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Aug 15, 2017

पंछियों की दुनिया से...

        पंछियों की दुनिया से...
               - दीपाली शुक्ला
बालकनी में कबूतरों का डेरा न जमा होता तो पंछियों की दुनिया से जुडऩे का मौका ही न मिला होता। उनको देखना एक दिलचस्प  अनुभव है और उससे भी कहीं अधिक एक अनजानी दुनिया का सफर भी। उनकी सुंदरता ही नहीं उनका संघर्ष भी अन्दर तक छू जाता है। पेड़, ज़मीन, खेत कम हो रहे हैं और पंछी भी। तो ऐसे में एक कोशिश है कि पंछियों से, उनकी दुनिया से एक जुड़ाव बने ताकि पंछी और उनका वजूद इस दुनिया में बना रहे।
पंखों वाली पत्तियाँ
ठंड के कुहासे के बीच कहीं सूरज की झीनी सी रोशनी फैल रही है। झाडिय़ों की हरी-सूखी पातों की ओट से चीं-चीं की आवाज़ें आ रही हैं। पहले एक छोटी चिडिय़ा चिंचिंयाती झुरमुट से बाहर आई और एक सूखी शाख के सिरे पर बैठ गई। नन्हेें परों को झटकारते, गर्दन को इधर-उधर करते-करते वह हल्की  गरमाहट को अपने भीतर समेटने लगी। सूखी शाख उसके वज़न से हिल रही थी। अभी कुछ पल ही बीते थे कि एक और चिडिय़ा आ गई। आकार में कुछ बड़ी। उसको देखते ही चिंचिंयाहट हुई। कभी ज़ोर से तो कभी धीरे। फिर उस शाख पर एक और चिडिय़ा उग आई। देखते ही देखते पाँच-छह चिडिय़ों का पूरा कुनबा उस हिलती-डुलती शाख पर यूँ बैठ गया मानो शाख पर पत्तियाँ आ गई हों, पत्तियां पंखों वाली पत्तियाँ। सूखी शाख हौले से हिल रही है...
नाराजग़ी
पीलू लगातार हरिली को पुकार रहा था। पर हरीली थी कि न जाने कहाँ छुपकर बैठी थी। कल पीलू ने हरीली को कुछ कहा था जो उसको अच्छा  नहीं लगा। पीलू ने ऊपर-नीचे, फूलों के गुच्छों  में, कोटर में हर जगह हरिली को ढूंढा। उसकी टरररर....करररर...सुनकर बुलबुल और गौरेया तक पेड़ों की पत्तियों की ओट से बाहर निकल आईं। क्या तुमने हरीली को देखा। नहीं। क्या तुम्हें हरीली दिखी। नहीं। पीलू ने कुछ पीले फूलों को खाया। फिर कुछ देर चुपचाप बैठा रहा। और फिर पुकारने लगा।  लेकिन हरीली पेड़ के एक सिरे पर दूसरी ओर मुँह किए बैठी रही।  
कतार
बरसात धीमी हो चली है। और सूरज बरसाती बादलों के पार हो गया है। सतरंगी चांदा और चंद फुहारें। आम के पेड़ से धीरे-धीरे आवाज़ें तेज हो चली हैं। पानी से तरबतर, गदबद चिडिय़ा एक-एक करके तार पर बैठ गई हैं। कुछ चुप्प हैं और सिरे पर बैठी हैं। कुछ एक-दूसरे से बातों में मगन हैं। एक पंखों को फटकारते ऊपर उड़ी, पानी से बाकी तर हुईं। फिर सब पंखों से पानी झाडऩे लगीं। सब फिर गीली हुईं। तार और चिडिय़ों के ठीक पीछे चांदा धीरे-धीरे मिटने लगा।
भूख
बारिश जारी थी। तोतों को भूख लगी थी, ज़ोरों की भूख। पानी के कारण कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था। पूरा दल भीगी पत्तियों से टपकते पानी में पंखों को समेटे डालियों में दुबका हुआ था। दोपहर बीत चुकने को थी कि बरसात की गति थमने लगी। सब उड़ चले।
एक फलियों से लदा पेड़ दिखा। सब ने उस पेड़ का रूख किया। तुरन्त फलियों को खाने की होड़ लगी। भूख इतनी थी कि उलटते लटकते, कभी एक-दूसरे को धकियाते तोतों ने बिना समय गँवाए खूब सारी फलियाँ चटकर डालीं। बड़े तो बड़े, छोटे भी पीछे न थे। फिर बौछारें तेज़ हुईं और पेड़ से तोतों का झुंड गायब हो गया।
वजूद
गर्मी में छांव, बरसात में छत, ठंड में धूप। सबको चाहिए। उस झाड़ी में जहाँ पूरा कुनबा रहता है। उस पेड़ पर जहाँ अलग-अलग कई कुनबे रहते हैं। उस मुंडेर पर जहाँ ढेर सारे पंछियों का बसेरा है। सब जूझते हैं अपनी-सी सूरतों से, कुछ अलग सूरतों से, कुछ आकार में अपने से बड़ों से। बिना इसके तो जगह मिलेगी नहीं मुट्ठी भर।  
धूप का टुकड़ा
शीशम ठंड से कांप रहा है। पत्तियाँ हरी, फिर पीली, फिर सुनहरे रंग में बदल गई हैं। कुछ पत्तियाँ अभी भी डालों पर टंगी हैं। पर सबसे ऊपर की पत्तियाँ अब विदा हो चुकी हैं। सूखी डालों पर बुलबुल भी बैठकर गुनगुनाहट का मज़ा लेना चाहती है, कोयल, मुनिया और चिडिय़ा भी। पर उस डाल पर तो कोई एक ही बैठ सकता है। शीशम बस देख रहा है। रोशनी के बढ़ते ही गिलहरी दौड़ रही हैं सूखे तने और डालों को गुदगुदी करतीं। उसे धूप के टुकड़ों की कोई फिक्र नहीं। बुलबुल और चिडिय़ा ने पँखों को ताना और धूप का स्वाद चखने को उड़ान भरी। बुलबुल और चिडिय़ा ने डाल हथिया ली। बाकी परिंदे देख रहे हैं। पेड़ के इर्द-गिर्द सुनहरी अलाव की आभा सूरज की रोशनी में चमक उठी है। 

कहानी

मौलाना
शहादत
फज़र की नमाज़ पढऩे के बाद सकीला ने दरवाज़े से झांका तो नमाज़ी लोग मस्जिद में नमाज़ के लिए जा रहे थें। उसने सोचा कि चलो अभी तो नमाज़ भी नही हुई। जमात होने से पहले ही वह घूम कर आ जाएगी।
उसने सिर पर अच्छे से लिपटे दुपट्टे पर शॉल ओढ़ा और नहर की ओर चल दी। फरवरी खत्म हो चुका था और मार्च भी आधा बीत चुका था। इसलिए दिन-रात की सर्दी तो खत्म हो गई थी लेकिन अभी सुबह और शाम की हल्की ठंड बाकी थी। इसी ठंड से पेड़ों और झाडिय़ों पर ओंस की नन्ही नन्ही बूंदें बेशकीमती मोती की तरह चमक रही थी।
नहर की पूर्वी दिशा में बस्ती और पश्चिम दिशा में खेत-खलिहान होने के कारण वहाँ चलने के लिए एक अच्छा और चौड़ा रास्ता बना हुआ था। रास्ते के दोनों ओर आम, नीम, शीशम और जामुन के छायादार पेड़, खड़े थे और उनके आस-पास काँटेदार झाडिय़ाँ। दूसरे तरफ जंगल और खेत थे इसलिए उस तरफ खेतों में काम करने वाले किसान और घास लेने जाने वाली औरतों के अलावा शायद ही कोई चलता हो। इसीलिए सुबह नमाज़ के बाद बहुत से लोग नहर पर टहलने चले आते। इनमें अधिकतर टहलने की बजाय फारिग होने आते, जिनमें औरतों और बूढ़ों की तादाद ज्यादा होती।
सकीला नहर पर पहुँची तो उसे थोड़ी सर्दी के साथ सुबह की ठंडी हवा ने आगोश में दबोच लिया। ताजी ठंडी हवा को अपने फेफड़ों में भरते हुए वह खुद में खोई हुई चली जा रही थी। फिर अचानक  उसने पलटकर अपने आगे-पीछे देखा तो उसे सिवा अपने वहाँ कोई नज़र नही आया। उसने सोचा कि शायद आज बाकी औरतें या तो उससे पहले घूम कर जा चुकी है या उनमें से अभी तक कोई आई नहीं हैं।
वह इसी सोच में गुम थी कि उसने अपने सामने की झाडिय़ों में कुछ चलता हुआ देखा। पहले तो वह बिल्कुल खामोशी के साथ एकटक उस ओर देखती रही। फिर जब हलचल का दायरा बढ़ता हुआ अपनी सीमा को लांघकर उसकी तरफ आने लगा तो वह डर गई। वह झाडिय़ों को गौर से देखते हुए, अपनी जगह से चार-पाँच कदम पीछे हट गई।
तभी झाडिय़ों में से एक काले-सफेद रंग का चित्तीदार कुत्ता, जो अपने मुँह में एक सफेद कपड़ा दबाए था, निकला और उसके सामने आकर खड़ा हो गया।
अपने सामने इस तरह कुत्ते को देखकर पहले तो वह डर के कारण अपनी जगह से हिली नहीं, फिर जल्दी से झुकी और अपने पैर की चप्पल निकालकर कुत्ते को मारने को लपकी। जैसे ही उसने कुत्ते को चप्पल हाथ में लेकर दुत्कारा, कुत्ता अपने ऊपर होने वाले हमले को भाँप गया और कपड़े को वहीं छोड़ दुम दबाकर भाग गया।
कुत्ते के जाने के बाद उसने अपनी जीत की खुशी में एक लम्बी सांस ली और हाथ की चप्पल को नीचे डाल, अपने दोनों हाथों को आपस में छाड़ते हुए उसे पैर में पहनने लगी।
चप्पल को अच्छी तरह से पहन और अपनी चादर को ठीक कर सकीला जब आगे की ओर चलने लगी तो उसकी निगाहें बरबस ही उस कपड़े की ओर चली गई जिसे कुत्ता वहाँ छोड़ कर भागा था। उसने देखा कि कपड़ा अपने-आप ही हिल रहा था। वह कपड़े के पास गई तो, कपड़े से बाहर निकली छोटी-छोटी अँगुलियों को देखकर अवाक रह गई।
सकीला ने जल्दी से कपड़ा को उठाकर देखा तो उसमें एक नवजात शिशु लिपटा हुआ था।
कपड़े में बच्चें को लिपटा देख सकीला ने लगभग चीखते हुए अपने से ही कहा, 'हाय अल्लाह, बच्चा! और वो भी नवजात। फिर छोड़ गई होगी कोई कल-मुँही। अल्लाह! इन नासगइयों से जब खसमों के बिना रहा नहीं जाता है तो माँ-बाप से कहकर शादी क्यों नही करा लेती हैं। क्यों इस तरह इन मासूमों की ज़िदंगी बर्बाद करती हैं।
अपनी बात खत्म कर सकीला ने बच्चें को ठीक से कपड़े में लपेटा कि कहीं उसे ठंड न लग जाए, ओर अपने आप-पास देखा कि कहीं कोई आ तो नहीं रहा है।
मौहल्ला कस्बे के बिल्कुल आखिर में पश्चिमी दिशा में बसा हुआ था। उसके एक तरफ दिल्ली रोड था जो उसे कस्बे से जोड़ता था तो दूसरी यमुना नहर थी जो कस्बे की सीमा निर्धारित करने का काम करती थी। इसके बाद कोई बस्ती नहीं थी। था तो सिर्फ जंगल और खेत-खलिहान। कस्बे का एकमात्र सरकारी अस्पताल भी दिल्ली रोड़ पर ही था। इसी से लगते कई ओर प्राइवेट अस्पताल भी बन गए थे। इसलिए यहाँ इस तरह के बच्चे मिलना कोई नई बात नहीं थी। इससे पहले भी यहाँ ऐसे कई फेंक दिए गए लावारिस बच्चें मिल चुके थे।
बच्चा, जिसके नन्हें-नन्हें हाथ, पैर और चेहरा ठंडी हवा लगने से लाल हो गए थे, कहीं मरा हुआ तो नहीं है यह देखने के लिए सकीला ने उसके सीने पर हाथ रखा तो उसकी धड़कनें चल रही थी।
उसने एक बार फिर आने जाने वालों को देखा और जल्दी से उसे अपनी चादर में इस तरह छुपाया कि वह किसी को दिखे नहीं। चादर को अच्छी तरह अपने ऊपर लपेट वह घर की ओर चल दी।
सकीला ने घर आकर सबसे पहले बच्चे को उस गंदे कपड़े में से निकालकर जिसमें वह लिपटा था, साफ कपड़े में लपेटा और फिर उसे रात का रखा दूध निवाया कर (हल्का गर्म) रूई के फाए से पिलाकर सुला दिया।
बच्चे को सुलाकर वह इस तरह बेफिक्री से घर के रोज़मर्रा के काम को करने लगी जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
सकीला पचास-पचपन साल की एक बूढ़ी महिला थी। उसके शौहर का इंतकाल हो चुका था और दोनों बेटियों की शादी हो चुकी थी। बेटे नाम की उसके पास कोई शै नहीं थी इसलिए वह अब अकेले ही रहती थी। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए उसने कुछ बकरियाँ पाल रखी थी जो उसके लिए करने को कोई-न-कोई काम बढ़ाती रहती। इससे उसे भी अपने अकेलेपन से कुछ राहत मिलती, और जो समय बचता उसे अपने नमाज़ रोज़े में लगाती।
आंगन में झाडू लगाने के बाद उसने बकरियों को छप्पर में से निकालकर बाहर बाँध दिया और उन्हें रात का रखा घास डाला दिया। फिर वह चूल्हें पर अपने लिए चाय बनाने लगी।
जब वह चाय पी रही थी तभी उसे बच्चा के रोने की आवाज़ सुनाई दी। चाय का प्याला रख वह अंदर चली गई और बच्चों को गोद में उठा लिया। लेकिन वह लगातार रोए जा रहा था, किसी तरह भी चुप नहीं हो रहा था। उसी वक्त बाहर गली से गुजर रही आपा सलीमन, जो इसी साल हज करके आई थी और जिनकी उम्र और दीनदार होने की वज़ह से पूरी बस्ती इज़्जत करती थी, बच्चे के रोने की आवाज़ सुनकर रुक गई। उसने सोचा, सकीला तो अकेली रहती है फिर उसके यहाँ यह बच्चे कि आवाज़ कैसी? लगता है उसकी बेटियाँ आई हुई। चलो उनसे ही मिलती चलूँ। कितने दिन हो गए उनसे मिले भी।
यह सोच कर आपा सलीमन ने सकीला के घर का दरवाज़ा खोला और उसे पुकारती हुई अंदर चली गई।
आपा सलीमन की आवाज़ सुनकर सकीला गोद में बच्चे को लिए, उसे चुप कराती हुई बाहर आई और 'आइये आपा जी’, कहते हुए एक प्लास्टिक की कुर्सी बैठने के लिए उनकी तरफ बढ़ा दी।
आपा सलीमन ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा, 'कैसी हो सकीला?’
'ठीक हूँ आपा जी। आप कैसी हैं?’ सकीला ने कहा।
'अल्लाह का शुक्र है। मैं भी ठीक हूँ। ये बच्चा किस का उठाए हो? बेटी आई हुई है क्या कोई सी?’ आपा सलीमन पूछा।
'वे कहाँ आपा? उन्हें अपने घर से फुर्सत मिले तब तो आएँ। वैसे भी वे अपने बाल-बच्चों में खुश रहे, हमें कौन-सा उनसे यहाँ हल चलवाना है’, सकीला ने जवाब दिया।
'हाँ ये बात तो है। ससुराल में बेटियाँ खुश रहे माँ-बाप के लिए इससे ज्यादा खुशी की कोई बात नहीं। पर जब कोई बेटी नहीं आई तो फिर ये बच्चा किसका है?’
'बच्चा! ये तो मुझे नहर पर मिला।
'क्या?’ आपा सलीमन ने चौंकते हुए कहा, 'वहाँ फिर से बच्चा मिला?’
'हाँ’, कहकर सकीला ने आपा के चेहरे की ओर देखा और उन्हें पूरी बात बताने लगी, 'सुबह नमाज़ पढ़कर जब मैं नहर पर घुमने गई तो पता नहीं कहा से एक कुत्ता अपने मुँह में गंदा कपड़ा दबाए पास की झाडिय़ों में छुपा बैठा था। जब मैंने उसे धमकाकर भगाया तो वह उसे वहीं छोड़ कर भाग गया। मुझे थोड़ेई पता था कि उसमें बच्चा है, वो तो मुझ बाद में पता चला जब मैंने उसे उठाकर देखा।
'और तू उसे घर ले लाई’, आपा सलीमन ने तंज करते हुए कहा।
'और क्या करती?’
'क्या करती?’, आपा सलीमन ने डाँटने वाले अंदाज़ में कहा, 'क्या तुझे पता नहीं कि मोलाना ने ऐसे लावारिस बच्चों को उठाकर घर लाने से मना किया है। क्या पता किनकी नाज़ायज औलाद होते हैं। इन्हें घर लाकर कौन अपना ईमान खराब करेगा।
'क्या, मुझे तो इस बारे में कुछ नहीं पता’, मौलाना की बात पर सकीला ने अपनी अनभिज्ञता ज़ाहिर की।
'तेरा ध्यान दीन (धर्म) की तरफ हो तभी तो पता चले। पता नहीं सारा दिन घर में क्या करती रहती है। ना इज्तमें (औरतों की दीनी मजलिस) में आती है न ही दीन की बात सुनती है’, आपा सलीमन उसे नसीहत करते हुए अपनी बात खत्म की।
ठीक ही कह रही थी आपा सलीमन भी। बीते दिनों जब इस तरह से फेंके गए एक के बाद एक कई लावारिस बच्चें मिले तो, मोलाना ने इनके संभावित माँ-बाप के धर्म को आधार बनाकर एक रोज़ जुमा के दिन यह ऐलान कर ही दिया कि कोई भी मुसलमान भाई-बहन जिसे इस तरह के बच्चें मिले तो वह उसे उठाकर कतई अपने घर न लाएँ। वह या तो इसके बारे में पुलिस में इत्तिला करे या उसे वहीं पड़ा रहने दे। क्योंकि पता नहीं ये किन काफिरों और बुतपरस्तों की नाज़ायज़ औलादें होती हैं।
मोलाना कि बात पर जब कुछ लोगों ने यह कहते हुए आपत्ति दर्ज कराई कि इसमें उन बच्चों का क्या कसुर है? तो मोलाना ने कुरान की वह आयात सुनाकर, जिसमें लिखा है कि यहूदी और बुतपरस्त कभी भी मुसलमानों के दोस्त नहीं हो सकते, उनकी बोलती बंद कर। फिर उन्होंने पूरे एतमाद के साथ दावा करते हुआ कहा कि और हो न हो ये लावारिस बच्चे जिन्हें बेदर्दी के साथ फेंक दिया जाता है वह बिलाशक बुतपरस्तों की ही नाजायज़ औलाद हैं।
 'तो अब मैं क्या करूँ?’ सकीला ने सवाल करते हुए आपा सलीमन से पूछा।
'क्या करूँ?’ आपा सलीमन उसी की बात दोहराते हुए कहा, 'वहीं डाल कर आ जहाँ से लाई है।
 'नहर पे। और वो भी अकेले’, सकीला ने दु:खी होते हुए कहा।
'और क्या? वरना अपना ईमान खराब करने के लिए रख इसे अपने घर में। और जब लोगों को इसके बारे में पता चलेगा तो वह क्या-क्या कहेंगे? ओर मौलाना तो तुझे ईमान से ही खारिज़ करवा फतवा ही सुना देंगे।
'फतवा। नहीं, नही मैं इसके लिए अपने ईमान से खारिज़ नहीं हो सकती। मैं कतई इसे अपने घर में नहीं रखूंगी। मैं अभी इसे वहीं छोड़ आती हूँ जहाँ से इसे लाई थी’, लगभग एक ही साँस में अपनी बात कहते हुए, सकीला घर के अन्दर अपनी चादर लेने चली गई। जब चादर लेकर आई तो तब तक आपा सलीमन भी जा चुकी थी।
सकीला चादर ओढ़कर जब घर से बाहर निकली तो सूरज पूरे आसमान पर फैल चुका था। दोपहर हो गई थी। सूरज अपने पूरी ताकत के साथ चमक रहा था। जिससे चेहरे और गर्दन पर पसीने की बूँदें पैदा हो रही थी जो इस बात एहसास दिला रही थी कि अब गर्मी दूर नहीं है।
बच्चे को लेकर सकीला नहर पर वहीं जा पहुँची जहाँ वह उसे कुत्ते के मुँह में दबे कपड़े में लिपटा हुआ मिला था। बच्चे को खुद से अलग करते हुए उसके दिमाग में ख्याल आया, 'इसमें इस बच्चे का क्या कसूर है? इसे क्या पता की यह हिंदु है या मुसलमान। ओर क्या पता ये किसी मुस्लिम औरत का ही हो?’यह सोचते हुए उसने बच्चें के ऊपर लिपटे कपड़े को हटाया जिसमें वह आँखे मिंचे कुलमुला रहा था। सकीला ने उसके लाल चेहरे, छोटे-छोटे होठ, छोटी सी नाक और बंद छोटी-छोटी आखों को ध्यान से देखा। उसने उसके हाथ की नन्हीं नन्हीं उँगलियों को छुते हुए कहा, 'ओ! कितना प्यारा है। बिल्कुल पिद्दक-सा’, ओर उसे प्यार करते हुए उसके नाक से अपनी नाक मिला दी।
तभी उसे आपा सलीमन की बाते और मोलाना का बयान याद आया। उसने बच्चे को खुद से दूर करते हुए कहा, 'नहीं नहीं, मैं इसे प्यार नहीं कर सकती। और न ही इसे अपने पास रख सकती हूँ। मैं इसके लिए अपना ईमान नहीं छोड़ सकती।
उसने बच्चे को वहीं पास ही पड़े पत्थर के टुकड़े पर लिटा दिया और जल्दी से उसकी ओर से मुँह फेरकर घर की ओर चल दी।
सकीला घर की ओर जाने वाले रास्ते पर चल तो रही थी लेकिन उसका सारा ध्यान बच्चें पर ही था। वह सोच रही थी, 'कितना प्यार बच्चा था बिल्कुल नन्हा-सा। छोटे-छोटे हाथ, छोटी-छोटी आँखें, छोटी सी नाक’, हँसते हुए 'और बिल्कुल छोटी छोटी उँगुलियाँ। और वह उस नन्हीं-सी जान को वहाँ, जंगल में अकेला छोड़ आई। अगर उसकी माँ ने लोक लाज के डर से उसे वहाँ फेंक तो दिया इसमें उसकी क्या खता है? फिर ज़रूरी भी नहीं कि वह किसी हिंदू औरत का ही हो। हो सकता है कि किसी मुसलमान लड़की ने उसे यहाँ फेंक दिया हो। आजकल तो न जाने कितनी कँवारी लड़कियाँ अस्पतालों में आती ही इन्हीं कामों के लिए है। अब कौन बताए कि उनमें कौन हिंदु है और कौन मुसलमान। और फिर बच्चों का क्या धर्म होता है वे तो उसी धर्म के हो जाते है जिसमें वह पलते-बढ़ते है।
सकीला अपने मन में ये बाते सोचते हुए जा ही रही थी कि उसे अपने माथे और गर्दन पर गर्मी की वजह से पैदा हो गई पसीने की बूँदों को महसूस किया। उसने उन्हें साफ करने के लिए अपने चेहरे पर से हल्की सी चादर हटाई तो उसे अपने सामने से एक कुत्ता जाता हुआ दिखाई दिया। कुत्ते को देखकर वह चलते चलते रूक गई।
उसका ध्यान जो इस बीच कुछ पल के लिए बच्चें पर से हट गया था वह कुत्ते को देखते ही फिर उसी पर चला गया। वह सोचने लगी, 'अगर उसे फिर से कोई कुत्ता उठाकर ले गया तो..., तो क्या होगा? क्या करेगा वह उसका? उसे फिर से उठाकर कहीं ओर ले जायेगा या उसे खा लेगा.....ये बातें सोचते सोचते मानो सकीला के कदम बिल्कुल जम गए, वह जैसे आगे बढऩे का नाम ही नही ले रहे थे।
'नहीं नहीं, ऐसा नही हो सकता। उसे कोई नही ले जा सकता। वह मेरा बच्चा है। मैं इस तरह उसे अकेला नहीं छोड़ सकती’, यह कहते सकीला जल्दी से मुड़ी और दौडऩे के अंदाज़ में बाग की ओर चलना शुरू कर दिया।
सकीला नहर पर जब उसी स्थान पहुँच गई जहाँ वह बच्चें को छोड़ कर गई थी तो वह उसी तरह पत्थर पर लेटा हुआ मिला जैसा वह छोड़ गई थी। उसने दौड़कर बच्चें को अपनी बाँहों में उठा लिया और अपने सीने से लगाते हुए कहा, 'मेरे बच्चा, इसमें तेरा क्या कसूर है। अगर तेरी बेरहम माँ ने तुझे यहाँ फेंक दिया। पर तू फिक्र न कर, मैं तेरी माँ हूँ। मैं तुझे पालूँगी। चाहे इसके लिए मुझे ईमान से ही खारिज़ क्यों न होना पड़े’, और फिर उसे चूमते हुए कहा, 'मैं तुझे एक बेहतर इंसान बनाऊँगी। ऐसा इंसान जो लोगों से नफरत नही, मौहब्बत करे।'
संप्रति- रेख़ता (ए उर्दू पोएट्री साइट) में कार्यरत। मोबाईल- 7065710789, दिल्ली में निवास। कथादेश, नया ज्ञानोदय और ई-माटी पत्रिका में कहानियाँ प्रकाशित। 786shahadatkhan@gmail.com

प्रेरक

            मानवता का सबक
                    - निशांत मिश्रा
मैं दिलीप मेनेज़ेस को नहीं जानता। उनके फेसबुक प्रोफाइल से पता चलता है कि वे गोवा में आल्टो पोरवोरिम में रहते हैं और अपनी बाइक पर दूर-दराज़ में घूमना पसंद करते हैं। कुछ दिन पहले आंध्रप्रदेश की ऐसी ही एक यात्रा में वे एक वृद्ध पति-पत्नी
से मिले जो अपनी झोपड़ी के सामने चाय बेचकर जीवनयापन करते हैं। गरीब वृद्ध दंपत्ति का दयालुतापूर्ण व्यवहार उनके दिल को छू गया। उन्होंने अपने साथ घटी घटना को फेसबुक पर शेयर किया जो वायरल हो गई। इसे यहाँ प्रस्तुत करने तक बज़
$फीड तथा अनेक वेबसाइटों ने शेयर किया है। मानवता में हमारी आस्था को गहरा करनेवाले इस प्रसंग का मैं अनुवाद करके हिंदी ज़ेन पर सभी से शेयर कर रहा हूँ। मैं आशा करता हूँ कि दिलीप इसे अन्यथा नहीं लेंगे।

सुबह-सुबह अपनी बाइक पर नरसीपट्नम से लंबासिंघी जाते समय में एक गाँव में नाश्ते के लिए रुका। गाँव की सड़क के किनारे बनी एक झोपड़ी के बाहर लगी टेबल पर एक वृद्ध व्यक्ति चाय बना रहा था। मैंने उससे एक कप चाय के साथ कुछ खाने के लिए मांगा। वृद्ध ने मुझे चाय बनाकर दी और अपनी भाषा में कुछ कहा जो मैं समझ न सका। तब मैंने उसे इशारे से कुछ खाने के लिए मांगा। वृद्ध ने पास ही खड़ी अपनी पत्नी की ओर मुड़कर कुछ कहा। वृद्ध पत्नी मे मुझे बाहर पड़ी एक बेंच पर बैठने का इशारा किया और झोपड़ी के भीतर चली गई। कुछ ही समय में वह एक प्लेट में इडली और चटनी लेकर आई, जिसे मैंने चाय के साथ अच्छे से खाया।
खाने के बाद मैंने वृद्ध से पूछा कि मुझे उसे कितने रुपए देने थे और उसने कहा- 5 रुपए। मुझे पता था कि मैं भारत के एक बहुत पिछड़े भूभाग में था फिर भी वहाँ एक प्लेट इडली और चाय का मूल्य 5 रुपए नहीं हो सकता था। मैंने इशारे से उन्हें अपनी हैरत जताई जिसपर वृद्ध ने केवल चाय के कप की ओर इशारा किया। जब मैंने इडली की खाली प्लेट की ओर इशारा किया तो उसकी पत्नी ने कुछ कहा जो मैं फिर से नहीं समझ सका। शायद वे मुझसे सिर्फ चाय का ही पैसा ले रहे थे।
मैंने विरोधस्वरूप फिर से खाली प्लेट की ओर इशारा किया और वे दोनों मुस्कुराने लगे। मुझे उसी क्षण यह समझ में आया कि वे केवल चाय बेचते थे और मेरे कुछ खाने का मांगने पर उन्होंने अपने नाश्ते में से मुझे खाने के लिए दिया, अर्थात उस दिन मेरी वजह से उनका खाना कम पड़ गया।
मैं वहाँ चुपचाप खड़ा कुछ मिनटों के भीतर घटी बातों को अपने मष्तिष्क में उमड़ता-घुमड़ता देखता रहा। फिर मैंने अपने वालेट से कुछ रुपए निकलकर वृद्ध को देना चाहा जो उसने स्वीकार नहीं किए। बहुत अनुनय-विनय और ज़िद करने पर ही मैं उसे कुछ रूपए दे पाया।
लंबासिंघी के घाट से गुज़रते समय मेरे मन में बार-बार उन वृद्ध दंपत्ति और उनके दयालुतापूर्ण व्यवहार की स्मृति तैरती रही। मैंने यकीनन उस दिन जीवन का एक बहुत महत्त्वपूर्ण पाठ ग्रहण किया। स्वयं अभावग्रस्त होने पर भी दूसरों की इस सीमा तक सहायता करने का गुण विरलों में ही होता है।

(मेरी पोस्ट के सोशल मीडिया पर वायरल हो जाने के बाद कई लोगों में मुझसे इन वृद्ध दंपत्ति का पता पूछा ताकि वे भी उनसे मिल सकें।
उनका गूगल लोकेशन मैप यह है। https://goo.gl/maps/vkeNdXj3Ze52 यदि आप उनसे मिलें तो उन्हें बताएँ कि बड़ी सी सफेद मोटरसाइकल पर गोवा से आनेवाले लंबे कद के दाढ़ीवाले युवक ने उन्हें नमस्ते कहा है।) 
दिलीप मेनेज़ेस की वेबसाइट है- http://www.deelipmenezes.com/
 (हिंदी ज़ेन से)

दो लघुकथाएँ

1. लड़ाई
- ख़लील जिब्रान, अनुवाद: सुकेश साहनी

उस रात महल में दावत थी। तभी एक आदमी वहाँ आया और राजा के सम्मुख दण्डवत् हो गया। दावत में उपस्थित सभी लोग उसकी ओर देखने लगे- उसकी एक आँख फूटी हुई थी और रिक्त स्थान से खून बह रहा था।
राजा ने पूछा, 'यह सब कैसे हुआ?’
उसने उत्तर दिया, 'राजन मैं पेशेवर चोर हूँ। पिछली अँधेरी रात को मैं चोरी के इरादे से एक साहूकार की दुकान में गया था। खिड़की  पर चढ़कर भीतर कूदते समय मुझसे भूल हो गई और मैं जुलाहे की दुकान में कूद पड़ा और लूम से टकराकर मेरी आँख निकल गई। राजन मैं आपसे न्याय की अपेक्षा रखता हूँ।
यह सुनकर राजा ने जुलाहे को पकड़  मँगवाया और उसकी एक आँख निकाल देने का आदेश दिया।
'राजन!जुलाहे ने कहा, 'आपका फैसला उचित है। मेरी एक आँख निकाल ली जानी चाहिए। लेकिन अफसोस! मुझे अपने हाथ से बुने कपड़े को दोनों ओर से देखने के लिए दोनों आँखों की जरुरत होती है। हुजूर, मेरे पड़ोस में एक मोची है, उसकी दो आँखें हैं उसे अपने काम के लिए दोनों आँखों की जरूरत नहीं पड़ती है।
सुनकर राजा ने मोची को तलब किया और उसके आते ही उसकी एक आँख निकालवा दी।

2. हरेक में

एक बार मैंने धुंध को मुट्ठी में भर लिया।
जब मुट्ठी खोली तो देखा, धुंध एक कीड़े में तब्दील हो गई थी।
मैंने मुट्ठी को बंद कर फिर खोला, इस बार वहां एक चिडिय़ा थी।
मैंने फिर मुट्ठी को बंद किया और खोला, इस बार वहाँ उदास चेहरे से ऊपर ताकता आदमी खड़ा था।
मैंने यह क्रिया फिर दोहराई तो इस बार मुट्ठी में धुंध के सिवा कुछ नहीं थापर अब मैं बहुत मीठा गीत सुनने लगा था। इससे पहले मैं खुद को इस धरती पर रेंगने वाला निरीह प्राणी समझता था। उस दिन मुझे पता चला कि पूरी पृथ्वी और उस पर का जीवन मेरे भीतर ही धड़कता है।

आप जो सोच रहे हैं वह टाइप हो जाएगा!!

आप जो सोच रहे हैं वह टाइप हो जाएगा!! 
- सुबोध जोशी
विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों के जीवन की गुणवत्ता, सक्रियता और गरिमा बनाए रखने और बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक निरंतर प्रयास कर रहे हैं। किसी बीमारी, स्वाथ्य सम्बंधी समस्या, अंगभंग, विकलांगता आदि के कारण प्रभावित व्यक्ति सामान्य ढंग से वह कार्य नहीं कर पाते जो सामान्य व्यक्ति सहज ही कर लेते हैं। किंतु यदि कार्य के तरीके में ऐसे व्यक्तियों की स्थिति के अनुरूप परिवर्तन किए जाएं और उसके लिए विशिष्ट तकनीकी साधन उपलब्ध कराए जाएँ तो, अलग ढंग से ही सही, ये व्यक्ति भी वे कार्य कर सकते हैं। ऐसे विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों को उनकी विशेष आवश्यकता के अनुरूप साधन मिल जाएँ तो वे उसी कार्य को अलग ढंग से करने में सक्षम (भिन्न सक्षम) हो जाते हैं। परिणाम यह होता है कि वे भी सक्रिय और उपयोगी हो जाते हैं जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता और गरिमा बनी रहती या बढ़ती है।
छड़ी, बैसाखी, व्हीलचेयर, वॉकर, तिपहिया साइकिल, ऐनक, श्रवण यंत्र, ब्रेल उपकरण, कैलिपर आदि बहुत-सी चीज़ें हैं, जिन्हें हम अपने आसपास कई लोगों को इस्तेमाल करते हुए रोज़ ही देखते हैं। देखने में ये सारे उपकरण बहुत साधारण प्रतीत हो
ते हैं लेकिन जो व्यक्ति इन्हें इस्तेमाल करते हैं
, उनमें से प्रत्येक के लिए ये अत्यधिक महत्त्वपूर्ण सहायक उपकरण हैं। छड़ी जैसी अत्यंत साधारण चीज़ का महत्त्व समझने के लिए ज़रा यह समझने की कोशिश करें कि छड़ी के सहारे चलने वाले व्यक्ति की स्थिति छड़ी के बिना कैसी होगी? इसी तरह कृत्रिम अंग भी बेहद सहायक होते हैं।
आधुनिक विज्ञान विशेष आवश्यकताओं वाले व्यक्तियों के सामने आने वाली चुनौतियों पर पैनी निगाह रखे हुए है और निरंतर यह प्रयास कर रहा है कि हर एक चुनौती का हल खोजा जाए। कोशिश यह है कि मौजूदा उपकरणों को बेहतर बनाया जाए और नई तकनीकें भी खोजी जाएँ। विशेष आवश्यकता वाले व्यक्ति के लिए विज्ञान और तकनीकी किस तरह आश्चर्यजनक रूप से सहायक हो सकते हैं इसे समझने के लिए प्रख्यात वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग के बारे में इंटरनेट के माध्यम से जानना लाभप्रद होगा।
ऐसे ही वैज्ञानिक प्रयासों में से एक है पैरालिसिस ग्रस्त व्यक्तियों के लिए एक ऐसा टाइपिंग उपकरण जो व्यक्ति के दिमाग को पढ़कर वह सब टाइप कर देगा जो वे टाइप करना चाहते हैं लेकिन अपने हाथ से नहीं कर सकते। इसे माइंड-रीडिंग टाइपिंग टूल कह सकते हैं। यह उपकरण कैलिफोर्निया स्थित स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मेडिसिन ने विकसित किया है। प्रायोगिक तौर पर इसकी सहायता से तीन व्यक्तियों ने सिर्फ विचारों के माध्यम से कंप्यूटर पर टाइपिंग करने में सफलता हासिल की है। वे टाइपिंग का यह काम अपनी उंगलियों से नहीं कर पाते। इनमें से दो व्यक्तियों को मोटर न्यूरॉन डिसीज़ या एएलए है और एक को स्पाइनल कॉर्ड क्षति है जिसके कारण ये अपने हाथ-पैरों का इस्तेमाल करने में असमर्थ हैं और यह भी संभव है कि एएलए ग्रस्त व्यक्ति में भविष्य में बोलने की क्षमता भी ना रहे। अब तक विकसित किए गए उपकरणों में यह टाइपिंग के लिए सबसे तेज़ साबित हुआ है।
जिन व्यक्तियों की बोलने की क्षमता नहीं रहती वे अपने सर, गाल या आँख की हरकत से खास उपकरण की सहायता से कंप्यूटर के स्क्रीन पर अक्षर चुन सकते हैं, जैसा स्टीफन हॉकिंग के लिए इंतज़ाम किया गया है। किंतु दिमाग से सीधे मशीन को संकेत मिल जाएँ और कार्य हो जाए ऐसी इंटरफेस तकनीकें विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं जिसका परिणाम स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की इस टीम की सफलता के रूप में सामने आया है।
इस तकनीक में व्यक्ति के दिमाग के प्राइमरी मोटर कॉर्टेक्स एरिया में छोटा-सा सिलिकॉन पैच लगाया गया। दिमाग का यह हिस्सा शारीरिक हलचल का नियंत्रण करता है। इस सिलिकॉन पैच को तार द्वारा कंप्यूटर से जोड़ा गया। व्यक्ति के दिमाग में अपने शरीर के विभिन्न अंगों को चलाने के बारे में उठने वाले विचारों को कोड के रूप में यह प्रणाली सीधे कंप्यूटर में पहुँचा देती है और कंप्यूटर इसे डिकोड/पढ़ कर स्क्रीन पर कर्सर चलाने लगता है। स्क्रीन पर दिखने वाले की-बोर्ड की मनचाही की पर कर्सर ले जाकर अक्षर, अंक और चिन्ह आसानी से टाइप किए जा सकते हैं। यह सब सिर्फ विचार की सहायता से हो जाता है, व्यक्ति को खुद किसी भी प्रकार की शारीरिक क्रिया नहीं करनी पड़ती।
इस शोध की सफलता के बाद अब इस तकनीक में सुधार के प्रयास जारी हैं ताकि टाइपिंग की गति बढ़ाई जा सके। दिमाग से मिलने वाले विचार-संकेतों को कंप्यूटर जितनी तेज़ी से डिकोड कर सकेगा टाइपिंग भी उतनी ही तेज़ी से होगी। दिमाग के मोटर कॉर्टेक्स की कार्य प्रणाली को वैज्ञानिक जैसे-जैसे और अधिक समझने लगेंगे वैसे-वैसे कंप्यूटर पर विचार-संकेतों की डिकोडिंग की गति बढ़ाना संभव होता चला जाएगा।
यह प्रणाली उपयोग में भी आसान है। तीनों व्यक्तियों ने एक दिन में ही कर्सर को अच्छी तरह चलाकर कंप्यूटर पर शब्द टाइप करना सीख लिया। वे औसतन छह से आठ शब्द प्रति मिनट टाइप करने लगे जो कि पहले अपनायी गई इंटरफेस तकनीक से दो से चार गुना तेज़ है। शोधकर्ताओं का कहना है कि तकनीक में सुधार के साथ सामान्य व्यक्ति द्वारा हाथ से की जाने वाली टाइपिंग की गति की आधी गति से टाइपिंग इस तकनीक की सहायता से जल्दी ही संभव हो जाएगी।
इस तकनीक को अधिक तेज़, भरोसेमंद और पोर्टेबल बनाने की दिशा में प्रयास जारी हैं। इसे बेतार (वायरलेस) कनेक्टिविटी से सुसज्जित कर दिया जाए तो शायद और बेहतर होगा। अलग-अलग शोध केन्द्रों पर विकलांगों का जीवन सहज स्वाभाविक बनाने के लिए किए जा रहे वैज्ञानिक प्रयासों से भविष्य में अनेक प्रकार की नई तकनीकें विकसित होने की उम्मीद है। दिमाग से इलेक्ट्रोड को सीधे मांसपेशियों में जोड़कर बेकार हो चुकी भुजाओं को पुन: सक्रिय बनाने के प्रयास जारी हैं और सफलता की खबरें भी आ रही हैं।
बायोनिक भुजाएँ विकसित करने के शोध भी हो रहे हैं। चिकित्सा विज्ञान के साथ इंजीनियरिंग और टेक्नॉलॉजी क्षेत्र के विशेषज्ञों के साझा प्रयासों से यह सब संभव हो रहा है। (स्रोत फीचर्स)