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Feb 23, 2012

ब्लॉग बुलेटिन

लहरें... एक नशा है अहसासों का
उदंती के इस अंक से हम एक नयी शृंखला की शुरूआत कर रहे हैं जिसके अंतर्गत हर बार किसी एक ब्लॉग के बारे में आपको जानकारी दी जाएगी। इस 'एकल ब्लॉग चर्चा' में ब्लॉग की शुरुआत से ले कर अब तक की सभी पोस्टों के आधार पर उस ब्लॉग और ब्लॉगर का परिचय रश्मि प्रभा जी अपने ही अंदाज में करवायेंगी। आशा है आपको हमारा यह प्रयास पसंद आएगा। तो आज मिलिए ... पूजा उपाध्याय के ब्लॉग http://laharein.blogspot.com से रश्मि प्रभा
कुछ लोग रूह को हथेलियों पर उठाकर लिखते हैं- कुछ ऐसे एहसास कि कितनों की रूह उस रूह के इर्द- गिर्द खड़ी हो कहती है-
'यह तो मुझे कहना था...' पूजा उपाध्याय के एहसास ऐसे ही सगे लगते हैं, यूँ कहें जुड़वाँ। पढ़ते- पढ़ते कई बार ठिठकी हूँ, कभी आँखें शून्य में टंग गई हैं, कभी हथेलियाँ पसीज गईं... सच पूछिए तो कई बार गुस्सा भी आया- 'मुझसे आगे तुम कैसे लिख गई' फिर एक स्नेहिल मुस्कान चेहरे पर रूकती है- कुछ पल ब्लॉग के पन्ने पर मुस्कुराती पूजा को देखती हूँ - इश्क, अश्क, ओस, बारिश, हवाएँ... ऐसे ही सहज चेहरों के पास मुकाम पाते हैं। सच कह दो तो शरीर, दिल, दिमाग कमल की तरह खिल जाते हैं... कहीं कोई काई नहीं, खुरदुरी बुनावट नहीं, न ही आँखों को मिचिआती तेज रौशनी, न कोई सीलन... एक मोमबत्ती, पिघलता मोम, हल्की रौशनी के घेरे- खुदा बहुत करीब होता है।
2007 से पूजा ने लिखना शुरू किया, नि:संदेह ब्लॉग पर। ब्लॉग पर आने से पहले तितली बन कई कागजों पर उतरी ही होगी, ख्वाबों के कितने इन्द्रधनुष बनाये होंगे। अपने ब्लॉग के शुरूआती पन्ने पर पूजा ने लिखा है-
'कितना कुछ है जो मेरे अन्दर उमड़ता घुमड़ता रहता है कितना कुछ कहना चाहती हूँ मैं कितना कुछ बताना चाहती हूँ मैं, ये कौन सा कुआँ हैं, ये कौन सा समंदर है कि जिसमें इतनी हलचलें होती रहती है' पढ़कर मैं भी सतर्कता के साथ अपने भीतर के कुँए और समंदर को ढूँढने लगती हूँ... वह समंदर- जहाँ कई बार सुनामी आया और टचवुड मेरी कई बेवकूफियों को बहा ले गया। पर सोचती हूँ- बेवकूफियों में ही रिश्ते चलते हैं, पर सामने अगर समझदारी हो, स्वार्थ व्यवहारिकता हो तो इकतरफा बेवकूफ पागल हो जाता है। खैर ये कहानी फिर सही...
2008 की दहलीज पर भी कई एहसास कई मुद्राओं में बैठे मिले.... सबसे मिली, कुछ उनसे सुना, कुछ सुनाया और उठा लायी कुछ पंक्तियाँ, कवयित्री की सोच से परे मैं उन पंक्तियों में समा गई, जाने कितने ख्याल पलकों तले गुजर गए -
'आलसी चांद
आज बहुत दिनों बाद निकला
बादल की कुर्सी पे टेक लगा कर बैठ गया
बेशरम चाँद
पूरी शाम हमें घूरता रहा' ....
अपने ख्यालों में डूबी कवयित्री ने सोचा नहीं होगा कि इस आलसी चाँद के आगे कितने शर्माए चेहरे खुद में सिमटते खड़े होंगे। बात तेरी जुबां से निकली हो या मेरी जुबां से- ख्वाब तो कितनों के होते हैं।
किसी राह से गुजरते हमारे ख्याल, हमारी परछाई मिले होंगे... एक ही ट्रेन में सफर किया होगा, भागते दृश्यों से एक लम्हा तुमने तोड़ा तो मैंने भी तोड़ा- रहे अजनबी, पर एहसास? कहा तो उसने, पर कैसे कहूँ ये मेरे नहीं?
'एक सोच को जिन्दा रखने के लिए बहुत मेहनत लगती है, बहुत दर्द सहना पड़ता है, फिर भी कई ख्याल हमेशा के लिए दफन करने पड़ते हैं... उनका खर्चा पानी उसके बस की बात नहीं।'
2009 की पोटली से एक रचना उठती हूँ- कोई कम नहीं किसी से, पर जहाँ आँखें ठहर गईं, उसे छू लिया और ले आई-
एक लॉन्ग ड्राइव से लौट कर
जाने क्या है तुम्हारे हाथों में
कि जब थामते हो तो लगता है
जिंदगी संवर गई है...
बारिश का जलतरंग
कार की विन्ड्स्क्रीन पर बजता है
हमारी खामोशी को खूबसूरती देता हुआ
कोहरा सा छाता है देर रात सड़कों पर
ठंड उतर आती है मेरी नींदों में
पीते हैं किसी ढाबे पर गर्म चाय
जागने लगते हैं आसमान के बादल
ख्वाब में भीगे, रंगों में लिपटे हुए
उछल कर बाहर आता है सूरज
रात का बीता रास्ता पहचानने लगता है हमें
अंगड़ाईयों में उलझ जाता है नक्शा
लौट आते हैं हम बार बार खो कर भी
अजनबी नहीं लगते बंगलोर के रस्ते
घर भी मुस्कुराता है जब हम लौटते हैं
अपनी पहली लॉन्ग ड्राइव से
रात, हाईवे, बारिश चाय
तुम, मैं, एक कार और कुछ गाने
जिंदगी से यूँ मिलना अच्छा लगा...
जिन्दगी से यूँ मुलाकात आपने भी की होगी, रख दिया होगा हाथ बेतकल्लुफी से कानों पर, लम्बे रास्ते छोटे होते गए होंगे... खुली आँखों इश्क को जीते गए होंगे।
पूजा के ब्लॉग से मेरी मुलाकात नई नहीं, पर जब भी इसके दरवाजे खोले हैं- यूँ लगता है अभी- अभी कोई ताजी हवा इधर से गुजरी है, सब नया नया खास- खास लगता है... जैसे 2010 का यह कमरा।
कोई गुनगुना रहा है या मेरी धड़कनें गा रही हैं... मेरी जाँ मुझे जाँ न कहो...नहीं यह है पूजा का कमरा, जहाँ उसकी धड़कनें कह रही हैं, 'जान'... तुम जब यूँ बुलाते हो तो जैसे जिस्म के आँगन में धूप दबे पाँव उतरती है और अंगड़ाइयां लेकर इश्क जागता है, धूप बस रौशनी और गर्मी नहीं रहती, खुशबू भी घुल जाती है जो पोर पोर को सुलगाती और महकाती है। तुम्हारी आवाज पल भर को ठहरती है, जैसे पहाडिय़ों के किसी तीखे मोड़ पर किसी ने हलके ब्रेक मारे हों और फिर जैसे धक से दिल में कुछ लगता है, धड़कनें तेज हो जाती हैं साँसों की लय टूट जाती है। इतना सब कुछ बस तुम्हारे 'जान' बुलाने से हो जाता है... एक लम्हे भर में। तुम जानते भी हो क्या? तो, मुझे यूँ जाँ ना कहो...
ख्वाबों के संग यूँ ही मेरा उठना बैठना रहता है, दिन हो या रात सुबह हो या शाम एक ख्वाब मेरे संग चलता ही है, उसपे करम ऐसे ब्लॉग के जो मुझे न देंगे जीने...
2011 की शाख पर पूजा ने कई कंदील जलाये, एहसासों के आगे कोई अँधेरा न हो - इसका ध्यान रखा, या... चलो, एक कंदील के उजाले में पढ़ें-
आपने देखा है किसी लड़की में दो नदियाँ ? न देखा हो तो देखिये-
'मेरे अन्दर दो बारामासी नदियाँ बहती हैं। दोनों को एक दूसरे से मतलब नहीं... अपनी- अपनी रफ्तार, अपना रास्ता... आँखें इन दोनों पर बाँध बनाये रखती हैं, पर हर कुछ दिन में इन दोनों में से किसी एक में बाढ़ आ जाती है और मुझे बहा लेती है।'
मुझे मालूम है इसे पढऩे के बाद कईयों को अपने अन्दर की नदी का पता मिल जायेगा!
2012 ने तो अभी घूँघट उठाया ही है... और गले में प्यास की तरह अटके थे (हैं)
सिर्फ तीन शब्द-l love you, l love you, l love you
यह ब्लॉग है या एक नशा है एहसासों का... घूंट- घूंट जी के देखिये, शब्द- शब्द आँखों की हलक से उतार के देखिये- हिचकी हिचकी हिचक हिचकी हो न जाना, ख्वाबों की गली में तू याद बनके खो न जाना...

संपर्क: निको एन एक्स, फ्लैट नम्बर- 42, दत्त मंदिर,
विमान नगर, पुणे- 14, मो. 09371022446
http://lifeteacheseverything.blogspot.in

प्रेरक

वृक्ष
यह कहानी बहुत पुरानी है। किसी नगर के समीप एक पहाड़ी पर तीन वृक्ष थे। वे तीनों अपने सुख- दु:ख और सपनों के बारे में एक दूसरे से बातें किया करते थे।
एक दिन पहले वृक्ष ने कहा- 'मैं खजाना रखने वाला बड़ा सा बक्सा बनना चाहता हूँ। मेरे भीतर हीरे- जवाहरात और दुनिया की सबसे कीमती निधियां भरी जाएँ। मुझे बड़े हुनर और परिश्रम से सजाया जाय, नक्काशीदार बेल- बूटे बनाए जाएँ, सारी दुनिया मेरी खूबसूरती को निहारे, ऐसा मेरा सपना है।'
दूसरे वृक्ष ने कहा- 'मैं तो एक विराट जलयान बनना चाहता हूँ। बड़े- बड़े राजा और रानी मुझपर सवार हों और दूर देश की यात्राएं करें। मैं अथाह समंदर की जलराशि में हिलोरें लूं। मेरे भीतर सभी सुरक्षित महसूस करें और सबका यकीन मेरी शक्ति में हो... मैं यही चाहता हूँ।'
अंत में तीसरे वृक्ष ने कहा- 'मैं तो इस जंगल का सबसे बड़ा और ऊंचा वृक्ष ही बनना चाहता हूँ। लोग दूर से ही मुझे देखकर पहचान लें, वे मुझे देखकर ईश्वर का स्मरण करें, और मेरी शाखाएँ स्वर्ग तक पहुंचें... मैं संसार का सर्वश्रेष्ठ वृक्ष ही बनना चाहता हूँ।'
ऐसे ही सपने देखते- देखते कुछ साल गुजर गए। एक दिन उस जंगल में कुछ लकड़हारे आए। उनमें से जब एक ने पहले वृक्ष को देखा तो अपने साथियों से कहा- 'ये जबरदस्त वृक्ष देखो! इसे बढ़ई को बेचने पर बहुत पैसे मिलेंगे।' और उसने पहले वृक्ष को काट दिया। वृक्ष तो खुश था, उसे यकीन था कि बढ़ई उससे खजाने का बक्सा बनाएगा।
दूसरे वृक्ष के बारे में लकड़हारे ने कहा- 'यह वृक्ष भी लंबा और मजबूत है। मैं इसे जहाज बनाने वालों को बेचूंगा'। दूसरा वृक्ष भी खुश था, उसका चाहा भी पूरा होने वाला था।
लकड़हारे जब तीसरे वृक्ष के पास आए तो वह भयभीत हो गया। वह जानता था कि अगर उसे काट दिया गया तो उसका सपना पूरा नहीं हो पाएगा। एक लकड़हारा बोला- 'इस वृक्ष से मुझे कोई खास चीज नहीं बनानी है इसलिए इसे मैं ले लेता हूं'। और उसने तीसरे वृक्ष को काट दिया।
पहले वृक्ष को एक बढ़ई ने खरीद लिया और उससे पशुओं को चारा खिलानेवाला कठौता बनाया। कठौते को एक पशुगृह में रखकर उसमें भूसा भर दिया गया। बेचारे वृक्ष ने तो इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी। दूसरे वृक्ष को काटकर उससे मछली पकडऩेवाली छोटी नौका बना दी गई। भव्य जलयान बनकर राजा- महाराजाओं को लाने-ले जाने का उसका सपना भी चूर- चूर हो गया। तीसरे वृक्ष को लकड़ी के बड़े- बड़े टुकड़ों में काट लिया गया और टुकड़ों को अंधेरी कोठरी में रखकर लोग भूल गए।
एक दिन उस पशुशाला में एक आदमी अपनी पत्नी के साथ आया। स्त्री ने वहां एक बच्चे को जन्म दिया। वे बच्चे को चारा खिलानेवाले कठौते में सुलाने लगे। कठौता अब पालने के काम आने लगा। पहले वृक्ष ने स्वयं को धन्य माना कि अब वह संसार की सबसे मूल्यवान निधि अर्थात एक शिशु को आसरा दे रहा था।
समय बीतता गया। सालों बाद कुछ नवयुवक दूसरे वृक्ष से बनाई गई नौका में बैठकर मछली पकडऩे के लिए गए। उसी समय बड़े जोरों का तूफान उठा और नौका तथा उसमें बैठे युवकों को लगा कि अब कोई भी जीवित नहीं बचेगा। एक युवक नौका में निश्चिंत सा सो रहा था। उसके साथियों ने उसे जगाया और तूफान के बारे में बताया। वह युवक उठा और उसने नौका में खड़े होकर उफनते समुद्र और झंझावाती हवाओं से कहा- 'शांत हो जाओ'। और तूफान थम गया। यह देखकर दूसरे वृक्ष को लगा कि उसने दुनिया के परम ऐश्वर्यशाली सम्राट को सागर पार कराया है।
तीसरे वृक्ष के पास भी एक दिन कुछ लोग आए। उन्होंने उसके दो टुकड़ों को जोड़कर एक घायल आदमी के ऊपर लाद दिया। ठोकर खाते, गिरते- पड़ते उस आदमी का सड़क पर तमाशा देखती भीड़ अपमान करती रही। वे जब रुके तब सैनिकों ने लकड़ी के सलीब पर उस आदमी के हाथों- पैरों में कीलें ठोंककर उसे पहाड़ी की चोटी पर खड़ा कर दिया। दो दिनों के बाद रविवार को तीसरे वृक्ष को इसका बोध हुआ कि उस पहाड़ी पर वह स्वर्ग और ईश्वर के सबसे समीप पहुंच गया था क्योंकि ईसा मसीह को उस पर सूली पर चढ़ाया गया था। सब कुछ अच्छा करने के बाद भी जब हमारे काम बिगड़ते जा रहे हों तब हमें यह समझना चाहिए कि शायद ईश्वर ने हमारे लिए कुछ बेहतर सोचा है। यदि आप उस पर यकीन बरकरार रखेंगे तो वह आपको नियामतों से नवाजेगा। प्रत्येक वृक्ष को वह मिल गया जिसकी उसने ख्वाहिश की थी, लेकिन उस रूप में नहीं मिला जैसा वे चाहते थे। हम नहीं जानते कि ईश्वर ने हमारे लिए क्या सोचा है या ईश्वर का मार्ग हमारा मार्ग है या नहीं... लेकिन उसका मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। (www.hindizen.com से )

वाह भई वाह



दांत का कीड़ा
मीठू (डॉक्टर से)- सर, मेरा ऊपर की ओर का दांत, जिसे कीड़ा खा रहा था, उसकी जगह आपने नीचे का दांत निकाल दिया।
डॉक्टर- मूझे मालूम है। कीड़ा नीचे के दांत पर चढ़कर ऊपर का दांत खा रहा था...

क्या बनोगे...?

टीचर- टूटू, तुम बड़े होकर क्या बनोगे...?
टूटू- (शरमाते हुए)- जी दूल्हा...
टीचर- अरे, मेरा मतलब है, बड़े होकर क्या पाना चाहते हो...?
टूटू- (फिर शरमाते हुए) जी दुल्हन...
टीचर- उफ, मुझे यह बताओ, बड़े होकर ऐसा क्या करोगे, जो तुमने अभी तक नहीं किया...?
टूटू- (फिर शरमाते हुए)-जी शादी...

पाउडर!

सेल्समैन (मीठू से)- सर, कॉकरोच के लिए पाउडर खरीदोगे क्या?
मीठू (सेल्समैन से)- नहीं, नहीं! हम कॉकरोच को इतना लाड़- प्यार नहीं करते। आज पाउडर देंगे तो कल परफ्यूम मांगेंगे।

पिछले दिनों

दुनिया की तीसरी सबसे छोटी बच्ची
जन्म लेने वाले दुनिया के सबसे छोटे बच्चों में से एक बच्ची जिसका जन्म लॉस ऐंजिलिस में 30 अगस्त को हुआ था को पिछले दिनों अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है। उसने करीब पांच माह इन्क्यूबेटर में गुजारे हैं। गुलाबी कपड़ों में लिपटी बच्ची का नाम मेलिंडा स्टार गुइडो है। जिस समय बच्ची पैदा हुई, तब वह महज 269 ग्राम की थी। उसका साइज एक बड़े चूहे के बराबर था। डॉक्टरों ने आशंका जताई कि वो ज्यादा दिन नहीं बचेगी, लेकिन फिर भी डॉक्टरों ने हार नहीं मानी। हथेली पर समा जाने वाली इस बच्ची को पांच महीने तक इंक्यूबेटर में रखा गया। लंबे इलाज के बाद इस नन्ही परी के स्वास्थ्य में काफी सुधार आया और वो भी सामान्य बच्चों की तरह हाथ पैर चलाने लगी। माना जा रहा है कि वह जीवित रहने वाली दुनिया की तीसरी और अमेरिका की दूसरी सबसे छोटी बच्ची है। उसकी मां ने कहा, 'मुझे बहुत खुशी है कि अंतत: हम उसे घर ले जा रहे हैं।'

पुरुष ने जन्म दिया एक बच्चे को

ब्रिटेन में पहली बार एक पुरुष ने बच्चे को जन्म दिया है। दरअसल, इस पुरुष का जन्म एक महिला के रूप में हुआ था, लेकिन एक ऑपरेशन कर उसने अपना लिंग बदलवा लिया था। लिंग बदलवाते वक्त उसने अपना गर्भाशय नहीं निकलवाया था। बच्चे को जन्म देने के लिए उसने अपनी हारमोन चिकित्सा करवाकर अपने गर्भाशय को फिर से सक्रिय किया।
पुरुष की उम्र 30 वर्ष से अधिक है। उसने पिछले साल ही बच्चे को जन्म दिया था, लेकिन इसे हाल में सार्वजनिक किया गया। बीटी अपनी पत्नी नैंसी के साथ एरीजोना में रहता है। इस दम्पत्ति ने अज्ञात दानकर्ता के वीर्य का उपयोग किया था।
ऐसा करने वाला वह ब्रिटेन का पहला पुरुष है, लेकिन अमेरिका में एक 38 वर्षीय पुरुष 2007 में गर्भवती हुआ और तीन बच्चों सुसान, ऑस्टिन तथा जेंसन को जन्म दिया।


माफ करना सीखें

- डॉ. सृष्टि सिसोदिया
माफ करना सीखें। वैसे ये तो सजा देने से भी कड़ा व कठिन काम है, लेकिन यह हमें खुद को तथा वातावरण को हल्का रखने के लिए संजीवनी बूटी का काम करती है।
किसी अपने की बुरी लगी पुरानी बातों व गलतियों को माफ कर नजरअंदाज करना ही उचित है। यदि हम इसे अपनी आदत में शुमार कर लें तो मन से कड़वाहट तो दूर हो जाती है साथ ही हम अपने आप से परेशान नहीं होते और सामने वाले की अप्रस्न्नता भी दूर हो जाती है। अगर हम ऐसा नहीं कर पाते तो इसका सीधा असर हमारे दिल व दिमाग पर होता है।
देने और माफ करने का ही दूसरा नाम ही जिंदगी है। आप देते और माफ सिर्फ इसलिए नहीं करते कि यह सही है, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि इससे आप अच्छा महसूस करते हैं। किसी को माफ न करने पर आपका मन भी तो अशांत रहता है।
माफी मांग कर जहां हम खुद का बोझ उतारते हैं, वहीं किसी को माफ करके दोनों का मन निर्मल करते हैं। छोटी-छोटी बातों के लिए मन में बैर क्यों रखें? इंसान को गलतियों से सीखकर, प्रायश्चित कर खुद को भी माफ करना आना चाहिए। अनावश्यक आत्मग्लानि में जलते रहना समझदारी नहीं है। इसपर आप भी सोचिए और माफ करना सीखिए।