- अनिमा दास
त्याग दूँ.. स्मृतियों की भावपूर्ण उर्मियों को
कि हृदयार्णव हो जाए निश्चल व गरलमय
अभेद्य अध्वर की असहायता में है श्वास जो
हो भस्म में सुगंध श्मशान हो मेरा निलय
मैं नहीं ककुंजल जो करूँ प्रतीक्षा सुधा वृष्टि की
अनंत काल रहूँ नीरव मुद्रा में तीव्र निदाघ लिये
प्रश्न करती रहूँगी कि 'शेष जन्म में क्या मैं थी?'
त्याग दूँ वे प्रश्न भी जो मुझे निसर्ग से कभी मिले।
मेरे अंतः के अतल गह्वर में उद्विग्न शाखाओं पर
अपवादों के पक्षिदल करते अनवरत कोलाहल
कुहेलिका से पूर्ण चतुर्पार्श्व चित्रित व्यथा का नगर
विक्षिप्त विरहिणी है विश्वास की वैशाली विह्वल
शीघ्र हो जाओ दूरत्व में मिलित ऐ व्यथा -अनुक्त
हो जाओ शून्य में ॐ..नील शिखा से सदा मुक्त।

यह कविता त्याग और वैराग्य की गहन अनुभूति है। कवयित्री स्मृतियों, प्रश्नों और व्यथा का त्याग कर हृदय को निश्छल करना चाहती है। 'भस्म में सुगंध, श्मशान हो मेरा निलय' में आत्म-स्वीकृति है। भाषा तत्सम-प्रधान, गंभीर और दार्शनिक है, जो विरहिणी के आत्म-मुक्ति के संकल्प को दर्शाती है। डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
ReplyDeleteजी सादर धन्यवाद आपका.... 😊🙏🌹
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