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Sep 23, 2009

बदलती फिल्मी दुनिया


जिन्दगी का साज भी क्या साज है, बज रहा है और बेआवाज है...
'जागृति' जैसी बच्चों की फिल्म अब कौन बनाता है। आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झांकी हिन्दुस्तान की ... ने इस फिल्म को अमर कर दिया। राजकपूर की 'आवारा' ने दिखाया है कि बढ़ते बच्चे पर वातावरण का  वंशानुक्रम से ज्यादा असर पड़ता है।
- अरुण कुमार शिवपुरी
हिन्दी सिनेमा ने समाज को बदला है या समाज की छिपी भावनाओं को सिनेमा ने उभारा है, यह कहना मुश्किल है। दादा साहब फाल्के के वक्त से अब तक हिन्दी सिनेमा ने काफी लम्बा सफर तय किया है। इसमें चोटी के कलाकारों, निर्माता निर्देशकों व संगीतकारों का बड़ा हाथ रहा है। मूक फिल्मों के दौर से निकलकर हमने बहुत तकनीकी ऊंचाईयों को छुआ है। आजकल की फोटोग्राफी, लोकेशन और रंग आपको दूसरी दुनिया में ले जाते हैं। लेकिन वहीं कला की बारीकियों में धीरे-धीरे गिरावट देखी गई है।
आपको मालूम होगा कि मीनाकुमारी का असली नाम माहजबीं था यानि चान्द की मुस्कराहट। उनकी अभिनीत फिल्में किसको नहीं याद हैं? बिमल मित्र लिखित 'साहिब बीबी और गुलाम' फसाने पर गुरुदत्त ने यादगार फिल्म बनाई। उसमें जहां गुलाम की वफा व कौतुहल दिखाया था, वहीं छोटी बहू के किरदार को मीनाकुमारी ने जिस ऊंचाई पे पहुंचा दिया शायद ही उस तक कोई पहुंच पाये। यह इन कलाकारों की कड़ी मेहनत, लगन व समझ को दर्शाता है। गुरुदत्त ने बहुत ही बीरीकी से उस समय के बंगाल के जमींदार परिवार की जीवनशैली, ठाट-बाट व अधोपतन को दिखाया है। तिजोरी का खाली दिखना, मीनाकुमारी का अपने पति की मंगल कामना के लिए फि़टन पर बैठकर गुलाम के संग जाना व उसका अन्त तथा रहमान व सप्रू की एक्टिंग गजब की है। अबरार अल्वी के डायलॉग ने फिल्म को अमर बना दिया।
एक लम्बा अर्सा गुजर जाने पर भी अनेक फिल्में हमारे दिलो दिमाग पर अभी भी छाई हुई हैं। विमल राय की देवदास, मधुमती, दो बीघा जमीन, महबूब खां  की अमर, मदर इंडिया, कमाल अमरोही की महल व पकीजा, गुरुदत्त  की कागज के फूल, प्यासा, मिस्टर एंड मिसेज 55, चौदवीं का चांद, राजकपूर की आवारा व श्री 420, के.आसिफ की मुगले आजम, वी शांताराम की दो आंखें बारह हाथ, सुबह का तारा, सत्यजीत रे की मुंशी प्रेमचंद की कथा पर बनी मार्मिक सद्गति आदि मील के पत्थर हैं।
 'बैजू बावरा' के मीनाकुमारी व भारत भूषण, उसका संगीत,  'शबाब' में नूतन का यौवन व सौन्दर्य साथ में भारत भूषण, सोहराब मोदी की  'मिर्जा गालिब'  में सुरैय्या व गालिब के किरदार में भारत भूषण,  'शिकस्त' की नलिनी जयवन्त जमीदारनी की भूमिका में व अशोक कुमार  'अलबेला'  का मनमोहने वाला संगीत गीताबाली की खूबसूरती, और भगवान का रोल,  'खूबसूरत' की दीना पाठक, अनारकली का संगीत व बीनाराय,  'सिकन्दर' के सोहराब मोदी व पृथ्वीराज कपूर बेजोड़ हैं। परिणीता (मीनाकुमारी, अशोक कुमार) तीसरी कसम, जुनून, त्यागपत्र, मुझे जीने दो, अमानुष, नमक हराम, कोरा कागज, चश्मे बद्दूर, जाने भी दो यारो, सारांश, गुमराह... आदि नामी फिल्में थीं।
बिमल राय की  'देवदास'  में दिलीप कुमार ने देवदास, वैजयन्तीमाला ने नर्तकी चन्द्रमुखी, मोतीलाल ने चुन्नी बाबू व सुचित्रा सेन ने पारो का अभिनय जिस खूबसूरती से किया है वह आप शायद ही किसी फिल्म में अब देख पाएं। आज के कलाकारों ने जब वह जीवन ही नहीं देखा, न वैसी तालीम पाई, तो उसको सुनना, समझना व पेश करना उनके लिए बड़ा मुश्किल है।
फातिमा कनीज, जो फिल्मों में नरगिस के नाम से आईं ने  'मदर इंडिया' में अभिनय कर के दिखा दिया कि वे कला में कितनी पारंगत हैं। उनके जैसा अभिनय शायद ही कोई कर पाता। 'किस्मत' में अशोक कुमार कितने चपल व सुन्दर हैं, वहीं 'महल' में मधुबाला वीनस नजर आती हैं। इस फिल्म में लता मंगेश्कर का गाया गाना आयेगा आने वाला... दीपक बगैर कैसे परवाने जल रहे हैं ... को अभी भी कोई भूला नहीं हैं। 'महल' में असली कथक को दिखाया गया है जिसको समझने वाले अब कम ही हैं।
मिर्जा हादी रूसवा के उपन्यास पर बनी फिल्म 'उमराव जान' में मुजफ्फर अली ने उन्नीसवींसदी के अवध को बहुत सुन्दरता से उतार कर रख दिया। बंगला (फैजाबाद) की अमीरन का सफर किस- किस दौर से गुजरा, उसने अपनी जईफी में लखनऊ के चौक में खुद, रूसवा को जबानी सुनाया था। मुजफ्फर अली ने अवध के रहन-सहन, नजाकत-नफासत व महफिलो को बहुत क्लासिकल अंदाज से आपके सामने पेश किया। इन फिल्मों में जीवन की वास्तविकता को दिखाया जाता था, खूबसूरत चित्रण था व शिक्षा भी मिलती थी।
'मुगले आजम' में पृथ्वीराज कपूर ने दिखा दिया कि अकबर की भूमिका के लायक उनसे बढ़कर किसी और का होना मुश्किल है। 'पाकीजा' को राजकुमार, मीनाकुमारी व वीना ने यादगार बना दिया। कमाल अमरोही ने इस फिल्म में रुहेलखण्ड के चूड़ीदार पजामा कुत्र्ता, वहां के रहन- सहन व तवायफ की दुनिया को बेजोड़ ढंग से दर्शकों के सामने पेश किया है। इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मोरा ... व ठाड़े रहियो ... अब आपको आजकल की फिल्मों में नहीं मिलेगा।
'जागृति' जैसी बच्चों की फिल्म अब कौन बनाता है। आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झांकी हिन्दुस्तान की ... ने इस फिल्म को अमर कर दिया। राजकपूर की 'आवारा' ने दिखाया है कि बढ़ते बच्चे पर वातावरण का वंशानुक्रम से ज्यादा असर पड़ता है। 'श्री 420' का रिमझिम बारिश में छाता लिए नर्गिस व राजकपूर पर फिल्माया गाना प्यार हुआ इकरार हुआ .... आपको रोमान्स की खूबसूरत दुनिया में ले जाता है पर उसमें आप नग्नता को कही नहीं पायेंगे।
शैलेन्द्र, शकील बदायूंनी, मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी व जां निसार अख्तर जैसे मशहूर कवि शायर अब कहां हैं? उनके गीतों, गजलों के मतलब होते थे। नौशाद, सी. रामचंद्र (चितलकर) खेमचन्द्र प्रकाश, खय्याम, ओपी नैय्यर, शंकर जयकिशन व एसडी बर्मन का संगीत सर चढ़कर बोलता था। गीता दत्त (राय) व मुकेश के गानों का दर्द अनूठा था। कुन्दन लाल सहगल के गाये गीत, भजन, गजल अपना सानी नहीं रखते। सहगल का गाया फिल्म 'देवदास' का गीत बालम आय बसो मेरे मन में ... या फिल्म 'स्ट्रीट सिंगर' के लिए गाया गीत बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाय ... प्रमाण है सहगल की उस गायन प्रतिभा के  जिसने उनके गाये प्रत्येक गीत गजल को अविस्मरणीय बना दिया।
तलत महमूह की रेशमी आवाज, मुहम्मद रफी ने बहुत खूबसूरत भजन भी गाये वे बुलंद आवाज के मालिक थे। जोहरा बाई अम्बाले वाली, कानन बाला/ देवी, राजकुमारी, उमा देवी, अमीर बाई कर्नाटकी, शमशाद बेगम, सुरैय्या, मुबारक बेगम अब अतीत के होके रह गये पर लोग उन्हें भुला न पाये। इसी तरह लता मंगेश्कर के शुरुआती दौर के फिल्मी गाने बहुत मधुर थे। उनका गाया 'अमर' का गीत चलो अच्छा हुआ अपनो में कोई गैर तो निकला, अगर अपने ही होते सब, तो बेगाने कहां जाते.... अब आपको फिल्मों में नहीं मिलेगा।
पर अब गाने फास्ट बीट और साजों की तेज आवाज पर चलते हैं। नृत्य में भी हिन्दुस्तानी परंपरा तहजीब व कला का अभाव होता है। इसमें कोई गहराई नहीं होती। गीतों के कोई खास मायने भी नहीं होते, वे तुकबन्दी बन कर रह गये हैं। सांवरियां फिल्म में नायक को टॉवेल में दिखाया गया है। आजकल नायकों के शरीर को दिखाना एक आम बात सी हो गई है। फिल्मों में जिस्म को उघाढ़ कर दर्शकों के मन को खींचने की कोशिश की जाती है। अब फिल्में ग्लैमर का सहारा लेती हैं। आपको आस्ट्रेलिया, वेल्स, न्यूजीलैंड, नामीबिया की सैर कराई जाती है। अब फिल्मों में एक्शन ज्यादा व अभिनय की गहराई कम देखने को मिलती है। फिल्मी संवाद भी सभ्रान्त नहीं रह गये। बाजारू व चालू भाषा का प्रयोग कर आपको लुभाने की कोशिश की जाती है। जीवन की असलियत को बताने वाला गाना जिन्दगी का साज भी क्या साज है, बज रहा है और बेआवाज है... जो नसीम बानू ने फिल्म पुकार में गाया को सुनने, समझने वाले गिनती के मिलेंगे। तलफ्फुज (उच्चारण) को भी अब कुछ खास महत्व नहीं दिया जाता। आज की दुनिया में धनोपार्जन का अव्वल स्थान है, कला दोयम दर्जे पर पीछे हो गई हैं।

कालजयी कहानियाँ

गिरगिट
-  अन्तोन चेखव
आंतोन पावलोविच चेखव विश्व के महान रूसी कथाकार और नाटककार थे। उनका जन्म दक्षिण रूस के टगनरोग में 29 जनवरी 1860 को हुआ और उनकी मृत्यु तपेदिक के कारण 15 जुलाई 1904 को हुई। अपने छोटे से साहित्यिक जीवन में उन्होंने रूसी भाषा को चार कालजयी नाटक दिए जबकि उनकी कहानियाँ विश्व के समीक्षकों और आलोचकों में बहुत सम्मान के साथ सराही जाती हैं। चेखव अपने साहित्यिक जीवन के दिनों में ज़्यादातर चिकित्सक के व्यवसाय में लगे रहे। वे कहा करते थे कि चिकित्सा मेरी धर्मपत्नी है और साहित्य प्रेमिका। छोटी कहानियों की शृंखला में प्रस्तुत है चेखव की एक बहुचर्चित कहानी 'गिरगिट' का अनुवाद।
पुलिस का दारोगा ओचुमेलोव नया ओवरकोट पहने, बगल में एक बण्डल दबाये बाजार के चौक से गुजर रहा था। उसके पीछे-पीछे लाल बालों वाला पुलिस का एक सिपाही हाथ में एक टोकरी लिये लपका चला आ रहा था। टोकरी जब्त की गई झडग़रियों से ऊपर तक भरी हुई थी। चारों ओर खामोशी। ...चौक में एक भी आदमी नहीं। ....भूखे लोगों की तरह दुकानों और शराबखानों के खुले हुए दरवाजे ईश्वर की सृष्टि को उदासी भरी निगाहों से ताक रहे थे, यहां तक कि कोई भिखारी भी आसपास दिखायी नहीं देता था।
'अच्छा! तो तू काटेगा? शैतान कहीं का!' ओचुमेलोव के कानों में सहसा यह आवाज आयी, 'पकड़ तो लो, छोकड़ो! जाने न पाये! अब तो काटना मना हो गया है! पकड़ लो! आ...आह!'
कुत्ते की पैं-पैं की आवाज सुनायी दी। आचुमेलोव ने मुड़कर देखा कि व्यापारी पिचूगिन की लकड़ी की टाल में से एक कुत्ता तीन टांगों से भागता हुआ चला आ रहा है। कलफदार छपी हुई कमीज पहने, वास्कट के बटन खोले एक आदमी उसका पीछा कर रहा है। वह कुत्ते के पीछे लपका और उसे पकडऩे की कोशिश में गिरते- गिरते भी कुत्ते की पिछली टांग पकड़ ली। कुत्ते की पैं-पैं और वही चीख, 'जाने न पाये!' दोबारा सुनाई दी। ऊंघते हुए लोग दुकानों से बाहर गरदनें निकालकर देखने लगे, और देखते-देखते एक भीड़ टाल के पास जमा हो गयी, मानो जमीन फाड़कर निकल आयी हो।
'हुजूर! मालूम पड़ता है कि कुछ झगड़ा-फसाद हो रहा है!' सिपाही बोला।
आचुमेलोव बाईं ओर मुड़ा और भीड़ की तरफ चल दिया। उसने देखा कि टाल के फाटक पर वही आदमी     खड़ा है। उसकी वास्कट के बटन खुले हुए थे। वह अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाये, भीड़ को अपनी लहूलुहान उंगली दिखा रहा था। लगता था कि उसके नशीले चेहरे पर साफ लिखा हुआ हो 'अरे बदमाश!' और उसकी उंगली जीत का झंडा है। आचुमेलोव ने इस व्यक्ति को पहचान लिया। यह सुनार खूकिन था। भीड़ के बाचों- बीच अगली टांगे फैलाये अपराधी, सफेद ग्रे हाउंड का पिल्ला, छिपा पड़ा, ऊपर से नीचे तक कांप रहा था। उसका मुंह नुकिला था और पीठ पर पीला दाग था। उसकी आंसू- भरी आंखों में मुसीबत और डर की छाप थी।
'यह क्या हंगामा मचा रखा है यहां?' आचुमलोव ने कंधों से भीड़ को चीरते हुए सवाल किया। 'यह उंगली क्यों ऊपर उठाये हो? कौन चिल्ला रहा था?'
'हुजूर! मैं चुपचाप अपनी राह जा रहा था, बिल्कुल गाय की तरह,' खूकिन ने अपने मुंह पर हाथ रखकर, खांसते हुए कहना शुरू किया, 'मिस्त्री मित्रिच से मुझे लकड़ी के बारे में कुछ काम था। एकाएक, न जाने क्यों, इस बदमाश ने मेरी उंगली में काट लिया। ..हुजूर माफ करें, पर मैं कामकाजी आदमी ठहरा, ... और फिर हमारा काम भी बड़ा पेचिदा है। एक हफ्ते तक शायद मेरी उंगुली काम के लायक न हो पायेगी। मुझे हरजाना दिलवा दीजिए। और हुजूर, कानून में भी कहीं नहीं लिखा है कि
 हम जानवरों को चुपचाप बरदाश्त करते रहें। ..अगर सभी ऐसे ही काटने लगें, तब तो जीना दूभर हो जायेगा।'
'हुंह..अच्छा..' ओचुमेलाव ने गला साफ करके, त्योरियां चढ़ाते हुए कहा, 'ठीक है। ...अच्छा, यह कुत्ता है किसका? मैं इस मामले को यहीं नहीं छोडूंगा! कुत्तों को खुला छोड़ रखने के लिए मैं इन लोगों को मजा चखाउंगा! जो लोग कानून के अनुसार नहीं चलते, उनके साथ अब सख्ती से पेश आना पड़ेगा! ऐसा जुर्माना ठोकूंगा कि छठी का दूध याद आ जायेगा। बदमाश कहीं के! मैं अच्छी तरह सिखा दूंगा कि कुत्तों और हर तरह के ढोर-डगार को ऐसे छुट्टा छोड़ देने का क्या मतलब है! मैं उसकी अकल दुरुस्त कर दूंगा, येल्दीरिन!'
सिपाही को संबोधित कर दरोगा चिल्लाया, 'पता लगाओ कि यह कुत्ता है किसका, और रिपोर्ट तैयार करो! कुत्ते को फौरन मरवा दो! यह शायद पागल होगा। .....मैं पूछता हूं, यह कुत्ता किसका है?'
'शायद जनरल जिगालोव का हो!' भीड़ में से किसी ने कहा।
'जनरल जिगालोव का? हुंह...येल्दीरिन, जरा मेरा कोट तो उतारना। ओफ, बड़ी गरमी है। ...मालूम पड़ता है कि बारिश होगी। अच्छा, एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि इसने तुम्हें काटा कैसे?' ओचुमेलोव खूकिन की ओर मुड़ा, 'यह तुम्हारी उंगली तक पहुंचा कैसे? ठहरा छोटा- सा और तुम हो पूरे लम्बे- चौड़े। किसी कील-वील से उंगली छी ली होगी और सोचा होगा कि कुत्ते के सिर मढ़कर हर्जाना वसूल कर लो। मैं खूब समझता हूं! तुम्हारे जैसे बदमाशों की तो मैं नस-नस पहचानता हूं!'
'इसने उसके मुंह पर जलती सिगरेट लगा दी थी, हुजूर! यूं ही मजाक में और यह कुत्ता बेवकूफ तो है नहीं, उसने काट लिया। यह शख्स बड़ा फिरती है, हुजूर!'
'अबे! झूठ क्यों बोलता है? जब तूने देखा नहीं, तो गप्प क्यों मारता है? और सरकार तो खुद समझदार हैं। वह जानते हैं कि कौन झूठा है और कौन सच्चा। खुद मेरा भाई पुलिस में है। ..बताये देता हूं....हां....'
'बंद करो यह बकवास!'
'नहीं, यह जनरल साहब का कुत्ता नहीं है,' सिपाही ने गंभीरता पूर्वक कहा, 'उनके पास ऐसा कोई कुत्ता है ही नहीं, उनके तो सभी कुत्ते शिकारी पौण्डर हैं।'
'तुम्हें ठीक मालूम है?'
'जी सरकार।'
'मैं भी जनता हूं। जनरल साहब के सब कुत्ते अच्छी नस्ल के हैं, एक- से- एक कीमती कुत्ता है उनके पास। और यह! तो बिल्कुल ऐसा- वैसा ही है, देखो न! बिल्कुल मरियल है। कौन रखेगा ऐसा कुत्ता? तुम लोगों का दिमाग तो खराब नहीं हुआ? अगर ऐसा कुत्ता मास्का या पीटर्सबर्ग में दिखाई दे तो जानते हो क्या होगा? कानून की परवा किये बिना, एक मिनट में उससे छुट्टी पा ली जाये! खूकिन! तुम्हें चोट लगी है। तुम इस मामले को यों ही मत टालो। ...इन लोगों को मजा चखाना चाहिए! ऐसे काम नहीं चलेगा।'
'लेकिन मुमकिन है, यह जनरल साहब का ही हो,' सिपाही बड़बड़ाया, 'इसके माथे पर तो लिखा नहीं है। जनरल साहब के अहाते में मैंने कल बिल्कुल ऐसा ही कुत्ता देखा था।'
'हां-हां, जनरल साहब का तो है ही!' भीड़ में से किसी की आवाज आयी।
'हूंह। ...येल्दीरिन, जरा मुझे कोट तो पहना दो। अभी हवा का एक झोंका आया था, मुझे सरदी लग रही है। कुत्ते को जनरल साहब के यहां ले जाओ और वहां मालूम करो। कह देना कि मैंने इसे सड़क पर देखा था और वापस भिजवाया है। और हां, देखो, यह कह देना कि इसे सड़क पर न निकलने दिया करें। मालूम नहीं, कितना कीमती कुत्ता हो और अगर हर बदमाश इसके मुंह में सिगरेट घुसेड़ता रहा तो कुत्ता बहुत जल्दी तबाह हो जायेगा। कुत्ता बहुत नाजुक जानवर होता है। और तू हाथ नीचा कर, गधा कहीं का! अपनी गन्दी उंगली क्यों दिखा रहा है? सारा कुसूर तेरा ही है।'
'यह जनरल साहब का बावर्ची आ रहा है, उससे पूछ लिया जाये। ...ऐ प्रोखोर! जरा इधर तो आना, भाई! इस कुत्ते को देखना, तुम्हारे यहां का तो नहीं है?'
'वाह! हमारे यहां कभी भी ऐसा कुत्ता नहीं था!'
'इसमें पूछने की क्या बात थी? बेकार वक्त खराब करना है, ' ओचुमेलोव ने कहा, 'आवारा कुत्ता यहां खड़े-खड़े इसके बारे में बात करना समय बरबाद करना है। तुमसे कहा गया है कि आवारा है तो आवारा ही समझो। मार डालो और छुट्टी पाओ?
'हमारा तो नहीं है,' प्रोखोर ने फिर आगे कहा, 'यह जनरल साहब के भाई का कुत्ता है। हमारे जनरल साहब को ग्राउंड के कुत्तों में कोई दिलचस्पी नहीं है, पर उनके भाई साहब को यह नस्ल पसन्द है।'
'क्या? जनरल साहब के भाई आये हैं? ब्लादीमिर इवानिच?' अचम्भे से ओचुमेलोव बोल उठा, उसका चेहरा आह्वाद से चमक उठा। 'जरा सोचो तो! मुझे मालूम भी नहीं! अभी ठहरेंगे क्या?'
'हां।'
'वाह जी वाह! वह अपने भाई से मिलने आये और मुझे मालूम भी नहीं कि वह आये हैं! तो यह उनका कुत्ता है? बहुत खुशी की बात है। इसे ले जाओ। कैसा प्यारा नन्हा- सा मुन्ना- सा कुत्ता है। इसकी उंगली पर झपटा था! बस-बस, अब कांपो मत। गुर्र...गुर्र...शैतान गुस्से में है... कितना बढिय़ा पिल्ला है!
प्रोखोर ने कुत्ते को बुलाया और उसे अपने साथ लेकर टाल से चल दिया। भीड़ खूकिन पर हंसने लगी।
'मैं तुझे ठीक कर दूंगा।' ओचुमेलोव ने उसे धमकाया और अपना लबादा लपेटता हुआ बाजार के चौक के बीच अपने रास्ते चला गया।

शिक्षकों के लिए एक मंच

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि शिक्षक हमारी शिक्षा व्यवस्था के हृदय हैं। शिक्षा को अगर बेहतर बनाना है तो शिक्षण विधियों के साथ-साथ शिक्षकों को भी इस हेतु पेशवर रूप से सक्षम तथा बौद्धिक रूप से सम्पन्न बनाए जाने की जरूरत है।
इसके लिए हर स्तर पर तरह-तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। टीचर्स आफ इंडिया पोर्टल ऐसा ही एक प्रयास है। तेजी से बदलती और विकसित होती दुनिया में कम्प्यूटर तकनॉलॉजी हमारे जीवन के हर क्षेत्र में प्रवेश कर गई है। शिक्षा का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। पोर्टल इस तकनॉलॉजी पर ही आधारित है। इसीलिए इसे शिक्षकों के लिए ई-मंच भी कहा जा रहा है। गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की प्राप्ति के लिए कार्यरत अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन (एपीएफ) ने इसकी पहल की है। महामहिम राष्ट्रपति महोदया श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने वर्ष 2008 में शिक्षक दिवस पर इसका शुभांरभ किया था। पोर्टल राष्ट्रीय  ज्ञान आयोग द्वारा समर्थित  है। इसे आप  www.teachersofindia.org पर देख सकते हैं। यह नि:शुल्क है। अभी यह हिन्दी,कन्नड़, तमिल, तेलुगू, मराठी, उडिय़ा, गुजराती तथा अंग्रेजी भाषाओं में है। कोशिश है कि यह सभी मुख्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हो।   
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* शिक्षक पोर्टल के विभिन्न स्तम्भों के माध्यम से पोर्टल पर भागीदारी कर सकते हैं। 
क्या है पोर्टल में !
पोर्टल पर शिक्षा परिप्रेक्ष्य, शिक्षानीति, कक्षा अभ्यास तथा विषय शीर्षकों के अंतर्गत सामग्री प्रस्तुत की जा रही ही। माह के शिक्षक पोर्टल का एक विशेष फीचर है। इसमें हम ऐसे शिक्षकों को सामने ला रहे हैं, जिन्होंने अपने उल्लेखनीय शैक्षणिक काम की बदौलत न केवल स्कूल को नई दिशा दी है, वरन समुदाय के बीच शिक्षक की छवि को सही मायने में स्थापित किया है। प्रश्नकाल में शिक्षक शिक्षा से संबंधित अपने सवाल पूछ सकते हैं। इस स्तम्भ की खास बात यह है कि अगर पूछे गए प्रश्न का जवाब किसी शिक्षक को आता है तो वह भी जवाब दे सकता है। स्टाफ रूम में अपने हमख्याल शिक्षकों से चर्चा की जा सकती है। फोटो एलबम शिक्षकों की गतिविधियों को दृश्य रूप में सबके सामने रखने का मौका देता है। भविष्य में पोर्टल पर कक्षा गतिविधियों के वीडियो प्रस्तुत करने की योजना भी है।         
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निसंदेह पोर्टल शिक्षकों का मंच है। शिक्षकों का अर्थ है- वे जो स्कूल में पढ़ा रहे हैं, वे जो भविष्य के शिक्षक हैं, वे जो शिक्षकों को तैयार कर रहें हैं- यानी शिक्षक अध्यापक। पोर्टल इन सबके लिए तो है ही । शिक्षक-शिक्षा में संलग्न संस्थाएं, शिक्षा विभाग, स्कूल शिक्षा के प्रशासक और विश्वविद्यालयों से भी पोर्टल का उतना ही सरोकार है। पोर्टल का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है जब अधिक-से-अधिक शिक्षक उसमें भागीदारी करें।
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* अपने इलाके में शिक्षा में आजमाई जा रही शिक्षण विधियों, नवाचारों की पहचान करना तथा उनके बारे में इस दृष्टि से लिखना, लिखवाना कि उसका लाभ अन्य शिक्षक उठा सकें।
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- गिरीश पंकज
हमारे साथ सरकार ने अन्याय किया है। क्या एक हमीं हैं, जो गलत काम करते हैं? और भी कई लोग भ्रष्टाचार कर रहे हैं, जिन्हें 'सस्पेंड' किया जाना था, लेकिन गाज गिरी हमारे ऊपर।
चार निलंबित जन सिर पर हाथ धरे गंभीर मुद्रा में बैठे हुए थे। बाद में प्राणायाम में रत हो गए।
एक बेचारा मर्मभेदी स्वर में पुराना फिल्मी गीत गाए जा रहा था, 'इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा न हुआ। गैर तो गैर थे अपनो का सहारा न हुआ'। दूसरा मन को मजबूत करने के लिए अनुलोम-विलोम कर रहा था, तीसरा कपालभाती में भिड़ा था। चौथा भ्रामरी कर रहा था। दरअसल हरिद्वार से आए किसी महात्मा ने बता दिया था, कि चित्त की शांति के लिए प्राणायाम कर लिया करो। इससे निलंबन का दु:ख भी कुछ कम हो जाएगा।
काफी देर तक सिर झुकाए रहने के बाद एक ने सिर उठाकर कहा- 'हमारे साथ सरकार ने अन्याय किया है। क्या एक हमीं हैं, जो गलत काम करते हैं? और भी कई लोग भ्रष्टाचार कर रहे हैं, जिन्हें 'सस्पेंड' किया जाना था, लेकिन गाज गिरी हमारे ऊपर। मैं समझ नहीं पाता कि आखिर सरकार छापामार कार्रवाई काय कूं करती है? हमें मौका दिया है तो क्या उसका लाभ भी न उठाएं? हर कोई सरकारी नौकरी में माल सरकाने की नीयत से ही तो आता है न।'
दूसरा निलंबित होने के बाद कुछ- कुछ दार्शनिक किस्म का हो गया था। किसी पुराने निलंबित अधिकारी से मिलिए, तो वह दार्शनिक जैसा व्यवहार करता है। लोग उसे पागल भी समझते हैं, लेकिन वह निलंबन के कारण चिंतक हो जाता है। ज्ञानचक्षु खुल-से जाते हैं। दार्शनिक बने निलंबित अधिकारी ने कहा-
'हां भई, आप ठीक कहते हैं। लेकिन कहा गया है न कि जब ससुरे बुरे दिन आते हैं तो वे मोबाइल या एसएमएस करके नहीं आते कि भैये, अब हम तुम्हारे पास पहुंचने वाले हैं। वैसे सच पूछा जाए तो हमने न जाने कितने लोगों का बुरा ही किया। अब, जब अपनी बारी आई है तो निलंबित होने का खिताब पाने का दु:ख क्यों करें? हाय, दु:खी हो कर मेरे भीतर से अचानक एक कविता भी फूट पड़ी है, सुन लो-
दोस्त, रिश्तेदार सारे सब अचंभित हो गए।
हम बड़े ही धार्मिक थे, क्यों निलंबित हो गए।
तीर्थयात्रा और फारेन-टूर का प्रोग्राम था,
हम निलंबित क्या हुए प्रोग्राम लंबित हो गए'
दूसरे ने तीसरे से पूछा- 'अच्छा प्रियतम जी, आप किस आरोप में निलंबित हुए थे?'
प्रियतम जी के चेहरे पर हल्की- सी मुस्कान तैर गई, वे बोले, 'मैं तो अपनी 'पीए' के साथ मटरगश्ती करने के कारण निलंबित कर दिया गया। जैसा हर कोई करता रहता है... और जानते हैं, सबसे दुखद पहलू क्या था?'
सारे निलंबितों ने एक स्वर में पूछा- 'वो क्या था?'
'वो ये था कि मेरी बीवी को पता चल गया, कि मैं पीए के साथ ज्यादा व्यस्त और मस्त रहने लगा हूं। बस, वह त्रस्त हो गई। उसने बड़े बॉस को शिकायत कर दी। तब से लेकर अब तक निलंबित हूं। पीए के गम आजकल 'पिये' रहता हूं।
अच्छा, आप क्यों 'सस्पेंड' हुए साहब?'
'मेरे सस्पेंड होने के पीछे इतना रूमानी कारण नहीं था।' पाकिटप्रसाद ने प्रियतम जी को जवाब दिया, 'मैं तो रिश्वतखोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था। देखो न, कितना बुरा समय आ गया है। अगले को अपना काम करवाना था। तुम तो जानते हो, हम बिना घूस-वूस खाए कभी काम नहीं करते, सो हमने कहा- 'पांच हजार लूंगा'।
उसने भी कह दिया कि कल ग्यारह बजे ले आऊंगा। हम दूसरे दिन उसका इंतजार करते बैठे रहे। वह ठीक ग्यारह बजे आ धमका और मुझे पांच हजार थमा दिए। रुपए हाथ में लेकर अपनी तिजोरी की तरफ मुड़ा ही था कि चार लोग यमदूत की तरह तेजी के साथ घर में घुसे और मुझे पकड़ लिया। ये लोग सतर्कता विभाग के थे। उन्होंने मेरा हाथ धुलवाया तो मेरे हाथों में रंग था, जो उन्होंने रिश्वत वाले नोट में लगाया था। इस तरह उन्होंने मुझे रंगे हाथों पकड़ लिया। शिकायत हुई। जांच होने लगी और मुझे निलंबित कर दिया गया। एक साल हो गए हैं। निलंबित सिंह बना हुआ हूं। किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहा। जो भी मिलता है, यही पूछता है, क्यों भाई आपके रंगे हाथों पकड़ाने वाला किस्सा क्या है, कुछ हमें भी तो सुनाइए न? हमारी जान चली गई और भाई लोगन को मजा आ रहा है। तो भइया, निलंबित क्या हुए, बाहर निकलने की हिम्मत नहीं होती।'
तीसरे जेलप्रसाद ने कहा- 'मैं भी तो रिश्वतखोरी के मामले में निलंबित हुआ था। अपने देश में ज्यादातर     निलंबन रिश्वत के मामले में ही होते हैं। तो भाई साहब, मैं आपको बताऊं , कि जब मैं टिम्बकटू में पोस्टेड था तो मानो स्वर्ग- लोक में पहुंच गया था। पैसा खुद चल के मेरे पास आता था और कहता था, कि 'सर प्लीज, कैच मी'। मैं कैच कर लेता था। घर आई लक्ष्मी को कौन ठुकराता है भला? लेकिन इस समाज के कुछ दुर्जन किस्म के लोगों से हमारा सुख न देखा गया और मेरे खिलाफ 'बदमाशों' ने शिकायतें शुरू कर दीं। आखिरकार मैं बारह के भाव में चला गया। साल भर हो गए निलंबन के। कोई ऊपरी कमाई नहीं। तनखाह भी कटकर मिल रही है। ये तो अच्छा हुआ कि हराम की कमाई का 'बैंक बैलेंस' जमा कर चुका था, वरना अपने जो शौक हैं, उनकी पूर्ति कैसे हो सकती थी?'
चौथे निलंबित काष्ठïकुमार छाती पीटते हुए कहा - 'मेरी कथा भी सुन लो भई। मेरे हाथ में तो पूरा जंगल था। जंगल में मंगल ही मंगल था। बस, एक दिन एक शैतान मन में आ बसा। गाय-बकरियों को घास-पत्ता चरते देखते रहता था। अपने मन में भी एक दिन विचार आया कि क्यों न अपन भी पूरा जंगल का जंगल चर जाएं। जो काम गाय कर सकती है वो मनुष्य क्यों नहीं कर सकता है? कुछ पाने के लिए त्याग तो करना ही होता है। बिना त्यागी बने, सुख नहीं मिलता। सो, मैंने भी अपने आदर्श का त्याग कर दिया और लगा जंगल खाने। उधर जंगल कम होता गया, इधर मेरी हवेली तनती गई। पैसा आता गया तो हम भी तनते गए। तनते- तनते एक समय ऐसा भी आया, जब मेरा घर एक दर्शनीय स्थल में तब्दील हो गया। लोग शहर आते तो लोगों से पूछते शहर के दर्शनीय स्थलों के  नाम बताइए। हर कोई मेरे महल का नाम बता देता। बस, नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर। लोगों की नज़र लग गई। सरकार के दोनों कान भर दिए गए। और एक दिन घर पर जबर्दस्त छापा पड़ा और अपुन का काम हो गया। जंगल का अमंगल करने के चक्कर में हमहू निलंबित हो गए। कभी हम निलंबन आदेश को, कभी अपने महल को देखते हैं। जंगल साफ होने से बच चुका है। यही मेरा सबसे बड़ा दु:ख है। मूरख सरकार। झाड़-झंखाड़ का करेगी क्या? मुझे चरने देती, महल बनाने देती, लेकिन बड़ी क्रूरता के साथ मेरे ऐशोआराम के सारे सामान जब्त कर लिए गए। अब हम रात-रात भर जाग-जाग कर अपने निलंबन की वापसी का इंतजार करते हैं।'
चारों निलंबितों ने अपने-अपने ऐतिहासिक कारनामों के बारे में एक-दूसरे को ईमानदारी के साथ जानकारी दी। फिर एक-दूसरे के कंधों पर सिर रख कर कुछ देर तक आंसू बहाते रहे। चारों इस बात से सहमत थे कि भले ही हम लोग भ्रष्टाचार के मामले में पकड़े गए लेकिन पूरी कोशिश करेंगे कि हमारे प्यारे-प्यारे बच्चे न पकड़े जाएं। उन्हें समझाएंगे, कि रिश्वत कैसी ली जाए। 'मैं तो एक पुस्तक भी लिखने वाला हूं, कि रिश्वत से बचने के सौ टिप्स। इसे इंटरनेट पर भी डाल देंगे। तरह-तरह के काले कारनामों से कैसे बचें, इसके टिप्स भी अलग से दिए जाएंगे। हम अपनी गलतियों से सबक लेकर उनका भविष्य संवार सकते हैं। बिना रिश्वत के तो ऐश संभव नहीं। क्यों भई, कैसा है सुझाव?'
सबने एक स्वर में कहा-'बिल्कुल मस्त-मस्त।'
चारों निलंबितों ने कसम खाई कि हम अपने-अपने बच्चों को भ्रष्टïचार में ट्रेंड करेंगे ताकि वे रंगे हाथों न पकड़े जाएं और बेचारे हमारी तरह निलंबन का दुख न भोगें। अलबत्ता चंद सालों में ही इतना पैसा कमा लें कि बर्खास्त भी हो जाएं तो कोई फर्क न पड़े।
जेलप्रसाद ने एक और बढिय़ा सुझाव दिया- 'क्यों न हम लोग एक वेब साइट ही बना लें- निलंबित डॉट कॉम। इस साइट के माध्यम से हम दुनिया के तमाम निलंबितों को एकजुट करेंगे। अपन एक संगठन ही बना लेते हैं, 'निलंबित अधिकारी संघ'। जो कोई भी निलंबित हो, हम लोग उसकी मदद करें। रिश्वत लेते हुए पकड़े गए हैं, तो रिश्वत दे कर कैसे छूटें, इसकी टे्रनिंग दी जाए। अपन सरकार से मिलें और कहें, कि आप हमें निलंबित कर दें तो करें, लेकिन हमारे नाम अखबारों तक तो न पहुंचाएं। इमेज खराब होती है। मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाते। अब उनकी बात और है जो बेशरमी के महाकाव्य को रटे हुए हैं। उनको कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन हमारे जैसे महान इज्जतदार लोगों को निलंबित हो कर कैसा-कैसा तो लगता है।'
सबको सुझाव पसंद आया। उन्होंने निर्णय किया कि कल ही सीएम से मिलेंगे, कि वे कुछ करें। सब के सब भयानक आशावादी होकर अपने- अपने घरों की ओर चल पड़े।
इस तरह वे चार निलंबित लोग बहुत सारे निलंबितों के प्रेरणास्रोत बन चुके थे।
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 गिरीश पंकज उन व्यंग्यकारों में से हैं जिन्होंने अपनी लेखकीय सक्रियता की शुरुआत पत्रकारिता से की है। व्यंग्यकार का पत्रकार होना उसकी लेखकीय प्रतिभा को अतिरिक्त ताप देता है। ऐसे लेखकों के पास पत्रकारिता की तीक्ष्ण दृष्टि और व्यंग्य की चटखारेदार शैली होती है। जिनकी रचनाएं सामयिक घटनाओं से प्रेरित होकर अपना अलग प्रभाव और वातावरण निर्मित कर लेती हैं। वैसे भी हिन्दी का समूचा व्यंग्य साहित्य पत्र- पत्रिकाओं से ही मुखरित होता आया है। व्यंग्य के अनेक लोकप्रिय कॉलम अखबारों, पत्रिकाओं में लिखे गए हैं। साहित्य में व्यंग्य ही एक ऐसी विधा है जिसकी स्थापना में अखबारों का बड़ा हाथ रहा है। कई व्यंग्यकार, पत्रकारिता जगत से स्थापित हुए हैं। इस पृष्ठभूमि ने गिरीश पंकज के लेखन को भी अपना समर्थन दिया है। वे छत्तीसगढ़ के विभिन्न पत्र समूहों से जुड़े हुए हैं। इन पत्र- पत्रिकाओं में निरंतर व्यंग्य और सामयिक मुद्दों पर लेखन में वे सक्रिय हैं। लेखक होने के अतिरिक्त वे एक सफल कार्यक्रम संयोजक भी हैं। वे 'सद्भावना दर्पण' नामक वैचारिक पत्रिका के संपादक हैं। उन्होंने व्यंग्य के अतिरिक्त उपन्यास लिखे हैं जो पुरस्कृत हुए हैं। गिरीश उन चुनिन्दा लेखकों में से हैं जो बाल साहित्य की सर्जना कर रहे हैं। बाल साहित्य पर उनकी पुस्तकें  प्रकाशित हुई हैं। यहां प्रस्तुत उनकी व्यंग्य रचना 'निलंबित डॉट कॉम' में देश को खोखला करने वाले रिश्तखोरों की टोह ली गई है। जिस कारण सरकारी महकमों में निलंबन होने का अभिशाप रोज के अखबारों में सुर्खियों पर होता है।
- विनोद साव