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Dec 18, 2015

मास्टरनी

भुवनेश्वर की एक गुमनाम कहानी
भुवनेश्वर का जन्म 1910 उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था। एक प्रतिष्ठित वकील का पुत्र होने के बावजूद उनका जीवन अर्थाभाव में बीता। भुवनेश्वर की माँ बचपन में ही गुजर गई थी। इसके कारण उनको घर में घोर उपेक्षा झेलनी पड़ी। कम उम्र में घर छोड़कर वे इलाहबाद आ गए। शाहजहांपुर में महज इंटरमीडिएट तक पढ़े भुवनेश्वर को अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान था। उन्हें एकांकी का जनक माना जाता है, किन्तु उन्हें प्रसिद्धि मिली अपनी कहानी ‘भेडिय़े’ से। उनके लेखन के बारे में तरह- तरह की किवदंतियां फैलने लगी, कहा गया कि उनके नाटकों पर जॉर्ज बर्नार्ड शा तथा डी. एच. लॉरेंस का प्रभाव है और उनकी कहानी ‘भेडिय़े’ पर जैक लंडन के ‘कॉल ऑफ वाइल्ड’ की छाया देखी गई। भुवनेश्वर के जन्म-शताब्दी के साल में उनकी एक लगभग गुमनाम कहानी ‘मास्टरनी’ प्रस्तुत है। 1938 में प्रकाशित यह अपने समय की रचनाओं से अलग संवेदना से भरी कहानी है।

     मास्टरनी

उस रोज सुबह से पानी बरस रहा था। साँझ तक वह पहाड़ी बस्ती एक अपार और पीले धुंधलके में डूब सी गई थी। छिपे हुए सुनसान रास्ते, बदनुमा खेत, छोटे- छोटे एकरस मकान- सब उसी पीली धुंध के साथ मिलकर जैसे एकाकार हो गए थे।
औरतें घरों के दरवाजे बंद किये सूत सुलझा रही थीं। आदमी पास के एक गांव में गए थे। वहाँ मिशन का एक क्वार्टर था और एक भट्टी। वाकई, वहां बारिश की धीमी, एकरस और मुलायम छपाछप के कोई और आवाज नहीं आ रही थी।
चार बजने से कुछ ही मिनट पहले एक कॉटेज का दरवाजा खुला। यह कॉटेज मामूली मकानों से भी नीची और छोटी थी। उसके चरमराते हुए लकड़ी के जीने से पाँच- छह लड़के- लड़कियाँ उतरकर, बूढ़े किसानों की तरह झुककर, अपने बस्तों से बारिश बचाते, चुपचाप घुमावदार रास्ते पर चलकर आँखों से ओझल हो गए। जब तक वह दिखलाई देते रहे, उनकी मास्टरनी तनी हुई चुपचाप खड़ी उसी ओर देखती रही। फिर वह दरवाजे को मजबूती और अवज्ञा से बंद करके भीतर चली गई।
वह एक अधेड़ इसाई औरत थी- कठिन और गंभीर। दो साल पहले इसाईयों के इस गाँव में आकर, एक हिन्दुस्तानी मिशनरी की मदद से उसने यह स्कूल खोला था। इन दो सालों में उसका चेहरा और भी लम्बा, और भी पीला और स्वाभाव और भी चिड़चिड़ा हो गया था। गाँव में रहते हुए भी वह गाँव से जैसे अलग थी। स्त्रियाँ उससे डरती थीं मर्द उसको एक मर्दानी अवज्ञा से देखते थे।
आज के इतने नीले- नीले पहाड़ों और इस घने धुँध के सामने वह काँप सी उठी और दिन भर अपने दोनों हाथों को बगल में इधर- उधर फिराती रही।
इसके बाद बस्ती फिर सुनसान हो गई। सिर्फ एक बार मास्टरनी ने अपना द्वार खोलकर झाँका और फिर तुरंत ही बंद कर लिया।
करीब छह बजे जब धुँध का पीलापन पहाड़ों के साथ नीला हो रहा था, आखिरकार बस्ती में एक मानव दिखाई दिया। लम्बा रोगी सा एक सोलह- सत्रह साल का लड़का। पुराना फौजी कोट पहने था। कालर के बाहर उसने अपनी मैली कमीज निकाल रखी थी। कीचड़ बचाने के लिए वह सड़क के इस तरफ से उस तरफ मेंढकों की तरह फुदक रहा था। लकड़ी के जीने पर आकर उसने संतोष की साँस ली और एक भीगे कुत्ते की तरह अपने आपको झाड़कर जीने पर चढ़ गया।
‘लूसी बहन, बड़ा अँधेरा है।’ पास आते ही वह चिल्ला उठा था। ‘टूटू।’ मास्टरनी ने अपने हाथ  छोड़कर कहा और और फिर धीरे- धीरे चलकर छत से टंगी हुई लालटेन जला दी।  उस छोटे से गंदे और अँधेरे कमरे में रौशनी लालटेन से खून की तरह बहने लगी।
इस बीच टूटू बारिश और रास्ते पर भुनभुनाकर अपने बड़े और भारी कोट को टांगने की जगह खोज रहा था।
‘मैं कहता हूँ, तुम्हारे पास कोई कपड़ा है-  कम्बल का टुकड़ा- उकड़ा। मैं जूते साफ करूँगा।’
मास्टरनी ने चुपचाप झुककर उसके जूते साफ कर दिए। टूटू बराबर अपने जूतों की तरफ देखता हुआ ‘नहीं- नहीं’ कह रहा था।
मास्टरनी ने वैसे ही झुके- झुके पूछा, ‘घर पर सब अच्छे हैं।’ 
मेरे पास तुम्हारे लिए सैकड़ों खत हैं, सिर्फ मुरली तुमसे खफा है। तुमने उसके मोजे खूब बुने। वह जाड़े से नीली पड़ी जा रही है।
उसने अपनी बहिन को खत दे दिया और रौशनी के पास जाकर अपने भींगे बालों पर हाथ फेरने लगा। बीच- बीच में वह कुछ बुदबुदा उठता था। मास्टरनी पत्रों से सिर उठाकर उसकी तरफ देखती और फिर पढऩे लग जाती थी।
अब उसने खत एक ओर रखकर इस सोलह साल के लम्बे- चिकने युवक की तरफ देखना और उसके बारे में सोचना शुरू कर दिया। वह उसके बिल्कुल बचपन के बारे में सोचने लगी। जबकि उसके गरम मुलायम जिस्म को चिपटाकर वह एक पके हुए फल की तरह हो जाती थी।
‘तुम खत नहीं पढ़ रही हो’, उसने सहसा घूमकर कहा।
‘पढ़ लिया।’
उसका भाई खड़ा- खड़ा उसकी तरफ देखता रहा और फिर यह देखकर कि वह खत पढ़ चुकी है, बुदबुदा सा उठा, ‘मुरली के मोजे। और मम्मी ने कहा है...’
मास्टरनी ने जैसे चाकू से काटा, ‘और पापा कैसे हैं।’
टूटू ने भांडों सा मुँह बनाकर कहा- ‘वैसे ही।’
पापा रोगी, परित्यक्त, उपेक्षित-  उसे कभी भी न लिखते थे और इसीलिए उससे कुछ माँगते भी न थे।
‘तुम क्या करते हो।’
‘मैं- मैं रोज सवेरे- शाम पादरी तिवारी के साथ काम करता हूँ। मम्मी जान ले लें अगर मैं काम न करूँ। मुरली और मम्मी झमकती फिरती हैं।’
‘तुम मर्द हो’, उसकी बहिन ने जैसे स्वप्न में कहा और फिर वह वैसे ही टहलने लगी।
‘मैं दो साल में पादरी हो जाऊंगा’, टूटू ने कुछ गर्व और दिल्लगी से कहा।
कुछ देर वह दोनों चुप रहे। मास्टरनी ने एक संदूक पर बैठकर जल्दी- जल्दी बुनना शुरू कर दिया। बीच- बीच में एक अजीब और कड़वी मुस्कान उसके पीले और दागदार होंठों पर छा जाती थी।
टूटू एन उसी वक्त अपने चारों ओर के गंदे कमरे की टूटी कुर्सियों और मैले तकिये की ओर देखकर बार- बार सहम जाता था।
‘यह क्या। मुरली की स्टोकिंग है।’
‘देखते नहीं हो’, और मास्टरनी चौंक सी उठीं।
जबसे वह यहाँ आया था, टूटू का मन भीगते हुए कम्बल की तरह हर मिनट भारी होता जा रहा था। वह अपनी बहिन, अपने घर के बारे में इस तरह सोच रहा था जैसे वह दूरबीन से नए नक्षत्र देख रहा हो।
किसी के पैरों का जीने पर शोर हुआ। दो छोटी- छोटी लड़कियाँ हाथ पकड़े हुए अंदर आई। वह गबरून की ऊँचे- ऊँचे फ्राकें पहने थीं और उनके चेहरों पर किसानों की सी झुलस थी।
उनमें से बड़ी लड़की ने खाट पर एक मैली तामचीनी की प्लेट रख दी। उस पर एक लाल रुमाल पड़ा था। फिर अपनी छोटी बहन का हाथ पकड़कर वह खड़ी हो गई।
‘तुम क्या प्लेट चाहती हो?’
दोनों लड़कियों ने एक साथ सिर हिलाकर कहा, ‘हाँ।’
उसने उठकर उसमें से चार अंडे और अधपके टमाटर और एक सस्ता पीतल का बूच निकाल लिया।
‘अपने बाप से कहना कि टीचर ने कहा है-  हाँ’ और उसने खड़े होकर फिर दोनों हाथ बगलों में भींच लिए।
लड़कियाँ चुपचाप जैसे आई थीं वैसे ही चली गईं।
टूटू उनको बराबर एक विचित्र दिलचस्पी से देखता रहा। उनके जाने पर वह खिड़की की तरफ मुँह करके बोला, ‘तुम चाय नहीं पीती लूसी बहिन।’
मास्टरनी एकाएक बीच कमरे में खड़ी हो गई।
‘सुनो, यह पाँच रुपये हैं, और यह मुरली का स्टोकिंग और यह मम्मी का सिंगारदान। और कहना कि कोई मुझसे और कुछ न माँगे। सब मर जाएँ, गिरजे में जा पड़ें।’
पागलों की तरह दो छोटे- छोटे और सिकुड़े हाथों से रुपये, स्टोकिंग और सिंगारदान का अभिनय कर रही थी और बोल ऐसे रही थी जैसे उसका सारा खून जम रहा हो।
टूटू ने बड़ी पीड़ा से कहा, ‘लूसी बहिन।’
‘मेरे पास कुछ नहीं है-  कुछ नहीं है। तुम मेरा घर झाड़ लो।’ और उसने खिड़की धमाके से बंद कर दी।
मास्टरनी अपने पलंग पर जाकर बैठ गई। उसके दोनों हाथ उसकी पत्तियों को जकड़े थे। आज सारी जिंदगी के छोटे- बड़े घाव अचानक चसक उठे थे। कुछ सोचने की ताब उसमें न थी।
बाहर से किसी ने भर्राई हुई आवाज में कहा, ‘टीचर मैं आ सकता हूँ।’
टूटू उस तरफ बढ़ा। पर घृणा से दौड़ते हुए मास्टरनी ने दरवाजा आधा खोल, बाहर जा बंद कर लिया। टूटू ने उसकी झलक ही देखी थी। वह एक बुझे हुए चेहरे का अधेड़ किसान था-  ऐसे जैसे संडे को गिरजों में टोपियां उतारकर भीख मांगते हैं।
एक मिनट में मास्टरनी लौट आई। उसका चेहरा पहले से भी सख्त था। उसने टूटू को देखकर उधर से मुंह फेर लिया और अपने आप बुदबुदाकर कहा-
‘मैं ही क्यों... तुमसे मुझे कोई सरोकार नहीं-  तुम लोगों से मैं पूछती हूँ...’
और वह हथेलियों को बगलों में भींचकर और तेजी से टहलने लगी।
‘मैं जैसे जिंदा दफन हो गई हूँ। पर मुझे कब्र की शांति दे दो।’ वह वाकई हाथ फैलाकर शांति माँग रही थी।
टूटू गुमसुम बैठा हुआ रौशनी को घूर रहा था। सहसा उसने टूटू का हाथ पकड़ लिया।
‘जाओ, सोओ।’
टूटू ने आज्ञा का पालन किया।
मास्टरनी वैसे ही टहल रही थी। फिर चूर होकर उसी चारपाई पर गिर पड़ी।
टूटू आखिर चुप हो रहा। कमरे में सन्नाटा छा गया था।
केवल दूर- दूर पर रात के पोर वो पहरेदारों... के विचित्र स्वर चारों तरफ पहाड़ों से टकराकर इस कमरे में गिर- गिर पड़ते थे। 

बदला

यशस्वी रचनाकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
हिन्दी की यादगार कहानियां शृंखला में इस बार प्रस्तुत है ‘अज्ञेय’ की विशिष्ट कहानी....। कहानी, कविता, उपन्यास एवं निबंध विधाओं को समृद्ध करने वाले यशस्वी रचनाकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'. ‘अज्ञेय’ ने तारसप्तक संपादित कर आने वाले समय के बेहद महत्त्वपूर्ण कवियों को रेखांकित कर इतिहास रचा, अल्पभाषी ‘अज्ञेय’ जी वाद- विवादों की सीमारेखा से ऊपर उठकर प्रतिभा को पहचानने वाले उदार और अत्यंत गुणी संपादक माने जाते हैं। उन्होंने दिनमान जैसी पत्रिका के माध्यम से समकालीन प्रतिभाओं को मंच दिया। उनसे प्रोत्साहन और संरक्षण पाकर तब से संघर्षशील लेखकों में से अनेकों ने विस्तृत आकाश में उडऩे का हौसला पाया। अरे यायावर रहेगा याद, शेखर एक जीवनी, एक बूंद सहसा उछली, जैसी कृतियों के सर्जक के रूप में चर्चित अज्ञेय की कहानी ‘बदला’ प्रस्तुत है।

     बदला
अंधेरे डिब्बे में जल्दी- जल्दी सामान ठेल, गोद के आबिद को खिड़की से भीतर सीट पर पटक, बड़ी लड़की जुबैदा को चढ़ा कर सुरैया ने स्वयं भीतर घुस कर गाड़ी के चलने के साथ- साथ लम्बी साँस ले कर पाक परवरदीगार को याद किया ही था कि उसने देखा, डिब्बे के दूसरे कोने में चादर ओढ़े जो दो व्यक्ति आकार बैठे हुए थे, वे अपने मुसलमान भाई नहीं सिख थे! चलती गाड़ी में स्टेशन की बत्तियों से रह- रह कर जो प्रकाश की झलक पड़ती थी, उस में उसे लगा, उन सिखों की स्थिर अपलक आँखों में अमानुषी कुछ है। उन की दृष्टि जैसे उसे देखती है पर उस की काया पर रुकती नहीं, सीधी भेदती हुई चली जाती है, और तेज धार- सा एक अलगाव उनमें है, जिसे कोई छू नहीं सकता, छुएगा तो कट जाएगा! रोशनी इसके लिए काफी नहीं थी, पर सुरैया ने मानो कल्पना की दृष्टि से देखा कि उन आँखों में लाल- लाल डोरे पड़े हैं, और... और... वह डर से सिहर गयी। पर गाड़ी तेज चल रही थी, अब दूसरे डिब्बे में जाना असम्भव था। कूद पडऩा एक उपाय होता, किन्तु उतनी तेज गति में बच्चे- कच्चे लेकर कूदने से किसी दूसरे यात्री द्वारा उठा कर बाहर फेंक दिया जाना क्या बहुत बदत्तर होगा? यह सोचती और ऊपर से झूलती हुई खतरे की चेन के हैंडिल को देखती हुई वह अनिश्चित- सी बैठ गयी... आगे स्टेशन पर देखा जाएगा... एक स्टेशन तक तो कोई खतरा नहीं है कम से कम अभी तक तो कोई वारदात इस हिस्से हुई नहीं...
‘आप कहाँ तक जाएँगी?’
सुरैया चौंकी। बड़ा सिख पूछ रहा था। कितनी भारी उस की आवाज थी! जो शायद दो स्टेशन के बाद उसे मार कर ट्रेन से बाहर फेंक देगा, वह यहां उसे ‘आप’ कह कर सम्बोधन करे, इस की विडम्बना पर वह सोचती रह गयी और उत्तर में देर हो गयी। सिख ने फिर पूछा, ‘आप कितनी दूर जाएँगी?’
सुरैया ने बुरका मुँह से उठा कर पीछे डाल रखा था, सहसा उसे मुँह पर खींचते हुए कहा, ‘इटावे जा रही हूं।’
सिख ने क्षण- भर सोच कर कहा, ‘साथ कोई नहीं है?’
उस तनिक- सी देर को लक्ष्य करके सुरैया ने सोचा, हिसाब लगा रहा है कि कितना वक्त मिलेगा मुझे मारने के लिए... या रब, अगले स्टेशन पर कोई और सवारियाँ आ जाएँ... और साथ कोई जरूर बताना चाहिए उससे शायद यह डरा रहे! यद्यपि आज- कल के जमाने में वह सफर में साथ क्या जो डिब्बे में साथ न बैठे...कोई छुरा भोंक दे तो अगले स्टेशन तक बैठी रहना कि कोई आ कर खिड़की के सामने खड़ा हो कर पूछेगा, ‘किसी चीज की जरूरत तो नहीं...’
उस ने कहा, ‘मेरे भाई हैं... दूसरे डिब्बे में...’
आबिद ने चमक कर कहा, ‘कहाँ माँ? मामू तो लाहौर गये
हुए हैं।’
सुरैया ने उसे बड़ी जोर से डपट कर कहा, ‘चुप रह!’
थोड़ी देर बाद सिख ने फिर पूछा ‘इटावे में आप के अपने लोग हैं?’
‘हां।’
सिख फिर चुप रहा। थोड़ी देर बाद बोला, ‘आपके भाई को आप के साथ बैठना चाहिए था, आज- कल के हालात में कोई अपनों से अलग बैठता है?’
सुरैया मन ही मन सोचने लगी कि कहीं कम्बख्त ताड़ तो नहीं गया कि मेरे साथ कोई नहीं है!
सिख ने मानो अपने- आप से ही कहा, ‘पर मुसीबत में किसी का कोई नहीं है, सब अपने ही अपने हैं...’
गाड़ी की चाल धीमी हो गयी। छोटा स्टेशन था। सुरैया असमंजस में बैठी थी कि उतरे या बैठी रहे? दो आदमी डिब्बे में और चढ़ आये सुरैया के मन ने तुरन्त कहा, ‘हिन्दू’ और तब वह सचमुच और भी डर गयी, और थैली- पोटली समेटने लगी।
सिख ने कहा, ‘आप क्या उतरेंगी?’
‘सोचती हूँ भाई के पास जा बैठूं...’ क्या जीव है इंसान कि ऐसे मौके पर भी झूठ की टट्टी की आड़ बनाए रखता है...और कितनी झीनी आड़, क्योंकि डिब्बा बदलवाने भाई स्वयं न आता? आता कहाँ से, हो जब न?...
सिख ने कहा, ‘आप बैठी रहिये। यहां आपको कोई डर नहीं है। मैं आप को अपनी बहन समझता हूँ और इन्हें अपने बच्चे...आप को अलीगढ़ तक ठीक- ठीक मैं पहुँचा दूँगा। उस से आगे खतरा भी नहीं है, और वहां से आप के भाई- बंधु भी गाड़ी में आ ही जाएँगे।’
एक हिन्दू ने कहा, ‘सरदारजी, जाती है तो जाने दो न, आप को क्या?’
सुरैया न सोच पायी कि सिख की बात को, और इस हिन्दू की टिप्पणी को किस अर्थ में ले, पर गाड़ी ने चल कर फैसला कर दिया। वह बैठ गयी।
हिन्दू ने पूछा, ‘सरदार जी, आप पंजाब से आये हो?’
‘जी।’
‘कहाँ घर है आप का?’
‘शेखपुरे में था। अब यहीं समझ लीजिए...’
‘यहीं? क्या मतलब?’
‘जहाँ मैं हूँ, वही घर है! रेल के डिब्बे का कोना।’
हिन्दू ने स्वर को कुछ संयत कर, जैसा गिलास में थोड़ी- सी हमदर्दी उड़ेल कर सिख की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘तब तो आप शरणार्थी हैं...’
सिख ने मानो गिलास को ‘जी, मैं नहीं पीता’ कह कर ठेलते हुए, एक सूखी हँसी हँस कर कहा, जिसकी अनुगूँज हिन्दू महाशय के कान नहीं पकड़ सके, ‘जी।’
हिन्दू महाशय ने तनिक और दिलचस्पी के साथ कहा, ‘आपके घर के लोगों पर तो बहुत बुरी बीती होगी...’
सिख की आँखों में एक पल के अंश- भर के लिए अँगार चमक गया, पर वह इस दाने को भी चुगने न बढ़ा। चुप रहा। हिन्दू ने सुरैया की ओर देखते हुए कहा, ‘दिल्ली में कुछ लोग बताते थे, वहां उन्होंने क्या- क्या जुल्म किये हैं हिन्दुओं और सिक्खों पर। कैसी- कैसी बातें वे बताते थे, क्या बताऊं, जबान पर लाते शर्म आती है। औरतों को नंगा करके...’
सिख ने अपने पास पोटली बन कर बैठे दूसरे व्यक्ति से कहा, ‘काका, तुम ऊपर चढ़ कर सो रहो।’ स्पष्ट ही वह सिख का लड़का था, और जब उसने आदेश पा कर उठ कर अपने सोलह- सत्रह बरस के छरहरे बदन को अँगड़ाई में सीधा कर ऊपरी बर्थ की ओर देखा, तब उसकी आंखों में भी पिता की आंखों का प्रतिबिम्ब झलक आया। वह ऊपरी बर्थ पर चढ़ कर लेट गया, नीचे सिख ने अपनी टांगें सीधी की और खिड़की से बाहर की ओर देखने लगा।
हिन्दू महाशय की बात बीच में रुक गयी थी, उन्होंने फिर आरम्भ किया, ‘बाप- भाइयों के सामने ही बेटियों- बहनों को नंगा कर के...’
सिख ने कहा, ‘बाबू साहब, हमने जो देखा है वह आप हमीं को क्या बताएंगे...’ इस बार वह अनुगूँज पहले से ही स्पष्ट थी, लेकिन हिन्दू महाशय ने अब भी नहीं सुनी। मानो शह पा कर बोले, ‘आप ठीक कहते हैं...हम लोग भला आप का दु:ख कैसे समझ सकते हैं! हमदर्दी हम कर सकते हैं, पर हमदर्दी भी कैसी जब दर्द कितना बड़ा है यही न समझ पाएं! भला बताइए, हम कैसे पूरी तरह समझ सकते हैं कि उन सिखों के मन पर क्या बीती होगी जिन की आंखों के सामने उन की बहू- बेटियों को...’
सिख ने संयम से काँपते हुए स्वर में कहा, ‘बहू- बेटियाँ सब की होती हैं, बाबू साहब।’
हिन्दू महाशय तनिक- से अप्रतिभ हुए कि सरदार की बात का ठीक आशय उनकी समझ में नहीं आ रहा। किन्तु अधिक देर तक नहीं बोले, ‘अब तो हिन्दू- सिख भी चेते हैं। बदला लेना बुरा है, लेकिन कहाँ तक कोई सहेगा! इस दिल्ली में तो उन्होंने डट कर मोर्चे लिए हैं, और कहीं कहीं तो ईंट का जवाब पत्थर से देने वाली मसल सच्ची कर दिखाई है। सच पूछो तो इलाज ही यही है। सुना है करोलबाग में किसी मुसलमान डॉक्टर की लड़की को...’
अब की बार सिख की वाणी में कोई अनुगूँज नहीं थी, एक प्रकट और रड़कनेवाली रुखाई थी। बोला, ‘बाबू साहब, औरत की बेइज्जती सब के लिए शर्म की बात है। और बहिन...’ यहाँ सिख सुरैया की ओर मुखातिब हुआ, ‘आप से माफी मांगता हूं कि आप को यह सुनना पड़ रहा है।’
हिन्दू महाशय ने अचकचा कर कहा, ‘क्या- क्या- क्या- क्या? मैंने इनसे कुछ थोड़े ही कहा है?’ फिर मानो अपने को कुछ सँभालते हुए, और ढिठाई से कहा, ‘ये आप के साथ हैं?’
सिख ने और भी रुखाई से कहा, ‘जी। अलीगढ़ तक मैं पहुँचा रहा हूं।’
सुरैया के मन में किसी ने कहा, ‘यह बेचारा शरीफ आदमी अलीगढ़ जा रहा है! अलीगढ़- अलीगढ़...’ उस ने साहस कर पूछा, ‘आप अलीगढ़ उतरेंगे?’
‘हां।’
‘वहाँ कोई हैं आप के?’
‘मेरा कहां कौन है? लड़का तो मेरे साथ है।’
‘वहाँ कैसे जा रहे है? रहेंगे?’
‘नहीं, कल लौट आऊँगा।’
‘तो...तफरीहन जा रहे हैं!’
‘तफरीह!’ सिख ने खोये- से स्वर में कहा, ‘तफरीह?’ फिर सँभल कर, ‘नहीं, हम कहीं नहीं जा रहे अभी सोच रहे हैं कि कहां जाएं और जब टिकाऊ कुछ न रहे तब चलती गाड़ी में ही कुछ सोचा जा सकता है...’
सुरैया के मन में फिर किसी ने कोंच कर कहा, ‘अलीगढ़...अलीगढ़...बेचारा शरीफ है...’
उसने कहा, ‘अलीगढ़...अच्छी जगह नहीं है। आप क्यों जाते हैं?’
हिन्दू महाशय ने भी कहा, जैसे किसी पागल पर तरस खा रहे हों, ‘भला पूछिए...’
‘मुझे क्या अच्छी और क्या बुरी!’
‘फिर भी आप को डर नहीं लगता? कोई छुरा ही मार दे रात में...’
सिख ने मुस्करा कर कहा, ‘उसे कोई नजात समझ सकता है, यह आप ने कभी सोचा है?’
‘कैसी बातें करते हैं आप!’
‘और क्या! मारेगा भी कौन? या मुसलमान, या हिन्दू। मुसलमान मारेगा, तो जहाँ घर के और सब लोग गये हैं, वहीं मैं भी जा मिलूँगा; और अगर हिन्दू मारेगा, तो सोच लूँगा कि यही कसर वाकी थी देश में जो बीमारी फैली है वह अपने शिखर पर पहुँच गयी और अब तन्दुरुस्ती का रास्ता शुरू होगा।’
‘मगर भला हिन्दू क्यों मारेगा? हिन्दू लाख बुरा हो, ऐसा काम नहीं करेगा...’
सरदार को एकाएक गुस्सा चढ़ आया, उसने तिरस्कारपूर्वक कहा, ‘रहने दीजिए, बाबू साहब! अभी आप ही जैसे रस ले- ले कर दिल्ली की बातें सुना रहे थे अगर आप के पास छुरा होता और आप को अपने लिए खतरा न होता, तो आप क्या अपने साथ बैठी सवारियों को बंख्श देते? इन्हें या मैं बीच में पड़ता तो मुझे?’ हिन्दू महाशय कुछ बोलने को हुए पर हाथ के अधिकारपूर्ण इशारे से उन्हें रोकते हुए सरदार कहता गया, ‘अब आप सुनना ही चाहते हैं तो सुन लीजिए कान खोल कर। मुझसे आप हमदर्दी दिखाते हैं कि मैं आपका शरणार्थी हूँ। हमदर्दी बड़ी चीज है, मैं अपने को निहाल समझता, अगर आप हमदर्दी देने के काबिल होते। लेकिन आप मेरा दर्द कैसे जान सकते हैं, जब आप उसी साँस में दिल्ली की बातें ऐसे बेदर्द ढंग से करते हैं? मुझसे आप हमदर्दी कर सकते होते उतना दिल आप में होता तो जो बातें आप सुनाना चाहते हैं, उनसे शर्म के मारे आपकी जबान बन्द हो गयी होती, सिर नीचा हो गया होता! औरत की बेइज्जती औरत की बेइज्जती है, वह हिन्दू या मुसलमान की नहीं, वह इंसान की मां की बेइज्जती है। शेखपुरे में हमारे साथ जो हुआ सो हुआ मगर मैं जानता हूँ कि उसका मैं बदला कभी नहीं ले सकता हूँ क्योंकि उसका बदला हो ही नहीं सकता। मैं बदला दे सकता हूँ और वह यही, कि मेरे साथ जो हुआ है, वह और किसी के साथ न हो। इसीलिए दिल्ली और अलीगढ़ के बीच इधर और उधर लोगों को पहुँचता हूँ, मेरे दिन भी कटते हैं और कुछ बदला चुका भी पाता हूँ, और इसी तरह, अगर कोई किसी दिन मार देगा तो बदला पूरा हो जाएगा चाहे मुसलमान मारे, चाहे हिन्दू! मेरा मकसद तो इतना है कि चाहे हिन्दू हो, चाहे सिख हो, चाहे मुसलमान हो, जो मैंने देखा है वह किसी को न देखना पड़े, और मरने से पहले मेरे घर के लोगों की जो गति हुई, वह परमात्मा न करे किसी की बहू- बेटियों को देखनी पड़े।’
इस के बाद बहुत देर तक गाड़ी में बिलकुल सन्नाटा रहा। अलीगढ़ के पहले जब गाड़ी धीमी हुई, तब सुरैया ने बहुत चाहा कि सरदार से शुक्रिया के दो शब्द कह दे, पर उसके मुँह से भी बोल नहीं निकला।
सरदार ने ही आधे उठ कर ऊपर के बर्थ की ओर पुकारा, ‘काका, उठो, अलीगढ़ आ गये है।’ फिर हिन्दू महाशय की ओर देख कर बोला, ‘बाबू साहब, कुछ कड़ी बात कह गया हूँ तो माफ करना, हम लोग तो आप की सरन हैं!’
हिन्दू महाशय की मुद्रा से स्पष्ट दिखा कि वहाँ वह सिख न उतर रहा होता तो स्वयं उतर कर दूसरे डिब्बे में जा बैठते।  

जार्ज पंचम की नाक

कहानी कला के उस्ताद कमलेश्वर
  कथाकार कमलेश्वर की कहानी जार्ज पंचम की नाक हिन्दी कहानी संसार की अद्भुत प्रस्तुति मानी जाती है। जार्ज पंचम की मूर्ति की टूटी हुई नाक के बहाने कहानीकार ने स्वतंत्र देश के लिए लडऩे वाले महापुरुषों और आजाद देश के बच्चों को जिस तरह याद किया है उससे कहानी में कई दिशाओं की यात्राओं का प्रस्थान बिन्दु पाठक पाता है। आजाद देश के परतंत्र मानस के प्रतिनिधियों की खाल उधेडऩे का करिश्मा भी कमलेश्वर ने इस कहानी में काफी पहले कर दिखाया था। कहानी कला के उस्ताद कमलेश्वर की यह कहानी उनकी सैकड़ों कहानियों में से एक है। कमलेश्वर नई कहानी त्रयी के विलक्षण प्रतिनिधि थे। मध्यमवर्गीय जीवन के अमर शिल्पी कमेश्वर ने मानवीय संबंधों के खोखलेपन पर अपनी कहानियों में बखूबी कटाक्ष भी किया है।
छत्तीसगढ़ से कमलेश्वर को विशेष लगाव था। पं. माधवराव सप्रे की कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को हिन्दी की पहली कहानी के रूप में उन्होंने स्थापित किया। साहित्य अकादमी की पहल पर किताबघर से प्रकाशित चार खंडों के ऐतिहासिक दस्तावेज में यह कहानी के रूप में ससम्मान दर्ज है। प्रस्तुत है कथा शिल्पी कमलेश्वर की अद्भुत कहानी ‘जार्ज पंचम की नाक’।


        जार्ज पंचम की नाक
यह बात उस समय की है जब इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ द्वितीय अपने पति के साथ हिन्दुस्तान पधारने वाली थी। अखबारों में उनके चर्चे हो रहे थे। रोज लंदन के अखबारों से खबरें आ रही थीं कि शाही दौरे के लिए कैसी- कैसी तैयारियां हो रही हैं। रानी एलिजाबेथ का दर्जी परेशान था कि हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और नेपाल के दौरे पर रानी कब क्या पहनेंगी? उनका सेक्रेटरी और शायद जासूस भी उनके पहले ही इस महाद्वीप का तूफानी दौरा करनेवाला था। आखिर कोई मजाक तो था नहीं, जमाना चूंकि नया था, फौज- फाटे के साथ निकलने के दिन बीत चुके थे, इसलिए फोटोग्राफरों की फौज तैयार हो रही थी।
इंग्लैंड के अखबारों की कतरनें हिन्दुस्तानी अखबारों में दूसरे दिन चिपकी नजर आती थीं- कि रानी ने एक ऐसा हल्के रंग का सूट बनवाया है जिसका रेशमी कपड़ा हिन्दुस्तान से मंगाया गया है कि करीब चार सौ पौंड खर्चा उस सूट पर आया है।
रानी एलिजाबेथ की जन्मपत्री भी छपी। प्रिंस फिलिप के कारनामे छपे और तो और उनके नौकरों, बावर्चियों, खानसामों, अंगरक्षकों की पूरी की पूरी जीवनियां देखने में आयीं। शाही महल में रहने और पलनेवाले कुत्तों तक की तस्वीरें अखबारों में छप गयीं...
बड़ी धूम थी, बड़ा शोर- शराबा था, शंख इंग्लैंड में बज रहा था, गूँज हिन्दुस्तान में आ रही थी।
इन अखबारों से हिन्दुस्तान में सनसनी फैल रही थी... राजधानी में तहलका मचा हुआ था। जो रानी पांच हजार रुपए का रेशमी सूट पहनकर पालम के हवाई अड्डे पर उतरेगी, उसके लिए कुछ तो होना ही चाहिए। कुछ क्या, बहुत कुछ होना चाहिए। जिसके बावर्ची पहले महायुद्ध में जान हथेली पर लेकर लड़ चुके हैं, उसकी शान- शौकत के क्या कहने... और वही रानी दिल्ली आ रही है...
नई दिल्ली ने अपनी तरफ देखा और बेसाख्ता मुंह से निकल गया- वह आये हमारे घर, खुदा की रहमत... कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते हैं, और देखते- देखते नई दिल्ली का कायापलट होने लगा।
और करिश्मा तो यह था कि किसी ने किसी से नहीं कहा, किसी ने किसी को नहीं देखा, पर सड़कें जवान हो गयीं, बुढ़ापे की धूल साफ हो गयी। इमारतों ने नाज़नीनों की तरह शृंगार किया।
लेकिन एक बड़ी मुश्किल पेश थी... वह थी जॉर्ज पंचम की नाक।... नई दिल्ली में सब कुछ था, सब कुछ होता जा रहा था,  सब कुछ हो जाने की उम्मीद थी, पर जॉर्ज पंचम की नाक की बड़ी मुसीबत थी। नई दिल्ली में सब कुछ था... सिर्फ नाक नहीं थी।
इस नाक की भी एक लम्बी दास्तान है। इस नाक के लिए बड़े तहलके मचे थे किसी वक्त। आंदोलन हुए थे। राजनीतिक पार्टियों ने प्रस्ताव पास किए थे। चंदा जमा किया था। कुछ नेताओं ने भाषण भी दिए थे, गर्मागर्म बहसें भी हुई थीं। अखबारों के पन्ने रंग गए थे। बहस इस बात पर थी कि जॉर्ज पंचम की नाक रहने दी जाए या हटा दी जाए। और जैसा कि हर राजनीतिक आंदोलन में होता है- कुछ पक्ष में थे, कुछ विपक्ष में थे और ज्यादातर लोग खामोश थे। खामोश रहने वालों की ताकत दोनों तरफ थी...।
यह आंदोलन चल रहा था। जॉर्ज पंचम की नाक के लिए हथियारबंद पहरेदार तैनात कर दिए गए थे... क्या मजाल कि कोई उनकी नाक तक पहुंच जाए। हिन्दुस्तान में जगह- जगह ऐसी नाकें खड़ी थीं और जिन तक लोगों के हाथ पहुंच गए उन्हें शानो- शौकत के साथ उतारकर अजायबघरों में पहुंचा दिया गया। शाही लाटों की नाकों के लिए गुरिल्ला युद्ध होता रहा।
उसी जमाने में यह हादसा हुआ। इंडिया गेट के सामने वाली जॉर्ज पंचम की लाट की नाक एकाएक गायब हो गयी। हथियार बंद पहरेदार अपनी जगह तैनात रहे, गश्त लगाते रहे... और लाट की नाक चली गई।
रानी आये और नाक न हो। ... एकाएक यह परेशानी बढ़ी। बड़ी सरगर्मी शुरु हुई। देश के खैरख्वाहों की एक मीटिंग बुलायी गयी और मसला पेश किया गया कि क्या किया जाए? ... वहां सभी एकमत से इस बात पर सहमत थे कि अगर यह नाक नहीं है, तो हमारी भी नाक नहीं रह जाएगी...।
उच्च स्तर पर मशविरे हुए। दिमाग खरोंचे गये और यह तय किया गया कि हर हालत में नाक का होना बहुत जरूरी है। यह तय होते ही एक मूर्तिकार को हुक्म दिया गया कि वह फौरन दिल्ली में हाजिर हो।
मूर्तिकार यों तो कलाकार था, पर जरा पैसे से लाचार था, आते ही उसने हुक्कामों के चेहरे देखे... अजीब परेशानी थी उन चेहरों पर - कुछ लटके हुए थे, कुछ उदास थे और कुछ बदहवास थे, उनकी हालत देखकर लाचार कलाकार की आंखों में आंसू आ गये...। तभी एक आवाज सुनाई दी-  ‘मूर्तिकार। जॉर्ज पंचम की नाक लगानी है। ‘
मूर्तिकार ने सुना और जवाब  दिया- ‘नाक लग जाएगी, पर मुझे यह मालूम होना चाहिए कि यह लाट कब और कहां बनी थी? इस लाट के लिए पत्थर कहां से लाया गया था?’
सब हुक्कामों ने एक दूसरे की तरफ ताका... एक की नजर ने दूसरे से कहा कि यह बताना  तुम्हारी जिम्मेदारी है। खैर, मसला हल हुआ, एक क्लर्क  को फोन किया गया और इस बात की पूरी छानबीन करने का काम सुपुर्द कर दिया गया पर कुछ भी पता नहीं चला, क्लर्क ने लौटकर कमेटी के सामने कांपते हुए, बयान किया- ‘सर। मेरी खता माफ हो, फाइलें सब कुछ हजम कर चुकी हैं।’
हुक्कामों के चेहरे पर उदासी के बादल छा गये। एक खास कमेटी बनायी गयी और उसके जिम्मे यह काम दे दिया गया कि जैसे भी हो यह काम होना है और इस नाक का दारोमदार आप पर है। आखिर मूर्तिकार को फिर बुलाया गया... उसने मसला हल किया दिया। वह बोला - ‘पत्थर की किस्म का ठीक पता नहीं चलता तो परेशान मत होइए... मैं हिन्दुस्तान के हर पहाड़ पर जाऊंगा और ऐसा ही पत्थर खोजकर लाउंगा।’ कमेटी के सदस्यों की जान में जान आई। सभापति ने चलते- चलते गर्व से कहा- ‘ऐसी क्या चीज है जो अपने हिन्दुस्तान में मिलती नहीं, हर चीज इस देश के गर्भ में छिपी है ... जरूरत खोज करने की है... खोज करने के लिए मेहनत करनी होगी। आने वाला जमाना खुशहाल होगा।’
वह छोटा सा भाषण फौरन अखबारों में छप गया। मूर्तिकार हिन्दुस्तान के पहाड़ी प्रदेशों और पत्थरों की खानों के दौरे पर निकल पड़े। कुछ दिन बाद वह हताश लौटे। उनके चेहरे पर लानत बरस रही थी।
उन्होंने सिर लटकाकर खबर दी - ‘हिन्दुस्तान का चप्पा- चप्पा खोज डाला, पर इस किस्म का पत्थर कहीं नहीं मिला। यह पत्थर विदेशी है।’
‘सभापति ने तैश में आकर कहा- लानत है आपकी अक्ल पर। विदेशों की सारी चीज हम अपना चुके हैं... दिल- दिमाग, तौर- तरीके और रहन- सहन... जब हिन्दुस्तान में बाल डांस तक मिल जाता है तो पत्थर क्यों नहीं मिल सकता।
मूर्तिकार चुप खड़ा था। सहसा उसकी आंखों में चमक आ गयी। उसके कहा, ‘एक बात मैं कहना चाहूंगा, लेकिन इस शर्त पर कि यह बात अखबारवालों तक न पहुंचे...’
सभापति की आंखों में भी चमक आई। चपरासी को हुक्म हुआ और कमरे के सब दरवाजे बंद कर दिए गए। तब मूर्तिकार ने कहा- ‘देश में अपने नेताओं की मूर्तियां भी हैं... अगर इजाजत हो... अगर आप लोग ठीक समझें, तो मेरा मतलब है, तो जिसकी नाक इस लाट पर ठीक बैठे, उसे उतार लाया जाए...’
सबने सबकी तरफ देखा, सबकी आंखों में एक क्षण की बदहवासी के बाद खुशी तैरने लगी। सभापति ने धीमे से कहा  लेकिन बड़ी होशियारी से।
और मूर्तिकार फिर देश- दौरे पर निकल पड़ा, जॉर्ज पंचम की खोयी हुई नाक का नाप उसके पास था। दिल्ली से वह मुम्बई पहुँचा... दादा भाई नौरोजी, गोखले, तिलक, शिवाजी कावस जी, जहांगीर... सबकी नाके उसने टटोली, नापीं और गुजरात की ओर भागा- गांधीजी, सरदार पटेल, विट्ठलभाई पटेल, महादेव देसाई की मूर्तियां को परखा और बंगाल की ओर चला। गुरु रविन्द्रनाथ, सुभाषचंद्र बोस, राजा राममोहन राय आदि को भी देखा, नाप-जोख की और बिहार की तरफ चला, बिहार होता हुआ उत्तरप्रदेश की ओर आया- चंद्रशेखर आजाद, बिस्मिल, मोतीलाल नेहरू, मदनमोहन मालवीय की लाटों के पास गया... घबराहट में मद्रास भी पहुंचा, सत्यमूर्ति को भी देखा और मैसूर- केरल आदि सभी प्रदेशों का दौरा करता हुआ पंजाब पहुंचा। लाला लाजपतराय और भगत सिंह की लाटों से भी सामना हुआ। आखिर दिल्ली पहुंचा और अपनी मुश्किल बयान की- ‘पूरे हिन्दुस्तान की मूर्तियाँ की परिक्रमा कर आया, सबकी नाकों का नाप लिया, पर जॉर्ज पंचम की इस नाक से सब बड़ी निकलीं।’
सुनकर सब हताश हो गए और झुंझलाने लगे, मूर्तिकार ने ढांढस बंधाते हुए आगे कहा, सुना था कि बिहार सेक्रेटेरियट के सामने सन बयालीस में शहीद होने वाले तीन बच्चों की मूर्तियां स्थापित हैं। शायद बच्चों की नाक ही फिट बैठ जाए, यह सोचकर वहां भी पहुंचा... पर उन तीनों की नाकें भी इससे कहीं बड़ी बैठती हैं, अब बताइए, मैं क्या करूं?
... राजधानी में सब तैयारियाँ थीं। जार्ज पंचम की लाट को मल- मलकर नहलाया गया था। रोगन लगाया था। सब कुछ था, सिर्फ नाक नहीं थी।
बात फिर बड़े हुक्कामों तक पहुंची। बड़ी खलबली मची-  अगर जार्ज पंचम के नाक न लग पायी तो फिर रानी का स्वागत करने का मतलब? यह तो अपनी नाक कटानेवाली बात हुई।
लेकिन मूर्तिकार पैसे ले लाचार था... यानी हार माननेवाला कलाकार नहीं था। एक हैरतअंगेज खयाल उसके दिमाग में कौंधा और उसने पहली शर्त दुहराई। जिस कमरे में कमेटी बैठी हुई थी, उसके दरवाजे फिर बंद हुए और मूर्तिकार ने अपनी नयी योजना पेश की - ‘चूंकि नाक लगना एकदम जरूरी है, इसलिए मेरी राय है कि चालीस करोड़ में से कोई एक जिंदा नाक काटकर लगा दी जाए...’
बात के साथ ही सन्नाटा छा गया। कुछ मिनटों की खामोशी के बाद सभापति ने सबकी तरफ देखा। सबको परेशान देखकर मूर्तिकार कुछ अचकचाया और धीरे से बोला ‘आप लोग क्यों घबराते हैं? यह काम मेरे ऊपर छोड़ दीजिए... नाक चुनना मेरा काम है ... आपकी सिर्फ इजाजत चाहिए।’
कानाफूसी हुई और मूर्तिकार की इजाजत दे दी गयी।
अखबारों में सिर्फ इतना छपा कि नाक का मसला हल हो गया है और राजपथ पर इंडिया गेट के पास वाली जार्ज पंचम की लाट के नाक लग रही है।
नाक लगने के पहले फिर हथियारबंद पहरेदारों की तैनाती हुई। मूर्ति के आस- पास का तालाब सुखाकर साफ किया गया। उसकी खाब निकाली गयी और ताजा पानी डाला गया, ताकि जो जिंदा नाक लगायी जाने वाली थी, वह सूखने न पाए, इस बात की खबर औरों को नहीं थी, ये सब तैयारियां भीतर- भीतर चल रही थीं, रानी के आने का दिन नजदीक आता जा रहा था। मूर्तिकार खुद अपने बताए हल से परेशान था। जिंदा नाक के लाने के लिए उसने कमेटीवालों से कुछ और मदद मांगी। वह उसे दी गयी, लेकिन हिदायत के साथ कि एक खास दिन हर हालत में नाक लग जाएगी।
और वह दिन आया।

जार्ज पंचम के नाक लग गयी।
सब अखबारों ने खबरें छापीं कि जार्ज पंचम के जिंदा नाक लगायी गयी है...यानी ऐसी नाक जो कतई पत्थर की नहीं लगती।
लेकिन उस दिन के अखबारों में एक बात गौर करने की थी। उस दिन देश में कहीं भी किसी उद्घाटन की खबर नहीं थी। किसी ने कोई फीता नहीं काटा था। कोई सार्वजनिक सभा नहीं हुई थी। कहीं भी किसी का अभिनंदन नहीं हुआ था। कोई मानपत्र भेंट करने की नौबत नहीं आई थी। किसी हवाई अड्डे या स्टेशन पर स्वागत समारोह नहीं हुआ था। किसी का ताजा चित्र नहीं छपा था।
सब अखबार खाली थे।
पता नहीं ऐसा क्यों हुआ था?
नाक तो सिर्फ एक चाहिेए थी, और वह भी बुत के लिए।

विसर्जन

डॉ.परदेशी राम वर्मा की कहानी
हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में समान रूप से लिखकर देश भर में पहचान बनाने वाले चुनिंदा साहित्यकारों में से एक डॉ.परदेशी राम वर्मा ने कहानी, उपन्यास, संस्मरण, जीवनी, निबंध, शोध प्रबंध आदि सभी विधाओं में पर्याप्त लेखन किया है। उनके अब तक पाँच कथा संग्रह, दो उपन्यास, नौ संस्मरण एवं एक नाटक प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कृति ‘औरत खेत नहीं’ कथा संग्रह को अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा मदारिया सम्मान प्राप्त हुआ है। तीन हिन्दी तथा एक छत्तीसगढ़ी कहानी पुरस्कृत हुई है। उनकी पत्रिका ‘आरूग फूल’ को मघ्यप्रदेश साहित्य परिषद का सप्रे सम्मान और उपन्यास ‘प्रस्थान’ को महन्त अस्मिता पुरस्कार प्राप्त हुआ है। उनके छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘आवा’ को रविशंकर विश्वविद्यालय में एमए हिन्दी के पाठयक्रम में सम्मिलित किया गया है। वे ‘आगासदिया’ पत्रिका का संपादन करते हैं।
उनकी कथा संग्रह ‘औरत खेत नहीं’ में प्रकाशित एक विशिष्ठ कहानी ‘विसर्जन’ में उन्होंने छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन की एक त्रासद भरी झांकी प्रस्तुत की है। आज से चार दशक पहले मध्यप्रदेश शासन ने नदी किनारे शराब का कारखाना डलवाया था जिससे पानी तो प्रदूषित हुआ ही युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में आ गई, जिसका दुष्परिणाम आज तक गाँवों में देखने को मिलता है। विश्वास है पाठकों को उनकी यह आंचलिक कहानी पसंद आयेगी।                      - संपादक

             विसर्जन
बकरी चराने वाले लड़कों के लिए यह इलाका एकदम निरापद था। इस पूरे क्षेत्र में बकरी पालन का व्यवसाय इसीलिए तो फल फूल रहा था। चारों ओर जंगल, पास में छोटी- छोटी पहाडिय़ाँ। पहाडिय़ों के बीच छोटे- छोटे मैदान। मैदान और पहाडिय़ों से सटकर बहती छोटी सी नदी और नदी के उपरी कछार पर बन गए टीले के उपर स्थित एक नामी गाँव ढाबा। ढाबा का मतलब होता है भंडार। मगर यह ढाबा नाम का कोई एक ही गाँव नहीं है इस क्षेत्र में। ढाबा नाम के तीन और गाँव है, अत: पहचान के लिए हर ढाबा के साथ कोई विशेषण जोड़ दिया जाता है। मैं जिस ढाबा का जिक्र कर रहा हूँ उसे इस क्षेत्र में बोकरा ढाबा के नाम से जाना जाता है। बकरी पालन का व्यवसाय खूब फूला फला, इसीलिए होते- होते इसका नाम बोकरा ढाबा प्रचलित हो गया।
छत्तीसगढ़ी में बकरे को बोकरा ही कहते हैं। घर- घर तो यहाँ बकरे पलते हैं। सुबह हुई नहीं कि घरों से बकरों के दलों के साथ छोकरे निकल पड़ते हैं अपने निरापद चरागाह की ओर। इस चरागाह का नाम भी बोकरा डोंगरी है। अब तो गीतों में भी इस डोंगरी का नाम आने लगा है। छत्तीसगढ़ में एक लोकगीत भी प्रचलित है
'चलो जाबो रे
बोकरा चराय बर जी
बोकरा डोंगरी खार मन।’
अर्थात चलो साथियों, बोकरा डोंगरी में चले अपने अपने बकरे चराने के लिए आगे वर्णन आता है कि डोंगरी में घास बहुत है। पेड़ों की छाया है। पास में बहती है नदी।
यह बात भी सोची जा सकती है कि गाँव का नाम 'बोकरा ढाबा’ ही क्यों पड़ा। आखिर इस रूप में गाँव की पहचान क्यों बनी -
हुआ यूँ कि काशीराम यादव रोज की तरह अपनी बकरियाँ, भेड़ें लेकर पाँच बरस पहले एक दिन बड़े फज़र निकला डोंगरी की ओर। साथ में उसका पंद्रह बरस का लड़का हीरा भी था। हीरा तालापार के स्कूल में आठवीं तक पढ़कर निठल्ला बैठ गया था। उसके घर में पूंजी के रूप में मात्र तीस बकरियाँ और भेड़ें थीं। बाप बकरी चराकर उसे आठवीं तक ही पढ़ा पाया। स्कूल तो इस क्षेत्र में दस मील दूर एक ही गाँव में था। नदी के उस पार तालापार में वह स्कूल जाता था। ढाबा से सिर्फ दो लड़के अब तक आठवीं पास कर सके हैं। एक यह हीरा, दूसरा समारू। दोनों के बाप बकरी चराते थे। दोनों आठवीं पास करने के बाद खाली बैठ गये। नौकरी लगती तब कुछ और पढ़ लेते। घर की हालत इतनी अच्छी नहीं कि उनके बाप शहर भेजकर उन्हें आगे पढ़ा पाते। इसीलिए वे भी अपने बाप के साथ चल निकलते डोंगरी की ओर।
उस दिन कांशीराम के साथ हीरा भी जा रहा था। आगे- आगे बकरियाँ चर रही थी बकरियों के गले में टुनुन टुनुन बजती घंटियाँ। कुछ बड़ी बकरियों के गले में छोलछोला। एक दो गाय भी थीं। बहुत हरहरी थीं और भागती बहुत थी, इसीलिए उनके पावों में काशी ने लकड़ी का गोडार बाँध दिया था। सब जानवर आगे आगे जा रहे थे। अभी मैदान आया ही था कि दो मोटर साइकिलों से लंबी लंबी मूँछोवाले चार लोग उतरकर खड़े हो गए। उनके हाथें में लाठियाँ थीं एक के हाथ में चिडिय़ाँ मारने की बंदूक भी थी। काशी को रोकरकर एक लम्बे से आदमी ने कहा, 'रूक बे बोकरा खेदा’। काशी को उसका यह कथन बुरा तो लगा, मगर वह जान गया कि या तो ये जंगल विभाग के आदमी हैं या पुलिस या फिर पास वाले कस्बे के दारू ठेकेदार के बंदे। हीरा के साथ सहमते हुए काशी उन्हें सलाम कर खड़ा हो गया।
उनमें से एक नौजवान ने कहा, 'भाई मियां, क्या आदमी का शिकार करना है चिडिय़ा तो साली कोई मरी नहीं।’
मूँछ वाले ने उसकी बात का मजा लेते हुए कहा, 'यार तुम भी हो अकल के दुश्मन। अरे भाई, आदमी तो यहाँ कोई रहता नहीं। बकरी चराते हैं सब साले। सभी जानवर की तरह हैं। तुम भी यार चश्मा लगाओं आँखों में। यह लंडूरा तुम्हें आदमी दिखता है क्या?’
कहते हुए उसने काशी के हाथ की बाँसुरी छीन ली। हीरा ने अचानक चिल्लाकर कहा, 'बाँसुरी क्यों छीनते हैं हमने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा ‘ मुछियल ने एक लात हीरा के कूल्हे पर जमाते हुए कहा,  'तुम क्या बिगाड़ोगे साले  बिगाडऩे के लिए चाहिए दम! अब जो भी बिगाडऩा होगा हम बिगाड़ेंगे।’
हीरा मार खाकर जमीन पर गिर गया। उसके मुँह से खून आने लगा। काशी दौड़ पड़ा बेटे को उठाने के लिए। तब तक चारों में से सबसे तगड़े लगने वाले व्यक्ति ने हुकुम दे दिया। 'उठा लो साले के दो बकरे। लौंडा तो लात खाकर सुधर ही गया। चलो डालो रवानगी।’
बकरों को जब उन्होंने कँधों पर लादा तो बाप बेटे उनके पीछे दौड़ पड़े। बकरे 'मैं मैं’ कर अपने चरवाहे मालिकों से आर्तनाद कर छुडा़ लेने का आग्रह करते रह गए। बाप बेटे को दौड़ते देखा तो उन लोगों ने कुछ छर्रे भी बंदूक से चला दिए। काशी के पाँव में छर्रा जा लगा। वह बावला हो गया। उसने उठाकर एक पत्थर पीछे वाले के पीठ पर दे मारा। पत्थर लगते ही वह तिलमिलाकर रूक गया। चारों वहीं मोटर साइकिल रोककर खड़े हो गए। उनमें से एक आदमी ने सबको रूक जाने को कहा और अकेला ही लहकते हुए आगे बढ़ा। उसने एक लम्बा सा चाकू निकाला और एक झटके में काशी के पेट में पूरा घुसा दिया। हीरा बाप से लिपटकर रोने लगा। तब तक और चरवाहे भी आने लगे। हत्यारे बकरों को लादकर भाग गए। उसी रात हीरा के सिर से बाप का साया हट गया।
'बोकरा ढाबा’ में हुई यह पहली हत्या थी। चारों तरफ शोर उड़ गया कि काशी यादव दिन दहाड़े मार दिया गया। आसपास के गाँवों में बात फैल गई। लोग कुछ दिन तो बोकरा डोंगरी की ओर बकरों के साथ नहीं आए, फिर सब भूल भाल गए।
अब हीरा ही घर का सयाना हो गया। अपनी विधवा माँ और छोटे भाई बसंत का पालनहार। वह बकरियाँ चराता और घर का भार उठाता। साल भर बाद हीरा के गाँव में एक दिन मरे हुए जानवर के शरीर से उठने वाली दुर्गंध भर गई। लोग ओक-ओक करने लगे। सयानों ने बताया कि नदी के किनारे पर यहाँ से दस कोस की दूरी पर एक शराब का कारखाना खुला है। उसमें शराब बननी शुरू हो गई है। तब हीरा को पता चला कि यह जो मरे हुए जानवर के शरीर से उठने वाली गंध से भी बदबूदार गंध गाँव में घुसी है, वह है क्या आखिर। फिर धीरे- धीरे एक और मुसीबत आने लगी। नदी का पानी भी दूषित होने लगा। बहकर जो चमचम चममच पानी आ रहा था वह कुछ- कुछ ललहू हो जाता था, मटमैला। उसका स्वाद भी कुछ कसैला होने लगा। बकरियाँ वह पानी पीकर बीमार होने लगी। कुछ मर भी गईं। आस- पास के गाँव वाले परेशान होने लगे। बोकरा डोंगरी में हलचल कम हो गई। लड़के वहाँ डंडा पचरंगा खेलते, कबड्डी खुडुवा जमाते थे। मगर अब घूम-घामकर ही आ जाते। डोंगरी में लगे जंगली पेड़ों के पत्ते भी झडऩे लगे। त्राहि- त्राहि मचने लगी। गाँववाले अधमरे हो गए। उन्हें कुछ भी न सूझता।
एक दिन हीरा ने देखा, एक जीप में चार पाँच लोग गाँव में आए। उनमें वही मुछियल तगड़ा जवान भी था जिसके छूरे से उसके बाप की जान गई थी। जीप बीच गाँव में रूकी। उस जीप से एक अफसरनुमा व्यक्ति उतरा। अफसर ने कहा, 'पास में हमारा कारखाना है। वहाँ हम आपके गाँव के लोगों को नौकरी देंगे। ये हमारे सुरक्षा अधिकारी हैं। आप जाकर इनसे गेट पर मिलिए। ये आपको भीतर भेज देंगे।’ इतना कहकर मुछियल को साथ लेकर अफसर जीप में बैठने लगा। हीरा जीप के आगे जाकर बोला, 'रूकिए साहब।’
'क्या बात है भाई।’ अफसर ने कहा।
'मैं हूँ हीरा।’
'तुम भी आ जाना।’
'मेरे बाप का नाम काशी। ‘
'उन्हें भी लेते आना।’
'वो अब नहीं हैं साहब।’
'ओ हो, मुझे दुख है।’
'दुख नहीं साहब, आपको काहे का दुख। जो लोगों की जान लेता है, वह तो आपका सुरक्षा अधिकारी है। दुख काहे का जो मारे जान, उसे तो आप सिर पर चढ़ाए घुम रहे हैं।’
अफसर अब जीप से उतर गया। मुछियल भी सर नवाए जमीन पर आ खड़़ा हुआ।
गाँव के लोग भी जमीन पर आ खड़े हुए। हीरा से सभी बातें सुनकर अफसर ने कहा, 'भाई हीरा, तुम हो हिम्मती नौजवान। हम तुमसे खुश हैं। हम तुम्हें अच्छी नौकरी देंगे। बाप तो अब है नहीं। जो हुआ सो हुआ। अब आगे की सोचो। गुस्से में काम नहीं बनता।’
हीरा ने कहा, 'साहब समय से सम्हलना जरूरी है। मुझे वह दिन भूलता नहीं जब इस आदमी ने छूरे से मेरे बाप को मार गिराया था, इसलिए बाप की लाश कंधे से उतरती नहींं है। मुझे लगता है कि धीरे- धीरे पूरा छत्तीसगढ़ उसी तरह जमीन पर गिरकर तड़पेगा, जैसे मेरा बाप तड़पा था। और उसकी लाश पर आप लोग एक के बाद एक कारखाने लगाकर मुँह में मिश्री घोलते हुए कहेंगे कि पीछे की भूलो और आगे बढ़ो। साहब, हम लोग मूरख तो हैं, मगर अंधे नहीं। देख रहे हैं सारा खेल। आँखें हमारी देखने भी लगी हैं साहब। लेकिन आप लोग आँखों में टोपा बाँध रखे हैं।’
अब साहब उखड़ गए। उन्होंने कहा, 'लड़के, देख रहा हूँ कि बहुत चढ़ गए हो। बाप की गति देखकर भी सुधार नहीं हुआ है। ऐंठते ही जा रहे हो। फूँक देंगे तो सारा इलाका उजड़ जाएगा।’
अफसर अभी बात कर ही रहा था कि मुछियल ने निकाल लिया चाकू और हीरा के हाथ में थी तेंदूसार की लाठी। धाड़ की आवाज हुई और चाकू दूर जा गिरा। मुछियल का हाथ टूटकर झूल गया था। तब तक अफसर ने अपना पिस्तौल निकाल लिया था, मगर उसने देखा कि सैकड़ों नौजवान लाठियों से लैस होकर उसकी ओर 'मारो मारो’ कहते हुए बढ़ रहे हैं।
मुछियल को जीप में बैठाकर अफसर वहाँ से भागने लगा। हीरा ने झट दौड़कर गिरा हुआ चाकू उठा लिया। खुली हुई जीप थी। सारे बोकरा ढाबा की बकरियाँ इधर उधर बगरकर चर रही थी। गाँव के लोग तो वहीं उलझे खड़े थे।  गाँव टीले पर है इसलिए जीप नीचे की ओर सर्र से भाग रही थी। हीरा को पता नहीं क्या हुआ कि उसने उठाकर चाकू जीप की ओर फेंक दी।
चाकू लगा ठीक ड्राइवर के सिर पर। ड्राइवर का संतुलन बिगड़ गया। गाड़ी उलट- पलट हो गई और देखते ही देखते सवारो के साथ गहरी नदी में जा गिरी। नदी के जल में शराब का मैल घुला हुआ था। अचेत सवार जल के भीतर समाते चले गए।
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