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Nov 10, 2011

टूटे पाँव की पहाड़ी परीक्षा और माता कौशल्या

- डॉ. परदेशीराम वर्मा
युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने लिखा है ...
'दृष्टि के अनुरूप सृष्टि बनती है।' यह सूत्र कथन है। समय- समय पर ऐसे सूत्रों को समझने की प्रेरणा मिलती है। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के लिए लंबे समय तक संघर्ष करने वाले संत पवन दीवान इन दिनों माता कौशल्या के नाम पर नवनिर्मित मंत्रालय भवन का नाम हो इस उद्देश्य के लिए अपने संचित पुण्य और अनुभव को समर्पित कर रहे हैं।
विगत छ: माह में मुझे उनके साथ भिन्न- भिन्न व्यक्तियों के पास जाने का अवसर मिला है। छत्तीसगढ़ भी अन्य प्रांतों की तरह किसी एक विराट व्यक्तित्व, विशिष्ट चरित्र नायक, देव- देवी, युगावतार, आलोक पुंज से जुड़कर अपनी पहचान बनाए यह उनकी सदिच्छा है।
छत्तीसगढ़ की बेटी, भगवान श्रीराम की माता कौशल्या ही ऐसी विराट सर्वपूजित व्यक्तित्व हो सकती हैं जिनकी स्मृति से जुड़कर यह छत्तीसगढ़ अपनी विशिष्ट पहचान बनाकर उभरेगा यह वे मानते हैं। इस उद्देश्य को सामने रखकर वे राजनेता, साहित्यकार, कलाकार, साधु- सन्यासी, महामण्डलेश्वर और शंकराचार्य जी से मिलते चल रहे हैं। सबने उनसे सहमति जताते हुए इस पवित्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना समर्थन सहर्ष दिया है। वे चाहते थे कि इसी उद्देश्य के लिए गायत्री तीर्थ, हरिद्वार की यात्रा कर डॉ. प्रणव पण्ड्या जी से मिलकर आग्रह किया जाए। उत्तरांचल में संत पवन दीवान के अनेक गुरुभाईयों के अपने आश्रम भी हैं।
उनके आदेश पर मैं जाना तो चाहता था मगर यात्रा को केवल तीर्थ यात्री के रूप न लेकर पर्यटक के रूप में सपरिवार देवभूमि की ओर प्रस्थान करना चाहता था। यात्रा लंबी, पांव टूटा हुआ और देव हैं पहाड़ों पर, ऐसे में परिवार के लोग साथ हों तो सम्बल बना रहेगा, यह मैंने सोचा।
मैं ऐसे समय में शांतिकुंज जाने के लिए निकला जब नैतिक क्रांति, बौद्धिक क्रांति और सामाजिक क्रांति के लिए प्रसिद्ध होकर समग्र जीवन होम कर देने वाले पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जन्म शताब्दी वर्ष की गहमागहमी चरम पर है। लगभग 40 वर्षों से मैं उनके अभियान से जुड़े संकल्पित लोगों को करीब से देख और समझ रहा हूं। छत्तीसगढ़ में पं. श्रीराम शर्मा आचार्य कई बार आए। वे मेरे गांव लिमतरा के पास स्थित छोटे से गांव कंडरका में भी अपनी सुपुत्री श्रीमती शैलबाला जी के साथ पधारे थे। सामुदायिक विकास विभाग में मेरे प्रमुख रहे स्व. रामानुज शर्मा गायत्री परिवार से जुड़े थे। गायत्री परिवार में जीवन अर्पित करने वाले इंजीनियर श्री कालीचरण जी मेरे ही गांव के पास स्थित नरधा के निवासी हैं। श्री कालीचरण आज इस आंदोलन के प्रमुख व्यक्तियों में से एक हैं।
गायत्री परिवार के समर्पित परिजनों से चारों ओर घिरे रहकर भी मैं कभी मथुरा या हरिद्वार जाकर शांतिकुंज घूम आऊं यह उत्सुकता नहीं हुई। लेकिन जाने किस प्रेरणा से 13 अक्टूबर 2011 को सपरिवार मैं हरिद्वार के लिए निकल पड़ा।
मैं 13 को निकला 14 को संध्या छत्तीसगढ़ के युवक राजू केसरवानी शांतिकुंज का वाहन लेकर स्टेशन आए। छत्तीसगढ़ रायपुर के हड्डी रोग विशेषज्ञ गायत्री अस्पताल के प्रमुख डॉ. अरुण मढ़रिया ने यह वाहन शांतिकुंज को अपनी ओर से भेंट की है। हमारे ठहरने का प्रबंध भी डॉ. मढ़रिया के सौजन्य से शांतिकुंज के सुविधाजनक कमरों में हो गया।
मैं दर्शनार्थी या पर्यटक की उत्सुकता लेकर वहां गया लेकिन जब लौटा तो एक बैचेनी लेकर लौटा। इस अभियान से सूत्रधार को बहुत करीब से जानने वाले लोगों से घिरा रहकर भी मैं कभी इस ओर आकृष्ट नहीं हुआ लेकिन शांतिकुंज पहुंच कर एक गहरी जिज्ञासा से भर उठा। मुझे लगा कि इस अभियान को और युग निर्माण की परिकल्पना से जुड़े समस्त सूत्रधारों की जीवनचर्या को महत्व न देकर मैंने बहुत कुछ खो दिया है।
दूसरे ही दिन मुझे श्रीराम सहाय शुक्ल जी की कृपा से पं. श्रीराम शर्मा के जामाता विद्वान दार्शनिक डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं उनकी सुपुत्री श्रीमती शैलबाला से मिलकर आशीर्वाद लेने का अवसर मिला। छत्तीसगढ़ की बेटी भगवान श्रीराम की माता कौशल्या से संबंधित नामकरण अभियान से जुड़े प्रयत्न संबंधी कुछ प्रपत्र एवं साहित्य उन्हें भेंट करते हुए मैंने छत्तीसगढ़ के संत पवन दीवान जी का संदेश सुनाया। पण्ड्या जी ने उदारतापूर्वक समर्थन में पत्र लिखते हुए आशीष दिया। संत पवन दीवान माता भगवती देवी की रसोई में उनके हाथों से भोजन प्राप्त कर चुके हैं। शांतिकुंज में उनका प्रेरणास्पद प्रवचन भी होता रहा है।
मेरे गांव के नामी सपूत डॉ. लाखेश मढ़रिया भी गायत्री परिवार के निष्ठावान साधक हैं। यश के शिखर की ओर बढ़ रहे डॉ. लाखेश आज भी मिशन के कामों में हाथ बंटाते हैं।
शांतिकुंज में छत्तीसगढ़ पूरी तरह प्रभावी नजर आया। मुझे गर्व हुआ कि शांतिकुंज के साधकों, सेवकों, समयदानियों, जीवनदानियों में छत्तीसगढ़ अग्रगण्य है। संत पवन दीवान के गुरुभाई पूर्व केंद्रीय गृहराज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानंद जी का परमार्थ आश्रम भी हरिद्वार में है। हम वहां भी गए। ऋषिकेश में दीवान जी के गुरुभाई मुनीजी महाराज श्री चिदानंद जी का आश्रम ठीक गंगा जी के किनारे हैं। वहां गंगा जी में बोटिंग करते हुए हम पहुंचे।
मुनि जी के नेतृत्व में भव्य गंगा आरती हुई। विदेशी पर्यटक टूट पड़ते हैं इस अवसर पर। वे आरती गाकर नाचते भी हैं। वह अद्भूत दृश्य था। मुनिजी से भी भेंट हुई। उनका आशीष मिला। फिर हम देहरादून में डी.एस.पी. के रूप में पदस्थ छत्तीसगढ़ की बिटिया श्रीमती श्वेता मिश्रा के सुझाव पर मसूरी भी घूमने गए। मसूरी पहुंचते ही मैं प्रख्यात अंग्रेज मूल के भारतीय लेखन रश्किन बांड से मिलने निकल पड़ा। पर अफसोस वे यात्रा पर थे। हम 19 को वापस लौटे।
देवभूमि, उत्तराखंड और झारखंड तो अपनी पहचान रखते हैं। वे खंड- खंड नहीं बल्कि पहचान की दृष्टि से अखंड हैं मगर गढ़विहीन छत्तीसगढ़ कई खंड़ों में बंटा है। यहां छत्तीसगढ़ की अस्मिता की बात करने वाला संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। क्षेत्रीयतावादी और संकीर्ण माना जाता है। जबकि इसी के साथ जन्में उत्तराखंड एवं झारखंड अपनी विशिष्ट पहचान के लिए काम करने वालों पर न्यौछावर होते हैं।
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री निशंक जी कथाकार हैं और वर्तमान मुख्यमंत्री खंडूरी जी सेना के पूर्व अधिकारी हैं। इस तरह दोनों से ही मैं जुड़ाव महसूस करता हूं। उनसे मिलना भी तय था मगर व्यवस्तता के कारण मुलाकात न हो सकी। संत पवन दीवान से प्राप्त दिशा- निर्देश लेकर मैं माता कौशल्या के नामकरण के संदर्भ में भिन्न- भिन्न महत्वपूर्ण लोगों से मिलने निकला था।
यह पूरी यात्रा कई कई उद्देश्यों को स्पर्श करती रही। शांतिकुंज की विराट व्यवस्था देखकर युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा जी के देवोपम तपस्वी व्यक्तित्व के प्रति अगाध जिज्ञासा जग उठती है। वहां जाकर ही मैं समझ पाया कि क्यों लोग पारिव्राजक बनकर पीला झोला लटकाये, पीला कुर्ता एवं उसी रंग की धोती पहने घूमते रहते हैं।
वेदपाठी, कर्मकांडी, विद्वान, संस्कृत के आचार्य के घर जन्मे पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने लिखा है कि वे प्रतिदिन 4 घंटे लिखते हैं। पूरी पत्रिका ही वे अकेले निकालते रहे। उनका साहित्य विपुल है। उन्होंने हिमालय में लगातार तपस्या की। मथुरा के जिस किराए के घर में 15 रुपया महीने पर वे रहे वहां प्रेतों का डेरा था। पैतृक संपत्ति बेचकर उन्होंने हरिद्वार में शांतिकुंज के लिए जमीन ली। एक पूरा प्रज्ञापूर्ण संसार का सृजन उन्होंने अपने दम पर किया। आज वे भगवान की तरह पूजे जा रहे हैं लेकिन उनका संघर्षपूर्ण जीवन यह संदेश देता है कि...
'यूं ही शोहरत की बुलंदी नहीं मिलती साजिद,
पहले कुछ खोइये इस दौर में पाने के लिए'
चप्पे- चप्पे पर उनके चरण चिन्ह वहां अंकित हैं। उन्होंने वहां शांतिवन और विश्वविद्यालय भी स्थापित किया। चिकित्सालय और समृद्ध पुस्तकालय तो देश भर में चर्चित हैं। पत्रिकाएं भी लाखों की संख्या में निकलती हैं। कमाल यह है कि पत्रिकाओं में एक भी विज्ञापन नहीं होता। विज्ञापन के युग में खुद को विज्ञापित न करते हुए पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के आख्यानों में आए ऋषियों की कथा को और चमत्कारों को सच मानने पर मजबूर कर दिया है। लगता है कि अगस्त्य ने जरूर समुद्र को अंजूरी में भर कर पी लिया होगा। इस पंक्ति की सार्थकता को भी महसूस किया...
'राम से बढ़कर राम कर दासा।'
घूमते हुए पहाड़ के संबंध में कवि की पंक्तियां याद आती रहीं... 'सब मैदानों में ही इतराते हैं, पहाड़ पर आदमी तो आदमी, पेड़ भी सीधे हो जाते हैं।'
18 अक्टूबर को प्रात: 6 बजे राजू ने पुन: हरिद्वार रेलवे स्टेशन तक हम सबको पहुंचाया। राजू एवं अन्य आत्मीयजनों से मिलकर यह नहीं लगा कि मैं छत्तीसगढ़ से दूर हूं। हंसते- हसंाते ही 19 अक्टूबर को हमारी वापसी हुई।

संपर्क- एल आई जी-18, आमदीनगर, हुडको, भिलाई मो. 9827993494

उपहार में एक टन संतरे


बच्चे के जन्म पर उपहार देने की परंपरा तो सदियों पुरानी है। लेकिन दक्षिण अफ्रीका के 'साइट्रस ग्रोवर्स एसोसिएशन' ने इस परंपरा को एक अनूठे अंदाज में निभाया। इस एसोसिएशन ने दुनिया के सात अरबवें के रूप में जन्मे प्योत्र निकोलायेव की मां को उपहार स्वरूप एक टन संतरे का टोकन भेंट किया।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) और रूस के राज्य सांख्यिकी संघीय सेवा ने 31 अक्टूबर, 2011 को पैदा हुए इस बच्चे को सांकेतिक रूप से दुनिया के सात अरबवें इंसान के रूप में सम्मानित करने का फैसला लिया, हालांकि इस बारे में ठीक- ठीक तय करना असंभव है। क्योंकि इस मामले में सभी देश की अपनी अलग अलग राय है।
एसोसिएशन के प्रतिनिधि इरिना मर्केल कलिनिनग्राद के उस अस्पताल में पहुंचे, जहां बच्चे का जन्म हुआ और उन्होंने उसकी मां 36 वर्षीया येलेना निकोलायेवा को प्रमाण- पत्र, फूल तथा संतरे के लिए टोकन भेंट किया। निकोलायेवा दंपत्ति कलिनिनग्राद में एसोसिएशन के किसी भी स्टोर से संतरे ले सकते हैं। प्योत्र अपने माता- पिता की तीसरी संतान है।

ममता की मसीहा

पडरौना नगर के समीप स्थित परसौनी कला की 60 वर्षीय श्रीमती शीरीन यशोदा मइया इसीलिए कहलाती हैं क्योंकि वे 23 बच्चों की मां हैं। चार अपने और 19 उनके जिनके माता- पिता लोक- लाज के भय से उन्हें सड़कों पर फेंक गए या अस्पतालों में छोड़ गए। पिछने महीने ही चार दिन की एक नन्ही मासूम का आगमन 19वें बच्चे के रूप में उनकी बगिया में हुआ है।
करीब डेढ़ दशक पहले श्रीमती शीरीन ने यतीम मासूमों की सेवा के लिए शिक्षिका की नौकरी को ठुकरा दिया। ममता की यह मूरत अपने भरे- पूरे परिवार के साथ बीते 11 वर्षो से यतीम मासूमों की नि:स्वार्थ सेवा कर रही हैं। उनके आंगन में इस समय महिमा, एंजल, छाया, कोमल, अनुप्रिया, शारून, विनीता, आशा, जूही, अनीता, मेनका, विशाल, विश्वास, संतोष, वैभव व गैवरियल जैसे 18 बच्चों की किलकारी गूंज रही है। शीरीन के पति रमन सिंह उनके इस काम में उनका भरपूर सहयोग करते हैं। उनकी अपनी चार संतानों में एक पुत्री है, जिसका विवाह हो चुका है तथा दो बेटे बाहर रहते हैं।

दुनिया का कूड़ाघर बनता भारत

- नरेन्द्र देवांगन

विकसित देश भारत को जिस तरह अपना कूड़ाघर बनाने का प्रयास कर रहे हैं उससे इसकी छवि दुनिया में सबसे बड़े कबाड़ी के रूप में भी उभर रही है। इसे रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है, तो इसकी वजह यह है कि इस समस्या के प्रति सरकारें उदासीन रही हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कोई बड़ी समस्या नहीं है।
गुजरात के अलंग तट पर विश्व का सबसे बड़ा कबाडख़ाना है। फ्रांस के विमानवाही पोत क्लिमेंचू को यहां पहियों पर चढ़ाकर गोदी तक लाया जाना था जहां गैस कटर से लैस सैकड़ों मजदूर इसके टुकड़े- टुकड़े करते। लेकिन पर्यावरण समूह ग्रीनपीस ने यह चेतावनी दी थी कि इस युद्धक विमानवाही पोत में सैकड़ों टन एस्बेस्टस भरा पड़ा है, जो पर्यावरण के लिए घातक है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और इस जहाज को तट पर ही रोक दिया गया। बाद में फ्रांस के राष्ट्रपति ने जहाज को वापस अपने देश भेजने का आदेश दिया। इसी तरह एक अन्य विषैले निर्यात से भरे नार्वे के यात्री जहाज लेडी 2006 की तुड़ाई पर भी सुप्रीम कोर्ट ने राक लगा दी थी।
15 नवबंर 2009 को कोटा (राजस्थान) के कबाड़ में एक बहुत भीषण विस्फोट हुआ जिसमें तीन व्यक्ति मारे गए व अनेक घायल हुए। आसपास की इमारतें भी क्षतिग्रस्त हुर्इं। यह विस्फोस्ट कबाड़ में से धातु निकालने के प्रयास के दौरान हुआ। यह हादसा इकलौता हादसा नहीं था। कबाड़ में विस्फोट की अनेक वारदातें हाल में हो चुकी हैं।
पश्चिम के औद्योगिक देशों के सामने अपने औद्योगिक कचरे के निपटान की समस्या बहुत भयानक है। इसलिए पहले वे अपना कचरा जमा करते हैं फिर उस कचरे को किसी कल्याणकारी योजना के साथ जोड़कर रीसाइक्लिंग प्रौद्योगिकी सहित किसी गरीब या विकासशील देश को बतौर मदद पेश कर देते हैं या बेहद सस्ते दामों पर उसे बेच देते हैं।
इराक युद्ध के समय यहां अमरीकी सेना ने बहुत भीषण बमबारी की थी जिसमें बहुत विनाश हुआ था। उसके बाद की घरेलू हिंसा और हमलों से भी बहुत विनाश हुआ। इस विनाश का मलबा बहुत सस्ती कीमत पर उपलब्ध होने लगा और व्यापारी इसे भारत जैसे देशों में पहुंचाने लगे क्योंकि यहां इसकी प्रोसेसिंग लुहार या छोटी इकाइयां सस्ते में कर देती हैं। पर उन्हें यह नहीं बताया जाता है कि युद्ध के समय के ऐसे विस्फोटक भी इस मलबे में छिपे हो सकते हैं और कभी भी फट सकते हैं। इन विस्फोटकों की उपस्थिति के कारण ही हाल के वर्षों में कबाड़ के कार्य व विशेषकर लोहे के कबाड़ को गलाने के कार्य में बहुत- सी दुर्घटनाएं हो रही हैं।
अब तो कबाड़ के नाम पर रॉकेट और मिसाइलें भी देश में आने लगी हैं। इससे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक नया खतरा पैदा हो गया है। यह हैरत की बात है कि ईरान से लोड होने के बाद भारत के कई राज्यों से गुजरने, दिल्ली पहुंचने और फिर साहिबाबाद स्थित भूषण स्टील फैक्टरी में विस्फोट होने तक किसी ने ट्रकों में भरे कबाड़ की जांच करने की जहमत नहीं उठाई। दिल्ली में तुगलकाबाद स्थित जिस कंटेनर डिपो में ये ट्रक पहुंचे थे, वह खुद 1991, 1993 और 2002 के कबाड़ में आई ऐसी विस्फोटक सामग्री की मार झेल चुका है। तब भी यह सामग्री पश्चिम एशिया से आई थी और हर बार वहीं से माल लाया जा रहा है। कस्टम विभाग द्वारा बिना जांच के आयातित सामग्री को स्वीकार करने का चलन इसमें सहायक की भूमिका निभा रहा है।
भारत दुनिया का सबसे पसंदीदा डंपिंग ग्राउंड (कबाडग़ाह) है। हम सस्ते मलबे के सबसे बड़े आयातक हैं। प्लास्टिक, लोहा या अन्य धातुओं का कबाड़, ल्यूब्रिकेंट के तौर पर अनेक अन्य धातुओं का कबाड़, ल्यूब्रिकेंट के तौर पर अनेक रासायनिक द्रव और अनेक जहरीले रसायन, पुरानी बैटरियां और मशीनें हमारी चालू पसंदीदा खरीदारी सूची में हैं। जब इन्हें इस्तेमाल के लिए दोबारा गलाया जाता है तो इससे निकलने वाला प्रदूषण न केवल यहां की हवा बल्कि मिट्टी और पानी तक में जहर घोल देता है। उस मिट्टी में उपजा हुआ अनाज दूसरी- तीसरी पीढ़ी में आनुवंशिक समस्याएं पैदा कर सकता है। लेकिन इतनी दूर तक जांच- परख करने की सतर्कता भारत सरकार में नहीं है।
बढ़ते ई- कचरे ने पर्यावरणविदों के कान खड़े कर दिए हैं। यह कबाड़ लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा है। देश में अनुपयोगी और चलन से बाहर हो रहे खराब कम्प्यूटर व अन्य उपकरणों के कबाड़ से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। कबाड़ी इस कचरे को खरीदकर बड़े कबाडिय़ों को बेच देते हैं। वे इसे बड़े-बड़े गोदामों में भर देते हैं। इस प्रकार जगह- जगह से एकत्र किए गए आउटडेटेड कम्प्यूटर आदि कबाड़ बड़ी संख्या में गोदामों में जमा हो जाते हैं। इसके अलावा विदेशों से भी भारत में भारी मात्रा में कभी दान के रूप में तो कभी कबाड़ के रूप में बेकार कम्प्यूटर आयात किए जा रहे हैं। यह ई-कचरा प्राय: गैर कानूनी ढंग से मंगाया जाता है। आसानी से धन कमाने के फेर में ऐसा किया जाता है। कम्प्यूटर व्यवसाय से जुड़े लोगों का मानना है कि हमें अपने देश में बेकार हो रहे कम्प्यूटर की अपेक्षा विदेशों से आ रहे ढेरों कम्प्यूटरों से अधिक खतरा है।
भारत की राजधानी दिल्ली में ही ऐसे कबाड़ को कई स्थानों पर जलाया जाता है और इससे सोना, प्लेटिनम जैसी काफी मूल्यवान धातुएं प्राप्त की जाती हैं हालांकि सोने और प्लेटिनम का इस्तेमाल कम्प्यूटर निर्माण में काफी कम मात्रा में किया जाता है। इस ई- कचरे को जलाने के दौरान मर्करी, लेड, कैडमियम, ब्रोमीन, क्रोमियम आदि अनेक कैंसरकारी रासायनिक अवयव वातावरण में मुक्त होते हैं। ये पदार्थ स्वास्थ्य के लिए अनेक दृष्टियों से घातक होते हैं। साथ ही पर्यावरण के लिए खतरनाक होते हैं। कम्प्यूटर व अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में प्रयुक्त होने वाला प्लास्टिक अपनी उच्च गुणवत्ता के चलते जमीन में वर्षों यूं ही पड़ा रहता है और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाता है।
आयातित कचरे के प्रबंधन के बारे में गठित उच्चाधिकार प्राप्त प्रो. मेनन समिति ने ऐसे जहरीले कचरे के आयात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी। इस समिति का गठन भी सरकार ने अपने आप नहीं किया था बल्कि एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में अंतराष्ट्रीय बेसल कन्वेंशन में सूचीबद्ध कचरों का भारत में प्रवेश प्रतिबंधित किया था। इसके बाद सरकार ने खतरनाक कचरे के प्रबंधन के अलग- अलग पहलुओं की जांच करने के लिए मेनन समिति का गठन किया था। मेनन समिति ने न सिर्फ कई कचरों के आयात पर रोक लगाने की सिफारिश की थी बल्कि जो औद्योगिक कचरा देश में है उसके भंडारण और निपटान के बारे में भी कई महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए। लेकिन सरकार ने मात्र 11 वस्तुओं का आयात ही प्रतिबंधित किया, बाकी 19 वस्तुओं को विचारार्थ छोड़ दिया गया। यह उदासीनता तो आयातित कचरे से निकलने वाले जहर से भी खतरनाक है।
इराक युद्ध में अमरीका ने जो बमबारी की थी, उसमें क्षरित युरेनियम का भी उपयोग हुआ था। इस बात को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अब सामान्यत: स्वीकार किया जाता है कि पूरे विश्व में क्षरित युरेनियम युक्त हथियारों का सबसे अधिक उपयोग अभी तक इराक में ही हुआ है। क्षरित युरेनियम वाले बमों से क्षतिग्रस्त टैंक के मलबे में भी क्षरित युरेनियम के अवशेष होते हैं। यदि हमारे देश में बड़े पैमाने पर इस मलबे का आयात होगा तो क्षरित युरेनियम से युक्त धातु हमारे देश में दूर- दूर तक इसके खतरे से अनभिज्ञ लोगों के पास पहुंच जाएगी और वे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हो सकते हैं।
जाहिर है विकसित देश भारत को जिस तरह अपना कूड़ाघर बनाने का प्रयास कर रहे हैं उससे इसकी छवि दुनिया में सबसे बड़े कबाड़ी के रूप में भी उभर रही है। इसे रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है, तो इसकी वजह यह है कि इस समस्या के प्रति सरकारें उदासीन रही हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। यह सरकारी नजरिया है, जो आयातित कचरे के खतरे को बहुत मामूली करके आंकता है। (स्रोत फीचर्स)

लघुकथाएँ

- डॉ. शील कौशिक
अमंगल
जनवरी की ठिठुरती ठंड में दो दिन से रुक- रुक कर कुत्ते के रोने की आवाज सुनाई पड़ रही थी। जिस घर के दर के पास जाकर कुत्ता रोने लगता, घर का मालिक डंडा दिखाकर उसे वहाँ से भगा देता। कुत्ते का रोना पूरी गली में चर्चा का विषय बन गया था।
एक ने कहा, 'कुत्ते का रोना अशुभ संकेत है। बाईस नंबर वालों के यहाँ रामेश्वर जी बीमार हैं, कहीं?'
दूसरे ने पहले की बात का समर्थन करते हुए कहा, 'सुना है कुत्ते को यम के दूत दिखाई दे जाते हैं। राम भला करे!'
तीसरे ने कहा, 'कल गली के नुक्कड़ पर कार और स्कूटर का एक्सीडेंट हुआ था। स्कूटर वाले लड़के को बहुत चोट लगी थी। भगवान उसकी रक्षा करे!'
चौथा कहाँ चुप रहने वाला था, तुरंत बोला, 'लगता है किसी आदमी की आत्मा इसमें प्रवेश कर गई है। तभी तो यह आदमी की तरह रो रहा है।'
पाँचवाँ जो चुपचाप सबकी बातें सुन रहा था, क्षोभ से भरकर बोला, 'वह कुत्ता अब मेरे घर में है। उसके पाँव में काँच का टुकड़ा गड़ा हुआ था, जिससे उसे बहुत कष्ट हो रहा था। किसी ने भी उसके दर्द को समझने की कोशिश नहीं की। सभी उसके रोने को अपशकुन समझ कर उसे भगाते रहे।'

बीस जोड़ी आँखें

'रीमा, तुम्हारी सहेली पूजा का फोन था। आज उनके यहाँ किटी-पार्टी है। तुम जरूर जाना। थोड़ा माहौल बदलेगा तो मूड ठीक हो जाएगा।' सुकेश ने ऑफिस जाते हुए पत्नी से कहा।
पिछले दिनों हृदयगति रुक जाने से रीमा के पिता जी का देहांत हो गया था। बहुत समझाने के बावजूद भी वह इस सदमे से उबर नहीं पा रही थी।
जैसे ही रीमा किटी पार्टी में पहुँची, बीस जोड़ी आँखें उसे घूरने लगीं। वहाँ आई औरतों के बीच खुसुर- फुसुर होने लगी। कुछ वाक्य रीमा के कानों में पिघले शीशे की तरह पड़े।
'ऐसी भी क्या जल्दी थी किटी में आने की। बाप को मरे सवा महीना भी नहीं हुआ।'
'देख तो, माथे पर बिंदिया सजा कर आई है!'
'हमें तो इसके यहाँ शोक प्रकट करने जाना था। अब कैसा शोक? यह महारानी तो यहाँ ही आई हुई है।'
'चलो अच्छा है, हम सहानुभूति के दो शब्द कहकर औपचारिकता यहीं पूरी कर लेते हैं। इतनी दूर इनके घर कहाँ जाएँगे।'
एक के बाद एक संवाद रीमा के कानों तक पहुँच रहे थे। उसकी डबडबाई आँखें वहाँ सच्ची सहानुभूति खोज रही थीं।

मिसाल

'रामदीन, एक साथ बीस हजार रुपए निकलवा रहे हो, क्या करोगे? बैंक कर्मी ने पैसे निकलवाने आए चपरासी से पूछा।
'बहुत दिनों से मन में इच्छा थी, स्कूल में वाटर- कूलर लगवाना है।'
'स्कूल में वाटर- कूलर! क्यों? अब तुम रिटायर हो गए हो। तुम्हारे अकाऊंट में बस पचास हजार रुपये ही जमा हैं। कभी भी हारी- बीमारी में जरूरत पड़ सकती है।' बैंक कर्मी ने पड़ोसी होने के नाते उसे समझाया।
'हाँ सब जानता हूँ। इतने साल स्कूल में नौकरी की है। प्रिंसिपल और अध्यापकों के लिए आधा किलोमीटर दूर अस्पताल में लगे वाटर- कूलर से फील्टर का ठंडा पानी लाता रहा। बच्चे बेचारे काई लगी पुरानी टंकी से गर्म पानी पीते हैं। मैंने मन में ठान रखा था कि रिटायरमेंट पर जो पैसै मिलेंगे, उससे स्कूल में बच्चों के लिए वाटर- कूलर जरूर लगवाना है।' रामदीन का चेहरा दमक रहा था।

हवा के विरुद्ध

अरोड़ा दंपति चाय पीते हुए सोच रहे थे 'लगता है अपने डॉक्टर बेटा- बहू भी विदेश में या फिर किसी बड़े शहर में सैटल होंगे। भला हमारे पास इस छोटे- से शहर में आकर क्या करेंगे?'
तभी मोबाइल फोन की घंटी बजी। फोन डॉक्टर बेटे का ही था। उसने कहा, 'हमारी एमडी की पढ़ाई पूरी हो गई है। हम शीघ्र ही आपके पास वापस आ रहे हैं। वहीं अपना क्लिनिक खोलेंगे।'
पति- पत्नी अवाक एक- दूसरे को ऐसे देख रहे थे, जैसे उन्हें सुनी हुई बात पर विश्वास ही न हो रहा हो।
सो इस बार श्रीमती अरोड़ा ने बेटे का मन टटोला, 'बेटा, हमारी तरफ से कोई बंधन न समझना, कल कहीं तुम्हारे दिमाग में यह बात आए कि बड़े बेटे को तो अमेरिका में पढ़ा कर वहीं सैटल कर दिया और हमें यहाँ।'
'कैसी बात कर रही हो माँ? हम ऐसा कुछ नहीं सोच रहे। हमने आपसे और अपने शहर की मिट्टी से जो कुछ पाया है, अब उसे लौटाने की बारी है माँ।' बेटे ने दृढ़ता से कहा।
'देखो बेटा, ये जिंदगी भर का सवाल है। तुम्हारे बच्चे होंगे तो उन्हें पढऩे के लिए बाहर भेजना पड़ेगा। यहाँ अच्छे स्कूल कहाँ हैं? एक बार फिर से सोच लो बेटा।' इस बार अरोड़ा साहब बेटे को समझा रहे थे।
'पापा! हमने अच्छी तरह सोच समझ कर ही फैसला किया है।' बेटे ने उत्तर दिया।
फोन एक बार फिर माँ के हाथ में था, 'बेटा'
'माँ जी! लगता है आप नहीं चाहते कि हम आपके पास आकर रहें।' इस बार फोन पर बहू ने कहा।
'नहीं- नहीं, बेटे! तुम लोग जरूर आओ। तुम यहाँ रहोगे तो हमें बहुत खुशी होगी।' श्रीमती अरोड़ा की आँखों में आँसू छलक आए।

संपर्क- मेजर हाउस-17, सैक्टर-20, हुड्डा, सिरसा (हरियाणा)-125055 मो. 9416847107

वाह भई वाह

भाषा

टूटू: मिटू तुम कौन- कौन सी भाषाएं बोल और लिख सकते हो?
मिटू: मैं चार भाषाएं अच्छी तरह बोल और लिख सकता हूं।
टूटू: अच्छा कौन- कौन सी।
मिटू: हिंदी, देवनागरी, हिंदुस्तानी और राष्ट्रभाषा।

निबंध

टीचर ने सभी बच्चों से क्रिकेट मैच पर निबंध
लिखने को कहा।
सभी छात्राएं अपनी- अपनी कॉपी लेकर निबंध
लिखने में जुट गई।
मगर नीता चुपचाप बैठी थी।
टीचर ने उसकी कॉपी देखी तो उस पर सिर्फ एक लाइन
लिखी थी।
बारिश की वजह से मैच स्थगित कर दिया गया है।

चीनी

टूटू: एक राहगीर को बड़ी देर से देखने के
बाद- अंकल बुरा मत मानिएगा क्या
आप चीनी हैं
राहगीर ने कहा: नहीं मैं भारतीय हूं।
टूटू चला गया।
थोड़ी देर बाद टूटू लौटकर फिर आया
और पूछा: अंकल क्या आप चीनी हैं?
राहगीर गुस्से से: मैं भारतीय हूँ
टूटू फिर चला गया।
कुछ देर बात फिर आया
और पूछा: अंकल आप चीनी हो?
राहगीर भड़क उठा: हां
हां मैं चीनी हूं।
अब बोलो
टूटू: पर चीनी लगते तो
नहीं अंकल...।