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Nov 10, 2011

नये युग में नया छत्तीसगढ़

- स्वराज्य कुमार

प्रदेश में लगभग 32 लाख कार्ड धारक गरीबी रेखा श्रेणी के हैं, जिन्हें केवल 1 और 2 रूपए किलो में हर महीने 35 किलो चावल और नि:शुल्क 2 किलो नमक नियमित रूप से मिल रहा है। स्वस्थ, समृद्ध और खुशहाल छत्तीसगढ़ निर्माण के चौतरफा प्रयासों की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में राज्य के गांवों में भारत माता वाहिनियों का गठन भी किया जा रहा है।

भारत के 26 वें राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ इस वर्ष एक नवम्बर को अपनी स्थापना के ग्यारह साल पूर्ण कर बारहवें साल में प्रवेश कर रहा है। नदियों, पहाड़ों, हरे- भरे जंगलों से परिपूर्ण अपने नैसर्गिक सौन्दर्य और अन्य अनेक बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर यह इलाका भारत की आजादी के पहले और आजादी के बाद भी कई दशकों तक अपनी मेहनतकश जनता के साथ विकास के नये युग में प्रवेश करने का सपना देख रहा था। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने यहां की जनभावनाओं के अनुरूप इसे अलग राज्य का दर्जा देने का वायदा निभाकर छत्तीसगढ़ के करोड़ों लोगों के पूर्वजों के सपनों को साकार कर दिया। शांति और सौहार्द्र के वातावरण में आम सहमति से छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण भारत के महान लोकतंत्र की एक महान उपलब्धि है। विकास की राह पर अपने सफर की शुरूआत करते हुए ग्यारहवां पड़ाव पार करने की इस अल्प अवधि में छत्तीसगढ़ की जनता ने प्रदेश की तरक्की के हर मोर्चे पर कामयाबी के कई परचम लहराए हैं। इनमें सबसे बड़ा परचम देश के नये राज्य के निवासी के रूप में आत्मविश्वास की भावना का है। यही कारण है कि विरासत में मिली नक्सल हिंसा और आतंक की गंभीर चुनौती के बावजूद इक्कीसवीं सदी का यह नया राज्य कदम- दर- कदम कामयाबी की नयी मंजिलों की ओर बढ़ता जा रहा है।
भरपूर पैदावार की वजह से धान के कटोरे के रूप में देश और दुनिया में प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ अब स्कूल शिक्षा, कॉलेज शिक्षा, तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में ज्ञान के विस्तृत होते महासागर के रूप में भी अपनी पहचान बना रहा है। गांवों से लेकर शहरों तक नये युग के इन ज्ञान केन्द्रों में प्रतिदिन हजारों की संख्या में बालक- बालिकाओं और युवाओं का स्कूली बस्तों और किताबों के साथ आना- जाना सचमुच काफी लुभावना लगता है। नई पीढ़ी की आंखों में तैरते सपनों के साथ एक उज्जवल भविष्य की चहल- पहल शिक्षा के इन नये मंदिरों में देखी जा रही है। राज्य में सरकारी क्षेत्र में विश्वविद्यालयों की संख्या सिर्फ एक दशक में चार से बढ़कर ग्यारह तक पहुंच गयी है। इनमें से छह विश्वविद्यालय तो अकेले डॉ. रमन सिंह की सरकार की देन हैं। उन्होंने स्वामी विवेकानन्द तकनीकी विश्वविद्यालय, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय और सुन्दर लाल शर्मा (ओपन) विश्वविद्यालय सहित आयुष एवं स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय तथा बस्तर और सरगुजा विश्वविद्यालयों की स्थापना के जरिए राज्य में उच्च शिक्षा और चिकित्सा शिक्षा के लिए एक नया वातावरण बनाया है। गो- वंश और पशुधन के समग्र विकास और इसके लिए अध्ययन- अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए राज्य में बहुत जल्द कामधेनु विश्वविद्यालय की स्थापना भी होने जा रही र्है। इसके लिए राज्य शासन की ओर से विधानसभा में प्रस्तुत विधेयक विचार- विमर्श के बाद पारित हो चुका है। राज्य में इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या 12 से बढ़कर 50, आई.टी.आई की संख्या 61 से बढ़कर 101, शासकीय कॉलेजों की संख्या 116 से बढ़कर 172, प्राथमिक शालाओं की संख्या 32 हजार से बढ़कर 37 हजार, मिडिल स्कूलों की संख्या सात हजार से बढ़कर 16 हजार, हाईस्कूलों की संख्या एक हजार 176 से बढ़कर दो हजार 208 और हायरसेकेण्ड्री स्कूलों की संख्या एक हजार 386 से बढ़कर दो हजार 635 हो गयी है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने वर्ष 2007 में दो नये जिलों- बीजापुर और नारायणपुर का गठन किया था, जबकि इस वर्ष 2011 में उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर नौ नये जिलों के निर्माण की घोषणा की है जिनमें बेमेतरा, बलौदाबाजार, बालोद, बलरामपुर, गरियाबंद, मुंगेली, सूरजपुर, कोण्डागांव और सुकमा शामिल हैं, जो उनकी घोषणा के अनुरूप जनवरी 2012 से अस्तित्व में जाएंगे और प्रदेश में जिलों की संख्या 18 से बढ़कर 27 हो जाएगी। आम जनता को विभिन्न प्रकार की सरकारी सेवाएं समय- सीमा में मिल सके, इसके लिए विधानसभा के मानसून सत्र 2011 में राज्य सरकार ने लोक सेवा गारंटी विधेयक प्रस्तुत किया, जो सर्वानुमति से पारित होने के बाद अब कानून बन चुका है। इन ग्यारह वर्षों में व्यापारिक और औद्योगिक विकास की गति भी छत्तीसगढ़ में लगातार तेज होती गयी है। इसके फलस्वरूप यह नया राज्य देश के प्रमुख व्यावसायिक और औद्योगिक केन्द्र के रूप में भी चिन्हांकित होने लगा है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना सहित विभिन्न योजनाओं में सड़कों, पुल- पुलियों के निर्माण में तेजी आई है। इसके फलस्वरूप राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में से अधिकांश में बारहमासी सड़क नेटवर्क विकसित हो चुका है। इससे यातायात और परिवहन सेवाओं में भी इजाफा हुआ है।
संचार क्रांति के इस नये दौर में छत्तीसगढ़ ने एक ऐसी छलांग लगाई है कि राजधानी रायपुर से प्रदेश के सभी 18 जिला मुख्यालयों और 146 विकासखण्ड मुख्यालयों के बीच शासन- प्रशासन के लिए अब वीडियो कॉन्फें्रसिंग के जरिए अधिकारियों से आमने- सामने बातचीत करना आसान हो गया है। सार्वजनिक कम्पनी भारत संचार निगम लिमिटेड सहित निजी क्षेत्र की अनेक नई कम्पनियों द्वारा राज्य की जनता को मोबाईल फोन की सुविधा दी जा रही है। इसके फलस्वरूप सरगुजा और बस्तर जैसे अनेक सुदूर इलाकों के अनेक गांवों तक, जहां पहले टेलीफोन एक सपना हुआ करता था, अब मोबाईल फोन के जरिए संचार सम्पर्क आसान हो गया है। राज्य सरकार के कुशल प्रबंधन के फलस्वरूप छत्तीसगढ़ बिजली कटौती की समस्या से मुक्त होकर जनवरी 2008 से लगातार देश का पहला विद्युत कटौती मुक्त राज्य बना हुआ है। उल्लेखनीय है कि अभी अक्टूबर 2011 में देश में कोयला उत्पादन वाले कुछ इलाकों में भारी बरसात और सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी कोल इंडिया के कर्मचारियों की दो दिवसीय हड़ताल तथा आंध्रप्रदेश में तेलांगना राज्य आन्दोलन के चलते कोयला खनन और आपूर्ति में रूकावट आई जिसके फलस्वरूप देश भर में एक ऐसा भी समय आया, जब बिजली संकट एकदम से गहरा गया था, लेकिन ऐसे नाजुक दौर में भी छत्तीसगढ़ ने अपनी घरेलू विद्युत आपूर्ति की स्थिति को संभाल लिया। हालांकि प्रदेश में इस दौरान राज्य सरकार के बिजली संयंत्रों में कुछ उपकरणों में तकनीकी खराबी के कारण थोड़े समय के लिए बिजली संकट उत्पन्न हो गया था, लेकिन विद्युत कम्पनी के कुशल इंजीनियरों और कामगारों की मेहनत के फलस्वरूप 13 अक्टूबर को यह संकट टल गया और 13-14 अक्टूबर की स्थिति में राज्य में मांग के अनुरूप 2400 से 2700 मेगावाट तक उत्पादन हो रहा था। आधुनिक युग में बिजली की खपत का बढऩा किसी भी देश या राज्य की प्रगति का सूचक होता है। राज्य निर्माण के बाद छत्तीसगढ़ में बिजली की खपत में पांच सौ गुना वृद्धि वर्ष 2009-10 में दर्ज की गई। इसके मुताबिक यहां बिजली की औसत वार्षिक खपत प्रति व्यक्ति 1547 यूनिट तक पहुंच गयी है। राज्य में 97 प्रतिशत गांवों का विद्युतीकरण हो चुका है। किसानों के पांच हार्स पावर तक सिंचाई पंपों को सालाना छह हजार यूनिट बिजली नि:शुल्क दी जा रही है। विद्युत कनेक्शन वाले सिंचाई पंपों की संख्या राज्य में अब 72 हजार से बढ़कर दो लाख 90 हजार तक पहुंच गयी है। अनेक लघु और मध्यम सिंचाई योजनाओं के तेजी से पूर्ण करने पर अब राज्य की सिंचाई क्षमता 23 प्रतिशत से बढ़कर 32 प्रतिशत हो गई है। किसानों को खेती के लिए मात्र तीन प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर सहकारी समितियों से गण सुविधा मिल रही है। बिजली, सिंचाई और किफायती गण सुविधा के फलस्वरूप किसानों में खेती के लिए नये उत्साह का संचार हुआ हैं। पिछले खरीफ विपणन वर्ष 2010-11 में सहकारी समितियों में 51 लाख मीटरिक टन धान की खरीदी हुई और किसानों को पांच हजार करोड़ रूपए से अधिक राशि का भुगतान किया गया। वर्तमान खरीफ विपणन वर्ष 2011-12 में राज्य सरकार ने किसानों से 55 लाख मीटरिक टन धान खरीदने का अनुमानित लक्ष्य निर्धारित किया है। किसी भी देश या राज्य के निर्माण और विकास में श्रमिकों की मेहनत का सबसे बड़ा योगदान होता है। स्वतंत्र भारत के अब तक के इतिहास में भवन निर्माण गतिविधियों से जुड़े असंगठित श्रमिकों के कल्याण के लिए पहली ऐतिहासिक और संगठित पहल वर्ष 2010 में छत्तीसगढ़ में की गयी है, जहां मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने ऐसे लाखों श्रमिकों के लिए अनेक नवीन योजनाओं की शुरूआत की है, जिनमें नि:शुल्क औजार और महिला श्रमिकों के लिए नि:शुल्क सिलाई मशीन और नि:शुल्क सायकल वितरण की योजना के साथ-साथ ऐसे श्रमिकों के लिए दुर्घटना बीमा योजना और उनके बच्चों के लिए छात्रवृत्ति योजना भी शामिल हैं। इन योजनाओं के संचालन के लिए छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य सनिर्माण कर्मकार कल्याण मण्डल का गठन किया गया है। श्रमिकों को इन योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए सभी जिलों में श्रम विभाग द्वारा उनके पंजीयन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गयी है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली आज छत्तीसगढ़ के गरीबों और सामान्य उपभोक्ताओं के लिए रमन सरकार की मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण सामाजिक प्रतिबद्धता का पर्याय बन गयी है। राज्य में इस प्रणाली पर दो सबसे बड़ी जिम्मेदारियां हैं। एक तरफ तो उस पर दस हजार से अधिक राशन दुकानों के जरिए सस्ता अनाज, शक्कर और मिट्टी तेल जैसी आवश्यक वस्तुएं हर महीने उचित मूल्य पर 52 लाख से अधिक राशन कार्ड धारक परिवारों तक नियमित रूप से पहुंचाने का दायित्व है, तो दूसरी तरफ एक हजार 333 प्राथमिक सहकारी समितियों के माध्यम से लाखों किसानों को उनकी मेहनत का वाजिब मूल्य दिलाने के लिए समर्थन मूल्य नीति के तहत धान और मक्का खरीदी की जिम्मेदारी। इन दोनों जिम्मेदारियों को निभाना इतना सरल नहीं है। देखा जाए तो किसी भी सरकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती भी है, लेकिन रमन सरकार के कुशल प्रबंधन से ये दोनों ही कार्य बड़ी कुशलता से संचालित हो रहे हैं। राज्य की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पूरे देश में एक आदर्श प्रणाली के रूप में मान्यता मिलने लगी है। प्रदेश के 52 लाख से अधिक राशन कार्ड धारकों में लगभग 32 लाख कार्ड धारक गरीबी रेखा श्रेणी के हैं, जिन्हें केवल एक रूपए और दो रूपए किलो में हर महीने 35 किलो चावल और नि:शुल्क दो किलो नमक नियमित रूप से मिल रहा है। स्वस्थ, समृद्ध और खुशहाल छत्तीसगढ़ निर्माण के चौतरफा प्रयासों की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में राज्य के गांवों में भारत माता वाहिनियों का गठन भी किया जा रहा है। इनमें शामिल महिलाएं गांवों में अवैध शराब के कारोबार को रोकने के लिए संगठित पहल कर रही हैं। प्रदेश सरकार ने सामाजिक स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर इस वित्तीय वर्ष के प्रारंभ होते ही विगत 01 अप्रैल 2011 से 2000 तक आबादी वाले गांवों में देशी- विदेशी शराब की लगभग ढाई सौ लाईसेंसी दुकानों को हमेशा के लिए बंद करवा दिया है। यह रमन सरकार की आंशिक शराबबंदी के जरिए धीरे- धीरे पूर्ण शराबबंदी की दिशा में आगे बढऩे का एक महत्वपूर्ण कदम है।
छत्तीसगढ़ महतारी के माथे पर चमकते विकास के मुकुट का आभामण्डल हर साल नये- नये पुरस्कारों के मोर पंख से सजता जा रहा है। विभिन्न योजनाओं में उल्लेेखनीय सफलताओं के लिए हाल के वर्षो में राज्य को समय- समय पर अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया है। देश में सर्वाधिक चावल उत्पादन के लिए विगत 16 जुलाई 2011 को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने छत्तीसगढ़ को केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के प्रतिष्ठित 'कृषि कर्मण' पुरस्कार से सम्मानित किया। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने नई दिल्ली में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के स्थापना दिवस समारोह में प्रधानमंत्री के हाथों इस पुरस्कार के रूप में एक करोड़ रूपए की धनराशि के साथ प्रशस्ति पत्र भी ग्रहण किया। उन्होंने बड़ी विनम्रता से यह पुरस्कार छत्तीसगढ़ के मेहनतकश किसानों को समर्पित कर दिया। गरीबों के लिए संचालित राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के क्रियान्वयन में छत्तीसगढ़ को देश में प्रथम आने का गौरव मिला है। विगत दो जुलाई 2010 को चंडीगढ़ में केन्द्रीय श्रम तथा रोजगार मंत्रालय द्वारा आयोजित कार्यशाला में छत्तीसगढ़ सरकार को इस योजना में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के बेहतर इस्तेमाल के लिए -इंडिया एवार्ड तथा धान खरीदी व्यवस्था के तहत सहकारी समितियों के कम्प्यूटरीकरण पर भी राज्य को केन्द्र सरकार से -गवर्नेन्स का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। प्रदेश सरकार के उपक्रम छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कम्पनी के कोरबा स्थित डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ताप विद्युत गृह को केन्द्रीय विद्युत मंत्रालय द्वारा वर्ष 2010 के राष्ट्रीय ऊर्जा सरंक्षण पुरस्कार से नवाजा गया है।
इसी तरह वर्ष 2009 में प्रदेश सरकार के ही उपक्रम छत्तीसगढ़ राज्य अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (क्रेडा) को भी राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। प्रदेश सरकार के कुशल प्रबंधन का एक और उत्साहजनक नतीजा अक्टूबर 2011 में उस वक्त सामने आया, जब राष्ट्रीय स्तर पर संकलित वर्ष 2010-11 के आंकड़ों के आधार पर छत्तीसगढ़ देश के प्रथम तीन ऐसे राज्यों में शामिल हो गया, जहाँ सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जी.एस.डी.पी.) देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा है। ये आंकड़े केन्द्र सरकार के अखिल भारतीय सांख्यिकी कार्यालय और राज्यों के आर्थिक एवं सांख्यिकी निदेशालयों के आंकड़ों के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर जारी हुए हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ ने सकल राज्य घरेलू उत्पाद के मामले में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान और आंध्रप्रदेश जैसे पुराने और तुलनात्मक रूप से अधिक विकसित राज्यों को पीछे छोड़ते हुए जी.एस.डी.पी. में 11.57 प्रतिशत की वृद्धि हासिल की है। नये राज्य की ये उपलब्धियां वाकई इसलिए भी चौकाती हैं, क्योंकि विकास की दिशा में आगे बढ़ते छत्तीसगढ़ को नक्सल हिंसा की गंभीर समस्या का भी सामना करना पड़ रहा है, लेकिन वह इस समस्या से बड़ी सूझबूझ के साथ जूझते हुए प्रदेशवासियों की तरक्की और खुशहाली के लक्ष्य की ओर तेजी से अग्रसर है।
(डीपीआर से)



आपके पत्र

बेहतरीन अंक
अक्टूबर अंक की अनकही में 'विश्वसनीयता का अंधकार' पढ़कर यह कहना पड़ा कि सचमुच आज दुनिया से विश्वास लुप्त होता जा कहा है। विनोद साव का व्यंग्य 'गांधी, अंडा और मुर्गा' सुंदर व्यंग्य है। आज नाम के गाँधी तो बहुत हैं पर गाँधीवाद मर रहा है। 'ये चेहरा अपना सा लगता है' अच्छी सोच को दर्शाती कविता है लेकिन अफसोस अन्ना के साथी निजी कारणों के चलते अन्ना के साथ हैं न कि देश भक्ति के कारण, फिर अन्ना कोई विकल्प भी तो नहीं बता रहे, कहीं यह आंदोलन 1977 के आंदोलन जैसा न हो जाए। इसी अंक में प्रकाशित करमजीत सिंह की लघुकथाओं में पहली लघुकथा जहाँ इज्जत की रोटी खाने का संदेश देती है, वहीं दूसरी लघुकथा विदेशों में प्रवासियों की दशा का चित्रण करती है। हाइकु तो एक से बढ़कर एक हैं ही।
- दिलबाग विर्क, dilbagvirk23@gmail.com
सामाजिक सरोकार
उदंती पठनीय और अच्छी पत्रिका है। इसके सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रचनाएं आकर्षण का केंन्द्र होती हंै। झारखंड के सामाजिक परिवेश से जुड़ा आर्टिकल मैं भी लिखना चाहूंगा। उदाहरण के लिए अपराध जगत को लें। सभी जानते हैं छत्तीसगढ़ की तरह झारखंड भी नक्सलियों के कब्जे में है। लेकिन यहां के ग्रामीण कितने सहृदय हैं इसका अनुमान शायद ही बाहरी दुनिया के लोग लगा पाते हैं। नक्सली घटनाओं को छोड़ दें तो कई ऐसे उदाहरण हैं जहां हत्या करके हत्यारा भागता नहीं, खुद पुलिस के पास जाता है और अपराध स्वीकार कर लेता है। यह अजूबा है। पिछले एक साल में मैंने सैंकड़ों ऐसी खबरें छापी हैं।
- संजय कुमार, sanjayjournalist@gmail.com
हाइकु: सर्दी की धूप जैसी जिंदगी
जीवन के विविध और गहन सन्दर्भों की बात की जाए तो मानवीय प्रेम सुख- दुख की गहनता को हाइकु जैसे छोटे छन्द में गम्भीरता और मार्मिकता से चित्रण करना कठिन है। भाषा की क्षमता की परख यहीं पर होती है। डॉ. हरदीप कौर सन्धु की भाषा, हृदय की धड़कनों से प्रकट होती है। अक्टूबर अंक में प्रकाशित उनके हाइकु इसका जीवन्त प्रमाण हैं।
- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु', rdkamboj@gmail.com
डॉ. हरदीप के हाइकु 'सर्दी की धूप जैसी जिंदगी' के बारे में कुछ लिखना सूरज को दिया दिखाना है। किस- किस के बारे में लिखूं शब्दों के बारे में या भावों के बारे में दोनों ही उत्तम हैं।
- रचना पाण्डेय, लखनऊ (यूपी)
सभी हाइकु एक से बढ़ कर एक हैं ....हरदीप हाइकु का नियमित और बहुत संतुलित लेखन करती हैं।
- डा.रमा द्विवेदी
हाइकु में प्यार, प्रकृति बहुत निखर कर आया है, उनके हाइकु की ये पंक्तियां पसंद आई - चप्पु न कोई
उमर की नदिया
बहती गई...
हार्दिक बधाई...
- डॉ. भावना कुंवर
bhawnak2002@gmail.com
यह जानकर प्रसन्नता हुई कि मेरे हाइकु आपको पसन्द आए और आपने प्रकाशित किया। आपके आत्मीय विचारों ने मेरा उत्साह बढ़ाया। कोई भी कलम कुछ लिखने में तब सफल होती है जब उसकी बात पाठक के हृदय में प्रवेश करती है। मेरा प्रयास इसी दिशा में चलने का रहता है, जिसको समय- समय पर आप सभी के शब्दों से हुलारा मिलता रहता है। हार्दिक धन्यवाद एवं आभार।
- डॉ. हरदीप कौर सन्धु
shabdonkaujala@gmail.com
बार- बार पढऩे योग्य
रश्मि प्रभा की कविता 'विजयी मंत्र' बेहतर है, आशा भाटी का 'ये चेहरा अपना सा लगता है' उत्तम विचार है पर इसमें कविता कहाँ है? नडाला जी की पहली लघुकथा पूर्व में भी कहीं पढ़ी है ऐसा लगा, फिर भी उनकी दोनों ही लघुकथाएं बार- बार पढऩे योग्य हैं। बधाई..
- दीपक 'मशाल', mashal.com@gmail.com
विजयी मंत्र बहुत ही प्रेरक रचना है। काश हम सबको भी याद रहता है कि हम देश हैं, पार्टी या कोई जाति नहीं...।
- पूजा आर शर्मा, मध्यप्रदेश
नई उमंग
त्यौहार के रंगों से सजा महीना लेख में पल्लवीजी ने सच ही तो कहा है... हो सकता है कल की कोई घटना ऐसी रही हो जिसके कारण त्यौहार का उल्लास कम हो जाता हो। फिर भी त्यौहार जीवन में नई उमंग लाते हैं। बहुत ही सुंदर लेख है। उनके कुछ विचार अच्छे लगे-जैसे क्यों देवों को सुला दिया जाता रहा होगा। हम अभी भी कुछ बातों को बिना दिमाग लगाए मानते जा रहे हैं... पुराने जमाने में उन्हें करने के कारण रहे होंगे। पर अब ठोस कारण नहीं है तो भेड़ चाल चलना ठीक नहीं।
- कनुप्रिया गुप्ता, भोपाल kanubpl@gmail।com

रंग- बिरंगी दुनिया

लंबी जीभ ने दिलाई ख्याति

अमेरिका की 21 साल की एक युवती की जीभ 9.7 सेंटीमीटर लम्बी है। गिनीज बुक ने इसे दुनिया की सबसे लम्बी जीभ के रूप में दर्ज किया है। अमेरिका में ह्यूटन की शनेल टैपर 13 साल की उम्र में ही चर्चा में तब आ गई थीं जब उन्होंने यूट्यूब वीडियो पर अपनी लंबी जीभ दिखाई थी।
गिनीज बुक ने सितंबर में उन्हें लास एंजेलिस आने का आमंत्रण दिया, जहां उसके सदस्यों ने टैपर की जीभ की नाप ली। टैपर ने दो अन्य महिलाओं को पीछे छोड़कर यह रिकॉर्ड अपने नाम किया।
टैपर ने कहा कि अपनी जीभ को लेकर मैं हमेशा बेवकूफ और नासमझ रही। मुझे लोगों के सामने जीभ निकालना अच्छा लगता है। मैंने स्कूल के दिनों में ही ऐसा करना शुरू कर दिया था। लंबी जीभ के कारण मुझे कभी कोई समस्या नहीं हुई। टैपर के लिए यह मजेदार है।

मशहूर दंपती 20 वें बच्चे की तैयारी में

अमेरिका में एक दंपती इसलिए मशहूर हैं क्योंकि वे लगातार बच्चे पैदा करते चले जा रहे हैं। सिलेब्रिटी बन चुके इस दंपती जिम बॉब और मिशेल दूगर ने अब अपने 20वें बच्चे की तैयारी कर ली है। आगामी अप्रैल में 20वें बच्चे के माता पिता बनेंगे। 45 साल की दूगर ने कहा, 'हम इस नए तोहफे को लेकर बेहद उत्साहित हैं और बड़ी बेसब्री से उसका इंतजार कर रहे हैं। मुझे नहीं लगता था कि ईश्वर हमें एक और देगा।'
बच्चे पैदा करने के इस सिलसिले ने जिम बॉब और मिशेल दूगर को रिएलिटी टीवी स्टार बना दिया है। एक पूरा शो सिर्फ इन दोनों पर बनाया गया है। जब यह शो शुरू हुआ तो शो का नाम था 17 किड्स एंड काउंटिंग। बढ़ते बढ़ते वह 19 किड्स एंड काउंटिंग तक पहुंच चुका है। अप्रैल के बाद इस शो का नाम जाहिर है फिर बदल दिया जाएगा। बॉब और दुगर के 19 बच्चों की उम्र 23 साल से लेकर 23 महीने तक है। उनके 10 लड़के हैं और 9 लड़कियां।
एक और बच्चे की आने की खबर से बेहद खुश बॉब कहते हैं, 'हम विषम संख्या पर नहीं रुकना चाहते थे।' यह दंपती परिवार नियोजन का कोई तरीका इस्तेमाल नहीं करता। अरकन्सॉ राज्य के लिटल रॉक शहर में रहने वाले इस ईसाई जोड़े ने अपने हर बच्चे का नाम जे अक्षर से रखा है। वे लोग इसे अपने विश्वास का प्रतीक मानते हैं। इस परिवार की अपनी एक वेबसाइट है जिस पर उनके माता पिता की लिखी किताबें और डीवीडी बिकती हैं। वहां माता पिता को बच्चों को पालने की सलाह भी दी जाती हैं।

नोटों का बिछौना
बहुत अमीर लोगों के बारे में पुराने लोग बताते हैं कि अमुख व्यक्ति इतना अमीर इंसान था कि नोटों के बिछौने पर सोता था। आज के समय में यह सुनने में भले ही अजीब लगे वह भी किसी गरीब इंसान के बारे में, लेकिन चीन में पुलिस ने एक ऐसे तथाकथित गरीब को गिरफ्तार किया है जो अपने बिछौने में करीब पचास करोड़ रुपये की नकदी छिपाकर सोता था।
इतनी बड़ी रकम उसने नशीली दवाओं के कारोबार से जुटाई थी। लोगों को संदेह न हो, इसके लिए यह गरीब होने का दिखावा भी करता था। पहले एक फार्मेसी में काम करने वाले इस व्यक्ति ने नशीली दवाएं बेचनी शुरू की। जब अधिक कमाई से धन को रखने की समस्या खड़ी हुइ तो इसने अपने बैंक खाते में इस रकम को जमा किया, लेकिन खतरा बढ़ता गया। लिहाजा, इसने इस रकम को सोने और शेयर बाजार में निवेश करना शुरू किया। धीरे- धीरे नशीली दवाओं के अवैध कारोबार से इतनी अधिक कमाई होने लगी कि इसे कहीं और रखने पर उसे विवश होना पड़ा। इस लिहाज में उसका अपना बिस्तर सबसे सुरक्षित स्थान लगा। अब कमाई की सारी नकद राशि वह अपने बिछौने में डालकर चैन की नींद लेने लगा। हालांकि यह सुकून उसे बहुत देर तक नसीब नहीं हुआ। पहले से उसके पीछे लगी पुलिस ने आखिरकार उसे धर दबोचा।
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'इस उम्र में'


- श्रीलाल शुक्ल
व्यंग्य के नाम पर, या सच तो यह है कि किसी भी विधा के नाम पर पत्र-पत्रिकाओं के लिए जल्दबाजी में आएँ-बायँ-शायँ लिखने का जो चलन है, उसके अंतर्गत कुछ दिन पहले मैंने एक निबंध लिखा था। वह एक पाक्षिक पत्रिका में ‘हास्य-व्यंग्य’ के स्तंभ के लिए था। हल्केपन के बावजूद उसे लिखते-लिखते मैं गंभीर हो गया था (बक़ौल फ़िराक़, ‘जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए’) यानी, इस निबंध से ‘शायँ’ ग़ायब हो गई थी, सिर्फ ‘आयँ-बायँ’ बची थी।

‘आयँ-बायँ’ की प्रेरणा शहर के एक बहुत बड़े दार्शनिक ने दी थी जो उतने ही बड़े कवि और कथाकार भी थे परंतु वास्तव में प्रेरणा उन्होंने नहीं, उनकी मौत ने दी थी। वे एक सड़क दुर्घटना में घायल हो गए थे। एक सप्ताह तक अस्पताल और घर की सेवा अपसेवा के बीच झूलते हुए उनकी मृत्यु हो गई। उनके बेटे को पता था कि वे ऊँचे दर्जे के विद्वान हैं, पर उनके प्रशंसकों और मित्रों के नाम का उसे पता न था। इसलिए उसने एक अखबार के दफ्तर को छोड़कर-जो उतना ही गुमनाम था-दो-चार गिने-चुने रिश्तेदारों को ही उनके न रहने की खबर दी और वहीं आठ-दस लोग मिलकर उनका दाह-संस्कार कर आए। बाद में उनके देहांत की खबर फैली और तब अखबारों में विद्वानों के प्रति समाज की उपेक्षा पर जमकर लिखा गया, यह और बात है कि उनकी मृत्यु और उसके अवसादपूर्ण कारणों पर तब भी ज़्यादा नहीं लिखा गया।
स्थिति अवसादपूर्ण थी, इसमें शक नहीं, पर मुझ जैसे लेखक को, जो अपने यथार्थ-बोध और भावुकता-विरोध के लिए विख्यात है, इससे क्या लेना-देना ? मुझे ‘आयँ-बायँ’ यानी हास्य-व्यंग्य के लिए यह बहुत वाजिब जान पड़ा और एक दिन मैंने चार बजे शाम तक छत के ऊपर बने हुए अध्ययन कक्ष में एक टिप्पणी लिख डाली।

जो मैंने लिखा, वह भविष्य में मरने वालों को संबोधित था। उसका सारांश था: ‘ऊँचे नेताओं, व्यवसायियों, उद्योगपतियों और अफसरों के मरने पर उनकी शवयात्रा में जनसंख्या की कमी नहीं रहती। उनके पीछे अनगिनत संस्थाएँ और प्रतिष्ठान भीड़ मुहैया करा देते हैं, या खुद भीड़ बन जाते हैं। पर मामूली लोगों जिनमें लेखक, कलाकार नट, विट, गायक आदि शामिल हैं-को यह सुविधा नहीं मिलती। उनकी शवयात्रा में चलने वाले गिने-चुने ही होते हैं। अत: अगर आप चाहते हैं कि आपकी शवयात्रा धूमधाम से संपन्न हो तो आपको मरने से काफी पहले एक विशेष प्रकार का जनसंपर्क चलाना पड़ेगा। वरना अखबार, टी.वी. रेडियो आदि का तो ज़िक्र ही क्या, आपका पड़ोसी तक आपका-यानी आपके मरने का नोटिस न लेगा और बाद में कहता सुना जाएगा, ‘बड़े अफसोस की बात है ! पर क्या बताएँ, मुझे पता ही नहीं चला !’

‘यह भी याद रखना चाहिए कि भरी-पूरी शवयात्रा के लिए बहुत बासी जनसंपर्क काम न देगा, लोग भूल जाते हैं या मरकर एक अजनबी पीढ़ी छोड़ जाते हैं। जनसंपर्क का अभियान अपने मरने से कोई दो साल पहले चला सकें तो अधिक गुणकारी होगा।’

जनसंपर्क के मैंने कुछ नुस्खे भी सुझाए थे: ‘दूसरों की शवयात्राओं में ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सा लेना शुरू कर दें, किसी आध्यात्मिक, धार्मिक या सांप्रदायिक संगठन की सदस्यता ले लें, किसी शिक्षा-संस्था के प्रबंध मंडल में घुस जाए (ताकि कई अध्यापक और कुछ विद्यार्थी ऐन मौके पर उपलब्ध रहें), अपनी जाति के किन्हीं ऐसे उद्धार-कार्यक्रमों में खप जाएँ तो हर जाति में हर वक्त चलते ही रहते हैं...आदि-आदि !
‘सारांश यह कि मुर्दा हालत में अगर आपको भीड़ की दरकार है तो जिंदा हालत में भी आपको भीड़ से रब्तोज़ब्त रखनी पड़ेगी।’
ऐसा लिख चुकने पर, एक बडे लेखक के साथ जैसा कि होना चाहिए मैं अपने से कुछ असंतुष्ट और साथ ही, कुछ हद तक आत्ममुग्ध होकर छत पर टहलता रहा। बाद में एक मुँडेर के पास आकर खड़ा हो गया और अपने मकान के सामने से निकलने वाली अतिव्यस्त और काफ़ी अस्त-व्यस्त सड़क को देखता रहा। तभी सड़क के किसी गड्ढे में किसी गाड़ी के गिरने और उभरने की ‘भड़-भड़ भड़ाम’ सुनाई दी और गाड़ी के ब्रेक की चिहुँक भी। इसी के साथ हल्की धूप में एक साया-सा उतराया और ग़ायब हो गया। फाटक पर मेरा नौकर खड़ा था, उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई और सड़क की ओर दौड़ा। एक दुर्घटना हो गई थी।

एक बूढा आदमी किसी तेज़ रफ़्तार टैपों की चपेट में आ गया था। सात सवारियों वाली इस तिपहिया गाड़ी ने उसे बगली धक्का मारकर उछाला और वह पक्की सड़क से विस्थापित होकर, हवा में तैरता-सा मेरे घर की चहारदीवारी के पास आ गिरा। तत्काल वे सभी दृश्य-श्रव्य जो सड़क दुर्घटनाओं से जुड़े होते हैं एक साथ दिखाई-सुनाई देने लगे। बूढ़े के आसपास भीड़ जमा हो गई। टैंपों का ड्राइवर जो दो-चार सेकेंड के लिए रुका था, पहले ही गाड़ी भगाता हुआ आँख-ओझल हो गया था।

‘‘क्या हुआ ?’’ क्या हुआ ?’’ मैं छत से पुकार रहा था पर दौड़कर नीचे नहीं आ पाया। एक तो भागदौड़ का तरीका मुझे धीरोदात्त आचरण के विपरीत जान पड़ता है दूसरे सच तो यह है-मुझे दुर्घटनाओं से घबराहट होती है, घायल आदमी को मैं देख नहीं सकता। ख़ून देखते ही मेरा सिर चकराने लगता है। जो ऐसे दृश्यों को आसानी से झेल लेता है वह एक तरह से मानव की आदिम संस्कृति में वापस लौटता है। यह प्रवृत्ति उन उदात्त संस्कारों के विरुद्ध है जो शताब्दियों की सभ्यता ने हम जैसों में परिपुष्ट किए हैं। पर तभी एक विचित्र घटना हुई जिसने मुझे तेज़ी से नीचे आने के लिए मजबूर कर दिया।

मैंने देखा कि कुछ लोगों ने इसी बीच बहुत सँभालकर बूढ़े को अपने हाथों में ले लिया है और जब मैं उम्मीद कर रहा था कि वे किसी गाड़ी में लिटा कर अस्पताल ले जाएँगे, वे उसे उठाकर मेरे फाटक के सामने लाए, उसके बाद उन्होंने बड़ी कोमलता से फाटक के ठीक आगे लिटा दिया। यह देखकर नीचे से मेरे नौकर ने और छत से मैंने विरोध की आवाज़ उठाई और मैं तेज़ी से फाटक के पास पहुँच गया। तब तक वे लोग बूढ़े को फाटक के पास छोड़कर ग़ायब हो गए थे। आसपास दस-ग्यारह छोकरे, कुछ औरतें और बूढ़े भर रह गए थे। मुझसे हमदर्दी जताई जाने लगी, कोई अपने आप से कह रहा था, ‘ऐसा नहीं करना चाहिए था।’ यह एक चालू और निरर्थक वक्तव्य है जिसे सुनने के लिए कहीं भी आपको लंबी यात्रा करने की ज़रूरत नहीं है।

बूढ़े के जिस्म में कोई हरकत नहीं हो रही थी, पता नहीं कि बेहोश था या मुर्दा। पर भयानक होते हुए भी यह दृश्य मुझे उतना भयानक नहीं दीखा क्योंकि उसकी देह पर कोई घाव नहीं था, न कहीं ख़ून ही दिखाई दे रहा था। इतना ज़रूर है कि उसकी पतलून के सामने का हिस्सा गीला था, पर घबराहट मुझे ख़ून से होती है, पानी से नहीं।

‘‘आप लोग यहीं रुकें, मैं पुलिस को फोन करके आता हूँ,’’ मैंने कहा और कई कदमों को एक में समेटता हुआ मैं अपने सुपरिचित बैठकखाने में आ गया। कुछ सुकून मिला और जाने-बूझे माहौल में पुलिस को फ़ोन करते वक़्त मुझे ज़्यादा उलझन नहीं हुई।

कौन कहता है कि पुलिस का कोई भरोसा नहीं ? मैंने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया और पाँच मिनट के भीतर ही पुलिस का एक सचल दस्ता मेरे दरवाज़े पर हाज़िर था। यह और बात है कि जब तक वे आ नहीं गए और नौकर ने मुझे उनके आने की ख़बर नहीं दे दी, मैं घर के अंदर ही बना रहा-बाहर निकलता भी तो क्या कर लेता ?

पुलिस के आने से मुझे दोहरी खुशी हुई एक तो यह कि बूढ़े के बारे में मेरी जिम्मेदारी ख़त्म हुई, दूसरे इसलिए कि बची-खुची भीड़ और मुहल्लेवालों की नज़र में निश्चय ही मेरी साख बढ़ी। उन्होंने देख लिया कि मेरे टेलीफ़ोन घुमाते ही कैसे पूरा पुलिस दस्ता-एक नायब दारोग़ा, एक हेडकांस्टेबुल और तीन सिपाही-मेरे दरवाज़े पर है बूढ़ा अब भी किसी जिस्मानी हरकत के बिना फाटक के सामने पड़ा था। पुलिस की मौजूदगी का असर देखिए कि जो उसे मेरे फाटक के पास छोड़ गए थे, उनके ख़िलाफ़ मेरे मन में अब पहले जैसी कड़ुवाहट नहीं बची थी। बूढ़े के लिए चिंता ज़रूर थी पर यह चिंता भी शायद इस एहसास की उपज थी कि पूरे घटना-चक्र में मुझे अब एक महत्व की भूमिका निभानी है। तभी मैंने हेडकांस्टेबुल से कहा, ‘‘कृपया पूछताछ में वक़्त न बरबाद करें। पूछताछ तो बाद में भी हो सकती है, पहले इसे अस्पताल ले जाएँ। क्या पता, बच ही जाए।

वास्तव में पुलिस ने आते ही बूढ़े की ओर तो बाद में देखा, एकदम से पूछताछ शुरू कर दी थी। कोई जानता है कि यह कौन है ? इसका क्या नाम है ? दुर्घटना कैसे हुई ? तुममें से कोई मौक़े पर था ? टैपों का नंबर ? किसी एक को भी नंबर याद नहीं ? तब तुम साले यहाँ क्या कर रहे थे ? टैपों ने फाटक पर आकर कैसे टक्कर मारी ? उधर मारी ? उस जगह ? तो लाश फाटक पर कैसे आ गई ? वे कौन हरामी के पिल्ले थे जो इसे फाटक पर खींच लाए ?

प्रश्नोत्तर-काल में घटना की बेहूदगियाँ जैसे-जैसे खुलती जातीं, उसी अनुपात से पुलिसवालों की गालियाँ भी तीखी होती जा रही थीं। हैरत की बात कि उन पर मेरी बात से ठंडे पानी का छींटा पड़ा। पता नहीं क्यों, वे मुझसे पुलिस की तरह नहीं, सभ्य पुरुषों की तरह बात कर रहे थे। इसका कारण मैं बाद में सोच पाया: शायद इसलिए कि मैं साफ-सुथरा कुर्ता और पायजामा पहने था ! उनकी निगाह में मेरा अपरिचय इज़्ज़त का हकदार था : क्या पता कोई अज्ञात नायक हो ? या कोई प्रभामंडित महान् खलनायक ?
नायब दारोग़ा ने पहली बार मुँह खोला, ‘‘फ़िक्र न करें, बच जाएगा।’’

बूढ़े के मुँह पर पहले ही पानी के छींटे मारे जा चुके थे। कोई नतीजा नहीं निकला था। अब नायब दारोग़ा से शह जैसी पाकर हेडकास्टेबुल बूढ़े के निश्चल शरीर के पास आया। उसने बूट की नोक उसकी पसलियों में गड़ाई और कहा, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा ?’’
कोई जवाब नहीं। तब पैर छोड़कर उसने हाथ का सहारा लिया बूढ़े की नाड़ी पकड़ी, कहा, ‘‘मरा नहीं है।’’ सिपाहियों से उसने कहा, ‘ले चलो....रामनगर अस्पताल।’
सिपाहियों ने अभ्यस्त मुद्रा से भीड़ में खड़े हुए दो रिक्शावालों को चुना, उनसे कहा, ‘इसे उठाकर जीप पर रखो..सीट पर नहीं, नीचे..अबे नीचे, फ़र्श पर..।’’

जैसे वे अपने गाँव का घर, बटाई पर लिया खेत, खलिहान, नीम का पेड़ छोड़कर शहर यही सुनने, यही करने आए थे, उन्होंने यह सुना यही किया।

अभी कुछ आशाप्रद भी होना बाकी था। हेडकांस्टेबुल ने फर्श पर पड़े हुए बूढ़े को झिड़ककर कहा, ‘‘बैठ जा।’’ इसका भी कोई असर नहीं हुआ। तब उसने बूढ़े को गर्दन का सहारा देकर बैठाया कहा, ‘‘बैठ, बैठा रह !’’ इस बार उसकी पलकों में कुछ हरकत हुई, मुँह से हल्की-सी कराह निकली। पर वह हेडकांस्टेबुल के हुक्म की तामील नहीं कर पाया; ढीले जिस्म से फ़र्श पर पसर गया।
‘‘रामनगर के अस्पताल मत ले जाइए, वहाँ की आपात सेवाओं का भरोसा नहीं। मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में ले जाएँ। वहाँ...।’’
नायब दारोग़ा का धीरज जवाब देने लगा। उसने मेरी बात बीच में ही काट दी, कहा, ‘‘आप अपना काम कर चुके, अब हमें अपना काम करने दें।’’

दूसरे दिन सूर्योदय से पहले ‘जीर्णाजीर्ण’ पर विचार करते हुए शय्या-त्याग, उष:पान, चाय-पान, मल-मूत्र विसर्जन, दंतधावन, आसन-प्राणायाम-व्यायाम, समाचार-मंथन, प्रातराश उर्फ़ सूक्ष्माहार। इन क्रियाओं के बाद मेरे असली कर्म की शुरुआत होनी थी : मरणहीन गद्य की रचना, साहित्य-साधना।

पर मन में कुछ कुरेद रहा था, लग रहा था कि आज कुछ और करना है। क्या अस्पताल जाकर उस बूढ़े की हालत का पता लगाना ही इस अनमनेपन का अभीष्ट है ? हो सकता है। तब फिर क्या मेरा अस्पताल जाना ज़रूरी नहीं है ? है भी और नहीं भी। है इसलिए कि अगर वह ज़िंदा हो और उसकी कुछ ज़रूरतें हों तो अपने साधन और सामर्थ्य को नज़रअंदाज़ किए बिना उनकी पूर्ति की जा सके। उधर ‘नहीं भी’ के पीछे भी कई तर्क थे। एक घटना थी, ख़त्म हुई। अब मुझे हिलगे रहने की क्या ज़रूरत ? फिर, बिलावजह एक अजनबी आदमी का हालचाल लेने के लिए अस्पतालों के वैरपूर्ण वातावरण में चक्कर काटना क्या नाटकीय न लगेगा ?

पर ‘नाटकीय’ ने ही फ़ैसला कर दिया। मैं नाटकीयता के ख़िलाफ़ हूँ, पर कोई मेरे किसी कार्य को नाटकीय समझे या अख़बारों में उसे नाटकीय बनाकर प्रस्तुत करे, तो क्या नाटकीयता के आरोप से भयभीत होकर मुझे उससे विरत हो जाना चाहिए-ख़ास तौर से तब जब कि मैं शुद्ध मानवीय भावना से प्रेरित होकर कुछ करने जा रहा हूँ ?

मैं जानता था कि पुलिस बूढ़े को मेडिकल कॉलेज नहीं ले जाएगी। इसलिए मैं रामनगर अस्पताल गया। वहाँ काफ़ी देर मेरे मरीज़ का पता नहीं चला। जिसका कोई नाम नहीं, उसका पता कैसा ? फिर, कल सारे डॉक्टर हड़ताल पर थे। (किसी दूसरे अस्पताल में किसी मरीज़ ने किसी डॉक्टर को झापड़ मार दिया था। किसी ने उसकी मदद नहीं की थी, न जवाबी तौर पर कोई मरीज़ को पीटने के लिए आगे बढ़ा था। प्रशासन तटस्थ रहा था-‘क़ानून तोड़ा गया है तो क़ानून ख़ुद अपना रास्ता तय करेगा’ के सिद्धांत के अंतर्गत। यह हड़ताल उसी गतिरोध के ख़िलाफ़ सिर्फ़ प्रतीकात्मक रूप में एक दिन के लिए थी।) आज डॉक्टरों की हड़ताल नहीं थी, फिर भी रामनगर अस्पताल में हड़ताल का ख़ुमार बाक़ी था, अधिकांश डॉक्टर ड्यूटी पर नहीं आए थे।

मैं पूछता रहा: एक बूढ़ा इमरजेंसी में लाया गया था-दुर्घटना का मामला था। उसे पुलिस लाई थी। अब कैसा है ? कहां है ? किसी वार्ड में ? या शवगृह में ?
बड़ी दौड़-धूप और पूछताछ के बाद एक नर्स ने बताया : न वह किसी वार्ड में है, न शवगृह में।
नर्स ने कहा, ‘वे उसे कल यहाँ इमरजेंसी में लाए थे। मैंने कहा कि सारे डॉक्टर हड़ताल पर हैं, मरीज़ को भर्ती नहीं किया जा सकता। पुलिसवाले बोले, ‘ठीक है।’ इसके बाद वे ख़ुद मरीज़ को स्ट्रेचर पर लादकर अंदर लाए, इमरजेंसी वार्ड में एक बेड पर डाल दिया। दारोगा ने मुझसे कहा, ‘सॉरी सिस्टर, हम कुछ नहीं कर सकते, जो करना है तुम ख़ुद करो। एक मोटर ने इसे उछालकर सड़क के किनारे फेंक दिया था। पता नहीं कितनी चोट आई है। पर इतना तय है कि अभी उसकी साँस चल रही है। मैं कुछ बोलती, इसके पहले ही वे गाड़ी स्टार्ट करके चल दिए। मैं उनसे मरीज़ का नाम और पता भी नहीं पूछ सकी।’’

मैंने नर्स को समझाया कि वह पूछ लेती तब भी कोई नतीजा न निकलता।
‘‘मैंने मरीज़ को अपने हिसाब से जाँचा-परखा। लगा कि कोई खास चोट नहीं है। सदमा भर है। पर बिना डॉक्टरी जाँच-पड़ताल के ऐसी राय बना लेना भी खतरे का काम है। हो सकता है कि उसके दिमाग़ में अंदरूनी चोट आई हो, भीतर ही भीतर ख़ून बहा हो ! वैसे डॉक्टर होते, तब भी यह जानने में दिक़्क़त आती। यहाँ न कोई न्यूरोलॉजिस्ट है, न न्यूरोसर्जन, कैट्स स्कैन की मशीन भी नहीं..।
‘‘धीरे-धीरे उसने कराहना शुरू किया। आधी रात होते-होते वह पूरी तौर से होश में था। उसने चाय माँगी, मैं खुद चाय पी रही थी। कहीं और से चाय मिलनी मुश्किल थी। मैंने अपने प्याले से ही कुछ घूँट निकालकर उसे दिए। उसने पिया, कहा, ‘थैंक्यू’ और सो गया।
‘‘मैं भी सो गई।
‘‘बहुत सवेरे देखा, उसकी चारपाई ख़ाली थी वह जा चुका था।’’
नर्स ने आँखें फैलाकर कहा, ‘‘उसने बड़े जोख़िम का काम किया है।’’

श्रेष्ठता की कसौटी को लेकर हमारे साहित्य में रचनाकारों और आलोचकों के दो-तीन बड़े मज़बूत और सुपरिचित खेमे हैं, इनकी मान्यताएँ और दृष्टियाँ अत्यंत सुपरिभाषित हैं और अपने को एक-दूसरे से भिन्न मानने में ही उनकी सैद्धांतिक सार्थकता समझी जाती है, पर एक मामले में दोनों खेमों के सदस्य एक जैसे हैं। वे एक ओर भावुकता-विरोध को एक स्वत: सिद्ध मूल्य मानते हैं और दूसरी ओर अकेले में वे सभी भावुक होने की अपार क्षमता दिखा सकते हैं-सब नहीं तो अधिकांश। उन्हीं अधिकांश में एक मैं भी हूँ।

तभी उस बूढ़े के प्रसंग को बहुत कोशिश करके भी दिमाग़ से ख़ारिज नहीं कर पा रहा था। फाटक पर करवट के बल पड़ा हुआ उसका निश्चेष्ट शरीर, जिसे बुढ़ापे ने सब तरफ़ से बरबाद कर रखा था, दूर-दूर पड़ी रबर की दो घिसी चप्पलें, सामने से गीली मटमैली पतलून-सब कुछ दयनीय होते हुए भी मेरी कल्पना में ये किसी प्रेतछाया के से आतंक के साथ मौजूद थीं। मैं यह भी सोचा करता था कि वह अस्पताल से घिसटकर बाहर आ गया है और सड़क के किनारे किसी झाड़ी में पड़ा हुआ दम तोड़ चुका है या तोड़ रहा है।

मेरा मन व्याकुल था, दो दिन व्याकुल रहा। तीसरे दिन भावुकता चुकने लगी, चौथे दिन चुक गई, आहार-निद्रा भय आदि में ज़िंदगी की सहजता लौटने लगी। तभी पाँचवें दिन, जब मैं अपने फाटक पर खड़ा हुआ सामने सवारियों और पैदल राहगीरों के निरंकुश आवागमन को देख रहा था, मैंने सड़क पर उस बूढ़े को ऐंड़े-बैंड़े चलते हुए पाया। वह मेरे सामने से निकला जा रहा था।

वह पिए हुए हो सकता था, पर मुझे न जाने क्यों यक़ीन था कि था नहीं। पर बदहाल तो था ही। फिर भी मैंने राहत की साँस ली : वह ज़िंदा था.

अपनी कहानियों के बारे में श्रीलाल शुक्लकहानियाँ मैंने बहुत कम लिखी हैं। 1945-47 की चार कहानियों को छोड़कर 1955 से 2000 तक मैंने तीस से ज्यादा नहीं लिखी होंगी। इसका कारण मेरी रचनात्मक प्रवृत्ति तो थी ही, शायद यह तथ्य भी था कि अपने लेखन के पूर्वार्ध में मेरी अधिसंख्य कहानियाँ व्यंग्यपरक थीं, जिनको मुख्य धारा की कहानियों में सामान्यत: नहीं गिना जाता।
'यह घर मेरा नहीं' 1961 की है। उसके बाद 1963 में एकाध अपवादों को छोड़कर मैंने अगली कहानी 'छुट्टियाँ' 1978 में लिखी। 1983 के बाद का समय कहानी की दृष्टि से मेरे लिए काफी उर्वर रहा है। 1956-57 से लगभग बीस वर्ष का समय हिंदी में अनेक रूपों वाले कहानी- आंदोलनों का रहा है। निस्संदेह इस अवधि में विभिन्न साहित्यिक संप्रदायों के और कुछ संप्रदायहीन लेखकों ने हिंदी कहानी को विशिष्टता दी। इतना ही नहीं, उन्होंने कहानी संबंधी 'पालेमिक्स' को भी •ाोरदार उछाल दिया। कभी- कभी मैं सोचता हूँ कि उन दिनों कहानी विधा के प्रति मेरी उदासीनता का कहीं यही कारण तो न था कि मैं उस साहित्यिक घमासान में कूदने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। यह तो निश्चित है कि गत शताब्दी के आठवें दशक के आते- जाते हिंदी में कहानी- लेखन कहानी के आंदोलनों को भुलाकर अपना सहज कर्म, यानी कहानी- लेखन करने लगे थे। अगर उसके बाद मैं भी, अपनी सीमाओं के बावजदू, नए सिरे से कहानी के प्रति उन्मुख हुआ तो शायद इसीलिए कि अब कहानी के मैदान में 'नई- समांतर- सचेतन- सहज' का मोटा लबादा उतारकर मुक्त रूप से साँस ली जा सकती थी। इस अवधि में यदि हिंदी में सशक्त कहानी- लेखकों की एक पूरी पीढ़ी उभरकर आई तो शायद इस बदले वातावरण का भी इसमें कुछ योग रहा है।


तीन छन्नियाँ

प्राचीन यूनान में सुकरात अपने ज्ञान और विद्वता के लिए बहुत प्रसिद्द था. सुकरात के पास एक दिन उसका एक परिचित व्यक्ति आया और बोला, “मैंने आपके एक मित्र के बारे में कुछ सुना है.”
“दो पल रुको”, सुकरात ने कहा, “मुझे कुछ बताने से पहले मैं चाहता हूँ कि हम एक छोटा सा परीक्षण कर लें जिसे मैं ‘तीन छन्नियों का परीक्षण’ कहता हूँ”.
“तीन छन्नियाँ? कैसी छन्नियाँ?”, परिचित ने पूछा.
“हाँ”, सुकरात ने कहा, “मुझे मेरे मित्र के बारे में कुछ बताने से पहले हमें यह तय कर लेना चाहिए कि तुम कैसी बात कहने जा रहे हो. किसी भी बात को जानने से पहले मैं यह तीन छन्नियों का परीक्षण करता हूँ. इसमें पहली छन्नी सत्य की छन्नी है. क्या तुम सौ फीसदी दावे से यह कह सकते हो कि जो बात तुम मुझे बताने जा रहे हो वह पूर्णतः सत्य है?
“नहीं”, परिचित ने कहा, “दरअसल मैंने सुना है कि…”
“ठीक है”, सुकरात ने कहा, “इसका अर्थ यह है कि तुम आश्वस्त नहीं हो कि वह बात पूर्णतः सत्य है. चलो, अब दूसरी छन्नी का प्रयोग करते हैं जिसे मैं अच्छाई की छन्नी कहता हूँ. मेरे मित्र के बारे में तुम जो भी बताने जा रहे हो क्या उसमें कोई अच्छी बात है?
“नहीं, बल्कि वह तो…”, परिचित ने कहा.
“अच्छा”, सुकरात ने कहा, “इसका मतलब यह है कि तुम मुझे जो कुछ सुनाने वाले थे उसमें कोई भलाई की बात नहीं है और तुम यह भी नहीं जानते कि वह सच है या झूठ. लेकिन हमें अभी भी आस नहीं खोनी चाहिए क्योंकि छन्नी का एक परीक्षण अभी बचा हुआ है. और वह है उपयोगिता की छन्नी. जो बात तुम मुझे बतानेवाले थे, क्या वह मेरे किसी काम की है?”
“नहीं, ऐसा तो नहीं है”, परिचित ने कहा.
“बस, हो गया”, सुकरात ने कहा, “जो बात तुम मुझे बतानेवाले थे वह न तो सत्य है, न ही भली है, और न ही मेरे काम की है, तो मैं उसे जानने में अपना कीमती समय क्यों नष्ट करूं?”
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