मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Sep 21, 2010

स्वरुचि भोज


अब तो वैसे मेहमान रहे और ही वैसे मेजबान। किसी ने खाया अथवा किसी ने नहीं खाया, इस बात को लेकर आज कोई मेजबान परेशान नहीं होता। खाया तो ठीक, नहीं खाया तो और भी ठीक।

- गजेन्द्र तिवारी
किस परेशानी में पड़े हुए हैं प्रोफेसर? ... आप तो इस तरह घबरा रहे हैं जैसे आपको लड़ाई के मैदान में जाना हो। किशोरीलाल ने कहा।
लड़ाई के मैदान में जाना होता तो मैं घबराता दरअसल, एक स्वरुचि भोज (बफे डिनर) में जाना है, उसी की याद कर पसीने छूट रहे हैं। प्रोफेसर ने कहा, अभी चार दिन पहले ऐसे ही एक डिनर के दौरान हुए हादसे से अभी तक हमारा सूट उबर नहीं पाया है। ड्राईक्लीनर के यहां पड़ा आहें भर रहा है।
तो फिर इस बार क्या इरादा है आपका? किशोरीलाल ने छेड़ते हुए कहा। गोल मार जाइए।... इतनी भीड़ रहती है। कौन कितना याद रखेगा कि कौन आया और कौन नहीं।
अरे नहीं यार किशोरीलाल। प्रोफेसर ने कहा, रिलेशंस ऐसे हैं महरोत्रा साहब के साथ कि नहीं जाऊंगा तो बुरा मान जाएंगे और जिंदगी भर उलाहने देते रहेंगे।
तो ऐसा करो न। किशोरीलाल ने मध्यमार्ग सुझाते हुए कहा, किसी के हाथ से सगुन का लिफाफा भिजवा दो, जाने की जहमत से भी बच जाओगे और काम भी हो जाएगा। ... और हां, एक और सूट बोलोराम होने से बच जाएगा। क्यों, ठीक कह रहे हैं हम?
ठीक तो कह रहे हो किशोरीलाल, लेकिन वैसा हो नहीं सकता। आज ही महरोत्रा साहब का फोन आया था। खास आग्रह किया है उन्होंने और कहा है कि वे मेरा राह देखेंगे। प्रोफेसर ने कहा, जाना ही होगा किशोरीलाल। होनी को कौन टाल सकता है?
स्वरूचि भोजों का आजकल जो स्वरूप हो गया है, उसे देखते हुए यही कहना होगा कि सीधे और सज्जन व्यक्ति के बस का रोग नहीं गया है यह बफे डिनर। अब तो ऐसे भोजों में बाहुबलियों की चलती है। जो शख्स आक्रामक मुद्रा नहीं अपना सकता, वह ऐसे डिनरों में रसगुल्ला तो दूर, टमाटर का एक टुकड़ा तक नहीं पा सकता।
एक वह भी समय था, जब लोग अपने मेहमानों को इसरार कर- कर के खाना खिलाते थे और मेहमान संकोचवश 'ना-ना' करता रहता था। प्रोफेसर ने कहा, अब तो वैसे मेहमान रहे और ही वैसे मेजबान। किसी ने खाया अथवा किसी ने नहीं खाया, इस बात को लेकर आज कोई मेजबान परेशान नहीं होता। खाया तो ठीक, नहीं खाया तो और भी ठीक।
दरअसल, होता यह है कि इंतजाम तो किया जाता है पांच सौ लोगों के लिए और निमंत्रित किया जाता है पांच हजार लोगों को। ऐसे में मारामारी और अफरातफरी नहीं मचेगी तो और क्या होगा? किशोरीलाल ने कहा।
हम तो कहेंगे कि इन बफे डिनरों के कारण व्यक्ति अपनी सभ्यता और शिष्टता तक को भूलने लग गया है। एक से एक पढ़ेलिखे और एक से बढ़कर एक आभिजात्य वर्ग के लोग भोजन के स्टालों पर यूं टूट पड़ते हैं मानो कि कई बरसों के अकाल-पीडि़त हों। किशोरीलाल ने कहा, तहज़ीब और भलमनसाहत और नज़ाकत जैसी बातों की परवाह किसी को नहीं रहती। सबका एकसूत्रीय कार्यक्रम रहता है- कैसे भर प्लेट भोज्य सामग्री 'लूट' लें ताकि भरपेट छकने का जुगाड़ हो सके।
आजकल यहां तक दरिद्रता पर उतारू हो गए हैं कि हमारे समाज के नामी गिरामी कहलाने वाले लोग मेजबान द्वारा भोजन के लिए अनुरोध किए जाने तक ही परवाह नहीं करते। अब तो बस पंडाल में घुसो और धक्कामुक्की करते हुए प्लेट भरो और पेट भरो अभियान में शामिल हो जाओ। कुछ लोग तो यह योजना बनाकर आते हैं कि आज किस आइटम के बारह बजाने हैं। कुछ चीजें ऐसी होती हैं भोजों में, जिन पर अक्सर ही भोजन भट्टों का कहर टूटता है। जैसे रसगुल्ला, राजभोग, आइसक्रीम।
सामने वाला कितना ही बढिय़ा इंतजाम क्यों करे, उसके परखच्चे उड़ा देने में कतिपय नामचीन लोग, जो कि हर जगह पाए जाते हैं, बड़े माहिर होते हैं इन्हीं के विपरीत ऐसे लल्लू लोग भी होते हैं, जो अव्वल तो रसगुल्ले के कटोरे तक पहुंच भी नहीं सकेंगे और यदि खुशकिस्मती से पहुंच भी गए तो एक पीस लेकर ही तौबा कर लेंगे। किशोरीलाल ने अफसोस प्रकट करते
हुए कहा।
मेरी तो यह समझ में नहीं आता कि एक से बढ़कर एक समझदार लोग प्लेटें भर भरकर वहीं स्टालों से चिपके हुए खड़े क्यों रहते हैं। प्रोफेसर ने कहा, अरे भाई, भर गई प्लेट, अब तो पिंड छोड़ो और दूसरों को मौका दो।
वे लोग मोर्चा संभाले जमे रहते हैं ताकि कोई दुश्मन कोई और चौकी पर कब्जा कर ले। किशोरीलाल ने कहा, मोर्चे से हटना वैसे ही हम भारतीयों की शान के खिलाफ बात है।
इन भोजों में स्टालों पर भगदड़ और आपाधापी का जो माहौल देखने में आता है, उसे देखते हुए इन्हें 'गिद्ध भोज' की संज्ञा ठीक ही दी गई है। वैसे ही चीख पुकार, वैसी ही धमाचौकड़ी। दरअसल, बफे डिनर का रूप इन दिनों इतना भयावह हो गया है कि अपने प्रोफेसर जैसे अनेक लोग अब इन डिनरों में जाने के नाम से ही थरथर कांपने लगते हैं।
ऐसे ही भयभीत और डरपोक लोगों की सहायता के लिए डीएएस वाले पैकेज प्रोग्राम लेकर आए हैं। किशोरीलाल ने रहस्योद्घाटन किया, 'डीएएस' यानी 'डिनर असिस्टेंस सर्विस' यानी अपनी प्यारी हिंदी भाषा में 'भोज सहायक सेवा।' हमारे शहर के उत्साही नौजवानों का स्वयंसेवी संगठन है यह, जो नाम मात्र के सेवा-शुल्क पर अपनी सेवाएं उपलब्ध कराते हैं।
अरे! ऐसा है क्या? प्रोफेसर ने अचरज से कहा, कब बन गई इस प्रकार की संस्था? किन लोगों ने बनाई? और ये किस प्रकार सहायता करते हैं?
सेवाभावी लोगों की अपने यहां कमी नहीं है प्रोफेसर, किशोरीलाल ने कहा। आप जैसे शरीफ लोगों की व्यथा इनसे देखी नहीं जाती इसलिए इन लोगों ने बकायदा एक संगठन बना लिया, जिसका महान धार्मिक उद्देश्य ही है आप जैसे जरूरतमंदों की सेवा करना और वह भी नाममात्र के सेवा शुल्क पर।
लेकिन ये करते क्या हैं? इनकी कार्यप्रणाली कैसी हैं? प्रोफेसर ने सवाल दागे।
आप डिनर पर जाना चाहते हैं लेकिन जाने से डरते भी हैं। ऐसे ही भोज-भीरुओं के लिए फरिश्ते बनकर प्रकट हुए हैं डीएएस के महाबली। किशोरीलाल ने कहा, आपको बस इतना करना है कि इन्हें स्थान, समय और तारीख की सूचना भर देनी है। इसके आगे की जवाबदारी इनकी। ये आएंगे और आपको अपनी अभिरक्षा में ले लेंगे फिर, निर्धारित स्थल पर आपको ले जाएंगे। आपके आगे-पीछे, दाएं-बांए अंगरक्षकों की तरह ये आपके साथ रहेंगे और तलवारें भांजते हुए आपको भोजन के स्टालों की ओर ले जाएंगे।
बस-बस! हम समझ गए। प्रोफेसर ने कहा, उन्हें बुला लो किशोरीलाल। उनको शुल्क क्या देना होगा? अरे, आप जो रकम लिफाफे में देने वाले हैं, उसका पचास प्रतिशत मात्र, किशोरीलाल ने कहा और डीएएस का फोन नंबर मिलाने लगा।
.......................................................
गजेन्द्र तिवारी वकील हैं और बागबहरा छत्तीसगढ़ में रहते हैं। उनकी प्रमुख विधा व्यंग्य है। उनके तीन व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में 900 से अधिक रचनाएं जिनमें कविता, कहानी, समीक्षाएं शामिल हैं छप चुकी हैं। उनका पता है- अधिवक्ता, प्रमुख पथ, बागबहरा (महासमुन्द) .. टेलीफोन नं. 07702-242482

पिकासो के रोचक संस्मरण

हैसियत
पिकासो के दक्षिणी फ्रांस वाले भवन में आने वाले मेहमान यह देखकर अचंभित हो जाते थे कि भवन में कहीं भी किसी भी दीवार पर पिकासो के चित्र नहीं लगे थे।
किसी ने एक बार इस बारे में पिकासो से पूछा- 'कमाल है! आपके घर में आपके ही बनाये चित्र नहीं है! क्या आपको अपने बनाये चित्र अच्छे नहीं लगते?'
पिकासो ने कहा 'ऐसी बात नहीं है। मुझे मेरे चित्र बहुत प्रिय हैं लेकिन मैं उन्हें खरीदने की हैसियत नहीं रखता।'
www.hindizen.com से

सबसे बड़ा और सबसे छोटा


यह दुनिया बड़ी अजीब है कहीं छोटा तो कहीं बड़ा जी हां आइंस्टाइन जहां दुनिया का सबसे छोटा घोड़ा है वहीं कैरिन वेबर के पास दुनिया का सबसे लंबा कुत्ता है।
सात फुट लंबा कुत्ता देखा है
यदि आपके पास पास दुनिया का सबसे लंबा कुत्ता होगा तो आप गर्व तो महसूस करेंगे ही ना। ऐसा ही गर्व महसूस करती हैं दक्षिण कैसल्टन, नॉर्थ डकोटा (अमेरिका) की निवासी कैरिन वेबर। वे अपने इस लंबे कुत्ते का नाम 'गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड' में भेजना चाहती हैं। लैंडसियर न्यूफाउंडलैंड प्रजाति का यह कुत्ता लगभग 180 पाउंड का है और नाक से लेकर पूंछ तक की इसकी लंबाई सात फुट है। कंधे तक इसकी पूरी ऊंचाई है 36 इंच यानी लगभग तीन फुट!
काले और धूसर बालों से भरा यह झबरीला कुत्ता जब किचन में घुसता है तो लगता है जैसे खुद ही किचन टेबल से खाना लेकर खा लेगा और सिंक में बर्तन भी खुद ही धो लेगा! कैरिन वेबर का दावा है कि उनका यह लाड़ला कुत्ता दुनिया का सबसे लंबा कुत्ता है। इससे पहले गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में जिस कुत्ते का नाम दर्ज था, वह था, ग्रेट डेन। इसकी कंधे तक ऊंचाई थी, 42 इंच।
आइंस्टाइन दुनिया का सबसे छोटा घोड़ा
आपने कभी सोचा भी न होगा कि एक नवजात बच्चे के वजन के समान ही नवजात घोड़े का वजन भी हो सकता है। ऐसा हुआ है ब्रिटेन के न्यू हैम्पशायर के बर्नस्टीड में। यहां जन्में इस नवजात घोड़े वजन जन्म के समय 2.7 किलोग्राम और ऊंचाई केवल 14 इंच दर्ज किया गया था। इस नर घोड़े का नाम 'आइंस्टाइन' रखा गया है।
टिज मिनिएचर हॉर्स फार्म में जन्मे इस घोड़े का आकार आश्चर्यजनक है, यह दूसरे नवजात घोड़ों की तुलना में अत्यंत छोटा है और इसे दुनिया के सबसे छोटे घोड़े के रूप में दर्ज करवाया जा सकता है।
इस खूबसूरत और हैरतअंगेज घोड़े आइंस्टाइन के मालिक रसेल वॉगनर का कहना है कि यह घोड़ा गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड में दर्ज चार किलोग्राम के सबसे छोटे नवजात घोड़े से बहुत छोटा है। यानी आइंस्टाइन दुनिया का सबसे छोटा घोड़ा आसानी से बन सकता है।

जागरूकता जरूरी

जागरूकता जरूरी
गुड़ाखू के गुलाम पढ़ा अच्छा लगा। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के अपने 11 वर्ष के प्रवास में मैं भी इसका दुरुपयोग देख चुका हूं। जागृति न होने के कारण न जाने कितने मासूम इसका खमियाजा भुगतेंगे। इसके लिए जनजागरण की नितान्त आवश्यकता है ।
- रामेश्वर काम्बोज हिमांशु , मुम्बई
rdkamboj@gmail.com
पीपली लाइव के बहाने
उदंती का नया अंक देखा। हमेशा की तरह बहुत सुन्दर है । पीपली लाइव पर तो इस समय दुनिया भर की निगाह है। आपने नए ढंग से प्रकाश डाला है। चोला माटी के ... पूरा पढ़ कर आनंद आया। अन्य सामग्री में डिजायनर टंकी अच्छी लगी। चित्रकार महेशचंद्र शर्मा का काम बहुत सुन्दर है। बधाई।
- जवाहर चौधरी, इंदौर
jc.indore@gmail.com
आकर्षक एवं कलात्मक
उदंती जैसी पत्रिका रायपुर से निकल रही है और आज तक मेरी आंखों के आगे से नहीं गुजरी इसका दुख है। बहुत ही आकर्षक कलात्मक एवं सुरूचिपूर्ण एवं पर्यावरण से ओतप्रोत रचनाएं हैं। कुल मिलाकर हमारे राज्य को गौरवान्वित करने की सजग क्षमता। वैज्ञानिक सोच को रेखांकित करने वाला ऐसा प्रयास मैंने नहीं देखा। हां पत्रिका का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक एप्रोच थोड़ा कमजोर लगा।
- रामेश्वर वैष्णव, रायपुर
सार्थक सवाल
कानून के जंगल में न्याय का अकाल पढ़कर अच्छा लगा। आपने बहुत ही सार्थक सवाल को उठाएं हैं। न्याय के अभाव में सार्थक विकास संभव नहीं हो पाता और ईमान के आभाव में कानून सार्थक नहीं हो पाते। विडंबनाओं के इस मकडज़ाल पर चिंता के लिए आप को साधुवाद।
- सुरेश यादव, दिल्ली
sureshyadav55@gmail.com
कहानी नहीं सत्य घटना
उदंती का अंक पहली बार देखने का अवसर मिला और सहसा विश्वास नहीं हुआ कि अपने शहर से इतनी बेहतरीन पत्रिका निकल रही है। कहानी एक और द्रौपदी हाल ही में घटी सत्य घटना है इसे कहानी कहकर समाज के निकृष्ट कार्य को कहानी का छद्म आवरण देने की कोई जरूरत नहीं थी जो विषय की गंभीरता को कमजोर कर देता है। पता नहीं क्यों लेखक इसे सत्य घटना के रूप में प्रस्तुत करने से हिचक गया। छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक स्थलों का वर्णन प्रदेश की संपदा को उद्घाटित तो करता ही है आमंत्रित भी करता है प्रकृति प्रेमी सैलानियों को। हां संपादकीय अवश्य कुछ हथियार डालते हुए सैनिक सा लगा। पत्रिका की कीर्ति समूचे साहित्य जगत में पहुंचे, ऐसी कामना करता हूं।
- के. पी. सक्सेना, टाटीबंध, रायपुर
सम्पूर्ण पत्रिका
हिमांशु जी की छोटे बड़े सपने और कट्टरपंथी दोनों ही अच्छी लघुकथाएं हैं। बधाई। उदंती पहली बार नेट पर देखने को मिली। कुछ नए पुराने अंक भी देखे। गरीबों का मसीहा लघुकथा में अच्छा व्यंग्य किया गया है। दूसरी लघुकथाएं और अन्य सामग्री भी अच्छी हैं। कुल मिलाकर एक सम्पूर्ण पत्रिका है उदंती।
- पवित्रा अग्रवाल
काश इनके सपने पूरे हों
दोनों लघु-कथाएं एक से बढ़कर एक हंै। बच्चों के सपने बच्चों जैसे ही मासूम होते हैं। काश इन जैसे बच्चों के ऐसे सपने पूरे हो जाएं! दूसरी लघुकथा पढ़ते- पढ़ते मेरी तो जैसे सांस ही रुक गई कि आगे क्या होने वाला है... इससे बढ़कर और इन्सानियत क्या होगी ?
- डॉ. हरदीप संधु, सिडनी
shabdonkaujala@gmail.com
विषयों में विविधता
पहली नजर में अंक पढऩे की उत्सुकता बढ़ाता है। विषयों में विविधता है।
- डॉ. प्रेम जनमेजय, नई दिल्ली
प्रासंगिक सामग्री
इतनी सार्थक और प्रासंगिक सामग्री उदंती में देने के लिए धन्यवाद। पीपली लाइव के बहाने फिल्म के बारे में रोचक जानकारी मिली, राहुल सिंह को धन्यवाद, शुभकामनाओं सहित।
- सुधा अरोड़ा, मुंबई- 400076
sudhaarora@gmail.com

पहली कक्षा में पढऩे वाली 102 वर्ष की छात्रा

नौ बच्चों की मां हैं मा जियूजिन। उन्हें आंखों से साफ दिखाई नहीं देता और कानों से ठीक से सुनाई भी नहीं देता, लेकिन इसके बावजूद उनके हौसले में कोई कमी नहीं आई है। 102 उम्र की होने के बाद भी उन्होंने पहली कक्षा में दाखिला लिया है। और इस तरह जियूजिन प्राथमिक विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने वाली विश्व की सबसे उम्रदराज छात्र हैं।
शैनडांग प्रांत की जियूजिन जब 13 साल की थीं तो उन्होंने एक कॉटन मिल में काम करना शुरू कर दिया था। उसके बाद उन्हें पढऩे का मौका नहीं मिल पाया। 18 साल की उम्र में ही जियूजिन की शादी हो गई थी। लेकिन उन्होंने अपने सभी बच्चों को स्कूल भेजा। उनके बेटे फेंगजिन ने कहा कि मेरी मां ने हमें पढ़ाने के लिए अपने सारे जेवर तक बेच दिए।
जियूजिन का सबसे बड़ा सपना एक दिन खुद स्कूल जाना था उसी सपने को अब वह पूरा कर रही हैं। उनके सबसे छोटे बेटे 58 वर्षीय यी फैंगजिन ने उनके सपने को साकार करने में मदद की। उन्होंने ही अपनी मां का स्कूल में दाखिला कराया। उनके लिए स्कूल का पहला दिन बहुत ही सुखद रहा। कक्षा में पहले दिन उन्होंने कहा कि मैं मेहनत से पढ़ाई कर देश के लिए अपना योगदान देना चाहती हूं। उनमें पढऩे की उमंग इतनी कि अध्यापक की बात सुनने के लिए कानों की मशीन और किताबों को पढऩे के लिए बड़े लैंस का इस्तेमाल करती हैं।
तभी तो कहते हैं कि सपने अवश्य देखने चाहिए क्योंकि वे कभी न कभी पूरे अवश्य होते हैं। जियूजिन खुशकिस्मत हैं कि वह इस उम्र में भी स्कूल जा पाईं। पर जियूजिन जैसे बहुत से बच्चे हैं, जिन्हें बचपन में पढऩा नसीब नहीं होता। यदि पढऩे में रुचि रखने वाले बच्चों का सपना पूरा करने में हम भी अपना योगदान दे पाएं तो दुनिया कितनी खुशहाल हो जाएगी क्योंकि शिक्षा से बढ़कर और कुछ भी नहीं है।
मलाइका ने पहनी हीरों जड़ी चोली
बॉलीवुड की 'छइयां-छइयां गर्ल' मलाइका अरोरा खान अपने जलवे बिखेरने में कभी भी पीछे नहीं रहती फिल्म 'दबंग' के गाने 'मुन्नी बदनाम..' से उन्होंने मनचलों की धड़कन भले ही बढ़ा दी हों पर यहां हम उनके फिल्मी ठुमकों के बारे में बात नहीं कर रहे हैं यहां तो इस तस्वीर में पहनी उनकी उस चोली की बात कर रहे हैं जिसकी कीमत लगभग छह करोड़ बताई जा रही है। यह चोली मलाइका ने दिल्ली के एक ज्वेलरी फैशन शो के दौरान पहने थे। 500 कैरेट से ज्यादा के बेल्जियम हीरों से जड़ी लगभग एक लाख यूरो की यह बस्टी (ब्लाऊज) पहनकर मलाइका भला बदनाम क्यों होने लगीं।
अंग्रेजी माता की जय!
उत्तरप्रदेश के लखीमपुर खीरी नगर के नालंदा पब्लिक स्कूल में अंग्रेजी भाषा की प्रतिमा बनाकर उसे देवी के रूप में पूजा जा रहा है। योजना है कि मंदिर बनाकर इस प्रतिमा को उसमें स्थापित किया जाएगा। अनुमान है कि अंग्रेजी भाषा देवी का यह मंदिर 25 अक्टूबर (लार्ड मैकाले का जन्मदिवस) पर तैयार हो जाएगा। सब जानते ही हैं कि लार्ड मैकाले ने ही भारत में अंग्रेजी भाषा की शिक्षा प्रारंभ की थी।
फिलहाल अंग्रेजी भाषा की यह देवी की प्रतिमा स्कूल के प्रिंसिपल के कमरे में रखी है और उसकी पूजा अर्चना प्रारंभ हो गई है। दलित नव विवाहित जोड़े अंग्रेजी भाषा देवी की प्रतिमा के सामने हाथ जोड़कर प्रण करते हैं कि वे अपनी संतान को अंग्रेजी भाषा में ही शिक्षा देंगे।