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Sep 9, 2018

नशा

नशा
– मुंशी प्रेमचंद
ईश्‍वरी एक बडे जमींदार का लड़का था और मैं गरीब क्‍लर्क था, जिसके पास मेहनत-मजूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी। हम दोनों में परस्‍पर बहसें होती रहती थीं। मैं जमींदारी की बुराई करता, उन्‍हें हिंसक पशु और खून चूसने वाली जोंक और वृक्षों की चोटी पर फूलने वाला बंझा कहता। वह जमींदारों का पक्ष लेता, पर स्‍वभावत: उसका पहलू कुछ कमजोर होता था, क्‍योंकि उसके पास जमींदारों के अनुकूल कोई दलील न थी। वह कहता कि सभी मनुष्‍य बराबर नहीं होते, छोटे-बडे हमेशा होते रहेंगे। लचर दलील थी। किसी मानुषीय या नैतिक नियम से इस व्‍यवस्‍था का औचित्‍य सिद्ध करना कठिन था। मैं इस वाद-विवाद की गर्मी-गर्मी में अक्‍सर तेज हो जाता और लगने वाली बात कह जाता, लेकिन ईश्‍वरी हारकर भी मुस्‍कराता रहता था मैंने उसे कभी गर्म होते नहीं देखा। शायद इसका कारण यह था कि वह अपने पक्ष की कमजोरी समझता था।
नौकरों से वह सीधे मुँह बात नहीं करता था। अमीरों में जो एक बेदर्दी और उद्दण्ता होती है, इसमें उसे भी प्रचुर भाग मिला था। नौकर ने बिस्‍तर लगाने में जरा भी देर की, दूध जरूरत से ज्‍यादा गर्म या ठंडा हुआ, साइकिल अच्‍छी तरह साफ नहीं हुई, तो वह आपे से बाहर हो जाता। सुस्‍ती या बदतमीजी उसे जरा भी बरदाश्‍त न थी, पर दोस्‍तों से और विशेषकर मुझसे उसका व्‍यवहार सौहार्द और नम्रता से भरा हुआ होता था। शायद उसकी जगह मैं होता, तो मुझसे भी वहीं कठोरताएँ पैदा हो जातीं, जो उसमें थीं, क्‍योंकि मेरा लोकप्रेम सिद्धांतों पर नहीं, निजी दशाओं पर टिका हुआ था, लेकिन वह मेरी जगह होकर भी शायद अमीर ही रहता, क्‍योंकि वह प्रकृति से ही विलासी और ऐश्‍वर्य-प्रिय था।
अबकी दशहरे की छुट्टियों में मैंने निश्‍चय किया कि घर न जाऊँगा। मेरे पास किराए के लिए रूपये न थे और न घरवालों को तकलीफ देना चाहता था। मैं जानता हूं, वे मुझे जो कुछ देते हैं, वह उनकी हैसियत से बहुत ज्‍यादा है, उसके साथ ही परीक्षा का ख्‍याल था। अभी बहुत कुछ पढना है, बोर्डिग हाउस में भूत की तरह अकेले पड़े रहने को भी जी न चाहता था। इसलिए जब ईश्‍वरी ने मुझे अपने घर का नेवता दिया, तो मैं बिना आग्रह के राजी हो गया। ईश्‍वरी के साथ परीक्षा की तैयारी खूब हो जाएगी। वह अमीर होकर भी मेहनती और जहीन है।
उसने उसके साथ ही कहा-लेकिन भाई, एक बात का ख्‍याल रखना। वहॉं अगर जमींदारों की निंदा की, तो मुआमिला बिगड. जाएगा और मेरे घरवालों को बुरा लगेगा। वह लोग तो आसामियों पर इसी दावे से शासन करते हैं कि ईश्‍वर ने असामियों को उनकी सेवा के लिए ही पैदा किया है। असामी में कोई मौलिक भेद नहीं है, तो जमींदारों का कहीं पता न लगे।
मैंने कहा-तो क्‍या तुम समझते हो कि मैं वहां जाकर कुछ और हो जाऊँगा?
‘हॉं, मैं तो यही समझताहूँ।
‘तुम गलत समझते हो।‘
ईश्‍वरी ने इसका कोई जवाब न दिया। कदाचित् उसने इस मुआमले को मरे विवेक पर छोड़ दिया। और बहुत अच्‍छा किया। अगर वह अपनी बात पर अड़ता, तो मैं भी जिद पकड़ लेता।
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सेकंड क्‍लास तो क्‍या, मैंनें कभी इंटर क्‍लास में भी सफर न किया था। अब की सेकंड क्‍लास में सफर का सौभाग्‍य प्राइज़ हुआ। गाडी तो नौ बजे रात को आती थी, पर यात्रा के हर्ष में हम शाम को स्‍टेशन जा पहुंचे। कुछ देर इधर-उधर सैर करने के बाद रिफ्रेशमेंट-रूम में जाकर हम लोगों ने भेजन किया। मेरी वेश-भूषा और रंग-ढंग से पारखी खानसामों को यह पहचानने में देर न लगी कि मालिक कौन है और पिछलग्‍गू कौन; लेकिन न जाने क्‍यों मुझे उनकी गुस्‍ताखी बुरी लग रही थी। पैसे ईश्‍वरी की जेब से गए। शायद मेरे पिता को जो वेतन मिलता है, उससे ज्‍यादा इन खानसामों को इनाम-इकराम में मिल जाता हो। एक अठन्‍नी तो चलते समय ईश्‍वरी ही ने दी। ‍फिर भी मैं उन सभों से उसी तत्‍परता और विनय की अपेक्षा करता था, जिससे वे ईश्‍वरी की सेवा कर रहे थे। क्‍यों ईश्‍वरी के हुक्‍म पर सब-के-सब दौडते हैं, लेकिन मैं कोई चीज मांगता हूं, तो उतना उत्‍साह नहीं दिखाते! मुझे भोजन में कुछ स्‍वाद न मिला। यह भेद मेरे ध्‍यान को सम्‍पूर्ण रूप से अपनी ओर खींचे हुए था।
गाड़ी आयी, हम दोनों सवार हुए। खानसामों ने ईश्‍वरी को सलाम किया। मेरी ओर देखा भी नहीं।
ईश्‍वरी ने कहा—कितने तमीजदार हैं ये सब? एक हमारे नौकर हैं कि कोई काम करने का ढंग नहीं।
मैंने खट्टे मन से कहा—इसी तरह अगर तुम अपने नौकरों को भी आठ आने रोज इनाम दिया करो, तो शायद इनसे ज्‍यादा तमीजदार हो जाएँ।
‘तो क्‍या तुम समझते हो, यह सब केवल इनाम के लालच से इतना अदब करते हैं।
‘जी नहीं, कदापित नहीं! तमीज और अदब तो इनके रक्‍त में मिल गया है।’
गाड़ी चली। डाक थी। प्रयास से चली तो प्रतापगढ जाकर रूकी। एक आदमी ने हमारा कमरा खोला। मैं तुरंत चिल्‍ला उठा, दूसरा दरजा है-सेकंड क्‍लास है।
उस मुसाफिर ने डिब्‍बे के अन्‍दर आकर मेरी ओर एक विचित्र उपेक्षा की दृष्टि से देखकर कहा—जी हाँ, सेवक इतना समझता है, और बीच वाले बर्थडे पर बैठ गया। मुझे कितनी लज्‍जा आई, कह नहीं सकता।
भोर होते-होते हम लोग मुरादाबाद पहुँचे। स्‍टेशन पर कई आदमी हमारा स्‍वागत करने के लिए खड़े थे। पाँच बेगार। बेगारों ने हमारा लगेज उठाया। दोनों भद्र पुरुष  पीछे-पीछे चले। एक मुसलमान था रियासत अली, दूसरा ब्राह्मण था रामहरख। दोनों ने मेरी ओर परिचित नेत्रों से देखा, मानो कह रहे हैं, तुम कौवे होकर हंस के साथ कैसे?
रियासत अली ने ईश्‍वरी से पूछा—यह बाबू साहब क्‍या आपके साथ पढ़ते हैं?
ईश्‍वरी ने जवाब दिया—हॉँ, साथ पढ़ते भी हैं और साथ रहते भी हैं। यों कहिए कि आप ही की बदौलत मैं इलाहाबाद पड़ा हुआ हूं, नहीं कब का लखनऊ चला आया होता। अब की मैं इन्‍हें घसीट लाया। इनके घर से कई तार आ चुके थे, मगर मैंने इनकारी-जवाब दिलवा दिए। आखिरी तार तो अर्जेंट था, जिसकी फीस चार आने प्रति शब्‍द है, पर यहाँ से उनका भी जवाब इनकारी ही था।
दोनों सज्‍जनों ने मेरी ओर चकित नेत्रों से देखा। आतंकित हो जाने की चेष्‍टा करते जान पड़े।
रियासत अली ने अर्द्धशंका के स्‍वर में कहा—लेकिन आप बड़े सादे लिबास में रहते हैं।
ईश्‍वरी ने शंका निवारण की—महात्‍मा गाँधी के भक्‍त हैं साहब। खद्दर के सिवा कुछ पहने ही नहीं। पुराने सारे कपड़े जला डाले। यों कहा कि राजा हैं। ढाई लाख सालाना की रियासत है, पर आपकी सूरत देखो तो मालूम होता है, अभी अनाथालय से पकड़कर आये हैं।
रामहरख बोले—अमीरों का ऐसा स्‍वभाव बहुत कम देखने में आता है। कोई भॉंप ही नहीं सकता।
रियासत अली ने समर्थन किया—आपने महाराजा चॉँगली को देखा होता तो दॉंतों तले उंगली दबाते। एक गाढ़े की मिर्जई और चमरौंधे जूते पहने बाजारों में घूमा करते थे। सुनते हैं, एक बार बेगार में पकड़े गए थे और उन्‍हीं ने दस लाख से कालेज खोल दिया।
मैं मन में कटा जा रहा था; पर न जाने क्‍या बात थी कि यह सफेद झूठ उस वक्‍त मुझे हास्‍यास्‍पद न जान पड़ा। उसके प्रत्‍येक वाक्‍य के साथ मानों मैं उस कल्पित वैभव के समीपतर आता जाता था।
मैं शहसवार नहीं हूँ। हॉँ, लड़कपन में कई बार लद्दू घोड़ों पर सवार हुआ हूँ। यहाँ देखा तो दो कलॉं-रास घोड़े हमारे लिए तैयार खड़े थे। मेरी तो जान ही निकल गई। सवार तो हुआ, पर बोटियॉं कॉंप रहीं थीं। मैंने चेहरे पर शिकन न पड़ने दिया। घोड़े को ईश्‍वरी के पीछे डाल दिया। खैरियत यह हुई कि ईश्‍वरी ने घोड़े को तेज न किया, वरना शायद मैं हाथ-पॉँव तुड़वाकर लौटता। संभव है, ईश्‍वरी ने समझ लिया हो कि यह कितने पानी में है।
3
ईश्‍वरी का घर क्‍या था, किला था। इमामबाड़े का—सा फाटक, द्वार पर पहरेदार टहलता हुआ, नौकरों का कोई सिसाब नहीं, एक हाथी बॅंधा हुआ। ईश्‍वरी ने अपने पिता, चाचा, ताऊ आदि सबसे मेरा परिचय कराया और उसी अतिशयोक्ति के साथ। ऐसी हवा बॉंधी कि कुछ न पूछिए। नौकर-चाकर ही नहीं, घर के लोग भी मेरा सम्‍मान करने लगे। देहात के जमींदार, लाखों का मुनाफा, मगर पुलिस कान्‍सटेबिल को अफसर समझने वाले। कई महाशय तो मुझे हुजूर-हुजूर कहने लगे!
जब जरा एकान्‍त हुआ, तौ मैंने ईश्‍वरी से कहा—तुम बड़े शैतान हो यार, मेरी मिट्टी क्‍यों पलीद कर रहे हो?
ईश्‍वरी ने दृढ़ मुस्‍कान के साथ कहा—इन गधों के सामने यही चाल जरूरी थी, वरना सीधे मुँह बोलते भी नहीं।
जरा देर के बाद नाई हमारे पांव दबाने आया। कुँवर लोग स्‍टेशन से आए हैं, थक गए होंगे। ईश्‍वरी ने मेरी ओर इशारा करके कहा—पहले कुँवर साहब के पाँव दबा।
मैं चारपाई पर लेटा हुआ था। मेरे जीवन में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि किसी ने मेरे पाँव दबाए हों। मैं इसे अमीरों के चोचले, रईसों का गधापन और बड़े आदमियों की मुटमरदी और जाने क्‍या-क्‍या कहकर ईश्‍वरी का परिहास किया करता और आज मैं पोतड़ों का रईस बनने का स्‍वांग भर रहा था।
इतने में दस बज गए। पुरानी सभ्‍यता के लोग थे। नई रोशनी अभी केवल पहाड़ की चोटी तक पहुंच पायी थी। अंदर से भोजन का बुलावा आया। हम स्‍नान करने चले। मैं हमेंशा अपनी धोती खुद छांट लिया करता हूँ; मगर यहाँ मैंने ईश्‍वरी की ही भाँति अपनी धोती भी छोड़ दी। अपने हाथों अपनी धोती छाँटते शर्म आ रही थी। अंदर भोजन करने चले। होस्‍टल में जूते पहले मेज पर जा डटते थे। यहॉं पाँव धोना आवश्‍यक था। कहार पानी लिये खड़ा था। ईश्‍वरी ने पाँव बढ़ा दिए। कहार ने उसके पाँव धोए। मैंने भी पाँव बढ़ा दिए। कहार ने मेरे पाँव भी धोए। मेरा वह विचार न जाने कहॉं चला गया था।
4
सोचा था, वहॉँ देहात में एकाग्र होकर खूब पढ़ेंगे, पर यहॉं सारा दिन सैर-सपाटे में कट जाता था। कहीं नदी में बजरे पर सैर कर रहे हैं, कहीं मछ‍लियों या चिडियों का शिकार खेल रहे हैं, कहीं पहलवानों की कुश्‍ती देख रहे हैं, कहीं शतरंज पर जमें हैं। ईश्‍वरी खूब अंडे मँगवाता और कमरे में ‘स्‍टोव’ पर आमलेट बनते। नौकरों का एक जत्‍था हमेशा घेरे रहता। अपने हाथ- पाँव हिलाने की कोई जरूरत नहीं। केवल जबान हिला देना काफी है। नहाने बैठो तो आदमी नहलाने को हाजिर, लेटो तो आदमी पंखा झलने को खड़े।
मैं महात्‍मा गांधी का कुँवर चेला मशहूर था। भीतर से बाहर तक मेरी धाक थी। नाश्‍ते में जरा भी देर न होने पाए, कहीं कुँवर साहब नाराज न हो जाऍं;बिछावन ठीक समय पर लग जाए, कुँवर साहब के सोने का समय आ गया। मैं ईश्‍वरी से भी ज्‍यादा नाजुक दिमाग बन गया था या बनने पर मजबूर किया गया था। ईश्‍वरी अपने हाथ से बिस्‍तर बिछाले लेकिन कुँवर मेहमान अपने हाथों कैसेट अपना बिछावन बिछा सकते हैं! उनकी महानता में बट्टा लग जाएगा।
एक दिन सचमुच यही बात हो गई। ईश्‍वरी घर में था। शायद अपनी माता से कुछ बातचीत करने में देर हो गई। यहॉं दस बज गए। मेरी ऑंखें नींद से झपक रही थीं, मगर बिस्‍तर कैसे लगाऊँ? कुँवर जो ठहरा। कोई साढ़े ग्‍यारह बजे महरा आया। बड़ा मुँह लगा नौकर था। घर के धंधों में मेरा बिस्‍तर लगाने की उसे सुधि ही न रही। अब जो याद आई, तो भागा हुआ आया। मैंने ऐसी डॉँट बताई कि उसने भी याद किया होगा।
ईश्‍वरी मेरी डॉँट सुनकर बाहर निकल आया और बोला—तुमने बहुत अच्‍छा किया। यह सब हरामखोर इसी व्‍यवहार के योग्‍य हैं।
इसी तरह ईश्‍वरी एक दिन एक जगह दावत में गया हुआ था। शाम हो गई, मगर लैम्‍प मेज पर रखा हुआ था। दियासलाई भी थी, लेकिन ईश्‍वरी खुद कभी लैम्‍प नहीं जलाता था। ‍‍फिर कुँवर साहब कैसे जलाऍं? मैं झुंझला रहा था। समाचार-पत्र आया रखा हुआ था। जी उधर लगा हुआ था, पर लैम्‍प नदारद। दैवयोग से उसी वक्‍त मुंशी रियासत अली आ निकले। मैं उन्‍हीं पर उबल पड़ा, ऐसी फटकार बताई कि बेचारा उल्‍लू हो गया— तुम लोगों को इतनी फिक्र भी नहीं कि लैम्‍प तो जलवा दो! मालूम नहीं, ऐसे कामचोर आदमियों का यहॉं कैसे गुजर होता है। मेरे यहॉं घंटे-भर निर्वाह न हो। रियासत अली ने कॉँपते हुए हाथों से लैम्‍प जला दिया।
वहाँ एक ठाकुर अक्‍सर आया करता था। कुछ मनचला आदमी था, महात्‍मा गांधी का परम भक्‍त। मुझे महात्‍माजी का चेला समझकर मेरा बड़ा लिहाज करता था; पर मुझसे कुछ पूछते संकोच करता था। एक दिन मुझे अकेला देखकर आया और हाथ बाँधकर बोला—सरकार तो गांधी बाबा के चेले हैं न? लोग कहते हैं कि यह सुराज हो जाएगा तो जमींदार न रहेंगे।
मैंने शान जमाई—जमींदारों के रहने की जरूरत ही क्‍या है? यह लोग गरीबों का खून चूसने के सिवा और क्‍या करते है?
ठाकुर ने ‍पिर पूछा—तो क्‍यों, सरकार, सब जमींदारों की जमीन छीन ली जाएगी। मैंनें कहा-बहुत-से लोग तो खुशी से दे देंगे। जो लोग खुशी से न देंगे, उनकी जमीन छीननी ही पड़ेगी। हम लोग तो तैयार बैठे हुए हैं। ज्‍यों ही स्‍वराज्‍य हुआ, अपने इलाके असामियों के नाम हिबा कर देंगे।
मैं कुरसी पर पॉँव लटकाए बैठा था। ठाकुर मेरे पॉँव दबाने लगा। फिर बोला—आजकल जमींदार लोग बड़ा जुलुम करते हैं सरकार! हमें भी हुजूर, अपने इलाके में थोड़ी-सी जमीन दे दें, तो चलकर वहीं आपकी सेवा में रहें।
मैंने कहा—अभी तो मेरा कोई अख्तियार नहीं है भाई; लेकिन ज्‍यों ही अख्तियार मिला, मैं सबसे पहले तुम्‍हें बुलाऊँगा। तुम्‍हें मोटर-ड़्राइवरी सिखाकर अपना ड्राइवर बना लूँगा।
सुना, उस दिन ठाकुर ने खूब भंग पी और अपनी स्‍त्री को खूब पीटा और गॉंव महाजन से लड़ने पर तैयार हो गया।
5
छुट्टी इस तरह तमाम हुई और हम फिर प्रयाग चले। गॉँव के बहुत-से लोग हम लोगों को पहुँचाने आए। ठाकुर तो हमारे साथ स्‍टेशन तक आया। मैनें भी अपना पार्ट खूब सफाई से खेला और अपनी कुबेरोचित विनय और देवत्‍व की मुहर हरेक हृदय पर लगा दी। जी तो चाहता था, हरेक नौकर को अच्छा इनाम दूँ, लेकिन वह सामर्थ्य कहॉँ थी? वापसी टिकट था ही, केवल गाड़ी में बैठना था; पर गाड़ी गई तो ठसाठस भरी हुई। दुर्गापूजा की छुट्टियॉं भोगकर सभी लोग लौट रहे थे। सेकंड क्‍लास में तिल रखने की जगह नहीं। इंटरव्यू क्‍लास की हालत उससे भी बदतर। यह आखिरी गाड़ी थी। किसी तरह रुक न सकते थे। बड़ी मुश्किल से तीसरे दरजे में जगह मिली। हमारे ऐश्‍वर्य ने वहॉं अपना रंग जमा लिया, मगर मुझे उसमें बैठना बुरा लग रहा था। आये थे आराम से लेटे-लेटे, जा रहे थे सिकुड़े हुए। पहलू बदलने की भी जगह न थी।
कई आदमी पढ़े-लिखे भी थे! वे आपस में अंगरेजी राज्‍य की तारीफ करते जा रहे थे। एक महाशय बोले—ऐसा न्‍याय तो किसी राज्‍य में नहीं देखा। छोटे-बड़े सब बराबर। राजा भी किसी पर अन्‍याय करे, तो अदालत उसकी गर्दन दबा देती है।
दूसरे सज्‍जन ने समर्थन किया—अरे साहब, आप खुद बादशाह पर दावा कर सकते हैं। अदालत में बादशाह पर डिग्री हो जाती है।
एक आदमी, जिसकी पीठ पर बड़ा गट्ठर बँधा था, कलकत्‍ते जा रहा था। कहीं गठरी रखने की जगह न मिलती थी। पीठ पर बॉँधे हुए था। इससे बेचैन होकर बार-बार द्वार पर खड़ा हो जाता। मैं द्वार के पास ही बैठा हुआ था। उसका बार-बार आकर मेरे मुँह को अपनी गठरी से रगड़ना मुझे बहुत बुरा लग रहा था। एक तो हवा यों ही कम थी, दूसरे उस गँवार का आकर मेरे मुँह पर खड़ा हो जाना, मानो मेरा गला दबाना था। मैं कुछ देर तक जब्‍त किए बैठा रहा। एकाएक मुझे क्रोध आ गया। मैंने उसे पकड़कर पीछे ठेल दिया और दो तमाचे जोर-जोर से लगाए।
उसनें ऑंखें निकालकर कहा—क्‍यों मारते हो बाबूजी, हमने भी किराया दिया है!
मैंने उठकर दो-तीन तमाचे और जड़ दिए।
गाड़ी में तूफान आ गया। चारों ओर से मुझ पर बौछार पड़ने लगी।
‘अगर इतने नाजुक मिजाज हो, तो अव्‍वल दर्जे में क्‍यों नहीं बैठे।‘
‘कोई बड़ा आदमी होगा, तो अपने घर का होगा। मुझे इस तरह मारते तो दिखा देता।’
‘क्‍या कसूर किया था बेचारे ने। गाड़ी में साँस लेने की जगह नहीं, खिड़की पर जरा सॉँस लेने खड़ा हो गया, तो उस पर इतना क्रोध! अमीर होकर क्‍या आदमी अपनी इन्‍सानियत बिल्‍कुल खो देता है।
’यह भी अंगरेजी राज है, जिसका आप बखान कर रहे थे।’
एक ग्रामीण बोला—दफ्तर मॉं घुस पावत नहीं, उस पै इत्‍ता मिजाज।
ईश्‍वरी ने अंगरेजी मे कहा- What an idiot you are, Bir!
और मेरा नशा अब कुछ-कुछ उतरता हुआ मालूम होता था।

पुस्तक- समीक्षा

मैं बैठी हूँ सात 
समंदर पार...
- कृष्णा वर्मा

काव्य संग्रह- ज़रा रोशनी मैं लाऊँ -डॉ. भावना कुँअर, प्रकाशक- अयन प्रकाशन, 1/20 महरौली नई दिल्ली -110020, मूल्य:,  पृष्ठ:132, वर्ष:2018
बहुमुखी रचना सम्पन्न डॉ. भावना कुँअर की जापानी विधाओं में कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ’ज़रा रोशनी मैं लाऊँ’ उनका पहला कविता संकलन है। सरल भाषा में रची काव्य रचनाएँ अपने आसपास से गहरा सरोकार रखती हैं। दुख-सुख, संघर्ष, रिश्ते-नाते, यादों की परछाइयाँ, या निजी जीवन इन सबके गहरे  अनुभवों से गुज़र कर उन्होंने अपने हर अहसास को शब्दों के माध्यम से बखूबी इस संग्रह की 66 छोटी बड़ी कविताओं में प्रस्तुत किया है।
पुरुष के कपट का दंश सहता मन कैसे पीड़ा में छटपटाता है ,जब उसके सपने पूर्ण होने से पहले कुचल दिए जाते हैं। भावना जी ने इस पीड़ा को अपनी कविता ’बड़े-बड़े सपने’ में कुछ यूँ अभिव्यक्त किया है-
बड़े-बड़े सपने, / जो अचानक / दिखाए थे तुमने
वो सब सपने / दिल की दहलीज पर आकर
खुशी में बरसे / आँसुओं की झड़ी में / फिसल कर रह गए।
चिड़िया, मछली तथा तितली आदि के माध्यम से  कवयित्री ने मानव मन के दुख-सुख को उकेरा है। दीन दुखियों की तड़प को महसूस करती, उनकी घुटन को रेखांकित करती उनकी रचनाएँ ‘दुखों की बस्ती’, ‘मासूम बच्चे’ बहुत भावपूर्ण हैं।
माँ पर लिखीं आपकी कविताओं ने मन को कहीं गहरे छू लिया। प्रवासी बेटी की मजबूरी, उसका दुख माँ-बेटी के अनुपम रिश्ते, सखी-सहेली की भाँति पल-पल संग बिताती जीवन और अचानक ब्याह कर साथ छूटने की वेदना को सहन करती बेटी, माँ को मिलने को छटपटा उठता है उसका मन। माँ के चौके की सुगंध को याद करती कवयित्री कहती है-
मैं बैठी हूँ सात समंदर पार / ढूँढती हूँ उस खुशबू को
जो दब गई है कभी धूल में।
सूनी कलाई, रिश्ते-नाते में जीवन में बदलती भूमिकाओं में संबंधों का धागा कैसे चटकता जाता है। जीवन में बनने वाले  मतलबी रिश्तों का कटु सत्य मर्म को छूने वाला हैं-
रिश्तों की बात करने के बाद एक ऐसा कोण ,जहाँ छिपी होती है निजता; जिसमें रागात्मक  तंत्र के गुम होने की टीस है,
अभिलाषाओं का हाथ छूट जाने का दर्द कवयित्री ने इन पंक्तियों में व्यक्त किया है-
दुनिया ने जब भी दर्द दिया / तुमने सँभाला  मुझे
तोहफ़ा, दर्द, प्यार, समेटे हैं अब सिलवटें, स्याह धब्बे आदि छोटी-छोटी कविताओं में सामान्य बोल-चाल की भाषा में जो आहत अनुभूतियों को अभिव्यक्त किया है, वह जिए- भोगे अतीत की खरोंचें और भावों की तिरछी रेखाएँ हैं।  कवयित्री की रचनाओं में सहज ही भावों के समूचे रंग छलछलाए हैं।
रचनात्मक ऊर्जा से भरी कविताएँ... 
काव्य संग्रह- घुँघरी -डा० कविता भट्ट, प्रकाशक- अयन प्रकाशन, 1/20 महरौली, नई दिल्ली -110020, मूल्य: 260 रूपये,  पृष्ठ: 128, वर्ष: 2018

डा० कविता भट्ट का नवप्रकाशित काव्य संग्रह मनमोहक कलेवर में विविध रंगों से सजा 48 कविताओं तथा काव्य की अन्य विधाओं का यह संकलन कवयित्री के अनुभवों की विविधता से संपन्न है। पहाड़ी जीवन के पोर-पोर से वाकिफ़ कविता जी ने विषम पहाड़ी जीवन, उसके दुख, उल्लास, जीने की विवशता स्त्री मन में बहते दर्द की भावधारा को बड़े सुंदर ढ़ंग से व्यक्त किया है।
’पहाड़ी नार’, ’घुँघरी’,  ’कौन -सी चर्चा चलती है’,  ’काँच की चूड़ियाँ’,  ’प्रिय यदि तुम पास होते’ में नारी मन में करवट लेती धाराएँ, अंतर्मन  की पीड़ा का सुंदर चित्रण किया है-
'चम्पा की कली', सामाजिक विडंबनाओं को बखानती रचना। 'फूलदेई'  में कवयित्री वर्तमान की आँधी में लुप्त होते लोकपर्व, फूलों -सा मुरझाता बचपन, संस्कृति और संस्कारों को समाप्ति की ओर जाते देख कर व्यथित है।  
'बंद दरवाज़ा' में गाँव में होते बदलाव, पलायन का दुख दिखता है। बंद दरवाज़ों और खिड़कियों की गहन उदासियों के बीच उजालों की इंतज़ार में कहीं एक आस का जुगनू चमकता दिखाई देता है। इस कविता में दरवाज़ों और खिड़कियों का बोलना यह सिद्ध करता है कि मन में किसी शुभ की आशा अभी   जीवित है। 
'बुराँस की नई कली'में वसंत आगमन की मोहक प्राकृतिक छटा। इस कविता की गेयता में एक गति  है, जो थिरकने के लिए बाध्य करती है-
बुराँस की नई कली किवाड़ खोल कर चली
सखी बसंत आ गया, दिशा-दिगंत छा गया
’मैतियों के आर्से-रुटाने’ कविता में इतनी ख़ूबसूरती से कवयित्री ने हिंदी के संग लोकभाषा को पिरोया है कि आंचलिक शब्दों के बावजूद इनके भाव अपने संग बहा ले गए।
संग्रह में कविताओं के साथ-साथ क्षणिकाएँ, मुक्तक, दोहे, हाइकु, ताँका, चोका मन को सतम्भित करती एक से बढ़ कर एक सुंदर रचनाएँ। काव्य की इन विधाओं में इनकी रचनात्मक ऊर्जा देखते बनती है।
क्षणिका-‘प्रणय निवेदन’ देखिए -
जिस उम्मीद से / किसान देखता है /आकाश की ओर
उसी उम्मीद-सा है, प्रिय!/तुम्हारा प्रणय-निवेदन।
गहन अनुभूति  एवं  दिल को छूने वाली भाषा में एक ताँका देखिए--
कभी पसारो / बाहें नभ-सी तुम /मुझे भर लो /आलिंगन में प्रिय
अवसाद हर लो।
कविता भट्ट के हाइकु के तेवर कुछ  अलग ही अनुभव से उत्पन्न  हैं ।  भाव और भाषा नूतनता लिये हुए  कुछ उदाहरण देखिए -1-तुम प्रणव / मैं श्वासों की लय हूँ / तुम्हें ही जपूँ।  
2-पाहन हूँ मैं / तुम हीरा कहते / प्रेम तुम्हारा।
3-तुम हो शिल्पी / प्रतिमा बना डाली / मैं पत्थर थी।
नीरव घाटी, चाय-चुस्की सा।, पथराई आँखें, मैं हूँ उद्गीत, तुम प्रणव, तुम हो शिल्पी, जैसे प्रयोग अर्थ में नई ऊर्जा भर  देते हैं। उत्कृष्ट सृजन के लिए बधाई एवं शुभकामनाएँ।

मुंबई की आर्ट-डेको इमारतें विश्व धरोहर

मुंबई की आर्ट-डेको इमारतें विश्व धरोहर
                                         - जाहिद खान
किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति तथा सांस्कृतिक, प्राकृतिक व ऐतिहासिक धरोहर से होती है। यह धरोहर न सिर्फ उसे विशिष्टता प्रदान करती है बल्कि दूसरे देशों से उसे अलग भी दिखलाती है। हमारे देश में हर तरफ ऐसी सांस्कृतिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक छटाएँ बिखरी पड़ी हैं। प्राचीन स्मारक, मूर्ति शिल्प, पेंटिंग, शिलालेख, प्राचीन गुफाएँ, वास्तुशिल्प, ऐतिहासिक इमारतें, राष्ट्रीय उद्यान, प्राचीन मंदिर, अछूते वन, पहाड़, विशाल रेगिस्तान, खूबसूरत समुद्र तट, शांत द्वीप समूह और आलीशान किले।

इनमें से कुछ धरोहर ऐसी हैं, जिनका दुनिया में कोई मुकाबला नहीं। ऐसी ही अनमोल धरोहर दक्षिण मुंबई की विशेष शैली में बनीं 19वीं सदी की दर्जनों विक्टोरिया गॉथिक और 20वीं सदी की आर्ट डेको इमारतें हैं जिन्हें अब विश्व विरासत का दर्जा मिल गया है। यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने हाल ही में बहरीन की राजधानी मनामा में हुई अपनी 42वीं बैठक में विक्टोरिया गॉथिक और आर्ट डेको इमारतों को अपनी विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया है। एलिफेंटा और छत्रपति शिवाजी टर्मिनस स्टेशन के बाद मुंबई को यह तीसरा विश्व गौरव मिला है। इस घोषणा के साथ ही भारत में विश्व धरोहर स्थलों की सूची में 37 स्थान हो जाएँगे। यही नहीं, सबसे अधिक 5 धरोहर स्थलों के साथ महाराष्ट्र पहला राज्य हो जाएगा। ओवल ग्राउंड के साथ यह परिसर मियामी (अमेरिका) के बाद विश्व का एकमात्र ऐसा इलाका है, जहां समुद्र तट पर अन्य विक्टोरियन गॉथिक इमारतों के साथ बड़ी तादाद में बेहतरीन आर्ट डेको इमारतें मौजूद हैं। इनकी संख्या तकरीबन 39 होगी। यूनेस्को के इस फैसले के साथ ही मुंबई की पहचान अंतर्राष्ट्रीय फलक पर और भी मज़बूती के साथ दर्ज हो गई है।
विक्टोरिया गॉथिक और आर्ट डेको इमारतों को विश्व धरोहर की फेहरिस्त में शामिल करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार बीते चार साल से लगातार कोशिश कर रही थीं। युनेस्को को प्रस्ताव तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने साल 2012 में ही भेज दिया था। कोशिश अकेली सरकार की नहीं थी, बल्कि इसमें मुंबई के नागरिक भी जुड़े हुए थे। सही बात तो यह है कि उन्होंने ही इसकी सर्वप्रथम पहल की थी। यूडीआरआई, काला घोड़ा एसोसिएशन, ओवल कूपरेज रेसिडेंट्स एसोसिएशन, ओवल ट्रस्ट, नरीमन पॉइंट चर्चगेट सिटिज़न एसोसिएशन, हेरिटेज माइल एसोसिएशन, फेडरेशन ऑफ रेसिडेंट्स ट्रस्ट, आब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन और एमएमआर हेरिटेज कंज़र्वेशन सोसायटी जैसे संगठनों ने इसके लिए जमकर मेहनत की और बाकायदा एक अभियान चलाया। यूनेस्को की समिति जब इन स्थलों का दौरा करने मुंबई आई तो जानी-मानी वास्तु रचनाकार आभा नारायण लांबा और नगर विकास विभाग के प्रधान सचिव नितिन करीर ने मुंबई का पक्ष मज़बूती से रखा। आभा नारायण लांबा ने मुंबई के दावे का शानदार डोज़ियर बनाया और चौदह साल तक लगातार कोशिश करती रहीं कि ये इमारतें विश्व धरोहर में शामिल हो जाएँ। अंतत: ये कोशिशें रंग लार्इं और अंतर्राष्ट्रीय स्मारक और स्थल परिषद् की सिफारिश पर विक्टोरिया गॉथिक और आर्ट डेको इमारतों को विश्व विरासत की फेहरिस्त में शामिल कर लिया।
विश्व धरोहर सूची में किसी जगह का शामिल होना ही ये बताता है कि उस जगह की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कितनी कीमत होगी। युनेस्को की सूची में शामिल होने के बाद निश्चित तौर पर मुंबई में पर्यटकों की संख्या और बढ़ेगी।

आर्ट डेको इमारतों की बात करें, तो ये इमारतें मुंबई के वास्तुकला का अलंकार हैं। आर्ट डेको इमारतें (बॉम्बे डेको) दरअसल, युरोप और अमेरिका में 1920 और 1930 के दशक में फैले स्थापत्य आंदोलन की देन हैं। दक्षिण मुंबई में चर्चगेट स्टेशन और मंत्रालय के बीच स्थित अंडाकार क्रिकेट ग्राउंड ओवल मैदान के नाम से मशहूर है। ओवल मैदान के दाहिनी ओर करीब एक ही शैली में कतार से आर्ट डेको या मुंबई डेको शैली में बनी 125 से अधिक इमारतें हैं। इनका निर्माण प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के बाद साल 1920 से 1935 के बीच हुआ। उस समय मुंबई के नवधनाढ्यों द्वारा बनवाई गई इन इमारतों की शृंखला ओवल मैदान के किनारे तक ही सीमित नहीं रही। समुद्री ज़मीन पाटकर एक ही शैली की ये आर्ट डेको इमारतें मरीन ड्राइव पर भी बनाई गर्इं। ये आज भी नरीमन पॉइंट से गिरगांव चौपाटी तक खड़ी दिखाई देती हैं। इस शैली की इमारतों को विभिन्न वास्तुकारों ने डिज़ाइन किया था। आर्ट डेको इमारतों में रीगल सिनेमा, रजब महल, इंडिया इंश्योरेंस बिल्डिंग, न्यू एम्पायर सिनेमा, क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया, इंप्रेस कोर्ट, सूना महल, ओशियाना, इरोस सिनेमा और मरीन ड्राइव की कई रिहाइशी इमारतें शामिल हैं। कुछ आर्ट डेको इमारतें मुंबई के उत्तरी क्षेत्र में भी हैं।

ओवल मैदान के बार्इं ओर विक्टोरियन गॉथिक शैली की पुरानी बेहद खूबसूरत इमारतें हैं। इन इमारतों को सर गिल्बर्ट स्कॉट, जेम्स टिबशॉ और ले. कर्नल जेम्स फुलर जैसी हस्तियों ने डिज़ाइन किया था। इनका निर्माण ज़्यादातर 19वीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ था। फोर्ट क्षेत्र की विक्टोरियन शैली की इमारतों का वैभव चमत्कृत कर देने वाला है। इन इमारतों में मुंबई हाई कोर्ट, मुंबई विश्वविद्यालय, एलफिंस्टन कॉलेज, डेविड ससून लाइब्रोरी, छत्रपति शिवाजी वास्तु संग्रहालय, पुराना सचिवालय, नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, पश्चिम रेल मुख्यालय, क्रॉफर्ड मार्केट, सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज व एशियाटिक लाइब्रोरी और महाराष्ट्र पुलिस मुख्यालय प्रमुख हैं। 19वीं सदी की ये इमारतें ओल्ड बांबे फोर्ट की दीवारों से घिरी हुई थीं। बाद में दीवारें गिरा दी गर्इं, लेकिन इलाके के नाम के साथ फोर्ट शब्द जुडा रह गया। 11वीं सदी में विकसित युरोपियन शैली की इन इमारतों में गॉथिक शैली का वास्तुशिल्प है। इमारतों में लेसेंट खिड़कियाँ और दागे हुए काँच का भरपूर इस्तेमाल किया गया है, जो इन्हें बेहद आकर्षक बनाता है। मुंबई में हर साल आने वाले लाखों पर्यटक इन्हें देखकर कहीं खो से जाते हैं।

यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत में शामिल कर लिए जाने के बाद कोई भी जगह या स्मारक पूरी दुनिया की धरोहर बन जाता है। इन विश्व स्मारकों का संरक्षण यूनेस्को के इंटरनेशनल वर्ल्ड हेरिटेज प्रोग्राम के तहत किया जाता है। वह इनका प्रचार-प्रसार करती है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा पर्यटक इन स्मारकों के इतिहास, स्थापत्य कला, वास्तु कला और प्राकृतिक खूबसूरती से वाकिफ हों। विश्व विरासत की सूची में शामिल होने का एक फायदा यह भी होता है कि उससे दुनिया भर के पर्यटक उस तरफ आकर्षित होते हैं। अब केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार की सामूहिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वे दक्षिण मुंबई की इन शानदार इमारतों को सहेजने और सँवारने के लिए एक व्यापक कार्य योजना बनाए। न सिर्फ सरकार बल्कि हर भारतीय नागरिक की भी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह अपनी अनमोल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को सहेज कर रखे। इनके महत्व को खुद समझे और आने वाली पीढ़ियों को भी इनकी अहमियत समझाए। एक महत्वपूर्ण बात और, जो भी विदेशी पर्यटक इन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को देखने आए, उन्हें यहाँ सुरक्षा, अपनत्व और विश्वास का माहौल मिले। वे जब अपने देश वापिस लौटकर जाएँ, तो भारत की एक अच्छी छवि और यादें उनके संग हों। (स्रोत फीचर्स) 

शुक्र है शिक्षक हूँ

 1.शुक्र है शिक्षक हूँ

- शबनम शर्मा

नेता नहीं, एक्टर नहीं, रिश्वत खोर नहीं,
शुक्र है शिक्षक हूँ, कुछ और नहीं।
न मैं स्पाइसजेट में घूमने वाला गरीब हूँ,
न मैं किसी पार्टी के करीब हूँ,
कभी राष्ट्रीयता की बहस में मैं पड़ता नहीं,
मैं जन धन का लुटेरा या टैक्स चोर नहीं,
शुक्र है शिक्षक हूँ, कुछ और नहीं।
न मेरे पास मंच पर चिल्लाने का वक्त है,
न मेरा कोई दोस्त अफज़ल, याकूब का भक्त है,
न मुझे देश में देश से आज़ादी का अरमान है,
न मुझे दो-चार पोथे पढ़ लेने का गुमान है,
मेरी मौत पर गन्दी राजनीति नहीं, कोई शोर नहीं,
शुक्र है शिक्षक हूँ, कुछ और नहीं।
मेरे पास मैडल नहीं वापस लौटाने को,
नकली आँसू भी नहीं बेवजह बहाने को,
न झूठे वादे हैं, न वादा खिलाफी है,
कुछ देर चैन से सो लूँ, इतना ही काफी है,
बेशक खामोश हूँ, मगर कमज़ोर नहीं,
शुक्र है शिक्षक हूँ, कुछ और नहीं।
मैं और सड़क एक जैसे कहलाते हैं
क्योंकि हम दोनों वहीं रहते हैं
लेकिन सबको मंजिल तक पहुँचाते हैं,
रोज़ वही कक्षा, वही बच्चे, पर होता मैं
कभी बोर नहीं,
शुक्र है शिक्षक हूँ, कुछ और नहीं।

2. शिक्षक
इतना आसान नहीं है
शिक्षक बनना
उतरना पड़ता है
हर हृदय, हर मस्तिष्क
की उन छोटी-छोटी नसों में,
जो दिल से होकर दिमाग
तक जाती, और जीवन का
सच्चा मोल बताती।
बनाती हर बच्चे को
इक प्यारा सा इन्सान
जो, अपना हर किरदार
सही पथ पर, सही समय
पर निभा सके।
शिक्षक, सिर्फ शिक्षक नहीं होता,
वह एक मित्र है, भाई है,
माँ है, बाप है,
वर्तमान है, भविष्य है
रक्षक है, भक्षक है
क्योंकि शिक्षक का कहा
एक- एक शब्द
उसके बच्चों के लिए
भगवान का शब्द होता है,
त्यागना होता है
अपना सर्वस्व
और उड़ेलनी है
अपनी हर खुशी
जनहित में।
सम्पर्कः अनमोल कुंज, पुलिस चौकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब,
जिला सिरमौर, हि.प्र.मोब. – ०९८१६८३८९०९, ०९६३८५६९२३, E-mail- shabnamsharma2006@yahoo.co.in