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Jun 12, 2018

पर्यावरण के प्रति भारतीय जीवन दृष्टि


पर्यावरण के प्रति भारतीय जीवन दृष्टि
- लोकेन्द्र सिंह        
आज ऐसा कोई देश नहीं है जो पर्यावरण संकट पर मंथन नहीं कर रहा हो। भारत भी चिंतित है। लेकिन, जहाँ दूसरे देश भौतिक चकाचौंध के लिए अपना सबकुछ लुटा चुके हैं, वहीं भारत के पास आज भी बहुत कुछ बाकी है। पश्चिम के देशों ने प्रकृति को हद से ज्यादा नुकसान पहुँचाया है। पेड़ काटकर जंगल के कांक्रीट खड़े करते समय उन्हें अंदाजा नहीं था कि इसके क्या गंभीर परिणाम होंगे? प्रकृति को नुकसान पहुँचाने से रोकने के लिए पश्चिम में मजबूत परंपराएँ भी नहीं थीं। प्रकृति संरक्षण का कोई संस्कार अखण्ड भारतभूमि को छोड़कर अन्यत्र देखने में नहीं आता है। जबकि सनातन परम्पराओं में प्रकृति- संरक्षण के सूत्र मौजूद हैं। भारतीय जीवन दृष्टि में प्रकृति पूजन को प्रकृति संरक्षण के तौर पर मान्यता है। भारत में पेड़-पौधों, नदी-पर्वत, ग्रह-नक्षत्र, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ मानवीय रिश्ते जोड़े गए हैं। पेड़ की तुलना संतान से की गई है तो नदी को माँ स्वरूप माना गया है। ग्रह-नक्षत्र, पहाड़ और वायु देवरूप माने गए हैं। प्रकृति के प्रत्येक अवयव को हमने आत्मीय भाव से देखा है और उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने की व्यवस्था की है। भारतीय दृष्टि प्रकृति का दोहन नहीं, अपितु त्यागपूर्वक उपभोग का संदेश देती है।
     ईशावास्योपनिषद के पहले ही श्लोक में इस संबंध में कहा गया है- 'ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यांजगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्यस्विद्धनम्।' अर्थात् इस जगत् में जो कुछ भी है वह सब ईश्वर द्वारा आच्छदित है। अर्थात् उसे ईश्वर ने उत्पन्न किया है और वही उसका स्वामी है। इसलिए मनुष्यों को उन सब सांसारिक पदार्थों का उपभोग त्याग की भावना रखकर ही करना चाहिए। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से 7-8 दिसंबर, 2017 को भोपाल में आयोजित दो दिवसीय 'ज्ञान- संगम'में यही बात अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संगठन मंत्री श्रीधर पराड़कर ने भी रखी। उन्होंने कहा कि हमें जो कुछ भी प्रकृति से प्राप्त हुआ है, उसका त्यागपूर्वक भोग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक क्षेत्र में आज जो समस्याएँ दिख रही हैं, उसका कारण है कि हमने भारतीय जीवन के आधार छोड़ दिए हैं। ज्ञान संगम में भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय संगठन मंत्री मुकुल कानिटकर ने उचित ही कहा कि प्रकृति भोग के लिए नहीं, बल्कि सामंजस्य एवं संतुलन बनाकर साथ चलने के लिए है और यही भारतीय दृष्टि है। प्रकृति के साथ यदि हमारा समन्वय हो जाएगा तो सामंजस्य की आवश्यकता नहीं होगी। यह सत्य है कि यदि पर्यावरण के प्रति भारतीय जीवन दृष्टि को विश्व के सभी लोग अपने जीवन में उतार लें, तो पर्यावरण की समूची समस्याओं का समाधान प्राप्त हो सकता है। यही कारण है कि पर्यावरण से संबंधित अनेक प्रकार की समस्याओं के समाधान के लिए विश्व भारत की ओर देख रहा है। पर्यावरण को बचाने एवं समृद्ध करने के लिए विश्व के अनेक देश भारत के नेतृत्व को स्वीकार कर चुके हैं। प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंदकुमार ने भी ज्ञान संगम में 'भारत की जीवन दृष्टि' को स्पष्ट करते हुए प्रकृति के प्रति भारतीय दृष्टि को प्रस्तुत किया है। श्री नंदकुमार ने कहा था कि भारतीय दृष्टि समूची सृष्टि को ईश्वर ही मानती है। मनुष्य मात्र में ही नहीं, अपितु प्रकृति के प्रत्येक तत्व- पेड़-पौधे, पक्षी, ग्रह-नक्षत्र, पृथ्वी, समुद्र एवं पहाड़, सबमें ईश्वर का ही अंश है। सबमें एक ही ब्रह्म है। इसलिए भारतीय ज्ञान परंपरा में सबके साथ आत्मीय संबंध देखे गए हैं। अन्यत्र किसी विचार-संस्कृति में प्रकृति के प्रति ऐसा दृष्टिकोण नहीं है। उन्होंने बताया- 'भृतहरि ने अपने वैराग्य शतक में प्रकृति की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि आकाश मेरा भाई है। पृथ्वी मेरी माता है। वायु मेरे पिता हैं और अग्नि मेरा मित्र है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन में प्रकृति को आनंद का बगीचा नहीं माना, बल्कि इसके साथ आत्मीय सम्बन्ध बनाए हैं।' भारतीय जीवन दृष्टि में प्रकृति के साथ यह जो आत्मीय संबंध स्थापित किए गए हैं, यही प्रकृति के साथ सामंजस्य एवं समन्वय की ओर मानव जाति को प्रेरित करती है।
  प्राचीन समय से ही भारत के वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों को प्रकृति संरक्षण और मानव के स्वभाव की गहरी जानकारी थी। वे जानते थे कि मानव अपने क्षणिक लाभ के लिए कई मौकों पर गंभीर भूल कर सकता है। अपना ही भारी नुकसान कर सकता है। इसलिए उन्होंने प्रकृति के साथ मानव के संबंध विकसित कर दिए। ताकि मनुष्य को प्रकृति को गंभीर क्षति पहुँचाने से रोका जा सके। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही भारत में प्रकृति के साथ संतुलन करके चलने का महत्वपूर्ण संस्कार है। यह सब होने के बाद भी भारत में भौतिक विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति पददलित हुई है। लेकिन, यह भी सच है कि यदि ये परंपराएँ न होतीं तो भारत की स्थिति भी गहरे संकट के किनारे खड़े किसी पश्चिमी देश की तरह होती। भारतीय जीवन दृष्टि ने कहीं न कहीं प्रकृति का संरक्षण किया है। भारत के लोगों का प्रकृति के साथ कितना गहरा रिश्ता है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही अग्नि की स्तुति में रचा गया है।
  प्रत्येक भारतीय परम्परा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है। इन रहस्यों को प्रकट करने का कार्य होना चाहिए। भारतीय जीवन पद्धति के संबंध में एक बात दुनिया मानती है कि यह 'जियो और जीने दो'के सिद्धांत पर आधारित है। यह विशेषता किसी अन्य विचार में नहीं है। दुनिया के शेष विचार सिर्फ अपने तक सीमित हैं। उनका भरोसा केवल 'मैं ही' में है। इसलिए वह दूसरे के अस्तित्व का न तो सम्मान करते हैं और न ही उसे स्वीकार करते हैं। यह विचार अपने से इतर विचारों को येन-केन-प्रकारेण अपने जैसा ही बना लेने को तत्पर हैं। जबकि भारतीय जीवन दृष्टि में न केवल दूसरों का सम्मान है, अपितु वह स्वीकार्य भी हैं। भारतीय जीवन दृष्टि का विश्वास 'मैं भी' में है। अर्थात् भारत के लोग, विचार और दर्शन अपने साथ दूसरों के अस्तित्व को मानते हैं। सह-अस्तित्व में भारतीय लोगों का भरोसा है। यह जीवन को देखने की एक उदात्त दृष्टि है। इसलिए भारतीय लोग अधिक संवेदनशील होकर सृष्टि के समस्त तत्वों के साथ आत्मीय संबंध स्थापित कर उनके अस्तित्व को सम्मान देते हैं।
            वैदिक वाङ्मयों में प्रकृति के प्रत्येक अवयव के संरक्षण और संवर्द्धन के निर्देश मिलते हैं। हमारे ऋषि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है। इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है- 'वृक्षाद् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन्न सम्भव:' अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है। जंगल को हमारे ऋषि आनंददायक कहते हैं- 'अरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु।'यही कारण है कि भारतीय जीवन पद्धति के चार महत्वपूर्ण आश्रमों में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वनों से ही है। हम कह सकते हैं कि इन्हीं वनों में हमारी सांस्कृतिक विरासत का संवर्द्धन हुआ है।
   भारतीय संस्कृति में वृक्ष को देवता मानकर पूजा करने का विधान है। वृक्षों की पूजा करने के विधान के कारण भारतीय जन स्वभाव से वृक्षों का संरक्षक हो जाते हैं। सम्राट विक्रमादित्य और अशोक के शासनकाल में वन की रक्षा सर्वोपरि थी। चाणक्य ने भी आदर्श शासन व्यवस्था में अनिवार्य रूप से अरण्यपालों की नियुक्ति करने की बात कही है। हमारे महर्षि यह भली प्रकार जानते थे कि पेड़ों में भी चेतना होती है। इसलिए उन्हें मनुष्य के समतुल्य माना गया है। ऋग्वेद से लेकर बृहदारण्यकोपनिषद्, पद्मपुराण और मनुस्मृति सहित अन्य वाङ्मयों में इसके संदर्भ मिलते हैं।
            छान्दोग्यउपनिषद् में उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु से आत्मा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वृक्ष जीवात्मा से ओतप्रोत होते हैं और मनुष्यों की भाँति सुख-दु:ख की अनुभूति करते हैं। आधुनिक समय में भारत के ही वैज्ञानिक जगदीश चंद्र वसु ने अपने प्रयोगों के आधार पर यह सिद्ध कर दिया कि वनस्पति में भी चेतना होती है, जीवन होता है, वह भी सुख-दु:ख का अहसास करते हैं। ऋग्वेद में एक वृक्ष की मनुष्य के दस पुत्रों से तुलना की गई है-
'दशकूप समावापी: दशवापी समोहृद:
दशहृद सम:पुत्रो दशपत्र समोद्रुम:।।'
      घर में तुलसी का पौधा लगाने का आग्रह भी भारतीय संस्कृति में क्यों है? यह आज सिद्ध हो गया है। तुलसी का पौधा मनुष्य को सबसे अधिक प्राणवायु ऑक्सीजन देता है। तुलसी के पौधे में अनेक औषधिय गुण भी मौजूद हैं। पीपल को देवता मानकर भी उसकी पूजा नियमित इसीलिए की जाती है क्योंकि वह भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देता है। परिवार की सामान्य गृहिणी भी अपने अबोध बच्चे को समझाती है कि रात में पेड़-पौधे को छूना नहीं चाहिए, वे सो जाते हैं, उन्हें परेशान करना ठीक बात नहीं। वह गृहिणी परम्परावश ऐसा करती है। उसे इसका वैज्ञानिक कारण ज्ञात नहीं रहता। रात में पेड़ कार्बन डाइ ऑक्सीजन छोड़ते हैं, इसलिए गाँव में दिनभर पेड़ की छाँव में बिता देने वाले बच्चे-युवा-बुजुर्ग रात में पेड़ों के नीचे सोते भी नहीं हैं। देवों के देव महादेव तो बिल्व-पत्र और धतूरे से ही प्रसन्न होते हैं। यदि कोई शिवभक्त है तो उसे बिल्वपत्र और धतूरे के पेड़-पौधों की रक्षा करनी ही पड़ेगी। वट पूर्णिमा और आंवला ग्यारस का पर्व मनाना है तो वटवृक्ष और आंवले के पेड़ धरती पर बचाने ही होंगे। सरस्वती को पीले फूल पसंद हैं। धन-सम्पदा की देवी लक्ष्मी को कमल और गुलाब के फूल से प्रसन्न किया जा सकता है। गणेश दूर्वा से प्रसन्न हो जाते हैं। प्रत्येक देवी-देवता भी पशु-पक्षी और पेड़-पौधों से लेकर प्रकृति के विभिन्न अवयवों के संरक्षण का संदेश देते हैं।
     मनुष्य के जीवन में वनस्पति के इस महत्व को जानकर ही ऋषियों ने उनकी स्तुति-पूजा का विधान रचा है। यह भी कहा जा सकता है कि ऋषियों ने यह व्यवस्था इसलिए दी होगी ताकि मनुष्य अपनी जीवन में वनस्पति के महत्व से भली-भाँति परिचित हो सके। पेड़-पौधों को नुकसान पहुँचाने से रोकना भी एक प्रमुख उद्देश्य रहा होगा। यद्यपि जीवित वनस्पति का मनुष्य के जीवन में अत्यधिक महत्व है, किंतु घर निर्माण, रसोई और यज्ञ आदि के लिए भी लकड़ी की आवश्यकता रहती है। ऐसी स्थिति में मनुष्य के सामने धर्मसंकट खड़ा न हो इसके लिए भी भारतीय संस्कृति में मार्गदर्शन दिया गया है। ऋषियों ने कहा कि वृक्षों से प्रार्थना करके लड़की, छाल, फूल-पत्ती माँगनी चाहिए। वृक्ष हमारी याचना सुनते हैं। इसके कई उदाहरण आख्यान में मिलते हैं। इसके बाद भी बहुत अधिक आवश्यकता के कारण वृक्ष काटना पड़े, तो उससे क्षमा याचना की परंपरा है। इसके लिए स्कन्दपुराण में कहा गया है-
'एतेषां सर्ववृक्षाणां छेदनं नैव कारयेत्।
चातुर्मास्ये विशेषेण विना यज्ञादि कारणम्।।'
अर्थात् वृक्षों को काटना नहीं चाहिए। यदि यज्ञ के उद्देश्य से काटना भी पड़े, तो भी वर्षा ऋतु में कदापि न काटा जाए। यहाँ ध्यान देना चाहिए कि यज्ञ जैसे पवित्र एवं लोक कल्याण के कार्य के लिए भी वृक्ष काटने पर आंशिक प्रतिबंध है। ऋषियों ने स्पष्टतौर पर कहा है कि वर्षा ऋतु में तो किसी भी प्रकार से वनस्पति को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए। वर्षा ऋतु प्रकृति के आनंद का समय है।
    जलस्रातों का भी भारतीय जीवन दृष्टि में बहुत महत्व है। ज्यादातर गाँव-नगर नदी के किनारे पर बसे हैं। ऐसे गाँव जो नदी किनारे नहीं हैं, वहां ग्रामीणों ने तालाब बनाए थे। बिना नदी या ताल के गाँव-नगर के अस्तित्व की कल्पना नहीं है। भारतीय संस्कृति के आधार स्तम्भ चार वेदों में से एक अथर्ववेद में बताया गया है कि आवास के समीप शुद्ध जलयुक्त जलाशय होना चाहिए। जल दीर्घायु प्रदायक, कल्याणकारक, सुखमय और प्राणरक्षक होता है। शुद्ध जल के बिना जीवन संभव नहीं है। यही कारण है कि जलस्रोतों को बचाए रखने के लिए हमारे ऋषियों ने इन्हें सम्मान दिया। पूर्वजों ने कल-कल प्रवहमान सरिता गंगा को ही नहीं वरन सभी जीवनदायनी नदियों को माँ कहा है। भारतीय परंपरा में अनेक अवसर पर नदियों, तालाबों और सागरों की माँ के रूप में उपासना की जाती है। छान्दोग्योपनिषद् में अन्न की अपेक्षा जल को उत्कृष्ट कहा गया है। महर्षि नारद ने भी कहा है कि पृथ्वी भी मूर्तिमान जल है। अन्तरिक्ष, पर्वत, पशु-पक्षी, देव-मनुष्य, वनस्पति सभी मूर्तिमान जल ही हैं। जल ही ब्रह्म है।
     महान ज्ञानी ऋषियों ने धार्मिक परंपराओं से जोड़कर पर्वतों की भी महत्ता स्थापित की है। देश के प्रमुख पर्वत देवताओं के निवास स्थान हैं। अगर पर्वत देवताओं के वासस्थान नहीं होते तो कब के खनन माफिया उन्हें उखाड़ चुके होते। विन्ध्यगिरि महाशक्तियों का वासस्थल है, कैलाश महाशिव की तपोभूमि है। हिमालय को तो भारत का किरीट कहा गया है। महाकवि कालिदास ने 'कुमारसम्भवम्' में हिमालय की महानता और देवत्व को बताते हुए कहा है- 'अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।' भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन की पूजा का विधान इसलिए शुरू कराया था क्योंकि गोवर्धन पर्वत पर अनेक औषधि के पेड़-पौधे थे, मथुरा के गोपालकों के गोधन के भोजन-पानी का इंतजाम उसी पर्वत पर था। मथुरा-वृन्दावन सहित पूरे देश में दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा धूमधाम से की जाती है।
  इसी प्रकार हमारे महर्षियों ने जीव-जन्तुओं के महत्व को पहचानकर उनकी भी देवरूप में अर्चना की है। मनुष्य और पशु परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। हिन्दू धर्म में गाय, कुत्ता, बिल्ली, चूहा, हाथी, शेर और यहां तक की विषधर नागराज को भी पूजनीय बताया है। भारतीय परिवारों में पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकाली जाती है। चींटियों को भी बहुत से लोग आटा डालते हैं। चिड़ियों और कौओं के लिए घर की मुँडेर पर दाना-पानी रखा जाता है। पितृपक्ष में तो काक को बाकायदा निमंत्रित करके दाना-पानी खिलाया जाता है। इन सब परम्पराओं के पीछे जीव संरक्षण का संदेश है। भारतीय व्यक्ति गाय को माँ कहता है। उसकी अर्चना करता है। नागपंचमी के दिन नागदेव की पूजा की जाती है। नाग-विष से मनुष्य के लिए प्राणरक्षक औषधियों का निर्माण होता है। नाग पूजन के पीछे का रहस्य ही यह है।
     भारतीय जीवन दृष्टि का वैशिष्ट्य है कि वह प्रकृति के संरक्षण की परम्परा की जन्मदाता है। भारतीय जीवन दृष्टि में प्रत्येक जीव के कल्याण का भाव है। भारत के प्रमुख त्योहार प्रकृति के अनुरूप ही हैं। मकर संक्रान्ति, वसंत पंचमी, महाशिव रात्रि, होली, नवरात्र, गुड़ी पड़वा, वट पूर्णिमा, ओणम्, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, छठ पूजा, शरद पूर्णिमा, अन्नकूट, देव प्रबोधिनी एकादशी, हरियाली तीज, गंगा दशहरा आदि सब पर्वों में प्रकृति संरक्षण का ही स्मरण है। आज यह स्थापित सत्य है कि प्राचीन काल में हमने जिन्हें ऋषि-मुनि कह कर संबोधित किया है, वह उस समय के वैज्ञानिक-विचारक थे। अपनी वैज्ञानिक समझ के आधार पर ही उन्होंने प्रकृति संरक्षण की ओर विशेष ध्यान दिया है। प्रकृति और प्रकृति द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक संसाधनों को संवद्र्धित कर आने वाली अपनी पीढ़ी को सौंपना हमारा नैतिक कर्तव्य है। ज्ञान संगम में 'प्रकृति में सामंजस्य एवं समन्वय की भारतीय दृष्टि' विषय पर अपनी बात रखते हुए पैसिफिक विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलपति प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा ने बहुत महत्वपूर्ण विचार रखे। उन्होंने स्पष्टतौर पर कहा है कि अपनी आने वाली पीढ़ियों को प्राकृतिक संसाधन देने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है कि वह अपने द्वारा उपयोग किए हुए संसाधनों एवं ऊर्जा का हिसाब रखे। जब हम यह हिसाब रखेंगे, तब ही हमें पता होगा कि हमने प्रकृति को कितना नुकसान पहुँचाया है। जब हमें यह पता होगा कि हमने प्रकृति को कितना नुकसान पहुँचाया है या पहुँचा रहे हैं, तब हम उसकी भरपाई के लिए सोचेंगे। प्रकृति को पहुँचाए नुकसान की भरपाई का विचार या प्रयास करते समय हमें ध्यान आएगा कि प्रकृति के अवदानों की प्रतिपूर्ति संभव नहीं है। इसके लिए एक ही रास्ता है कि हम संपूर्ण प्रकृति के प्रति भारतीय जीवन दृष्टि को पुन: व्यवहार में लाएँ। यह अत्यंत कठिन और असंभव कार्य भी नहीं है। भारतीय परंपरा ने सभी उपयोगी वनस्पतियों के संरक्षण की पूर्ण व्यवस्था की, बस उसका पालन करने की आवश्यकता है।
सम्पर्कः सहायक प्राध्यापक , माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपालE-mail- lokendra777@gmail.com

पर्यावरण

आइए एक बार पेड़ों के लिए दौड़ें...
- प्रो. अश्विनी केशरवानी
     औद्योगिक क्रांति की भट्ठी में हमने अपना जंगल झोंक दिया है। पेड़ काट डाले और सड़कें बना डालीं। कुल्हाड़ी-आरी से जंगल काटने में देर होती थी, तो पावर से चलने वाली आरियाँ  गढ़ डालीं। सन् 1950 से 2000 के बीच 50 वर्षों में दुनिया के लगभग आधे जंगल काट डाले, आज भी बेरहमी से काटे जा रहे हैं। जल संग्रहण के लिए तालाब बनाए  जाते थे, जिससे खेतों में सिंचाई भी होती थी। लेकिन आज तालाब या तो पाटकर उसमें बड़ी बड़ी इमारतें बनाई जा रही है या उसमें केवल मछली पालन होता है। मछली पालन के लिए कई प्रकार के रसायनों का उपयोग किया जाता है जिसका तालाबों का पानी अनुपयोगी हो जाता है। इसीप्रकार औद्योगिक धुएँ से वायुमंडल तो प्रदूषित होता ही है, जमीन भी बंजर होती जा रही है। इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा है और दुष्परिणाम हम भुगत रहे हैं। आखिर जंगल क्यों जरूरी है ? पेड़ हमें ऐसा क्या देते हैं, जो उन्हें बचाना जरूरी है ? पेड़ हमें फल, फूल, जड़ी-बूटी, भोजन, ईंधन, इमारती लकड़ी, गोंद, कागज, रेशम, रबर और तमाम दुनिया के अद्भूत रसायन देते हैं। इसलिए हमने उसका दोहन (शोषण) तो किया, पर यह भूल गये कि वृक्षों के नहीं होने से यह धरती आज वीरान बनती जा रही है। वनों के इस उपकार का रुपयों में ही हिसाब लगायें तो एक पेड़ 16 लाख रुपये का फायदा देता है। घने जंगलों से भाप बनकर उड़ा पानी वर्षा बनकर वापस आता है और धरती को हरा भरा बनाता है। पेड़ पौधों की जड़ें मिट्टी को बाँधे रहती है। पेड़ों की कटाई से धरती की हरियाली खत्म हो जाती है। धरती की उपजाऊ मिट्टी को तेज बौछारों का पानी बहा ले जाती है। पेड़ों की ढाल के बिना पानी की तेज धाराएँ पहाड़ों से उतर कर मैदानों को डुबाती चली जाती है। हर साल बाढ़ का पानी अपने साथ 600 करोड़ टन मिट्टी बहा ले जता है। मिट्टी के इस भयावह कटाव को रोकने का एक ही उपाय है-वृक्षारोपण। मिट्टी, पानी और बयार, ये तीन उपकार हैं वनों के हम पर; इसलिए हमारे देश में प्राचीन काल से पेड़ों की पूजा होती आयी है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़ों के अनुसार विकासशील देशों में हर घंटे 8 से 12 वर्ग कि.मी. वन काटे जा रहे हैं। वैज्ञानिक पृथ्वी को हरा गृहकहते हैं। हरियाली मानव सभ्यता की मुस्कान है। पृथ्वी की हरियाली हजारों किस्म की उपयोगी वनस्पतियों के कारण है, लेकिन आज तथाकथित विकास की अंधी दौड़ ने हमें पागल बना दिया है और हम जंगल काटकर कांक्रीट के जंगल खड़े कर रहे हैं। परिणामस्वरूप वनस्पतियों की 20 से 30 हजार किस्में धरती से उठ गई हैं। यदि हमारे पागलपन की यही स्थिति रही तो इस सदी के अंत तक हम 50 हजार से भी अधिक वनस्पतियों की किस्मों से हाथ धो बैठेंगे। इस बात का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इससे 10-12 जातियों के जीवों का भी लोप हो जाएगा । अतः पृथ्वी की हरियाली न केवल हमारे जीवन की ऊर्जा है, अपितु पर्यावरण को संतुलित करने के लिए बहुत जरूरी है।‘                                                
            पर्यावरण सबसे अधिक वनों से प्रभावित होता है। हवा, पानी, मिट्टी, तापमान आदि वनों से प्रभावित होते हैं। शंकुधारी पौधों की प्रजातियाँ  समुद्र तट से लगभग 5000 मीटर की ऊँचाई पर पहाड़ों पर पायी जाती है। शंकुधारी पौधों में जल ग्रहण क्षमता बहुत अधिक होती है। ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों में शंकुधारी पौधों के साथ साथ चौड़े पौधे वाले वृक्ष भी पाये जाते हैं। प्रायः इन क्षेत्रों के आसपास पानी का स्रोत पाया जाता है। साल प्रजाति के पौधे अन्य प्रजाति के पौधों की अपेक्षा अधिक ठंडे और आर्द्र होते हैं और इस क्षेत्र में पानी का बहाव हमेशा रहता है। छत्तीसगढ़ प्रदेश के सरगुजा, रायगढ़, जशपुर, रायपुर, बस्तर, दंतेवाड़ा, बिलासपुर और राजनांदगाँव जिलों के अलावा शहडोल, मंडला और बालाघाट जिले में साल के पेड़ बहुतायत में मिलते हैं। इसी प्रकार हिमालय की चोटी में पूरे वर्ष बर्फ जमे होने के कारण वहां से निकलने वाली नदियों में हमेशा पानी बहता है। लेकिन इंद्रावती, नर्मदा, सोन, चम्बल, महानदी, रिहंद, केन आदि का उद्गम बर्फीली पहाड़ियों से नहीं होने के कारण इनमें हमेशा पानी बहता जरूर था। लेकिन आज इन नदियों के ऊपर बाँध बन जाने से इन नदियों में भी पानी नहीं रहता। बल्कि इन नदियों में औद्योगिक रसायनयुक्त जल छोड़े जाने से नदियाँ  प्रदूषित होती जा रही है और नदियों के पुण्यतोया और मोक्षदायी होने में संदेह होने लगा है। छत्तीसगढ़ प्रदेश में साल के वनों के साथ साथ बाक्साइड, आयरन, कोयला, चूना और डोलामाइट अयस्क की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है, जिसका उत्खनन जारी है। इससे यहां की जल- ग्रहण क्षमता में भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगा है।
      वनों के घटने या बढ़ने से वहां की जलवायु प्रभावित होती है। वन क्षेत्रों में एवं उसके आसपास की जलवायु अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा आर्द्र और ठंडी होती है। जलवायु पर वनों के इस प्रभाव को माइक्रो क्लाइमेटिक इफेक्टकहते हैं। इस प्रभाव के साथ वनों का पृथ्वी के पूरे वातावरण एवं पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है। यहां यह बताना समीचीन प्रतीत होता है कि पौधे और वातावरण के साथ हमारा कैसा सम्बन्ध है। पौधे अपना भोजन बनाने के लिए सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पत्तियों में उपस्थित क्लोरोफिल और वातावरण में उपस्थित कार्बनडाइऑक्साइड के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करके अपना भोजन तैयार करते हैं और आक्सीजन छोड़ते हैं वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड और आक्सीजन का एक निश्चित अनुपात होता है। इसमें वायुमंडल में एक साम्य बना रहता है। लेकिन अगर कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाए, तो यह साम्य टूट जाता है। ऐसा तब होता है, जब पेड़ पौधे कम हों ? इस संतुलन को बिगाड़ने के लिए औद्योगीकरण बहुत हद तक जिम्मेदार है। गगनचुम्बी चिमनियों से और जल, थल ओर नभ में बढ़ते यातायात के साधनों के कारण कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती ही जा रही है, जो पृथ्वी के चारों ओर इकट्ठी होकर एक चादर का काम करती है। इससे पृथ्वी की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती, जिससे ताप में वृद्धि होती जा रही है। तापमान के बढ़ने की इस प्रक्रिया को ग्रीनहाउसकहते हैं वैज्ञानिकों का ऐसा अनुमान है कि अगली शताब्दी के अंत तक वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा दो गुनी हो जाएगी, जिससे ध्रुवीय क्षेत्रों का तापमान बढ़ जाएगा । इससे बर्फ पिघलेगी। गर्मी के दिनों में बाढ़ आएगी और अवर्षा के दिनों में बर्फ के पिघलने से बारहों मास बहने वाली नदियाँ  सूख जाएँगी। इससे जमीन का जल स्तर भी नीचे चला जाएगा  और इन नदियों में बनाए  गये बाँध सूख जाएँगे। इससे चलने वाले बिजली घर बंद हो जाएँगे। अतः इनसे होने वाले दुष्परिणामों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
    इसलिए यह विकास प्रकृति के साथ समरस होकर जीने वाले लोगों के लिए कष्ट दायक हो गया है। एक करोड़ पेड़ों को डुबाकर सुदूर वनांचल बस्तर में बनने वाली बोधघाट वि़द्युत जल परियोजना, भागीरथी टिहरी की घाटी में बसी हुई 70 हजार की जनसंख्या को विस्थापित कर बनने वाला भीमकाय टिहरी बाँध और इसीप्रकार के अन्य बाँध जो कभी भी अपनी पूरी आयु तक जिंदा नहीं रहेंगे, गंधमर्दन के प्राकृतिक वन को उजाड़कर प्राप्त होने वाले बाक्साइड और दून घाटी को रेगिस्तान बनाकर प्राप्त होने वाले चूना पत्थर से किसको लाभ होने वाला है ? इस प्रकार के विकास के आधार पर खड़ी होने वाली अर्थ व्यवस्था अवश्य ही भोग लिप्सा को भड़का सकती है, क्षेत्रीय असंतुलन पैदा कर सकती है। इससे पर्यावरण की अपूरणीय क्षति हो सकती है, जिसकी भरपाई किसी भी कीमत पर नहीं हो सकती। बहुगुणा जी ऐसे विकास के लक्ष्य को भारतीय संस्कृति के अनुरूप एक कसौटी पर खरा उतरने की बात कहते हैं। वे गांधी जी की बातों को याद दिलाते हैं। गांधी जी हमेशा कहते थे-पृथ्वी प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता पूरी करने के लिए तो सब कुछ देती है, लेकिन मनुष्य के लोभ को तृप्त करने के लिए कुछ भी नहीं देती।
   आखिर जंगल क्यों जरूरी है ? पेड़ पौधे हमें ऐसा क्या देते हैं, जो उन्हें बचाना जरूरी है ? पेड़-पौधे हमें फल, फूल, जड़ी-बूटी, भोजन, ईंधन, इमारती लकड़ी, गोंद, कागज, रेशम, रबर और कई प्रकार के रसायन देते हें। इसलिए उसका शोषण तो किया गया, पर हम यह भूल गये कि पेड़-पौधो के कारण ही यह धरती मानव विकास के योग्य बन सकी है। इसलिए आइये हम एक बार पेड़ों के लिए दौड़ें... 
सम्पर्कः राघव’, डागा कालोनी, चांपा-495671 (छत्तीगढ़), E-mail- ashwinikesharwani@gmail.com

Jun 11, 2018

कृषि को समेटता जलवायु परिवर्तन

कृषि को समेटता जलवायु परिवर्तन
- डॉ. खुशालसिंह पुरोहित
औद्योगीकरण एवं वर्तमान में जीवाश्म ईंधनों का अधिकाधिक उपयोग से जलवायु परिवर्तन हो रहा है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। पृथ्वी का औसत वार्षिक तापमान लगभग 15 डिग्री सेंटीग्रेड है। पृथ्वी को गर्म रखने की वायुमण्डल की यह क्षमता ग्रीनहाऊस गैसों की उपस्थिति पर निर्भर करती है। इनकी मात्रा में वृद्धि के परिणामस्वरूप ग्रीनहाऊस प्रभाव बढ़ जाएगा, जिससे वैश्विक तापमान में अत्यधिक वृद्धि हो जाएगी। बढ़ते वैश्विक तापमान यानी ग्लोबल वार्मिंग के लिए  कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है।
इक्कीसवीं शताब्दी के पहले 16 बरसों में 15 बरस पिछली एक शताब्दी की तुलना में सर्वाधिक गर्म रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण हरियाली में आ रही निरन्तर कमी है। पेड़, नदियों और पहाड़ों के अलावा जीव जन्तुओं तक की पूजा करने वाले भारतीय समाज में आज इनके विनाश को लेकर गम्भीर चिन्ता नहीं है।
तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन हमारी कृषि व्यवस्था, आर्थिक और औद्योगिक नीति तथा जीवनशैली से जुड़ा हुआ है। जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव खेती पर पड़ेगा। क्योंकि तापमान वर्षा आदि में बदलाव आने से मिट्टी की क्षमता में कमी होगी और कीट-पतंगों से फैलने वाली बीमारियाँ बड़े पैमाने पर होगी। गर्म मौसम होने से वर्षा चक्र प्रभावित होता है इससे बाढ़ या सूखे का
खतरा बढ़ता है।
एक समय था डग-डग रोटी पग-पग नीर के मुहावरे के लिए मालवांचल प्रसिद्ध था। इन दिनों गायब होती हरियाली और तेजी से नीचे जा रहे भूजल स्तर के कारण मालवा की वर्तमान पर्यावरणीय स्थिति दयनीय हो गई है। कृषि वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं यदि तापमान 3-5 डिग्री बढ़ता है तो गेहूँ के उत्पादन में 10-15 प्रतिशत की कमी आ जाएगी।
औद्योगीकरण एवं वर्तमान में जीवाश्म ईंधनों का अधिकाधिक उपयोग से जलवायु परिवर्तन हो रहा है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। पृथ्वी का औसत वार्षिक तापमान लगभग 15 डिग्री सेंटीग्रेड है। पृथ्वी को गर्म रखने की वायुमण्डल की यह क्षमता ग्रीनहाऊस गैसों की उपस्थिति पर निर्भर करती है। इनकी मात्रा में वृद्धि के परिणामस्वरूप ग्रीनहाऊस प्रभाव बढ़ जाएगा, जिससे वैश्विक तापमान में अत्यधिक वृद्धि हो जाएगी। बढ़ते वैश्विक तापमान यानि ग्लोबल वार्मिंग के लिए कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है। परन्तु इसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, मानव की उपभोगवादी गतिविधियाँ।
बढ़ता शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, वाहनों की भीड़, क्लोरोफ्लोरो कार्बन का वातावरण में रिसाव, बढ़ती विमान यात्राएँ, प्रकृति के साथ किया जा रहा खिलवाड़ एवं सबसे बढ़कर हमारी विलासितापूर्ण जीवनशैली का असर पूरे विश्व पर पड़ रहा है। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित वे देश हो रहे हैं जिनकी आबादी ज्यादा है और विकास की दृष्टि से पीछे हैं।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। दक्षिणी एशिया के चीन व भारत दो ऐसे विकासशील देश हैं, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों के दोषपूर्ण विदोहन से अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। यहाँ वन क्षेत्र कम हुआ है, बीसवीं सदी में भारत भूमि लगभग 30 प्रतिशत वनाच्छादित थी जो घटकर मात्र 19.4 प्रतिशत ही रह गई है।
भारतीय अर्थव्यस्था मुख्यतः कृषि आधारित है, कृषि के लिए  जल का महत्त्व है। मानसून की अनिश्चितता के कारण भारतीय कृषि पहले से ही अनिश्चितता का शिकार रही है। इस कारण विभिन्न फसलों के उत्पादन एवं उसकी उत्पादकता पर प्रभाव पड़ा है। फसलों पर कीटों का प्रकोप बढ़ा है। कृषि उत्पादन में कमी के कारण कृषि पदार्थों की कीमतों में भारी वृद्धि देखी जा रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानव का स्वास्थ्य भी अछूता नहीं है।
विज्ञान लेखक प्रो. दिनेश मणि का कहना है भारत में वैज्ञानिक कृषि का शुभारम्भ16वीं शताब्दी में हुआ। जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि होने के कारण कृषि उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता पड़ी। नई नीतियों का जन्म हुआ जिनका सीधा प्रभाव कृषि पर पड़ा। नकदी खेती के लिए  गन्ना, कपास, तम्बाकू, चारा, पशु उत्पादन, ऊन और चमड़ा पैदा करने पर ध्यान दिया गया।
भारतीय कृषि में किसान और पर्यावरण का सीधा सम्बन्ध है तथा किसान कृषि और पर्यावरण के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी है। इसलिए  किसानों को ऐसी खेती करनी चाहिए जिससे खेती में उन्नति के साथ-साथ पर्यावरण को भी शुद्ध बनाए रखा जा सके। जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में कमी आएगी तथा अनेक फसलों के उत्पादन क्षेत्रों में परिवर्तन होगा।
जलवायु परिवर्तन के सम्भावित दुष्प्रभावों से कृषि को बचाने के लिए  अनुकूलन हेतु अनेक कार्यनीतियाँ को मूर्तरूप देना होगा। फसलों एवं जीव-जन्तुओं में स्वाभाविक रूप से काफी हद तक अपने ढालने की क्षमता होती है जिसे प्राकृतिक अनुकूलन कहते हैं। हमें फसलों की ऐसी प्रजातियों विकसित करनी होंगी जो उच्च तापमान को सह सकें। वहीं दूसरी और कृषि प्रबन्ध तकनीकों में सुधार करके हम जलवायु परिवर्तन के सम्भावित प्रभावों को काफी हद तक कम कर सकते हैं। 
हमें टिकाऊ खेती के सिद्धान्तों को समझने व उनके अनुसरण पर जोर देना होगा। पारम्परिक खेती के साथ-साथ कृषि वानिकी, जैविक खेती, न्यूनतम जोत, समन्वित पोषक तत्व प्रबन्धन तथा समन्वित नाशी जीव प्रबन्धन को अपनाने की आवश्यकता है तभी हम कृषि को सुरक्षित रख पाएँगे तथा पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचा सकेंगे।
सम्पूर्ण कृषि विकास के लिए  समेकित जल प्रबन्धन द्वारा जल की प्रत्येक बूँद का इस्तेमाल कृषि में करने की आवश्यकता है। उन्नत कृषि तकनीकी के प्रचार-प्रसार के लिए  कृषि शिक्षा के पाठ्यक्रम को नया रूप देना होगा ताकि कृषि शिक्षा, अनुसन्धान विस्तार और भारतीय कृषि में आवश्यकताओं के अनुरूप जनशक्ति तैयार की जा सके। इससे हमारी कृषि और कृषकों को मजबूती मिलेगी। मानव जीवन में तीन बुनियादी आधार शुद्ध हवा, ताजा पानी और उपजाऊ मिट्टी मुख्य रूप से वनों पर ही आधारित हैं।
इसके साथ ही पेड़ से कई अप्रत्यक्ष लाभ भी हैं। जिनमें खाद्य पदार्थ, औषधियों, फल-फूल, ईंधन, पशु आहार, इमारती लकड़ी, वर्षा सन्तुलन, भूजल संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता आदि प्रमुख हैं। पेड़ और पर्यावरण की रक्षा आवश्यक है और यह महान विरासत हमारी राष्ट्रीय धरोहर हैं।
पेड़ लगाने और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए  हमारे देश में प्राचीनकाल से ही प्रयास होते रहे हैं जिसमें सरकार और समाज दोनों ही समान रूप से भागीदार होते थे। राजा व साहूकार सड़क किनारे छायादार पेड़ लगवाते थे तो जनसामान्य इनके संरक्षण की जिम्मेदारी निभाता था। इस प्रकार राज और समाज के परस्पर सहकार से देश में एक हरित संस्कृति का विकास हुआ जिसने वर्षों तक देश को हरा-भरा रखा। वर्तमान विषम परिस्थिति में इसी विचार से हरियाली का विकास होगा जिसकी आज सर्वाधिक आवश्यकता है। (सर्वोदय प्रेस सर्विस)

हरा समाधान खरा समाधान

हरा समाधान खरा समाधान
-डॉ.  शुभ्रता मिश्रा 
प्रकृति से हरीतिमा का गायब होते जाना और नीले आकाश का कालिमा से ढँकते जाना, वर्तमान शताब्दी की सबसे बड़ी मानवजनित प्राकृतिक चुनौती है। निःसन्देह जब दशकों पहले दुनिया को इस प्राकृतिक असहजता की सुगबुगाहटों का अनुभव होने लगा था, तभी से धीरे-धीरे राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तरों पर जागरूक कदम उठाए जाने लगे थे, नीतियाँ बनने सँवरने लगीं थीं।समय-समय पर इनमें संशोधनों की विभिन्न प्रक्रियाओं का दौर आज भी जारी है। पर समस्या वही ढाक के तीन पात की तरह सुलझने का नाम नहीं लेती या कि सुलझ तो सकती है, पर उलझाए रखने वालों की संख्या ज्यादा है और आनुपातिक तौर पर जन-जागरूकता का दृष्टिकोण रखने वाले भी बहुत कम है।
किसी भी विषय के प्रति जागरुकता की सफलता व्यक्ति से लेकर विश्व तक उसकी सही पैरवी पर निर्भर करती है। ग्लोबल वार्मिंग और वायु प्रदूषण को रोकने के लिए  जब 2017 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण परिवर्तन सम्मेलन में भारत सहित विश्व के 19 देशों अर्जेंटीना, ब्राजील, कनाडा, चीन, डेनमार्क, मिस्र, फिनलैंड, फ्रांस, इंडोनेशिया, इटली, मोरक्को, मोजांबिक, नीदरलैंड्स, पराग्वे, फिलीपींस, स्वीडन, ब्रिटेन और उरुग्वे ने जैविक ईंधन के उपयोग को लेकर एकजुटता का परिचय दिया, तब लगा कि घोषणापत्र में 2050 तक विश्व को कोयले के इस्तेमाल से मुक्त करने की प्रतिज्ञा सचमुच रंग लाएगी। लेकिन सच तो यह है कि अक्सर ऐसे सम्मेलनों और घोषणापत्रों की सच्चाई कागजों की खूबसूरती बनकर रह जाती है और विफलताएँ लोगों को एक कोने में लाकर बैठा देती हैं।
ऐसी ही कुछ कागजी सच्चाइयाँ हमारे देश में भी नजर आती हैं। हमारे यहाँ सम्बन्धित विषयों के समय और दिवस आने पर लोगों के साथ सरकारें भी ऐसे मुद्दों के प्रति काफी सचेत दिखने लगती हैं और बैनरों, रैलियों, भाषणों, गोष्ठियों के साथ ही सम्मेलनों के दौर शुरू हो जाते हैं। उनका यह तथाकथित जोश हमें दिग्भ्रमित करने में ऐसे कामयाब हो जाता है, मानो कल तक ही सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। कुछ समय के लिए मनोरंजित अवश्य हो लिया जाता है;लेकिन हकीकत कभी बदलती नहीं हैं। ऐसे कार्यक्रमों के दौरान हुई हलचलें सिर्फ वैचारिक एवं पर्यावरणीय सड़ांध छोड़ जाती हैं और सभी तरह के प्रदूषणों का स्तर बढ़ जाता है।
ऐसा नहीं है कि भारत में प्रदूषण को रोकने के लिए  उपाय, कार्ययोजनाएँ और नीतियाँ न बनाई गई हों। सब कुछ मानदण्डों के तहत निर्धारित किया गया है। 1976 में बनी पर्यावरण नीति के तहत भी वाहनों से होने वाले प्रदूषण को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए  भारत सरकार द्वारा समय-समय पर अनेक कानून बनाए गए हैं। 
वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2004 में विशेष रूप से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में वायु की गुणवत्ता और वायु प्रदूषण का नियंत्रण के तथ्यों को सम्मिलित किया गया है। इन अधिनियमों के अनुसार केन्द्र व राज्य सरकार दोनों को वायु प्रदूषण से होने वाले प्रभावों का सामना करने के लिए  कुछ विशिष्ट शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। 
इन कानूनों के आलोक में विभिन्न स्तरों पर प्रदूषण नियंत्रण हेतु प्रयास व प्रयोग किए जाते रहते हैं, परन्तु सफलता का प्रतिशत आशानुरूप नहीं होता। इस असफलता की जड़ में जाने पर प्रत्येक स्तर पर कार्यान्वयन की परिशुद्धता में कमी और जन-उदासीनता इसके मूल कारण नजर आते हैं।
ऐसे अनेक प्रयोगों की बानगियाँ समय-समय पर भारत में दिखती रहती हैं, जिनमें प्रदूषण से मुक्ति के लिए  कुछ हरे समाधान सुझाए जाते हैं। जैसे महाराष्ट्र के नागपुर शहर में फैलते वायु प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से 2016 से ग्रीन बसें संचालित की गईं जो एक हरा और खरा समाधान साबित हो सकता था। लेकिन प्रयास सही मायनों में सफल नहीं हो पाया ;क्योंकि इसे लोगों का पर्याप्त सहयोग नहीं मिल सका। ये ग्रीन बसें अभी भी शहर की सड़कों पर दौड़ रही हैं, परन्तु सिर्फ रस्म अदायगी के तौर पर। 
क्लीन एनर्जी इन्वेस्टमेंट्स के लिए  विश्व में अपनी पहचान बना चुकी स्वीडन की स्कानिया कम्पनी द्वारा निर्मित इन उच्चतम वातानुकूलित ग्रीन बसों में ईंधन के रूप में एथेनॉल का प्रयोग किया जाता है। इस बस सर्विस के एक कर्मचारी के अनुसार बसों में लगभग समस्त आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जैसे ऑटोमेटिक ट्रांसमिशन (जिसमें क्लच और गियर नहीं होता है) जीपीएस प्रणाली, सीसीटीवी कैमरा, स्टाप आने से पहले ध्वनि के माध्यम से पूर्वसूचना, चालक सीट पर माइक्रोप्रोसेसर मॉनीटर। इसके अलावा बसों में चालक वीडियो कॉल सुविधा द्वारा सीधे नियंत्रण कक्ष से जुड़ सकते हैं। इनकी सीटें बेहद आरामदायक हैं और दिव्यांगों के लिए  इनमें विशेष सीटों का प्रबन्ध है। स्टाप पर रुकने के बाद बुजुर्गों के चढ़ने व उतरने के लिए  लो फ्लोर की सुविधा भी है।
आमतौर पर देखा गया है कि अधिकांश लोगों में नए प्रयोगों या बदलाव को स्वीकार करने के प्रति अरुचि होती है। जैसे नागपुर में पर्यावरण अनुकूल बसों को बारे में लोग मानते हैं कि ये किसी खिलौने की तरह हैं, जो सिर्फ प्रयोगशालाओं तक ठीक हैं, व्यावहारिक स्तर पर उतनी खरी नहीं हैं। भले ही इन बसों ने नागपुर को जैवईंधन आधारित पब्लिक ट्रांसपोर्ट वाला पहला भारतीय शहर बना दिया, परन्तु शहर के लोगों की उदासीनता के कारण यह प्रयोग परवान नहीं चढ़ सका।
इसी तरह जुलाई 2017 में भारत की जानी मानी ऑटो कम्पनी, टाटा मोटर्स ने देश की पहली बायो-मीथेन इंजन (5.7 एसजीआई और 3.8 एसजीआई) से लैस बसें बनाईं और दावा किया गया कि ये देश के शहरों को साफ रखने में सकारात्मक योगदान दे पाएँगी। इनके चुनिन्दा मॉडलों का प्रदर्शन एक ऊर्जा उत्सव के दौरान हुआ पर उसके समाप्त होते ही सब कुछ किसी सपने की तरह विलुप्त हो गया। इस प्रयास से एक सकारात्मक सोच की जीत हुई, परन्तु व्यावहारिकता तब आस लगाए खड़ी है।
इन्हीं प्रयासों की शृंखला में भारत की वैज्ञानिक बिरादरी जैव ईंधन का विकल्प ढूँढ़ने में व्यस्त हैं। ऑटोमोबाइल उद्योग, इलेक्ट्रिक और जैवईंधन से चलने वाले वाहनों की प्रौद्योगिकी विकसित करने में लगी हुई है। सरकार देश की सार्वजनिक यातायात प्रणाली में नीतिगत स्तरों पर इन शोधों और प्रौद्योगिकियों को लागू करने के लिए  प्रतिबद्ध हैं। यह अलग बात है कि सामान्य लोग इन तीनों के मध्य घूम रहे विकल्पों और नीतियों को स्वीकार कर पाने के प्रति सशंकित हैं।
प्रचलित ईंधन के विकल्पों के तौर पर सीएनजी, बायोडीजल और एथेनॉल के प्रयोग में इजाफा हो रहा है लेकिन वैश्विक स्तर पर इनकी भागीदारी मात्र 8.5 प्रतिशत है। इसी तरह भारत में जैव ईंधन की मौजूदा उत्पादन क्षमता सिर्फ 12 लाख टन आँकी गई है पर यह इसकी माँग के अनुसार नाकाफ़ी है। 
देश में जीवाश्म ईंधनों की मौजूदा जरूरत का मात्र 20% भाग ही यहाँ उत्पन्न किया जाता है शेष भाग की आपूर्ति के लिए  हमें आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। इस आयात पर भारत को प्रति वर्ष छह लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। देश में निरन्तरबढ़ रही पेट्रोलियम पदार्थों की खपत से अन्दाजा लगाया गया है कि तेल का भण्डार अगले 40 से 50 सालों में समाप्त हो सकता है। इस दृष्टिकोण से अब जैवईंधन के उत्पादन पर जोर दिया जाने लगा है।
भारत में जैवईंधन के रूप में बायो डीजल और एथेनॉल के नाम सामने आते हैं। दो दशकों पहले वैज्ञानिकों ने रतनजोत (जट्रोफा), सोयाबीन अथवा कनोला आदि से प्राप्त किये गए वनस्पति तेलों एवं जन्तुवसाओं द्वारा बायोडीजल के उत्पादन की प्रक्रिया विकसित की है। इससे प्राप्त बायोडीजल का उपयोग आधुनिक डीजल वाहनों में या तो सीधे तौर पर अथवा जीवाश्म डीजल के साथ किसी सुनिश्चित अनुपात में मिलाकर किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसके लिए  वाहन में किसी भी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होती है।
जैवईंधन का दूसरा प्रचलित होता जा रहा विकल्प एथेनॉल है। इसकी सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसका उत्पादन किसी भी पौधे में पाये जाने वाले स्टार्च से किण्वन द्वारा सरलता से किया जा सकता है। अभी तक इसके लिए  गन्ना को सर्वाधिक उपयुक्त एवं सस्ती फसल के रूप में उपयोगी समझा गया है।
प्रारम्भ में जिन हरी बसों का जिक्र किया गया है, उनमें प्रयुक्त एथेनॉल को विशेष रूप से गन्ने से ही तैयार किया जाता है। गन्ने के अलावा भी दूसरे विकल्पों की खोज में वैज्ञानिक निरन्तर लगे हैं। तकनीशियनों का कहना है कि एथेनॉल को उसके विशुद्ध रूप में वाहनों में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है, बल्कि इसके लिए  वाहनों के इंजन में परिवर्तन करने पड़ते हैं, क्योंकि यह वाहन में लगे रबर और प्लास्टिक के कल-पुर्जों को नुकसान पहुँचता है।
इस तरह एथेनॉल और बायोडीजल, उद्योग जगत, सरकार और लोगों के बीच चर्चा का विषय है। इनके प्रयोग के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है। यह जरूर है कि किसी भी परिवर्तन को अपनाने के लिए  लोगों को समय की आवश्यकता होती है। अतः इनको पेट्रोल और डीजल के स्थान पर उपयोग में लाने में लोगों को परेशानी हो रही है। गाँवों में इनको अपनाने में अधिक मुश्किल है ;क्योंकि वहाँ लोगों में जागरूकता की कमी है। फिर भी मेट्रो शहरों और कुछ बड़े शहरों में वाहनों में जैवईंधन के इस्तेमाल को लेकर हिचक मिटती-सी दिखने लगी है। लोग इनका उपयोग कर पाने के लिए  स्वयं को अभ्यस्त करने लगे हैं।
यही कारण है कि अब जैवईंधन के उत्पादन की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण कदम उठने लगे हैं। वैश्विक स्तर पर बायो डीजल के उत्पादन, बाजार में खपत और उपयोग के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2021 तक विश्व में जैवईंधन का उत्पादन 65.7 बिलियन गैलन प्रति वर्ष के स्तर पर पहुँच जाएगा। यह बात सामने आ रही है कि बायो डीजल अपनी कार्बन तटस्थता के गुण के कारण काफी लोकप्रिय हो रहा है।
10-12 अप्रैल, 2018 के बीच नई दिल्ली में आयोजित हुई अन्तरराष्ट्रीय ऊर्जा फोरम की 16वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में वैश्‍विक ऊर्जा की आपूर्ति और खपत में हो रहे बड़े बदलाव पर गहन विचार-विमर्श किया गया। भारत सहित 72 सदस्य देशों को मिलाकर वर्ष 1991 में गठित इस फोरम में बायोडीजल और एथेनॉल के उपयोग को वायु प्रदूषण से निपटने के हरे समाधान के तौर पर विश्लेषित किया गया।
कुछ समय से देश में एक और मुद्दा बार-बार सामने आ रहा है कि शीघ्र ही सरकारी स्तर पर नई जैवईंधन नीति तैयार की जाएगी। देश के उन क्षेत्रों में जहाँ बंजर जमीन पर पारम्परिक फसलों की खेती सम्भव नहीं है, वहाँ बायो डीजल देने वाली फसलें उगाने की भी तैयारी है। सरकार की 2022 तक जीवाश्म ईंधन के आयात पर निर्भरता को 10 प्रतिशत कम करने के लक्ष्य में जैवईंधन की भूमिका अहम हो सकती है। इसके साथ ही पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय वर्ष 2022 तक 5 प्रतिशत बायोडीजल मिश्रण की योजना बना रहा है। इससे उद्योग जगत को लगभग 27,000 करोड़ रुपये के व्यवसाय के साथ ही 6.75 अरब लीटर जैवईंधन की माँग पैदा होने की आशा है।
हालाँकि सदियों से चले आ रहे जीवाश्म ईंधन के प्रयोग को कम करना अपने आप में बड़ी चुनौती है, क्योंकि तकनीकी स्तर पर देश की परिवहन व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत होगी जो किसी भी तरह से आसान काम नहीं है। इसके अलावा सरकार और तमाम ऑटोमोबाइल कम्पनियों पर पड़ने वाला आर्थिक दबाव भी एक बड़ा अवरोध है। निश्चित रूप से एथेनॉल और बायोडीजल एक हरा और खरा समाधान बन सकते हैं, बस उसे सरकारी औद्योगिक और व्यक्तिगत स्तर पर जागरूकता और एक दृढ़ संकल्प के साथ अपनाने की जरुरत है। (इंडिया वाटर पोर्टल से)