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Apr 21, 2012

ब्लॉग बुलेटिन से

सोचती हूँ 

सिर्फ कविता

 जैसा कि आप सब से हमारा वादा है ... हम आप के लिए कुछ न कुछ नया लाते रहेंगे ... उसी वादे को निभाते हुए उदंती में हमने जो नयी श्रृंखला की शुरूआत की है उसके अंतर्गत निरंतर हम किसी एक ब्लॉग के बारे में आपको जानकारी दे रहे हैं।  इस 'एकल ब्लॉग चर्चा' में ब्लॉग की शुरुआत से लेकर अब तक की सभी पोस्टों के आधार पर उस ब्लॉग और ब्लॉगर का परिचय रश्मि प्रभा जी अपने ही अंदाज दे रही हैं। आशा है आपको हमारा यह प्रयास पसंद आएगा। तो आज मिलिए... माधवी शर्मा गुलेरी के ब्लॉग http://guleri.blogspot.com से।           - संपादक

'तेरी कुड़माई हो गई है? हाँ, हो गई। ...देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ साल।' जेहन में ये पंक्तियाँ और पूरी कहानी आज भी है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी की 'उसने कहा था' प्राय: हर साहित्यिक प्रेमियों की पसंद में अमर है। अब आप सोच रहे होंगे किसी के ब्लॉग की चर्चा में यह प्रसंग क्यूँ , स्वाभाविक है सोचना और जरूरी है मेरा बताना। तो आज मैं जिस शख्स के ब्लॉग के साथ आई हूँ , उनके ब्लॉग का नाम ही आगे बढ़ते कदमों को अपनी दहलीज पर रोकता है - 'उसने कहा था' ब्लॉग के आगे मैं भी रुकी और नाम पढ़ा और मन ने फिर माना- गुम्बद बताता है कि नींव कितनी मजबूत है! जी हाँ , 'उसने कहा था' के कहानीकार चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी की परपोती माधवी शर्मा गुलेरी का ब्लॉग है- 'उसने कहा था' http://guleri.blogspot.com
माधवी ने 2010 के मई महीने से लिखना शुरू किया ... खबर ब्लॉग की पहली रचना है, पर तुम्हारे पंख में एक चिडिय़ा सी चाह और चंचलता है, जिसे जीने के लिए उसने कहा था की नायिका की तरह माधवी का मन एक डील करता है रेस्टलेस कबूतरों से -
क्यों न तुम घोंसला बनाने को
ले लो मेरे मकान का इक कोना
और बदले में दे दो
मुझे अपने पंख।
....जिन्दगी की उड़ान जो भरनी है !
माधवी की मनमोहक मासूम सी मुस्कान में कहानियों वाला एक घर दिखता है... जिस घर से उन्हें एक कलम मिली, मिले अनगिनत ख्याल... हमें लगता है कविता जन्म ले रही है, पर नहीं कविता तो मुंदी पलकों में भी होती है, दाल की छौंक में भी होती है, होती है खामोशी में- ...कभी भी, कहीं भी, .....बस वह आकार लेती है कुछ इस तरह -
रोटी और कविता
मुझे नहीं पता
क्या है आटे- दाल का भाव
इन दिनों
नहीं जानती
खत्म हो चुका है घर में
नमक, मिर्च, तेल और
दूसरा जरूरी सामान
रसोईघर में कदम रख
राशन नहीं,
सोचती हूं सिर्फ
कविता
आटा गूंधते- गूंधते
गुंधने लगता है कुछ भीतर
गीला, सूखा, लसलसा- सा
चूल्हे पर रखते ही तवा
ऊष्मा से भर उठता है मस्तिष्क
बेलती हूं रोटियां
नाप- तोल, गोलाई के साथ
विचार भी लेने लगते हैं आकार
होता है शुरू रोटियों के
सिकने का सिलसिला
शब्द भी सिकते हैं धीरे-धीरे
देखती हूं यंत्रवत
रोटियों की उलट- पलट
उनका उफान
आखरी रोटी के फूलने तक
कविता भी हो जाती है
पककर तैयार ...
 गर्म आँच पर तपता तवा और गोल गोल बेलती रोटियों के मध्य मन लिख रहा है अनकहा, कहाँ कोई जान पाता है। पर शब्दों के परथन लगते जाते हैं, टेढ़ी मेढ़ी होती रोटी गोल हो जाती है और चिमटे से छूकर पक जाती है- तभी तो कौर- कौर शब्द गले से नीचे उतरते हैं- मानना पड़ता है - खाना एक पर स्वाद अलग अलग होता है- कोई कविता पढ़ लेता है, कोई पूरी कहानी जान लेता है, कोई बस पेट भरकर चल देता है...
यदि माधवी के ब्लॉग से मैं उनकी माँ कीर्ति निधि शर्मा गुलेरी जी के एहसास अपनी कलम में न लूँ तो कलम की गति कम हो जाएगी http://guleri.blogspot. com/2011/09/blog-post_12.html इस रचना में पाठकों को एक और नया आयाम मिलेगा द्रौपदी को लेकर।
माधवी की कलम में गजब की ऊर्जा है ....समर्थ, सार्थक पड़ाव हैं इनकी लेखनी के- उनकी रचनाएं अनेक स्थानों पर प्रकाशित हुई है जिनमें अहा जिंदगी में पंकज कपूर से बातचीत, तेज रफ्तार सड़कें और यादों की टमटम, ख़ूबसूरती तथा यात्रा एवं प्रेम विशेषांक में लेख।  दैनिक जागरण में सापूतारा, तारकरली, बायलाकूपे, मॉरिशस व केरल पर संस्मरण। वागर्थ में कविताएं, कविता कोश में आपका साथ, साथ फूलों का,  हिमाचल मित्र में हाइकु, लमही में कविताएं, जनपक्ष में मेरा पक्ष, अनुनाद में अनूदित कविताएं,  inext में उसने कहा था की चर्चा, रूपायन (अमर उजाला) में तुम्हारे पंख आदि शामिल है।
सब कुछ बखूबी समेटने का अदभुत प्रयास ... नि:संदेह सफल प्रयास... अब है  2012, और उनकी रचना- जहाँ से मैं साथ चल पड़ी हूँ। साथ के लिए लगभग सारे पन्ने पलट डाले, उम्र से परे दोस्त बन गई- अपनी यात्रा के लिए लॉक हटवाया, बस सिर्फ एक बार कारण जानना चाहा और बिना देर किये सारे दरवाजे खोल दिए। इसे कहते हैं विरासत  जिसमें से हम जितना देते हैं, घटता नहीं। तो चलने से पहले हम इस वर्ष की रचना से रूबरू हों- http://guleri.blogspot.com/ 2012/01/blog-post.html

धौलाधार की पहाडिय़ों पर
बर्फ झरी है बरसों बाद
और कई सौ मील दूर
स्मृतियों में
पहाड़ जीवंत हो उठे हैं
...जिसे पढ़ते हुए मैंने कहा है- अरसे बाद मिली हूँ उन निशानों से, और मिलते ही जीवंत हो उठी हूँ और ले आई हूँ एक और संजीवनी आपके लिए ...
प्रस्तुति- रश्मि प्रभा, संपर्क: निको एन एक्स, फ्लैट नम्बर- 42, दत्त मंदिर, विमान नगर, पुणे- 14, मो. 09371022446 http://lifeteacheseverything.blogspot.in

छोटा जादूगर

छोटा जादूगर

                                                                                            -जयशंकर प्रसाद 
 उसने कहा-तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्य दूँगा। मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्नता होती। मैं आश्चर्य से उस तेरह- चौदह वर्ष के लड़के को देखने लगा।
कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूँज रहा था। मैं खड़ा था। उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लड़का चुपचाप शराब पीने वालों को देख रहा था। उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से एक मोटी-सी सूत की रस्सी पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्ते थे। उसके मुँह पर गम्भीर विषाद के साथ धैर्य की रेखा थी। मैं उसकी ओर न जाने क्यों आकर्षित हुआ। उसके अभाव में भी सम्पूर्णता थी। मैंने पूछा-क्यों जी, तुमने इसमें क्या देखा?
मैंने सब देखा है। यहाँ चूड़ी फेंकते हैं। खिलौनों पर निशाना लगाते हैं। तीर से नम्बर छेदते हैं। मुझे तो खिलौनों पर निशाना लगाना अच्छा मालूम हुआ। जादूगर तो बिलकुल निकम्मा है। उससे अच्छा तो ताश का खेल मैं ही दिखा सकता हूँ।- उसने बड़ी प्रगल्भता से कहा। उसकी वाणी में कहीं रुकावट न थी।
मैंने पूछा-और उस परदे में क्या है? वहाँ तुम गये थे।
नहीं, वहाँ मैं नहीं जा सका। टिकट लगता है।
मैंने कहा-तो चल, मैं वहाँ पर तुमको लिवा चलूँ। मैंने मन-ही-मन कहा-भाई! आज के तुम्हीं मित्र रहे।
उसने कहा-वहाँ जाकर क्या कीजिएगा? चलिए, निशाना लगाया जाय।
मैंने सहमत होकर कहा-तो फिर चलो, पहिले शरबत पी लिया जाय। उसने स्वीकार-सूचक सिर हिला दिया।
मनुष्यों की भीड़ से जाड़े की सन्ध्या भी वहाँ गर्म हो रही थी। हम दोनों शरबत पीकर निशाना लगाने चले। राह में ही उससे पूछा-तुम्हारे और कौन हैं?
माँ और बाबूजी।
उन्होंने तुमको यहाँ आने के लिए मना नहीं किया?
बाबूजी जेल में है।
क्यों?
देश के लिए। वह गर्व से बोला।
और तुम्हारी माँ?
वह बीमार है।
और तुम तमाशा देख रहे हो?
उसके मुँह पर तिरस्कार की हँसी फूट पड़ी। उसने कहा-तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्य दूँगा। मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्नता होती।
मैं आश्चर्य से उस तेरह- चौदह वर्ष के लड़के को देखने लगा।
हाँ, मैं सच कहता हूँ बाबूजी! माँ जी बीमार है; इसलिए मैं नहीं गया।
कहाँ?
जेल में! जब कुछ लोग खेल- तमाशा देखते ही हैं, तो मैं क्यों न दिखाकर माँ की दवा करूँ और अपना पेट भरूँ।
मैंने दीर्घ निश्वास लिया। चारों ओर बिजली के लट्टू नाच रहे थे। मन व्यग्र हो उठा। मैंने उससे कहा-अच्छा चलो, निशाना लगाया जाय।
हम दोनों उस जगह पर पहुँचे, जहाँ खिलौने को गेंद से गिराया जाता था। मैंने बारह टिकट खरीदकर उस लड़के को दिये।
वह निकला पक्का निशानेबाज। उसका कोई गेंद खाली नहीं गया। देखने वाले दंग रह गये। उसने बारह खिलौनों को बटोर लिया, लेकिन उठाता कैसे? कुछ मेरी रुमाल में बँधे, कुछ जेब में रख लिए गये।
लड़के ने कहा-बाबूजी, आपको तमाशा दिखाऊँगा। बाहर आइए, मैं चलता हूँ। वह नौ-दो ग्यारह हो गया। मैंने मन-ही-मन कहा-इतनी जल्दी आँख बदल गयी।
मैं घूमकर पान की दूकान पर आ गया। पान खाकर बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता देखता रहा। झूले के पास लोगों का ऊपर- नीचे आना देखने लगा। अकस्मात किसी ने ऊपर के हिंडोले से पुकारा-बाबूजी!
मैंने पूछा-कौन?
मैं हूँ छोटा जादूगर।
कलकत्ते के सुरम्य बोटानिकल-उद्यान में लाल कमलिनी से भरी हुई एक छोटी-सी-झील के किनारे घने वृक्षों की छाया में अपनी मण्डली के साथ बैठा हुआ मैं जलपान कर रहा था। बातें हो रही थीं। इतने में वही छोटा जादूगर दिखाई पड़ा। हाथ में चारखाने की खादी का झोला। साफ जाँघिया और आधी बाँहों का कुरता। सिर पर मेरी रुमाल सूत की रस्सी से बँधी हुई थी। मस्तानी चाल से झूमता हुआ आकर कहने लगा-
बाबूजी, नमस्ते! आज कहिए, तो खेल दिखाऊँ।
नहीं जी, अभी हम लोग जलपान कर रहे हैं।
फिर इसके बाद क्या गाना-बजाना होगा, बाबूजी?
नहीं जी-तुमको...., क्रोध से मैं कुछ और कहने जा रहा था। श्रीमती ने कहा-दिखलाओ जी, तुम तो अच्छे आये। भला, कुछ मन तो बहले। मैं चुप हो गया, क्योंकि श्रीमती की वाणी में वह माँ की- सी मिठास थी, जिसके सामने किसी भी लड़के को रोका जा नहीं सकता। उसने खेल आरम्भ किया।
उस दिन कार्निवल के सब खिलौने उसके खेल में अपना अभिनय करने लगे। भालू मनाने लगा। बिल्ली रूठने लगी। बन्दर घुड़कने लगा।
गुडिय़ा का ब्याह हुआ। गुड्डा वर काना निकला। लड़के की वाचालता से ही अभिनय हो रहा था। सब हँसते- हँसते लोट- पोट हो गये।
मैं सोच रहा था। बालक को आवश्यकता ने कितना शीघ्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है।
ताश के सब पत्ते लाल हो गये। फिर सब काले हो गये। गले की सूत की डोरी टुकड़े- टुकड़े होकर जुट गयी। लट्टू अपने से नाच रहे थे। मैंने कहा-अब हो चुका। अपना खेल बटोर लो, हम लोग भी अब जायँगे।
श्रीमती जी ने धीरे से उसे एक रुपया दे दिया। वह उछल उठा।
मैंने कहा-लड़के!
छोटा जादूगर कहिए। यही मेरा नाम है। इसी से मेरी जीविका है।
मैं कुछ बोलना ही चाहता था कि श्रीमती ने कहा-अच्छा, तुम इस रुपये से क्या करोगे?
पहले भर पेट पकौड़ी खाऊँगा। फिर एक सूती कम्बल लूँगा।
मेरा क्रोध अब लौट आया। मैं अपने पर बहुत क्रूद्ध होकर सोचने लगा-ओह! कितना स्वार्थी हूँ मैं। उसके एक रुपये पाने पर मैं ईष्र्या करने लगा था न!
वह नमस्कार करके चला गया। हम लोग लता-कुंज देखने के लिए चले।
उस छोटे-से बनावटी जंगल में सन्ध्या साँय- साँय करने लगी थी। अस्ताचलगामी सूर्य की अन्तिम किरण वृक्षों की पत्तियों से विदाई ले रही थी। एक शान्त वातावरण था। हम लोग धीरे- धीरे मोटर से हावड़ा की ओर आ रहे थे।
रह- रहकर छोटा जादूगर स्मरण होता था। सचमुच वह एक झोपड़ी के पास कम्बल कन्धे पर डाले खड़ा था। मैंने मोटर रोककर उससे पूछा-तुम यहाँ कहाँ?
मेरी माँ यहीं है न। अब उसे अस्पताल वालों ने निकाल दिया है। मैं उतर गया। उस झोपड़ी में देखा, तो एक स्त्री चिथड़ों से लदी हुई काँप रही थी।
छोटे जादूगर ने कम्बल ऊपर से डालकर उसके शरीर से चिमटते हुए कहा-माँ।
मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।
बड़े दिन की छुट्टी बीत चली थी। मुझे अपने आफिस में समय से पहुँचना था। कलकत्ते से मन ऊब गया था। फिर भी चलते- चलते एक बार उस उद्यान को देखने की इच्छा हुई। साथ- ही- साथ जादूगर भी दिखाई पड़ जाता, तो और भी..... मैं उस दिन अकेले ही चल पड़ा। जल्द लौट आना था।
दस बज चुका था। मैंने देखा कि उस निर्मल धूप में सड़क के किनारे एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा था। मोटर रोककर उतर पड़ा। वहाँ बिल्ली रूठ रही थी। भालू मनाने चला था। ब्याह की तैयारी थी, यह सब होते हुए भी जादूगर की वाणी में वह प्रसन्नता की तरी नहीं थी। जब वह औरों को हँसाने की चेष्टा कर रहा था, तब जैसे स्वयं कँप जाता था। मानो उसके रोएँ रो रहे थे। मैं आश्चर्य से देख रहा था। खेल हो जाने पर पैसा बटोरकर उसने भीड़ में मुझे देखा। वह जैसे क्षण-भर के लिए स्फूर्तिमान हो गया। मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए पूछा- आज तुम्हारा खेल जमा क्यों नहीं?
माँ ने कहा है कि आज तुरन्त चले आना। मेरी घड़ी समीप है।-अविचल भाव से उसने कहा।
तब भी तुम खेल दिखलाने चले आये! मैंने कुछ क्रोध से कहा। मनुष्य के सुख- दु:ख का माप अपना ही साधन तो है। उसी के अनुपात से वह तुलना करता है।
उसके मुँह पर वही परिचित तिरस्कार की रेखा फूट पड़ी।
उसने कहा-न क्यों आता!
और कुछ अधिक कहने में जैसे वह अपमान का अनुभव कर रहा था।
क्षण- भर में मुझे अपनी भूल मालूम हो गयी। उसके झोले को गाड़ी में फेंककर उसे भी बैठाते हुए मैंने कहा-जल्दी चलो। मोटरवाला मेरे बताये हुए पथ पर चल पड़ा।
कुछ ही मिनटों में मैं झोपड़े के पास पहुँचा। जादूगर दौड़कर झोपड़े में माँ- माँ पुकारते हुए घुसा। मैं भी पीछे था, किन्तु स्त्री के मुँह से, बे... निकलकर रह गया। उसके दुर्बल हाथ उठकर गिर गये। जादूगर उससे लिपटा रो रहा था, मैं स्तब्ध था। उस उज्ज्वल धूप में समग्र संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नृत्य करने लगा।
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 जयशंकर प्रसाद जी का जन्म माघ शुक्ल 10, संवत् 1946 वि. में काशी के सरायगोवर्धन में हुआ। किशोरावस्था के पूर्व ही माता और बड़े भाई का देहावसान हो जाने के कारण 17 वर्ष की उम्र में ही प्रसाद जी पर आपदाओं का पहाड़ टूट पड़ा। प्रसाद जी की प्रारंभिक शिक्षा काशी में क्वींस कालेज में हुई, किंतु बाद में घर पर इनकी शिक्षा का प्रबंध किया गया, जहाँ संस्कृत, हिंदी, उर्दू, तथा फारसी का अध्ययन इन्होंने किया। दीनबंधु ब्रह्मचारी जैसे विद्वान इनके संस्कृत के अध्यापक थे। इनके गुरुओं में रसमय सिद्ध की भी चर्चा की जाती है।
प्रसाद जी ने वेद, इतिहास, पुराण तथा साहित्य शास्त्र का अत्यंत गंभीर अध्ययन किया था। वे बाग- बगीचे तथा भोजन बनाने के शौकीन थे और शतरंज के खिलाड़ी भी थे। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और निबंध, साहित्य की प्राय: सभी विधाओं में उन्होंने ऐतिहासिक महत्व की रचनाएँ कीं तथा खड़ी बोली की श्रीसंपदा को महान और मौलिक दान से समृद्ध किया। वे छायावाद के संस्थापकों और उन्नायकों में से एक हैं। वैसे सर्वप्रथम कविता के क्षेत्र में इस नव- अनुभूति के वाहक वही रहे हैं और प्रथम विरोध भी उन्हीं को सहना पड़ा है। भाषा शैली और शब्द-विन्यास के निर्माण के लिये जितना संघर्ष प्रसाद जी को करना पड़ा है, उतना दूसरों को नहीं। प्रसाद जी का जीवन कुल 48 वर्ष का रहा है। क्षय रोग से प्रबोधिनी एकादशी सं. 1993 (15 नवंबर, 1936 ई.) को उनका देहांत काशी में हुआ। उदंती के इस अंक में प्रस्तुत है उनकी एक बेहद मर्मस्पर्शी कहानी छोटा जादूगर।

लुच्चों की दुनिया

लुच्चों की दुनिया

                           - आलोक पुराणिक
यह निबंध उस छात्र की कापी से लिया गया है, जिसे निबंध प्रतियोगिता में पहला स्थान मिला है। निबंध प्रतियोगिता का विषय था- बोर्ड के एक्जाम्स।
बोर्ड के एक्जाम फिर रिजल्ट, फिर परसेंटेज। परसेंटेज पे मार है। साधो जग बौराना। यानी कबीरदास जी कहते हैं कि जग बौराया हुआ है, देखता नहीं है, सच क्या है। सच हम बताता हूं। हमारे मुहल्ले के एक परिवार में तीन बेटे हैं। टुच्चा, लुच्चा और सच्चा। सच्चा बहुत पढ़ाकू था, बोर्ड के एक्जाम्स बहुत सीरियसली लिये। हंड्रेड परसेंट माक्र्स हर बोर्ड एक्जाम में। सच्चाजी को परसेंटेज के बेसिस पे होटल मैनेजमेंट के कोर्स में एडमीशन मिल गया। बहुत मन लगा कर पढ़ाई की आपने। इतने होशियार माने गये कि आपके बारे में सबकी राय रही है कि बहुतै बेवकूफ टाइप आदमी हैं। पर हैं बहुत पढ़े लिखे। आप होटल मैनेजर हुए। साल दर साल इस चिंता में उलझे रहे कि इस साल टीए डीए में कित्ते बढ़ेंगे। मुन्नी का स्कूल एडमीशन, मुन्ने के स्कूल की फीस। तरह- तरह की चिताएं इतनी गहरी रहीं कि सामाजिक कुछ कम हो पाये। सो कनेक्शन सही सैट ना बने। जीवन या दफ्तर में कटा या तमाम तरह की लाइनों में, इसके बाद जो कुछ भी बचा वह शिकायतों में कटा कि हाय ये देश क्या हो गया है, अब भले आदमियों का गुजारा नहीं है। यद्यपि सच्चे जी की पूरी लाइफ गुजारे के जुगाड़ में ही गुजरी। यूं इनकी लाइफ के बारे में यूं ही कह सकते हैं कि बस कट सी गयी।
बचपन में ही इनके दिमाग में घुस गया था कि दारु पीना बुरी बात है। सो ये सारे महानों की सोहबत से वंचित हो गये। शहर के जितने महान थे, वो सारे परस्पर एक दूसरे से दारु पर मिलते थे। फिर एक मसला यह भी था कि चूंकि सच्चे जी बहुत शरीफ थे, इसलिए वह व्यापक समाज में घुल मिल नहीं पाते थे। बड़े लोग आपस में सुनाते थे कि कैसे थाईलैंड में मजे आये। और हमने लास वेगास में ये ये किया। सच्चा जी के पास बताने को सिर्फ ये होता था कि हाय हाय देखो आलू कितने महंगे हो गये हैं। मैं तो थोक मंडी तक गया, पर वहां भी इतने महंगे। जीना कितना मुश्किल हो गया है। ऐसी बोरिंग बातें सुनकर सच्चाजी को बड़े लोग भगा दिया करते थे। कुल मिलाकर सदाचार के मारे सच्चाजी का जीवन गहन कष्टों में, छोटे लोगों में ही गुजरा।
पुत्र नंबर टू, लुच्चा जी, बचपन से ही लुच्चे थे। लुच्चों की सोहबत में रहे, सारे बड़े आदमियों के लड़कों से मैत्री रही। और साहब बड़े आदमी भी ऐसे ऐसे कि क्या कहो। किसी का बाप एसपी, किसी का बाप नेता। किसी का बाप वाइस चांसलर। किसी के बाप की पान मसाले की फैक्ट्री। किसी का बाप इनकम टैक्स कमिश्नर, जिसने अपने बेटे को बारह लाख की मोटरसाइकिल दिलवायी। यानी लुच्चाजी बचपन से ही जिन लोगों के बीच बड़े हुए वो काफी महत्वाकांक्षी थे। इनमें से किसी की इच्छा नौकरी का ना थी। या यूं कहे कि नौकरी की इच्छा अगर होती तो काबिलियत ना थी। पर इन सब बच्चों के पिताओं को पता था कि बच्चों को ठिकाने कैसे लगाना है यानी कैसे सही जगह पर सैट करना है।
सो रिजल्ट ये हुआ कि पैसे वालों के, असरदार लोगों के बच्चे, इन सबने मिलकर एक फाइव स्टार होटल खोला। बोर्ड के एक्जाम्स की इन्होंने बहुत कम चिंता की, हमेशा पचास परसेंट के आसपास आये। बड़े आदमियों के बच्चों के इनसे ज्यादा नंबर आ जायें, तो शिक्षा व्यवस्था पर शक करना चाहिए कि वह भ्रष्ट हो चुकी है पूरे तौर पर। तो कुल मिलाकर लुच्चाजी की सोहबत वाले ज्यादा पढ़े लिखे तो ना हुए पर फाइव स्टार होटल के मालिक हुए।
पुत्र नंबर तीन टुच्चा जी, बचपन से ही एक्स्ट्रा क्यूरिकूलर गतिविधियों में दिलचस्पी लेते थे। शहर के रोचक स्थलों पर आप पाये जाते थे। काल गर्ल के अड्डों के बारे में आपको इनसाइक्लोपीडिया माना जाता था। शहर के तमाम धनी मानी लोग आपके टच में बराबर रहते थे। धीमे- धीमे आप को इस विषय का महारथी भी माना जाने लगा कि शहर में अफीम, हीरोईन वगैरह कहां मिलती हैं। इस कारोबार में आपके संपर्क पुलिस वालों से हुए, नेताओं से हुए। आपने बहुत कमाया। तरह- तरह से कमाया। कैरियर के शुरुआती दौर में भले ही आपको दलाल टाइप आदमी कहा जाता रहा हो, पर अब तो आपको सब माननीय विधायक ही कहते हैं। मतलब माननीय मंत्री तक आप हो गये। अपनी एक्स्ट्रा क्यूरिकुलर एक्टिविटीज के चलते ही आप विधायक हुए और पर्यटन मंत्री हुए, होटल वगैरह के लाइसेंस देने में आपकी बहुत चलती है।
यानी बोर्ड के एक्जाम्स को बहुत सीरियसली लेने वाले सच्चा, होटल मैनेजर हुए।
बोर्ड के एक्जाम्स को बहुत कम सीरियसली लेने वाले लुच्चा, होटल मालिक हुए।
बोर्ड एक्जाम्स की बिलकुल चिंता ना करने वाले टुच्चा पर्यटन मंत्री हुए और होटल वालों के सलाम स्वीकार करने लगे।
पर जैसा कि कबीरदास ने कहा कि साधो, जग बौराना। जग बौराया हुआ है। बोर्ड के एक्जाम्स की, पढ़ाई लिखाई की बहुत चिंता करता है। वैसे साधो जग बौराना का एक और मतलब है- साधो, ये नार्मल वर्ड बोरिंग है। किराये, फीस, सेलरी, इन्क्रीमेंट्स की चिकचिक। हमें साधुगिरी के कैरियर पर विचार करना चाहिए, सुंदर चेलियां, सुंदर भवन, बड़ी कारों वाला साधुगिरी का कैरियर अत्यंत ही धन व यश प्रदायक है। साधुगिरी के कैरियर के लिए भी बोर्ड एक्जाम्स की जरुरत नहीं होती।
साधुगिरी का कैरियर भी परम नोट प्रदायक है। बड़े- बड़े आगे पीछे घूमते हैं। फिर टीवी चैनल जब से ढेर सारे हो गये हैं, तब से तो बाबागिरी का कैरियर और भी धांसू हो गया है। पर बचपन से देखा जाता है कि बाबा बनने के प्रति आमतौर पर बालकों और बालिकाओं में कोई रुचि नहीं होती। वो तो पारंपरिक कैरियरों में फंसकर चौपट होना चाहते हैं। इसलिए आवश्यक है कि बाबागिरी के कैरियर को लेकर समाज में नयी चेतना का प्रसार किया जाये। लोगों को बताया जाये कि कैसे बाबागिरी में अरबों खड़े किये जा सकते हैं।
पर ऐसा हो नहीं पा रहा है। ये देश की शिक्षा का दुर्भाग्य है। देश की शिक्षा तो सिर्फ क्लर्क बना रही है। होटल मालिक, होटल मंत्री या बाबा जैसा धांसू कैरियर उसकी चिंता का विषय नहीं है। इसलिए कहा जाता है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था ठीक नहीं है। यह बात विद्वान लोग कहते हैं और अब मैंने भी सिद्ध कर दिया कि वो सही कहते हैं।
संक्षेप में इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि सच्चे नहीं लुच्चे ही टाप पर जाते हैं।
संपर्क- फ्लैट नंबर एफ-1 प्लाट नंबर बी-39,  रामप्रस्थ गाजियाबाद-201011, मो. 9810018799
     Email-puranika@gmail.com

लो आई भोर

 लो आई भोर
- ज्योत्स्ना शर्मा
1
भोर का तारा
निशा संग जाए ना
देखे आकाश।
2
उजाला हुआ
चहकती चिडिय़ाँ
बजे संगीत।
3
बादल धुआँ
घुटती -सी साँसें हैं
व्याकुल धरा।
4
न घोलो विष
जल, जीव व्याकुल
तृषित धरा।
5
व्यथा कथाएँ
धरा जब सुनाए
सिन्धु उन्मन!
6
लो आई भोर
झाँक रहा सूरज
पूर्व की ओर।
7
जादुई पल
किरनों ने छू दिया
खिले कँवल।
8
पत्ता जो गिरा
मुस्कुराकर बोला-
फिर आऊँगा!
9
धानी चूनर
सतरंगी कर दी
भागा सूरज।
10
सिन्धु छुपाए
रंग लाल गहरा
घुल ही गया।
11
खिली धूप- सी
खुशियाँ और उमंग
बौराया मन।
12
मधुरा गिरा
भरे रस -कलश
रहे अक्षया!

   संपर्क- मकान नं 604, प्रमुख हिल्स, छरवडा रोड,
    वापी, जिला वलसाड ( गुजरात) -पिन-396191
    Email- jyotsna.asharma@yahoo.co.in


एक पातीः 'कहि देबे संदेश' विशेषांक पर

एक अतीत कथा 

का पुनर्जीवन

- विनोद साव
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से निकलने वाली मासिक पत्रिका 'उदंती' को अगर प्रोडक्शन के हिसाब से हम देखें तो लगता है कि यह देश की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका है जिसके हर अंक का कलेवर, चित्रांकन, मुद्रण और संपादन इतना मनोहारी बन पड़ता है कि अपनी पहली झलक में यह पत्रिका एक खूबसूरत ग्रीटिंग कार्ड होने का भान कराती है। ऐसा लगता है कि उदंती हर बार अपने पाठकों के पास अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ पहुंच रही है। छत्तीसगढ़ की अस्मिता के लिए रोज- रोज हल्ला करने वाले बुद्धिजीवी इस बात की ओर भी ध्यान दें कि उनके इस नये राज्य में साहित्य और विचार की पत्रिका का कितना अभाव है... और इन स्थितियों में उदंती जैसी कोई एक पत्रिका अपने नितांत निजी संघर्षों के बल पर इस तरह छटा बिखेर रही है तो यह उसके संपादक का कितना उत्तर-दायित्वपूर्ण उपक्रम है। इसे तो छत्तीसगढ़ के लेखकों-पाठकों और सरकार का पुरजोर समर्थन मिलना चाहिए।
बहरहाल, हम इस बात की चर्चा करें कि अपनी कई कोशिशों के बीच विगत फरवरी माह के अंक में उंदती ने इस बात की कोशिश की है कि छत्तीसगढी़ की पहली फिल्म 'कहि देबे सन्देस' की व्यथा कथा को प्रस्तुत किया जाए। यह संग्रहणीय अंक है जिसने एक अतीत बन चुकी कथा को पुनर्जीवित किया है। इसमें संपादक डॉ. रत्ना वर्मा के साथ मोहम्मद जाकिर हुसैन  ने छत्तीसगढ़ी की पहली फिल्म के निर्माण, इतिहास और उसकी जद्दोजहद को आलेखबद्ध किया है। इसमें फिल्म निर्माता मनु नायक, गीतकार डॉ. हनुमंत नायडू, संगीतकार मलय चक्रवर्ती, गायक मोहम्मद रफी, महेन्द्र कपूर, मन्नाडे, सुमन कल्याणपुर आदि पर अलग- अलग आलेखों में अनेक ज्ञानवद्र्धक सामग्रियां दी गई हंै। उस समय निर्देशक मनु नायक को फिल्म की शूटिंग के दौरान होने वाली दुविधाओं से उबारकर किस तरह तत्कालीन सांसद बृजलाल वर्मा ने अपने गांव पलारी में उन्हें सुविधाएं मुहैया करवाई इन सबकी जानकारी दी गई है। बृजलाल वर्मा, खूबचंद बघेल, रामचंद्र देशमुख, मंदराजी साव अपने समय के न केवल समृद्ध मालगुजार थे बल्कि ये बड़े कलाप्रेमी और विचारवान लोग थे जिन्होंने अपने समय की कला का कई तरह से उन्नयन किया, अनेक कलाकारों को परखा समझा और उन्हें मंच दिया।
उदंती के इस अंक ने मुझे भी अतीत के उस दौर में पहुंचा दिया जब इस फिल्म का 1964 में पहला प्रदर्शन हुआ था। तब हर नयेपन के प्रति सचेत रहने वाली अपनी अम्मां उर्मिला साव और शिक्षाविद् बाबूजी अर्जुनसिंह साव के साथ इस फिल्म को दुर्ग में देखा था। तब मैं प्रायमरी स्कूल का छात्र था पर इस फिल्म के 'पोएटिक पिक्चराइजेशन' ने मेरे बाल मन पर अपनी अमिट छाप छोड़ दी थी। बड़े होने के बाद जब साहित्य जगत में थोड़ी पहचान बनी तब मनु नायक से रामचंद्र देशमुख के घर बघेरा में भेंट हुई थी। दूसरी बार वे प्रेम साइमन के साथ मिले थे। इस फिल्म के गीतकार डॉ. हनुमन्त नायडू बाबूजी के मित्र थे। वे दुर्ग निवासी थे पर उनसे नागपुर में पहली भेंट उनके घर में हुई थी जब वे वहां प्राध्यापक थे। मैंने उनका साक्षात्कार लिया था जिसे प्रसिद्ध पत्रकार राजनारायण मिश्र ने छापा था।
यह फिल्म निदेशक मनु नायक की पहली प्रस्तुति थी जो एक समाजोत्तेजक फिल्म बन गई थी। इसने समाज की संकीर्ण जातीयता को अपनी कथा के केंद्र में रखा था। अपनी सीमित सुविधाओं, आरंभिक प्रयासों और कुछ अनावश्यक दबावों के कारण फिल्म में कई खामियां उभरकर आई थीं लेकिन मलय चक्रवर्ती के मनमोहक संगीत और मोहम्मद रफी जैसे सुरीले गायकों के कारण यह फिल्म हिट हो गई थी और लम्बे समय तक सिनेमा हालों में बार- बार प्रदर्शित होती रही थीं। मध्य प्रदेश शासन के पंचायत एवं समाजसेवा विभाग द्वारा भी इस फिल्म का प्रदर्शन गांव- गांव में किया जाता था। बरसों पहले दिल्ली दूरदर्शन ने इसे रविवार की महत्वपूर्ण फिल्मों में शामिल कर इसे दिखाया था।
इस फिल्म के लोकेशन्स और उनका फिल्मांकन भी इसके सशक्त पक्ष रहे हैं। बलौदाबाजार से पन्द्रह किलोमीटर पहले पडऩे वाले गांव पलारी में इसकी शूटिंग की गईं। पलारी गांव का बालसमुंद तालाब फिल्मांकन के केंद्र में है। यह समुद्र की तरह दिखने वाला संभवत: छत्तीसगढ़ का सबसे विराट तालाब है। फिल्म में तालाब के हर हिस्से को बड़ी खूबसूरती से फिल्माया गया है। तब तालाब के घाट पर एक विशाल तुलसी चौरा हुआ करता था जिस पर 'बिहनिया के उगत सुरुज देवता' जैसे मधुर गीत को फिल्माया गया था, जिसे सुमन कल्याणपुर ने स्वर दिया था। यह अपने मधुर गीतों और बालसमुन्द तालाब तट के मोहक दृश्यों के कारण एक दर्शनीय फिल्म बन गई थी।
छत्तीसगढ़ शासन को चाहिए कि वह फिल्म डिवीजन या एसोसिएशन जैसे किसी संगठन के माध्यम से इस पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म का रि-प्रिन्ट बनवा का उसे सुरक्षित रखे। साथ ही पलारी के उस विराट तालाब 'बालसमुन्द' और उसके किनारे स्थित 9 वीं सदी के पुरातन सिद्धेश्वर मंदिर की भव्यता को रख उसमें पर्यटन की संभावनाओं को तलाशे।
संपर्क-  मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001 मो. 09407984014
       vinod.sao1955@gmail.com

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ब्लॉग बुलेटिन का स्वागत

उदंती के फरवरी अंक से आरंभ ब्लॉग बुलेटिन  स्तंभ स्वागतेय है। 'लहरें... एक नशा है अहसासों काÓ निसंदेह पूजा जी बेहतरीन लिखती हैं। मैंने हाल ही में उनको पढऩा शुरू किया है। उनके शब्द बातें करते जान पड़ते हैं। ब्लॉग बुलेटिन स्तंभ की शुरुआत पूजा जी के ब्लॉग से हुई है यह बड़े संयोग की बात है। एक शानदार पत्रिका (उदंती) के नए कॉलम में उन्हें जगह मिली इसके लिए पूजा जी को बधाई।
- लोकेन्द्र सिंह राजपूत, ग्वालियर (मप्र)
lokendra777@gmail.com

दिल को छुने वाली ग़ज़लें

प्राण जी की ग़ज़लें, जिंदगी की सच्ची दास्तावेज होती हैं.. उनकी गज़लों में कल, आज और कल का मिश्रण होता है, जो की भावपूर्ण शब्दों के द्वारा दिल में उतर जाता है। 
- विजय कुमार, vksappatti@gmail.com
प्राण जी अपने आस- पास की बातों को सादे लहजे गज़ल में उतारना उन्हीं के बस की बात है...
- समीर लाल, sameer.lal@gmail.com

मर्मस्पर्शी लेख

आपाधापी एवं स्वार्थ- पीडि़त समाज में ऐसे लेखों की बहुत बड़ी भूमिका है, तपते मरुस्थल में शीतल जल की तरह। पूरा लेख मर्मस्पर्शी और प्रवाह पूर्ण है । इस तरह के लेखन को बनाए रखिए। (फरवरी अंक में रफी साहब की दरियादिली देख...  शीर्षक से प्रकाशित लेख के बारे में।)
- रामेश्वर काम्बोज, rdkamboj@gmail.com

संग्रहणीय अंक

कहि देबे संदेस फिल्म का नाम बचपन से सुनता रहा हूं, हालांकि देखने का मौका अब तक नहीं मिला है। इसमें अहम किरदार निभाने वाले स्व. रमाकांत बख्शी का पैतृक निवास खैरागढ़ के हमारे मोहल्ले में ही है, इसलिए इस फिल्म से बिना देखे ही एक अलग तरह का लगाव महसूस होता है। गाने जरूर सुने हैं और उनकी मिठास का कायल भी हूं। विशेषांक के माध्यम से फिल्म की पूरी जानकारी मिली। यह एक बढिय़ा अंक था और संग्रहणीय भी।
- विवेक गुप्ता, vivekbalkrishna@gmail.com
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