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Dec 25, 2010

ब्रिटिश राजघराने में

सबसे महंगी शाही शादी
दुनिया की सबसे महंगी शाही शादी की तारीख तय हो गई है, प्रिंस विलियम और केट मिडिलटन की शादी 29 अप्रैल 2011 को वेस्टमिंस्टर ऐबी चर्च में होगी। शाही शादी में ब्रिटिश राजघराना आम लोगों को शामिल नहीं करता बल्कि उनके लिए स्ट्रीट पार्टी का आयोजन किया जाता है लेकिन प्रिंस विलियम अपनी इस खुशी में आम लोगों को भी शरीक करना चाहते हंै इसके लिए सौ लोगों को ड्रा के जरिए चुना जाएगा। लेकिन फिलहाल ये खुलासा नहीं हुआ है कि यह ड्रा कब और कैसे निकाला जायेगा।
28 वर्षीय विलियम प्रिंस चाल्र्स के बड़े बेटे हैं और पिता के बाद राजगद्दी पर बैठने का दूसरा नंबर उन्हीं का है। प्रिंस चाल्र्स और राजकुमारी डायना के बेटे विलियम की होने वाली जीवनसाथी मिडिलटन भी 28 वर्ष की हैं। विलियम और केट की मुलाकात 2001 में स्कॉटलैंड की सेंट एंड्रयू यूनिवर्सिटी में हुई जहां से दोनों ने कला इतिहास की पढ़ाई की है।
अक्टूबर में प्रिंस विलियम और मिडिलटन की केन्या में सगाई हुई जहां वे छुट्टियां मनाने गए थे। केट मिडिलटन ने सगाई में वही अंगूठी पहनी हुई थी जो कभी प्रिंसेस ऑफ वेल्स, अर्थात विलियम की मां मरहूम प्रिंसेस डायना ने पहनी थी। प्रिंस विलियम ने इसकी महत्ता बताते हुए कहा कि जाहिर तौर पर यह अंगूठी मेरे लिए खास है, जैसे अब केट मेरे लिए खास है। इसीलिए मैंने सोचा इन दोनों को एक साथ रखा जाए। ताकि मेरी मां मेरे इस विशेष दिन के उत्साह और इस खुशी से वंचित न रहे और उसे पता चले कि आने वाली जिंदगी हम साथ गुजारने वाले हैं।
वेस्टमिंस्टर ऐबी जहां यह शाही शादी होने वाली है लगभग एक हजार साल पुराना एक ऐतिहासिक चर्च है जहां महारानी एलिजाबेथ और महारानी विक्टोरिया की शादियां हुई थीं। इसी चर्च में 1997 में लेडी डायना के लिए अंतिम प्रार्थना सभा भी आयोजित की गई थी। प्रिंस विलियम ने कहा है कि 'चर्च की शानदार खूबसूरती और उसके एक हजार साल के इतिहास को देखते हुए हमने वहीं शादी करने का फैसला किया गया है।'
इस शाही शादी से ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को भी नई जान मिलेगी और वहां की अर्थव्यवस्था में एक अरब पौंड का इजाफा होगा ऐसी उम्मीद जताई जा रही है। जाहिर है दुनिया भर से लोग इस शादी में शिरकत करने इंग्लैंड पहुंचेंगे जिससे मंदी से जूझ रहे ब्रिटिश टूरिज्म उद्योग को भी टॉनिक मिलेगा।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन भी इस अवसर को लेकर काफी उत्साहित हैं वे कहते हैं कि 'यह ब्रिटेन के लिए बहुत बड़ा और खुशी का मौका है' यही वजह है कि 29 अप्रैल 2011 को देश भर में सरकारी छुट्टी की घोषणा की गई है ताकि पूरा देश इस आयोजन से जुड़ सके। जाहिर है इससे ब्रिटिश उद्योग को फायदा मिलेगा, यानी शादी के बहाने व्यापार। शाही रीति- रिवाज के मुताबिक होने वाली इस शादी का खर्च दोनों परिवार उठाएंगे लेकिन सुरक्षा और परिवहन पर होने वाला खर्च सरकार के खजाने से जाएगा।

दो ग़ज़लें


-   ज़हीर  कुरैशी
1
नए रास्ते भी मिले एक दिन,
जो खिलते नहीं थे, खिले एक दिन।
पिघलने में हिम को लगे दस बरस,
हुए खत्म शिकवे- गिले एक दिन।
जो रहते थे अपने वचन पर अटल,
वचन से वो अपने हिले एक दिन।
घटा था वो सब उनकी बेटी के साथ,
अधर इसलिए भी सिले एक दिन।
बिना नींव के थे सो गिर भी गये,
बनाये थे हमने किले एक दिन।
जहां भी मरुस्थल में पानी दिखा,
वहीं रूक गये काफिले एक दिन।
जो मेरे ही यत्नों से गतिमान थे,
हुए खत्म वो सिलसिले एक दिन।

2
अपनी भागम- भाग दिनचर्या बदल पाए नहीं,
लोग शहरों में बहुत निश्चिन्त चल पाए नहीं।
उन बहुत गहरे अंधेरों में जले थे रात भर,
नफरतों की आंधियों में दीप जल पाए नहीं।
अपने निश्चित लक्ष्य से पहले भटक जाते हैं तीर,
तीर दिल को चीर कर आगे निकल पाए नहीं।
जब भी हम अनजान रस्ते पर चले तो गिर गए।
हम अचानक ठोकरें खा कर सम्हल पाए नहीं।
उसको देखा तो उन्हें याद आई अपनी लाडली,
वे कली को, इस वजह से भी, मसल पाए नहीं।
भाव तो बाजार में दिन भर उछलते ही रहे,
हम उछलना चाहते तो थे, उछल पाए नहीं।
हैं बहुत से देश, जिनमें रात होती ही नहीं,
चाहकर भी, सूर्य उन देशों में ढल पाए नहीं।
***
जहीर कुरेशी के लेखन की मूल विधा हिन्दी गजल है। वे 1965 से लगातार लिख रहे हैं। अब तक उनके छह गजल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी गजलें विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भी शामिल की गईं हैं।
पता- समीर कॉटेज, बी-21, सूर्य नगर,
शब्द- प्रताप आश्रम के पास, ग्वालियर-474012 (मप्र)
मोबाइल- 09425790565

एक टोकरी भर मिट्टी

एक टोकरी भर मिट्टी
- माधवराव सप्रे

'जब से यह झोपड़ी छूटी है तब से मेरी पोती ने खाना- पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत समझाया पर वह एक नहीं मानती। यही कहा करती है कि अपने घर चल, वहीं रोटी खाऊंगी। अब मैंने यह सोचा है कि इस झोपड़ी में से एक टोकरी भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊंगी। इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी। महाराज, कृपा करके आज्ञा दीजिए तो इस टोकरी में मिट्टी ले जाऊं।'
किसी श्रीमान जमींदार के महल के पास एक गरीब अनाथ विधवा की झोपड़ी थी। जमींदार साहब को अपने महल का हाता उस झोपड़ी तक बढ़ाने की इच्छा हुई। विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोपड़ी हटा ले। पर वह तो कई जमाने से वहीं बसी थी।
उसका प्रिय पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोपड़ी में मर गया था। पतोहू भी एक पांच बरस की कन्या को छोड़कर चल बसी थी। अब यही उसकी पोती इस वृद्धकाल में एकमात्र आधार थी। जब कभी उसे अपनी पूर्वस्थिति की याद आ जाती तो मारे दु:ख के फूट- फूट कर रोने लगती थी। और जबसे उसने अपने श्रीमान पड़ोसी की इच्छा का हाल सुना, तब से वह मृतप्राय हो गई थी।
उस झोपड़ी में उसका मन ऐसा लग गया था कि बिना मरे वहां से वह निकलना ही नहीं चाहती थी। श्रीमान के सब प्रयत्न निष्फल हुए। तब वे अपनी जमींदारी चाल चलने लगे। बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गरम कर उन्होंने अदालत में उस झोपड़ी पर अपना कब्जा कर लिया और विधवा को वहां से निकाल दिया। बेचारी अनाथ तो थी ही, पास- पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी।
एक दिन श्रीमान उस झोपड़ी के आसपास टहल रहे थे और लोगों को काम बतला रहे थे कि इतने में वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहां पहुंची। श्रीमान ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे यहां से हटा दो। पर वह गिड़गिड़ाकर बोली, 'महाराज, अब तो यह झोपड़ी तुम्हारी ही हो गई है। मैं उसे लेने नहीं आई हूं। महाराज क्षमा करें तो एक बिनती है।'
जमींदार साहब के सिर हिलाने पर उसने कहा, 'जब से यह झोपड़ी छूटी है तब से मेरी पोती ने खाना- पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत समझाया पर वह एक नहीं मानती। यही कहा करती है कि अपने घर चल, वहीं रोटी खाऊंगी। अब मैंने यह सोचा है कि इस झोपड़ी में से एक टोकरी भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊंगी। इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी। महाराज, कृपा करके आज्ञा दीजिए तो इस टोकरी में मिट्टी ले जाऊं।' श्रीमान ने आज्ञा दे दी।
विधवा झोपड़ी के भीतर गई। वहां जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और उसकी आंखों से आंसू की धारा बहने लगी। अपने आन्तरिक दु:ख को किसी तरह सम्हालकर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और हाथ से उठा कर बाहर ले आई। फिर हाथ जोड़कर श्रीमान से प्रार्थना करने लगी, 'महाराज, कृपा करके इस टोकरी को जरा हाथ लगाइये जिससे कि मैं उसे अपने सिर पर धर लूं।'
जमींदार साहब पहले तो बहुत नाराज हुए, पर जब वह बार- बार हाथ जोडऩे लगी और पैरों पर गिरने लगी तो उनके भी मन में कुछ दया आ गई। किसी नौकर से न कहकर आप ही स्वयं टोकरी उठाने आगे बढ़े। ज्योंही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे त्यों ही देखा कि यह काम उनकी शक्ति के बाहर है। फिर तो उन्होंने अपनी सब ताकत लगाकर टोकरी को उठाना चाहा, पर जिस स्थान पर टोकरी रखी थी वहां से वह एक हाथ- भर भी ऊंची न हुई। तब लज्जित होकर कहने लगे, 'नहीं यह टोकरी हमसे न उठाई जाएगी।'
यह सुनकर विधवा ने कहा, 'महाराज! नाराज न हों। आप से तो एक टोकरी भर मिट्टी नहीं उठाई जाती और इस झोपड़ी में तो हजारों टोकरियां मिट्टी पड़ी हैं। उसका भार आप जन्म भर क्यों कर उठा सकेंगे? आप ही इस बात पर विचार कीजिए!'
जमींदार साहब धन- मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गये थे, पर विधवा के उक्त वचन सुनते ही उनकी आंखें खुल गईं। कृतकर्म का पश्चाताप कर उन्होंने विधवा से क्षमा मांगी और उसकी झोपड़ी वापस दे दी।
पं. माधवराव सप्रे की कालजयी कहानी
19 जून 1871 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले में स्थित गांव पथरिया में जन्में पं. माधवराव सप्रे ने छत्तीसगढ़ में साहित्य, पत्रकारिता एवं शिक्षा के क्षेत्रों में वंदनीय कार्य किया है। बिलासपुर में मिडिल तक की पढ़ाई के बाद मेट्रिक शासकीय विद्यालय रायपुर से उत्तीर्ण किया। कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीए की डिग्री लेने के बावजूद उन्होंने अंग्रेजों की चाकरी कुबूल नहीं की वे राष्ट्रभक्त एवं सेवाव्रती समाजसेवी बनकर जिये और अपनी साहित्य साधना एवं देश सेवा के लिए पूजित हुए। सप्रे जी ने 1921 में रायपुर में राष्ट्रीय विद्यालय तथा प्रथम कन्या विद्यालय जानकी देवी महिला पाठशाला की भी स्थापना की।
1900 में जब समूचे छत्तीसगढ़ में प्रिंटिंग प्रेस नहीं था तब उन्होंने बिलासपुर जिले के एक छोटे से गांव पेंड्रा से छत्तीसगढ़ मित्र नामक मासिक पत्रिका निकालकर मध्य भारत में हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत की। इसी पत्रिका में छपी उनकी कहानी एक टोकरी भर मिट्टी हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी के रूप में चर्चित हुई। सप्रेजी ने इस कहानी के लिए लोकजीवन में प्रचलित कथा- कंथली से मिट्टी लेकर उसे अभिनव स्वरूप दिया। छत्तीसगढ़ में प्रचलित डोकरी अर्थात वृद्धा से जुड़ी कथाओं का विपुल भंडार रहा है। हर कहानी में केंद्रीय चरित्र के रूप में उपस्थित वृद्धा अपनी समझदारी से विध्नों पर नकेल कसती है और आततायी को पराजित कर देती है। इस कहानी की वृद्धा भी बुद्धि- कौशल से जमींदार को झुका देती है। बुढिय़ा का व्यक्तित्व भावना से परिचालित है। भावाकुलता और चातुर्य के साथ वैराग्य के छत्तीसगढ़ी गुण को भी इस कहानी में बखूबी रेखांकित किया गया है। छत्तीसगढ़ की बूढ़ी दाई अपनी समग्र गरिमा के साथ इस कहानी में उपस्थित है।
इससे पूर्व प्रेमचंद, मुक्तिबोध एवं पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की कहानियां इस स्तंभ में प्रस्तुत की जा चुकी हैं। पढि़ए इस स्तंभ की चौथी कहानी एक टोकरी भर मिट्टी। इस कहानी को साहित्य अकादमी के लिए कमलेश्वर जी ने हिन्दी की कालजयी कहानियां शृंखला में प्रथम कहानी के रूप में छापकर इसके महत्व को रेखांकित किया है।
संयोजक- डॉ. परदेशीराम वर्मा , एल आई जी-18, आमदीनगर, भिलाई 490009, मोबाइल 9827993494

21वीं सदी का सपना

- अमर गोस्वामी
मेरे किशोर होते हुए पुत्र ने एक सपना देखा। उसने देखा कि एक मोटर साइकिल पर वह कहीं जा रहा था। रास्ते में घने जंगल, छोटी- बड़ी नदियां, छोटे- बड़े नगर, इन सबको पीछे छोड़ता हुआ वह एक भव्य महानगर में जा पहुंचा। महानगर के बीच में बने एक आलीशान नगर- द्वार के पास जब वह पहुंचा तो वहां उसे एक ब्रह्यचारी खड़े नजर आए। उन्होंने रेशमी वस्त्र धारण कर रखे थे। उनके गले में रुद्राक्ष की माला और पैरों में मत्स्याकार खड़ाऊ थी। रोशनी का फव्वारा उनके पूरे शरीर पर पड़ रहा था। ब्रह्यचारी ने हाथ के इशारे से रोका। पुत्र रुक गया।
ब्रह्यचारी ने कहा, 'वत्स, तुम न जाने कितने नद- नदी, वन- उपवन, नगर- उपनगर पार करते हुए यहां तक आए हो। तुम्हारी यात्रा पूरी हुई। तुम्हें अब कहीं जाने की जरूरत नहीं। यह महानगरी राजधानी ही सबकी मंजिल है।'
'मगर मुझे तो कहीं और जाना है।'
'यही सबकी मंजिल है, तुम्हारी भी।'
'जो आज्ञा!'
'तुमसे मैं प्रसन्न हूं। एक तोहफा देना चाहता हूं। जरा अपनी बाईं ओर देखो।' पुत्र ने बाईं ओर देखा। एक तरफ स्वर्णाभूषण और मुद्राओं का ढेर था तो दूसरी तरफ एक स्व- चलित स्टेनगन रखी थी। दोनों ही प्रकाश में चमक रहे थे। ब्रह्यचारी ने कहा, 'इन दोनों में से जो चाहो, तुम उठा लो।'
पुत्र ने एक नजर दोनों पर डाली। फिर लपककर स्टेनगन उठा ली। बोला, ब्रह्यचारीजी, यह स्टेनगन मेरे पास रहेगी तो मुझे किसी चीज की कमी नहीं होगी, ऐसे न जाने कितने स्वर्णाभूषण और धन की ढेरियां मेरे कदमों में होगी। बस, आशीर्वाद दीजिए, यह मोटर साइकिल और स्टेनगन सलामत रहे।'
'एवमस्तु!' ब्रह्यचारी ने कहा। अपने सपने की बात सुनकर बेटा हंसने लगा, पर उस दिन से मेरी आंखों की नींद गायब है।
स्त्री का दर्द
वे दोनों शहर से मजदूरी करके और कुछ जरूरत का सामान खरीद लौट रहे थे। स्त्री की गोद में बच्चा था। दोनों की उम्र यही 20-25 वर्ष की रही होगी। ऊबड़- खाबड़ और कंकड़ों- भरी सड़क पर चलते हुए अपने पति के बिवाई- भरे नंगे पैरों को देखकर स्त्री को असुविधा हो रही थी। वह बोली, 'ए, हो दीनू के बाबू! तुम अपनी पनही (जूता) जरूर खरीद लेना।'
'हां।' पुरुष ने कहा।
वे दोनों सोच रहे थे कि पनही खरीदना क्या आसान बात है? इतने दिनों से पैसा जोड़कर माह- भर पहले जो पनही उधार लेकर खरीदा था, उस पर किसी चोर की निगाह पड़ गई। उधार सिर पर था। अब उधार लेकर खरीदने की भी हैसियत नहीं थी।
फिर जहां रोज खाने को रूखा- सूखा जुटाना मुश्किल हो, वहां पनही बहुत ऊंची चीज थी, मगर औरत को अपने पांव में चप्पल और मर्द को नंगे पांव ऊबड़- खाबड़ पथरीले रास्ते पर चलते देखकर असुविधा होती थी। वह कई दिन इसी ऊहापोह में रही, कुछ पैसे चोरी से बचाने की कोशिश की, मगर वे बचे नहीं। उस दिन भी औरत ने कहा, 'न हो तो दीनू के बाबू, यह चप्पल पहन लो।।'
मर्द हंसा, 'जनाना चप्पल पहनें। इससे तो नंगे पैर अच्छे।'
ठीक ही कहा, 'नंगे पैर अच्छे!'
बगल से गंगा नदी बहती थी। चलते हुए औरत मन ही मन कुछ बुदबुदाई, 'हे गंगा मैया अगर जुटा सको तो दोनों को जुटाना नहीं तो इसे भी रख लो।'
औरत ने अपनी चप्पल छपाक से पानी में फेंक दी। अब औरत को मर्द के नंगे पांवों से असुविधा नहीं हो रही थी।

सम्पर्क : डी-139, सेक्टर - 55, जिला - गौतम बुद्ध नगर, नोएडा- 201301, (यूपी), मोबा. 09899010211

संयुक्ता ने सिखाया दिल से

प्रस्तुत किताब 'सीखना ...दिल से' स्कूल की पढ़ाई पूरी करके निकली संयुक्ता नाम की उस लड़की की कहानी है जो कॉलेज में पढ़ाई के परंपरागत ढांचे से अलग हट कर अपनी रूचि के अनुसार पढ़ाई करने का फैसला लेती है और इसमें सफल भी होती है।
आंध्र प्रदेश के एक साधारण मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मी संयुक्ता उच्च शिक्षा के क्षेत्र में चल रहे चूहा दौड़ से बचने का निर्णय लेती है। वह कालेज की बोरिंग पढ़ाई को सालों- साल झेलने के बजाए अपनी खुद की उच्च शिक्षा पाठ्यक्रम निर्धारित करती है, जो उसके दिल और दिमाग दोनों के अनुकूल हो।
अपने दिल की बात मानकर संयुक्ता आगे की जितनी भी और जैसी भी पढ़ाई करती है, उसके इसी सफर को बयान करती है यह किताब। जो कहती है सीखना ऐसे कि जिसमें दिल भी साथ हो।
संयुक्ता की यह किताब उन बच्चों और उनके माता- पिता के लिए भी मार्गदर्शक साबित होगी जो ऐसा सोचते हैं कि परंपरागत उच्च शिक्षा पाकर ही बड़ा ओहदा, बड़ी नौकरी हासिल की जा सकती हैं। और उनके लिए भी जो अपने बच्चे को जबरदस्ती ऐसी पढ़ाई करने पर जोर डालते हैं जिनकी उस विषय विशेष में रूचि ही नहीं होती।
यह किताब सभी युवाओं को कॉलेज की पढ़ाई छोडऩे की राह बताएगी कहना भी गलत होगा परंतु संयुक्ता के अनुभव उन युवाओं को एक नया रास्ता जरुर दिखा सकते हैं जो परंपरागत पढ़ाई के स्थान पर अपने दिल से कुछ अलग कुछ अनोखा करने का सपना देखते हैं। (उदंती फीचर्स)
पुस्तक: सीखना दिल से
लेखक: संयुक्ता, अनुवाद: भरत त्रिपाठी
प्रकाशक: एकलव्य,
ई-10 बीडीए कॉलोनी, शंकर नगर, शिवाजी नगर,
भोपाल 462 016, मूल्य: 80.00 रुपये
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