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Sep 15, 2015

छत्तीसगढ़ः विश्व धरोहर की बाट जोहता सिरपुर


सिरपुर की प्राचीनता का सर्वप्रथम परिचय शरभपुरीय शासक प्रवरराज तथा महासुदेवराज के ताम्रपत्रों से उपलब्ध होता है जिनमें 'श्रीपुर' से भूमिदान दिया गया था। पाण्डुवंशीय शासकों के काल में सिरपुर महत्त्वपूर्ण राजनैतिक व सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। महाशिवगुप्त बालार्जुन के 57 वर्षीय सुदीर्घ शासनकाल में यहाँ  अनेक मन्दिर , बौद्ध विहार, सरोवर तथा उद्यानों का निर्माण करवाया गया।
महानदी के तट पर स्थित प्राचीन छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोशल) की राजधानी सिरपुर में जैसे जैसे उत्खनन का कार्य आगे बढ़ते जा रहा हैं वैसे- वैसे अतीत में छुपी अनेक पुरातात्विक, व ऐतिहासिक घटनाओं का खुलासा भी होते जा रहा है जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि व वास्तुकला के अकाट्य प्रमाण हैं।
सिरपुर प्राचीन काल में श्रीपुर के नाम से विख्यात रहा है तथा पाण्डुवंशीय शासकों के काल में इसे दक्षिण कोशल की राजधानी होने का गौरव प्राप्त रहा है। सिरपुर की प्राचीनता का सर्वप्रथम परिचय शरभपुरीय शासक प्रवरराज तथा महासुदेवराज के ताम्रपत्रों से उपलब्ध होता है जिनमें 'श्रीपुर' से भूमिदान दिया गया था। पाण्डुवंशीय शासकों के काल में सिरपुर महत्त्वपूर्ण राजनैतिक व सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। महाशिवगुप्त बालार्जुन के 57 वर्षीय सुदीर्घ शासनकाल में यहाँ  अनेक मन्दिर , बौद्ध विहार, सरोवर तथा उद्यानों का निर्माण करवाया गया। सातवीं सदी ईस्वी में चीन के महान पर्यटक व विद्वान ह्वेनत्सांग ने सिरपुर की यात्रा की थी। उस समय यहाँ  लगभग 100 संघाराम थे तथा महायान संप्रदाय के 10,000 भिक्षु निवास करते थे। महाशिवगुप्त बालार्जुन ने स्वयं शैव मतावलम्बी होते हुए भी बौद्ध विहारों को उदारतापूर्वक प्रचुर दान देकर संरक्षण प्रदान किया था।
वर्तमान में चल रही खुदाई से सिरपुर में कई बड़े-बड़े शिव मन्दिर  तथा पंचायतन शैली के मन्दिर  मिले हैं, जिसे भारत का सबसे बड़ा मन्दिर  माना जा है। इसके अलावा अनेक भव्य बौद्ध मठ, बौद्ध विहार, घंटा घर, वैदिक पाठशाला और कई प्राचीन शिलालेख प्राप्त हुए हैं। बौद्ध स्तूप और राजप्रासाद एवं ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी में पत्थरों से निर्मित तहखाना और एक आयुर्वेदिक स्नानागार भी मिला है। जिस स्थान पर तहखाना और घंटाघर मिला है, वहीं पर 36 अन्नागार और 9 आयुर्वेदिक स्नानकुंड प्राप्त हुए हैं यह सब इस बात को इंगित करते हैं कि सिरपुर के इतिहास को नए सिरे से परिभाषित करना होगा।
मन्दिरों का नगर
यहाँ  का प्रसिद्ध लक्ष्मण मन्दिर  छठवीं शताब्दी में निर्मित भारत का सबसे पहले ईंटों से बना मन्दिर  है। यह मन्दिर  सोमवंशी राजा हर्षगुप्त की विधवा रानी बासटा देवी द्वारा बनवाया गया था। इस मन्दिर  के समीप ही ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्त्व  का राम मन्दिर  है, जो भग्नावस्था में है। इसके अलावा यहाँ  सोमवंशी राजाओं की वंशावली को दर्शाने वाले अनेक दर्शनीय मन्दिर  हैं हैं- गंधेश्वर महोदव मन्दिर , शिव मन्दिर , राधाकृष्ण मन्दिर , चण्डी मन्दिर ।
साँची के स्तूपों से भिन्न स्तूप
सिरपुर की खुदाई में एक किलोमीटर की परिधि में फैले दूसरी शताब्दी के अवशेषों के अंतर्गत जो स्तूप मिले हैं उन स्तूपों का सीधा  सम्बन्ध  भगवान बुद्ध से है। इन स्तूपों के  सम्बन्ध  में बताया जाता है कि ये स्तूप सांची के स्तूपों से अलग हैं और पत्थर के बने हैं। पत्थरों के स्तूपों के बारे में कहा जाता है कि ऐसे स्तूप तो बुद्ध ही बनाते थे। पुरातत्त्व  विभाग के अधिकारी बताते हैं कि बौद्ध ग्रंथों में इस बात का उल्लेख है कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी में भगवान बुद्ध सिरपुर आए थे। यहाँ  के स्तूप उसी समय के हैं।
हाल की खुदाई में यहाँ  प्राप्त 184 टीलो के नीचे स्वर्णिम इतिहास दबा हुआ है। यहाँ  जो स्तूप मिले हैं उन्हें सम्राट अशोक के काल का स्तूप माना गया है। स्तूप मिलने के बाद अब यहाँ  की संस्कृति ईसा से तीन सदी पूर्व की मानी जाएगी। पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. अरुणकुमार शर्मा के अनुसार जातक कथाओं मे भी इस बात का उल्लेख है कि महात्मा बुद्ध छत्तीसगढ़ आए थे। वे जहाँ- जहाँ  गये थे वहाँ  सम्राट अशोक ने उनके निर्वाण के बाद स्तूप बनवाए थे। अब छत्तीसगढ़ मे स्तूप मिलने से उनके यहाँ  आने की पुष्टि तो होती ही है, एक नए इतिहास की शुरुआत भी हो जाती है।
बौद्ध विहार
यहाँ  दो बौद्ध विहार के अवशेष प्राप्त हुए हैं इनका निर्माण भी ईंटों से हुआ है। विहार के मुख्य कक्ष में भगवान बुद्ध की साढ़े छह फुट ऊँची प्रतिमा प्रस्थापित है। इसके अतिरिक्त यहाँ  अवलोकितेश्वर और मकर वाहिनी गंगा भी मिली है। अभिलेख से ज्ञात होता है महाशिव गुप्त बालार्जुन के राज्य में आनंदप्रभु नामक भिक्षु ने इस विहार का निर्माण करवाया था। दो मंजिला इस मठ में 14 कमरे थे। इसी के पास एक ध्वस्त विहार भी प्राप्त हुआ है। यहाँ  भी बुद्ध की प्रतिमा है।
घंटाघर
यहाँ  प्राप्त घंटाघर के संदर्भ में पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. अरुण कुमार शर्मा का कहना है कि समय के ज्ञान के लिए तब घड़ी जैसे उपकरणों का अविष्कार नहीं हुआ था तब यह घंटाघर ही सिरपुर व्यवसायियों और रहवासियों के लिए समय की जानकारी देने का एकमात्र साधन रहा होगा। प्राचीनकाल में घंटा, मिनट और सेकंड के स्थान पर पहर, पल और छिन समय के सूचक हुआ करते थे। रात्रिकाल को चार पहर में बांटा गया था। सिरपुर में मिले लगभाग 2600 वर्ष पुराने लोहे- ताँबे जैसे कठोर धातु से निर्मित इस घंटे को ईसा पूर्व तीसरी-चौथी सदी का बताया जा रहा है। मिट्टी में सैकड़ोंसाल तक दबे रहने और जंग लगने से घण्टा जीर्ण अवस्था में है। घण्टे के साथ ही दो छोटी घण्टियाँ भी मिली हैं। बड़े घंटे की लंबाई 33 सेमी, चौड़ाई 26 सेमी और मोटाई 16 सेमी है।
पुरातन वैदिक पाठशाला
उत्खनन में 5वीं शताब्दी में बनाई गई वैदिक पाठशाला के प्रमाण भी यहाँ  देखे जा सकते हैं। इस वैदिक पाठशाला को अरुणकुमार शर्मा के निर्देशन में खोजा गया है। 10 मीटर लंबाई व 1. 5 मीटर चौड़ाई के कमरों के बीचोंबीच में विष्णु की मूर्त्ति  मिली है। इस कमरे में 60 विद्यार्थियों के पढऩे की व्यवस्था थी। डॉ. शर्मा के अनुसार यह भारत में खोजी गई सबसे प्राचीन पाठशाला है। यहाँ  पर शिक्षकों के कमरें भी मिले हैं।
भव्य स्नान-कुण्ड
डॉ. शर्मा ने नगर संरचना के उत्खनन में एक सार्वजनिक मकान खोजा है, जिसमें बरामदे ही बरामदे हैं। इसके अलावा यहाँ  सफेद पत्थरों से निर्मितकुण्ड  निकला है। 3.6 मीटर लंब व चौड़ेकुण्ड  की गहराई 70 सेंटीमीटर है।
कुण्ड के चारों तरफ 12 स्तम्भ भी थे। इनके अवशेष के रूप में आधार स्तम्भ शेष बचे हैं।कुण्ड  के उत्तर पूर्व में तुलसी  चौरा है। इसमें जल की निकासी के लिए एक भूमिगत नाली से जोड़करकुण्ड  से मिलाया गया है।कुण्ड  के दक्षिण-पश्चिम कोने पर भी भूमिगत नाली से जल निकासी के काम करने के प्रमाण यहाँ  पर मिले हैं। यहकुण्ड  संभवत: आयुर्वेदिक स्नान के लिए प्रयुक्त होता था।कुण्ड  में नीम की पत्तियाँ  डालने का अनुमान हो सकता है। यहाँ पर संभवत: तेल स्नान पद्धति का भी उपयोग किया जाता रहा होगा।
यहाँ  सात धान्य भण्डार भी मिले हैं। इसमें तुलसी और नीम पत्ती व गेरू के टुकड़े रखकर दीमक से सुरक्षा करने के प्रमाण मिले हैं।
व्यापारिक नगरी का प्रमाण
औद्योगिक नगर की प्रतिष्ठा शरभपुरिया और पांडूवंशीय काल में सिरपुर का वैभव एक महान राजधानी के तौर पर था लेकिन हाल में मिले साक्ष्यों से इस बात की पुष्टि हो गई है कि इससे पहले भी इसकी ख्याति औद्योगिक उत्पादनों के लिए थी। सातवाहनों का प्रभुत्व इस नगर पर तीसरी सदी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईसवी तक रहा। महानदी के तट पर स्थित सिरपुर अरब देशों में चावल निर्यात का प्रमुख केन्द्र था। सूरत बंदरगाह होते हुए सदियों पूर्व अरबदेश के व्यापारी यहाँ  आते थे।
उत्खनन के निदेशक डा. अरुण शर्मा ने बताया कि वहाँ  पानी के बड़ेकुण्ड  के पास एक कमरा मिला है। इसमें सोने के गहने और काँच की चूडिय़ों की ढलाई होती थी। 10 सेमी लम्बा और ढाई सेमी चौड़ा स्लेटी प्रस्तर खण्ड  पर एक ऐसा साँचा मिला है ,जिसमें बारीक नक्काशीदार आकृतियाँ  हैं। जिसे दो हजार वर्ष पहले की सातवाहन काल का बताया जाता है। सोने को गलाने के बाद इसमें डाला जाता था। आम और कई आकर्षक आकृतियों में गहनों की ढलाई कर ली जाती। गहने ही नहीं यहाँ  बनाई जाने वाली काँच की चूडिय़ों की माँग देश के कई हिस्सो में होती थी। सोने-चाँदी और काँच का सामान पिघलाने में इस्तेमाल होने वाले मिट्टी के पात्र भी पाए गए हैं। बड़े पैमाने पर गहने और कांच की चूडिय़ों का उत्पादन कर इनका गुजरात, उड़ीसा समेत देश के कई हिस्सों में व्यापार होता था।
राम वनवास और सिरपुर
खुदाई में जो तथ्य सामने आ रहे हैं उससे फिर से इस बात की पुष्टि हुई है कि भगवान श्रीराम को जब 14 साल का वनवास मिला था तब उनको सिरपुर से होकर ही दक्षिण की तरफ जाना पड़ा था। श्रीराम के छत्तीसगढ़ के सिरपुर से होकर जाने के और कई प्रमाण पहले से भी छत्तीसगढ़ में मौजूद हैं जैसे आरंग में अहिल्या का स्थान होने के साथ तुरतुरिया में बाल्मीकि का आश्रम। सात ही दण्डकारण्य जाने का सबसे बेहतर रास्ता सिरपुर से होकर ही जाता था। श्रीराम ने शबरी से जो बेर खाए थे उसे सिरपुर के आस-पास के जंगलों में ही बताया जाता है।
शबरी जहाँ  रहती थीं उस नगर को शबरीपुर कहा जाता था। शबरीपुर का उल्लेख अलेक्जेंडर कनिंघम की पुस्तक में भी मिलता है, जो उन्होंने 1872 में लिखी थी। इस पुस्तक में शबरीपुर के साथ इस बात का भी उल्लेख है। यह बात भी स्थापित है कि सिरपुर में ही देश का प्रमुख चौराहा था। इस चौराहे से गुजरे बिना कोई भी दूसरी दिशा में जा ही नहीं सकता था। जहाँ  किसी को दक्षिण की और जाना होता था ,तो उसको इलाहाबाद, सतना, अमरकंटक के बाद सिरपुर होकर ही दक्षिण की और जाना पड़ता था। श्रीराम भी दक्षिण जाने के लिए इस चौराहे से होकर गए थे। इस मार्ग का उपयोग उस समय ज्यादा इसलिए भी होता था; क्योंकि यही एक ऐसा मार्ग था ,जिस मार्ग में नदियाँ  कम पड़ती थी।
मन्दोदरी पिता ने की टाउन प्लानिंग
ढाई हजार साल पुराने सिरपुर की खुदाई कर रहे पुरातत्त्ववेत्ताओं का यह भी दावा है कि इस शहर की डिजाइन लंका के राजा रावण के ससुर मय ने बनाया है। रावण की पत्नी मन्दोदरी के पिता मय का जिक्र पुराणों और पुरानी तमिल पाण्डुलिपियों में अद्वितीय वास्तुविद् के रूप में मिलता है। सिरपुर के महल, शहर संरचना, राजधानी के लिए जगह के चयन से लेकर ईंटों को जोडऩे के लिए प्रयुक्त गारे तक में वही सामग्री इस्तेमाल हुई है, जिसका जिक्र 10 हजार साल पहले मय ने किया था।
भवन निर्माण की सारी विधियों को संस्कृत भाषा में लिखी गई पाण्डुलिपियों में सुरक्षित किया गया था। कुछ साल पहले इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली ने इन पाण्डुलिपियों को मयमतम् (मय के विचार) किताब के रूप में प्रकाशित किया था। डेढ़ हजार से ज्यादा पेजों की दो हिस्सों में छपी किताब का अंग्रेजी में अनुवाद बेल्जियम के ब्रूनो डेगन्स ने किया है, जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वास्तुविद् और संस्कृत के शिक्षक हैं। ग्रंथ के हिसाब से पाण्दुवंशी राजाओं ने सिरपुर को ऐसे स्थान पर बसाया, जहाँ  पीली मिट्टी थी और उसका आकार नदी की धारा के साथ-साथ धनुष जैसा था। शहर की बाहरी दीवार नदी के धारा के समानान्तर ठीक 22 से 30 डिग्री के कोण पर थी। मयमतम् के अनुसार नदी से लगी दीवारों के ऐसे कोण से बाढ़ में भी शहर को नुकसान नहीं पहुँचता। सिरपुर का ढाल भी किताब के अनुसार पूर्व से पश्चिम की तरफ है।
सिरपुर में अब तक मिले 17 शिवमन्दिरों में भी एक खास सिद्धान्त का प्रयोग हुआ है, जिन्हें भी वास्तुविद् और भगवान शिव के भक्त मय ने बनाया था। सिद्धान्तके अनुसार मन्दिर  का दरवाजा शिवलिंग के आकार से दोगुना बड़ा और मन्दिर  काशिखर आठ गुना होना चाहिए। जाँच में पाया गया कि सारे शिवमन्दिर  उसी गणना के अनुरूप बने हैं। आज हम आधुनिक शहरों में भूमिगत नाली की व्यवस्था की बात करते हैं, लेकिन सिरपुर में 1800 से 2500 साल पुराने मकानों में पहले से ही यह व्यवस्था थी। शहर की कुछ भूमिगत नालियाँ  तो एक किमी से भी ज्यादा लंबी मिलीं है।
ईंटों की जुड़ाई का फार्मूला
मकान, मन्दिरों में इस्तेमाल ईंटों की जुड़ाई में मसाले की जगह फेविकोल जैसे पेस्ट का बखूबी इस्तेमाल किया गया था। सीमेंट से कहीं ज्यादा मजबूत जुड़ाई करने वाले पेस्ट के नमूने को शर्मा ने केमिकल टेस्ट के लिए देहरादून के लैब में भेजा था। जाँच से उन्हें पता चला कि पेस्ट तैयार करने के लिए हजारों साल पुराने फार्मूले का इस्तेमाल हुआ था। इसे बबूल की गोंद, अलसी के तेल, भूसे, सड़े हुए गुड़, कुछ जड़ी-बूटियों के मिश्रण को सड़ाकर तैयार किया जाता था।
विश्व धरोहर की बाट जोहता सिरपुर?
सिरपुर के इन पुरातन विशेषताओं के देखते हुए लम्बे समय से इसे विश्व धरोहर घोषित कराने की माँग की जा रही है परन्तु इस पर अभी तक गम्भीरता से विचार नहीं किया गया है। राज्य सरकार को चाहिए कि वह इस ओर पुन: प्रयास आरंभ करे ताकि विश्व के पर्यटन मानचित्र पर सिरपुर का नाम भी प्रमुकता से आए और आधिक से अधिक देशी और विदेशी पर्यटक इस ओर आकर्षित हों वैसे राज्य सरकार ने वर्ष 2006 से सिरपुर महोत्सव का आयोजन प्रारम्भ कर किया है; जिससे सिरपुर को राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक विशेष पहचान मिली है। इसके बावजूद अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। (उदंती फीचर्स)

पाली: शिव मन्दिर में कला का अद्भुत रूपांकन

पाली:
शिव मन्दिर में कला का अद्भुत रूपांकन 
  -  प्रो. अश्विनी केशरवानी
छत्तीसगढ़ को प्राचीन काल में 'दक्षिण कोशल' कहा जाता था। अतीत से वर्तमान तक यहाँ  अनेक राजवंश के राजाओं ने शासन किया, अपने पराक्रम और पराजय का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया और वे काल के मरुस्थल में पद-चिह्न की स्याही में घुल मिलकर इन खण्डहरों, शिलालेखों और ताम्रपत्रों में लिखे रह गये हैं। राजाओं द्वारा अनेक मन्दिर , मठ और तालाब आदि के निर्माण के बारे में हमारा विचार है कि यहाँ  के गाँवों में स्कूल-कालेज न हो, हाट-बाजार न हो, तो कोई बात नहीं; लेकिन नदी-नाला का किनारा हो या तालाब का पार, मन्दिर  चाहे छोटे रूप में हों, अवश्य देखने को मिलता है। ऐसे मन्दिरों में शिव लिंग, राधाकृष्ण, हनुमान, राम-लक्ष्मण-जानकी के मन्दिर  प्रमुख होते हैं।' लेकिन पाली का शिव मन्दिर  प्राचीन ही नहीं अपितु मूर्त्तिकला का अनुपम उदाहरण भी है।
पाली, बिलासपुर राजस्व सम्भाग में नवगठित कोरबा जिलान्तर्गत कोरबा से लगभग 55 कि.मी., बिलासपुर अम्बिकापुर मार्ग में बिलासपुर से 40 कि. मी., राजधानी रायपुर से 160 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। प्राचीन काल में इस नगर को 'झांझनगर-पाली' कहा जाता था। कालान्तर में झांझनगर का लोप हो गया और 'पाली' नाम प्रचलित हो गया। पाली में बस्ती के बाहर सड़क किनारे एक तालाब है, जिसके तट पर उत्कृष्ट मूर्त्तिकला से सजा एक शिव मन्दिर  है। यह मन्दिर  छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास पर प्रकाश डालती है।
मध्ययुगीन मूर्त्तिकला का केन्द्र-
मध्ययुगीन मूर्त्तिकला की शुरूवात इस क्षेत्र में पाली के इस शिव मन्दिर  से हुई प्रतीत होता है। इस मन्दिर  के बाहरी भाग, भीतरी सभा मण्डप और गर्भगृह के द्वार पर खुदाई का इतना सुन्दर और दर्शनीय काम किया गया है, जिन्हें देखकर आबू पर्वत के जैन मन्दिर  पर किये गए जालीदार नक्काशी की बरबस याद आ जाती है। इस सम्बन्ध में बिलासपुर जिले के प्रथम सेटलमेंट अधिकारी मि. चीजम साहब ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है- 'इस मन्दिर  का अवशिष्ट भाग अर्थात् गर्भगृह का सभा मण्डप अष्टकोण गुम्बददार है तथा मण्डप में प्रवेश करते ही नीचे से ऊपर तक नक्काशी का जो बारीक काम किया गया है उसे देखकर मन आश्चर्य चकित हो उठता है। सभा- मण्डप का गुम्ब्द जिन खम्भों पर स्थित है, उन पर हिन्दू पुराणों और काव्यों में वर्णित प्रसिद्ध व्यक्तियों की आकृतियाँ  चित्रित हैं। गुम्बद के सबसे निचले भाग में अत्यंत विचित्र आकृतियाँ  लकीरों में बनाई गयी हैं। सबसे उत्तम और परिश्रमपूर्वक खुदाई का काम गर्भगृह के द्वार पर किया गया है। यह नक्काशी अत्यंत बारीक है और इसे बनाने में बड़ी कुशलता दिखाई गयी है।'
श्री प्यारेलाल गुप्त अपनी पुस्तक 'प्राचीन छत्तीसगढ़' में लिखते हैं- 'किंवदंती है कि रतनपुर नगर का विस्तार दक्षिण पूर्व में 12 मील दूर पाली तक था, जहाँ  एक सुन्दर तालाब के तट पर शिवजी का एक अष्टकोणीय मन्दिर  अपनी भव्यता और शिल्पकला में अभी भी उत्कृष्ट समझा जाता है। आश्चर्य तो यह है कि धरातल से लेकर चोटी तक मन्दिर  का एक-एक इंच, अंग्रेज अधिकारियों द्वारा मरम्मत कराए गए भाग को छोड़कर, कलाकार की छेनी से अछूता नहीं है। मन्दिर  की दीवार पर चहुँ ओर अनेक कलात्मक मूर्त्तियाँ  इस चतुराई से अंकित हैं मानों वे बोल रहे हों कि 'देखो हमने अब तक कला की साधना की है और तुम पूजा के फूल चढ़ाओ।' सच पूछिए तो छत्तीसगढ़ की प्राचीन संस्कृति का विकास इन्हीं मन्दिरों में अंकित मूर्त्तियों के सहारे हुआ है। ये मूर्त्तियाँ  अंग-भंगिमा और सूक्ष्म साज- सज्जा की दृष्टि से बेजोड़ है। सभा मण्डप में चौरासी योगिनियों की मूर्त्तियाँ  प्रतिष्ठित हैं जो अत्यंत सुन्दर और मनहरण हैं। इन्हें देखकर जबलपुर के भेड़ाघाट में स्थित चौसठ योगिनी मन्दिर  की याद आती है। इसी प्रकार मन्दिर  के भीतरी भग की कला कृतियों में जिन कोमल और मधुर भाव के दर्शन होते हैं उसका बयान सम्भव नहीं है। 'गिरा अनयन नयन बिन बानी।' मूर्त्तियों के शिल्प में रेखाओं की निपुणता लालित्यपूर्ण अंग सौष्ठव एवं विस्मयकारी शिल्प दृष्टि एवं कला प्रेमियों में रस का संचार की है। मन्दिर  की बाहरी और भीतरी दीवार पर देवी-देवताओं की मूर्त्तियाँ , नायक-नायिकाओं का प्रदर्शन, ब्याल अलंकरण और योग मुद्राएँ  आदि उत्कीर्ण की गई है। चामुण्डा, सरस्वती, गज लक्ष्मी और पार्वती के अलावा इंद्र, अत्रि, अग्नि, वरूण, वायु, कुबेर और ईशान देव की मूर्त्ति  प्रमुख है। खजुराहो, कोणार्क, भोरमदेव, नारायणपुर, सेतगंगा के मन्दिरों की तरह यहाँ  भी काम कला का चित्रण मिलता है।
 मन्दिर  की दीवार पर ब्याल अलंकरण में काल्पनिक पशु का चित्रण है ,जिसमें शरीर सिंह का और सिर किसी दूसरे पशु का है। यहाँ पर सिंह, गज, नर, वराह, शुक्र आदि का विचित्र चित्रण मिलता है। नायिकाओं का अत्यंत सजीव चित्रण गर्भगृह के बाह्य भित्तियों पर किया गया है। तोते को दाना चुगाती शुक अभिसारिका, बच्चे को दूध पिलाती माँ , नृत्य की आकर्षक मुद्रा में नर्तकी, आंखों में अंजन लगाती सुंदरी, केश सँवारती और अन्य अनेक भाव भंगिमा में अलमस्त चित्रण निश्चित रूप से मन को मोहित कर लेता है। मन्दिर  की उत्कृष्ट कलाकृति में शिव-पार्वती की विभिन्न मुद्राओं का चित्रांकन है। द्वार के साख पर दाईं  और बाईं ओर शिव-पार्वती की आलिंगनबद्ध मूर्त्तियों का चित्रांकन कलात्मक ढंग से किया है। ऊपर दाईं  ओर शिवजी की बायीं जांघ में पार्वती जी विराजमान हैं। शिवजी के हाथ में त्रिशूल बीजपूरक है। इस मूर्त्ति में एक हाथ खण्डित  है, जबकि दूसरे हाथ से वे पार्वती जी का आलिंगन कर रहे हैं। नीचे की मूर्त्तियों में शिव-पार्वती नंदी पर आरूढ़ हैं। शिवजी के हाथ में त्रिशूल, नाग एवं कपाल है। बाईं ओर शिव-पार्वती की प्रथम मूर्त्ति में शिव पार्वती की ठोढ़ी को स्पर्श कर रहे हैं और पार्वती जी मोहक मुद्रा में शिव जी की ओर निहार रहीं हैं। नीचे बैठा नंदी आश्चर्यचकित हो शिवजी की ओर निहार रहा है। एक और मूर्त्ति में शिवजी के बाएँ भाग में पार्वती जी हैं; लेकिन उनका मुख दूसरी ओर है, जैसे वे रूठी हों और शिवजी उन्हें मनाने का प्रयास कर रहे हों?
पाली का ऐतिहासिक सफर-
उत्कृष्ट मूर्त्तिकला से सुसज्जित पाली के इस मन्दिर  का निर्माण आखिर कराया किसने और इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या थी यह सहज ही जिज्ञासा का प्रश्न है। मन्दिर  में कुछ स्थानों में 'श्री मज्जाजल्लदेवस्य कीर्तिरियम' खुदा हुआ है। इससे प्रतीत होता है, कि इसे कलचुरी वंशी राजा जाजल्लदेव ने बनवाया है? कलचुरी वंश की राजधानी पहले तुम्माण में फिर रत्नपुर में बनायी गयी। रत्नपुर के कलचुरी वंश में जाजल्लदेव नाम के दो राजा हुए । इनमें जाजल्लदेव प्रथम का शासनकाल सन् 1095 से 1120 तक था। मन्दिर  में उत्कीर्ण लेख की खुदाई भी इसी काल की प्रतीत होती है। अगर इसे जाजल्लदेव प्रथम ने बनवाया है, तब इसका निर्माण काल 11 वीं शताब्दी के अंत में निर्धारित होता है। लेकिन मन्दिर  इससे भी प्रचीन है क्योंकि मन्दिर  के गर्भगृह केद्वार पर गणेश पट्टी पर खुदा लेख विक्रमादित्य का है। इस लेख को सर्वप्रथम डॉ. देवदत्त भंडारकर ने लगभग 50 वर्ष पहले पढ़ा था। उनके अनुसार लेख का आशय है  'कि महामंडलेश्वर मल्लदेव के पुत्र विक्रमादित्य ने यह देवालय निर्माण कराकर कीर्तिदायक काम किया है।इस काल में यह तो ज्ञात हो गया कि बाणवंश में विक्रमादित्य नाम के राजा हुए  थे। लेकिन वे उनका शासनकाल की जानकारी प्राप्त नहीं कर सके। आज इससे सम्बन्धित अनेक लेख प्रकाश में आ चुके हैं ,जिनसे ज्ञात होता है कि बाणवंश में विक्रमादित्य नाम के तीन राजा हुए । उनमें से प्रथम विक्रमादित्य जिसे जयमेरू भी कहा जाता था, मल्लदेव का पुत्र था। पाली के लेख में भी विक्रमादित्य को मल्लदेव का पुत्र बताया गया है। अत: यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि दोनों विक्रमादित्य एक ही थे। इसका दूसरा शिलालेख अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। लेकिन उनके पुत्र विजयादित्य जिन्हें प्रभुमेरू भी कहा जाता है, का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है। यह संवत् 820-831 (सन् 898-99 से 909-910 ईसवीं) का है। इस लेख से ज्ञात होता है कि विक्रमादित्य (जयमेरू) ने सन् 870 से 895 ई. में राज्य किया और इसी बीच उन्होंने पाली के इस शिव मन्दिर  का निर्माण कराया। इससे यह तो सिद्ध होता है कि इस क्षेत्र में विक्रमादित्य का शासन था।
श्री प्यारेलाल गुप्त अपनी पुस्तक 'प्राचीन छत्तीसगढ़' में लिखते हैं- यद्यपि इनके प्रथम राजा का नाम शिवगुप्त था ; लेकिन यह प्रमाणित नहीं हो सका है कि पूर्ववर्ती पाण्डुवंशी से इनका कोई सम्बन्ध था। बल्कि पाण्डुवंशी राज्य प्रणाली के विपरीत किन्तु शरभवंशी राजाओं के समान इनकी राजमुद्राओं पर गजलक्ष्मी पायी जाती है। शिवगुप्त का एक भी प्रशस्ति पत्र अभी तक नहीं मिला है। इनके पुत्र महाभवगुप्त का एक प्रशस्ति पत्र मिला है जिसमें अंकित है-'स्वस्ति श्रीमत् परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर सोमकुल तिलक त्रिकलिंगाधिपति महाराज श्री भवगुप्त'
तुम्माण और रतनपुर के कलचुरी राजाओं के विभिन्न अभिलेखों में बताया गया है कि इस वंश हैहह रानी से दहाल का शासक कोकृल (ईसवी सन् 850 से 890) उत्पन्न हुआ, जिसके 18 पुत्र थे। इनमें से ज्येष्ठ पुत्र त्रिपुरी के राजगद्दी का उत्तराधिकारी हुआ और अन्य पुत्रों को विभिन्न मण्डलों का अधिपति बनाया गया। इनमें से एक पुत्र कलिंगराज हुआ जिसने अपने पूर्वजों की भूमि को छोड़कर दक्षिण कोसल जनपद में पहुँचकर उसे अपने बाहुबल से प्राप्त किया और तुम्माण को राजधानी बनाकर अपने राज्य की श्रीवृद्धि की। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि इसके पूर्व भी कलचुरियों ने तुम्माण में अपनी राजधानी स्थपित की थी। बिल्हारी अभिलेख के अनुसार कोकृलदेव प्रथम के पुत्र मुग्धतुंग ने पूर्व समुद्र के तटवर्ती देशों को जीतकर कोशल के राजा से पाली छीन ली। सम्भवत: ईसवीं सन 900 में पहली बार तुम्माण कलचुरियों की राजधानी बना और लगभग ईसवीं सन् 1000 में कलिंगराज ने तुम्माण को पुन: अपनी राजधानी बनाया। कोकृलदेव प्रथम और कलिंगराज के बीच के समय में इस वंश का इतिहास अंधकारमय है।
पंडित लोचनप्रसाद पांडेय ने उड़ीसा में समुद्र तट से 13 कि.मी. की दूरी पर स्थित 'पालिया' को उक्त अभिलेख का पाली माना है। उपर्युक्त तत्थों से स्पप्ट है कि पाली के इस मन्दिर  को बाणवंशी राजा विक्रमादित्य ने बनवाया है। लेकिन मन्दिर  की दीवार में कलचुरी राजा जाजल्लदेव के अभिलेख से ऐसा प्रतीत होता है कि इस मन्दिर  का जीर्णेद्धार राजा जाजल्लदेव ने कराया है। अन्य अभिलेखों से पता चलता है कि कलचुरी राजा जाजल्लदेव प्रथम ने अपने नाम पर 'जाजल्लपुर' बसाया जो वर्तमान में जांजगीर नगर को माना जाता है। यहाँ  उनहोंने विष्णु मन्दिर , मठ, सरोवर और आम्रवन आदि बनवाया तथा अनेक मन्दिरों-पाली का शिव मन्दिर , शिवरीनारायण का नारायण मन्दिर  आदि का जीर्णोद्धार कराया।  
मिस्टर कजिंस ने 50 वर्ष पूर्व इस मन्दिर  का अवलोकन किया था। वे लिखते हैं 'इस मन्दिर  का सभा मण्डप पहले चतुष्कोण था। बाद में ऊपर के गुम्बज को सहारा देने के लिये चारों कोणों में चार आड़ी दीवार बनायी गयी जिसके कारण अब मन्दिर  अष्ट-कोणीय दिखाई देता है। इसी प्रकार गर्भगृह के सामने दो नये स्तम्भ है, जिन पर नक्काशी का काम उतना नहीं है, जितना सभा मण्डप के अन्य स्तम्भों पर है। ये स्तम्भ ऊपर छत की टूटी हुई मयाल को सहारा देने के लिये बनाए गए हैं। इसके सिवाय सभा मण्डप का एक दरवाजा भी बाद में बना जान पड़ता है। यह भी उल्लेखनीय है कि जितने भाग का जीर्णोद्धार किया गया है उन्हीं में जाजल्लदेव का नाम खुदा है। इन सब तथ्यों से स्पष्ट है कि जालल्लदेव प्रथम ने इस मन्दिर  का निर्माण नहीं बल्कि जीर्णोद्धार कराया था'। मध्य कालीन मूर्त्तिकला के उत्कृष्ट नमूने इस क्षेत्र के जांजगीर, पाली, भोरमदेव, नारायणपुर और शिवरीनारायण के मन्दिर  में देखे जा सकते हैं। प्राचीन काल का वैभवशाली नगर पाली आज एक अल्प विकसित कस्बा मात्र है। यहाँ  प्रतिवर्ष महाशिवरात्री पर शिव भक्तों की भीड़ मेला जैसा दृश्य उपस्थित करता है। यह नगर कई राजवंशों का काल निर्धारित ही नहीं करता वरन् इस क्षेत्र में उनके शासन काल को दर्शाता भी है। अत: यह मन्दिर  छत्तीसगढ़ के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और इसकी पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की जानी चाहिये।

सम्पर्क- 'राघव' डागा कालोनी, चांपा-495671 (छ.ग.)

छत्तीसगढ़ः तुरतुरिया- लव- कुश की जन्मस्थली


जहाँ  सौर ऊर्जा से रौशन होते हैं गाँव
 - ज्योति प्रेमराज सिंह
 छत्तीसगढ़ के घने जंगलों के बीच स्थित तुरतुरिया में महर्षि वाल्मीक का आश्रम इस बात की याद दिलाता है कि रामायण काल में छत्तीसगढ़ का कितना महत्त्व  रहा होगा।
रायपुर से 113 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रायपुर-बलौदाबाजार मार्ग पर ठाकुरदिया नाम के स्थान से सात किलोमीटर दूरी पर घने जंगल और पहाड़ों पर स्थित है तुरतुरिया। यहाँ  जाने का रास्ता शायद पहले आसान नहीं रहा होगा, क्योंकि सुरम्य और घनी पहाडिय़ों के बीच स्थित इस स्थान में जगह-जगह पहाड़ी कछार, छोटे-छोटे नाले और टीलें हैं। इन्हीं पहाडिय़ों के बीच बहती है बालमदेही नदी जिसका पाट तुरतुरिया के पास काफी चौड़ा हो गया है। पहाड़ी नदी होने के कारण वर्षा ऋतु में इसका तेज प्रवाह तुरतुरिया तक पहुँचने के रास्तों को और कठिन बना देता है। यह नदी आगे चलकर पैरागुड़ा के पास महानदी में मिल जाती है।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद इस राज्य के ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्यों से संबंधिक क्षेत्रों का लगातार विकास कर इन्हें पर्यटन क्षेत्रों के रूप में उभारा जा रहा है। तुरतुरिया जहाँ  पहुँचना पहले आसान नहीं था, लेकिन अब इसके रास्तों को आसान बनाया जा रहा है।  तुरतुरिया तीन मुख्य रास्तों से जाया जा सकता है, एक सीधे रायपुर से बारनवापारा जंगल होते हुए, दूसरा सिरपुर से और तीसरा बलौदाबाजार से।
तुरतुरिया वन विभाग की चौकी पार करने के बाद दो सौ कदम के फासले पर ही स्थित है महर्षि वाल्मीक का आश्रम। सामने ही एक पहाड़ी पर वैदेही कुटीर नजर आती है। वहाँ  तक पहुँचने के लिए पहाडिय़ों को काटकर सीढिय़ाँ बना दी गई हैं। सीढिय़ों के किनारे-किनारे जंगली मोगरे के छोटे-छोटे पौधे बिखरे पड़े हैं। गर्मियों और बारिश में जब ये फूल खिलते हैं, तो वातावरण और खुशनुमा हो जाता है। ऊपर पहुँचने पर एक पक्का कुटीर नजर आता है। यदि आपकी किस्मत अच्छी है, तो आपको ऊपर पहुँचने पर हिरणों का झुण्ड भी विचरण करता नजर आ सकता है। हालाँकि पर्यटकों की आहट से चौकन्ना होकर ये हिरण कुलाँचे भरते हुए पल भर में पेड़ों के झुरमुट में गायब भी हो जाते हैं। रात में और भी जानवर यहाँ  पर देखे जा सकते हैं। इसी पहाड़ी से लगी एक अन्य पहाड़ी है, जहाँ  पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम स्थित है।
प्राचीन जनश्रुतियों के अनुसार त्रेतायुग में यहाँ  महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था और यहीं पर उन्होंने सीताजी को रामचन्द्र जी द्वारा त्याग देने पर आश्रय दिया था। और यहीं सीताजी के दोनों पुत्र लव और कुश ने जन्म लिया था। वैदेही कुटीर के नीचे ठीक बाएँ  एक सँकरा रास्ता पैदल जाता है। सामने ही कलात्मक खम्भे दिखाई देते हैं, जो विखण्डित  हो चुके हैं।
इसी क्षेत्र में बौद्ध भग्नावेश भी मिलते हैं, जो 8वीं शताब्दी के हैं। यहीं पर कई उत्कृष्ट कलात्मक खम्भे भी नजर आते हैं, जो किसी स्तूप के अंग हैं।  माता सीता और लव-कुश की एक प्रतिमा भी यहाँ  नजर आती है, जो 13-14 वीं शताब्दी की बताई जाती है। पाषाण निर्मित ये मूर्त्तियाँ  कलात्मक तो नहीं कही जा सकती, लेकिन इससे यह बात स्पष्ट होती है कि प्राचीन काल में भी इस जगह को वाल्मीक के आश्रम के रूप में मान्यता मिली हुई थी।
घने जंगलों से घिरे इस क्षेत्र का नाम तुरतुरिया पडऩे का कारण संभवत: चट्टानों के बीच से इस झरने का उद्गम एक लंबी सँकरी गुफा से होना है। जहाँ  से वह बड़ी दूर तक भूमिगत होकर बहती है। इस झरने को यहाँ  सुरसरि गंगा के नाम से भी जाना जाता है। इस गुफा से निकलने वाला जल नीचें पहुँच कर र्इंटों से निर्मित एक कुण्ड  में एकत्र होता है। इस कुण्ड  में उतरने के लिए सीढिय़ाँ बनी हुई हैं। बारहों महीने इसकी जलधारा प्रवाहित होती रहती है। यहाँ  पर नियुक्त महंत रामकिशोर दास के अनुसार वे पिछले 35 बरसों से इस क्षेत्र में निवास कर रहे हैं। इतने बरसों में उन्होंने कभी इस धारा को सूखते नहीं देखा है। कुण्ड  के निकट दो शूरवीरों की मूर्त्तियाँ  हैं, जिनमें से एक तलवार उठाए हुए है, जो उस सिंह को मारने के लिए उद्यत है जो उसकी दाहिनी भुजा को फाड़ रहा है। दूसरी मूर्त्ति में एक जानवर उसकी पिछली टाँगों पर खड़ा होकर उसका गला मरोड़ रहा है। यहाँ  पत्थर के कई स्तम्भ यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं, जिन पर उत्कृष्ट खुदाई का काम किया गया है।

 बौद्ध विहार-
यह स्थान कुण्ड  से कुछ दूरी पर नाले के दूसरे किनारे पहाड़ पर स्थित ऋषियों के कुटी में जाने के लिए बनाए गए पहाड़ी सीढिय़ों के समीप है। जहाँ  पर   बौद्ध  भिक्षुणियों की मूर्त्ति पाई गई हैं जो कि उपदेश देने की मुद्रा में दिखाई गई हैं। इन मूर्त्तियों का काल 8-9 वीं शताब्दी बताया जाता है। इन मूर्त्तियों को देखकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सम्भवत: यहाँ   बौद्ध  भिक्षुणियों का विहार था। और यह शोध का विषय भी है कि भारत में   बौद्ध  भिक्षुणियों के लिए विहार का निर्माण किया गया था या नहीं? इन अवशेषों से इस बात का स्पष्ट पता चलता है कि इस क्षेत्र पर 8-9 वीं शताब्दी में बौद्ध धर्म का प्रभाव था और यहाँ  प्रमुख बौद्ध स्तूप और स्थल रहा होगा। इस क्षेत्र की खुदाई और शोध से कई बातें और सामने आ सकती हैं। 
यहाँ  कुछ भग्न मन्दिर  भी प्राप्त हुए हैं जिनका जीर्णोद्धार हो चुका है। बौद्ध मूर्त्तियाँ खण्डित  अवस्था में हैं तथा समीप ही शैव वैष्णव धर्म की कुछ मूर्त्तियाँ  पाई गईं हैं, जिनमें शिवलिंगों की अधिकता है। इनमें विष्णु और गणेश जी की भी   मूर्त्तियाँ  हैं।
इस क्षेत्र का महत्त्व  छेराछेरा के मौके पर और बढ़ जाता है, जब यहाँ  पर मेला भरता है। जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि धार्मिक मान्यता के अनुसार इस स्थान पर लव-कुश का जन्म हुआ था, इसलिए पूष माह में यहाँ  पर तीन दिनों का मेला भरता है। छत्तीसगढ़ के इस पारम्परिक त्योहार छेरछेरा जो पूर्णिमा यानी पुन्नी के दिन धान कटाई के बाद मनाया जाता है  के दिन दिन गाँव -गाँव  में घर-घर जाकर छोटे-छोटे बच्चे गुहार (आवाज) लगाकर कहते हैं- छेरा-छेरा, कोठी के धान ल हेर हेरा। यानी धान का दान देना इस दिन शुभ माना जाता है। इस दिन लगने वाले मेले में आस-पास के हजारों लोग जुटते हैं। तब तक बालमदेही नदी का पाट काफी सिमट जाता है और गाँव -गाँव  से आने वाले लोग नदी के रेतीले तट पर अस्थायी चूल्हे बनाकर अपने खाने-पीने का इंतजाम करते हैं।
इस समूचे क्षेत्र में एक अच्छी बात यह देखने में आई कि पहाड़ी क्षेत्र होने के बाद भी यहाँ  पर गाँव -गाँव में रौशनी है। यह कमाल सौर ऊर्जा का है। समूचे क्षेत्र में सौर ऊर्जा से बिजली प्रवाहित होती है। आस-पास के गाँवों में भी छोटे-छोटे सौर संयन्त्र नजर आते हैं, जिनसे पूरे गाँव  को रौशनी मिलती है। तुरतुरिया में भी रौशनी सौर ऊर्जा से पहुँचाई जा रही है।
इस क्षेत्र से सबसे समीप का गाँव  है बफरा, जहाँ 30 से 40 कच्चे-पक्के मकान बने हुए हैं। यह गाँव  तुरतुरिया से 10-12 किमी की दूरी पर स्थित है। तुरतुरिया जाने के मार्ग पर पडऩे वाले गाँव  काफी बिखरे हुए हैं। इसकी वजह शायद इसका पहाड़ी इलाका होना है।
तुरतुरिया से 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है मातागढ़। बालमदेही नदी के पश्चिम में स्थित इस स्थान पर देवी माँ  का एक प्राचीन मन्दिर  है। जिसकी बड़ी मान्यता है।

राजिमः छत्तीसगढ़ का प्रयाग











राजिमःछत्तीसगढ़ का प्रयाग
छत्तीसगढ़ क्षेत्र में महानदी का वही स्थान है जो भारत में गंगा नदी का है। यहाँ  का सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि है जो माघ मास की पूर्णिमा से शुरु होकर फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि तक चलता है। इस अवसर पर राजिम एक तीर्थ का रूप ले लेता है। यहाँ  हजारों श्रद्धालु संगम स्नान करने और भगवान राजीव लोचन तथा कुलेश्वर महादेव के दर्शन करने दूर-दूर से पहुँचते हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक कि वे राजिम की यात्रा नहीं कर लेते।
रायपुर से लगभग 45 किमी दूर त्रिवेणी संगम (महानदी- सोंढूर-पैरी) के किनारे बसा राजिम छत्तीसगढ़ का प्रमुख तीर्थ स्थल है। इस संगम की खास बात यह है कि यहाँ  तीनों नदियाँ  साक्षात् दिखाई देती हैं, जबकि इलाहाबाद के त्रिवेणी संगम में सरस्वती लुप्तावस्था में है।
राजिम के देवालय ऐतिहासिक तथा पुरातात्त्विक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ  प्राप्त मन्दिरों को कालक्रम के अनुसार चार भागों में बांटा गया है।
(1) कुलेश्वर (9वीं सदी), पंचेश्वर (9वीं सदी) तथा भूतेश्वर महादेव (14वीं सदी), (2) राजीवलोचन (8वी सदी), वामन, वाराह, नृसिंह, बद्रीनाथ, जगन्नाथ, राजेश्वर, दानेश्वर एवं राजिम तेलिन मन्दिर । (3) रामचन्द्र (14वीं सदी) (4) सोमेश्वर महादेव नलवंशी नरेश विलासतुंग के राजीव लोचन मन्दिर  अभिलेख के आधार पर अधिकांश विद्वानों ने इस मन्दिर  को 8वीं शताब्दी की निर्मिति माना है। इस मन्दिर  के विशाल प्राकार के चारों अंतिम कोनों पर बने वामन, वाराह, नृसिंह तथा बद्रीनाथ के मन्दिर  स्वतंत्र वास्तु रूप के उदाहरण माने जा सकते । राजिम के मन्दिर  तथा यहाँ  स्थापित प्रतिमाएँ  लोगों की धार्मिक आस्था पर प्रकाश तो डालती ही हैं, साथ ही भारतीय स्थापत्यकला एवं मूर्त्तिकला के इतिहास को रेखांकित भी करती हैं । इन मन्दिरों के कालक्रम को देखने से यह पता चलता है कि छत्तीसगढ़ अंचल कला और स्थाप्त्य की दृष्टि से कितना समृद्धशाली था।
एशियाटिक रिसर्च सोसायटी के रिचर्ड जैकिंस इसे राजा राम के समकालीन राजीव नयन नामक राजा से जोड़ते हैं लेकिन मन्दिर  के पुजारी ठाकुर ब्रजराज सिंह जो कथा बतातें है , वह कुछ इस तरह है:
सतयुग में एक प्रजापालक भक्त राजा रत्नाकर था। उस समय यह क्षेत्र पद्मावती क्षेत्र या पद्मपुर कहलाता था। इसके आसपास का इलाका दण्डकारण्य के नाम से प्रसिद्ध था। यहाँ  अनेक राक्षस निवास करते थे। राजा रत्नाकर समय-समय पर यज्ञ, हवन, जप-तप करवातेरहते थे। ऐसे ही एक आयोजन में राक्षसों ने ऐसा विघ्न डाला कि राजा दु:खी होकर एक खण्डित  हवन कुण्ड  के सामने ही ईश आराधना में लीन हो गए और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे कि वे स्वयं आकर इस संकट से उबारें। ठीक इसी समय गजेंद्र और ग्राह में भी भारी द्वन्द्व चल रहा था, ग्राह गजेंद्र को पूरी शक्ति के साथ पानी में खींचे लिये जा रहा था और गजेंद्र ईश्वर को सहायता के लिए पुकार रहा था। उसकी पुकार सुन भक्त वत्सल विष्णु जैसे बैठे थे वैसे ही नंगे पाँव उसकी मदद को दौड़े। और जब वह गजेंद्र को ग्राह से मुक्ति दिलवा रहे थे, तभी उनके कानों में राजा रत्नाकर का आर्त्तनाद सुनाई दिया। भगवान उसी रूप में राजा रत्नाकर के यज्ञ में पहुँचे और राजा रत्नाकर ने यह वरदान पाया कि अब श्री विष्णु उनके राज्य में सदा इसी रूप में विराजेंगे। तभी से राजीव लोचन की मूर्त्ति इस मन्दिर  में विराज रही है। कहते हैं कि इस मूर्त्ति का निर्माण स्वयं विश्वकर्मा ने किया था।
एक और जनश्रुति के अनुसार राजा जगतपाल इस क्षेत्र पर राज कर रहे थे तभी कांकेर के कंडरा राजा ने इस मन्दिर  के दर्शन किए और उसके मन में लोभ जागा कि यह मूर्त्ति तो उसके राज्य में स्थापित होनी चाहिए । इसके लिए उन्होंने पुजारियों को धन का लोभ दिया ; पर वे नहीं माने तब राजा ने बलपूर्वक सेना की मदद से इस मूर्त्ति को उठा लिया और एक नाव में रखकर महानदी के जलमार्ग से कांकेर रवाना हुआ ;पर धमतरी के पास रूद्री नामक गाँव  के समीप मूर्त्ति सहित नाव डूब गई और मूर्त्ति शिला में बदल गई। कंडरा राजा खिन्न मन से कांकेर लौट गया। लेकिन राजिम में महानदी के बीच में स्थित कुलेश्वर महादेव मन्दिर  की सीढ़ी से आ लगी। इस 'शिला’को देख 'राजिम’नाम की तेलिन उसे अपने घर ले गई और उसने शिला को कोल्हू में रख दिया। उसके बाद से उस तेलिन का घर धन-धान्य से भर गया। उधर सूने मन्दिर  को देखकर दुखी होते राजा जगतपाल को भगवान ने स्वप्न दिया कि वे तेलिन के घर से मुझे वापस लाकर मन्दिर में प्रतिष्ठित करें। पहले तो तेलिन राजी ही नहीं हुई ; पर अंतत: पुन:प्रतिष्ठा हुई और तभी से यह क्षेत्र राजिम तेलिन के नाम से राजिम कहलाने लगा। आज भी राजीवलोचन मन्दिर  के आसपास अन्य मन्दिरों के साथ राजिम तेलिन का मन्दिर  भी विराजमान है।
यहाँ  पंचकोसी यात्रा की जाती है जिसके बारे में भी यहाँ  एक कथा प्रचलित है- एक बार विष्णु ने विश्वकर्मा से कहा कि धरती पर वे एक ऐसी जगह उनके मन्दिर  का निर्माण करें, जहाँ  पाँच कोस के अन्दर शव न जला हो। अब विश्वकर्मा जी धरती पर आए, और ढूँढ़ते रहे, पर ऐसा कोई स्थान उन्हें दिखाई नहीं दिया। उन्होंने वापस जाकर जब विष्णु जी से कहा तब विष्णु जी एक कमल के फूल को धरती पर छोडक़र विश्वकर्मा जी से कहा कि यह जहाँ  गिरेगा, वहीं हमारे मन्दिर  का निर्माण होगा। इस प्रकार कमल फूल के पराग पर विष्णु भगवान का मन्दिर है और पंखुडिय़ों पर पंचकोसी धाम बसा हुआ है। कुलेश्वर नाथ (राजिम) चम्पेश्वर नाथ (चम्पारण्य) ब्राह्मकेश्वर (ब्रह्मणी), पाणेश्वर नाथ (फिंगेश्वर) कोपेश्वर नाथ (कोपरा)।
लोगों की यह भी मान्यता है कि जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक सम्पूर्ण नही होती जब तक यात्री राजिम की यात्रा नही कर लेता। कहते हैं माघ पूर्णिमा के दिन स्वयं भगवान जगन्नाथ पुरी से यहाँ  आते हैं। उस दिन जगन्नाथ मन्दिर  के पट बंद रहते हैं और भक्तों को भी राजीव लोचन में ही भगवान जगन्नाथ के दर्शन होते हैं। महाभारत के आरण्यक पर्व के अनुसार  सम्पूर्ण  छत्तीसगढ़ में राजिम ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ  बदीनारायण का प्राचीन मन्दिर  है। इसका वही महत्त्व  है जो जगन्नाथपुरी का है।
राजिम मेले को कुम्भ का रुप प्रदान करने के बाद से अब प्रति वर्ष यहाँ  राज्य शासन विशेष व्यवस्था करता है। लोगों के लिए ठहरने खाने,कुम्भ स्नान करने तथा भगवान के दर्शन की व्यवस्था के साथ अन्य राज्यों से अनेक कलाकार, विद्वान आमन्त्रित किये जाते हैं। इस प्रकार राजिम के इस त्रिवेणी संगम पर धर्म, आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम नजर आता है।
(उदंती फीचर्स)
राजिम कुम्भ तक पहुँचने के लिए
हवाई मार्ग- रायपुर (45 किमी) निकटतम हवाई अड्डा है तथा दिल्ली, मुंबई, नागपुर, भुवनेश्वर, कोलकाता, रांची, विशाखापट्नम और चेन्नई से जुड़ा हुआ है।
रेल मार्ग- रायपुर निकटतम रेलवे स्टेशन है जो कि मुम्बई-हावड़ा रेल मार्ग पर स्थित है।
सडक़ मार्ग- राजिम नियमित बस तथा टैक्सी सेवा से रायपुर व महासमुंद से जुड़ा हुआ है। तीर्थ यात्रियों के ठहरने के लिए कुंभ के अवसर पर संस्कृति विभाग विशेष रुप से व्यवस्था करता है। सामान्य पर्यटकों के लिए रायपुर में अनेक होटल उपलब्ध हैं।

धरोहरः रायपुर- तेरह सौ साल से भी पुराना शहर

 -जी.के. अवधिया
 आज हम रायपुर को छत्तीसगढ़ की राजधानी के रूप में जानते हैं। शायद आपको पता हो कि छत्तीसगढ़ क्षेत्र वर्तमान भारत के अति प्राचीन क्षेत्रों में से एक है और प्राचीन काल में यह क्षेत्र दक्षिण कोसल के नाम से विख्यात था जिसका वर्णन मत्स्य पुराण, ब्रह्म पुराण, महाभारत आदि ग्रंथों में पाए जाते हैं।

छत्तीसगढ़ के अन्तर्गत आने के कारण रायपुर भी अत्यन्त प्राचीन क्षेत्र है। यदि रायपुर के इतिहास का अवलोकन करें तो ज्ञात होता है कि नौवीं शताब्दी से पीछे जाने पर पता चलता है कि दूसरी से तीसरी शताब्दी तक यहाँ पर सातवाहन राजाओं का राज्य रहा है। चौथी सदी में राजा समुद्रगुप्त ने इस पर विजय प्राप्त कर लिया और पाँचवी-छठवीं सदी तक उनके वंशज यहाँ राज्य करते रहे। पाँचवी-छठवीं सदी में यह क्षेत्र कुछ काल तक शरभपुरी राजाओं में के अधिकार में रहा फिर नल वंश के शासक यहाँ शासन करने लगे। बाद में इस क्षेत्र का नियन्त्रण सोमवंशी राजाओं के हाथ में आ गया जिन्होंने सिरपुर को अपनी राजधानी बनाया था। सोमवंशी राजाओं में महाशिवगुप्त बालार्जुन सर्वाधिक पराक्रमी राजा रहे, उन्हीं की माता रानी वत्सला ने सिरपुर में लक्ष्मण मन्दिर का निर्माण करवाया था। उल्लेखनीय है कि सिरपुर का प्राचीन नाम 'श्रीपुर’  था और 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग श्रीपुर आया था जिसने श्रीपुर के 70 मन्दिरों व 100 विहारों का उल्लेख किया है।
जहाँ तक शहर होने का सवाल है, 9वीं शताब्दी में भी रायपुर एक शहर के रूप में था यानी कि एक हजार तीन सौ साल पहले भी रायपुर कोई गाँव, कस्बा या बस्ती न होकर एक नगर था। वर्ष 1909 में प्रकाशित इम्पीरियल गजेटियर में लिखा है कि-  ऐसा प्रतीत होता है कि छत्तीसगढ़ एक अत्यन्त प्राचीन क्षेत्र है जहाँ भुइया एवं मुंडा वंश के शासकों का राज्य था जिन पर गोंड वंश ने विजय प्राप्त कर उन्हें सुदूर पहाड़ियों में भाग जाने के लिए विवश कर दिया था। गोंडों ने प्रथम बार इस क्षेत्र को नियमित व्यवस्था वाला शासन प्रदान किया।
 साथ ही उसमें यह भी उल्लेख है कि विश्वास किया जाता है कि रायपुर नगर का अस्तित्व नौवीं शताब्दी से है तथा प्राचीन रायपुर वर्तमान रायपुर के दक्षिण पश्चिम में बसा था ,जिसका विस्तार खारून नदी तक था।
14 वीं सदी में रतनपुर राजवंश के राय ब्रह्मदेव ने रायपुर को फिर से बसाया था तथा यहाँ अपनी राजधानी बनाई थी। सन् 1460 में एक किले का निर्माण किया गया था, जो कि आज पूर्णत: नष्ट हो चुका है।  किले के दो तरफ दो तालाब थे जो कि आज भी विद्यमान हैं तथा विवेकानन्द सरोवर (बूढ़ा तालाब) एव महराजबन तालाब के नाम से जाने जाते हैं। आज जो स्थान किला बगीचा के नाम से जाना जाता हैं कभी वहाँ पर ही वह किला था और वहाँ पर किला होने के कारण ही उस स्थान का नाम किला बगीचा पड़ा।
उपलब्ध जानकारी से लगता है कि रायपुर लगभग ग्यारहवीं शताब्दी में रतनपुर से विभाजित होकर अलग राज्य बना और रतनपुर के राजा के कनिष्ठ पुत्र यहाँ के राजा बने। सन् 1741 में मराठा सेनापति, भास्कर पन्त, ने रतनपुर राज्य पर विजय प्राप्त की और उसे मराठा राज्य में जोड़ दिया। तत्पश्चात् सन् 1750 में रायपुर के राजा अमरसिंह मराठों के द्वारा पराजित हुए और सन् 1750 से 1818 तक रायपुर पर मराठों का शासन रहा।
सन् 1818 में रायपुर को अंग्रेजों ने मराठों से हथिया लिया और वहाँ सन् 1818 से 1830 तक अंग्रेजों का शासन रहा। सन् 1818 में ही अंग्रेजों ने रायपुर को छत्तीसगढ़ का मुख्यालय बनाया। सन् 1830 में रायपुर पर फिर से मराठों का अधिकार हो गया जो कि सन् 1853 तक चला। सन् 1853 में पुन: रायपुर अंग्रेजों के अधीन आ गया और स्वतन्त्रता प्राप्ति तक उन्हीं का शासन रहा। इम्पीरियल गजेटियर के अनुसार रायपुर पर अंग्रेजों के अधिकार प्राप्ति के समय रायपुर के प्राचीन मन्दिर दूधाधारी मन्दिर का जीर्णोद्धार हो रहा था।
अंग्रेजों के काल में रायपुर कमिश्नर डिवीजन, डिवीजनल जज, इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स, सुपरिन्टेन्डेन्ट ऑफ पोस्ट ऑफिस तथा इरीगेशन इंजीनियर के प्रतिनिधि आदि का मुख्यालय था। सेन्ट्रल प्राव्हिंसेस के तीन सेन्ट्रल जेलों में से एक जेल रायपुर में ही था। सन् 1861 में बिलासपुर को रायपुर जिला से निकाल कर अलग जिला बनाया गया। सन् 1867 में रायपुर में म्युनिसपलिटी स्थापित की गई।
      सन् 1892 रायपुर में जल वितरण के लिए बलरामदास वाटर वर्क्सकी स्थापना हुई ,जो खारून नदी से पानी के वितरण का कार्य करता था; जिसके मालिक राजनांदगाँव के राजा बलरामदास थे।
उन दिनों पीतल के सामान बनाने का कार्य, लकड़ी पर रोगन लगाने का कार्य, कपड़ा बुनना, सोनारी कार्य आदि रायपुर के प्रमुख व्यवसाय थे। रायपुर में दो प्रिंटिंग प्रेस थे ,जिनमें अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू और ओड़िया भाषा में छपाई का कार्य होता था। यहाँ पर एक संग्रहालय भी था, जिसका निर्माण सन् 1875 में हुआ था, तथा यह संग्रहालय आज भी 'महंत घासीदास संग्रहालयके नाम से मौजूद है।
शिक्षा के लिए राजकुमार कॉलेज ( जहाँ पर राजा, जमींदारों, जागीरदारों एवं रईसों की सन्तानों को ही दाखिला दिया जाता था) के साथ ही गवर्नमेंट हाई स्कूल भी था, इसके अलावा और भी कई स्कूल थे। चिकित्सा के लिए अनेक डिस्पेंसरीज़ भी थे।

सम्पर्क:  अवधिया पारा चौक, पीपल झाड़ के पास
रायपुर (छ.ग.)-  492 001, मो. 08004928599,                   
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