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Sep 26, 2013

लाला जी के चले जाने का अर्थ

लाला जी के चले जाने का अर्थ
 - हरिहर वैष्णव

लाला जगदलपुरी। एक ऐसा नाम जिसे छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की जीवित किम्वदन्ती, बस्तर का चलता-फिरता ज्ञान-कोश, अक्षरादित्य आदि आदि कहा जाता रहा है। किन्तु आज 93 वर्षीय वह चलता-फिरता ज्ञान-कोष हमारे बीच नहीं है। 14 अगस्त की संध्या 7.00 बजे उस साहित्य-ऋषि ने अपने डोकरीघाट पारा (जगदलपुर, बस्तर- छत्तीसगढ़) स्थित निवास पर अन्तिम साँसें लीं। अन्तिम साँसों के पहले तक यद्यपि वे रोग-शय्या पर पड़े हुए थे ; तथापि उनके ज्ञान का भण्डार तब भी अक्षुण्ण रहा था। तब भी, यदि कोई उनसे कुछ माँगने गया तो वह खाली हाथ नहीं लौटा। हाँ, कभी-कभी स्मृति-लोप की स्थिति में चला जाने वाला दण्डक वन का यह साहित्य-ऋषि मूल प्रसंग से थोड़ी देर के लिये भटक भले ही जाता रहा हो किन्तु स्मृति लौटते ही आपके साथ समरस हो जाता था। कई बार आपसे पूछता था- और सब ठीक है, न?
इन साहित्य-मनीषी को हम सब लालाजी के नाम से जानते थे, जानते हैं और जानते रहेंगे। जहाँ तक मैं जानता हूँ, लालाजी के सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति ने उनसे कुछ-न-कुछ पाया अवश्य ही है किन्तु उन्हें दिया कुछ भी नहीं। दरअसल कोई उन्हें कुछ दे ही नहीं सकता था और फिर उन्होंने स्वयं भी कभी इसकी अपेक्षा नहीं की। उन्होंने याचना तो कभी की ही नहीं। वे हमेशा दाता बने रहे। लालाजी अत्यन्त स्वाभिमानी व्यक्ति रहे हैं। तब भी, जब वे रोग-शय्या पर थे, तो भी उनका स्वाभिमान जस-का-तस बना रहा। स्वाभिमान खोने का पाठ उन्होंने पढ़ा ही नहीं। अपने संपर्क में आये लोगों से भी यही कहा, स्वाभिमान मत खोयें। उसे बनाये रखें। लालाजी के स्वाभिमान की बातें उनके सम्पर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति जानता है। किन्तु कई लोग उनके इस स्वाभिमान को उनकी हेकड़ी बताते नहीं चूकते।
बहुत सम्भव है कि पढऩे-सुनने वालों को यह अतिशयोक्ति लगे किन्तु मैं जानता हूँ कि मेरे लिये लालाजी के चले जाने का अर्थ मेरा स्वयं का चला जाना है। मुझे लालाजी से जितना स्नेह मिला, जितना मार्गदर्शन मिला उसे सहेज पाना मेरे लिये सम्भव नहीं है। कल्पना कीजिए कि क्या महासागर को कोई अपनी बाँहों में समेट सकता है? लालाजी से मिले स्नेह और आशीर्वाद के महासागर को बाँहों में समेटना क्या मेरे लिये सहज है? कतई नहीं। वस्तुत: आज यदि मैं बस्तर की वाचिक परम्परा पर थोड़ा-बहुत काम कर पाया हूँ तो निश्चित ही इसके पीछे कीर्ति-शेष लालाजी का ही हाथ रहा है। उनका आशीर्वाद रहा है। कदम-कदम पर मेरा मार्गदर्शन करते लालाजी से कई बार मतभेद भी हो जाया करते थे किन्तु वे मतभेद आपसी विचार-विमर्श के बाद दूर भी हो जाया करते थे। मैं इस बात से गौरवान्वित हूँ कि अपने अन्तिम समय से कुछ पहले तक भी वे मुझे बराबर याद किया करते थे और भले ही अपने ही परिवार के सदस्यों को न पहचान पाते रहे हों ; किन्तु मुझे पहचान जाते थे। मेरे लिये जगदलपुर जाने का अर्थ ही था लालाजी से भेंट करना। किन्तु कभी-कभार यदि बहुत ही व्यस्तता के कारण या समयाभाव के कारण मैं उनसे नहीं मिल पाता तो तकलीफ दोनों को होती थी। मैं अधूरापन महसूस करता तो वे भी यही महसूसते थे।
मेरी उनसे पहली भेंट हुई थी 1971-72 में, जब मैं बी. ए. प्रथम वर्ष का छात्र था और उसी बीच उन्होंने जगदलपुर से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक 'अंगारा’ में मेरी पहली रचना प्रकाशित की थी और मुझे पत्र भी लिखा था। पत्र मिलने और रचना ('ध्यानाकर्षण’  शीर्षक कविता) प्रकाशन के बाद मैं अपने मित्र केसरी कुमार सिंह के साथ उनसे उनके निवास (कवि निवास) में मिला था। उसके बाद इन 40-41 वर्षों में उनसे न जाने कितनी बार भेंट हुई। प्रत्येक भेंट में उनसे ऊर्जा मिली, उनका आशीर्वाद मिला और मिला अथाह प्यार। फिर अन्तिम भेंट हुई थी 17 मार्च 2013 को। उस भेंट का जिक्र बाद में। उससे पहले 11 मार्च, 2013 की भेंट का पूरा चित्र-
इस दिन उनके और मेरे सह-सम्पादन में नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'बस्तर की लोक कथाएँ’ की प्रतियाँ ले कर मैं और नेशनल बुक ट्रस्ट में सहायक संपादक (हिन्दी) पंकज चतुर्वेदी जी उनसे मिलने पहुँचे थे। बात पहले से तय थी ही। पंकज चतुर्वेदी जी लाला जी से मिलने को उत्सुक थे। और 10 मार्च को कोंडागाँव में इस पुस्तक के लोकार्पण के बाद हम दूसरे दिन यानी 11 मार्च को सवेरे 09.30 बजे के आसपास जगदलपुर के लिये रवाना हो गये। 11.00 बजे के आसपास हम जगदलपुर पहुँचे। मैंने रास्ते में बस्तर की लोक-भाषा हल्बी के अन्यतम कवि श्री सोनसिंह पुजारी जी के विषय में पंकज जी को बताया था। वे उनसे भी मिलने को उत्सुक थे। हम सबसे पहले श्री पुजारी जी के घर पहुँचे। थोड़ी देर उनसे चर्चा की और लगभग 11.30 बजे हम लालाजी के निवास जा पहुँचे। हमने उनके घर में प्रवेश किया तो पाया कि उनके कमरे का दरवाजा बन्द है और वे 'आओ रे, भोजन कराओ रे’ कह रहे थे। उनकी उस आवाज में जो पीड़ा थी, जो रुदन था, उसे सुनकर मैं, पंकज जी और खीरेन्द्र यादव तीनों ही द्रवित हो गये थे। मैंने दरवाजा खोलने का प्रयास किया किन्तु वह खुला नहीं। मुझे चिन्ता हो आई कि यदि दरवाजा भीतर से बन्द है तो उन्हें किस तरह भोजन कराया जाएगा? अभी हम इसी दुश्चिंता से दो-चार हो ही रहे थे कि सामने वाले मकान से एक महिला आईं और बताया कि लालाजी के अनुज के. एल. श्रीवास्तव जी की पुत्र-वधू कल्पना श्रीवास्तव आ रही हैं। वे ही हमें कमरे के भीतर ले चलेंगी। भतीजे विनय श्रीवास्तव की पत्नी कल्पना आईं और कमरे का दरवाजा धकेल कर खोला। तब हमारी समझ में आया कि दरवाजे का पल्ला नीचे झुक कर फर्श पर टिक गया था और इसीलिए वह हमसे नहीं खुला था। बहरहाल। कल्पना के साथ हम तीनों ने भीतर प्रवेश किया। भीतर पहुँच कर हम तीनों ने लालाजी को प्रणाम किया। वे हम में से किसी को भी नहीं पहचान पाये। पंकज जी ने बस्तर की लोक कथाएँ की एक प्रति लाला जी के हाथ में दी। कल्पना बताने लगीं, ताऊ जी। आपसे मिलने आये हैं। ये आपकी पुस्तक छप गयी।
यह सुन कर वे कह उठे- बड़ी कृपा हुई। फिर हँसने लगे।
कल्पना ने टार्च उनके हाथ में थमायी। लालाजी ने बिस्तर पर लेटे-लेटे ही टार्च की रोशनी में पुस्तक का मुख-पृष्ठ देखा और प्रसन्न हो कर बरबस अपनी चिरपरिचित दबंग आवाज में बोल पड़े, वाह, वाह! बहुत बड़ा काम किया आपने। बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य किया है आपने। मैं बधाई देता हूँ आपको। फिर पूछने लगते हैं, सब ठीक है?
पंकज जी कहते हैं, बस! आशीर्वाद आपका।
सब आनन्द है? लालाजी फिर पूछते हैं। मैं केवल जी। कहता हूँ।
फिर पंकज जी पुस्तक की शेष प्रतियाँ भी उनके सिरहाने रख कर कहते हैं, ये सभी पुस्तकें आपके लिए।
मैं पंकज जी को लालाजी के पास बुलाता हूँ और परिचय कराता हूँ, लालाजी, आप दिल्ली से आये हैं। पंकज चतुर्वेदी जी हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट में संपादक। आपसे व्यक्तिगत रूप से मिलने, आपका आशीर्वाद लेने आए हैं। किन्तु वे सुन नहीं पाते।
मुझसे कहने लगते हैं, आप कोंडागाँव से आये हैं।
जी, कोंडागाँव से। मैं हरिहर। मैं जवाब देता हूँ।
 इसके साथ ही मैं उनसे अनुमति लेने को उद्यत होता हूँ। वे उत्तर में फिर से अपने हाथ जोड़ देते हैं और मैं उनके हाथ अलग कर देता हूँ। वे फिर से कहने लगते हैं, आप आए, बड़ा आनन्द आ गया। मैं याद करता रहता हूँ। 93 वर्ष का हो गया हूँ मैं। पत्रिकाएँ नहीं आती हैं। बहुत कम आती हैं; क्योंकि लोग समझ गए हैं कि ये लिख-पढ़ नहीं सकते। ऐसा समझ रहे हैं, लोग। तो ठीक है। स्वागत है तुम्हारी समझ का। इसके बाद वे पंकज जी की ओर मुखातिब होते हैं और पूछने लगते हैं, आप? आपका परिचय?
पंकज जी कहते हैं, मैं दिल्ली से आया हूँ। मैं नेशनल बुक ट्रस्ट में संपादक हूँ।
फिर मैं एक कागज पर पंकज जी का नाम आदि लिख कर देता हूँ। वे उसे टार्च की रोशनी में पढऩे का प्रयास करते हैं और पूछने लगते हैं, क्या नाम है?
पंकज चतुर्वेदी। पंकज जी कहते हैं।            
वे पूछते हैं, यहीं के हैं?
मैं दिल्ली से आया हूँ। पंकज जी कहते हैं। इसके बाद कल्पना पंकज जी के विषय में बताने लगती हैं कि इन्होंने ही आपकी किताब छापी है और दिल्ली से आये हैं। लेकिन वे फिर से कह उठते हैं, कोंडागाँव से? अब मैं फिर से एक कागज पर लिख कर देता हूँ।
 कल्पना बताने लगती हैं कि वे थोड़ी-थोड़ी देर में भूल जाते हैं। शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं। भोजन भी पहले की अपेक्षा अधिक करते हैं। वे पहले बैठ कर खाते थे किन्तु हड्डी टूट जाने के कारण अब बैठा नहीं जाता। लेटे-लेटे ही खाते हैं। उन्हें चम्मच से खिलाना पड़ता है। अपने हाथों से नहीं खाते। पहले तो कई सालों से वे केवल एक ही समय भोजन किया करते थे किन्तु अब दोनों समय भोजन करते हैं। खुराक अच्छी है। सुबह चॉकलेट और पपड़ी खाते हैं। कल्पना बताती हैं कि अब उनके भोजन का समय हो गया है। यह सुन कर हम लालाजी से अनुमति ले कर उनके कमरे से बाहर आ जाते हैं। इसके बाद हम जाते हैं कल्पना के घर। वहाँ कल्पना हमें बताती हैं कि लालाजी की कुछ सामग्री उन्होंने सम्हाल कर रखी हुई है। मैं उस सामग्री को देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाता और उनसे निवेदन करता हूँ कि वे वह सामग्री मुझे दिखाएँ। वे लालाजी के कमरे से वह सामग्री ले कर आती हैं और हमें दिखाती हैं। एक झोले में कुछ पुराने पत्र, दो ध्वनि रूपकों (राजमहल और मुखौटा) की पाण्डुलिपियाँ और छोटी-छोटी डायरियाँ हैं। मैं चाहता हूँ कि वे अपने श्वसुर श्री के. एल. श्रीवास्तव जी तथा  पति विनय श्रीवास्तव से अनुमति ले कर वह सामग्री मुझे उपलब्ध करा दें ; ताकि मैं उनका उपयोग अपनी पुस्तक में कर सकूँ। इसके बाद हम वहाँ से विदा ले कर वापस हो जाते हैं।
दो-तीन दिनों बाद मैं लालाजी के अनुज को फोन लगाता हूँ और अपनी इच्छा प्रकट करता हूँ। वे कहते हैं वे अभी-अभी काँकेर से लौटे हैं और फिलहाल तो उनकी खुद की तबीयत ठीक नहीं है इसीलिए कुछ दिनों बाद मैं उनसे सम्पर्क करूँ। मैं उनकी बात मान लेता हूँ। किन्तु मुझे सामग्री प्राप्त करने की जल्दी है। मैं 16 मार्च को फिर से फोन करता हूँ और उनसे अगले दिन यानी रविवार 17 मार्च का समय लेता हूँ। वे सहमत हो जाते हैं।
17 मार्च 2013। तय कार्यक्रम के अनुसार मैं अपने साथी खीरेन्द्र यादव के साथ सबेरे मोटर सायकिल पर जगदलपुर के लिये निकलता हूँ। निकलने के पहले लालाजी के अनुज को फोन पर यह बता देता हूँ कि हम कोंडागाँव से निकल रहे हैं। वे, विनय जी और कल्पना जी घर पर मिल जायें तो मेरा काम हो जायेगा। वे आश्वस्त करते हैं कि वे सब घर पर मिल जायेंगे। लगभग दो घन्टे बाद हम जगदलपुर पहुँचते हैं और सीधे लालाजी के घर पर ही रुकते हैं। हमें थोड़ा-सा विलम्ब हो गया था। उनके भोजन का समय हो चला था। मैं यह जानता था इसलिये हम दोनों ने उनके कमरे में प्रवेश करने की बजाय उनके अनुज के कमरे में प्रवेश किया और कल्पना जी वहीं पर वह झोला उठा लाईं। झोले में से मैंने अपने काम की सामग्री निकाल ली और उन्हें गिन कर अपने झोले में रख लिया। इस बीच लालाजी भोजन से निवृत्त हो चुके थे। मैंने मौका अच्छा जान कर उनके कमरे में प्रवेश किया। इस बार उन्हें मुझे पहचानने में अधिक देरी नहीं लगी। मेरे प्रणाम करते ही वे मुझे पहचान गये और अपनी खटिया पर बैठने को कहने लगे। मैं बैठ गया। वे कहने लगे, आप आये आनन्द आ गया। फिर पूछने लगे, और सब ठीक है? मैंने हाँ में सिर हिलाया और जी कहा। वे कहने लगे, आप आते हैं तो आनन्द आ जाता है। आप तो हरिहर वैष्णव हैं न। अपने आदमी हैं आप। मैं आपको याद करता रहता हूँ ;  लेकिन आपके आने पर मैं हरिहर वैष्णव को भूल जाता हूँ और उस आनन्द को ग्रहण करता हूँ। मैं तो कोंडागाँव जाता रहा हूँ। फिर पूछने लगते हैं, इन दिनों क्या लिख-पढ़ रहे हैं आप? मैं कहता हूँ, आप पर केन्द्रित पुस्तक पर काम कर रहा हूँ। इसी सिलसिले में यहाँ आया था। वे कहते हैं, अच्छा, ठीक है। फिर बताने लगते हैं, मेरे परिजन मेरा बहुत ध्यान रखते हैं। मैं चल-फिर नहीं पाता। आँखें कमजोर हो गयी हैं। पढ़-लिख भी नहीं पाता। 93 वर्ष का हो गया हूँ, न। वे बोलते रहते हैं और मैं सुनता रहता हूँ। अन्त में वे कहते हैं, और सब ठीक है? मैं पुन: सिर हिला कर हाँ में जवाब देता हूँ और उन्हें प्रणाम कर बाहर निकल जाता हूँ ताकि वे आराम कर सकें। भोजन के बाद आराम करने की उन्हें आदत है, यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ।                     
इसके बाद 21 मार्च, 2013 को एक बार फिर जगदलपुर जाने का अवसर आता है। हम अपना काम निबटा कर उनके दर्शन करने उनके घर पहुँचते भी हैं किन्तु उनके परिजनों द्वारा बताया जाता है कि आज उनसे मिल पाना सम्भव नहीं होगा। मैं अपने दो साथियों हरेन्द्र यादव और उमेश मण्डावी के साथ निराश हो कर चला आता हूँ।
फिर आया 14 अगस्त, 2013 का वह दिन जिसने न केवल मुझसे मेरे साहित्यिक गुरु और धर्मपिता अपितु समग्र छत्तीसगढ़ के साहित्याकाश के चमकते सितारे साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी जी को सदा के लिए हम सब से छीन लिया। इस दिन मैं महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर के सभा-कक्ष में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा ले रहा होता हूँ, जहाँ भाई डॉ. सुधीर शर्मा लालाजी का जिक्र करते हैं। कार्यक्रम के बाद मैं अपनी बेटियों के घर बेमेतरा जाने के लिये निकल पड़ता हूँ कि रास्ते में ही रात के लगभग 8.30 से 9 बजे के बीच क्रमश: जगदलपुर से जगदीश चन्द्र दास, रुद्रनारायण पाणिग्राही, विनय श्रीवास्तव और देहरादून से राजीव रंजन प्रसाद तथा कोंडागाँव से मेरे बेटे नवनीत मोबाइल पर मुझे लालाजी के न रह जाने का दु:खद समाचार देते हैं। अगले दिन जगदलपुर से ही भाईजान एम. ए. रहीम और फिर हल्बी के अन्यतम कवि आदरणीय सोनसिंह पुजारी द्वारा भी यह समाचार मोबाइल द्वारा मुझे दिया जाता है। मैं विवशता में न तो उनकी अन्तिम यात्रा में सम्मिलित हो पाता हूँ और न कोंडागाँव तथा जगदलपुर में आयोजित शोक-सभा में। बेमेतरा में ही मैं अपनी पत्नी, बेटियों और जामाताओं के साथ उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। और फिर जब 27 तारीख को उनकी तेरहवीं पर मैं उनके घर पहुँचता हूँ तो मुझे न जाने क्या हो जाता है कि मैं यह भूल जाता हूँ कि लालाजी अब नहीं रहे। मैं उनके कमरे के ठीक सामने बरामदे में ऐसी जगह जा बैठता हूँ ; जहाँ से मैं लालाजी को देख सकूँ। तभी ध्यान हो आता है कि लालाजी तो अब नहीं रहे और यहाँ उनकी तेरहवीं का कार्यक्रम चल रहा है, जिसमें सम्मिलित होने के लिए मैं आया हूँ। तब मैं समझ  पाता हूँ कि अब मैं न तो उनसे प्रत्यक्ष मिल सकूँगा और न वे मुझसे पूछ सकेंगे, और सब ठीक है, न?
यह सही है कि अब उनसे प्रत्यक्ष भेंट नहीं हो सकती किन्तु यह भी सच है कि प्रत्यक्ष भेंट भले ही न हो किन्तु वे प्रति पल मेरे साथ हैं। उनका आशीर्वाद मेरे साथ है, उनका अथाह स्नेह मेरे साथ है। परमपिता परमेश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और न केवल उनके परिजनों अपितु हम सब साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों तथा पाठकों और प्रशंसकों को उनके न रह जाने के इस अपार दु:ख को सहने की शक्ति दे, यही कामना है।
सम्पर्क: सरगीपाल पारा, कोंडागाँव 494226, बस्तर-छत्तीसगढ़, मोबा. 76971 74308 Email- hariharvaishnav@gmail.com

ज्जन कितना बदल गया है


सज्जन कितना बदल गया है


- लाला जगदलपुरी

दहकन का अहसास कराता,
चंदन कितना बदल गया है;
मेरा  चेहरा मुझे डराता,
दरपन कितना बदल गया है!

            आँखों ही आँखों में
            सूख गयी हरियाली अंतर्मन की;
            कौन करे विश्वास कि मेरा
सावन कितना बदल गया है! 

पाँवों के नीचे से खिसक-
खिसक जाता-सा बात-बात में;
मेरे तुलसी के बिरवे का
आँगन कितना बदल गया  है!

            भाग रहे हैं लोग मृत्यु के
            पीछे-पीछे, बिना बुलाये;
            जिजीविषा से अलग-थलग यह
            जीवन कितना बदल गया है!

प्रोत्साहन की नयी दिशा में
देख रहा हूँ, सोच रहा हूँ;
दुर्जनता की पीठ ठोंकता
सज्जन कितना बदल गया है!

 ( काव्य-संकलन मिमियाती ज़िंदगी दहाड़ते परिवेश से) 

सिन्टी


सिन्टी

- विनोद साव

 नदी वही थी पर यहाँ रूप बदला हुआ था। थोड़ी दूर पहले उसका चौड़ा विस्तीर्ण पाट था। एक सिरे से दूसरा सिरा दिखता नहीं था। जो दिखता था वो केवल रेत थी... रेत ही रेत। मानों रेत की नदी हो। पानी की धार को खोजना पड़ता था। पर यहाँ उलटवार था। रेत का पता ही नहीं था। पानी ही पानी रेत को खोजना पड़ रहा था। बहुत दूर कहीं कोई सुनहली चमकीली पगडंडी -सी दिख रही थी। वही शायद रेत थी।
हम जहाँ खड़े थे ; वहाँ पर घाट था। यह नदी के घाट की तरह नहीं तालाब के घाट की तरह छोटा था। सामने नदी का जल भी नदी के जल की तरह नहीं तालाब के जल की तरह  था। यहाँ आकर नदी जैसे थम गई हो।  वह बहती हुई नदी नहीं थी। उसका जल स्थिर था तालाब के जल की तरह। एकदम रुका हुआ एक ठहराव के साथ। 
ठहरे हुए जल में बड़ी गंभीरता होती है। उसकी यह गंभीरता कहीं पर रहस्यमयी भी लगती है। मानों वह किसी तिलस्म को अपने में समेटे हुए हो और किसी क्षीरसागर की तरह मथने पर न जाने कब उसमें से क्या निकल जाए। यहाँ पर नदी के जल का अपना आतंक था।
‘यहाँ कई लोग डूब चुके हैं...भैया!’ उसने डोंगी को खेते हुए बताया !
‘मुझे तैरना आता है।’  मैंने सिगरेट जलाते हुए कहा।
उसे सुनकर हँसी आ गई ; जिससे डोंगी में असंतुलन पैदा हुआ। मैंने इसमें संतुलन लाने के लिए अपने खड़े होने के ढंग को बदला। बदलते समय मुझे भी हँसी आ गई; क्योंकि असंतुलन मेरे भीतर भी था। ओम ने मना किया था कि यह नाव नहीं डोंगी है। कभी भी पलट सकती है। पर मोहन नहीं माना उसने एक बार कहा और चढ़ गया था डोंगी पर मैं भी उसके साथ।
'आपका नाम क्या है ? ‘मैंने डोंगी वाले से पूछा।’ मैं उसे तुम भी कह सकता था लेकिन मैंने उसे आप कहा। यह अतिशय सौजन्य अंग्रेजी महारानी की देन थी।
‘हम लोग केवट हैं! ’
'ओफ निषादराज! ’  यह एक ऐतिहासिक महत्त्व का शब्द था जिससे जुड़े व्यक्ति ने कृपासिन्धु को पार लगाया था। मैंने कुछ ज्यादा ही जोश में इस शब्द को उछाला था। शायद यह  भीतर की प्रेरणा थी 'नाव चलाने वाले लोग केवट तो होते ही हैं।’  मैंने अपनी जानकारी उड़ेली 'इसके अलावा भी कोई नाम होगा? ’
'मुन्ना .. ! ’  वह थोड़ी देर रुका था। 'मुन्ना केवट’  फिर रुककर उसने कहा था।
'आप स्कूल गए नहीं होंगे! ’
'नहीं! ’  उसने दोनों हाथ में रखे बाँस को नदी में डुबाते हुए कहा था।
मेरा अन्दाज बिल्कुल सही था। और इसीलिए वह मुन्ना था। स्कूल गया होता तो स्कूल का कोई और नाम होता, जो आज उसका असली नाम होता। जवान हो जाने के बाद भी अब तक वह माँ-बाप के रखे नाम से काम चला रहा था और डोंगी को किसी मुन्ने की तरह खेल रहा था।
बचपन में माँ-बाप का दिया स्नेहिल नाम अगर किसी के साथ चस्पाँ हो जाए तो कई बार वह आजीवन साथ चलता है। जैसे किसी मानी हुई कम्पनी का ब्राण्ड नेम हो। एक बार ठप्पा लग जाए तो उससे पार पाना मुश्किल। फिर मरते दम तक चला आता है वह नाम। अपने अंत तक वह मुन्ना ही बना रहता है। 
मैंने डोंगी वाले की ओर एक बार फिर देखा वह मुस्करा उठा था किसी मुन्ने की मानिन्द और मशगूल हो गया था। जैसे कागज की नाव बनाकर हर घर का मुन्ना मशगूल हो जाता है उसे चलाने में अपने मकान के बाहर बहती किसी नाली में।
'लाओ सिगरेट मुझे दो।’  यह मोहन की आवाज थी जो डोंगी में नीचे से आई। वह सिगरेट नहीं पीता पर मुझे देखकर कभी -कभी माँग लेता है। वह अक्सर नई वाली नहीं सुलगाता। मेरी आधी जली हुई को ही ले लेता है। वह अपनी आदत के अनुसार गरदन एक ओर लटकाए रखता है राजेशखन्ना की तरह। एक ऐसे हीरो का जिसका जमाना निकल गया है पर उसकी तरह अब भी कुछ लोगों की गरदन लटकी हुई है।’  
'मोहन- अपनी गरदन सीधी रखो इससे डोंगी एक तरफ झूल जाती है।’   मैंने किंचित व्यंग्य से कहा। तब उसके चेहरे पर एक मुचमुचाती मुस्कान आई उस गुजरे जमाने के हीरो की तरह।
मैंने घाट की ओर देखा वहॉ ओम खड़ा था। ओम अपने बड़े पेट को सम्हाले हुए खड़ा था। मैंने कहा 'अच्छा हो गया ओम डोंगी में नहीं बैठा।’
 'हाँ.. ओम का भारी पेट तो डोंगी को कब से डुबा चुका होता! ’ मोहन ने जैसे मेरे कहने का आशय पूरा किया। यह कहते हुए उसके चेहरे पर वही मुचमुची मुस्कराहट थी उस गुज़रे जमाने के हीरो की तरह। अब मेरे पास दो किसमों की मुस्कराहटें थीं एक मुन्ना की मेहनतकश  मुस्कान और दूसरी मोहन की मुचमुचाती मुस्कान और इनके बीच खड़ा था मैं जैसे कोई मुस्कराहटों का सौदागर हो।
हम घाट की ओर देख रहे थे। ओम के हाथ में अब भी वह स्टीलमग था, जिसमें उसे चाय पीता छोड़कर हम डोंगी में आ बैठे थे।  पेड़ों के बीच से छनकर आ रही सूरज की किरणों से उसका स्टीलमग जब तब चमक उठता था चाँदी के पीकदान की तरह।
डोंगी में चढ़ते समय मैंने अपने रुपये और कुछ कागजात ओम को पकड़ा दिए थे। ओम ने कहा था 'ठीक है! तुमको तो तैरना आता है। नोट सब डूब जाएँगे।’
'बचकर आ जाऊँगा तो पाई पाई का हिसाब ले लूँगा।’  मैं हँसते हुए डोंगी में तब जा बैठा था। बातचीत की यह वही मस्ती थी जो यारों के बीच होती है। ओम और मोहन यारों के यार थे।
नदी के दोनों किनारों पर जंगल युक्त हल्की पहाडिय़ाँ थीं। नदी का यह किनारा पहाडिय़ों का किनारा भी कहा जा सकता था। इन पहाडिय़ों के जिस हिस्से को नदी छूती थी वहाँ गोल मटोल पत्थर थे जिन्हें नदी अब तक काटकर उसका भुरका नहीं बना सकी थी। इसलिए यहाँ कोई रेत नहीं थी।
'पानी यहाँ पर ठहर गया न भैया... पत्थरों को काट न सका।’ मुन्ना की यह डोंगी लौटाते हुए आवाज थी। हम बीच नदी में आ गए थे ; जहाँ कई डोंगियाँ पहुँच गई थी। उनमें से कुछ ने अपने जाल फैला दिए थे।
'यहाँ पानी गहरा है! देखिए.. खोइना देखिए.. कितना डूब जाता है।’  उसने बाँस को खोइना कहा था। वह इससे खोने का काम करता था शायद इसीलिए। खोइना की डूब देखकर हमारी धमनियों में कुछ जम गया था।
'इस जगह का कुछ नाम होगा? ’  मोहन की आवाज सहमी हुई थी।
'धमनी! ’ मुन्ना का जवाब आया।
'इस गहरे और ठहरे पानी में मछलियाँ मिलती होगी!’  मैंने इकट्ठी हुई डोंगियों को देखकर कहा।
'सिन्टी मिलती हैं! ’  उसने सामान्य भाव से कहा पर मेरे लिए यह असामान्य था।
'यह क्या! मछली है? ’
'हाँ! ’
मैंने मोहन की ओर देखा पर उसकी आँखों में अन्जानापन था। शायद मेरी भी।
 'अब कजराए पानी लाल हो रहे हैं।’  मोहन ने अचंभित होते हुए कहा।
'पानी नहीं बादल लाल हो गया है। सूरज के कारण।’  मुन्ना ने खोइना चलाते हुए कहा। मैंने आसमान की ओर देखा। वह सूरज के किरणपुंजों से लाल हो रहा था। उसकी परछाई पानी पर थी। अब हमारे पास दो आसमान थे एक ऊपर और दूसरा नीचे।  मुन्ना  और मोहन की मुस्कानों की तरह। 
आसमान पर आकर सफेद बादल ठहर गए थे नदी में ठहरे जल की तरह। इन सफेद बादलों पर सूर्यास्त की लालिमा चढ़ गई थी। आसमान पर मनोहारी होता समूचा दृश्य हम नदी पर देख सकते थे। जैसे यह नदी नहीं कोई कलादीर्घा हो जिसमें दुनिया के महान कलाकारों की बनाई  हुई पेन्टिंग्स सजा दी गई हों।  इसमें मछली, मछुआरें, जाल, डोंगियाँ, उस पर बैठे हुए डोंगीवाले, उनके हाथ में खोइना और सूर्यास्त से इन सबकी लम्बी होती परछाइयाँ- इन सबको किसी चित्रकार ने अनेक बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से जैसे ढाल दिया हो। इस पेंटिंग में जाल में फँसी हुई एक उछलती हुई मछली चाँदी रंग में अलग से चमक रही थी। मुझे लगा शायद वही सिन्टी हो। 
पानी में लहरों की झिलमिलाहट थी।  इसमें कुछ चाँदी सी चमकती छायाएँ थीं। एक क्षण को लगा कि जैसे आसमान में सफेद बगुले उड़ रहे हों। उनकी छाया पानी में पड़ रही हो।  हम उन नीचे चाँदी सी चमकती छायाओं को देखकर मुग्ध हो रहे थे।
'वही सब सिन्टी है! ’  मुन्ना  की आवाज आई। हम जितने बार भी इस शब्द को सुनते हमें एक अनूठी आत्मीयता का बोध होता। मानों यह मछली नहीं किसी नन्ही लड़की का घरेलू नाम हो। एक ऐसी लड़की का अक्स उभरता जो दुबली पतली हो लेकिन चॉदी जैसा उसका रंग हो। जिसने झालरदार सफेद फ़्रॉक पहन रखी हो। जिसकी गोल-गोल आँखें हों। जिसके सीटी बजाने से गोल होंठ हो।
हम घाट पर उतर चुके थे। घाट पर ओम हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। उसके हाथ में झिल्ली थी। उस झिल्ली को फैलाकर उसने दिखाया 'ये देखो मछली! ’   
 वह मझोले आकार की थी। उसका बदन स्वस्थ और सुगठित था। उसके चाँदी जैसे रंग थे। उसकी आँखों की जगह में जैसे दो मूँगे टाँक दिए गए हों। उसके गले के पास एक वलय था जिससे वह झालरदार फ़्रॉक पहने हुए सी लग रही थी। उसके होंठ गोल और खुले हुए थे जैसे थोड़ी देर में वह कोई सीटी बजाने वाली हो।
'यही सिन्टी है।‘।‘ मुन्ना ने झिल्ली में झाँकते हुए कहा।
हम नदी की ढलान से ऊपर झुरमुट से बने मंडप पर आ गए थे 'आज बेटियाँ आने वाली हैं। बड़ी के आजकल दिन चल रहे हैं।’  ओम की आवाज थकी-थकी थी.. डूबते हुए दिन की तरह। हम लौट चले जंगल के अँधेरे में राह टटोलते हुए एक नयी सुबह की आस में।
दरवाजा खुला हमारे सामने ओम की दोनों बेटियाँ थीं। 'ये देखो सुन्दर प्यारी -सी मछली इसका नाम सिन्टी है।’  मेरे स्वर में उन्हें दिखाने का उत्साह था।
'हाय इसका नाम भी कितना प्यारा है! ’  यह बड़ी की धीमी लेकिन चहकती हुई आवाज थी।
'दीदी जब तुम्हारी गुडिय़ा होगी ना तब उसका नाम सिन्टी रखना।’  बड़ी से यह कहते हुए तब छोटी से रहा नहीं गया। मुझे लगा कि हर लड़की के भीतर होती है एक मासूम सी छटपटाहट जल बिन मछली की तरह।

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खिले कमल


खिले कमल

- डॉ. रमाकान्त श्रीवास्तव
१
गंगा की धारा-
चाँदनी रात में ज्यो
बहता पारा।
२
गाँव की गली
नीमों की छाँह तले
मुझे टेरती।
३
गाँव मुझको
मैं खोजता गाँव को
दोनों खो गए।
४
ओ मेरे गाँव
माटी की गोद तेरी
याद आती है।
५
नारी का मन
दहशत का धुआँ
सिर्फ़ घुटन।
६
वृक्ष कटे हैं
धरती निर्वसना
स्वप्न मिटे हैं।
७
चाँदनी छाई
प्रेम-पाती-सी भाई
तुम न आईं।
८
गई पिकी
प्रतीक्षारत पुन:
आम्र-शाखाएँ।
९
गए शिकारी
खोज रही हिरनी
निज हिरना।
१०
कोई रोया है
चाँदनी रात भर
ओस के आँसू।
११
महुआ खड़ा
बिछा श्वेत चादर
किसे जोहता!
१२
खुल गए हैं
'पी कहाँज् -कहकर
पृष्ठ पिछले।
१३
मरु-जीवन
सावन को तरसे
आकुल मन।
१४
चाँदनी-स्नात
विजन में डोलता
मन्द सुवास।
१५
नहीं बुझाता
झरना निज तृषा
झरता जाता।
१६
फूल खिलते
जब धरा हँसती
फूल बनती।
१७
वर्षा की साँझ
बजाते शहनाई
छिपे झींगुर ।
१८
खिले कमल
जलाशय ने खोले
सहस्र नेत्र ।
१९
रात ताल में
आसमान उतरा
तारों सहित।
२०
देता आवाज़
गाँव का आँगन वो
उलझे कहाँ !
२१
पिकी न आती
पता ही न चलता-
आया वसन्त।
२२
यह सुगन्ध
जो बसी है फूलों में
आदि गन्ध है।
२३
बीते वे दिन
बीत गईं हैं राते
बची हैं यादें।
२४
जूड़े में फूल
कैसे गूँथे श्रमिका
ढोती है ईंटें।
२५
ग्रीष्म -तपन
फूला, धरे अंगार
पलाश-वन।

सम्पर्क: एल ६ / ९६, सेक्टर एल, अलीगंज , लखनऊ-२२६०२४,
मो. ९६२८२४०२६३

चार लघुकथाएँ

१.मस्तराम जिन्दाबाद
-कमलेश भारतीय
वे बेकार थे और सड़कों से अधिक दफ्तारों के चक्कर लगाते थे। भूखे थे और घर से पैसे आने बंद थे।
एक होटल में पहुँचे और आवाज़ लगाई- मस्तराम को बुलाओ।
मस्तराम हाजि़र हुआ। वहाँ काउंटर पर सब्जियों से भरे पतीले थे और वे सुबह से भूखे थे, पर ललचाई दृष्टि से देखते तो मस्तराम को शक पड़ जाता। ज़रा रौब से बोले, मस्तराम, हमें एक समारोह करना है। वो सामने वाला हॉल बुक करवा लिया है। लगभग दो सौ आदमियों का खाना इन्तज़ाम मतलब खाने-पीने का तुम्हारा रहेगा। ठीक है?
जी, साहब! यह तो आपने कल भी फरमाया था।
अच्छा, आज खाना चेक कराओ, ये हमारे बड़े संयोजकों में से एक हैं। ये तुम्हारा खाना देखेंगे...ठीक
नहीं, साहब, आप कहीं और इन्तजाम कर लें। मैं रोज़-रोज़ मुफ्त खाना चेक नहीं करवा सकता।
अरे, बेवकूफ, कल ये तुम्हें एडवांस दे जाएँगे। इसलिए दिल्ली से विशेष रूप से आए हैं।
ठीक है साहब लगवाता हूँ ।
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ मुस्कराकर देखा और योजना की सफलता पर आँखों ही आँखों में बधाई दी। डटकर खाना खाया। उठकर चलने से पहले खाने के बारे में अपनी राय बताई कि कल से थोड़ा अच्छा है; पर उस दिन तुम जानते हो बाहर से लोग आएँगे, काफी अच्छा बनाना। मस्तराम जी साहब, जी साहब करता गया। वे बाहर चले गए और सड़कों पर नारे लगाने लगे-मस्तराम जिंदाबाद!
२.विभाजन
बहुत भारी बहसों में भाग लेने व सुनने का मौका मिलता रहा कि हमारे यहाँ अमीरी व गरीबी के बीच बहुत फासला है। हम इसे कैसे दूर कर सकते हैं? कर भी सकते हैं या नहीं? दीवाली का दिन आया। सब घरों में दीवाली से कुछ दिन पहले ही रंग बिरंगी लडिय़ाँ जगमगा कर अपनी अमीरी का परचम लहराने लगीं। हमारे पड़ोस का घर अँधेरे में ही डूबा रहा। वे लोग दुकानों पर छोटे-मोटे काम करने सुबह ही निकल जाते हैं और घर की औरतें भी कोई न काम कर घर का सहारा बनती हैं। मेरा नाती आर्यन उनके हमउम्र बच्चे विक्की से पूरी तरह हिलमिल चुका है। हर वक्त उसे खेलने के लिए बुला लाता है। वह खेलकर अपने घर चला जाता है।
दीवाली आ गई। मेरे नाती का मन था कि वह अपने हमउम्र से मिल कर पटाखे छोड़े। पर वह उसे कहीं दिखाई नहीं दिया नाती ने अपनी माँ से पूछा- विक्की क्यों नहीं आया? माँ ने उसे प्यार से समझाया कि शायद उसके पास पटाखे न हों।
क्यों? आर्यन ने मासूम सवाल पूछा।
शायद उनके पापा इतने पैसे खर्च न कर सकते हों। माँ ने वैसा ही भोला- सा जवाब दिया।
तो मम्मी मैं विक्की को अपने पटाखों में से कुछ पटाखे दे दूँ?
हाँ-हाँ, क्यों नहीं।
आर्यन दौड़ कर विक्की के घर गया और सोने का बहाना कर रहे विक्की को उठाकर ले आया और अपने हिस्से के पटाखे उसे देकर खुद ताली बजाने लगा। पर क्या यह विभाजन दूर करना इतना सरल हैं? दीवाली की रोशनी में यह विभाजन और भी बुरी तरह चमकने ही नहीं बल्कि चुभने लगा। चुभता रहता है, हर दीवाली पर।

३.मेरे अपने
अपना शहर व घर छोड़े लगभग बीस साल से ज़्यादा वक्त बीत चुका। इस दौरान बिटिया सयानी हो गई। वर ढूँढा और हाथ पीले करने का समय आ गया। विवाह के कार्ड छपे, सगे-सम्बन्धियों व मित्रों को भेजे। शादी के शगुन शुरू हुए आँखें द्वार पर लगी रहीं। इस आस में कि दूर- दराज़ के सगे-सम्बन्धी आएँगे। वे सगे सम्बन्धी, जिन्होंने उसे गोदी में खिलाया और जिन्हें बेटी ने तोतली ज़ुबान में पुकारा था। पण्डित जी पूजा की थाली सजाते रहे। मैं द्वार पर टकटकी लगाए रहा। मोबाइल पर सगे सम्बन्धियों के सन्देश आने लगे। सीधे विवाह वाले दिन ही पहुँच पाएँगे जल्दी न आने की मज़बूरियाँ बयान करते रहे।
मैं उदास खड़ा था। इतने में ढोलक वाला आ गया। उसने ढोलक पर थाप दी। सारे पड़ोसी भागे चले आए और पण्डित जी को कहने लगे- और कितनी देर है? शुरू करो न शगुन!
पण्डित जी ने मेरी ओर देखा। मानो पूछ रहे हों कि क्या अपने लोग आ गए? मेरी आँखे खुशी से नम हो गईं। परदेस में यही तो मेरे अपने हैं। मैंने पण्डित जी से कहा-शुरू करो शगुन, मेरे अपने सब आ गए!
४.इस बार
इधर बच्चों के इम्तहान शुरू होते उधर नानाजी के खत आने शुरू हो जाते- इम्तहान खत्म होते ही बच्चों को माँ के साथ भेज देना- फौरन। यह हमारा हुक्म है। साल भर बाद तो पढ़ाई को बोझ उतरता है। मौज मस्ती कर लेंगे। हम भी इसी बहाने तुम लोगों से मिल लेंगे।
पिछले कई सालों से यह लगभग तयशुदा कार्यक्रम था जिसमें उलट- फेर करने की हमारी न इच्छा थी, न हिम्मत पड़ती थी। बच्चे भी इम्तहान खत्म होते-होते 'नानी के घर जाएँगे’  की रट लगाने लगते। बीच-बीच में उन्हें नाना-नानी का प्यार-दुलार, मामा-मामी का सैर-सपाटा कराना याद आ जाता। वे और उतावले हो उठते। इस बार इम्तहान शुरू होने की जैसे किसी को खबर ही न हुई, कोई चिट्ठी - पत्री नहीं। पत्नी रोज़ रात को पूछे- दफ्तर के पते पर कोई चिट्ठी नहीं आई?
आखिर चिट्ठी आई, लिखा था- इस बार आप लोगों को बुलाना चाहकर भी बुला नही पाएँगे। हालात खराब हैं। गोली-सिक्का बहुत बरस रहा है। पता नहीं कब, कहाँ, क्या हो जाए। हवा भी दरवाजे पर दस्तक देती है तो मन में बुरे ख्याल आने लगते हैं। आप जहाँ हैं, वहीं खुश रहो, सुखी रहो। हमारी बात का बुरा मत मानना। कौन माँ-बाप अपनी बेटी से मिलना न चाहेगा? पर इस बार अपने ही घर छुट्टियाँ मनाना। बच्चों को प्यार अपनी राजी खुशी की चिट्ठी लिखते रहो करो।

 सम्पर्क: उपाध्यक्ष, हरियाणा ग्रन्थ अकादमी, अकादमी भवन,पी-16, सेक्टर-14, पंचकूला 134113, फोन-0172-2585521,  Email- bhartiyakamlesh@yahoo.com