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Jul 18, 2016

छह लघुकथाएँ

1.अहसास
- रचना गौड़ 'भारती'

एक चिड़िया रोज़ उसकी खिड़की पर आकर बैठती। आज जोरदार बारिश हो रही थी। खिड़की सूनी देख, उसे याद ही किया था कि भीगे पंख लिए कंपकंपाती सी चिडिय़ा खिड़की की सलाखों के बीच आकर बैठ गई। रह-रहकर अपने पंख फडफ़ड़ाने लगी, मानो पंखों को सुखा रही हो। सुधा भागती हुई अंदर आई और एक डलिया में तौलिया बिछाकर छज्जे के नीचे खिड़की से लगाकर रख दिया।
चिडिय़ा ने डलिया के चारों ओर घूमकर देखा आश्वस्त होने के बाद उसमें बैठ गई। तौलिए से उसके पंख सूख गए थे, अब वो उडऩे को तैयार थी। चिडिय़ा उड़ गई, सुधा ने जब डलिया देखी तो तौलिए पर उसे पंजों से बनी आकृति टी के आकार जैसी प्रतीत हुई। वो मुस्कुरा पड़ी शायद चिड़िया उसे थैंक्यू कह गई।

2.जनसेवा
नई क्रांति में अपशगुनों से भला कौन घबराता है, जब बात दफ्तर व चौकी की हो। शहर में बिगड़ी पेयजल आपूर्ति के आक्रोश में जनता अभियन्ताओं के कक्ष के बाहर मटकियाँ फोड़ रही थी। धरना- प्रदर्शन आदि चालू था। एक बारगी मन में आया बुरे समय में लोग घर के बाहर मटकी फोड़ते हैं, तो क्या जलदाय विभाग का समय ...।
हालात दिन ब दिन बिगड़ रहे थे। एक दिन मेरे घर के दरवाजे की घण्टी बजी देखा तो दो आदमी जिसमें से एक ने वर्दी पहनी थी वॉचमैन जैसी और दूसरा होगा कोई अदना कर्मचारी।
-मैडम! एक गिलास पानी मिलेगा।
-हाँ! हाँ जरूर।
-क्या बताएँ ऑफिस के अंदर-बाहर दोनों नल बंद हैं।
-अच्छा! आप लोग कौन से ऑफिस से आए हैं ?’
-वो नुक्कड़ पर है न, जलदाय विभाग की चौकी।

3.आज भी...।
सुनीता हमारे घर के ऑउट हॉउस में अपने छोटे से परिवार के साथ मुश्किलों के दिन काट रही थी। सर्दियों में अक्सर मेरे पास लॉन में आ बैठती। मैं अपने कागज़ों में उलझी बीच-बीच में उससे बात कर लेती। वो हसरत भरी निगाहों से मौन बस मुझे देखती रहती। मुझे कहानी का प्लॉट तैयार करना था, उसे देखकर जैसे मन में हिलोरें लेने लगा। मैंनें उससे पूछा-सुनीता कभी तुमने स्त्री की आज़ादी के बारे में सोचा है ?’
सुनीता-दीदी! मैं क्या जानूं ये तो आप लोग ही बता सकती हैं।
-अरे नहीं! तुम भी तो औरत हो। अच्छा बताओं मर्द और औरत की लड़ाई में हमेशा मर्द ही क्यों अपनी बात ऊपर रखता है ?’
सुनीता-दीदी! सच बताऊँ, जब भी लल्लन के पापा का कोई काम न हो बस हम पर गुस्सा उतार देते हैं। इसमें हमारा क्या दोष ?’
-फिर तुम क्या करती हो ?’
सुनीता-मैं जल्दी-जल्दी काम समेट लल्लन को लेकर कोने में दुबक जाती हूँ और क्या।

4.यश-अपयश
कब्रिस्तान में दो मुर्दे पास-पास दफ़न थे। एक दूसरे की मीमांसा में लीन। एक ने दूसरे से कहा-दोस्त! काफी समय से देख रहा हूँ लोग तुम्हारी कब्र पर फूल बरसाते रहते हैं और मेरी तरफ कोई देखता तक नहीं। जब मैं जीवित था तो सारी दुनियाँ मेरी जयजयकार में लगी माल्र्यापण करती थी।
दूसरा- मित्र! इसे ही दुनियाँ कहते हैं। तुम एक नेता थे इसलिए उस समय भीड़ तुम्हारे साथ थी। तुम अब मर गए। सत्ता भी बदल गई। मैं एक लेखक था सारा जीवन संघर्ष किया। प्रेस के दफ्तरों से निकाला भी गया। मगर ऐसा साहित्य रच आया जो लोगों की तब समझ से परे था। आज समझ में आया हैं।

5.मूक रिश्ता     
दिनभर की परेशानियों के बाद इक्वेरियम की रंगबिरंगी मछलियों का संसर्ग उसे शांति प्रदान  करता। दोनों वक्त भोजन के कण डालते समय उनपर उसका स्पर्श व खुश्बू मछलियां जैसे महसूस करतीं। एक बड़ी मछली उसकी उपस्थिति पा फ डफ़ ड़ाने लगती और भोजन के स्रोत पर पहुँच जाती। रिया को बहुत अच्छा लगता जैसे वो कह रही हो-आ गईं तुम ? मैं कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी।
कुछ दिन के लिए रिया को शहर के बाहर जाना पड़ा लिहाज़ा ये जिम्मेदारी गैर अनजान हाथों में सौंपनी पड़ी। अनभिज्ञता के चलते कुछ को छोड़ सारी मछलियाँ मर गईं।
रिया-उर्मि! नई मछलियाँ आ गईं मगर मैं उसे नहीं भूल पा रही उसके पास जाते ही उसका मचलना, फ ड़कना उसके और मेरे बीच संवाद जैसा था। आज इक्वेरयम के सूने माथे पर दोबारा बिंदिया तो सजा दी मगर जो रिश्ता कायम हुआ था उसकी टीस नहीं निकल रही।
उर्मि-जीवन में अपनों की जुदाई तक सहनी पड़ती है फिर वो तो एक मछली थी।
रिया-यादें जब सालतीं हैं, तभी रिश्तों की गहराई पता चलती है।

6.भाव विक्रय
एक बुढ़िया घण्टियाँ बेचा करती थी। सभी तरह की छोटी बड़ी घण्टियाँ। लोग भक्ति भाववश उससे घण्टी खरीदते भी थे। ये ही उसकी आजीविका भी थी और सूकून भी।
क्रेता-माँ जी! आप सिर्फ घण्टियाँ ही क्यों बेचती हो ? इससे कितनी आमदनी हो जाती होगी ?’
बुढिय़ा- आमदनी क्या बेटा, टेम निकाल रही हूँ अपना। बस दाल रोटी दे देता है मालिक।
क्रेता-और घण्टियाँ ही क्यों ?’
बुढिय़ा-कहते हैं जो इस लोक में जो करो, वो मालिक वहाँ देता है। देखो इसलिए सब दान करते हैं। मैं भी जब ऊपर जाऊँगीं तो कदम-कदम पर घण्टी बजाकर भगवान के दरबार में अपनी उपस्थिति दर्ज़रूँगी
अब क्रेता ने भी एक घण्टी खरीद ली।

सम्पर्क: 304,रिद्धि सिद्धि नगर प्रथम, बूंदी रोड, कोटा राजस्थान, मो.- 9414746668, 8058260600

फिर कभी मंदिर नहीं गई

 फिर कभी मंदिर नहीं गई

- डॉ. शील कौशिक

माँ नहीं है
पर सम्भाले हूँ मैं
उनका पुराना चश्मा
जिससे  झाँकती उनकी आँखें
रोक देती हैं मुझे
अगली गलती दोहराने से पहले।
कोने में खड़ी बैंत की मूठ पर रखा
उनका हाथ
सुझा देता है मुझे राह
अगली ठोकर खाने से पहले।
चारपाई के नीचे रखी उनकी चप्पलें
देती हैं गति
बर्फ हो गए मेरे पैरों को।

माँ के सिरहाने तिपाई पर रखा
वह पानी का घड़ा
जिसमें से पी कर
फिर कभी कोई प्यासा न रहा।
माँ के तकिए के नीचे रखा
सुईं- धागा
कुटुम्ब को सदा
जोड़े रखने को मुझे कहता।

और माँ का वह कमरा
जो बन गया है मेरे लिए पूजा स्थल
जिसे पाकर मैं फिर कभी मन्दिर नहीं गई  । 

 सम्पर्क- मेजर हॉउस-17, सेक्टर- 20 सिरसा- 125055, 
  मो. 9416847107

रहस्य

जीवन और नैतिक मूल्य का विरोधाभास
- सपना मांगलिक

भारत के विश्व में श्रेष्ठ स्थान रखने का आधार यहाँ के नैतिक मूल्य ही रहे हैं। नैतिक मूल्यों का ज्ञान स्म्रतियों की धूल को एकत्र ही नहीं करता अपितु वह तो साफ़ दर्पण की भाँती सबको प्रतिबिंबित करता है। जो सदा ताजा और नया है। और जो सदा वर्तमान में है। नैतिक मूल्य जीवन को एक ऐसा बगीचा बना देते है जहाँ पक्षी गाते हों, जहाँ वृक्ष नाच रहे हों, फूल खिल रहे हों, जहाँ पर सूर्य ख़ुशी से अपने कपोल चमका रहा हो। हम सब के भीतर कुछ ऐसा होता है जो पत्थर में नहीं है। जो प्रफ्फुलित होता है। मग्न होता है। सुबह के सूरज को देखते ही जो आह्लादित हो उठता हो। रात में चाँद सितारों को देख जिसे भीतर एक अनुपम शांति छा जाती हो। एक गुलाब को आप एकटक देखि, क्या वह एकांगी है? नहीं, वह कुछ और है उसमे जीवन की झलक है। सौन्दर्य है। एक सरगम है। एक पक्षी को ध्यान से उड़ते हुए देखिये। उड़ते हुए कितना बेफिक्र रहता है और किसी बैठे हुए पक्षी के पास जरा जाकर देखिये वह आपको देखते ही डर जाएगा, सहम के सिकुड़ जाएगा, कांपने लगेगा। मगर गुलाब का फूल- आप उसके जितने करीब जाओगे वो उतना ही प्यारा और निश्छल नजर आएगा। वजह सिर्फ़ इतनी सी है कि पक्षी की खूबसूरती कम हो् गई; क्योंकि वह आपसे डर गया मगर गुलाब आपसे नहीं डरा अपने में ग्न यथावत् अपनी टहनी पर मस्तमौला सा झूमता रहा।
 
अब एक मनुष्य को देखि, जब आप एक मनुष्य को देखते हैं तब आप जानते हैं कि इस मनुष्य की देह ही सब कुछ नहीं है। इसके भीतर इसके स्वाभाव में कुछ अलग है। इसकी आत्मा में गहराई है। उसकी आँखों में झांकिए   आपको देह का नहीं आत्मा का आभास होगा। आपने अक्सर देखा होगा लोगों को बातचीत करते समय, वह बोलते कुछ और हैं मगर उनकी आँखें कुछ और ही कह रही होती है। उनकी देह जुबान से झूठ भी बोल सकती है लेकिन आँखें उनसे तो आत्मा बाहर झाँकने का प्रयास करती है। कितना विरोधाभास है अन्दर और बाहर। यही इस जगत का रहस्य है यहाँ अक्सर विरोधाभास मिल जाया करते हैं। एक दूसरे में डूबे तो कभी पृथक। अक्सर विरोधाभास यहाँ आलिंगन करते हैं। सिद्धन कहता है शरीर है तो आत्मा नहीं हो सकती क्योंकि तब शरीर के ऊपर आत्मा की सीमा आरोपित हो जाती है अगर आत्मा भी है तो शरीर के जैसी ही दिखाई देनी चाहिए अदृश्य क्यों है,  जो अदृश्य है उसका अस्तित्व क्योंकर स्वीकार्य हो, शरीर का वजन तोला जा सकता है। आत्मा को दुनिया की किसी भी छोटी से छोटी या बड़ी बड़ी
तराजू पर तोलकर देख लो कोई वजन कोई माप आप प्राप्त नहीं कर पायेंगे। कहाँ है आत्मा? यहाँ तक कि शरीर को टुकड़े टुकड़े कर असंख्य भागों में विभक्त ही क्यों ना कर लिया जाए, आत्मा का साक्षात् आपको नहीं होगा। तर्क को सिद्ध करने की अनिवार्य शर्त है संश्लेषण और विश्लेषण तब जाकर किसी भी सिद्धांत का बोध किया जाता है। मगर आत्मा के सन्दर्भ में यही सबसे बड़ा विरोधाभास है कि यहाँ जो अदृश्य है वही सत्य है, जिसे कसौटी पर परखा ही नहीं जा सकता वही वास्तविक है।  यहाँ छिपा हुआ ही असीम सत्य है जो उजागर है उसका कोई मोल नहीं। जीवन की यही सबसे बड़ी खूबसूरती है यहाँ हर जगह विरोधाभास ही विरोधाभास आपको नजर आएगा जैसे नदी प्रवाहमान, गतिमान है मगर बहती दो किनारों के बीच है, जन्म और मृत्यु एक दूसरे से बिलकुल विपरीत हैं मगर एक ही जीवन से जुड़े हैं। रात और दिन दोनों ही काल के दो विपरीत खंड हैं मगर काल के साथ हैं, सर्दी और गर्मी मौसम के दो विरोधी भाग मगर वह भी साथ साथ हैं, जुड़े हैं अर्थात जीवन जैसा है विशिष्ट है जीवन पर कोई सिद्धान्त थोपा ही नहीं जा सकता, और यह इसलिए है की मनुष्य बहुत ही चालाक है वह सिद्धान्त अपने हिसाब से बनाता है और अपने ही सिद्धान्त को प्रतिपादित करने के लिए दुसरे हर सिद्धान्त का खंडन करता जाता है।

 वजह सिर्फ इतनी सी की वह खुद को और खुद के सिद्धान्त को सर्वश्रेष्ठ साबित करना चाहता है। जो उसके सिद्धान्त के अनुकूल वह सही जो विपरीत वह गलत। ठीक वैसे ही जैसे राजनीति में कभी कोई नीति नहीं होती मगर नाम है राजनीति। व्यावहारिक तौर तो सब जानते हैं कि इसमें अनीति के अलावा और कुछ नहीं होता। यहाँ घोषणाएँ तो नीति के आधार पर की जाती हैं और उनपर भरोसा करके ही राजनेताओं को चुना जाता है जो राजनेता जितना चतुर होता है वह घोषणा तो पूरी ईमानदारी के साथ करता है मगर चुने जाने के बाद निभाता उतनी बेईमानी से है। यह सत्य है कि राजनेता कितना ही झूठा क्यों न हो ,कहीं न कहीं उसे सत्य तो बोलना ही पड़ता है। उसके दिल की बात कहीं न कहीं तो जुबान पर आ ही जाती है। आज जीवन में आत्मा की और नैतिक मूल्यों की अत्यन्त आवश्यकता है। भौतिकतावाद जहाँ जीवन की सच्चाई और मासूम खुशियाँ लील ले गया है तब नैतिक मूल्य ही इसमें सुधार ला सकता है क्योंकि पर्यावरण का गिरता स्तर ,पूँजीवाद सभी का कारण जीवन में नैतिक मूल्यों का ह्रास होना ही है। आजकल जीवन में धर्म और राजनीति की अच्छी घुसपैठ हो ग है, और इन दोनों वृत्तियों का उद्देश्य मानव कल्याण नहीं अपितु दूसरों का शोषण करना होता है।  वे धर्म के नाम पर लोगों को बाँटते हैं। सम्प्रदाय खड़े करते हैं, और लड़वाते हैं वह लोगों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा ना देकर हिन्दू-मुसलमान, जैन -बौद्ध, नीची जाति-ऊँची जाति इत्यादि अलगाववादी शिक्षा देकर समाज से नैतिकता और सर्वभौमिकता का नामोनिशान मिटाने की कोशिश करते हैं। 

आज हमारे देश को, हम मनुष्यों को एक नयी नैतिकता की आवश्यकता है। पुरानी नैतिकता स्थानीय थी, न नैतिकता सार्वभौमिक होगी। पुरानी नैतिकता एक छोटे से घेरे में कैद थी, न नैतिकता का कोई घेरा ही नहीं होगा। पूरी मनुष्यता ही उसका विस्तार होगी। पुरानी नैतिकता हमें भड़काती थी कि देखो तुम्हारी चमड़ी काली और तुम्हारी गोरी है, तुम अलग, तुम हिन्दू, तुम मुस्लिम, मगर नई नैतिकता कहेगी मनुष्य मनुष्य है और कोई मनुष्य किसी अन्य मनुष्य से अलग नहीं।  सब मनुष्य उस परम पिता की संतान हैं एक हैं एक ही रहेंगे। 

सम्पर्क: एफ- 659 कमला नगर आगरा- 282005, फोन- 9548509508, sapna8manglik@gmail.com

भोर

 भोर 

- र्मिला शर्मा

सरस भोर की किरण ने,
फैलाया कैसा उल्लास!

चुपके से अरुणिमा सिमटती,
विकसित हो रहे जलजात!!

चपल को किला मौन रहे क्यों?
दिशि-दिशि में फैला आह्लाद!

स्वर- रस में डूबा कण-कण यों,
चहुँ ओर लालित्य प्रवाह!!

मृदु ओ मंद समीरण तुझसे,
पुलकित पल्लव और पराग !

नींद भरे दृग-पट खुलते ज्यों,
कलियों में नव-रस संचार!!

तृण-तृण पर यों विहँस रहा है,
तुहिन कणों का भव्य-विलास!

जल कण के लघु रुप में जैसे,
प्रतिबिम्बित हो रहा विराट!!

हे प्रकृति तुम पूज्य हमारी,
नमन तुम्हे है बारम्बार!!

कही मनुज से छीन ना लेना,
अनुराग मेरा वात्सल्य प्रवाह


सम्पर्क: 2/332, विद्याधर नगर, जयपुर-302039, मो. 30296089

कविताएँ

1

रजनी एक पहेली

-मंजुल भटनागर

बादल गरज रहा है
गहराती बदली है
सपने हवा संग
शाम गोधूली है।

ओस कण झर  रहे
चाँद दूर तक रहा
चाँदनी फलक पर
दिल हम जोली  है।

हवा बर्फ बन रही
पगडण्डी सांय सांय
सपन बैठ आँख में
बुनता डर सहेली है।

चंपा मौलसरी बहक रही
रात रानी जग रही
गेंदा गुलाब दूर खड़े
रजनी एक पहेली है.
  
2

 मिलने की हो आस

दस्तक दे दरवाजे पर
जब सूनी यादें  बहती  हैं
पंख पसारे धुँधली- सी छवि
सन्मुख आ कर बैठी है।

बारिश बदली संग लिये वो
रहती दिल के कोने में
रोज सहेली बन बैठी जब
रोती हूँ में कोने में।

इन्द्रनुष जब सज जाते हैं
बादल कोई गाता  है
जुगलबंदी संग जैसे कोई
पास मुझे बुलाता हो।

आकारों के महल बने हैं
दिन, पल के साज
गीत उभर आता है मन में
जब मिलने की हो आस।
-
O/503,Tarapore Towers, 3rd floor
 New Link Rd.Oshiwara, Andheri West Mumbai- 53.
 phone 09892601105, 022-42646045,   
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