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Sep 15, 2015

अतीत को वर्तमान से जोड़ते

धरोहर
अतीत को वर्तमान से जोड़ते
                                                                       -  राहुल सिंह

'शहरीकरण और जनसंख्या के विस्तार के दबावों से देश भर में हमारे ऐतिहासिक स्मारकों के लिए खतरा पैदा हो गया है।' ... 'पुरातत्त्व  विज्ञान हमारे भूतकाल को वर्तमान से जोड़ता है और भविष्य के लिए हमारी यात्रा को परिभाषित करता है। इसके लिए दूर दृष्टि, उद्देश्य के प्रति निष्ठा और विभिन्न सम्बद्ध पक्षों के सम्मिलित प्रयासों की आवश्यकता होगी। मुझे उम्मीद है कि आप इस महत्त्वपूर्ण प्रयास के दायित्व को सँभालेंगे।' यह बात प्रधानमंत्री ने 20 दिसंबर को नई दिल्ली में आयोजित भारतीय पुरातत्तव सर्वेक्षण की 150वीं वर्षगांठ समारोह में यह कहा। इस दौर में मैंने 'पुरातत्त्व ', 'सर्वेक्षण' शब्दों पर विचार किया जिसे आप सबके साथ बाँट रहा हूँ-

आमतौर पर पिकनिक, घूमने- फिरने, पर्यटन के लिए पुरातात्विक स्मारक-मन्दिर  देखने का कार्यक्रम बनता है और कोई गाइड नहीं मिलता, न ही स्थल पर जानकारी देने वाला। ऐसी स्थिति का सामना किए आशंकाग्रस्त लोग, पुरातत्त्व  से संबंधित होने के कारण साथ चलने का प्रस्ताव रखते हुए कहते हैं कि जानकार के बिना ऐसी जगहों पर जाना निरर्थक है, लेकिन ऐसा भी होता है कि किसी जानकार के साथ होने पर आप अनजाने- अनचाहे, उसी के नज़रिए से चीज़ों को देखने लगते हैं। अवसर बने और कोई जानकार, विशेषज्ञ या गाइड का साथ न हो तो कुछ टिप्स आजमाएँ-
मानें कि प्राचीन मन्दिर  देखने जा रहे हैं। गंतव्य पर पहुँचते हुए समझने का प्रयास करें कि स्थल चयन के क्या कारण रहे होंगे, पानी उपलब्धता, नदी- नाला, पत्थर उपलब्धता, प्राचीन पहुँच मार्ग, आसपास बस्ती- आबादी और इसके साथ स्थल से जुड़ी दन्तकथाएँ , मान्यताएँ , जो कई बार विशेषज्ञ से नज़रअंदाज़ हो जाती हैं। स्थल अब वीरान हो तो उसके सम्भावित कारण जानने- अनुमान करने का प्रयास करें। यह जानना भी रोचक होता है कि किसी स्थान का पहले- पहल पता कैसे चला, उसकी महत्ता कैसे बनी।
काल, शैली और राजवंश की जानकारी तब अधिक उपयोगी होती है जब इसका इस्तेमाल तुलना और विवेचना के लिए हो, अन्यथा यह रटी- रटाई सुनने और दूसरे को बताने तक ही सीमित रह जाती है। प्राचीन स्मारकों के प्रति दृष्टिकोण 'खण्डहर' वाला हो तो निराशा होती है, लेकिन उस बचे, सुरक्षित रह गए प्राचीन कलावशेष, उपलब्ध प्रमाण की तरह देखें तो वही आकर्षक और रोचक लगता है। मौके पर अत्यधिक श्रद्धापूर्वक जाना, 'दर्शन' करने जैसा हो जाता है, इसमें देखना छूट जाता है और अपने देख चुके स्थानों की सूची में वह जुड़ बस जाता है, मानों 'अपने तो हो गए चारों धाम'
मन्दिर , आस्था केन्द्र तो हैं ही, उसमें अध्यात्म- दर्शन की कलात्मक अभिव्यक्ति के साथ वास्तु- तकनीक का अनूठा समन्वय होता है। मन्दिर  स्थापत्य को मुख्यत: किसी अन्य भवन की तरह, योजना (plan) और उत्सेध (elevation), में देखा जाता है। मन्दिर  की योजना में सामान्य रूप से मुख्यत: भक्तों के लिए मंडप और भगवान के लिए गर्भगृह होता है। उत्सेध में जगती या चबूतरा, उसके ऊपर पीठ और अधिष्ठान/ वेदिबंध, जिस पर गर्भगृह की मूल प्रतिमा स्थापित होती है, फिर दीवारें- जंघा और उस पर छत- शिखर होता है। सामान्यत: संरचना की बाहरी दीवार पर और गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर प्रतिमाएँ  होती हैं, कहीं शिलालेख और पूजित मन्दिरों में ताम्रपत्र, हस्तलिखित पोथियाँ  भी होती हैं।
 सामान्यत: मन्दिर  पूर्वाभिमुख और प्रणाल (जल निकास की नाली) लगभग अनिवार्यत: उत्तर में होता है। मन्दिर  की जंघा पर दक्षिण व उत्तर में मध्य स्थान मुख्य देवता की विग्रह मूर्त्तियाँ  होती हैं और पश्चिम में सप्ताश्व रथ पर आरूढ़, उपानह (घुटने तक जूता), कवच, पद्मधारी सूर्य की प्रतिमा होती है। दिशाओं/ कोणों पर पूर्व- गजवाहन इन्द्र, आग्नेय- मेषवाहन अग्नि, दक्षिण- महिषवाहन यम, नैऋत्य- शववाहन निऋति, पश्चिम- मीन/ मकरवाहन वरुण, वायव्य- हरिणवाहन वायु, उत्तर-नरवाहन कुबेर, ईशान- नंदीवाहन ईश, दिक्पाल प्रतिमाएँ  होती हैं। मूर्त्तियों की पहचान के लिए उनके वाहन- आयुध पर ध्यान दें ,तो आमतौर पर मुश्किल नहीं होती। यह भी कि प्राचीन प्रतिमाओं में नारी- पुरुष का भेद स्तन से ही संभव होता है, क्योंकि दोनों के वस्त्राभूषण में कोई फर्क नहीं होता।
विष्णु की प्रतिमा शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी और गरुड़ वाहन होती है। उनके अवतारों में अधिक लोकप्रिय प्रतिमाएँ  वराह, नृसिंह, वामन आदि अपने रूप से आसानी से पहचानी जाती हैं।  शिव सामान्यत: जटा मुकुट, नंदी और त्रिशूल, डमरू, नाग, खप्पर, सहित होते हैं। ब्रह्मा, श्मश्रुल (दाढ़ी- मूंछ युक्त), चतुर्मुखी, पोथी, श्रुवा, अक्षमाल, कमंडलु धारण किए, हंस वाहन होते हैं। कार्तिकेय को मयूर वाहन, त्रिशिखी और षण्मुखी, शूलधारी, गले में बघनखा धारण किए दिखाया जाता है। दुर्गा- पार्वती, महिषमर्दिनी ,सिंहवाहिनी होती हैं तो गौरी के साथ पंचाग्नि, शिवलिंग और वाहन गोधा प्रदर्शित होता है। सरस्वती, वीणापाणि, पुस्तक लिए, हंसवाहिनी हैं। लक्ष्मी को पद्मासना, गजाभिषिक्त प्रदर्शित किया जाता है।
जैन प्रतिमाएँ , कायोत्सर्ग यानी समपाद स्थानक मुद्रा में (एकदम सीधे खड़ी) अथवा पद्मासनस्थ/ पर्यंकासन में सिंहासन, चँवर, प्रभामंडल, छत्र, अशोक वृक्ष आदि सहित, किन्तु मुख्य प्रतिमा अलंकरणरहित होती हैं। तीर्थंकर प्रतिमाओं में ऋषभदेव/ आदिनाथ- वृषभ लांछनयुक्त व स्कंध पर केशराशि, अजितनाथ- गज लांछन, संभवनाथ- अश्व, चन्द्रप्रभु- चन्द्रमा, शांतिनाथ- मृग, पार्श्वनाथ- नाग लांछन और शीर्ष पर सप्तफण छत्र तथा महावीर- सिंह लांछन, प्रमुख हैं। तीर्थंकरों के अलावा ऋषभनाथ के पुत्र, बाहुबलि की प्रतिमा प्रसिद्ध है। जैन प्रतिमाओं को दिगम्बर (वस्त्राभूषण रहित) तथा उनके वक्ष मध्य में श्रीवत्स चिह्न से पहचानने में आसानी होती है।
आसनस्थ बुद्ध, भूमिस्पर्श मुद्रा या अन्य स्थानक प्रतिमाओं जैसे अभय, धर्मचक्रप्रवर्तन, वितर्क आदि मुद्रा में प्रदर्शित होते हैं। अन्य पुरुष प्रतिमाओं में पंचध्यानी बुद्ध के स्वरूप बोधिसत्व, अधिकतर पद्मपाणि अवलोकितेश्वर, वज्रपाणि और खड्ग- पोथी धारण किए मंजुश्री हैं और नारी प्रतिमा, उग्र किन्तु मुक्तिदात्री वरदमुद्रा, पद्मधारिणी तारा होती हैं। कुंचित केश के अलावा बौद्ध प्रतिमाओंकी जैन प्रतिमाओं से अलग पहचान में उनका श्रीवत्सरहित और मस्तक पर शिरोभूषा में लघु प्रतिमा होना सहायकहोता है।
मन्दिर  गर्भगृह प्रवेश द्वार के दोनों पार्श्वऊर्ध्वाधर स्तंभों पर रूपशाखा की मिथुन मूर्त्तियों सहित द्वारपाल प्रतिमाएँ  व मकरवाहिनी गंगा और कच्छपवाहिनी यमुना होती हैं। द्वार के क्षैतिज सिरदल के मध्य ललाट बिम्ब पर गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा का ही विग्रह होता है। लेकिन पाँचवीं- छठीं सदी के आरंभिक मन्दिरों में लक्ष्मी और चौदहवीं- पन्द्रहवीं सदी से इस स्थान पर गणेश की प्रतिमा बनने लगी तथा इस स्थापत्य अंग का नाम ही गणेश पट्टी हो गया। यहीं अधिकतर ब्रह्मा- विष्णु- महेश, त्रिदेव और नवग्रह, सप्तमातृकाएँ  स्थापित होती हैं। आशय होता है कि गर्भगृह में प्रवेश करते, ध्यान मुख्य देवता पर केन्द्रित होते ही सभी ग्रह- देव अनुकूल हो जाते हैं, गंगा- यमुना शुद्ध कर देती हैं। यहीं कल्प- वृक्ष अंकन होता है यानी  अन्य सभी लौकिक आकांक्षाओं से आगे बढऩे पर गर्भगृह में प्रवेश होता है और देव- दर्शन उपरांत बाहर आना, नए जन्म की तरह है।
यह जिक्र भी कि पुरातत्त्व  का तात्पर्य मात्र उत्खनन नहीं और न ही पुराविद् है ;जिसका काम सिर्फ रहस्यमयी गुफा या सुरंग के खोज अभियान में जुटा रहना है। यह भी कि उत्खनन कोरी सम्भावना के चलते नहीं किया जाता, बल्कि ठोस तार्किक आधार और धरातल पर मिलने वाली सामग्री, दिखने वाले लक्षण के आधार पर, आवश्यक होने पर ही किया जाता है। बात काल और शैली की, तो सबसे प्रचलित शब्द हैं- बुद्धकालीन और खजुराहो शैली, इस झंझट में अनावश्यक न पड़ें, क्योंकि वैसे भी बुद्धकाल (छठीं सदी ईस्वी पूर्व) की कोई प्रतिमा नहीं मिलती और खजुराहो नामक कोई शैली नहीं है, और इसका आशय मिथुन मूर्त्तियों से है, तो ऐसी कलाकृतियाँ  कमोबेश लगभग प्रत्येक प्राचीन मन्दिर  में होती हैं।
आम ज़ुबान पर एक अन्य शब्द कार्बन- 14 डेटिंग होता है, वस्तुत: यह काल निर्धारण की निरपेक्ष विधि है, लेकिन इससे सिर्फ जैविक अवशेषों का तिथि निर्धारण, सटीक नहीं, कुछ अंतर सहित ही सम्भव होता है तथा यह विधि ऐतिहासिक अवशेषों के लिए सामान्यत: उपयोगी नहीं होती या कहें कि किसी मन्दिर , मूर्त्ति या 'ज्यादातर पुरावशेषों के काल- निर्धारण में यह विधि प्रयुक्त नहीं होती, बल्कि सापेक्ष विधि ही कारगर होती है, अपनाई जाती है।
किसी स्मारक/स्थल के खण्डहर हो जाने के पीछे कारण आग, बाढ़, भूकम्प या आततायी- आक्रमण, विधर्मियों की करतूत ही जरूरी नहीं, बल्कि ऐसा अक्सर स्वाभाविक और शनै: शनै: होता है और कभी समय के साथ उपेक्षा, उदासीनता, व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के कारण भी होता है। स्थापत्य खण्ड, मूर्त्तियों या शिलालेख का उपयोग आम पत्थर की तरह कर लिये जाने के ढेरों उदाहरण मिलते हैं और एक ही मूल के लेकिन अलग- अलग पंथों के मतभेद के चलते भी कम तोड़फोड़ नहीं हुई है।
इस सबके साथ स्वयं सहित कुछ परिचितों के पैतृक निवास की वर्तमान दशा पर ध्यान दें, वीरान हो गए गाँव  भी ऐसे तार्किक अनुमान के लिए उदाहरण बनते हैं। ऐसे उदाहरण भी याद करें, जिनमें आबाद भवन धराशायी हो गए हैं, मन्दिर  के खण्डहर बन जाने के पीछे भी अक्सर ऐसी ही कोई बात होती है।
सम्पर्क-  संस्कृति विभाग, रायपुर (छ.ग.) मो. 9425227484
    rahulsinghcg@gmail.com,  http://akaltara.blogspot.in

चंदखुरी: कौशल्या का मायका था छत्तीसगढ़

चंदखुरी
कौशल्या का मायका था छत्तीसगढ़
भारत के हृदय में स्थित छत्तीसगढ़ प्रदेश सांस्कृतिक विरासत एवं आकर्षक नैसर्गिक विविधताओं से परिपूर्ण हैं । छत्तीसगढ़ की पुरातत्त्व  सम्पदा छत्तीसगढ़ को देश-विदेश में अलग रेखांकित करती है। आकर्षक पर्वत।-मालाएँ, नैसर्गिक वनांचल छत्तीसगढ़ के गौरवशाली इतिहास के साक्षी है । छत्तीसगढ़ अपने आप में समृद्ध पर्यटन क्षेत्र है। यह भू-भाग ऐतिहासिक, पुरातात्त्वीय, पौराणिक, धार्मिक दृष्टि से भी अत्यन्त प्रतिष्ठित है। दक्षिण कोसल इसका प्राचीन नाम है। यहाँ  के भौगोलिक स्थिति के चिह्न7वीं शताब्दीं ईस्वी से महाभारत और रामायण में जीवन्त है ।
भगवान श्री राम ने दक्षिण कोशल के उत्तर तथा पूर्व भू-भागों से होते हुए दण्डाकारण्य में प्रवेश किया था। उन्होंने वनवास की कुछ अवधि इस क्षेत्र में बिताई थी। महाभारत में भी पांडवों के युद्ध अभियान प्रसंग में दक्षिण-कोसल का विवरण है। प्रचलित किंवदतियाँ , दन्तकथाएँ, पौराणिक साक्ष्य इन सब बातों की अधिक पुष्टि करते हैं ।
छत्तीसगढ़ में यह प्रचलित मान्यता है कि माता कौशल्या इसी प्रदेश (कोशल) की रहने वाली थीं, इसीलिए इसे रामचन्द्र जी का ननिहाल माना जाता है। वानरराज सुग्रीव ने अपने साथियों को इसी दण्डकारण्य क्षेत्र में सीताजी का पता लगाने भेजा था।
महाभारत काल में इसी पर्वत पर परशुराम का आश्रम होने का भी उल्लेख है। जनश्रुति है इसी पर्वत में जाकर दानवीर कर्ण ने उनसे शिक्षा पाई थी।  रतनपुर, आरंग एवं सिरपुर तीनों महाभारत कालीन नगर हैं। इसी तरह रामायण के पात्रों के नाम पर ग्राम एवं बस्तियाँ  पहचानी गई हैं जैसे - रामपुर, लक्ष्मणपुर, भरतपुर, जनकपुर, सीतापुर आदि। रायगढ़ एवं बिलासपुर जिले के सीमा पर कोसीर ग्राम में तथा आरंग के निकट ग्राम बोरसी में भी महारानी कौशल्या का प्राचीन मन्दिर  मिलता है। इस प्रकार कौशल्या माता के मन्दिर  केवल छत्तीसगढ़ में ही अनेक स्थानों पर देखने को मिलते हैं।
प्राचीन धर्मग्रंथों से यह ज्ञात होता है कि छत्तीसगढ़ के राजा महाकोशल की पुत्री होने के कारण राममाता को कौशल्या नाम से संबोधित किया जाता था (कोशलात्मजा कौशल्या मातु राम जननी)। इसी वजह से यह क्षेत्र महाकोशल अथवा कोशल क्षेत्र कहलाया। वाल्मीकि रामायण में भी इक्षवाकु वंश राजा दशरथ और कोशल देश की राजकन्या कौशल्या के विवाह- प्रसंग का विशद वर्णन है। इस विवाह के अवसर पर कोशल नरेश महाकोशल ने अपनी पुत्री को स्त्रीधन के रूप में दस हजार गाँव  दान में दिए थे।
ऋषिमुनि कह गए हैं कि -
ज्ञानशक्तिश्च कौसल्या सुमित्राउपासनात्मिका
क्रियाशक्तिश्च कैकेयी वेटो दशरथो नृप:
जगत पिता परमात्मा जिनके घर अवतरित हुए हों ,उन भाग्यशाली जगन्माता के विषय में कोई कह ही क्या सकता है, पूर्वजन्म में जो मनुशतरूपा थे ,वे ही इस जन्म में दशरथ के रूप में अवतरित हुए। महारानी कौशल्या कोशल नरेश भानुमन्त की पुत्री थी। पुराणों में ऐसी एक कथा  का भी उल्लेख है - रावण को यह पता था कि मुझे मारने वाले राम कौशल्या के गर्भ से ही उत्पन्न होंगे। अत: विवाह के पूर्व ही गिरिजा पूजन करने गई कौशल्या का उन्होंने अपहरण कर लिया था।
प्राप्त साक्ष्य के अनुसार विनत वंश में कोशल नामक एक महाप्रतापी राजा हुए थे ,उनके ही नाम पर इस क्षेत्र का कोशल नामकरण हुआ। उनकी राजधानी बिलासपुर के मल्हार के निकट कोशल नगर में थी। कोशल वंश में आगे चलकर भानुमान हुए ,जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है।
रायपुर से सराईपाली जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर रायपुर से 15 किमी दूर मन्दिर  हसौद स्थित है, यहाँ  से बाईं ओर 11 किमी दूर मन्दिर  हसौद से पक्की सड़क पर बैद चंदखुरी स्थित है। चंदखुरी गाँव  में पटेल पारा में सोमवंशी नरेशों द्वारा बनाया गया 9वीं सदी में निर्मित भव्य शिवमन्दिर  है। जिसे पुरातत्त्व  विभाग ने संरक्षित घोषित किया है।
चंदखुरी ग्राम में मोहदी ग्राम जाने के रास्ते में भरनी तालाब के पहले एक खलिहान के बाहर बाईं ओर लगभग चार फीट ऊँचा शिवलिंग स्थापित है; जिसके ऊपर का हिस्सा गोलाकार तथा नीचे का आधा भाग चौकोर वर्गाकार है। इस शिवलिंग की बनावट आरंग के शिवलिंग के समान है। यह शिवलिंग सोमवंशी शासनकाल की है। इसी प्रकार भरनी तालाब के किनारे पीपल की जड़ में ऐसी ही प्राचीन छोटी आकृति का शिवलिंग स्थापित है।
चंदखुरी पचेड़ा मार्ग में बलसेन तालाब के बीच एक टीला है जो बारह मास जल से घिरा रहता है। इसी टिले में स्थित मन्दिर  में प्राचीन कौशल्या देवी की प्रतिमा स्थापित है। वर्तमान मन्दिर  का निर्माण गाँव  वालों ने 1916 में करवाया था। इस मन्दिर  में राम लक्ष्मण की प्रतिमा स्थापित है। राम मन्दिर  के सामने हनुमान मन्दिर  है तथा दाहिने पार्श्व में शिव परिवार का मन्दिर  है। शिव मन्दिर  को देखने से यह पता चलता है कि इसका अनेक बार जीर्णोद्धार किया गया है ; जिसके कारण उसका मूल स्वरूप विकृत हो गया है। कौशल्या मन्दिर  के आसपास बड़ी संख्या में प्राचीन मन्दिरों के अवशेष बिखरे मिले थे। इससे अनुमान लगाया जाता है कि किसी समय वहाँ  भव्य मन्दिर  था। पिछले दिनों पर्यटन विभाग ने चंदखुरी के इस क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने हेतु योजना तैयार की  है।विश्वास है कि शीघ्र ही यह गाँव  पर्यटन के मानचित्र पर नजर आने लगेगा।
जहाँ  कभी 126 तालाब थे
छत्तीसगढ़ की प्राचीन नगरी आरंग में मन्दिर , मठ किले एवं जलाशयों की बहुलता है। इस क्षेत्र के लोकगीत में छह कोरी छह तरिया का उल्लेख है, जिसका मतलब यहाँ 126 तालाब थे। इनमें से कई  तालाब आज भी विद्यमान है। रानीसागर तालाब को जलक्रीड़ा के लिए बनाया गया था; जिसके अवशेष ही अब नज़र आते हैं। पास ही महल का भग्नावशेष है तथा छत्तीस एकड़ में फैला झलमला तालाब है जो कौशल्या कुण्ड के नाम से प्रसिद्ध है। इन्हीं सब तथ्यों के आधार पर इसे दक्षिण कोशल की प्राचीन राजधानी माना जाता है। (उदंती फीचर्स)

ताला : शिव की नगरी

ताला
शिव की नगरी 
मन्दिर  के वास्तुकला, शिल्पकला के अनुसार देवरानी मन्दिर  किसी अधिष्ठात्री देवी (पार्वती स्वरूप) की मन्दिर  रही होगी, जहाँ पशुबलि की भी प्रथा थी, जो पुरावशेषों के प्रमाण के रूप में आज भी विद्यमान है।
छत्तीसगढ़ में बिलासपुर से 30 किलोमीटर दूर अमठी-काँपा ग्राम के समीप मनियारी नदी के तट पर स्थित 'ताला में दो शैव मन्दिर  हैं, जो देवरानी- जेठानी के नाम से विख्यात हैं। जेठानी मन्दिर  अत्यंत ही खराब हालत में है जबकि देवरानी मन्दिर  की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। ये दोनों मन्दिर  अपनी विशिष्ट कला के कारण प्रसिद्ध हैं। प्रति वर्ष माघ पूर्णिमा में यहाँ पर मेले का आयोजन किया जाता है। ताला के पास ही एक और ऐतिहासिक नगर 'मल्हार' मात्र पांच किलोमीटर दूरी पर स्थित है।
भारतीय पुरातत्त्व के पहले महानिदेशक एलेक्जेन्डर कनिंघम के सहयोगी जे.डी. बेलगर को ताला गाँव  की सूचना 1873-74 में तत्कालीन कमिश्नर फिशर ने दी। एक विदेशी पुरातत्त्व वेत्ता महिला जेलियम विलियम्स ने इसे चन्द्रगुप्त काल का मन्दिर  बताया है। ताला मन्दिर  के भग्नावशेष में ईंट मिलने से ऐसा प्रतीत होता है कि मन्दिर  निर्माण में ईंट से किया गया था। अत: पुरातत्त्ववेत्ता इसके काल का निर्धारण पाँचवी- छठवीं शताब्दी का करते हैं; जिसका जीर्णोद्धार कलचुरि राजवंश में हुआ था। इतिहासकारों के अनुसार इस मन्दिर  को शरभपुरीय शासकों के राजप्रसाद की दो रानियों देवरानी- जेठानी ने बनवाया है। जेठानी मन्दिर  की सफाई के समय दो मुद्राएँ प्राप्त हुईं; जिसमें एक शरभपुरी शासक की रजत मुद्रा तथा दूसरी रतनपुर के कलचुरि शासक की जिसमे श्रीमद् रत्नदेव अंकित है।
मन्दिर  के वास्तुकला, शिल्पकला के अनुसार देवरानी मन्दिर  किसी अधिष्ठात्री देवी (पार्वती स्वरूप) की मन्दिर  रही होगी, जहाँ पशुबलि की भी प्रथा थी, जो पुरावशेषों के प्रमाण के रूप में आज भी विद्यमान है। जेठानी मन्दिर  के चारो ओर खुला होने का कारण पूजा, अनुष्ठान व यज्ञस्थल रहा होगा। भग्नावशेषों में प्राप्त दशमहाविद्या की देवी धूमावती की प्रतिमा से प्रतीत होता है कि यह तंत्र साधना का शक्ति केन्द्र एवं ज्योतिष का बहुत बड़ा केन्द्र रहा होगा। प्राप्त पुरावशेषों में मानव, पशुओं के जीवन संहार का शिल्पांकन इसका प्रमाण है। असमानुपातिक भव्य जीव- जन्तुओं एवं देवी- देवताओं, स्त्री- पुरुष प्रतिमाओं का शिल्पांकन, पुरावशेषों में मानव, पशुओं के जीवन- संहार का प्रमाण है।
देवरानी मन्दिर 15 मीटर की दूरी पर है। जेठानी मन्दिर  एवं विशाल जगमोहन ध्वस्त अवस्था में है। ये दोनों ही शिवमन्दिर  हैं। मन्दिर  के तल विन्यास में आरंभिक चन्द्रशिला और सीढ़िय़ों के बाद अर्धमण्डप, अन्तराल गर्भगृह तीन प्रमुख भाग हैं। मन्दिर  की सीढिय़ों पर शिव के यक्षगण और गंधर्वो की सुन्दर आकृतियाँ  डोलोमटिक लाइमस्टोन पर खुदी हुई हैं। मनियारी नदी में मिलने वाले पत्थरों का प्रयोग यहाँ  किया गया है। निचले हिस्से में शिव-पार्वती विवाह के दृश्य उत्कीर्ण हैं। प्रवेश द्वार के उत्तरी पार्श्वमें दोनों किनारों में विशाल स्तम्भ के दोनों और 6- 6 फीट के हाथी बैठी मुद्रा में हैं। दक्षिण की और मुख्य प्रवेश द्वार के अलावा पूर्व और पश्चिम दिशा में भी द्वार हैं। मुख्य प्रवेश द्वार पर पत्थरों के कलात्मक स्तम्भ हैं।
उत्खनन से प्राप्त अतिरिक्त मूर्त्तियों में चतुर्भुज कार्तिकेय की मयूरासन प्रतिमा है। द्विमुखी गणेश की प्रतिमा अपने दाँत को एक हाथ में लिए चन्द्रमा में प्रक्षेपण के लिए उद्यत मुद्रा में है। अर्धनारीश्वर, उमा- महेश, नागपुरुष, यक्ष मूर्त्तियों में अनेक पौराणिक कथानक झलकते हैं। शाल भंजिका की भग्न मूर्त्ति  में शरीर सौष्ठवता व कलात्मक सौन्दर्य का संतुलित प्रयोग किया गया है। एक विशाल चतुर्भज प्रतिमाकी भाव भंगिमा से महिषासुरमर्दिनी की मूर्त्ति  का बोध होता है; जिसकी भुजाएँ तथा आयुध खण्डित  हैं ।
देवरानी- जेठानी मन्दिर  विशिष्ट तल विन्यास, विलक्षण प्रतिमा निरूपण तथा मौलिक अलंकरण की दृष्टि से भारतीय कला में विशेष रूप से चर्चित है। उत्खनन के बाद के अध्ययन से पता चलता है कि ईसा पूर्व से दसवीं शताब्दी तक यह अत्यंत समृद्ध स्थल रहा होगा। मूर्त्तियों की शैली और प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि लम्बे काल तक यह स्थल विभिन्न संस्कृतियों की धर्मस्थली रही होगी, जो शैव पूजक थी साथ ही यह स्थान तांत्रिकों की अनुष्ठान -स्थली भी रही होगी। पर्यटन की दृष्टि से ताला के इस पुरातात्त्विक स्थल के विकास के लिए विभिन्न योजनाओं को सरकार द्वारा मंजूरी दी गई है।
देवरानी मन्दिर  के उत्खनन में प्राप्त रुद्रशिव की विशाल प्रतिमा छत्तीसगढ़ के इस क्षेत्र को पुरातत्त्व  की दृष्टि से और भी महत्त्वपूर्ण बना देती है।
रूद्रशिव की विशाल प्रतिमा
शिल्पी ने प्रतिमा के शारीरिक विन्यास में पशु पक्षियों का अद्भुत संयोजन किया है। विद्वानों के अनुसार महाकाल रूद्रशिव की प्रतिमा का अलंकार बारह राशियों एवं नौ ग्रहों के साथ हुआ है।
भारतीय शिल्प में मूर्त्ति  निर्माण की परम्परा बहुत ही प्राचीन काल से चली आ रही है। कला इतिहासकारों ने इन प्रतिमाओं को उनके लक्षण एवं शैलियों के आधार पर विवेचनाएँ  प्रस्तुत की हैं ;किन्तु कभी- कभी ऐसी विलक्षण प्रतिमाएँ  मिल जाती हैं ,जो पुरातत्त्व  वेत्ताओं एवं कला इतिहासज्ञों के लिए समस्या बन जाती हैं। ऐसी ही एक अद्भुत प्रतिमा छत्तीसगढ़ में बिलासपुर जिले के ताला गाँव  में प्राप्त हुई है।
वर्ष 1987-88 में देवरानी मन्दिर  के परिसर में उत्खनन के दौरान यह विलक्षण प्रतिमा मिली है। यह प्रतिमा भारतीय कला में अपने ढंग की एकमात्र ज्ञात प्रतिमा है। शैव सम्प्रदाय से सम्बन्धित इस प्रतिमा का शिल्प अद्भुत है। शिव के रूद्र अथवा अघोर रूप से सामंजस्य होने के कारण सुविधा की दृष्टि से इसका नामकरण रुद्रशिव किया गया है। ताला से प्राप्त प्रतिमाओं में यही एक मात्र लगभग परिपूर्ण प्रतिमा है।
यह विशाल प्रतिमा 9 फुट ऊँची एवं 5 टन वजनी। इसमें शिल्पी ने प्रतिमा के शारीरिकविन्यास में पशु पक्षियों का अद्भुत संयोजन किया है। विद्वानों के अनुसार महाकाल रूद्रशिव की प्रतिमा का अलंकार बारह राशियों एवं नौ ग्रहों के साथ हुआ है।
विभिन्न जीव -जन्तुओं की मुखाकृति से इसके अंग-प्रत्यंग निर्मित होने के कारण प्रतिमा में रौद्र भाव संचारित है। प्रतिमा समपाद स्थानक मुद्रा में प्रदर्शित है। इस महाकाय प्रतिमा के रूपांकन में गिरगिट, मछली, केकड़ा, मयूर, कच्छप सिंह आदि जीव-जन्तु तथा मानव मुखों की मौलिक प्रकल्पना युक्त रूपाकृति अत्यंत ओजस्वी है। इसके शिरोभाग पर मण्डलाकार चक्रों में लिपटे हुए गिरगिट के पृष्ठ भाग से नासिका रंध्र, सिर से नासाग्र तथा पिछले पैरों से भौंह निर्मित है। बड़े आकार के मेंढक के विस्फारित मुख से नेत्र पटल तथा कुक्कट के अण्डे से नेत्र गोलक बने है। छोटे आकार के प्रोष्ठी मत्स्य से मूँछे तथा निचला ओष्ठ निर्मित है। बैठे हुए मयूर से कान रूपायित हैं।
कंधा मकर मुख से निर्मित है। भुजायें हाथी के शुण्ड के सदृश्य हैं तथा हाथों की अँगुलियाँ  सर्प मुखों से निर्मित हैं। वक्ष के दोनों स्तन तथा उदर भाग पर मानव मुख द्रष्टव्य है। कच्छप के पृष्ठ से कटिभाग, मुख से शिश्न और उसके जुड़े हुए  दोनों अगले पैरो से अंडकोष निर्मित है। अंडकोष पर घंटी के सदृश्य जोंक लटके हुए हैं। दोनों जंघाओं पर हाथ जोड़े विद्याधर तथा कटि पार्श्व में दोनों ओर एक-एक गंधर्व की मुखाकृति है। दोनों घुटनों पर सिंह मुख अंकित है। स्थूल पैर हाथी के अगले पैर के सदृश्य हैं। प्रमुख प्रतिमा के दोनों कधों के ऊपर दो महानाग पार्श्व रक्षक के सदृश्य फन फैलाए हुए स्थित है। पैरों के समीप उभय पार्श्व  में गर्दन उठाकर फन काढ़े हुए नाग अनुचर द्रष्टव्य हैं।
प्रतिमा के दाएँ में स्थूल दण्ड का खण्डित भाग बच हुआ है। उनके आभूषणों में हार, वक्ष- बंध तथा कटिबंध नाग केकुण्डलित भाग से रूपायित हैं । वर्णित प्रतिमा के बाएँ हाथ में स्थित आयुध,दाएँपैर के समीप स्थित नाग तथा अधिष्ठान भाग भग्न है। सामान्य रूप से इस प्रतिमा में शैव मत, तंत्र तथा योग के गुह्य सिद्धांतों का प्रभाव और समन्वय दिखलाई पड़ता है। 
कैसे पहुँचे - वायु मार्ग: रायपुर 85 कि. मी. निकटतम हवाई अड्डा है। जो मुम्बई, दिल्ली, नागपुर भुवनेश्वर, कोलकाता, राँची, विशाखापट्टनम एवं चैन्नई से जुड़ा हुआ है। रेल मार्ग : हावड़ा –मुम्बई मुख्य रेल मार्ग पर बिलासपुर 30 कि. मी. समीपस्थ रेलवे जंक्शन है। सड़क मार्ग : बिलासपुर शहर से निजी वाहन द्वारा सड़क मार्ग से यात्रा की जा सकती है। आवास व्यवस्था : बिलासपुर नगर में आधुनिक सुविधाओं से युक्त अनेक होटल ठहरने के लिए उपलब्ध हैं।। (उदंती फीचर्स)

धरोहर विशेष

   सिंघनपुर विश्व का प्राचीनतम शैलाश्रय

 छत्तीसगढ़ का रायगढ़ जिला पुरातत्त्व  की दृष्टि से काफी समृद्ध है। यहाँ  विश्व का प्राचीनतम शैलाश्रय सिंघनपुर है। पुरातत्त्ववेताओं की दृष्टि से जो 30 हजार वर्ष ईसा- पूर्व के हो सकते हैं। उनके अनुसार यह स्पेन और मैक्सिको से प्राप्त शैलाश्रयों के समकालीन हैं। पुरातत्त्ववेत्ता स्व. एंडरसन ने 1912 में प्रथम बार इन शैलचित्रों को देखा था। इंडियन पेंटिंग्स 1918 में तथा इनसायक्लोपिडिया ब्रिटेनिका के 13 वें अंक में पहली बार सिंघनपुर के शैलचित्रों की सूचना प्रकाशित हुई थी और विश्व के पुरातत्त्वविद् इस ओर आकृष्ट हुए थे। 1923 से 1927 तक पुरातत्त्ववेत्ता स्व. अमरनाथ दत्ता ने सिंघनपुर के शैलचित्रों पर व्यापक सर्वेक्षण कार्य किया। उन्होंने अपनी पुस्तक 'ए फ्यू रैलिक्स एण्ड द राक पेटिंग ऑफ सिंघनपुर' का प्रकाशन  किया था। स्व. लोचनप्रसाद पाण्डेय 'महाकोशल हिस्टोरिकल पेपर्स' में सिर्फ सिंघनपुर ही नहीं अपितु अंचल के महत्त्वपूर्ण स्थलों का ऐतिहासिक महत्त्व  के साथ प्रकाशन किया था।

यह खुशी की बात है कि पिछले दिनों भारत सरकार के इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) नई दिल्ली द्वारा पहली बार यहाँ  की एक दर्जन पहाड़ों और गुफाओं का वैज्ञानिक दृष्टि से विस्तृत अध्ययन व फिल्मांकन किया जा रहा है। इसके लिए क्षेत्र की आबोहवा, पर्यावरण आदिमानवों द्वारा छोड़े गए औजार, जानवरों की हड्डिया, उनके रहन-सहन जैसे विषयों का भी गहनता से अध्ययन हो रहा है। इस अध्ययन से उम्मीद जागी है कि छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले का नाम भी शैलचित्रों के लिए विश्व परिदृश्य में उभर कर सामने आयेगा। इस समय किये जा रहे इस अध्ययन में यहाँ 12 करोड़ से 90 करोड़ वर्ष पुराने शैल चित्र पाये गये है।  शैलचित्रों के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध रायगढ़ जिले की सिंघनपुर गुफा और कबरा पहाड़ के अलावा जिले में टिमरलगा, चोरमाड़ा, गाताडीह, सिरोली डोंगरी, कर्मागढ़, ओंगना, पोटिया, बसनाझर और बोतल्दा में भी अनेक शैलाश्रय हैं।  आदिमानवों द्वारा उकेरे गये इन शैलचित्रों के आधार पर तत्कालीन रहन-सहन, पशु और संस्कृति के साथ-साथ प्राकृतिक अवस्था का भी पता चलता है। कुछ  एक  शैलचित्रों  में शुतुरमुर्गडायनासोर  और जिराफ  से  मिलते- जुलते जानवरों को उकेरा गया है, जो  इस क्षेत्र में करोड़ों वर्ष पूर्व इनकी मौजूदगी की ओर संकेत करता है। इनमें हिरण, वन भैंसा, मछली, सांप, हाथी जैसे पशुओं के अलावा कुछ नये शैल चित्र भी मिले है जो गोंडवाना शैली के है। साथ ही प्राकृतिक कारणों से आये बदलाव को भी ये शैलचित्र रेखांकित करते है।
आईए जानते हैं रायगढ़ जिले में प्राप्त कुछ महत्त्व पूर्ण शैलाश्रयों के बारे में-
बसनाझर शैलाश्रय- रायगढ़ से 28 किमी की दूरी पर बसनाहर शैलाश्रय है जो बम्हनीन पहाड़ों पर 2000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। इस शैलाश्रय में लगभग चार सौ शैलचित्र हैं। यहाँ  के शैलचित्रों में जंगली पशुओं और आखेट के  दृश्य  प्रमुखता से चित्रित किए गए हैं। इस जिले में हाथी का चित्र केवल इसी शैलाश्रय में अंकित है। गहरे गैरिक रंग (रेड आर्च कलर) में अंकित इन चित्रों का आकार 7 इंच से लेकर 18 इंच तक है। इनमें सामूहिक नृत्य, शिकार, जंगली भैसा, हिरण गोह, अश्व के चित्र बड़ी संख्या में नजर आते हैं।
कबरा शैलाश्रय- कबरा शैलाश्रय रायगढ़ से 8 किमी पूर्व में ग्राम विश्वनाथ पाली तथा भैजा पाली के निकट पहाड़ी में स्थित है। यहाँ  करीब दो हजार फीट की सीधी चढ़ाई चढ़कर पहुँचा जा सकता है। इस शैलाश्रय के अनेक चित्र अभी भी सुरक्षित अवस्था में है। कबरा शैलाश्रय के गैरिक रंग के शैलचित्रों में कछुवा के चित्र प्रमुख रुप से पाए गए हैं जो तीन इंच से लेकर एक फीट तक हैं। यहाँ  अश्व के चित्र भी सजे हुऐ नजर आते हैं जो छोटे तथा बड़े आकार में हैं। यहाँ   हिरण की आकृतियाँ  भी दिखाई देती है। जिले के अब तक ज्ञात शैलचित्रों में विशालतम जंगली भैसे का चित्र प्रमुख है। 
 बसनाहट तथा धर्मजयगढ़ के ओंगना की शैलचित्रों में अद्भूत समानता है। कबरा शैलाश्रय जहाँ  पूर्वमुखी है वहीं सिंघनपुर दक्षिण पूर्व तथा बसनाझर उत्तर की ओर है।
ओंगना शैलाश्रय- यह रायगढ़ से 72 किमी उत्तर में धर्मजयगढ़ के निकट ओंगना गाँव  में स्थित है। पश्चिममुखी इस शैलाश्रय  में तीस फुट चौड़े और 20 फीट ऊँचे एक ही शिलाखण्ड पर गहरे और हल्के गैरिक रंग के लगभग एक सौ शैलचित्र अंकित है।
कर्मागढ़ शैलाश्रय- यह जिले का प्रागैतिहासिक धरोहर है जो रायगढ़ से 30 किमी पूर्व में उड़ीसा सीमा पर स्थित उषाकोठी पहाड़ी पर स्थित है। इस शैलाश्रय  में तीन सौ से अधिक बहुरंगी आकृतियाँ  एवं जलचरों की आकृतियाँ  हैं जो तीन सौ फीट लम्बी तथा बीस फीट चौड़े क्षेत्र में पूर्वामुखी पाषाण शिलाखण्ड  पर अंकित है।  कर्मागढ़ के पश्चिम में भैंसगढ़ी के बांस के जंगलों में भी बेनीपाट शैलाश्रय है।
जिले का एक और शैलाश्रय रायगढ़ से 66 किमी की दूरी पर घरघोड़ा के आगे नवागढ़ी पहाड़ी पर 2000 फुट ऊँचाई पर स्थित एक गुफा में है। यह चित्र गहरे गैरिक रंग में एक वृत्त का है। जिसका व्यास साढ़े सात फीट है। इस वृत्त के भीतर 4 फुट का एक व्यास आठ खड़ी और आठ आड़ी रेखाओं में विभाजित है, इन खण्डों में कई आकृतियाँ  उकेरी गई हैं। इन शैलचित्रों को देखकर लोग कहते हैं कि इन संकेतों के पीछे डोम राजाओं का खजाना छिपा हुआ हैं जिन्होंने 17 शताब्दी में यहाँ  आश्रय लिया था।

दुख की बात हैकि ये समस्त शैलचित्र संरक्षण के अभाव और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित हो रहे हैं, अत: पुरातत्त्वविद् चाहते हैं कि इन शैलाश्रयों के बारे में अधिकाधिक जानकारी जुटाकर उन्हें लिपिबद्ध किया जाए और उनके संरक्षण के बारे में  लोगों को जागरूक किया किया जाए। (उदंती फीचर्स)

धरोहरः पलारी- ऐतिहासिक सिद्धेश्वर मन्दिर

- डॉ. रत्ना वर्मा
उपेक्षित होते हमारे प्राचीन धरोहर
छत्तीसगढ़ में ईंटों के मन्दिरों की गौरवाशाली परम्परा रही है, इसी परम्परा का एक उदाहरण पलारी का सिद्धेश्वर मन्दिर  है जो रायपुर जिले में स्थित पलारी ग्राम के बालसमुंद तालाब के किनारे स्थित है। पश्चिमाभिमुख यह मन्दिर  लघु अधिष्ठान पर निर्मित है। मन्दिर  का गर्भगृह पंचस्थ शैली का है तथा जंघा तक अपने मूल रूप में सुरक्षित है। शिखर का शीर्ष भाग पुनर्निर्मित है। पाषाण निर्मित द्वार के चौखट कलात्मक एवं अलंकृत है, इसके दोनों पार्श्वों में नदी देवियों, गंगा एवं यमुना का त्रिभंग मुद्रा में अंकन है। सिरदल पर ललाट बिम्ब में शिव का चित्रण है, तथा दोनों पार्श्वों में ब्रह्मा तथा विष्णु का अंकन है। मन्दिर  के द्वार पर निर्मित पाषाण पर तराशे गए शिव विवाह का दृश्य दर्शनीय है। पुरातत्त्व विशेषज्ञों के अनुसार शिव विवाह का यह अंकन अद्भुत है।  
सिद्धेश्वर मन्दिर  के सामने निर्मित बालसमुंद तालाब के बारे में अनेक जनश्रुतियाँ  प्रचलित हैं जिसके अनुसार इस मन्दिर  का निर्माण छैमासी रात में किया गया है तथा तालाब की खुदाई भी इसी दौरान की गई थी। बताया जाता है कि एक घुमंतू जाति के नायक अपने दल  बल सहित यहाँ  पहुँचे और यहीं आकर बस गए। तब यहाँ  चारो ओर जंगल था। लेकिन पानी के लिए कोई तालाब या पोखर न होने से वे सब परेशान हो गए। तब उनके नायक ने 120 एकड़ में विस्तारित विशाल तालाब का निर्माण कराया ; लेकिन तालाब खुदाई के बाद भी वह तालाब सूखा का सूखा ही रहा। तब गुरुजन की सलाह पर नायक राजा ने अपने नवजात शिशु को परात में रखकर तालाब में छोड़ दिया, देवयोग से तालाब में पर्याप्त पानी आ गया और बालक भी सुरक्षित परात के ऊपर आ गया। कहते है इसी कारण इस तालाब का नाम बालसमुंद पड़ा। और तब से इस तालाब में हमेशा पानी रहता है। यह भी कहा जाता है कि भमनीदहा का स्रोत बालसमुंद तक आया है; इसलिए इस तालाब का पानी कभी नहीं सूखता। इस तालाब के बीच में एक  टापू है ,जिसके  बारे में भी लोग तरह तरह के किस्से सुनाते हैं - यह कि तालाब बनवाते समय तालाब की मिट्टी फेंकने के बाद उक्त स्थल पर टोकनी की मिट्टी झर्राने (झड़ाने) के कारण यह टापू बना है।
परन्तु बुजुर्गों द्वारा जो बात बताई जाती है वह सत्य के ज्यादा नजदीक जान पड़ती है। बात 1950- 60 के दशक की है जब  पलारी गाँव  के आस- पास घना जंगल था तथा शेर, भालू, तेंदुआ यहाँ  आसपास विचरते रहते थे। गाँव  के मालगुजार दाऊ कलीराम वर्मा शिकार के दौरान घूमते हुए घने जंगल से घिरे इस मन्दिर  के पास पहुँच गए तब यह मन्दिर  झाड़ -झंखाड़ से दबा हुआ जीर्ण- शीर्ण अवस्था में था। यद्यपि मन्दिर का गर्भगृह तब खाली था;लेकिन घाट और तालाब के अवशेष के चिह्न देखकर उन्होंने अनुमान लगाया कि हो न हो यह शिव मन्दिर  था। अत: धाराशायी होते इस जीर्णशीर्ण मन्दिर  का जीर्णोद्धार एवं घाट का निर्माण करने की इच्छा पलारी के मालगुजार दाऊ कलीराम वर्मा ने अपने स्व. पिता मोहन लाल की स्मृति में बनवाने की इच्छा जाहिर की। तब उनकी इच्छानुसार पुत्र बृजलाल वर्मा (भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री) ने सन् 1960-61 में इस मन्दिर  का जीर्णोद्धार करवाया और मन्दिर  में शिवलिंग की स्थापना करके अपने पिता की अंतिम इच्छा पूरी की।
इस  प्राचीन स्मारक तथा पुरातात्विक दृष्टि से अधिनियम 1964 तथा 65 के अधीन राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया हैं।
मन्दिर  के गर्भगृह में जीर्णोद्धार के समय ही संगमरमर का शिवलिंग स्थापित कर दिया गया था अत: 60 के दशक से ही यहाँ  पूजा अर्चना होती आ रही है। इस मन्दिर  में प्रति वर्ष माघ पूर्णिमा के दिन भव्य मेले की आयोजन किया जाता है। मेले के दिन आस-पास के गाँव  से हजारो भक्त तालाब में स्नान करते हैं तथा दिन भर मेले का आनंद लेते हैं।
 कलाशैली की दृष्टि से यह मन्दिर 900 ई. का माना जाता  है।  जिसे छत्तीसगढ़ में ही स्थित विश्व विख्यात लक्ष्मण मन्दिर  जो सिरपुर में है, के समकक्ष कहा जा सकता है। सिरपुर में इन दिनों खुदाई का कार्य चल रहा है ,जिससे इतिहास के अनेक पन्ने खुलते चले जा रहे हैं।
 गुप्तकालीन वास्तुकला भारतीय इतिहास में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाती है। यह मन्दिर  गुप्तकालीन स्थापत्यकला काअनुपम उदाहरण है। भारतीय स्थापत्यकला के विकास में नागर, द्राविण और बेसर शैलियों का मान निश्चित किया गया। पलारी का शिव मन्दिर  नागर शैली में निर्मित है। गुप्तकाल में मथुरा, सारनाथ, नालंदा, अमरावती आदि मूर्त्तिकला के प्रमुख केंद्र थे। शैली की दृष्टि से गुप्तकालीन मूर्त्तियाँ  व यक्ष प्रतिमाओं का विकास पुराण की देन है। गुप्तकालीन मन्दिरों के द्वार शाखाओं पर गंगा, यमुना की खूबसूरत मूर्त्तियों का रूपायन हुआ है, जो पलारी के इस सिद्धेश्वर मन्दिर  के द्वार पर भी देखने को मिलता है।
पुरातत्त्वविद डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर के अनुसार छत्तीसगढ़ के राजिम, सिरपुर, खरौद एवं पलारी के शिव मन्दिर  एक ही समय के निर्मित मन्दिर  हैं।
इस मन्दिर  के बाह्य भाग में सूर्यनारायण, नृसिंह भगवान, हनुमान जी, सरस्वती आदि के मनोमुग्धकारी चित्रांकन हैं, मौसम की मार से जो अब लुप्तप्राय स्थिति में हैं। मन्दिर  का पृष्ठ भाग भी काफी क्षतिग्रस्त हो गया है एवं मन्दिर  झुकता हुआ नजर आता है। जिसको दुरुस्त किए जाने की आवश्यकता है।
अफसोस की बात है कि हम अपनी ऐसी न जाने कितनी धरोहरों को उपेक्षित करते चले जा रहे हैं। नवीं शताब्दी में बने इस मन्दिर  के इस महत्त्व पूर्ण द्वार की मूर्त्तियों के ऊपर कुछ वर्ष पहले ग्रामवासियों ने अपनी अपार भक्ति का प्रदर्शन करते हुए वार्निश और चूने का उपयोग कर कलाकृतियों को खराब कर दिया था, जिसे बाद में पुरातत्त्व विभाग ने सन् 1995 में रासायनिक उपचार कर दुरुस्त किया था। इसी तरह की भक्ति दिखाते हुए कुछ वर्ष पहले मन्दिर के गर्भ गृह में अतिरिक्त निर्माण करके एक भारी भरकम पीतल की घंटी लगा कर मन्दिर  को कमजोर करने की कोशिश की गई थी। हाल ही में उक्त घंटी के चोरी हो जाने का भी समाचार मिला। अत: ऐसे ऐतिहासिक मन्दिरों की महत्ता के प्रति क्षेत्र के लोगों को जागरुक किया जाना अत्यावश्यक है। इसके लिए जरुरी है कि पुरातत्त्व विभाग भी आवश्यक कदम उठाए।
शिव विवाह का चित्रण
पुरातत्त्ववेत्ताओं का  मत है कि पूरे भारत में अब तक ज्ञात किसी भी मन्दिर  में ऐसी शिल्पकला नहीं देखी गई है और न ही किसी ग्रंथ में वर्णित है कि अमुक मन्दिर  में पुष्पक जैसे विमान पत्थरों पर चित्रित हैं। इस दृष्टि से पलारी के इस शिव मन्दिर  का महत्त्व  काफी बढ़ जाता है, साथ ही यह और अधिक अध्ययन की माँग करता है।
मन्दिर  के प्रवेश द्वार पर चित्रित पुष्पक जैसे विमान पर जब पहली बार पुरातत्त्व अधिकारियों की निगाह पड़ी तो वे चौंक गए।  सर्वेक्षण  में पत्थरों पर शिव विवाह को चित्रित किया गया है और बारातियों में शामिल देव समुदाय विमान पर सवार हैं। पुष्पक विमान का उल्लेख केवल पौराणिक ग्रंथों में मिलता है, जिसके अनुसार यह कुबेर का था, जिसे रावण ने छीन लिया था। लंका विजय के बाद भगवान श्री राम इसी से अयोध्या लौटे थे।

यहाँ  शिव विवाह से संबंधित कथानक को अत्यंत कलात्मक ढंग से उकेरा गया है। मन्दिर  की चौखट पर शिव विवाह के दृश्य में देवाताओं को हाथियों अश्वों एवं बैल पर सवार होकर जाते अंकित किया गया है। चौखट के शीर्ष पर मृदंग आदि बजाते नृत्य करते लोगों को दर्शाया गया है;जो अत्यंत मनोहारी है। प्रवेश द्वार पर बारातियों में शामिल दिग्पालों का शिल्पांकन प्रमुखता से है। शिल्प शास्त्रों में वर्णित दिग्पालों के पारम्परिक वाहनों से अलग हटकर वाहन दर्शाए गए हैं। पुराणों में बताये गए वैमानिक का प्रतीकात्मक शिल्पाकंन यहाँ  मिला है। धर्मशास्त्रों के बाद वैमानिक कला का यह प्रतीकात्मक शिल्पांकन निश्चित रूप से प्राचीनकाल में वैमानिक ज्ञान की परम्परा का घोतक है।