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Feb 1, 2022

कविता- ज्ञानदायिनी माता मेरी नैया पार लगा दो

-डॉ. कमलेन्द्र कुमार श्रीवास्तव 


दूर- दूर तक तम ने अपनी ,

चादर है फैलाई ।

तरस रहे हम उजियारे को ,

तम ने कला दिखाई ।

तम को दूर भगा दो माता ज्ञान का दीप जला दो।

ज्ञानदायिनी माता मेरी  नैया पार लगा  दो।।1।।


जो लिखना मैं चाहूँ मैया ,

झट से मैं लिख डालूँ ।

दिशा दिखाए मेरा लेखन ,

मंजिल को मैं पालूँ ।

ज्ञान -दीप के पथ पर मैया काँटे सभी हटा दो।

ज्ञानदायिनी माता मेरी नैया  पार  लगा दो।।2।।


 निर्मल कर दो मेरे उर को ,

 बुद्धि, विद्या का वर दो ।

सतत लेखनी चलती जाए ,

माँ वह मधुरिम स्वर दो ।

कलुष हृदय से दूर करो माँ नई दिशा दिखला दो ।

ज्ञानदायिनी माता मेरी  नैया पार लगा दो ।।3।।


सम्पर्कः  प्राथमिक विद्यालय डगरु का पुरवा , विकास खंड कुठौंद जनपद जालौन, उत्तर प्रदेश, मो.  9451318138 

तीन लघुकथाएँ

 - हरभगवान चावला

1. पहाड़
      मैं पहाड़ से लौटने लगा तो पहाड़ ने मेरे साथ चलने की ज़िद पकड़ ली। मैंने लाख कहा मैदान में कुछ भी नहीं पहाड़ जैसा, तुम वहाँ रह कैसे पाओगे? उसने कहा- तुम हो न, रह लूँगा। घर आने के बाद कुछ दिन वो घर से बाहर नहीं निकला। एक दिन गया तो घंटे भर में लौट आया। बोला- कैसे लोग हैं तुम्हारे शहर में, पूरे शहर में एक भी दरख़्त नहीं और लोग हैं कि मज़े में हैं। कोई किसी से बात भी नहीं करता।
       मैंने ग़ौर किया कि उसकी साँवली हो गई देह पसीने  में नहा गई थी। मैंने कहा- तुमसे पहले कहा था कि मैदान में कुछ भी पहाड़ जैसा नहीं है, अब तुमने देख लिया न! लौट जाओ अपने घर।
      - तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊँगा।
वह मेरी किताबों के पास बैठा रहता एकदम चुपचाप। मैं उसकी कैफ़ियत पूछता तो वह मुस्कुरा देता, पर मैं महसूस कर रहा था कि उसके भीतर का जल सूख रहा है और पथरीलापन उसके चेहरे पर झलकने लगा है। किसी दिन यह निर्जीव पत्थर हो कर रह जायेगा। मैंने फ़ैसला किया कि इसे इसके घर छोड़ कर आऊँगा। एक दिन मैंने उससे कहा- चलो आज हम तुम्हारे घर चलेंगे।
    - तुम चल रहे हो न?
    - हाँ।
   - रास्ते में छोड़कर चले तो नहीं जाओगे?
    - नहीं।
        उसने लपककर मेरी उँगली पकड़ ली। हम दोनों चले जा रहे थे। बहुत गर्मी थी, पर थोड़ी-थोड़ी देर बाद कोई झरना पैरों को भिगो जाता या फुहार तन को शीतल कर जाती। जब भी ऐसा होता, पहाड़ मेरे मुख की तरफ़ देखता और मेरी उँगली पर उसकी पकड़ और मज़बूत हो जाती।


2. हरसिंगार

   वे दोनों बहुत लम्बे अरसे के बाद मिल रहे थे। सुबह का वक्त था। दोनों हरसिंगार के फूलों का झड़ना देख रहे थे। लड़की ने अपनी हथेलियाँ फैला दीं और बर्फ़ के फाहों जैसे फूलों को हथेलियों पर गिरने दिया। फिर उसने अपना सिर ऊपर उठा दिया। फूल उसके चेहरे पर गिरते रहे- चमकती धूप में फुहारों की तरह। वह बहुत ख़ुश थी, क्योंकि भयावह लम्बी लड़ाई के बाद लड़का सही सलामत लौट आया
 था। लड़की ने कहा, "मैं हमेशा तुम्हें लेकर डरती रही और हमेशा तुम्हारी सलामती की दुआ करती रही। कितने ख़त लिखे मैंने तुम्हें।"
    "मैंने तुम्हारे हर ख़त का जवाब देने की कोशिश की, पर कभी-कभी ऐसा नहीं भी हो पाया। हर समय तुम मुझे याद आती रहीं।"
    "जानती हूँ। तुम्हें पता है, तुम्हारा हर ख़त मुझे ज़ुबानी याद है।"
     "और मुझे तुम्हारा।"
  "मैं तुमसे सपने में मिलती थी। आज भी लग रहा है कि सपना देख रही हूँ। मैं कभी इस सपने को टूटते नहीं देखना चाहती थी। मैं आज भी जागने से डरती हूँ।"
   "और मैं सोने से डरता हूँ। युद्ध में जो कुछ हुआ, मुझे डरावने सपने जैसा लगता है। बम फट रहे हैं, गोलियाँ चल रही हैं, मैं भाग रहा हूँ लाशों से टकराता। पेड़ों के पत्तों पर ख़ून जमा है। चीख़ें हैं, लोग मर रहे हैं बेगानी जगह लावारिस मौत। ओफ़्फ़, यह सब नहीं होना चाहिए। आदमी युद्ध के लिए पैदा नहीं हुआ। वह पैदा हुआ है शांति के साथ मेहनत करने के लिए, प्रेम के साथ जीने के लिए। जो कुछ मैंने अपनी आँखों से देखा, अब अक्सर सपने में देखता हूँ। इसलिए डरते-डरते सोता हूँ कि कहीं ..."
      लड़की ने अपना हाथ लड़के के मुँह पर रख दिया। लड़के ने उस हाथ को कसकर पकड़ लिया। दोनों कुछ देर यूँ ही बैठे रहे- ख़ामोश और संजीदा। अचानक लड़का अपनी हथेलियों से हरसिंगार के फूलों को लड़की के पैरों के पास सरकाने लगा। लड़की के दोनों पाँव फूलों से ढक गये। मंत्रमुग्ध सी लड़की देखती रही, देखती रही और फिर उन फूलों को अंजुरी में भरकर लड़के के चेहरे पर उछाल दिया। आधे फूल लड़के की झोली में आ गिरे और आधे लड़की की झोली में।

3. मगरमच्छ 

पोता जब पढ़ने के लिए बाहर चला गया तो सतवंती के लिए घर का माहौल असह्य हो गया। अब तक वह पोते के मोह में सब सहती आई थी। उसने तय किया कि बस अब और नहीं। ज़मीन बेटे के नाम करवा उसने ख़ुद वृद्धाश्रम जाने की इच्छा जताई। उसे लगता था, यह बात सुनकर बेटा नाराज़ होगा और उसे वृद्धाश्रम जाने से रोकेगा, पर बेटे ने सिर्फ़ इतना कहा, "अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो ठीक है।"
 सतवंती वृद्धाश्रम में थी। बेटा महीने, दो महीने में वहाँ जाकर माँ का हालचाल पूछ आता, लेकिन यह सिलसिला साल भर भी नहीं चला। अब तो बेटे को माँ को देखे सात साल होने को आए थे। कभी-कभी आश्रम से फ़ोन आता और थोड़ी देर बाद एक आदमी आकर कुछ रुपये उससे ले जाता। उस दिन भी आश्रम से फ़ोन था। प्रबंधक ने बताया, "आपकी माँ की मौत हो गई है सर! क्या आप उनके अन्तिम संस्कार के लिए उनकी पार्थिव देह लेने आ रहे हैं?"
  "ओह, इस समय मैं देश से बाहर हूँ। क्या आप अपने स्तर पर अन्तिम संस्कार की व्यवस्था कर सकते हैं?" उसने बहाना बनाते हुए एक पल भी नहीं लगाया।
 "अगर किसी वृद्ध के परिजन उपलब्ध नहीं हों तो हम अपने स्तर पर अन्तिम संस्कार करते ही हैं।" "बहुत-बहुत धन्यवाद आपका। आप अन्तिम संस्कार करवा दीजिए और अन्तिम संस्कार का वीडियो मुझे भिजवा दीजिए।"
  "जी ठीक है।"
  अब यह उच्च अधिकारी अपने पुराने शहर से दूर एक और शहर में पदस्थ है। वह अक्सर अपने अधीनस्थ अलग-अलग अधिकारियों के सामने अपने मोबाइल में माँ के अन्तिम संस्कार का वीडियो चलाता है और कहता है, "आज मैं जो भी हूँ, अपनी माँ की वजह से हूँ, पर कितना बदनसीब हूँ मैं कि विदेश में होने के चलते माँ को मुखाग्नि भी नहीं दे पाया।" यह कहते ही उसकी आँखों से आँसू निकल आते हैं। जब भी ऐसा होता है, वह किसी विशाल मगरमच्छ को अपने भीतर रेंगते हुए महसूस करता है।

लेखक के बारे में - जन्मतिथि: 20 नवम्बर, 1958, जन्मस्थान: गाँव बिज्जुवाली, जिला सिरसा (हरियाणा), शिक्षा: एम.ए. (हिंदी), एम.फिल.। सम्प्रति: राजकीय महिला महाविद्यालय, रतिया से बतौर प्राचार्य सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन।
लेखन: पाँच कविता संग्रह ‘कोई अच्छी खबर लिखना’, ‘कुंभ में छूटी औरतें’, ‘इसी आकाश में’, ‘जहाँ कोई सरहद न हो’, ‘इन्तज़ार की उम्र’, कहानी संग्रह ‘हमकूं मिल्या जियावनहारा’ व लघुकथा संग्रह ‘बीसवाँ कोड़ा’। इसके अलावा सारिका, हंस, कथादेश, जनसत्ता, वागर्थ, रेतपथ, अक्सर, जतन, कथासमय, दैनिक भास्कर, दैनिक ट्रिब्यून, हरिगंधा आदि में रचनाएँ प्रकाशित। कुछ साझा संकलनों में रचनाएँ छपी हैं। पुरस्कार/ सम्मान:  कहानी तथा लघुकथा के लिए कथादेश द्वारा पुरस्कृत, कविता संग्रह ‘कुंभ में छूटी औरतें’ को वर्ष 2011-12 के लिए तथा कविता संग्रह ‘इसी आकाश में’ को वर्ष 2016-17 के लिए हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। सम्पर्क- 406, सेक्टर-20, सिरसा-125055 ( हरियाणा)

व्यंग्य- चोरी होना कवि- प्रिया की कार का

 - यशवंत कोठारी 

कवि-प्रिया  की कार जो थी, वो चोरी हो गई। कवि प्रिया  रूठ गई। कवि घबरा गया, लेकिन कवि- प्रिया  की प्रिय कार ढूँढकर लाना कोई आसान काम नहीं था।

हुआ यों कि हास्यास्पद रस के प्रसिद्ध कवि ने चार चुटकुलों की मदद से कवि सम्मेलनों से करोड़ों कूट लिये थे। कविता की दलाली में इतना पैसा है, यह कवि को इस दलदल में आकर ही पता चला। उसने नौकरी छोड़ी, छोकरी पकड़ी, उसे मंच के लटके- झटके सिखाए, चार चुटकुले पकड़ाए खुद को कवि प्रिया का मालिक घोषित किया । सुरीला कंठ , देह दर्शन की सुविधा कवि- प्रिया  और कवि ने मिलकर अमेरिका, योरोप, तक कविता की कॉमेडी की धूम मचा दी, डॉलर, यूरो, पौंड आए। कोठी खड़ी की, महँगी कार ली फिर और पैसा आया और दूसरी महँगी कार कवि -प्रिया के लिए अलग से ली, और यही कार चोरी हो गई। आसमान फट गया, धरती पर भूकंप आ गया। कवि की महँगी कार की चोरी से दुनिया दहल गई। सुहागिनें विधवा विलाप करने लगीं। गन्धर्वों ने गान बंद कर दिए। सर्वत्र  त्राहि -त्राहि होने लगी।

इस घटना पर कविता लिखी गई, कहानी रची गई, व्यंग्य उकेरे गए, मंच संचालकों ने इसी विषय पर कवि सम्मेलनों का आयोजन किया। कार्टून बने, कथा वाचक बाबाओं ने धार्मिक कथा- वाचन किया, मगर कार नहीं मिली। लोग कार के बहाने कवि- प्रिया पर लाइन मारने लगे। कवि उपेक्षा, ईर्ष्याग्रस्त होकर अवसाद  में आते- आते बचे। वास्तव में लोग संवेदना के बहाने अपना सिट्टा सेंक रहे थें। कविता पीछे रह गई। महँगी कार और खूबसूरत मालकिन आगे हो गई। कवि तो खलासी हो गएँ। कार चोरी का शोक  एक मौलिक शोक है जो अलग से चिंतन की मांग करता है। इस चिंतन के लिए विचार चाहिए और आजकल विचार की कविता कौन लिखता है सर।

कवि थाने में गया; लेकिन थाने के नियमों का पालन नहीं किया। थानेदार ने तहरीर लेने के पहले, कार का  पंजीकरण, बीमा व खुद का लाइसेंस माँगा  कवि के पास यह सब ना था। थानेदार ने कहा -आप की कार एक जगह पड़ी है आप में हिम्मत हो तो उठा लाओ। इतनी हिम्मत कवि में कहाँ । उसने तो विदेशी कार की कस्टम ड्यूटी भी नहीं चुकाई थी। एक राज्य के सर्वेसर्वा की मदद से कार का काम चल रहा था। मजमा जमा हुआ था ।

निराश हताश कवि ने स्थानीय पत्रकारों के कान में फूँक मारी। फूँक के साथ  सजल डिनर के कारण अगले दिन दो कॉलम में कवि -प्रिया की कार चोरी का सचित्र समाचार छपा । चित्र कार का नहीं, कवि- प्रिया का छपा । यहीं से सब  दुःख-सुख भी शुरू हुए।

कवि और कवि -प्रिया  दोनों ही अपनी आलीशान कोठी में बैठकर चोरी की इस घटना पर टेसुए बहा रहे थे। अख़बार में छपते ही शोक व्यक्त करने वालों की लाइन लग गई। छोटे- मोटे कवि, मंच संचालक, मोहल्ले के स्थानीय नेता अड़ोसी- पडोसी कोरोना का डर भूलकर मास्क लगाकर सोशल डिस्टेंस का ध्यान रखकर आने- जाने लगे। कवि को लगा कार खोने के सुख भी है। इतने लोग तो  मरे हुए की  बैठक में भी जमा नहीं होते। उधर कवि का बेटा अपने दोस्तों को मम्मी की कार के किस्से सुना रहा था। कवि ने मन में सोचा कार का स्थान्तरण हुआ है, मन  ने कहा, जो ले गया, उसके काम आ रही होगी, मगर महँगी कार  का स्यापा भी महँगा होता है। एक बुड्ढी दादी तो कह गई - अन्याय से कमाया धन दस साल में नष्ट हो जाता है।

एक बुड्ढी कवयित्री  उवाच-चोरी के माल से जो कमाया, वो चोरी हो गया  बात ख़त्म।

एक नेता जी बोले -आप कुछ  खर्चा -वरचा करो, तो रैली निकालें, धरना दें। ज्ञापन दें। लेकिन कवि- प्रिया  को ये रास्ते पसंद नहीं आए। जनवादियों  ने किनारा कर लिया प्रगतिशील दूर भाग गए। मुसीबत में राम का नाम। हारे को हरी नाम। विरोधी कवि इस चोरी को कविता की चोरी से जोड़ने लगे। वैसे भी कवि प्रिया के पास कोई कविता ना थी, सब चोरी का माल था।

कवि ने सोचा इस कार- पुराण का एक ही रास्ता है, एक नई शानदार कार ली जाए और कवि- प्रिया  को भेंट की जाए।

यह सोचकर कवि  ने अपने विदेशी संपर्कों को खटखटाया, एक शानदार लेम्बोर्गिनी कार को खरीदने का फैसला किया  मगर जब तक कार आती, कवि-प्रिया एक केबिनेट मंत्री की कार में बैठकर फुर्र हो गई। कवि आजकल कवि सम्मेलन हेतु दूसरी काव्य- प्रतिभा को खोजने- तराशने  में व्यस्त हैं। कवि प्रिया खुद मंत्री बनने की फ़िराक में है। कार चोर खुद भी कवि बनने की फ़िराक में है। कार चोरी की यह  दुर्घटना क्रन्तिकारी कविता पर बड़ी भारी पड़ी।

सम्पर्कः 86, लक्ष्मी नगर  ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-302002 ,  मो- 9414461207

ग़ज़ल - मेरा सूरज तो कभी ढलता नहीं

  - धर्मेन्द्र गुप्त

अपने  बारे में  कभी सोचा नहीं

ठीक से दरपन कभी देखा नहीं


भूखे बच्चे को  सुलाऊँ किस तरह

याद मुझको कोई भी क़िस्सा नहीं


आप मुझको तय करें मुमकिन नहीं

मैं कोई  बाज़ार  का  सौदा  नहीं


ज़हन में हर  वक़्त रहती धूप है

मेरा सूरज तो कभी ढलता नहीं


नाज़ मैं किस चीज़ पर आख़िर  करूँ

मुझमें  मेरा कुछ  भी तो अपना नहीं


जो ठहर  जाये  निगाहों  में मेरी

ऐसा  मंज़र  सामने आया नहीं


सबके हिस्से में  कोई अपना तो है

अपने हिस्से में मैं ख़ुद अपना नहीं


तेज हैं कितनी हवाएँ , फिर भला

दर्द का बादल ये क्यों उड़ता नहीं


सम्पर्कः के  3/10 ए. माँ शीतला भवन , गायघाट, वाराणसी -221001, 8935065229, 8004550837

जीवन दर्शन - पौराणिक की प्रासंगिकता

 -विजय जोशी (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

बाहर की तू माटी फाँके

भीतर मनवा क्यों ना झाँके  

आधुनिक जन पौराणिक को पुरातन मानते हुए भले ही अस्वीकार करें, पर इसकी प्रासंगिकता को नकार पाना दुरूह है.  मूल बात तो यह है कि इनके तत्कालीन सृजनकर्ताओं के मनोभाव  को तब के परिप्रेक्ष्य में देखते हुए सामयिक, सार्थक संदेश को आचरण में अंगीकार कर न केवल  जीवन जिया जा सकता है, अपितु उसे सफलता के शिखर तक पहुँचाया भी जा सकता है।  कुरुक्षेत्र घटित महाभारत युद्ध का वर्णन मात्र पौराणिक या धार्मिक ग्रंथ न होकर एक संपूर्ण जीवन संहिता है, जिसे एक अलग दृष्टिकोण से इस प्रसंग के माध्यम से भी समझा जा सकता है।

महाभारत युद्ध की समाप्ति के पश्चात वीर विहिन रक्त से रंजित धरा पर जब संजय पहुँचे तो उनका मन स्वजनों के मध्य घटित इस युद्ध के परिणाम और निरर्थता के मद्देनज़र ग्लानि से भर उठा। वे चिंतन तथा चिंतायुक्त मन:स्थिति के साथ धरती पर बेसुध होकर बैठ गए, और तभी उनका सामना एक वयोवृद्ध  पुरुष से हुआ जिसने कहा – हे संजय क्या सोच रहे हो- तुम लाख प्रयत्न के बाद भी घटित इस सत्य को कभी नहीं जान पाओगे।

 संजय ने पूछा – ऐसा क्यों, क्या आप बता पाएँगे।

वृद्ध ने कहा – अवश्य, जीवन में पाँच पांडव तो प्रतीक हैं पाँच इंद्रियों के :

1.  दृष्टि / Sight, 2. श्रवण / Hearing, 3. गंध / Smell, 4.  स्वाद / Taste, 5/ स्पर्श / Touch

और कौरव प्रतीक  हैं उन दोष, विकार या प्रवृत्ति के जो आपकी इंद्रियों पर हावी होकर, प्रतिदिन आक्रमण कर उसे कुंद बनाने का उपक्रम करती हैं, जिनसे लड़ने का माद्दा आपके अंदर समाहित है पर उसे जीवंत रखने का उत्तरदायित्व भी आप ही को निभाना है।  

संजय ने सहमति में सिर हिलाया तथा आगे पूछा – और कृष्ण?

कृष्ण तो अंतरात्मा की आवाज हैं, जिसका अनुसरण यदि आप कर सकें तो चिंता की कोई बात ही नहीं।

अब तक उत्सुक हो चुके संजय ने फिर प्रश्न किया –  तो फिर द्रोणाचार्य, भीष्म क्या हैं ?

वृद्ध ने अपनी बात जारी रखी – ऐसे वरिष्ठ जन जो उत्तम न होकर भी स्वयं को सर्वगुण संपन्न समझते रहे। दोषपूर्ण आचरण के स्तंभ।

अब तक की व्याख्या से अभिभूत हो चुके संजय ने अगला सवाल पूछा – और कर्ण ?

वृद्ध ने उत्तर दिया – कर्ण आपकी इंद्रियों का भाई है। ऐसी इच्छाएँ या लालसा जो आपके साथ सदा खड़ी रहती हैं।  आपको मार्ग से विचलित करने के लिये बनीं हैं तथा आप गलत होते हुए भी स्वयं को सही समझते रहते हैं।

अंदर से आंदोलित संजय ने मौन रहते हुए सहमति में सिर हिलाया। महाभारत के सारे घटनाक्रम के तार इस नवीनतम सत्य से जोड़ते हुए कहीं दूर विचारों में खो गए। और जब चेतना लौटी तो देखा वे वृद्ध जा चुके थे जीवन के वास्तविक दर्शन का दिग्दर्शन कराते हुए।  यह तथ्य सत्य है कि महाभारत वास्तविकता से समाहित एक अपूर्व  ग्रंथ है पर उसकी एक अलग व्याख्या  उपरोक्त संदर्भ में पात्रों के परिप्रेक्ष्य में सारगर्भित सार्थकता से परिपूर्ण है। एक अद्भुत संदेशवाहक जो दैनिक जीवन के लिये भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। कृष्ण  ने गीता में इसी गूढ़ तत्व को समझाने का यत्न किया है, बशर्ते हमारी मानसिकता और जिज्ञासा उस सूत्र को समझकर जीवन में उतार सके।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,
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