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Aug 26, 2010

पीपली लाइव के बहाने...गुम होती लोक विधाओं को कैसे बचाएँ


पीपली लाइव के बहाने...
गुम होती लोक विधाओं को कैसे बचाएँ
- राजेश अग्रवाल
छत्तीसगढ़ के लोक-गीत अब बालीवुड के रास्ते दुनिया भर में धूम मचा रहे हैं। दूरदर्शन में समृद्ध लोक नाटकों, प्रहसनों का और आकाशवाणी में ऐसे मशहूर गीतों का खजाना भरा पड़ा है। वक्त आ गया है कि अब इन महान रचनाओं को लोगों को सामने लाने के लिए प्रसार-भारती अपना व्यावसायिक दायित्व निभाए, वरना भद्दे वीडियो एलबम और बेतुके छत्तीसगढ़ी फिल्म, यहां के महान कलाकारों का योगदान धूल-धुसरित करके रख देंगे।

चोला माटी के राम... के जरिये, साल भर के भीतर ही बालीवुड के धुरंधरों ने दूसरी बार छत्तीसगढ़ के कला व संगीत प्रेमियों को उनके घर में उन्हीं का सामान बेचकर चौंका दिया है। दिल्ली-6 में जब प्रसून जोशी ने ससुराल गेंदा फूल का इस्तेमाल किया तो छत्तीसगढ़ी साहित्य और संस्कृति को लेकर चौकन्ना होने का दम भरने वाले बुद्धिजीवी वर्ग ने उनके इस प्रयास की सराहना कम और आलोचना ज्यादा की। ससुराल गोंदा फूल गाने की पृष्ठभूमि खोज निकाली गई और इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया कि फिल्म के गीतकार व संगीतकार ने छत्तीसगढ़ के मूल गीतकार व गायकों का जिक्र नहीं करके उनके साथ धोखाधड़ी की, अन्याय किया।
गीत के बोल व धुन के साथ छेड़- छाड़ का आरोप भी लगा। हालांकि संगीत प्रेमियों का एक बड़ा वर्ग इस बात से कभी सहमत नहीं हुआ और उन्होंने दिल्ली-6 में पारम्परिक ददरिया लोकगीत पर किए गये प्रयोग के लिए प्रसून जोशी व एआर रहमान की भूरि-भूरि प्रशंसा की। पूरे देश के अलावा छत्तीसगढ़ के संगीत प्रेमी इस गीत पर अब भी झूम उठते हैं और उन्हें अपनी माटी की सुगंध देश-विदेश में फैलते देखकर खुशी होती है।
अब छत्तीसगढ़ के साथ-साथ पूरी दुनिया में पद्मभूषण हबीब तनवीर की बेटी नगीन तनवीर की आवाज में, इसी माटी के संगीत का एक बार फिर डंका बज रहा है। इसी माह रिलीज हुई आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म पीपली लाइव का लोक- गीत चोला माटी के राम... हर किसी की जुबान पर है। मांदर की थाप में, करमा के धुन पर तैयार इस तात्विक गीत को करीब 3 दशकों से छत्तीसगढ़ के लोग जानते हैं।
आमिर खान को इस साहस के लिए बधाई देनी होगी कि उन्होंने गीत को उसी मौलिक स्वरूप में मूल लोक वाद्य-यंत्रों के साथ परोसा। यूं तो सालों साल गाए जाने के बाद लोकगीत पारम्परिक मान लिए जाते हैं, लेकिन इस गीत के बोल लिखने वाले गंगाराम साकेत का नाम भी ईमानदारी से डाल दिया गया है। ससुराल गेंदा फूल गीत के गीतकार प्रसून जोशी और संगीतकार एआर रहमान ने मूल गीत व धुन में कुछ फेरबदल कर दिए थे। गीत को तब भी खूब सराहना मिली, इतनी कि इस नाम का एक टीवी सीरियल भी चल रहा है। ससुराल गेंदा फूल के आने पर छत्तीसगढ़ और यहां के कलाकारों की उपेक्षा की जो बात की गई, चोला माटी के राम... गीत में वह भी
नहीं है।
अब तो झेंपने की बारी थोक के भाव में छत्तीसगढ़ी फिल्म और गीत बनाने वालों की है, जो आज तक ऐसा कोई प्रयोग दिखाने का साहस नहीं कर पाए। सिर उन नौकरशाहों, नेताओं भी पीटना चाहिए जो करोड़ों का बजट लेकर राज्य की कला और संस्कृति का उत्थान करने में लगे हैं।
एक तरफ आमिर और प्रसून जैसी प्रख्यात हस्तियां बेधड़क छत्तीसगढ़ के सालों पुराने गीतों को हाथों-हाथ ले रही हैं और दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ की फिल्मों और वीडियो एलबम में बालीवुड के ठुमके, लटके-झटके, पहनावे आदि की भौंडी नकल हो रही है। रायपुर में जिस दिन पीपली लाइव रिलीज हुई उसी दिन गोविन्दा की एक फिल्म के नकल पर रखे गए नाम वाली एक छत्तीसगढ़ी फिल्म भी प्रदर्शित हुई। एक तरफ देशभर के चैनलों में दर्शक मंहगाई डायन और चोला माटी के राम सुन रहे थे, तो रीजनल चैनल में चल रहे इस छत्तीसगढ़ी फिल्म के प्रोमो में नहाती, साड़ी गिराती एक नायिका बालीवुड बालाओं से होड़ करने के चक्कर में नाच रही थी।
एक समय था जब पद्मभूषण हबीब तनवीर का चरणदास चोर नाटक दूरदर्शन पर आता था, तो आधी रात तक जागकर लोग उसे देखते थे। तीजन बाई की पंडवानी को भी दम साधकर सुनने वाले दर्शक मिलते थे। गली-गली में आकाशवाणी के लोकप्रिय गीत लोगों के जुबान पर होते थे। शुक्रवार की शाम बांस गीत का बेसब्री से इंतजार होता था।
लेकिन अब न दूरदर्शन के वैसे दर्शक रह गये न आकाशवाणी के श्रोता। बालीवुड के गीतों को आज मोबाइल पर लोड किया जा सकता है, इंटरनेट पर सुन सकते हैं, फिल्मों व सीडी के अलावा दिन भर टीवी पर आने वाले प्रोमो के जरिये हमारे कानों में ये गीत बार-बार झनक रहे हैं। लेकिन उन पुराने गीतों व लोकनाट्यों का क्या हो, जो आकाशवाणी व दूरदर्शन की लाइब्रेरी में तो हैं, पर कला प्रेमी उसे देख-सुन नहीं पा रहे हैं। कई दशक पहले जब आकाशवाणी मनोरंजन का प्राथमिक व एकमात्र साधन होता था, राज्य के दबे-छिपे कलाकारों को उसने उभरने का मौका दिया, अब कलाकार इसके मोहताज नहीं रह गए। वे अपना वीडियो एलबम खुद निकाल रहे हैं। उन्हें लगता है कि आकाशवाणी ने उसे ले भी लिया तो उसे पहचान भी क्या मिलेगी। अब तो डीवीडी में गाने सुने व देखे जाते हैं। बिना किसी प्रशिक्षण के, छत्तीसगढ़ के लोक-धुनों के साथ वे प्रयोग करते हैं और बाजार में आ जाते हैं। इन गीतों में न छत्तीसगढ़ की मिठास मिलेगी न अभिनय व नृत्यों में लोक तत्वों की मौजूदगी, लेकिन छत्तीसगढ़ को आज उनके इन्हीं उत्पादों के जरिए पहचाना जा रहा है। दूसरी तरफ विडम्बना यह है कि छत्तीसगढ़ को असल पहचान देने वाले सैकड़ो गाने आकाशवाणी की लाइब्रेरी में मौजूद हैं। पर संगीत में रूचि रखने वाले आज के युवाओं को इनके बारे में कुछ पता ही नहीं। टीवी पर क्या आप लक्ष्मण मस्तूरिया या केदार यादव के मधुर गीत सुन या देख पाते हैं? मोर संग चलव रे... का रिंगटोन कोई उपलब्ध करा देगा आपको। टूरा नई जानय रे... का रिंग टोन तो मिल सकता है पर तपत गुरू भई तपत गुरू... सुनने के लिए आप कहां जाएंगे? छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद इस उम्मीद को गहरा धक्का लगा है कि राज्य के लोक संस्कृति को नई ऊंचाई मिलेगी। तोर मन कइसे लागे राजा.. जैसे एक दो गीतों व फिल्मांकनों को छोड़ दिया जाए तो छत्तीसगढ़ के हर पंडाल पर, हर उत्सव और त्यौहार में राज्य की लोक कला को लहूलुहान होते देखा जा सकता है। यदि आज वीडियो एलबमों व छत्तीसगढ़ी फिल्मों में अश्लीलता, मार-धाड़, संवाद में बालीवुड से रेस लगाने की कोशिश दिखाई दे रही है तो इसकी बड़ी वजह आकाशवाणी की वह दकियानूसी नीति भी है, जिसके चलते वह अपने खजाने को आज के लोकप्रिय इलेक्ट्रानिक माध्यमों के जरिये लोगों तक पहुंचाने में परहेज कर रही है। इन गीतों के रि-रिकार्डिंग की जरूरत भी महसूस नहीं की गई, जबकि तब और आज की तकनीक और वाद्य-यंत्रों में काफी परिष्कार हो चुका है। आज तो छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के प्रेमी सालों से उन मधुर गीतों को सुनने के लिए तरस गए हैं, जो उन्हें आकाशवाणी से तब सुनाई देते थे जब वह मंनोरंजन का इकलौता साधन हुआ करता था। दिल्ली-6 और पीपली लाइव में छत्तीसगढ़ी की जय- जयकार के बाद अब तो आकाशवाणी को अपनी गठरी खोल ही देनी चाहिए। इस सच्चाई को स्वीकार करते हुए कि व्यापक श्रोता समुदाय तक अपनी दुर्लभ कृतियों को पहुंचाना अकेले उसके सामथ्र्य की बात नहीं है। इस तरह के फैसले में कोई दिक्कत भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि प्रसार भारती बन जाने के बाद तो उस पर अपने स्तर से संसाधन जुटाने की जिम्मेदारी है। आकाशवाणी व दूरदर्शन दोनों में ही विज्ञापन लिए जा रहे हैं, स्टूडियो किराये पर दिए जा रहे हैं और अनेक स्तरहीन कार्यक्रम भी प्रायोजित इसलिए किये जा रहे हैं क्योंकि उससे इन्हें पैसे मिलते हैं। छत्तीसगढ़ी गीतों को भी वे पैसे लेकर संगीत प्रेमियों को उपलब्ध कराएं तो क्या बुरा है। आकाशवाणी के सालाना जलसे में सीडी के स्टाल भी लगे देखे जा सकते हैं। इनमें वे भारतीय व अन्य क्षेत्रीय संगीत की सीडी बेचते हैं, लेकिन अफसोस कि इनमें छत्तीसगढ़ी गीत आपको नहीं मिलेंगे। प्रसार-भारती को न केवल छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए बल्कि अपने मुनाफे के लिए भी, इस विषय में जल्द फैसला लेना चाहिए। क्योंकि अभी छत्तीसगढ़ी संगीत का जादू न केवल छत्तीसगढ़ में बल्कि देश भर के संगीत प्रेमियों में सर चढ़ कर बोल रहा है। ससुराल गेंदा फूल... और चोला माटी के राम... के बीच करीब डेढ़ साल का अंतराल रहा है। उम्मीद करनी चाहिए कि ये अंतर अब कम हो जाएगा। ठीक समय पर आकाशवाणी भी अपने दायित्व के लिए सजग हो जाए तो फिर बात ही क्या है? ये प्रयास एक दिन छत्तीसगढ़ की गुम होती नैसर्गिक लोक विधाओं को बचा लेंगे वरना छत्तीसगढ़ के लोक-संगीत का कबाड़ा करने के फिल्मकारों व वीडियो एलबम के निर्माताओं के साथ उसे भी जिम्मेदार माना जाएगा।
पता- 15, पत्रकार कालोनी, रिंग रोड नं 2, बिलासपुर (छ. ग.) मो. 098263 67433,
ब्लाग- Sarokaar.blogspot.com

सबसे बड़े विद्वान

सबसे बड़े विद्वान
एक हवाईजहाज में चार लोग सवार थे- एक पायलट, एक किशोर, एक बुजुर्ग और एक दार्शनिक। उड़ान के दौरान अचानक विमान के इंजन में खराबी आ गई। पायलट ने घोषणा की कि अब इस विमान का बचना संभव नहीं है और विमान में सिर्फ तीन ही पैराशूट हैं। किसी एक को तो अवश्य ही मरना होगा। इतना कहकर पायलट फुर्ती से अपने केबिन से निकला और बोला - चूंकि मुझे इस खराबी से संबंधित जानकारी हेडक्वार्टर को देनी होगी अत: मेरा बचना जरूरी है। इतना कहकर उसने एक पैराशूट उठाया और कूद गया। अब दो पैराशूट बचे। दार्शनिक महोदय अपने स्थान से उठे और बोले- मैंने ऑक्सफोर्ड और केम्ब्रिज में पढ़ाई की है। ढेर सारी किताबें लिखीं हैं। मेरे जैसे विद्वान दुनिया में कम ही हैं। अभी दुनिया को मेरी विद्वत्ता की बहुत जरूरत है अत: मेरा बचना बहुत जरूरी है। इतना कहकर उन्होंने भी एक पैराशूट उठाया और कूद गए।
अब सिर्फ एक पैराशूट बचा था। बुजुर्ग सज्जन ने किशोर की ओर देखा और कहा- बेटा, मैं अपनी जिंदगी जी चुका हूं और दो-चार साल में वैसे भी मर जाने वाला हूं। तुम्हारे सामने अभी पूरी जिंदगी पड़ी है। तुम यह पैराशूट उठाओ और कूद जाओ ।
किशोर बोला- चिन्ता मत करो, हम दोनों ही बच जाएंगे। दुनिया के सबसे बड़े विद्वान व्यक्ति पैराशूट की जगह मेरा कपड़ों का बैग उठाकर कूद गए हैं।

मेरे छत पर बना है डिजाइनर वॉटर टैंक

मेरे छत पर बना है डिजाइनर वॉटर टैंक
अगर आप जालंधर- लुघियाना हाइवे पर ट्रेवल कर रहे हैं तो घरों की छत पर बने दिलकश आकार के वॉटर टैंक्स आपका ध्यान अपनी ओर जरूर आकर्षित करेंगे। जी हां यहां लोगों ने अपने घरों पर फुटबॉल, एयरोप्लेन, हाथी, घोड़े आदि की शेप में वाटर टैंक्स बनवाए हैं।
पानी स्टोर करने के लिए सभी घरों की छतों पर वॉटर टैंक बनवाए जाते हैं। लेकिन घर को नया रूप देने और उसे आकर्षक बनाने के लिए जालंधर के लोगों ने नायाब तरीका ढूंढा है। लोग घर की छतों पर डिजाइनर आकार में वॉटर टैंक बना रहे है, जो न केवल उनके घर की सुंदरता को बढ़ाते है बल्कि आम टैंक से ज्यादा पानी भी स्टोर करते हैं। ये टैंक हर राहगीर के लिए अजूबे की तरह हैं और ये शहर की खूबसूरती को भी बढ़ा रहे हैं।
पिछले दिनों इन टैंक्स पर फीफा फीवर भी देखने को मिला। गत वर्ष जितने भी नए मकान बने उनमें सबसे ज्यादा टैंक्स फुटबॉल की शेप में नजर आए। इसके अलावा ईगल, एयरोप्लेन, कार, घोड़े, हाथी, शेर, अंब्रेला, बड्र्स आदि आकार तो हैं ही। इतना ही नहीं इसे बहुत ही सुंदर तरीके से रंगों से डिजाइन कर सजावट भी की गई है।
ये टैंक्स घर के मालिकों के लिए लैंडमार्क की तरह भी काम कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि अब किसी को भी घर का रास्ता बताना आसान हो गया है। बस कहना पड़ता है कि नीले हाथी वाला, मोर वाला या फुटबाल वाला घर मेरा है।
इस नए चलन को लेकर ग्रामीण और शहर दोनों ही क्षेत्रों के लोगों में खासा क्रेज देखने को मिल रहा है। लम्बारन, दोआबा, करतारपुरा, शाहकोट, मालसिया आदि जगाहों पर ऐसे अनेक टैंक्स लोगों ने बनाए हैं। टैंक्स बनाने का सिलसिला केवल शहर और गांवों तक ही सीमित नहीं है। यहां जालंधर- लुघियाना हाइवे पर एयरोप्लेन शेप, पखवाड़ा- चंडीगढ़ बाईपास पर लाल रंग की कार, बांगा से दस किलोमीटर पहले हॉक की शेप और इससे थोड़ा आगे ही बहुत बड़े शेर की शेप के टैंक भी देखे जा सकते हैं।
दोआबा क्षेत्र में वॉटर टैंक बनाने वाले लोग बहुत कम हैं, जिसकी वजह से नकोदर रोड और जंडियाला रोड के सब-अर्बन और रूरल एरिया के मेन्यूफेक्चरर्स को रोजगार मिल रहा है। टैंक मेन्यूफेक्चरर अवतार सिंह कहते हैं कि इन दिनों हमारे पास इस तरह के टैंक बनाने के ऑर्डर पूरे राज्य से आ रहे हैं।
टैंक बनाने वाले कुलबीर सिंह कहते हैं कि इन टैंक्स को बनाने में थोड़ा वक्त लगता है, क्योंकि इन्हें दो हिस्सों में बनाया जाता है। दोनों हिस्सों को अलग से तैयार कर उसकी फिनीशिंग की जाती है और फिर बाहर से इन्हें जोड़ा जाता है। यह जोड़ इतना परफेक्ट होता है कि न तो इससे पानी रिसता और न ही कोई आसानी से पता लगा सकता कि जोड़ कहां लगाया गया है। इन टैंकों की खासियत यह होती है कि निर्माण के समय उपयोग की गई सामग्री की वजह से इस टैंक का पानी अन्य टैंकों की अपेक्षा अधिक ठंडा रहता है।

जिंदगी के तय खाँचे और युवा पीढ़ी

जिंदगी के तय खाँचे और युवा पीढ़ी
- उमेश चतुर्वेदी
...तो क्या किताबें मर जाएंगी ...क्या नए यंत्रों की दुनिया उन्हें खा जाएगी...यहां पर याद आता है मशहूर अमेरिकी पत्रकार वाल्टर लिपमैन का कथन। उन्होंने कहा था- दुनिया जैसी भी है, चलती रहेगी। फिर हम भी उम्मीद क्यों न बनाए रखें।
बहुत खुशनसीब वे होते हैं, जिनकी जिंदगी की तय खांचे और योजना के मुताबिक चलती है। लेकिन आज की पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने अपने बच्चों तक की जिंदगी के लिए खांचे तय कर रखे हैं और इसी खांचे के तहत जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ रही है। मनोवैज्ञानिक और शिक्षाशास्त्री भले ही इस चलन को गलत बताते रहें, थ्री इडियट जैसी फिल्में भी इसकी आलोचना करती रहें, लेकिन उदारीकरण के बाद आई भौतिकवाद की आंधी और उसमें कठिन और कठोर हुई जिंदगी की पथरीली राह पर चलते वक्त आज की जवान होती पीढ़ी के लोग सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि काश उनके भी माता- पिता ने उनकी जिंदगी का खांचा तय कर दिया होता ...
बहरहाल अपनी जिंदगी भी ऐसी खुशनसीबी के पड़ावों से नहीं गुजरी। जिस वक्त जिंदगी तय करने का वक्त था, पढ़ाई के उस दौर में रोजाना ट्रेन की घंटों की यात्रा करना मजबूरी थी। घर से कॉलेज की दूरी जो ज्यादा थी। लेकिन इस अनखांचे की जिंदगी ने खुदबखुद एक खांचा दे दिया। तब ट्रेन की लंबी यात्रा काटने के लिए किताबों और पत्रिकाओं का सहारा लेना शुरू किया और देखते ही देखते किताबें और पत्रिकाएं जिंदगी की पथरीली राह पर सहारा तो बन ही गईं, जिंदगी को देखने का नया नजरिया भी देने लगीं। किताबों की दुनिया से लोगों को परिचित कराने में ट्रेनों की बड़ी भूमिका रही है। मशहूर पत्रकार प्रभाष जोशी ने एक बार कहा था कि रेल यात्राओं का एक बड़ा फायदा उनकी जिंदगी में यह रहा है कि इसी दौरान उन्होंने कई अहम किताबें पढ़ लीं। रेल यात्रियों के मनोरंजन में किताबों की जो भूमिका रही है, उसमें एक बड़ा हाथ एएच व्हीलर बुक कंपनी और सर्वोदय पुस्तक भंडार जैसे स्टॉल का भी रहा है। यह भी सच है कि इन स्टॉल्स से गंभीर साहित्य की तुलना में इब्ने सफी और कुशवाहा कांत के साथ गुलशन नंदा, रानू, सुरेंद्र मोहन पाठक और वेदप्रकाश शर्मा जैसे लुगदी साहित्यकार ज्यादा बिकते रहे हैं। यहां पाठकों की जानकारी के लिए बता देना जरूरी है कि इन साहित्यकारों को लुगदी साहित्यकार क्यों कहा जाता है। दरअसल इनकी रचनाएं जिस कागज पर छपा करती थीं, वह कागज अखबारी कचरे और किताबों के कबाड़ की लुगदी बनाकर दोबारा तैयार किया जाता था। बहरहाल इसी लुगदी साहित्य के बीच ही गोदान, गबन से लेकर चित्रलेखा तक पढऩे वाले पाठक भी मिल जाते थे। इसके साथ ही
पाठकीयता का एक नया संसार लगातार रचा-बनाया जाता था। ट्रेन में बैठने
की जगह मिली नहीं कि किताब या पत्रिका झोले से निकाली और अपनी दुनिया में डूब गए।
लेकिन आज हालात बदल गए हैं। तकनीकी क्रांति ने आज की पीढ़ी के हाथ में मोबाइल के तौर पर नन्हा-मुन्ना कंप्यूटर ही दे दिया है। मोबाइल फोन सचमुच में जादू का पिटारा है। बीएसएनएल की मोबाइल फोन सेवा का 2003 में उद्घाटन करते वक्त तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे पंडोरा बॉक्स ही कहा था। तो इस जादुई बॉक्स ने संगीत और एफएम का जबर्दस्त सौगात दे दिया है। आज की पीढ़ी इसका हेडफोन साथ लेकर चलती है और गाड़ी या बस में जैसे ही मौका मिला, हेड फोन कान में लगाती है और दीन-दुनिया से बेखबर संगीत की अपनी दुनिया में डूब जाती है। मेरे एक मित्र हैं, वे इस पीढ़ी को ढक्कन वाली पीढ़ी कहते हैं। आपने होमियोपैथिक दवाओं की पुरानी शीशियां देखी होंगी। कार्क लगाकर उन्हें बंद किया जाता था। आज के हेडफोन कुछ वैसे ही कान में कार्क की तरह फिट हो जाते हैं, जैसे पहले ढक्कन लगाए जाते थे। जाहिर है कि ढक्कन वाली इस पीढ़ी से रेल और बस यात्राओं के दौरान पढ़े जाने का जो रिवाज रहा है, वह लगातार छीजता जा रहा है। आज की पीढ़ी के हाथ में पत्रिकाएं और किताबें कम ही दिखती हैं। लेकिन नई-नई सुविधाओं वाले यंत्र उनके हाथ में जरूर हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव मोहन प्रकाश जैसे नेता कहा करते हैं कि जब वे पढ़ाई करते थे, उस वक्त अगर दिनमान में उनकी चिट्ठी भी छप जाती थी तो वे पूरी यूनिवर्सिटी में गर्व से उसे लेकर अपने बगल में दबाए घूमा करते थे। वैसे भी दिनमान और धर्मयुग पढऩा उस समय शान की बात मानी जाती थी। लेकिन आज की पीढ़ी के लिए नए यंत्र ही शान के प्रतीक हैं। जाहिर है कि सोच में आए इस बदलाव का असर भी दिख रहा है। चूंकि पाठकीयता नहीं है, उसका संस्कार नहीं है तो आप देखेंगे कि आज की पीढ़ी के ज्यादातर लोगों को सामान्य ज्ञान की सामान्य सी जानकारी भी नहीं है। इसका दर्शन यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में पढ़ाने वाले अध्यापकों- प्रोफेसरों को रोजाना हो रहा है। कई बार तो वे माथा तक पीटने के लिए मजबूर हो जाते हैं। लेकिन क्या मजाल कि ढक्कन वाली पीढ़ी के माथे पर शिकन तक आ जाए। हो सकता है बदले में आपको यह भी सुनने को मिले- इट्स ओके...सब चलता है यार...
... तो क्या किताबें मर जाएंगी... क्या नए यंत्रों की दुनिया उन्हें खा जाएगी...यहां पर याद आता है मशहूर अमेरिकी पत्रकार वाल्टर लिपमैन का कथन। उन्होंने कहा था- दुनिया जैसी भी है, चलती रहेगी। फिर हम भी उम्मीद क्यों न बनाए रखें।
पता: c/o जयप्रकाश, एफ 23-ए, निकट शिवमंदिर, दूसरा तल, कटवारिया सराय, नई दिल्ली 110016.
ईमेल- uchaturvedi@gmail.com

3 साल की बच्ची से लेकर 60 साल की बुजुर्ग तक

गुड़ाखू के गुलाम
3 साल की बच्ची से लेकर 
60 साल की बुजुर्ग तक
- पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर
इस तस्वीर में गुडिय़ा जैसी दिखनेवाली 3 साल की इस नन्ही परी का नाम टमी है। 3 साल की इस बच्ची की उंगली में गुड़ाखू लगा है और वह उससे दांत घिस रही है। कालाहांडी जिले के नियमगिरि पहाड़ में बसे गांव लाखपदर में जब मैंने उसे घर के बाहर खड़े होकर गुड़ाखू करते देखा तो पशोपेश में पड़ गया। गुड़ाखू यानी एक तरह का तंबाकू मिश्रित दंतमंजन, जिसमें अच्छा-खासा नशा होता है। सोचा, जरुर यह बच्ची गलती से गुड़ाखू कर रही होगी। मैंने घर के अंदर बैठी उसकी मां को आवाज़ लगाई। मां का जवाब था- नहीं, वह गुड़ाखू ही कर रही है।
उसकी मां खुद भी गुड़ाखू करती है और उन्होंने कहा कि उनके गांव की ज्यादातर लड़कियां और महिलायें गुड़ाखू करती हैं। पुरुष तो गुड़ाखू करते ही हैं।
इतने घने जंगल में बसे इस डोंगरिया कंध आदिवासी गांव में यह गुड़ाखू किस हद तक अपने पैर पसार चुका है, इस बात को समझने के लिये टमी की हालत देखना पर्याप्त था। तंबाकू मिला यह कथित दंतमंजन उस नन्हीं सी जान के जिस्म में किस तरह के दुष्प्रभाव पैदा कर रहा होगा और आगे क्या करेगा, यह पता नहीं पर इसमें कोई शक नहीं कि टमी के लिये इसका इस्तेमाल जानलेवा भी साबित हो सकता है।
हालांकि टमी को तो इसका इल्म भी नहीं है लेकिन उसकी मां भी इस बात से बेखबर है कि उन्होंने जाने-अनजाने कितनी खतरनाक चीज को अपना लिया है।
आस-पास के छोटे दुकानों के अलावा साप्ताहिक हाट में सब तरफ मिलने वाला यह गुड़ाखू जिन छोटी-छोटी डिबियों में बिकता है, उसमें किसी तरह की कोई चेतावनी भी नहीं लिखी होती है। यहां तक कि गुड़ाखू कैसे बनता है और उसमें क्या-क्या सामग्री मिलाई गयी है, उसकी भी कोई जानकारी नहीं दी जाती है। जनता के नाम अपील में दर्ज होता है कि गुड़ाखू वास्तव में तम्बाकू मिश्रित एक दंत मंजन है।
तंबाखू के सेवन से शरीर को जितना नुकसान होता है, उतना ही नुकसान गुड़ाखू के सेवन से भी होता है। इसके प्रयोग से मुंह और श्वांस नली के विभिन्न भागों में कैंसर हो सकता है। दांतों में इसे घिसने से हाजमा खराब होना, भूख न लगना, एलर्जी और अल्सर आदि रोग बड़ी तेजी से
पनपते हैं।
तंबाखू के सेवन से शरीर को जितना नुकसान होता है, उतना ही नुकसान गुड़ाखू के सेवन से भी होता है। इसके प्रयोग से मुंह और श्वांस नली के विभिन्न भागों में कैंसर हो सकता है। दांतों में इसे घिसने से हाजमा खराब होना, भूख न लगना, एलर्जी और अल्सर आदि रोग बड़ी तेजी से पनपते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल तकरीबन 10 लाख भारतीयों की मौत केवल धुम्रपान जनित बीमारी से होती है। लगभग 28 प्रतिशत भारतीय यानि आबादी का एक तिहाई तम्बाकू का सेवन करता हैं, जिनमें 15 से 49 वर्ष के लोग शामिल हैं। लेकिन इनके मुकाबले महिलाओं के आंकड़े भी कमजोर नहीं हैं। तकरीबन 11 प्रतिशत यानि करीब 5 करोड़ 40 लाख महिलाएं किसी ना किसी रूप में तम्बाकू का सेवन करती हैं। इनमें ज्यादातर महिलाएं धुआं रहित तम्बाकू का इस्तेमाल करती हैं, जैसे तम्बाकू वाला गुटखा, पान मसाला, मिश्री गुल आदि। 35 से 69 वर्ष की तकरीबन 20 में से एक यानि 90,000 महिलाओं की मौत के लिए धुम्रपान को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
लेकिन इन सारे आंकड़ों से बेखबर उड़ीसा के घने जंगलों में बसे इन गांवों में गुड़ाखू के अलावा खैनी और गुटका भी लोगों को नशे की एक ऐसी गिरफ्त में कस रहे हैं, जिससे निकलना मुश्किल है। पहाड़ी रास्तों में हर जगह गुटका और खैनी के खाली पाउच नजर आते हैं। गांव की बुजुर्ग महिलाएं और युवतियों में तो जैसे खैनी खाने की होड़ सी लगी हुई है। ये महिलाऐं खैनी को अपनी कमर में खोंस के रखती हैं। फिर चाहे वह घर पर हों, बाजार जा रही हों, काम पर या रिश्तेदारों के घर। कमर में हर वक्त खैनी की एक पोटली पड़ी रहती है।
गौरतलब है कि कालाहांडी जिले के लांजीगढ़ ब्लाक के नियमगिरि पहाड़ में बसे ये आदिवासी, बदनाम ब्रितानी कंपनी वेदांता के खिलाफ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, जो नियमगिरि पर्वत में बॉक्साइट की खुदाई करना चाहता है। नियमगिरि पर्वत को डोंगरिया कंध नियम राजा कहते हैं और उसकी पूजा अर्चना करते हैं क्योंकि यहां पीढिय़ों से ना केवल उनका बसेरा है बल्कि यह नियमगिरि उन्हें वह सब कुछ देता है, जो उन्हें चाहिये। इस 'सब कुछ' में भोजन से लेकर जड़ी-बुटी और दूसरे जरुरी सामान शामिल हैं।
ऐसे में आश्चर्य नहीं कि तंबाकू, गुटका, खैनी और गुड़ाखू जैसी नशीली सामग्री को इलाके में जिस तरह से विस्तारित किया जा रहा है, उससे आदिवासी समाज के अंदर एक खास किस्म की अराजकता और कमजोरी पैदा हो रही है। जाहिर है, इससे ब्रितानी कंपनी वेदांता के खिलाफ चल रही लड़ाई भी कहीं न कहीं कमजोर पड़ेगी ही।
दूसरी ओर जिस राज्य सरकार को अपनी आदिवासी जनता की सुध लेनी थी, उसका कहीं अता-पता नहीं है। उदाहरण के लिये लाखपदर गांव को ही लें। गांव में ना तो स्कूल है, ना ही स्वास्थ्य केंद्र। गांव तक आने के लिये कोई सड़क भी नहीं है। गांव के छोटे बच्चे भी अपने मां-बाप के साथ जंगल जाते हैं और घर के लिए खाना जुगाडऩे में लगे रहते हैं।
मामला केवल लाखपदर और कालाहांडी तक सिमटा हुआ है, ऐसा नहीं है। कोरापूट जिले के पोटापोड़ू गांव में जब हम पहुंचे तो गांव के बाहर एक इमली के पेड़ के नीचे बड़ी संख्या में महिलाएं बैठी थीं। अधिकांश महिलाओं के कान में तंबाकू के पीका लगे हुए थे। ये ऐसे पीका हैं, जिनसे महिलाएं नशे का सेवन करती हैं। पता चला कि गांव की अधिकांश महिलाओं को इसकी लत है। दूसरी और महिलाओं के एक साथ मिल बैठने और खाली समय में बोरियत दूर करने के लिये भी पीका का सेवन किया जा रहा है। महिलाएं पीका में डूबी हैं। कम उम्र की लड़कियां और गर्भवती औरतें भी। इस बात से बेखबर कि इसका उनके स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा। सरकार की लापरवाही और उदासीनता से एकदम दूर, जैसे हर फिक्र को धुयें में उड़ाते हुये और जीवन की हर समस्या को गुड़ाखू की तरह समय की धार पर घिसते हुये। (रविवार.com से)