मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Feb 12, 2020

बालकथा

दो गौरैया
-भीष्म साहनी
घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं- माँ, पिताजी और मैं। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं।
आँगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं। जो भी पक्षी पहाडिय़ों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। यहाँ कभी तोते पहुँच जाते हैं, तो कभी कौवे और कभी तरह-तरह की गौरैया। वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं!
घर के अंदर भी यही हाल है। बीसियों तो चूहे बसते हैं। रात-भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते फिरते हैं। वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। बर्तन गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं, प्याले टूटते हैं। एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है। एक दूसरा है जिसे बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठना पसंद है। उसे शायद गर्मी बहुत लगती है। बिल्ली हमारे घर में रहती तो नहीं मगर घर उसे भी पसंद है और वह कभी-कभी झाँक जाती है। मन आया तो अंदर आकर दूध पी गई, न मन आया तो बाहर से ही 'फिर आऊँगीकहकर चली जाती है। शाम पड़ते ही दो-तीन चमगादड़ कमरों के आर-पार पर फैलाए कसरत करने लगते हैं। घर में कबूतर भी हैं। दिन-भर 'गुटर-गूँ, गुटर-गूँका संगीत सुनाई देता रहता है। इतने पर ही बस नहीं, घर में छिपकलियाँ भी हैं और बर्रे भी हैं और चींटियों की तो जैसे फ़ौज ही छावनी डाले हुए है।
अब एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं। पिताजी कहने लगे कि मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं। कभी वे किसी रोशनदान पर जा बैठतीं, तो कभी खिड़की पर। फिर जैसे आईं थीं वैसे ही उड़ भी गईं। पर दो दिन बाद हमने क्या देखा कि बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उन्होंने अपना बिछावन बिछा लिया है और सामान भी ले आईं हैं और मजे से दोनों बैठी गाना गा रही हैं। जाहिर है, उन्हें घर पसंद आ गया था।
माँ और पिताजी दोनों सोफे पर बैठे उनकी ओर देखे जा रहे थे। थोड़ी देर बाद माँ सिर हिलाकर बोलीं, 'अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।
इस पर पिताजी को गुस्सा आ गया। वह उठ खड़े हुए और बोले, 'देखता हूँ ये कैसे यहाँ रहती हैं! गौरैयाँ मेरे आगे क्या चीज हैं! मैं अभी निकाल बाहर करता हूँ।
'छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिडिय़ों को निकालेंगे!माँ ने व्यंग्य से कहा।
माँ कोई बात व्यंग्य में कहें, तो पिताजी उबल पड़ते हैं वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक उड़ा रही हैं। वह फौरन उठ खड़े हुए और पंखे के नीचे जाकर जोर से ताली बजाई और मुँह से 'श...शू...कहा, बाहें झुलाईं, फिर खड़े-खड़े कूदने लगे, कभी बाहें झुलाते, कभी 'श...शू...’  करते।
गौरैयों ने घोंसले में से सिर निकालकर नीचे की ओर झाँककर देखा और दोनों एक साथ 'चीं-चीं करने लगीं।माँ खिलखिलाकर हँसने लगीं।
पिताजी को गुस्सा आ गया, इसमें हँसने की क्या बात है?
माँ को ऐसे मौकों पर हमेशा मजाक सूझता है। हँसकर बोली,'चिडिय़ा एक दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?’
तब पिताजी को और भी ज़्यादा गुस्सा आ गया और वह पहले से भी ज़्यादा ऊँचा कूदने लगे। गौरैया घोंसले में से निकलकर दूसरे पंखे के डैने पर जा बैठीं। उन्हें पिताजी का नाचना जैसे बहुत पसंद आ रहा था। माँ फिर हँसने लगीं, 'ये निकलेंगी नहीं, जी। अब इन्होंने अंडे दे दिए होंगे।
'निकलेंगी कैसे नहीं?’ पिताजी बोले और बाहर से लाठी उठा लाए। इसी बीच गौरैयाँ फिर घोंसले में जा बैठी थीं। उन्होंने लाठी ऊँची उठाकर पंखे के गोले को ठकोरा। 'चीं-चींकरती गौरैयाँ उड़कर पर्दे के डंडे पर जा बैठीं।
'इतनी तकलीफ़ करने की क्या ज़रूरत थी। पंखा चला देते तो ये उड़ जातीं।माँ ने हँसकर कहा।
पिताजी लाठी उठाए पर्दे के डंडे की ओर लपके। एक गौरैया उड़कर किचन के दरवाज़े पर जा बैठी। दूसरी सीढिय़ों वाले दरवाज़े पर। 
माँ फिर हँस दी। 'तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाज़े खुले हैं और तुम गौरैयों को बाहर निकाल रहे हो। एक दरवाज़ा खुला छोड़ो, बाकी दरवाज़े बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी।
अब पिताजी ने मुझे झिड़ककर कहा, 'तू खड़ा क्या देख रहा है? जा, दोनों दरवाज़े बंद कर दे!
मैंने भागकर दोनों दरवाज़े बंद कर दिए केवल किचन वाला दरवाज़ा खुला रहा।
पिताजी ने फिर लाठी उठाई और गौरैयों पर हमला बोल दिया। एक बार तो झूलती लाठी माँ के सिर पर लगते-लगते बची। चीं-चीं करती चिडिय़ा कभी एक जगह, तो कभी दूसरी जगह जा बैठतीं। आखिर दोनों किचन की ओर खुलने वाले दरवाज़े में से बाहर निकल गईं। माँ तालियाँ बजाने लगीं। पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे।
'आज दरवाज़े बंद रखो उन्होंने हुक्म दिया। 'एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देंगी।
तभी पंखे के ऊपर से चीं-चीं की आवाज सुनाई पड़ी और माँ खिलखिलाकर हँस दीं। मैंने सिर उठाकर ऊपर की ओर देखा, दोनों गौरैया फिर से अपने घोंसले में मौजूद थीं।
'दरवाज़े के नीचे से आ गई हैं,’ माँ बोलीं।
मैंने दरवाज़े के नीचे देखा। सचमुच दरवाज़ों के नीचे थोड़ी-थोड़ी जगह खाली थी।
पिताजी को फिर गुस्सा आ गया। माँ मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थी।
अब तो पिताजी गौरैयों पर पिल पड़े। उन्होंने दरवाज़ों के नीचे कपड़े ठूँस दिए, ताकि कहीं कोई छेद बचा नहीं रह जाए और फिर लाठी झुलाते हुए उन पर टूट पड़े। चिडिय़ाँ चीं-चीं करती फिर बाहर निकल गईं। पर थोड़ी ही देर बाद वे फिर कमरे में मौजूद थीं। अबकी बार वे रोशनदान में से आ गई थीं, जिसका एक शीशा टूटा हुआ था।
'देखो-जी, चिडिय़ों को मत निकालोमाँ ने अबकी बार गंभीरता से कहा, 'अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे। अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी।
क्या मतलब? मैं कालीन बरबाद करवा लूँ? पिताजी बोले और कुर्सी पर चढ़कर रोशनदान में कपड़ा ठूँस दिया और फिर लाठी झुलाकर एक बार फिर चिडिय़ों को खदेड़ दिया। दोनों पिछले आँगन की दीवार पर जा बैठीं।
इतने में रात पड़ गई। हम खाना खाकर ऊपर जाकर सो गए। जाने से पहले मैंने आँगन में झाँककर देखा, चिडिय़ा वहाँ पर नहीं थीं। मैंने समझ लिया कि उन्हें अक्ल आ गई होगी। अपनी हार मानकर किसी दूसरी जगह चली गई होंगी।
दूसरे दिन इतवार था। जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं। पिताजी ने फिर लाठी उठा ली। उस दिन उन्हें गौरैयों को बाहर निकालने में बहुत देर नहीं लगी।
अब तो रोज़ यही कुछ होने लगा। दिन में तो वे बाहर निकाल दी जातीं; पर रात के वक्त जब हम सो रहे होते, तो न जाने किस रास्ते से वे अंदर घुस आतीं।
पिताजी परेशान हो उठे। आखिर कोई कहाँ तक लाठी झुला सकता है? पिताजी बार-बार कहें, 'मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।पर आखिर वह भी तंग आ गए थे। आखिर जब उनकी सहनशीलता चुक गई, तो वह कहने लगे कि वह गौरैयों का घोंसला नोचकर निकाल देंगे।
और वह फ़ौरन ही बाहर से एक स्टूल उठा लाए।
घोंसला तोडऩा कठिन काम नहीं था। उन्होंने पंखे के नीचे फर्श पर स्टूल रखा और लाठी लेकर स्टूल पर चढ़ गए। 'किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए,’ उन्होंने गुस्से से कहा।
घोंसले में से अनेक तिनके बाहर की ओर लटक रहे थे, गौरैयों ने सजावट के लिए मानो झालर टाँग रखी हो। पिताजी ने लाठी का सिरा सूखी घास के तिनकों पर जमाया और दाईं ओर को खींचा। दो तिनके घोंसले में से अलग हो गए और फरफराते हुए नीचे उतरने लगे।
'चलो, दो तिनके तो निकल गए,’ माँ हँसकर बोलीं, 'अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे!
तभी मैंने बाहर आँगन की ओर देखा और मुझे दोनों गौरैयाँ नजर आईं। दोनों चुपचाप दीवार पर बैठी थीं। इस बीच दोनों कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं। अब वे चहक भी नहीं रही थीं।
अब पिताजी लाठी का सिरा घास के तिनकों के ऊपर रखकर वहीं रखे-रखे घुमाने लगे। इससे घोंसले के लंबे-लंबे तिनके लाठी के सिरे के साथ लिपटने लगे। वे लिपटते गए, लिपटते गए और घोंसला लाठी के इर्द-गिर्द खिंचता चला आने लगा। फिर वह खींच-खींचकर लाठी के सिरे के इर्द-गिर्द लपेटा जाने लगा। सूखी घास और रूई के फाहे और धागे और थिगलियाँ लाठी के सिरे पर लिपटने लगीं। तभी सहसा जोर की आवाज आई, 'चीं-चीं, चीं-चीं!
पिताजी के हाथ ठिठक गए। यह क्या? क्या गौरैयाँ लौट आईं हैं? मैंने झट से बाहर की ओर देखा। नहीं, दोनों गौरैया बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी थीं।
'चीं-चीं, चीं-चीं! फिर आवाज आई। मैंने ऊपर देखा। पंखे के गोले के ऊपर से नन्ही-नन्ही गौरैया सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं-चीं किए जा रही थीं। अभी भी पिताजी के हाथ में लाठी थी और उस पर लिपटा घोंसले का बहुत-सा हिस्सा था। नन्हीं-नन्हीं दो गौरैया! वे अभी भी झाँके जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं। हमारे माँ-बाप कहाँ हैं?
मैं अवाक् उनकी ओर देखता रहा। फिर मैंने देखा, पिताजी स्टूल पर से नीचे उतर आए हैं और घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर उन्होंने लाठी को एक ओर रख दिया है और चुपचाप कुर्सी पर आकर बैठ गए हैं। इस बीच माँ कुर्सी पर से उठीं और सभी दरवाजे खोल दिए। नन्ही चिड़िया अभी भी हाँफ-हाँफकर चिल्लाए जा रही थीं और अपने माँ-बाप को बुला रही थीं।
उनके माँ-बाप झट-से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्ही-नन्ही चोंचों  में चुग्गा डालने लगे। माँ-पिताजी और मैं उनकी ओर देखते रह गए। कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुस्कुराते रहे।

Feb 11, 2020

आँगन की गौरैया

आँगन की गौरैया ( 20 मार्च -गौरैया दिवस )
-कालू राम शर्मा
गौरैया के साथ मेरा रिश्ता बचपन से ही रहा है। गौरैया छत में लकड़ी व बाँस की बल्लियों के बीच की जगह और दीवारों पर टंगे फोटो के पीछे दुबकी रहती और सुबह होते ही यहाँ-वहाँ चहकती फिरती, गली-मोहल्ले में धूल में नहाती। आँगन में झूठे बर्तनों में बचे हुए अन्न कणों को चुगना आम बात थी। कई बार तो खाना खाने के दौरान इतना पास आ जाती कि बस चले तो थाली में ही चोंच मार दे। वे घर की दीवार पर टंगे शीशे में अपने को ही चोंच मारती रहती। शाम होते अनेक गौरैया एक साथ मिलकर कलरव मचाती।
बरसात के दिनों में हम बच्चों का एक प्रमुख काम होता गौरैया को पकड़ने का। तकनीक का खुलासा नहीं करूँगा। गौरैया को पकड़कर उसके पँखों को स्याही से रंगकर वापस छोड़ देते। उस रंगी हुई चिड़िया को देखकर हम खुश होते रहते।
अब गौरैया की संख्या काफी कम हो चुकी है, खासकर महानगरों व शहरों में। रहन-सहन व घरों की डिज़ाइन में बदलाव के साथ गौरैया शहरी घरों से अमूमन विदा ले चुकी है। अनेक गाँवों-कस्बों में आज भी गौरैया बहुतायत से दिखाई देती है। यह सही है कि गौरैया कम होती जा रही है लेकिन इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) की जोखिमग्रस्त प्रजातियों की रेड लिस्ट में गौरैया को अभी भी कम चिंताजनक ही बताया गया है।
मैं यहाँ यह बात करना चाहता हूँ कि इसने कैसे और कब मानव के साथ जीना सीखा? माना जाता है कि गौरैया ने मानव के साथ जीना तब शुरू किया था जब उसने कृषि की शुरुआत की थी। जब गौरैया ने मानव के साथ जीना सीखा तो इसमें क्या बदलाव आया होगा? उसके खान-पान में बदलाव ज़रूर आए होंगे। इसके चलते इसकी शारीरिक बनावट में क्या कोई अंतर आए होंगे?
गौरैया (पैसर डोमेस्टिकस) को अक्सर हम पालतू चिड़िया की श्रेणी में रखने की भूल कर बैठते हैं। सच तो यह है कि वह मानव के निकट रहती है मगर पालतू नहीं है। दरअसल, गौरैया को कुत्ते, गाय, घोड़े, मुर्गी की तरह मानव ने पालतू नहीं बनाया है बल्कि इसने मानव के निकट जीना सीख लिया है। सलीम अली ने अपनी पुस्तक ‘भारत के पक्षी’ में लिखा है कि यह मनुष्य की बस्तियों से अलग नहीं रह सकती।
गौरैया एक नन्ही चिड़िया है जो पैसेराइन समूह की सदस्य है। इसकी लगभग 25 प्रजातियाँ हैं जो पैसर वंश के अंतर्गत आती हैं। घरेलू चिड़िया युरोप, भूमध्यसागर के तटों और अधिकांश एशिया में पाई जाती है। ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, और अमेरिका व अन्य कई क्षेत्रों में इसे जानबूझकर पहुँचाया गया या आकस्मिक कारणों से पहुँच गई।
जहाँ भी हो, यह मानव बस्तियों के इर्द-गिर्द ही पाई जाती है। जहाँ-जहाँ मनुष्य गए, गौरैया साथ गई! घने जंगलों, घास के मैदानों और रेगिस्तान, जहाँ मानव की मौजूदगी नहीं होती वहाँ  गौरैया नहीं पाई जाती।
यह अनाज और खर-पतवार के बीज खाती है। वैसे यह एक अवसरवादी भक्षक है, जिसे जो मिल जाए खा लेती है। कीट और इल्लियों को भी खाती है। इसके शिकारियों में बाज, उल्लू जैसे शिकारी पक्षी और बिल्ली जैसे स्तनधारी शामिल हैं।
पक्षियों की चोंच
पक्षियों की चोंच और इससे सम्बंधित लक्षण विकास की विशेषताओं को समझने में कारगर रहे हैं। चोंच भोजन प्राप्त करने का प्रमुख औज़ार है। पक्षियों के अध्ययन के दौरान अक्सर उनकी चोंच का अवलोकन करने को कहा जाता है। चोंच के आधार पर पक्षी के भोजन का अनुमान लगाया जा सकता है।
डार्विन ने गैलापेगोस द्वीपसमूह पर फिंच पक्षियों का अध्ययन कर बताया था कि वास्तव में पक्षियों की चोंच की शक्ल और आकृति को प्राकृतिक चयन द्वारा इस तरह से तराशा जाता है कि वह उपलब्ध भोजन के साथ फिट बैठ सके। डार्विन ने बताया था कि फिंच की अलग-अलग प्रजातियों में भोजन के अनुसार चोंच का आकार विकसित हुआ है। गौरैया जब मानव के साथ रहने लगी तो खेती में उपलब्ध बीजों को खाने के मुताबिक गौरैया की चोंच में परिवर्तन हुआ।
दो गौरैया की तुलना
गौरैया की एक उप प्रजाति है: पैसर डोमेस्टिकस बैक्ट्रिएनस। यह हमारी घरेलू गौरैया पैसर डोमेस्टिकस की ही तरह दिखती है। बैक्ट्रिएनस गौरैया शर्मिली और मानवों से दूर रहने की कोशिश करती है। यह प्रवासी पक्षी है। दोनों के डीएनए विश्लेषण से पता चला है कि लगभग 10 हजार वर्ष पहले गौरैया का एक उपसमूह मुख्य समूह से अलग होकर घरेलू गौरैया बन गया।
गौरैया का मानव के साथ सहभोजिता का रिश्ता रहा है। लगभग दस हज़ार वर्ष पूर्व मनुष्यों ने जब मध्य-पूर्व में खेती प्रारंभ की उसी समय गौरैया ने मानव के साथ रिश्ता बिठाना शुरू किया। लगभग चार हज़ार वर्ष पूर्व खेती के फैलाव के साथ-साथ गौरैया भी तेज़ी से फैलती गई। हालाँकि घरेलू गौरैया की कई उपप्रजातियाँ हैं ; लेकिन जेनेटिक विश्लेषण से पता चलता है कि ये हाल ही में अलग-अलग हुई हैं।
अलबत्ता, बैक्ट्रिएनस गौरैया ने आज तक अपने प्राचीन पारिस्थितिक गुणधर्म बचाकर रखे हैं। बैक्ट्रिएनस मानव के साथ नहीं जुड़ी है; बल्कि मानव बस्तियों से दूर प्राकृतिक आवासों में (जैसे नदी, झाड़ियों, घास के मैदानों और पेड़ों पर) रहती है। इनकी तुलना करके हम घरेलू गौरैया के मनुष्यों से रिश्ता बनने में हुए परिवर्तनों को देख सकते हैं।
शरद ऋतु में बैक्ट्रिएनस गौरैया अपने प्रजनन स्थल मध्य एशिया से बड़ी तादाद में सर्दियाँ बिताने के लिए उड़कर दक्षिण-पूर्वी ईरान और भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी भागों में पहुँच जाती है। गौरतलब है कि बैक्ट्रिएनस मुख्य रूप से जंगली घास के बीज खाती है जबकि मानव के साथ रहने वाली गौरैया खेती में उगने वाली गेहूँ और जौं जैसी फसलों के बीज खाती हैं। अध्ययन से पता चला है कि अस्थि संरचनाओं का विकास प्रवासी बैक्ट्रिएनस गौरैया की तुलना में घरेलू गौरैया में संभवत: जल्दी हुआ क्योंकि प्रवासी व्यवहार के चलते पक्षी पर वज़न सम्बन्धी अड़चनें ज़्यादा आएँगी, जबकि एक ही जगह पर रहने वाली गौरैया के लिए इस तरह की अड़चन बाधक नहीं बनेगी क्योंकि उन्हें दूर-दूर तक उड़कर तो जाना नहीं है। इसीलिए प्रवासी व्यवहार का परित्याग करने के साथ ही घरेलू गौरैया की चोंच और खोपड़ी मज़बूत होने लगी।
गौरैया में प्रवास के परित्याग के फलस्वरूप चोंच व खोपड़ी में होने वाले परिवर्तन एक प्रकार से अपने नए भोजन के साथ अनुकूलन है। जंगली अनाज के दानों और खेती में उगाए गए अनाज के दानों के बीच कई अंतर हैं। फसली बीजों का आकार बढ़ने लगा और ये बीज जंगली बीजों से कठोर व बनावट में अलग थे। अत: बीजों के गुणधर्मों में परिवर्तन के चलते खोपडी और चोंच पर प्राकृतिक चयन का दबाव बढ़ा। 
खेती में उगाए जाने वाले अनाज के दाने पौधे में एक डंडी (रेकिस) पर काफी पास-पास मज़बूती से बँधे होते हैं जबकि जंगली घास के पौधों में पकने पर रेचिस के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। बैक्ट्रिएनस उप प्रजाति मानवों से दूर ही रही और उनकी चोंच व खोपड़ी में कोई फर्क नहीं आया। यह भी देखा गया कि मानव के निकट रहने वाली गौरैया की उप प्रजाति डील-डौल में भी थोड़ी बड़ी है।
गौरैया ने मानव सभ्यता के साथ रहते हुए अपने आपको मानव-निर्भर पर्यावरण के अनुसार ढाल लिया है। प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया ने उन आनुवंशिक परिवर्तनों को सहारा दिया या उन्हें संजोया जिनके चलते इनकी खोपड़ी के आकार में बदलाव के अलावा इनमें माँड या स्टार्च को पचाने की क्षमता भी विकसित होती गई।
आखिर कृषि ने कैसे गौरैया के जीनोम को प्रभावित किया होगा? घरेलू गौरैया में ऐसे जीन मिले हैं जो इसके करीबी जंगली रिश्तेदार में नहीं हैं।
घरेलू गौरैया में प्रमुख रूप से ऐसे दो जीन मिले हैं। इनमें से एक जीन जानवरों की खोपड़ी की संरचना के लिए ज़िम्मेदार होता है और दूसरा स्टार्च के पाचन में प्रमुख भूमिका अदा करता है। (स्रोत फीचर्स)

लघुकथा

भाई-भाई 
- ख़लील जिब्रान , अनुवाद - सुकेश साहनी

ऊँचे पर्वत पर चकवा और गरुड़ की भेंट हुई। चकवा बोला, ‘‘शुभ प्रभात, श्रीमान्!’’
गरुड़ ने उसकी ओर देखा और रुखाई से कहा, ‘‘ठीक है-ठीक है।’’ चकवे ने फिर बात शुरू की, ‘‘आशा है, आप सानन्द हैं। ’’
गरुड़ ने कहा, ‘‘हाँ, हम मजे में हैं पर तुम्हें मालूम होना चाहिए कि तुम पक्षियों के राजा से बात कर रहे हो। जब तक हम बात शुरू न करें, तुम्हें हमसे बात शुरू करने की गुस्ताखी नहीं करनी चाहिए।’’
चकवे ने कहा, ‘‘मेरे ख्याल से हम दोनों एक ही परिवार से हैं।’’  
गरुड़ ने आँखें निकालकर घृणा से उसकी ओर देखा, ‘‘किस बेवकू ने कह दिया कि हम एक ही परिवार से हैं?’’
तब चकवे ने कहा, ‘‘मैं आपको याद दिला दूँ कि मैं आपके समान ऊँचा उड़ सकता हूँ। इसके अलावा मैं अपने सुमधुर गीतों से दूसरों का मनोरंजन भी कर सकता हूँ। आप किसी को भी सुख और खुशी नहीं दे सकते।’’
इस पर गरुड़ ने  क्रोधित होते हुए कहा, ‘‘सुख और खुशी! अबे ढीठ, मैं अपनी चोंच की एक चोट से तेरा काम तमाम कर सकता हूँ। तू तो मेरे पैर जितना भी नहीं है।’’
चकवा उड़कर गरुड़ की पीठ पर जा बैठा और उसके पंख नोचने लगा। गरुड़ भी गुस्से में था, उससे पिण्ड छुड़ाने के लिए वह तेजी से काफी ऊँचाई तक उड़ता चला गया। लेकिन उसका बस नहीं चला। हारकर वह फिर उसी चट्टान पर आ गया। चकवा अब भी उसकी पीठ पर सवार था। गरुड़ उस घड़ी को कोस रहा था, जब वह उस तुच्छ पक्षी से उलझ पड़ा था।
तभी एक कछुआ वहाँ  आ निकला। गरुड़ और चकवे की हालत देखकर उसे हँसी आ गई। वह हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया।
गरुड़ ने कछुए की ओर देखकर कहा, ‘‘पृथ्वी पर रेंगने वाले कीड़े, हँसता क्यों है?’’
कछुए ने कहा, ‘‘क्या यह हँसने की बात नहीं है कि आपको घोड़ा बनाकर एक छोटा-सा पक्षी आपकी पीठ पर सवारी कर रहा है।’’
गरुड़ ने कहा, ‘‘अबे जा, अपना काम कर। यह तो मेरे भाई चकवे का और मेरा घरेलू मामला है।’’

जीव जगत

बया का खूबसूरत घोंसला
बया पक्षी बुनकर पक्षी समुदाय का सदस्य है इसका वैज्ञानिक नाम Ploceus philippinus  है  यह पूरे भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया में पाया जाता है। यह खासकर जंगलो और खेतों में निवास करता है। इसकी प्रजातियों का रंग अलग अलग होता है। नर पक्षी पीले और काले रंग के होते है। मादा बया का रंग भूरा होता है। कुछ ऑरेंज रंग के भी होते है। इनका आकार 5 से 10 इंच के बीच में होता है। वैसे बया पक्षी गोरैया के आकार की होती है और कुछ कुछ दिखाई भी गौरैया की तरह ही देते हैं। इनकी चोंच गौरेया से मोटी होती है।

बया एक ऐसा पक्षी है जो पेड़ की शाखाओं पर नहीं बल्कि उस की डाल पर लटकते हुए खूबसूरत घोंसले बनाता है। ये घोंसले आकार में लौकी की तरह लगते हैं। बया का घोंसला एक बेहतरीन कारीगरी होता है। घोंसला नर पक्षी बनाता है और वह मादा को इससे रिझाता है। कभी कभी मादा पक्षी नर के बनाये घोसले का निरक्षण भी करती है। मादा बया घोसले को देखकर ही नर के पास आती है।  बया के घोसले की बनावट जटिल होती है। सभी पक्षियों के घोंसले में बया पक्षी का घोसला सबसे अनोखा होता है, इसे बुनकर पक्षी भी कहा जाता है।
बया का घोंसला पत्तियों, छोटी टहनियों, घास से मिलकर बना होता है। बया अपने इस घोसले में रोशनी की व्यवस्था भी करती है। बया हर बार एक नया घोंसला बुनती है। लेकिन यह एक ही पेड़ पर बार बार घोसला बना लेती है। नर बया घोंसला बनाने के लिए करीब 500 बार उड़कर लंबी घास और पत्तियाँ लाता है, इसके बाद यह अपनी चोंच से तिनकों और लम्बी घास को आपस में बुन देता है। ये ऊपर की तरफ से पतले और बीच मे मोटे गोल होते है। इसके घोसले का निकासी भाग सकरा टयूब की तरह होता है। घोंसला पूरी तरह बनने में 28 दिन का समय लगता है।  बया अक्सर अपना घोंसला पेड़ के पूर्वी दिशा में बनाना पसंद करता है। घोंसला बनाने के बाद ही नर पक्षी मादाओं को आकर्षित करने के लिए पंखों को हिला कर मधुर आवा निकालता है, नर और मादा बया पक्षी घोंसला बनने के बाद मिट्टी के गिले टुकड़े लाकर इस घोसले को और मजबूत बनाते हैं।
एक ही पेड़ पर अधिक संख्या में घोसले होने के कारण, यह पेड़ बया की कॉलोनी की तरह दिखता है। बाया एक सामाजिक पक्षी है इसलिए एक पेड़ पर 60 पक्षियों के घोंसले तक देखने को मिल जाते हैंबया पक्षी की एक कॉलोनी में 200 से अधिक घोसले पाए जाते हैं।
बया पक्षी-समूह में रहना पसंद करती है और काफी शोरगुल करती है। यह अपने घोसले पानी के निकट बनाती है या फिर उन टहनियों में बनाती है, जो पानी के ऊपर हों। अमूमन काँटेदार या ताड़ के वृक्षों में यह अपना घोसला बनाना पसन्द करती है; क्योंकि इसकी वजह से इसके बच्चों को परभक्षियों से सुरक्षा प्रदान होती है।
बारिश का मौसम आने से पहले यह पक्षी घोंसला बनाता है। बया को बारिश का सटीक पूर्वानुमान होता है। ये ज़्यादातार खेतों के आसपास रहते है; क्योंकि खेतों में इन्हें अनाज आसानी से मिल जाता है। ये खेतो के आसपास के पेड़ों की डालियों पर घोंसला बनाते हैं। इनके घोसले उन डालियों पर भी होते है ,जो नदियों या तालाबों के ऊपर से गुजरती हैं।  जिन पेड़ों पर यह पक्षी घोसला बनाता है, वे ज्यादातर काँटेदार होते हैं, जिससे शिकारी जानवरों से इनके बच्चों का बचाव होता है। अक्सर इस पक्षी को बबूल के पेड़ पर घोंसला बनाते देखा गया है। बया पक्षी के घोसले इतने मजबूत होते हैं कि ते  आँधी में भी ये डाली से नीचे नहीं गिरते है। ये घोसले अपनी पकड़ डाली से बना रहते है।
मादा बया दो से चार सफेद अंडे देती है, इन अंडों को 14 से 17 दिनों तक सेया जाता है, नर और मादा दोनों बया पक्षी बच्चों को खाना खिलाते हैंकेवल 17 दिन के बाद ही बच्चे घोसला छोड़ देते हैं।
बया का मुख्य भोजन अनाज होता है। बया को किसान का दुश्मन भी कहते है ; क्योंकि यह खेतों की फसलों से बीज खाती है। इससे पकी-पकाई फसल खराब हो जाती है। यह कीड़े-मकौड़े भी खाते हैं। कई प्रकार के बीज भी खाते है। बया पक्षी की आवाज चीं- चीं की होती है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई होने से इन पक्षियों का आशियाना खत्म हो रहा है और बया पक्षी विलुप्ति के कगार पर है। (उदंती फीचर्स)

चित्र

चित्र  
-शंकर पुणतांबेकर
वह चित्र बना रहा था। सामने स्‍टैंड पर फलक, हाथ में कूँची, नीचे रंग फैले हुए।
वह चित्र बना तो रहा था, पर क्‍या चित्र बना रहा था उसे नहीं मालूम! आँखों के सामने धुँधलका। धुँधलके में से वह चित्र खोजने की कोशिश करता।
दरवाजे पर दस्‍तक। वह उठकर दरवाजा खोलता है।
दरवाजा खोलने पर सामने क्‍या देखता है कि रूस के अध्‍यक्ष मिखाइल गोर्बाचेव खड़े हुए हैं।
आइए, आइए!’ वह उनका स्‍वागत करता है और उन्‍हें अंदर लाता है।
फलक के पास एक कुर्सी थी, उसी में वह गोर्बाचेव को बैठाता है।
मा करना, मैंने तुम्‍हें डिस्‍टर्ब किया। तुम काम में हो।’ गोर्बाचेव बोले।
नहीं, नहीं, आपने डिस्‍टर्ब नहीं किया।’ वह बोला, ‘मैं काम में जरूर था। मेरे हाथ में कूँची तो थी लेकिन आँखों में दृष्टि नहीं थी। पता नहीं कूँची से क्‍या उतरता।’
मेरा एक काम करोगे? मुझे एक चित्र बना दो। कबूतर का चित्र।’
कबूतर का चित्र।’ वह बोला।
हाँ,’ गोर्बाचेव ने कहा। ‘अब तक हमने बड़े गलत चित्र बनाए कबूतर के। हमने से मतलब क्‍या रूस ने क्‍या अमेरिका ने। चित्र तो हम लोगों ने कबूतर का बनाया लेकिन उसके अंदर रखे शस्‍त्र… अणुशस्‍त्र। ऊपर से कबूतर अंदर से गिद्ध। ऐसा चित्र क्‍यों बनाया? इसलिए कि हम स्‍वयं ऊपर से कबूतर और अंदर से गिद्ध थे।’
आप क्‍या लेंगे? चाय या कॉफी? बोका तो मेरे यहाँ है नहीं।’
गोर्बाचेव हँसे। बोले, ‘जो भी तुम पिलाओ। सही कबूतर के चित्र के साथ तो जहर भी पिलाओगे तो मैं पी लूँगा।’
उसने गोर्बाचेव के लिए कबूतर का चित्र बना दिया।
गोर्बाचेव बड़ी खुशी-खुशी उसके यहाँ से विदा हुए।
वह चित्र बना रहा था।
वह चित्र बना तो रहा था, पर क्‍या चित्र बना रहा था उसे नहीं मालूम। आँखों के सामने धुँधलका। धुँधलके में से वह चित्र खोजने की कोशिश करता।
दरवाजे पर दस्‍तक।
दरवाजा खोलने पर सामने देखता है तो धर्म की मूर्ति शंकराचार्य।
वह स्‍वागत कर उन्‍हें अंदर लाता है और फलक के पास की कुर्सी में बैठाता है।
क्षमा करना, मैं तुम्‍हारे पास एक काम से आया था। मुझे एक चित्र बना दो। हंस का चित्र।’
हंस का चित्र।’ वह बोला।
हाँ,’ शंकराचार्य ने कहा, ‘शुभ्र वर्ण का हंस, रक्‍त वर्ण का नहीं। मोती चुगनेवाला… राजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति में से केवल नीति चुगनेवाला हंस। पानी-का-पानी और दूध-का-दूध कर देनेवाला हंस।’
लेकिन आप स्‍वयं ऐसा हंस प्रस्‍तुत करते रहे हैं। कबीर ने प्रस्‍तुत किया, नानक ने प्रस्‍तुत किया, स्‍वामी विवेकानंद ने प्रस्‍तुत किया।’
हाँ, किया। लेकिन लोकतंत्र में इसे अब लोक के हाथों ही प्रस्‍तुत होने दो। लोगों को हमारी कूँचियों में सांप्रदायिकता के रंग नजर आते हैं, हमारे हंसों में कौआ नजर आता है।’
आप क्‍या लेंगे चाय या कॉफी? दूध तो मेरे यहाँ है नहीं।’ वह बोला।
मैं जानता हूँ, नहीं होगा। दूध शुभ्र होता है और विडंबना यह कि शुभ्र ही इससे वंचित रह जाता है। तुम मुझे सिर्फ पानी दो।’
लेकिन मेरा वर्ण तो…’
कला का, श्रम का, चरित्र का, न्‍याय का कोई वर्ण नहीं होता। बल्कि इनका उच्‍च वर्ण होता है। हमें जो उच्‍च वर्ण अभिप्रेत है वह इन्‍हीं का वर्ण है। इन्‍हीं से विहीन शूद्र वर्ण है।’
उसने शंकराचार्य के लिए हंस का चित्र बना दिया।
शंकराचार्य बड़ी खुशी-खुशी उसके यहाँ से विदा हुए।
वह चित्र बना रहा था।
वह चित्र बना तो रहा था, पर क्‍या चित्र बना रहा था उसे नहीं मालूम। आँखों के सामने धुँधलका। धुँधलके में से वह चित्र खोजने की कोशिश करता।
दरवाजे पर दस्‍तक।
उसने उठकर दरवाजा खोला तो देखा अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस के नेता नेल्‍सन मंडेला खड़े हैं।
स्‍वागत कर वह उन्‍हें अंदर लाया और फलक के पास की कुर्सी में बैठाया।
मैं जरा जल्‍दी में हूँ भाई! तुम तो जानते हो मैं इसी माह (11 फरवरी, 1990) वर्षों बाद जेल से छूटा हूँ। बहुत काम पड़े हैं। मैं चाहता हूँ तुम मेरे लिए एक चित्र बना दो। एक कोकिल का चित्र।’ मंडेला बोले।
कोकिल का चित्र!’ उसके मुँह से निकला।
हाँ,’ मंडेला ने कहा, ‘कोकिल का चित्र… काली कोकिल का चित्र, जिसको अब तक सफेद चमड़ी के हंस नामी बगुलों ने कौआ समझ रखा था।’
हे कलाकार, तुम तो जानते हो राजनीति में केवल दो ही वर्ण होते हैं - एक सफेद, एक काला। सफेद अपने काले पर पोतने के लिए और काला औरों के सफेद पर पोतने के लिए। कलानीति में ऐसा नहीं होता। वहाँ तो वर्ण नहीं रंग होते हैं - विविध रंग। कलानीति में तो काला भी उतना ही सुंदर है जितना कोई और रंग। काला राजनीति में कौआ है तो कलानीति में कोकिल।’
आप महान हैं मंडेला साहब, आप महान हैं। राजनीति में रहते भी आपको कला की परख है।’
मेरे कलाकार, अब क्‍या बताऊँ मैं तुम्‍हें! कोकिल के चित्र बनते रहे, पर अंदर उसके तोता रहता। अंदर तोता, सो पिंजरे में बंद आराम की जिंदगी जीता और पढ़ाए हुए को ही गाता।’
आप क्‍या लेंगे चाय या कॉफी?’
दोनों ही कुछ अंतर से लूँ तो?’ मंडेला हँसते हुए बोले, ‘जेल इन्‍हीं पर तो काटी है भाई! चाय तो अभाव और गरीबी का एकमात्र सहारा है।’
उसने मंडेला के लिए कोकिल का चित्र बना दिया।
मंडेला बड़ी खुशी-खुशी उसके यहाँ से विदा हुए।
वह चित्र बना रहा था।
वह चित्र बना तो रहा था, पर आँखों के सामने धुँधलका होने से कोई स्‍पष्‍ट चित्र उसकी नजरों में नहीं था।
तभी दरवाजे पर दस्‍तक हुई।
उसने उठकर दरवाजा खोला तो पाया - महान अमेरिकी लेखक आर्थर मिलर खड़े हैं।
आइए, आइए!’ उसने उनका स्‍वागत किया और वहीं फलक के पास की कुर्सी पर बैठाया।
तुमने मुझे पहचाना इसके लिए मैं तुम्‍हारा शुक्रगुजार हूँ। लोग खिलाड़ियों और अभिनेताओं को ही पहचानते हैं।’
मैं शुक्रगुजार हूँ कि आप मेरे यहाँ आए। शब्‍दों का एक महान चितेरा मुझ जैसे सामान्‍य रंगकार के यहाँ!’
नहीं भाई नहीं, ऐसा न कहो। सच पूछो तो मैं तुम्‍हारे यहाँ मतलब से आया हूँ। तुम एक चित्र बना दो मेरे लिए। मयूर का चित्र!’
मयूर का चित्र!’ उसके मुँह से निकला।
तुम्‍हें आश्‍चर्य हो रहा है न!’ मिलर बोले, ‘सोचते होगे मुझ-जैसे को तो बंदर का चित्र बनवाना चाहिए। हम लोग कहते तो हैं कि बंदर से आदमी बनें, लेकिन आदमी बनकर अब हम प्रगति के साथ देवता बनने के स्‍थान पर पुनः बंदर ही बन रहे हैं, संपन्‍न बंदर, शक्तिशाली बंदर। बंदर की जो रेस अधिक शस्‍त्र-संपन्‍न, दुनिया को खत्‍म करने की जिसमें अधिक ताकत व अधिक प्रगति।’
मैं जानता हूँ, आपकी कलम ऐसे बंदरों के खिलाफ पूरी ताकत के साथ जूझ रही है।’ वह बोला। और सवाल किया, ‘आप मयूर का ही चित्र क्‍यों चाहते हैं?’
इसलिए कि मैं साहित्‍य को मयूर मानता हूँ। अपने रंग-बिरंगे पंख फैलाकर मयूर कितना सुंदर नृत्‍य प्रस्‍तुत करता है! ...और जानते हो मयूर नृत्‍य ही नहीं करता, वह सर्प का सफाया भी करता है।’
एक बात कहूँ, आप बुरा तो नहीं मानेंगे?’ वह बोला, ‘आज का साहित्‍य यथार्थ के नाम... सर्प का सफाया करने के नाम केवल डंडा नचाता है, साहित्‍य नहीं।’
आप ठीक कहते हैं।’ मिलर बोले, ‘डंडा... कोई वाद, फिर वह जनता से कितना ही जुड़ा हो साहित्‍य नहीं केवल डॉक्‍टरी एक्‍स-रे है।’
आप क्‍या लेंगे चाय या कॉफी?’
कुछ भी। बस गरम हो, आज के सही साहित्‍य-जैसा।’
उसने मिलर के लिए मयूर का चित्र बना दिया।
आर्थर मिलर बड़ी खुशी-खुशी उसके यहाँ से विदा हुए।
वह चित्र बना रहा था। वह चित्र बना तो रहा था पर आँखों के समाने धुँधलका होने से कोई स्‍पष्‍ट चित्र उसकी नजरों में नहीं था। पेट में चूहे बुरी तरह से दौड़ रहे थे। पत्‍नी को दो बार भोजन के लिए आवाज दे चुका था।
जब तीसरी बार आवाज दी तो पत्‍नी अंदर से ही बोली, ‘कैसे लाऊँ भोजन! पकाने को घर में कुछ नहीं है। कैसे हो सकता है जब तुम कबूतर, कोकिल, हंस, मयूर में डूबे रहोगे।’
तभी दरवाजे पर दस्‍तक हुई।
दरवाजा खोलने पर उसने देखा भेड़िया है।
देखो, मुझे एक चित्र बना दो तुम। भेड़ का चित्र।’
नहीं बनाऊँगा।’ वह बोला, ‘भेड़ को छीलने वाले, भेड़ को खा जानेवाले तुम! मैं जानता हूँ भेड़ का चित्र तुम्‍हें क्‍यों चाहिए। भेड़ से प्‍यार के दिखावे के लिए।’
मैं तुम्‍हें इतना दूँगा, इतना जो कोई नहीं दे सकता।’ भेड़िया बोला।
नहीं, मैं बिकाऊ नहीं हूँ।’
इतना कह उसने दरवाजा बंद कर दिया और अपनी जगह पर आया।
तभी पत्‍नी बोली, ‘यह तुमने क्‍या किया! रोटी दरवाजे पर आई थी, और तुमने उसे ठुकरा दिया।’
उधर पत्‍नी बोली और इधर उसके पेट की भूख भी जोर से चीखी।
वह उठा और दरवाजे की ओर भागा।