट या आईसी)। जब आईसी का आविष्कार नहीं हुआ था तब वैक्यूम ट्यूब की मदद से संकेतों की तीव्रता बढ़ाई जाती थी यानी उन्हें परिवर्धित किया जाता था। ये वैक्यूम ट्यूब बड़े होते थे और उपयोग करने पर गर्म हो जाते थे। 1947 में जब जॉन बार्डीन और उनके साथियों ने ट्रांज़िस्टर का आविष्कार किया तो ये परिवर्धक छोटे हो गए और इनकी बिजली खपत कम हो गई।

इस कार्य ने सूचना प्रौद्योगिकी में क्रांति ला दी। इनकी मदद से जैक किल्बी (और कुछ महीनों बाद रॉबर्ट नॉयस) ने एक सिलिकॉन चिप पर पूर्णत: एकीकृत जटिल इलेक्ट्रॉनिक परिपथ बनाकर दिखा दिया।

किताब में ल्लिखित तीसरा नवाचार है, डैटाबेस और उसका व्यवस्थित रूप में प्रबंधन। उदाहरण के लिए, हमारे आधार कार्ड में कई तरह का डैटा (उम्र, लिंग, पता, फिंगरप्रिंट वगैरह) होता है, जिसे एक साथ संक्षिप्त रूप में रखा जाता है। इस तरह की डैटाबेस प्रणाली को रिलेशनल डैटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम या RDBMS कहते हैं। पहले इन फाइलों को मैग्नेटिक टेप में संग्रहित किया जाता था, फिर फ्लॉपी डिस्क आर्इं, और अब सीडी और पेन ड्राइव हैं।

चौथा नवाचार है, लोकल एरिया नेटवर्क (या LAN)। इससे पहला परिचय हवाई के नॉर्मन अब्रेमसन समूह ने करवाया था। उन्होंने पूरे द्वीप के कंप्यूटर्स को आपस में जोड़ने के लिए ALOHA net नामक बेतार प्रसारण प्रणाली (वायरलेस ब्रॉडकास्ट सिस्टम) का उपयोग किया था। बाद में रॉबर्ट मेटकाफ और डेविड बोग्स ने इस प्रोटोकॉल में कुछ तब्दीलियाँ कीं और इसे ईथरनेट कहा गया। इससे केबल कनेक्शन के माध्यम से कंप्यूटर्स के बीच संदेश और फाइलों को साझा करना और उनका आदान-प्रदान संभव हुआ। अब हम, कार्यालयों में LAN का उपयोग हार्ड-कॉपी को ई-फाइल में बदलने के लिए, और विश्वविद्यालय में विभिन्न विभागों के कंप्यूटर्स को आपस में जोड़ने जैसे कामों के लिए करते हैं।

पाँचवाँ नवाचार है, निजी या पर्सनल कम्प्यूटर (पीसी) का विकास। इसने घर से काम करना और पढ़ना संभव बनाया है। पीसी डिज़ाइन करने वाले पहले व्यक्ति थे स्टीव वोज़नियाक जिन्होंने 1970 के दशक में इसे बनाया था, और स्टीव जॉब्स ने इसका शानदार बाज़ारीकरण किया था। 1981 तक पीसी समोसे-कचोड़ियों की तरह बज़ार में बिकने लगे और 1980 के दशक के अंत तक, ऐपल, आईबीएम और अन्य कंपनियाँ माइक्रोसॉफ्ट ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ बाज़ार पर छा गर्इं।

हमें अपना फोन या कम्प्यूटर खोलने के लिए एक पासकोड चाहिए होता है, जो सुरक्षित होता है और सिर्फ हमें पता होता है। जब कोई प्रेषक या बैंक हमें गोपनीय संदेश भेजते हैं तो वे एक सुरक्षित पासकोड (जैसे, ओटीपी) भी भेजते हैं। यह कूटलेखन प्रेषक और रिसीवर के संदेशों की गोपनीयता बनाए रखता है। यह सार्वजनिक कुंजी कूटलेखन छठा नवाचार है।

हमारे कम्प्यूटर में अब एक बिल्ट-इन प्रोग्राम है जिससे आप तस्वीरें, वीडियो ले सकते हैं और व्हाट्सएप, फेसटाइम या इसी तरह की अन्य ऐप्लिकेशन के ज़रिए इन्हें भेज सकते हैं। यह कम्प्यूटर ग्राफिक्स नामक सातवें नवाचार से संभव हो सका है। प्रो. राजारामन ने इसके बारे में विस्तार से बताया है। इसके अलावा, उन्होंने मल्टीमीडिया डैटा के संक्षेपण के बारे में भी बताया है जिसने इंटरनेट पर ऑडियो-वीडियो का आदान-प्रदान संभव किया। (स्रोत फीचर्स)

प्रेरक- बेहतर और उपयोगी जीवन जीने के 7 सिद्धांत

-निशांत

जब कोई दुख गहराता है तो हम अक्सर फ़िलोसॉफ़िकल हो जाते हैं। ‘जीवन क्या है? हम यहां क्या करने के लिए आए हैं?’

क्या आप भी ऐसी ही बातें करते हैं?

कितना अच्छा होता हम अपने रचयिता को एक कॉल करके उससे पूछ सकते, ‘जीवन क्या है? इसका उद्देश्य क्या है?’

लेकिन इन प्रश्नों का उत्तर हमें खुद ही ढूँढना पड़ता है। एक अहम बात जो मैंने सीखी है वह यह है कि जीने का कोई सटीक सही या गलत तरीका नहीं है।

लेकिन कुछ ऐसे सार्वभौमिक सिद्धांत होते हैं जिनका हमें ज्ञान होना चाहिए। हमारी समस्या यह है कि हम घटनाओं और परिस्थितियों के लिए प्रतिक्रिया उस रूप में नहीं करते जैसी करनी चाहिए।

ऐसे में ही जब कुछ वर्ष पहले मैं एक निजी संकटकाल से गुज़र रहा था तब मैंने खुद से पूछा: ऐसी कौन सी चीज हैं जिनके बारे में लोग बातें बहुत करते हैं लेकिन कुछ करते नहीं हैं?

मेरे मन में जो बिंदु सामने जो आए उन्हें मैं अपने 7 निजी सिद्धांत कहता हूँ। तब से ही मैं अपना जीवन इन 7 सिद्धांतों के अनुसार जी रहा हूँ। वे सिद्धांत ये हैं:

1. दर्द से गुज़रे बिना हम ग्रो नहीं करते

कभी-कभी हम बहुत क्रेज़ी तरह के काम करने की बातें करते हैं। पहाड़ चढ़ना, मैराथन दौड़ना, स्काई-डाइविंग, स्टार्टअप बनाना, दुनिया घूमना, किताब लिखना, फ़िल्म बनाना- इसी तरह के बहुत से काम हमारी लिस्ट में शामिल होते हैं।

जिन कामों को हम अपनी ज़िंदगी में आगे कभी करने का सोचते हैं उनके लिए अंग्रेजी में एक एक्सप्रेशन इस्तेमाल किया जाता है जिसे ‘bucket list’ कहा जाता है। आपकी भी कोई बकेट लिस्ट होगी। उसपर एक निगाह डालिए और मेरे एक प्रश्न का उत्तर दीजिए। आपने वे सब काम अभी तक क्यों नहीं किए हैं?

इसका उत्तर लगभग हमेशा ही यह होता है: यह बहुत मुश्किल है।

लेकिन यहाँ मैं आपको यह बताना ज़रूरी समझता हूं कि जीवन सरल होने के लिए बना ही नहीं है। यह मेरा सीखा सबसे अनमोल सबक है।

कठिन चीजों से मुँह मत फेरिए। इसके उलट स्वयं को ऐसा व्यक्ति बनाइए जो हर तरह की कठिनाइयों को झेल सके। शारीरिक भी और मानसिक भी।

यह कोई घिसी-पिटी किताबी बात नहीं है। यह 100% सत्य है कि टूटे बिना हम जुड़ नहीं सकते, गिरे बिना हम उठ नहीं सकते, कष्ट झेले बिना हम रोगमुक्त नहीं सकते।

यदि हम अपनी मांसपेशियों को उनकी सीमाओं तक इस्तेमाल नहीं करते हैं तो हमारे हाथ-पैर कमजोर हो जाते हैं। यदि हम अपने मस्तिष्क को झकझोरते नहीं हैं तो हमारी मानसिक शक्तियों का क्षय होने लगता है। यदि हम अपने चरित्र का परीक्षण नहीं करते हैं तो हम रीढ़-हीन हो जाते हैं।

2. नकारात्मकता को हर कीमत पर दूर रखिए

इस बात को हर व्यक्ति जानता है लेकिन शायद ही कोई इसे अपने जीवन में पूरी तरह से लागू कर पाता है।

लोग अपने घर, ऑफ़िस, परिवार और दोस्तों के साथ नकारात्मक वातावरण में रहते हैं।

इसमें कुछ भी अजीब नहीं है क्योंकि निगेटिविटी जीवन के हर क्षेत्र में इतनी व्यापक हो गई है कि इसकी उपस्तिथि सामान्य और स्वीकार्य हो गई है। यह एक स्थापित वैज्ञानिक तथ्य है कि लोग मूलतः नकारात्मक प्रवृत्ति के होते हैं और नकारात्मकता का प्रभाव और प्रसार अधिक प्रबलता से होता है।

यही कारण है कि दुनिया में लोग बहुत अधिक शिकायतें करते हैं, झूठ बोलते हैं, आरोप लगाते हैं, धोखा देते हैं, ईर्ष्या करते हैं, लोगों को झुकाते-दबाते हैं।

यह सारी नकारात्मकता और नकारात्मक चीजें हमें शारीरिक और मानसिक विकास व समृद्धि से दूर रखती है। आप नकारात्मकता को अपने करीब क्यों आने देते हैं?

आप ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि मनुष्य होने के नाते आप व्यक्तियों से भलाई की उम्मीद करते हैं। आप उनमें यकीन करते हैं:

  • उसकी नीयत साफ़ है।
  • वह आइंदा ऐसा नहीं करेगी।
  • वह मुझे चोट नहीं पहुँचाना चाहता था।
  • आगे सब ठीक हो जाएगा।

आपको पता है कि आप लोगों को नहीं बदल सकते। तो फिर आप इसके लिए प्रयास क्यों करते हैं? लोग तभी बदलेंगे जब वे बदलना चाहेंगे।

नकारात्मकता को दूर रखिए। हर कीमत पर दूर रखिए।

3. आप जितना लेते हैं उससे अधिक दूसरों को दीजिए

जब आप छोटे बच्चे थे तब आपका पूरा ध्यान रखा जाता था। आपके माता-पिता आपके भोजन और सुरक्षा का प्रबंध करते थे, और यदि आप भाग्यशाली थे तो आपसे बहुत प्रेम भी करते थे। यदि आपका बचपन खुशहाल नहीं भी था तो भी उन्होंने आपको शिक्षा दिलाई और बीमार होने पर इलाज़ करवाया।

यह भी आपको पढ़ने में अजीब लगेगा लेकिन हमारे मन में तभी से वस्तुओं को लेने की प्रवृत्ति घर कर गई है जो हमारी युवावस्था तक चली आई है। हमें लगता है कि हम जितना चाहें उतना ले सकते हैं और हमें सब कुछ मिलना ही चाहिए।

बहुत वर्षों तक मैं भी इसी पैटर्न पर सोचता था। आज मैं पलट कर देखता हूँ तो पाता हूं कि वह मेरी मूढ़ता थी। मैं कुछ भी पाने का हकदार नहीं था।

कौन कहता है कि आपको वह नौकरी मिलनी चाहिए जिसके लिए आपने आवेदन किया? या वह प्रमोशन जिसके लिए आप लालायित थे? या क्लास की वह खूबसूरत लड़की या सबसे स्मार्ट लड़के की नज़दीकी? या बेजोड़ सफलता?

बजाए यह सोचने के कि आप दुनिया से कितना ज्यादा ले सकते हो, आप यह सोचना शुरु करो कि आपके पास देने के लिए क्या है।

ज़िंदगी सब कुछ प्राप्त कर लेने का नाम नहीं है। इसके विपरीत करके देखिए और लोगों की मदद कीजिए, उन्हें वह दीजिए जिसकी वे आपसे अपेक्षा करते हैं और आप पाएँगे कि आपको और अधिक मिलता है।

दूसरों की सहायता करना, उनका मार्गदर्शन करना, उनके भविष्य को सुधारने का काम ही एकमात्र वह काम हो सकता है जिसके लिए लोग आपको हमेशा याद रखेंगे।

4. समय सबसे अधिक मूल्यवान है

विश्व के सभी संसाधनों में से केवल समय ही वह संसाधन है जो हमारे लिए सबसे अधिक सीमित है और सबसे अधिक मूल्यवान है।

यह बात आप जानते हैं। समय के महत्त्व के बारे में हमें बचपन से ही समझाया जाता है। पूरे जीवनकाल में हमारे समय का एक-तिहाई भाग सोने में बीत जाता है और शेष भाग में ही हम कुछ सार्थक कर सकते हैं।

लेकिन लोग अपना समय इस प्रकार बिताते हैं जैसे उनके पास इसकी असीम मात्रा हो। हम यह क्यों नहीं समझ पाते कि जीवन अनिश्चित है और कभी भी कुछ भी घट सकता है?

क्या आपके मन में यह विचार कभी नहीं आता कि हमारे पास कुछ महत्त्वपूर्ण करने के लिए बहुत अधिक समय नहीं है? यदि हम मनुष्य की औसत आयु 80 वर्ष मान लें तो हमारे पास कितना समय बचा है? जितना भी शेष हो, उसे व्यर्थ बिताने में कोई सार नहीं है।

आपको अपने समय को लेकर बहुत सेलेक्टिव होना चाहिए। किसी भी ज़रूरी काम को यह सोचकर कल पर नहीं टालिए कि आप उसे जब चाहे तब कर लेंगे। यदि आप अपनी सेहत या धन गंवा दें तो उसकी भरपाई की जा सकती है लेकिन अवसरों को हाथ से निकल जाने की भरपाई नहीं की जा सकती। बीत चुका समय कभी वापस नहीं आता।

जो समय बीत जाता है वह हमेशा के लिए अनुपलब्ध हो जाता है। उसका 100% लॉस हो जाता है।

5. अपने मार्ग का निर्माण स्वयं कीजिए

हम सफल व्यक्तियों को अनुकरणीय उदाहरण मानकर उनकी ओर देखते हैं। हम अपने पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त, बॉस, शिक्षक, मेंटर, और प्रसिद्ध लेखक, कलाकार, आंत्रपेन्यूर, लीडर, व बिजनेसमेन आदि से किसी-न-किसी रूप में प्रभावित होते हैं और उनके जैसा बनना चाहते हैं।

मैंने भी अतीत में यह किया है। अभी भी मैं कुछ लोगों जैसा बनना चाहता हूँ। दूसरों से सीखना जीवन में उन्नति करने का सबसे अच्छा उपाय है। दूसरे से सीखने के लायबक बनना भी बहुत बड़ा गुण है। इसके लिए अपने अहंकार को पीछे छोड़ना पड़ता है।

लेकिन इसमें एक समस्या है–  आप वे सभी व्यक्ति नहीं हैं। वे अलग हैं और आप अलग हो। उनका जीवन और उनकी सफलता उनकी अपनी है। वह आपका जीवन नहीं हो सकता।

ऐसे में आपके बस एक ही चीज़ बचती है: वह यह कि आप उनकी राह पर नहीं चलो। आप अपनी राह स्वयं बनाओ।

दूसरों की बनाई राह पर चलना बहुत आसान होता है। आपको यह पता होता है कि उन्होंने किन अवरोधों और कठिनाइयों का सामना किया। लेकिन यह आपको परिपूर्णता की अनुभूति नहीं कराता। परिपूर्णता की अनुभूति का होना मनुष्य के लिए हर तरह की सुख-सुविधा, स्टेटस, और बहुत अधिक धन पास में होने से भी बड़ी उपलब्धि है।

इसीलिए मैं नवयुवकों से हमेशा यह कहता हूं कि उन्हें अनजान राहों पर चलने और उन कामों को करने से परहेज़ नहीं करना चाहिए जिन्हें कोई भी करने के लिए तैयार नहीं होता। उन्हें वहाँ जाना चाहिए जहाँ कोई नहीं जा रहा हो। उन्हें उस काम को हाथ में लेना चाहिए जिसे लोग सबसे कठिन बताकर छोड़ देते हैं।

आपको इस बात का पता कैसे चलता है कि आप किसी अनजान राह पर चल रहे हो? जब दुनिया भर के लोग आपको समझ नहीं पा रहे हों और आपको कुछ और करने के लिए कह रहे हों। यह इस बात का प्रमाण है कि आप जो कर रहे हैं वह सही है।

6. अपने जीवन और परिस्तिथियों का विरोध नहीं करें

जीवन बहुत ही रैंडम चीज़ है। आपका जन्म किसी और घर में क्यों नहीं हुआ? आप इस देश में ही क्यों जन्मे? आप किसी दूसरे स्कूल में क्यों नहीं पढ़ सके? क्यों, क्यों, क्यों?

मुझे पता है आपके पास इन प्रश्नों के कोई उत्तर नहीं हैं। क्योंकि यह सब चांस की बात है।

यह सोचने की बजाए कि ऐसा होता तो अच्छा होता, वैसा होता तो अच्छा होता, अपने जीवन की परिस्तिथियों को स्वीकार कर लीजिए। परिस्तिथियां कितनी ही बुरी क्यों न हों आप उनसे लड़ने में शक्ति व्यर्थ नहीं कर सकते।

जीवन में बहुत सी चीज़ों पर हमारा नियंत्रण नहीं होता। इसे इस तरह से देखिए कि आज आप जीवन के जिस मोड़ पर हैं उसके पीछे कुछ कारण हैं। जीवन बहुत सी ज्ञात-अज्ञात अदृश्य शक्तियों द्वारा नियंत्रित होता है।

इससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता कि वे कौन सी ताकतें हैं जो आपको जीवन को संचालित करती हैं। किसी मोड़ पर जब जीवन आपसे कुछ करने के लिए कोई निर्णय लेने की अपेक्षा करे तो उठिए और कर्म कीजिए। जीवन से मुंह मत मोड़िए। किसी और को अपने जीवन के फैसले मत लेने दीजिए।

7. जीवन एक ही दिशा में आगे बढ़ता है

आप अपने मस्तिष्क में तीन अलग-अलग आयामों में रह सकते हैं

1.      अतीत

2.      भविष्य

3.      वर्तमान

यदि आप अतीतजीवी हैं तो आप हमेशा क्योंके चंगुल में फंसे हैं। आप हमेशा इसपर विचार करते रहते हैं कि जो कुछ भी हुआ वह क्यों हुआ। यह जीवन में दुःख को न्यौता देता है।

यदि आप भविष्य में जीते हैं तो आप यदिके चंगुल में फंसे हैं। आपकी मनःस्तिथि आपको उन बातों के बारे में चिंताग्रस्त रखती है जिनके भविष्य में होने की संभावना है। यह भी डर-डर के जीना है।

इन बातों के बारे में आप अच्छे से जानते हैं। आपको पता है कि जीवन एक ही वास्तविक आयाम में जिया जा सकता है। वर्तमान में।

तो फिर आप वर्तमान में क्यों नहीं जीते? क्योंकि अनगिनत कारक आपको वर्तमान में जीवन जीने से रोकते रहते हैं।

मुझे अतीत और भविष्य के चंगुल से निकालकर वर्तमान में जीवन जीने की प्रेरणा देने वाला विचार यह है: जीवन हमेशा आगे बढ़ता है – यह इस बात की परवाह नहीं करता कि मैं क्या सोचता या करता हूँ। इसीलिए मुझे उन बातों पर सोचविचार करके समय नष्ट नहीं करना चाहिए जिनपर मेरा कोई नियंत्रण नहीं है।

अपनी भावनाओं को हाशिए पर रखकर थोड़ा प्रैक्टिकल होकर सोचिए। आप देखेंगे कि जीवन में परिस्तिथियों के वश में घटनेवाली घटनाओं पर प्रश्नचिह्न लगाने का कोई औचित्य नहीं है। हम हर परिस्तिथि में केवल आगे ही बढ़ सकते हैं।

ये वे बातें हैं जिन्हें आप जानते हैं। इन्हें आपने आज पहली बार नहीं पढ़ा है। ये सब आपको समय-समय पर बताई गई हैं लेकिन आप इनका संज्ञान नहीं लेते। इन बातों को मान लेने पर और इन्हें अपने जीवन में उतार लेने पर भी सफल और खुशहाल जीवन बिताने की कोई गारंटी नहीं है, लेकिन यदि आप इन्हें मानते हैं तो जीवन के बेहतर होने की संभावनाएँ कई गुना बढ़ जाती हैं। इनका पालन करने पर आप आशान्वित बने रहते हैं, कठिनाइयों से हार नहीं मानते, अपनी राह खुद बनाते हैं, परिस्तिथियों का सामना करते हैं, अपने समय का सदुपयोग करते हैं, और जीवन में आगे बढ़ते रहने के लिए कर्म करते रहते हैं।

क्योंकि इन सिद्धांतो का एक ही लक्ष्य है: बेहतर और उपयोगी जीवन का निर्माण। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है।

विज्ञान- प्रथम परोपकारी पक्षी

पने परिजनों की रक्षा करना और अजनबियों को आश्रय देना मानवता का एक ऐसा अनिवार्य भाग है जिसको हमने व्यापक रूप से विकसित किया है। मनुष्यों के अलावा ओरांगुटान और बोनोबो जैसे कुछ ही अन्य जीवों में स्वेच्छा से दूसरों की मदद करने का गुण देखा गया है। अब वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने ऐसे गैर-स्तनपायी प्राणि खोज निकाले हैं जो परोपकारी होते हैं।

गौरतलब है कि पूर्व में हुए अध्ययनों से पक्षियों में बुद्धिमत्ता के प्रमाण तो मिले हैं लेकिन अफ्रीकी मटमैला तोता (Psittacuserithacus) एक ऐसा पक्षी है जो परोपकारी भी है। मैक्स प्लांक इंस्टिट्यूट फॉर ओर्निथोलॉजी के पशु संज्ञान वैज्ञानिकों ने असाधारण मस्तिष्क वाले अफ्रीकन मटमैले तोते और नीले सिर वाले मैकॉ (Primoliuscouloni) की कुछ जोड़ियों पर अध्ययन किया। सबसे पहले शोधकर्ताओं ने पक्षियों को सिखाया कि वे एक टोकन के बदले पुरस्कार स्वरूप एक काजू या बादाम प्राप्त कर सकते हैं। इस परीक्षा में दोनों प्रजाति के पक्षी सफल रहे।

लेकिन अगली परीक्षा में केवल अफ्रीकी मटमैले तोते ने बाज़ी मारी। इस परीक्षा में शोधकर्ताओं ने जोड़ी के एक ही पक्षी को टोकन दिया और वह भी ऐसे पक्षी को जो किसी भी तरह से शोधकर्ता तक या पुरस्कार तक नहीं पहुँच सकता था। अलबत्ता वह एक छोटी खिड़की से टोकन अपने साथी पक्षी को दे सकता था। और वह साथी टोकन के बदले पुरस्कार प्राप्त कर सकता था। लेकिन इसमें पेंच यह था कि काजू-बादाम जो भी मिलता उसे वही दूसरा पक्षी खाने वाला था। 

दोनों प्रजातियों में, जिन पक्षियों को टोकन नहीं मिला, उन्होंने हल्के से चिंचिंयाकर दूसरे साथी का ध्यान खींचने की कोशिश की। ऐसे में नीले सिर वाले मैकॉ अपने साथी को नज़रअंदाज़ करते हुए निकल गए लेकिन अफ्रीकी मटमैले तोतों ने पुरस्कार की चिंता किए बिना अपने साथी पर ध्यान दिया। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार पहले ही परीक्षण में 8 में से 7 मटमैले तोतों ने अपने (वंचित) साथी को टोकन दे दिया। जब इन भूमिकाओं को पलट दिया गया तब तोतों ने अपने पूर्व सहायकों की भी उसी प्रकार मदद की। इससे लगता है कि उनमें परस्परता का कुछ भाव होता है।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि यदि उनका साथी कोई करीबी दोस्त या रिश्तेदार नहीं है तब भी उनमें उदारता दिखी। और यदि वह उनका करीबी रिश्तेदार है तब तो वे और अधिक टोकन दे देते थे। मैकॉ के व्यवहार से तो लगता था कि उन्हें साथी चाहिए ही नहीं। बल्कि अपने खाने का कटोरा साझा करना भी उन्हें पसंद नहीं था।  

शोधकर्ताओं का मानना है कि इन दोनों प्रजातियों के बीच का अंतर उनके अलग-अलग सामाजिक माहौल के कारण हो सकता है। जहाँ अफ्रीकी मटमैले तोते अपने झुंड बदलते रहते हैं वहीं मैकॉ छोटे समूहों में रहना पसंद करते हैं। वैसे कुछ अन्य पक्षी वैज्ञानिकों को लगता है कि तोतों के परोपकार के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है किवे शायद आपस में भाई-बहन रहे हों, जिनके बीच आधे जीन तो एक जैसे होते हैं। (स्रोत फीचर्स)