मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Mar 10, 2013

हमें छींक क्यों आती है?



 हमें छींक क्यों आती है?
- सुभाष लखेड़ा
 छींक पर सर्वप्रथम वैज्ञानिक ढंग से विचार करने का प्रयत्न प्रसिद्ध दार्शनिक एवं वैज्ञानिक हिप्पोक्रेट्स को जाता है। ईसा से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व जन्मे इस विद्वान् का विचार था कि फेफड़ों की बीमारियों से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए छींकना खतरनाक है, जबकि अन्य रोगियों को इससे फ़ायदा होता है। प्रसिद्ध विकृति विज्ञानी सर जोनाथन हटचिन्सन भी छींकने को अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक मानते थे। बहरहाल, वैज्ञानिक छींक पर अनुसंधान करते रहे और आज जो जानकारी उपलब्ध है, उसके अनुसार यह एक नासा क्षोभक प्रतिवर्त है और इसका अच्छे या बुरे स्वास्थ्य, जन्म अथवा मृत्यु से कोई रिश्ता नहीं है और न इसका शकुन अथवा अपशकुन से कोई सैद्धांतिक संबंध है।
 दरअसल, छींक हमारी नाक की भीतरी सतह में मौजूद तंत्रिकाओं के सीमांत सिरों अथवा दृष्टि तंत्रिका के उद्दीपन से मस्तिष्क में पहुँचने वाले आवेगों के कारण उत्पन्न होने वाला एक अनैच्छिक प्रतिवर्त है। नाक में यह उद्दीपन किसी बाह्य पदार्थ की उपस्थिति, नाक की शलेष्मल कला की सूजन, जुकाम आदि से होता है. दृष्टि तंत्रिका चमकीले प्रकाश से उद्दीप्त होती है। नसवार के सूँघने से अथवा किसी वस्तु विशेष से एलर्जी की वजह से भी छींक आ जाती है.  यूँ किसी भौतिक उद्दीपन और कई तरह के रासायनिक उत्तेजकों को नाक की भीतरी सतह पर प्रयोग करने से छींक पैदा की जा सकती है। हिस्टामीन जैसी औषधियों को सूँघने एवं नाक में होने वाले श्लेष्मीय स्राव से भी छींक आती है. झर्झरिका (ethmoidal), वीडिअन (vidian)और बड़ी सतही अश्म (petrosal)  तंत्रिकाओं का वैद्युत उद्दीपन भी छींक पैदा कर सकता है किन्तु त्रिधारा (trigeminal) तंत्रिका को उत्तेजित करने से छींक का आना कतई जरूरी नहीं है. शरीर की त्वचा को ठंडा करने, शिरोवल्क या कान पर उत्तेजकों की उपस्थिति, तथा कतिपय मनोवैज्ञानिक कारणों से भी छींक आ सकती है।
   हिस्टीरियाजन्य कारणों से व्यक्ति को लंबे समय तक निरंतर छींक आ सकती है. ऐसे कुछ उदाहरण रिकॉर्ड भी किए गए हैं। ऐसा ही एक उदाहरण एक तेरह वर्षीय लड़की का है जो दो महीनों तक लगातार छींकती रही। उसकी छींक तभी बंद हुई जब उसे एक एकांत कमरे में रखा गया। ऐसा भी देखने में आया है कि काली खाँसी के कुछ रोगियों में खाँसी का दौरा समाप्त होने पर छींक का दौरा शुरू हो गया। नाक में पालिपों के कारण एवं बाह्य कर्ण गुहर में किसी इतर पदार्थ की मौजूदगी से भी छींक आती है। दरअसल, नाक की श्लेष्मीय कला में मौजूद तंत्रिकाओं के सीमांत सिरे ही छींक पैदा करने वाले उत्तेजकों के लिए ग्राहक का काम करते हैं यानी ये सिरे ही उद्दीपकों द्वारा पैदा आवेगों को मस्तिष्क में स्थित छींक केंद्र तक पहुँचाते हैं।
  वैज्ञानिकों का विचार है कि सभी तरह के छींक पैदा करने वाले उद्दीपकों के लिए एक ही अभिवाही पथ नहीं हो सकता है किन्तु अध्ययनों से यही ज्ञात होता है कि अधिकतर उद्दीपकों के कारण नाक के अंदर श्लेष्मीय अतिरिक्तता एवं श्लेष्मा का स्राव होता है। इन दोनों कारणों से नाक के आंतरिक पटों में मौजूद तंत्रिका सिरे सक्रिय हो उठते हैं और व्यक्ति विशेष छींकने लगता है। यद्यपि अभी तक छींक पैदा करने वाले आवेगों के अभिवाही पथों के विषय में वैज्ञानिक एकमत नहीं हो पाए हैं  ; किन्तु इस बात से वैज्ञानिक सहमत हैं कि जब ये आवेग मस्तिष्क में स्थित  छींक केंद्र  को उत्तेजित करते हैं तभी छींक आती है। छींक की प्रक्रिया शुरू होते ही व्यक्ति विशेष एक अनैच्छिक गहरी साँस लेता है।  तत्पश्चात्, कोमल तालु एवं अलिजिह्वा श्वासावरोध की स्थिति पैदा करते हैं। इसी अल्पकाल के दौरान फेफड़ों तथा ग्रसनी में दबाव में वृद्धि होती है और अचानक अधिजिह्वा के अवनमित होते ही फेफड़ों से हवा तेजी से संबंधित व्यक्ति के मुँह और नथुनों से बाहर निकलती है। फेफड़ों से अत्यधिक तेज गति से आने वाली यह हवा नाक के अंदर मौजूद इतर पदार्थ अथवा श्लेष्मा को साधारणतया एक या दो बार में बाहर फेंक देती है।
 छींक के शारीरिक प्रभावों में मुँह तथा की पेशियों का संकुचन, आँखों का टिमटिमाना और बंद होना तथा सिर सहित शरीर के ऊपरी भाग का संचालन प्रमुख है। छींक के दौरान आँखों में पानी आ सकता है। कभी-कभी छींक की प्रबलता के कारण श्वसनी के बहिर्व्यास एवं हृदवाहिका प्रणाली में अस्थायी परिवर्तन हो सकता है। यदा-कदा, इस दौरान होने वाले कुछ अन्य शारीरक परिवर्तनों के कारण क्षणिक उच्च रक्त दाब, अथवा मूर्च्छा के लक्षण भी देखने को मिलते हैं।  लाक्षणिक दृष्टि से छींक का अत्यंत अल्प महत्त्व है। हाँ, यदि इसकी निरंतरता बनी रही यानी किसी व्यक्ति को लगातार छींक आती रही तो इसकी तरफ अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति के नाक, कान और गले की जाँच जरूरी है। बीमार व्यक्तियों को भी छींक आती है और यदि वे प्लूरिसी अथवा कमर के दर्द से पीड़ित हों तो उन्हें छींक अत्यधिक कष्टप्रद महसूस होती है। ऐसा भी देखा गया है कि छींक आने से हिचकियों का दौरा समाप्त हो जाता है।  कुल मिलाकर, सामान्यतया छींक आना कोई हानिकारक शारीरिक प्रक्रिया नहीं है। यदि छींक आ रही है तो उसे रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए। ऐसा प्रयास श्लेष्मा को साइनसों एवं कानों में पहुँचा सकता है जहाँ वह जीवाणु संक्रमण का कारण बन सकती है।

 लेखक के बारे में: रक्षा शरीर क्रिया एवं सम्बद्ध विज्ञान संस्थान से सेवानिवृत्त वैज्ञानिक, एम एससी (रसायन विज्ञान), वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यों से जुड़े लगभग तीस से अधिक शोध पत्र एवं रिपोर्ट। राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए विगत 32 वर्षों से प्रयासरत, एक हजार पाँच सौ से अधिक वैज्ञानिक लेख और विविध रचनाएं राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। पंद्रह विज्ञान कथाएँ प्रकाशित, आकाशवाणी से विज्ञान विषयक 134 वार्ताएँ प्रसारित खेल विज्ञान पर  खेल, खिलाड़ी और विज्ञान पुस्तक प्रकाशित। कई पुरस्कार एवं सम्मान। सम्प्रति: रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन से वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद से सन 2009 में सेवा निवृत्त।
संपर्क: सी - 180, सिद्धार्थ कुंज, सेक्टर- 7, प्लाट नंबर -17, द्वारका, नई दिल्ली-110075, फोन- 011-25363280; मो.9891491238,  Email -subhash.surendra@gmail.com

प्रेरक प्रसंग



मन की शांति
अमेरिकन रब्बाई और अनेक प्रेरक पुस्तकों के लेखक जोशुआ लोथ लीबमैन (1907-1948) ने अपने संस्मरणों में लिखा है- मैं जब युवा था तब जीवन में मुझे क्या पाना है उसके सपने मैं देखता रहता था। एक दिन मैंने उन चीज़ों की लिस्ट बनाई जिन्हें पाकर किसी को भी पूर्णता की अनुभूति हो और वह स्वयं को धन्य समझे। उस लिस्ट में स्वास्थ्य, सौंदर्य, समृद्धि, सुयश, शक्ति, संबल- और भी बहुत सी चीज़े उसमें मैंने लिख दीं।
उस लिस्ट को लेकर मैं एक बुजुर्ग के पास गया और उनसे मैंने पूछा- क्या इस लिस्ट में मनुष्य की सभी गुणवान उपलब्धियाँ नहीं आ जाती हैं?
मेरे प्रश्न को सुनकर और मेरी लिस्ट में वर्णित उपलब्धियों को देखकर उन बुजुर्ग के चेहरे पर मुस्कान फैल गयी और वह बोले- बेटे, तुमने वाकई बहुत अच्छी लिस्ट बनाई है और इसमें तुमने अपनी समझ के अनुसार हर सुन्दर विचार को स्थान दिया है। लेकिन तुम इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व तो लिखना ही भूल गए जिसकी अनुपस्थिति में शेष सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। उस तत्त्व का दर्शन विचार से नहीं वरन अनुभूति से ही किया जा सकता है।
मैं असमंजस में आ गया। मेरी दृष्टि में तो मैंने लिस्ट में ऐसी कोई चीज़ नहीं छोड़ी थी। मैंने उनसे पूछा- तो वह तत्त्व क्या है?
इस प्रश्न के उत्तर में उन बुजुर्ग ने मेरी पूरी लिस्ट को बड़ी निर्ममता से सिरे से काट दिया और उसके सबसे नीचे उन्होंने छोटे से तीन शब्द लिख दिए:
'मन की शांति ' (Peace of Mind)
पागलपन
एक ताकतवर जादूगर ने किसी शहर को तबाह कर देने की नीयत से वहाँ के कुँए में कोई जादुई रसायन डाल दिया। जिसने भी उस कुँए का पानी पिया वह पागल हो गया।
सारा शहर उसी कुँए से पानी लेता था। अगली सुबह उस कुँए का पानी पीनेवाले सारे लोग अपने होशोहवास खो बैठे। शहर के राजा और उसके परिजनों ने उस कुँए का पानी नहीं पिया था  ; क्योंकि उनके महल में उनका निजी कुआँ था , जिसमें जादूगर अपना रसायन नहीं मिला पाया था।
राजा ने अपनी जनता को सुधबुध में लाने के लिए कई फरमान जारी किये ; लेकिन उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा ; क्योंकि सारे कामगारों और पुलिसवालों ने भी जनता कुँए का पानी पिया था और सभी को यह लगा कि राजा बहक गया है और ऊलजलूल फरमान जारी कर रहा है। सभी राजा के महल तक गए और उन्होंने राजा से गद्दी छोड़ देने के लिए कहा।
राजा उन सबको समझाने-बुझाने के लिए महल से बाहर आ रहा था, तब रानी ने उससे कहा- क्यों न हम भी जनता कुँए का पानी पी लें! हम भी फिर उन्हीं जैसे हो जाएँगे।
राजा और रानी ने भी जनता कुँए का पानी पी लिया और वे भी अपने नागरिकों की तरह बौरा गए और बेसिरपैर की हरकतें करने लगे।
अपने राजा को 'बुद्धिमानीपूर्ण' व्यवहार करते देख सभी नागरिकों ने निर्णय किया कि राजा को हटाने का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने तय किया कि राजा को ही राजकाज चलाने दिया जाय।

आपके पत्र

 बच्चों के लिए भी एक नन्हा कोना बने
 जनवरी अंक में मुख पृष्ठ से लेकर कागज, छपाई और प्रकाशित सामग्री की विषय वस्तु तक सभी कुछ अच्छा और स्तरीय लगा। संजय कुमार के लेख '.खत्म होते घर-आँगनकी चिंता विचारणीय है। भारतीय सामाजिक ढाँचे की बुनावट की शिथिलता समाज के लिये एक गम्भीर चेतावनी है। वर्तमान परिवेश में अर्थोपार्जन की वरीयता ने परिवार में आत्मीय सम्बन्धों की हत्या कर दी है जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव नयी पीढ़ी पर पड़ रहा है और वह उग्र एवं असहिष्णु होती जा रही है।
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा की रचना अच्छी लगी... बारिश में नहायी वल्लरी पर खिली धूप की तरह। उनका काव्य शिल्प मोहक है। पत्रिका में बच्चों के लिये भी यदि एक नन्हा सा कोना बन सके तो अच्छा होगा। आजकल बच्चों के लिये पर्याप्त लेखन नहीं हो पा रहा है। पत्रिका को राष्ट्रीय स्तर तक ले जाने के लिये लिये शुभकामनाएँ।
                                  -डॉ. कौशलेन्द्र मिश्र, kaushalblog@gmail.com

 
वंदना परगनिहा के चित्र...
जनवरी अंक में प्रकाशित वन्दना परगनिहा के सभी चित्र मार्मिक मनोदशा को मुखर कर रहे हैं। भविष्य में भी इनकी तूलिका की सर्जन पाठकों तक पहुँचती रहेगी, ऐसा विश्वास है।
                -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु

 अपने संस्कार बच्चों को जरूर दें
 'तमसो मा ज्योतिर्गमयजनवरी अंक में प्रकाशित अनकही में बहुत सुंदर विचार व्यक्त किये गए हैं। अब जरूरी है हम अपने संस्कार बच्चों को जरूर दें तभी ऐसी घटनाओं पर लग सकती है रोक।                          
                                                             -देवेन्द्र प्रसाद मिश्र
   किसानों को अपनी लड़ाई खुद लडऩी होगी
अमित जी ने फरवरी अंक में प्रकाशित अपने लेख 'दरकती नींव पर विकास की इमारतमें सौ आना सही बात कही है। लेकिन इस देश में जहा शासन कान में रुई लगाकर बैठा है, किसानों को अपनी लड़ाई खुद ही लडऩी पड़ेगी। यहाँ मै कानपुर देहात के किसानो के बारे में कुछ तथ्य रखना चाहूँगा। कानपुर देहात गंगा और यमुना के बीच का वह मैदानी भाग है जिसे भूगोल में सबसे ज्यादा उपजाऊ कहा गया है। यहाँ की जमीन सभी प्रकार की खेती के लिए उपयुक्त है और किसी ज़माने में धान और गन्नें की खेती बहुतायत में की जाती थी। लेकिन सरकारी उदासीनता ने गन्नें की खेती में लगभग विराम लगा दिया है। यहाँ की सभी नहरे अब सूख चुकी हैं और पानी के लिए पूरी तरह से पम्प पर निर्भर है। खेती की लागत इतनी ज्यादा बढ़ गयी है कि नयी पीढ़ी पूरी तरह से पलायन कर गयी है। खेती करना आज की तारीख में घाटे का सौदा हो गया है। इस सब के लिए किसान भी कुछ हद तक जिम्मेदार है। किसानों ने न तो खेती करने के तरीके बदले न ही कोई अलग फसल उगाने की कोशिश की। आज का किसान पूरे सीजन में 10-15 दिन काम करके बाकी दिन जुआ खेलने में व्यस्त रहता है। अब तो कोई चमत्कार ही यहाँ के किसानों की हालत सुधार सकता है।                
                                          -पुनीत सचान, punitsachan@gmail.com
एक सार्थक पहल
बोईन ऊख बहुत मन हरसा, किहिन हिसाब बचा का सिरका। अमित जी यह कहावत मैं बहुत वर्षों से सुनते आ रहा हूँ। कृषि और कृषक की जिस विडंबना और समस्या को आप लगातार रेखांकित करते आ रहे हैं इसके तार मुझे बहुत उलझे लगते हैं। आपका लेख उन उलझनों को सुलझाने की दिशा में एक सार्थक पहल लगता है।    
                                                        -अनगढ़
समाधान नहीं बताया गया
कृषि वाले लेख में लेखक के विचार बहुत अच्छे हैं लेख भी अति सुन्दर सराहनीय एवं तथ्यात्मक है। बस एक कमी है लेख का अंतिम छोर नकारात्मकता से भर गया है लेख में किसानों की मजबूरियों को सही से उकेरा गया है परन्तु कोई समाधान नहीं बताया गया है।
                                                                                     -वेद प्रकाश वर्मा 
प्रेम, आत्मीयता की मौन अभिव्यक्ति
मेरी मानसिक धारणा के मुताबिक प्रेम, आत्मीयता की एक मौन अभिव्यक्ति ...बस और कुछ नहीं! रही बात वेलेंटाइन डे मनाने कि तो यहाँ मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा ...कि किसी के पिता को अपने पिता के समान सम्मान देना तो उचित है, पर किसी के पिता को पिता कहकर सम्बोधित करना सर्वथा गलत। ...यह मेरी व्यक्तिगत सोच है, बाकी दुनिया क्या सोचती है कह नहीं सकता।
                                       -अमित वर्मा, avermaaa@gmail.com

एक पाती सूरज के नाम


एक पाती सूरज के नाम
अनसुलझे प्रश्नों की कथा
- निरूपमा कपूर
एक याद अतीत की
चलती है मेरे साथ-साथ
अस्तित्व मेरा / अपना है या पराया
हम दोनों में है कितना अंतर
मुझे पहचान पाना और मिलना
बड़ी दूर की बात है।
साहित्य की कई विधाओं या यूँ कहें कि साहित्य या जीवन के हर पक्ष को किसी दूसरे के सामने रखने के लिए ईमानदारी की आवश्यकता होती है। यह बात आत्मकथा के लिए सबसे अधिक आवश्यक है। आत्मकथा के लिए बुनियादी आवश्यकता है -ईमानदारी। इसकी पुष्टि तभी होती है, जब व्यक्ति किसी बात के लिए दूसरों के साथ-साथ अपनी और अपनों की भी आलोचना करता है।
डॉ सुधा गुप्ता की ‘एक पाती सूरज के नाम’  भारतीय स्त्री की पारंपरिक छवि को आधुनिक दृष्टिकोण से देखने की कथा है। परम्पराओं के नाम पर अपनी इच्छाओं को दबाते रहना भारतीय स्त्रियों की मजबूरी है। अपने पिता के घर में जो कल तक लाड़ली थी पति के घर में कोने में पड़ी तुच्छ वस्तु के समान थी। ज्यादातर तो औरतों का हाल यह है कि शक्ति, सामर्थ्य, बुद्धि, आर्थिक, आत्मनिर्भरता के बावजूद वे एक बार अगर अंधे कुँए में गिर पड़ी तो बस गिर पड़ी... जिंदगी के आखिरी लम्हे तक उस अकेले भयावह अँधेरे में पड़े रहना ही उनकी नियति है... विवाह के पश्चात पति यदि समझदार व कर्तव्यनिष्ठ हो तो समस्याएँ थोड़ी कम हो जाती हैं परन्तु भारतीय पुरुष अपनी पत्नियों के मामले में कम संवेदनशील होते हैं ; वैसे अब तस्वीर बदल रही है। परन्तु अपनी कमियों के प्रति आँखें मूँदे रहना और स्त्रियों की प्रकृतिवश किसी कमी को माफ न करना भारतीय जनमानस में अंदर तक व्याप्त है। लेखिका के काले रंग के लिए उनके पति के व्यंग्य निश्रित बाण उनकी नकारात्मक सोच दर्शाने के लिए काफी थे। अरे, अरे दीवार से हट कर खड़ी होओ... कहीं काली न हो जाए। पता है पूरे पाँच हजार लगे हैं घर की पुताई -रंगाई में। पति के मिसरी घुले शब्द विवाह के दूसरे दिन ही यदि पत्नी को सुनने को मिले तो वह अपने आगामी जीवन के स्वप्नों को तो काला होते  देख ही सकती है। पति के लिए तो उनका काला रंग ऊपर से विद्याध्ययन की ललक एक तो करेला  ऊपर  से नीम चढ़ा।
 शोध कार्य के उपरान्त परिवार की जीविका चलाने के लिए सुधा जी ने कई महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया। इस दौरान कई खट्टे-मीठे अनुभव उन्होंने अपने तीनों पुत्रों के साथ सहे ; जिसमें अपने पति की अकर्मण्यता व अजीब विचारों से ग्रसित होने के कारण सुधाजी व उनमें (बलवीर जी के रिश्ते में) एक अजीब सी दूरी व डर बैठ गए थे। अनमेल विवाह का दंश लेखिका को कई स्तरों पर आजीवन चुभता रहा। 
 पहले अस्थायी व्याख्याता और फिर स्थायी नौकरी के पश्चात भी लेखिका अपने उस वैवाहिक मकडज़ाल से बाहर नहीं निकल पाई; जिसे हम संस्कारों में जकड़ी भारतीय स्त्री की आजीवन कैद भी कह सकते हैं  ; जहाँ हर सम्बन्ध इस रिश्ते की कठिनाइयों को जानते व समझते हुए भी दोनों पक्षों के सामने इससे बाहर आने का विकल्प को नहीं देखता।
लेखिका को अपने प्रति कर्कश व्यवहार, बच्चों के प्रति गैर जिम्मेदराना व्यवहार ही पूरे जीवन मिला था। पति की मृत्यु के बाद वह उनके द्वारा किये गये शोषण की भी इतनी अभ्यस्त हो चुकी थीं कि उसके बिना रहने की कल्पना भी डराती रहती थी। वाह री भारतीय नारी शोषण से भी प्यार करने लगती है। सुधा जी की आत्मकथा की यह एक बड़ी उपलब्धि है कि उन्होंने ईमानदारी से सच को अभिव्यक्त करके अपनी कथा के माध्यम से शिक्षित व आर्थिक रूप से सुदृढ़ स्त्रियों की कथा को फलक पर ला दिया है; जिसे हम सब यह कह कर खारिज करते थे कि  शिक्षित स्त्रियों के शोषण की समस्या समाज में न के बराबर है।
 यह आत्मकथा हमारी संवेदना को झंझोरते हुए प्रश्न उठाती है कि आखिर कब तक रिश्तों के बोझ तले दब कर बहुमूल्य जि़न्दगियाँ बेरौनक होती रहेगी।
पुस्तक: एक पाती सूरज के (आत्मकथा)

लेखक: डॉ. सुधा गुप्ता, पृष्ठ- 580,
मूल्यः 800 रुपये,  संस्करण 2012,
प्रकाशक: अयन प्रकाशन, 1/20 महरौली
नई दिल्ली-110030
संपर्क: 18, कैला देवी इन्क्लेव, देवरी रोड, बुन्दूकटरा, आगरा (उप्र),मो. 9319163600

स्वामी विवेकानंद- ये साक्षात् जगदम्बा की प्रतिमूर्ति हैं


ये साक्षात् जगदम्बा की प्रतिमूर्ति हैं   

स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद सामाजिक जीवन की मूर्खता तथा अखबारी हो-हल्ले से ऊब चुके थे। अमेरिकी लोगों में स्वामीजी की सुविधाओं का ध्यान रखने वाले उनके अनेक प्रशंसक एवं भक्त थे, जो अभाव के समय उन्हें धन देते थे तथा उनके निर्देशों पर चलते थे। अमेरिकी महिलाओं के वे विशेष कृतज्ञ थे, और उनकी प्रशंसा करते हुए स्वामी जी ने अपने भारतीय मित्रों को कई पत्र लिखे।

एक पत्र में उन्होंने लिखा- इस देश की महिलाएँ दुनिया भर में नहीं हैं। वे कैसी पवित्र, स्वावलम्बिनी और दयावती हैं। महिलाएँ ही यहाँ की सब कुछ हैं। विद्या, बुद्धि आदि सभी उनके अंतर्गत हैं।
एक अन्य पत्र में वे लिखते हैं- (अमेरिकी लोग) महिलाओं के प्रति अतीव सम्मान का भाव रखते हैं और वे भी इन लोगों के जीवन में काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। तात्पर्य यह कि इस तरह की पूजा यहाँ पूर्णता तक पहुँच चुकी है। खैर- इस देश की नारियों को देखकर मेरी तो बुद्धि ही ठिकाने आ गई।
ये रूप में लक्ष्मी और गुण में सरस्वती हैं- ये साक्षात् जगदम्बा की प्रतिमूर्ति हैं इस तरह की माँ जगदम्बा अगर अपने देश में एक हजार तैयार करके मर सकूँ, तो निश्चिंत होकर मर सकूँगा। तभी हमारे देश के आदमी आदमी कहलाने लायक हो सकेंगे।
1894 ई. में खेतड़ी नरेश को लिखे एक पत्र में उनकी यह प्रशंसा शायद सर्वोच्च सुर तक पहुँची थी -
अमेरिकी महिलाओ! सौ जन्म में भी मैं तुमसे उऋण न हो सकूँगा- गत वर्ष ग्रीष्म में दूर देश से नाम-यश-धन विद्याविहीन बंधरहित असहाय दशा में प्राय: खाली हाथ जब मैं एक परिव्राजक प्रचारक के रूप में इस देश में आया, उस समय अमेरिका की महिलाओं ने मेरी सहायता की, मेरे ठहरने तथा भोजन की व्यवस्था की, वे मुझे अपने घर ले गईं तथा उन्होंने मेरे साथ पुत्र तथा सहोदर जैसा बर्ताव किया।
जब उनके पुरोहितों ने इस भयानक विधर्मी को त्याग देने के लिए उन्हें बाध्य करना चाहा, जब उनके सबसे अंतरंग बंधु इस संदिग्ध भयानक चरित्र के अपरिचित विदेशी व्यक्ति का संग छोडऩे के लिए उपदेश देने लगे, तब भी वे मेरी मित्र बनी रहीं। ये महिलाएँ ही चरित्र तथा अंत:करण के संबंध में कोई निर्णय देने की अधिकारी हैं- क्योंकि स्वच्छ दर्पण में ही प्रतिबिंब पड़ता है।
कितने ही सुंदर पारिवारिक जीवन मैंने यहाँ देखे हैं, कितनी ही ऐसी माताओं को मैंने देखा है, जिनके निर्मल चरित्र तथा नि:स्वार्थ संतान-स्नेह का वर्णन भाषा के द्वारा नहीं किया जा सकता। कितनी ही ऐसी कन्या तथा कुमारियों को देखने का मुझे अवसर मिला है, जो कि डायना देवी के मंदिर पर स्थित तुषारकणिकाओं के समान निर्मल, असाधारण शिक्षिता तथा मानसिक एवं आध्यात्मिक सब दृष्टि से उन्नत हैं। तब क्या अमेरिका की सभी नारियाँ देवी स्वरूपा हैं?
यह बात नहीं, भले-बुरे सभी स्थानों में होते हैं। किंतु दुर्बल व्यक्तियों द्वारा जिसे हम दुष्टों के नाम से अभिहत करते हैं, किसी जाति के बारे में किसी प्रकार की धारणा नहीं बनाई जा सकती, क्योंकि वे तो व्यर्थ के कूड़े-करकट की तरह पीछे रह जाते हैं जो लोग सत्, उदार तथा पवित्र होते हैं, उनके द्वारा ही राष्ट्रीय जीवन का निर्मल तथा शक्तिशाली प्रवाह निर्धारित हुआ करता है। (विवेकानंद एक जीवनी से)