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Nov 17, 2018

यमराज की डायरी का पन्ना

यमराज की डायरी का पन्ना
विजय विक्रान्त
अपने बारे में अब तो मुझे पूरा विश्वास हो गया है कि धरती के बोझ का संतुलन रखने के लिये ही मेरा जनम हुआ है और शिवजी महाराज मेरे बड़े साहब (बॉस) हैं। धरती पर जब कभी भी किसी का जनम होता है, ब्रह्माजी के दफ़्तर से एक पत्र विष्णु जी को जाता है और दूसरा पत्र शिवजी महाराज के देखने के बाद मेरे पास
आता है। अब जब धरती पर जन्म हो ही गया है तो किसी को तो लालन पालन करना है। इसकी ज़िम्मेवारी का महकमा विष्णु जी के पास है। हर प्राणी की धरती पर रहने की एक लीज़ होती है और उस लीज़ के पूरा होने के बाद उसको धरती से उठाने की ज़िम्मेवारी शिवजी की होती है। अब शिवजी महाराज तो कैलाश पर्वत पर मस्त रहते हैं। इस उठाने बिठाने के लिए ना तो उनके पास समय है और न ही कोई रुचि। बस यही एक कारण है कि यह काम उन्होंने मुझे सौंपा है। देखा जाए, तो लोगों को ऊपर लाने की पूरी ज़िम्मेवारी अब मेरी ही है; क्योंकि मैं अकेला इतना सब काम नहीं कर सकता ;इसलिए मेरे पास पूरा डिपार्टमैण्ट है और उस में काम करने वाले यमदूतों के अपने अपने क्षेत्र बँधे हुए हैं।
रोज़ सुबह दफ़्तर खुलने पर सारे यमदूतों को उनके इलाकों के कार्ड दे दिए जाते हैं। इन कार्डों पर हर ऊपर लाने वाले प्राणी का नाम, पता और प्राण निकालने का समय दर्ज होता है। प्राण खींचने के समय में कोई भूल न हो जाए ,इसीलिए हर कार्ड पर नंबर होते हैं । हम नंबरों के हिसाब से ही काम करते हैं।
एक दिन अचानक मेरे एक यमदूत की तबियत ख़राब हो गई। खाँसी और ज़ुकाम के मारे बुरा हाल था। उसकी हालत नीचे जाने लायक नहीं थी। मेरे पास वैसे भी स्टाफ़ की कमी थी, क्योंकि कुछ यमदूत छुट्टी पर गए हुए थे।
स्टाफ़ कम होने के साथ -साथ आज की लिस्ट भी काफ़ी लंबी थी। यही सोचकर मैंने फ़ैसला किया कि आज धरती पर यमदूतों के साथ मैं स्वयं जाऊँगा। इस बहाने मेरा भी कुछ सैर- सपाटा हो जाएगा और मेरे यमदूत कैसा काम करते हैं, इसकी भी रिपोर्ट मिल जाएगी।
दफ़्तर की गाड़ियों में बैठकर हम ठीक समय पर अपने अपने इलाकों में पहुँच गए। हमारे दफ़्तर का एक नियम था कि किसी के प्राण लेने से पहले हम उसका इंटरव्यू लेते थे। मरने से पहले वह अपने सब चाहने वालों से मिल ले इसलिए हम उसे दो घण्टे का समय देते थे। शाम के पाँच बजे तक हम कोई पन्द्रह जानें ले चुके थे।
सोलह नम्बर कार्ड चुलबुलीनाम की एक महिला का था। जब हम उसे लेने पहुँचे, तो देखा कि वह एक क्लब में किसी मित्र की पार्टी में बड़े ज़ोर- शोर से नाच रही थी। उसे देखकर ऐसा लगता था कि उसे दुनिया का कोई ग़म नहीं है और वह पूरी मस्ती से हर पल को जी रही है।
इन्टरव्यू के दौरान जब चुलबुली को हमारे आने का कारण पता चला ,तो वो बहुत गिड़गिड़ाई और कहने लगी कि अगर उसको कुछ दिन और जीने का मौका मिल जाए, तो हमारी उस पर बहुत बड़ी कृपा होगी। मैंने उसे बताया कि हम ब्रह्मा जी और शिवजी के नियमों से बँधे हुए हैं और इस मामले में नियम के उलंघन करने की कोई भी गुंजाईश नहीं है। मेरे हाथ में कार्डों की मोटी गड्डी देखकर चुलबुली समझ गई कि हम लोग अपने कार्डों के हिसाब से ही अगला प्राणी चुनते हैं। एकाएक उसकी आँखों में एक चमक -सी आ गई । वह कहने लगी कि  अगर हम अपने अगले प्राणी कार्ड की ढेरी के नीचे से चुनेंगे ,तो उसका नंबर सब से बाद में आएगा और उसे जीने और नाचने का कुछ और समय मिल जाएगा।
हालाँकि ऐसा करना हमारे डिपार्टमैन्ट के कायदे कानून के बिल्कुल ख़िलाफ़ था फिर भी न जाने क्यों मुझे चुलबुली पर तरस आगया और मन ही मन मैंने यह फ़ैसला कर लिया कि अगले प्राणी हम चुलबुली के सुझाव से ही चुनेंगे। यह बात मैं ने किसी को भी नहीं बताई। मुझे यह भी पता था कि हमारा अगला प्राणी भी इसी क्लब में है।
चूँकि खाने का समय हो गया था, इसलिए उसी क्लब में एक कोने में बैठ कर खाने का आर्डर कर दिया। इस बीच चुलबुली भी मेरे वाली मेज़ पर आगई। कार्ड की ढेरी को मेज़ पर छोड़कर मैं हाथ धोने के लिये वाशरूम गया।
समय आने पर मैंने चुलबुली को बुलाया और कहा कि मैने उसकी बात मान ली है और आगे के सब प्राणी मैं नीचे से ही चुनूँगा। कहाँ तो मैं सोच रहा था कि चुलबुली यह सुनकर बहुत ख़ुश होगी; लेकिन जैसे ही मैं ने सब से नीचे वाल कार्ड निकाला चुलबुली के चेहरे की हवाइयाँ उड़ चुकी थीं और वो हक्का -बक्का हो कर मेरी तरफ़ देख रही थी। वो रह रहकर गिड़गिड़ा रही थी कि मैं नीचे वाले कार्ड से अपना अगला इंसान न चुनूँ। उसका कहना था कि मैं अपने बनाए हुए हिसाब से ही चलूँ। मैं बहुत परेशान हो गया। क्या हो गया है इस औरत को जो थोड़ी देर पहले कही अपनी बात का ही खण्डन कर रही है। हालाँकि कार्ड ढेरी में से निकाला जा चुका था और मुझे कार्ड वाली आत्मा को अपने साथ ले जाना था फिर भी मैं ने बड़ी उत्सुकता से पूछा कि आख़िर माजरा क्या है।
मेरा सवाल सुनकर रोते हुए चुलबुली बोली - यमराज जी, जब आप वाशरूम गए थे ,उस समय मैं ने अपना कार्ड चुपके से गठ्ठी के सब से ऊपर से हटाकर सब से नीचे रख दिया था। मुझे क्या पता था कि आप मेरा सुझाव मान लेंगे।


सम्प्रतिः  सह-संस्थापक निर्देशक, हिन्दी राइटर्स गिल्ड

पेड़ - पवित्र, आध्यात्मिक और धर्म निरपेक्ष

पेड़ पवित्रआध्यात्मिक और धर्म निरपेक्ष
-डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन
जापान के कामाकुरा तीर्थ का 800 साल पुराना पूजनीय गिंको वृक्ष इस वर्ष मार्च में बर्फीली आँधी में गिर गया। तीर्थ के पुजारियों और साध्वियों ने वृक्ष पर पवित्र शराब और नमक डालकर इसका शुद्धीकरण किया। यह गिंको वृक्ष 12 फरवरी 1219 को तानाशाह सानेतोमो की हत्या का साक्षी था। उस दिन वह प्रधान पद के लिए अपने नामांकन का जश्न मनाकर मंदिर से वापस आ रहा थातभी उसके भतीजे मिनामोतो ने उस पर हमला करके उसे मौत के घाट उतार दिया। इस कृत्य के लिए कुछ ही घंटों बाद उसका भी सिर कलम कर दिया गया। इसके साथ ही साइवा गेंजी शोगुन राजवंश का अंत हो गया।
पेड़ न केवल इतिहास बताते हैं बल्कि लोगों में विस्मय और आध्यात्मिकता भी जगाते हैं। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण गौतम बुद्ध हैंजिन्होंने बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया था। इसी कारण बुद्ध का एक नाम बोधिसत्व भी है। 286 ईसा पूर्व में बोधि वृक्ष की एक शाखा को श्रीलंका के अनुराधापुर में लगाया गया था। इस तरह से यह वृक्ष मानव द्वारा लगाया गया सबसे प्राचीन वृक्ष है।
भगवान बुद्ध ने ही कहा था, “पेड़ अद्भुत जीव हैं जो अन्य जीवों को भोजनआश्रयऊष्मा और संरक्षण देते हैं। ये उन लोगों को भी छाया देते हैंजो इन्हें काटने के लिए कुल्हाड़ी उठाते हैं।
कर्नाटक के रामनगरम ज़िले के हुलिकल की रहने वाली 81 वर्षीय सालमारदा तिमक्का बौद्ध विचारों से प्रेरित हैं। जब उन्हें और उनके पति को समझ में आया कि उन्हें बच्चा नहीं हो सकता तो उन्होंने पेड़ लगाने और हर पेड़ की परवरिश अपने बच्चे की तरह करने का निर्णय लिया। इसके बारे में और अधिक गूगल पर पढ़सुन एवं देख सकते हैं।
पेड़ अत्यंत प्राचीन भी हो सकते हैं। बोधि वृक्ष यदि 2,300 साल पुराना हैतो वहीं कैलिफोर्निया के विशाल सिक्वॉइ पेड़ भी लगभग उतने ही प्राचीन हैं। ये विशाल पेड़ 275 फीट लंबे, 6000 टन भारी हैं और इनका आयतन करीब 1500 घन मीटर है। समुद्र तल से 3300 मीटर की ऊँचाई पर खड़ा ब्रिस्टलकोन पाइन वृक्ष तो इससे भी पुराना है। तकरीबन 4850 साल प्राचीन इस वृक्ष को मेथुसेला नाम दिया है। लेकिन दुनिया का सबसे प्राचीन वृक्ष तो नॉर्वे-स्वीडन की सीमा पर दलामा के एक पेड़ को माना जाता है। यह सदाबहार शंकुधारी फर पेड़ है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इसका तना 600 साल तक जीवित रहता है। इतने वर्षों में इसने अपना क्लोन बना लिया है।
पेड़ों की क्लोनिंग करने की यह क्षमता ही इन्हें जानवरों और हमसे अलग करती है। इसी खासियत के परिणामस्वरूप हमें अनुराधापुर में फलता-फूलता क्लोन महाबोधि वृक्ष नज़र आता हैऔर इसी खासियत के चलते कामकुरा गिंको के उत्तराधिकारी वृक्ष बन जाएँगेऔर दलामा का फर वृक्ष आज भी मौजूद है, और डॉ. जयंत नार्लीकर द्वारा पुणे में लगाया गया सेब का पेड़ भी इसी खासियत का परिणाम है। यह पेड़ इंग्लैण्ड स्थित उस सेब के पेड़ की कलम से लगाया गया था जिसके नीचे कथित रूप से न्यूटन को गुरुत्वाकर्षण का विचार कौंधा था।
इंसानों या जानवरों का जीवनकाल सीमित क्यों होता हैवे मरते क्यों हैंक्यों जानवर या इंसान पेड़-पौधों की तरह अपना क्लोन बनाकर अमर नहीं हो जाते। और तो और, 40 विभाजन के बाद हमारी कोशिकाएँ और विभाजित नहीं हो पातीं। गुणसूत्र की आनुवंशिक प्रतिलिपि बनाने की प्रक्रिया को समझ कर इस रुकावट के कारण को समझा जा सकता है।
जब गुणसूत्र विभाजित होकर अपनी प्रतिलिपि बनाता है तो हर बार उसका अंतिम छोरजिसे टेलोमेयर कहते हैंथोड़ा छोटा हो जाता है। निश्चित संख्या में प्रतिलिपयाँ बनाने के बाद टेलोमेयर खत्म हो जाता है। टेलोमेयर के जीव विज्ञान की समझ और क्यों कैंसर कोशिकाएँ मरती नहीं (टेलोमरेज़ एँजाइम की बदौलत) इसका कारण समझने में कई लोगों का योगदान हैजिसकी परिणति डॉ. एलिजाबेथ ब्लैकबर्न और कैरोल ग्राइडर के शोध कार्य में हुई थी जिसके लिए वर्ष 2009 में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला था।
यह बात काफी पहले ही स्पष्ट हो गई थी कि पौधों में उम्र बढ़ने का तरीका जंतुओं से अलग है। डॉ. बारबरा मैकलिंटॉक ने इसे गुणसूत्र मरम्मत का नाम दिया था। डॉ. मैकलिंटॉक को यह समझाने के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था कि ‘जीन कैसे फुदकते या स्थानांतरित होते हैं
अब हम बेहतर ढंग से जानते हैं कि उम्र बढ़ना और टेलोमेयर का व्यवहार पेड़- पौधों और जंतुओं में अलग- अलग तरह से होता है। जब हम किसी जंतु के जीवनकाल की बात करते हैंतो हम उसके पूरे शरीर के जीवित रहने के बारे में बात करते हैं। किंतु पौधों में तुलनात्मक रूप से एक प्राथमिक शरीर योजना होती है। पौधे अलग-अलग हिस्सों- जड़तनाशाखापत्तीफूल जैसे मॉड्यूल्स- में वृद्धि करते हैं।यदि पत्तियाँ मर या झड़ भी जाती हैं तो बाकी का पेड़ या पौधा नहीं मरता। इसके अलावा पेड़-पौधे वृद्धि में वर्धी विभाजी ऊतक (वेजिटेटिव मेरिस्टेम) का उपयोग करते हैं यानी ऐसी अविभाजित कोशिकाएँ जो विभाजन करके पूरा पौधा बना सकती हैं। इसी वजह से किसी पेड़ या पौधे की एक शाखा या टहनी से नया पौधा उगाया जा सकता है या उसकी कलम किसी अन्य के साथ लगाकर अतिरिक्त गुणों वाला पौधा तैयार किया जा सकता है।
पेड़-पौधों में कोशिका की मृत्यु पूरे पौधे की मृत्यु नहीं होती। इस विषय पर विएना के डॉ. जे. मेथ्यू वॉटसन और डॉ. केरल रिहा द्वारा प्रकाशित पठनीय समीक्षा ‘टेलोमेयर - बुढ़ाना और पौधे - खरपतवार से मेथुसेला तकएक लघु समीक्षा’ आप इंटरनेट पर मुफ्त में पढ़ सकते हैं। यह समीक्षा जेरेंटोलॉजी में अप्रैल 2010 को प्रकाशित हुई थी। (स्रोत फीचर्स)

दाल की खाली होती कटोरी

दाल की खाली होती कटोरी
भारत डोगरा

भारत में सदियों से दालें जनसाधारण के लिए प्रोटीन का सबसे सामान्य व महत्त्वपूर्ण स्रोत रही हैं। अत: यह गहरी चिंता का विषय है कि दाल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में बहुत गिरावट आई है। इस स्थिति को तालिका से समझा जा सकता है।      
तालिका से स्पष्ट है कि वर्ष 1961 में हमारे देश में प्रति व्यक्ति 70 ग्राम दाल उपलब्ध थी, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के 80 ग्राम के सुझाव के बहुत पास थी। पर इसके बाद इसमें तेज़ी से गिरावट आई व एक समय यह उपलब्धता 29 ग्राम तक गिर गई। इसके बाद इसमें कुछ वृद्धि तो लाई गई पर यह वृद्धि काफी हद तक दाल के आयात द्वारा प्राप्त की गई जिसका हिस्सा कुछ वर्षों तक 14 प्रतिशत के आसपास रहा।
इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि वर्ष 1966 के बाद जो हरित क्रांति आई उसमें दलहन की उपेक्षा हुई व विशेषकर मिश्रित फसल में दलहन को उगाने की उपेक्षा भी हुई। पंजाब में तो इसके बाद के 16 वर्षों में दलहन का क्षेत्रफल कुल कृषि क्षेत्रफल में 13 प्रतिशत से घटकर 3 प्रतिशत रह गया।
भारत में प्रति व्यक्ति दाल उपलब्धता
वर्ष
मात्रा (ग्राम में)
1951
60.7
1961
69.0
1971
51.2
1981
37.5
1991
41.6
2001
30.0
2003
29.1
2007
35.5
2011
43.0
2016
43.6
स्रोत: आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18
इसके बाद आयात से दलहन उपलब्धता बढ़ाने के प्रयास हुए। आयात की गई बहुत सी दालों पर खतरनाक रसायनों, विशेषकर ग्लायफोसेट का छिड़काव होता रहा है।
दलहन की फसलों को अधिक उगाने से मिट्टी का प्राकृतिक उपजाऊपन बनाए रखने में मदद मिलती है ; क्योंकि इनकी जड़ें वायुमंडल से स्वयं नाइट्रोजन ग्रहण कर धरती को दे सकती हैं।
अत: देश में दलहन का उत्पादन बढ़ाने पर व इसकी मिश्रित खेती बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। हमारे देश की धरती अनेक तरह की दालों के लिए उपयुक्त है व हमारे किसानों के पास दलहन के उत्पादन का समृद्ध परंपरागत ज्ञान है। उन्हें सरकार की ओर से अधिक प्रोत्साहन मिलना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

..जलता रहा

...जलता रहा

ऋतु कौशिक

अश्क़ अपने ,आप ही पीता रहा
दरिया मेरी आँख में ठहरा रहा

धूप मेरा जिस्म पिघलाती रही 
और साया देख कर जलता रहा

कर ली थी उसने ग़मों से दोस्ती 
तब कहीं वो मुद्दतों ज़िन्दा रहा 

 रात से यारी रही मेरी ,मगर 
बरसों दिल आसेब से डरता रहा

इस तरह जीता रहा वो फुरसतें
याद में शामो सहर करता रहा 

मैं ही छाई हूँ मेरे चारों तरफ
दोस्तों का साथ अब जाता रहा।

सम्पर्कः मकान नम्बर 43सी, प्रोफेसर कालोनी, आज़ाद नगर, हिसार, पिन 125001, फोन 9354967636

माँ दीप सी जलती रही



1. माँ दीप सी जलती रही
-सपना मांगलिक

चूल्हा चौका पति और बच्चे
दिन रात ही वो खटती रही
हम मनाते रहे दीवाली
माँ दीप -सी जलती रही
रही बिखेरती ममता का आलोक
भूल सारे अपने दर्द और शोक
ढांप आँचल से नन्हीं सी लौ वो
तिमिर हालात के हरती रही
हम मनाते रहे दीवाली
माँ दीप- सी जलती रही
गठजोड़ औलादों का करके
खुद टूटकर माँ घटती रही
कलह द्वन्द करते रहे हम
वो वस्त्र शांति के सिलती रही
हम मनाते रहे दीवाली
माँ दीप सी जलती रही
बँट गई साथ वो घर के
उन औलादों की रहमत से
मांझे ने ही दिया छोड़ साथ
बन कटी पतंग वो गिरती रही
हम मनाते रहे दीवाली
माँ दीप- सी जलती रही
बोली न शब्द कटु फिर भी
मोती नैन सीप धरती रही
कौन आस बची उर उसके?
भावों से भाव गुँथती रही
हम मनाते रहे दीवाली
माँ दीप सी जलती रही

2. आजा चल दीवाली मना ले

हुआ जो अस्त कामनाओं का सूरज
दीप जूनून के फिर जला ले
काली रात से खौफ न खा तू
आजा चल दीवाली मना ले
आस विश्वास मूरत लक्ष्मी गणेश की
शीश इनके आगे तू झुका ले
रख वाग्देवी को मस्तिष्क में
खील खुशियों के अब बिखराले
आजा चल दीवाली मना ले
जोड़ मेहनतों के तिनके तू
ऊँची लक्ष्य हटरी बना ले
भर हसरतों के चंडोल दिल में
हृदय का दीवट यूँ सजा ले
आजा चल दीवाली मना ले
कर आह्वान प्रेम लक्ष्मी का
स्नेह आतिश जी भर छुड़ा ले
दूर कर तम वैर भाव का
भाई दूजों को गले लगा ले
आजा चल दीवाली मना ले

सम्पर्कः एफ-६५९ कमला नगर आगरा २८
फोन-९५४८५०९५०८ ईमेल –sapna8manglik@gmail.com