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Jan 28, 2017

नशा पाप का मूल है, करता सदा विनाश

नशा पाप का मूल है
करता सदा विनाश  
  - डॉ.पूर्णिमा राय
आज सबसे बड़ी सामाजिक समस्या मुँह खोले खड़ी है- युवाओं का नशे के चंगुल में फँसना। श्री गुरु नानक देव जी ने लिखा है-
भाँग मछली सुरापान,जो -जो प्राणी खाए।
धर्म- कर्म सब किये ते,सभी रसातल जाए।।
नशे के सेवन से इंसान का यह अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है।देश के कर्णधार 90 प्रतिशत युवा आज सबसे ज्यादा नशे के शिकार हैं। देश की उन्नति में अपनी र्जा लगाने के स्थान पर वह अपनी अमूल्य शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य चोरी, लूट-पाट और हत्या जैसे जघन्य अपराधों में व सामाजिक कुरीतियों में नष्ट कर रहे है। जब से बाजार में गुटका पाउच का प्रचलन हुआ है, तबसे नशे की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। आज बच्चे से लेकर बुज़ुर्ग भी गुटका पाउच की चपेट में है।
घर -गृहस्थी सँभालने वाली नारी भी अब इससे दुष्कर्म से अछूती नहीं रही। यह अत्यंत दु:खद है कि नशा करने वाला हर व्यक्ति जानता है कि नशे की आदत उसके लिए नुकसानदेह है, बावजूद इसके इस प्रवृत्ति में लगातार बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
यह ठीक है कि जहाँ तकनीकी विकास हुआ है, वहीं नशे के सेवन में भी नये ढंग, उपाय अस्तित्व में आ हैं। एक समय था जब युवा वर्ग शराब और हेरोइन जैसे मादक पदार्थो का नशा ही करता था;  लेकिन अब वह कुछ दवाओं का इस्तेमाल नशे के रूप में करने लगा है। वह इन घटिया व सस्ती दवाओं को आसानी से प्राप्त कर लेता है ; क्योंकि धन पाना व सुविधाओं को हासिल करना आज हर व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य बन गया है। मादक पदार्थों का सेवन उसे विनाश के मार्ग की ओर ले जा रहा हैं। वह अपने स्वयं का, परिवार का, समाज का, देश व राष्ट्र को विनाश के गर्त में धकेल रहा है...
    नशा पाप का मूल है, करता सदा विनाश
   शून्य जीवन जी रहे, खेलें दिन-भर ताश।
विवेकहीनता से सरोबार युवा पथभ्रष्ट होकर दिशा की तलाश में भटकता है पर अफसोस सर्वत्र घृणा के उसे कुछ हासिल नहीं होता। व्यसनी युवा का यही ध्येय होता है कि वह उचित -अनुचित साधनों से अपने नशे की प्राप्ति के लि धन एकत्र करे। धन की बर्बादी के साथ साथ वह अपना स्वास्थ्य भी खो देता है।
     गुटका, बीड़ी, पान से, कौन हुआ आबाद?
     खाकर मुख छाले पड़े, सेहत हो बर्बाद।।
महात्मा बुद्ध ने कहा है- शराब से भयभीत रहना,क्योंकि यह पाप और अत्याचार की जननी है।
मनु ने मनुस्मृति में मदिरा को महापातक बताया है। कौरव व पाण्डव मद्य के कारण ही जुए के अभ्यस्त हु तथा राष्ट्रीय कर्तव्य को भूल ग
नशा बुद्धि का लोप कर देता है। यथा-
    बुद्धिं लुम्पति यद् द्रव्यं मदकारी तदुच्युते।
रक्त में जैसे जैसे शराब की मात्रा का स्तर बढ़ता जाता है वैसे- वैसे मादक द्रव्य का असर अधिक होता जाता है- मन की परिवर्तन तर्क शक्ति कम हो जाती है, निर्णय -क्षमता का हनन होना व नशे में प्रतिक्रिया करना, नियंत्रण के स्तर में  गिरावट आना, संतुलन बिगड़ जाना, विचारों के तालमेल और समन्वय में कठिनाई खड़ी होना, इधर- उधर झूमने लगना, संवेदना में कमी, अनिश्चित भावनाओं का विकास, सचेत ना रहना, र्ध चेतना , शून्य हो जाना तथा  फिर अन्त में  मृत्यु का ग्रास बन जाते हैं। मादक पदार्थो की अधिकता कैंसर जैसे रोगों को जन्म देती है। वह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की प्रतिक्रियाओं को धीमा कर देता है। नशे के दौरान मूर्च्छित होना संभावित है। एक व्यक्ति का रक्तचाप, नाड़ी, संचार और नर्वस सिस्टम के रूप में और श्वसन में कमी आ जाती है। बीमारी से लडऩे की क्षमता कमजोर पड़ जाती है तथा रक्त में पोषक पदार्थों की कमी हो जाती है।
निम्न पंक्तियाँ ऐसे मानव की दशा का चित्रण करती हैं-
     मुरझा मुखड़े दिखे, लगता कैंसर रोग।
     सूखी टहनी तन दिखे,दर-दर भटकें लोग।।
 इस बुराई के सबसे बड़े जिम्मेदार हम, आप, अभिभावक, पारिवारिक माहौल, सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था है। आज की चकाचौंध भरी जिंदगी में, आधुनिकता की दौड़ में लोग स्वार्थी हो गएउनकी सोच मैं तक सीमित हो गई है। एकल परिवार, टूटते रिश्ते, वैयक्तिक स्वार्थ जहाँ नशे की ओर अग्रसर करने वाले बीज हैं; वहीं मानवीय इच्छा, धन की भूख, सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था तथा मुँह खोलती दिन प्रतिदिन बढ़ रही समस्या- बेरोजगारी, हँगाई, जनसंख्या वृद्धि आदि नशे के बीज को पनपने व विकसित करने में अहम् योगदान दे रहे हैं।  
राज्य शासन द्वारा विगत छह जून को नशामुक्ति महारैली का आयोजन किया गया था, जिसमें प्रदेश के 18 जिले के 146 विकासखंड और उससे सम्बन्धित गाँवों के जनप्रतिनिधियों ने भाग लिया, वहीं शैक्षिक संस्थाएँ, महिला स्व-सहायता समूह और जनसामान्य ने बड़ी संख्या में सम्मिलित होकर इसे सफल बनाया था। शासन के सहयोग से स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा राजधानी रायपुर में संकल्प व्यसन मुक्ति केंद्र तथा माँ डिंडेश्वरी नशा मुक्ति केंद्र बिलासपुर के नज़दीक सिरगिट्टी में संचालित है जो नि:शुल्क लोगों का उपचार करते हैं। अब तो हरेक राज्य में  नशा मुक्ति केन्द्र सक्रिय भूमिका निभा रहें हैं। नशा निवारणी सभाएँ स्थापित की गई हैं। जो अपने स्तर पर लोगों में नशे के विरूद्ध चेतना पैदा करती हैं। गुजरात जैसे प्रान्त से प्रेरणा लेनी चाहि वह नशा मुक्ति में सबसे आगे है। कहते है मानव वही कार्य बार-बार करता है जो वर्जित हो,जो अनुचित हो। इसलि ऐसे विज्ञापनों पर पाबन्दी हो जो नशे को बढ़ावा देते हो। नशे की रोकथाम में कि जाने वाले प्रयासों को मीडिया, समाचारों, रेडियो पर बताया जाना चाहि; ताकि सकारात्मक झुकाव एवं नजरिया बन सके। यह ठीक है कि हर साल विश्व स्तर पर नशा मुक्ति दिवस 26जून को मनाया जाता है व नशे के दुष्प्रभाव से अवगत करवाकर जागृति पैदा की जाती है। जब तक आत्म-नियन्त्रण नहीं होता, जब तक युवा मन की शक्ति को एक सही दिशा नहीं मिलती तब तक सब प्रयत्न निष्फल हैं ।
अन्त में यही कहूँगी-
शा पाश  इससे बचें, खुशियाँ हों दिन-रैन।।
कलह-क्लेश सब ही मिटे, घर में हो सुख-चैन।
  सिर्फ़ एक ही कामना, नशा मुक्त संसार।
 पढ़े-लिखें  बच्चे सभी, मिट जाए अँधियार।।
सम्पर्क: ग्रीन ऐवनियू घुमान रोड, तहसील बाबा बकाला, मेहता चौंक 143114, अमृतसर- (पंजाब), 7087775713,Email-drpurnima01.dpr@gmail.com

बच्चे की मुस्कान, राष्ट्र की शान

   बच्चे की मुस्कान, राष्ट्र की शान
 - अंकुश्री
बच्चों के सर्वांगीण विकास में ही देश का सर्वांगीण विकास निहित है इस बात को बहुत पहले महसूस किया जा चुका है और इसके लि बाल विकास  सम्बन्धी अनेक कार्यक्रम भी घोषित कि हैं। बाल विकास की दिशा में प्रयोग तो बहुत हुए हैं, उन्हें कार्यान्वित कि जाने की आवश्यकता है।
हमारा समाज जितने सामाजार्थिक वर्गों में बँटा है, बालकों की समस्याओं को भी हम उतने ही वर्गों में बाँट सकते हैं. उसी के अनुरूप उन समस्याओं का निराकरण किया जा सकता है;  क्योंकि समाज के हर वर्ग की समस्याएँ भिन्न-भिन्न हैं। आर्थिक रूप से संपन्न बालकों के साथ जो समस्याएँ जुड़ी हैं, गरीब बालकों की समस्याएँ उनसे भिन्न हैं। मजदूर के बालक और किसान के बालक की सभी समस्याओं में समानता नहीं हो सकती। उसी तरह खानाबदो परिवार के बालकों और स्थिर निवासी परिवार के बालकों की समस्याएँ भी भिन्न-भिन्न हैं। आबादी से दूर वनों में रहने वाले बालकों और शहरों में रहने वाले बालकों, एकल परिवार के बालकों और संयुक्त परिवार के बालकों की समस्याएँ भी अलग-अलग प्रकार की हैं।
शहरों में पति-पत्नी दोनों के नौकरीशुदा होने के कारण उनके बच्चों को जिन परिस्थितियों में रहना पड़ता है,  हमेशा माँ की आँखों तले रहले वाले बालकों को उसका अनुभव नहीं हो सकता। माता-पिता और दादा-दादी अथवा नाना-नानी के प्यार के बीच बढ़ रहे बच्चों को बिना माँ-बाप के लावारिश बच्चों की स्थिति से जोड़ कर देखना सर्वथा अनुपयुक्त और अव्यावहारिक होगा।
ऊपर वर्णित समस्याओं में कुछ पारिवारिक हैं तो कुछ सामाजिक। इनमें सभी समस्याओं के बारे में सोचा अवश्य जा सकता है, मगर निराकरण नहीं किया जा सकता। सामाजिक या सरकारी व्यवस्था के तहत बाहर से दिखा देने वाली समस्याओं का ही निराकरण सम्भव है।
ऐसा पाया गया है कि बाल-समस्याओं पर बात करते समय मेज-वार्ता अधिक होती है। इससे समस्याएँ सही रूप सामने नहीं आ पातीं। बालकों की वास्तविक समस्याओं को जानने के लि सरजमीन पर जाना बहुत रूरी है; ताकि यह जाना जा सके कि बालक किस परिस्थिति में रह रहे हैं और उनकी वास्तविक समस्या क्या है। योजनाओं के निर्माण और उसके वास्तविक क्रियान्वयन के लिये यह अति आवश्यक है।
बालकों की जितनी समस्याएँ हैं, उनमें अधिकतर उनकी गरीबी और अशिक्षा से जुड़ी हुई हैं ; लेकिन यह गरीबी और अशिक्षा बालकों की निजी समस्या नहीं है। यह उनके परिवार और समाज से आ हुई समस्याएँ हैं। परिवार की बेरोजगारी और उससे उत्पन्न गरीबी का बालकों के स्वास्थ्य और विकास पर सीधा असर पड़ता है। गरीब परिवार के अशिक्षित और अस्वस्थ बालकों को लेमनचूस थमाने से चेहरे पर आ मुस्कान को कैमरे में कैद तो किया जा सकता है, मगर ऐसी मुस्कान उसके विकास में हरगिज कारगर नहीं हो सकती।
राष्ट्र की शान के रूप में परिभाषित कि जाने वाले बालकों के चेहरे पर मुस्कान को स्थायित्व देना आवश्यक है। इसके लि लेमनचूस, स्लेट-पेन्सिल और गँजी आदि बाँटने जैसे कायक्रमों का कोई लाभकारी प्रभाव नहीं आँका गया है। तभी तो आज़ादी से अब तक बाल विकास से जुड़े कार्यक्रमों की संख्या में जिस तरह लगातार वृद्धि हो रही है, उसी तरह बालकों की समस्याएँ भी बढ़ती जा रही हैं।
बालक समाज की कोई स्वतंत्र इकाई नहीं होता। वह परिवार का एक हिस्सा होता है। यदि किसी गरीब-लाचार बालक को रोटियाँ दे दी जाएँ, तो वह उन्हें अपने घर ले जाता है। अपने परिवार से मिले संस्कार के अनुसार वह उन रोटियों को अन्य सदस्यों के बीच बाँटकर खाना चाहता है। ऐसी स्थिति में बालकों की समस्याओं से जुड़े कार्यक्रमों को बालकों के परिवार से जोड़कर तय करना होगा, तभी बालकों तक वास्तविक रूप में कुछ पहुँचाया जा सकता है और उनके विकास की बात सोची जा सकती है।
हमारे देश की एक बहुत बड़ी समस्या धर्म और सम्प्रदाय रूपी सामाजिक बँटवारा है। चूँकि बालक भी समाज से जुड़े हैं, इसलि वे भी इस समस्या से ग्रस्त हैं। किंतु बालक किसी धर्म या सम्प्रदाय की इकाई नहीं होता, वह सिर्फ बालक होता है। परिस्थितिजन्य कारणों से वह किसी धर्म या सम्प्रदाय की इकाई बन गया होता है। इसका कारण हमारी पारिवारिक, सामाजिक, जातिगत और समुदायगत विशेषता है।
देश के अनेक क्षेत्रों में 18 वर्ष के पूर्व ही लड़कियों का विवाह कर दिया जाता है। इसके परिणामस्वरूप वे जल्दी ही माँ बन जाती हैं। कम उम्र में शादी का कारण मुख्यत: उस समाज और क्षेत्र की गरीबी और अशिक्षा है। ऐसी गरीब लड़कियों के माँ बनने से उनके बच्चे कमजोर होते हैं और उनकी मृत्यु-दर भी अधिक होती है। बड़ा होने पर ऐसे बच्चे चिड़चिड़े और अस्वस्थ रहने लगते हैं।
गरीबी में जन्में बालकों को होश होने पर जब भूख सताती है तो रोटी की तलाश में वे घर से बाहर निकल पड़ते हैं। चूँकि माता-पिता उनकी भूख मिटाने में सक्षम नहीं होते, इसलि उन बालकों पर उनका नियंत्रण भी नहीं रह पाता अथवा कम रहता है। बिना नियंत्रण या कम नियंत्रण के ऐसे बच्चे कुसंगत में पड़ जाते हैं और इसका परिणाम होता है कि वे भीख माँगते हैं, छोटा-बड़ा अपराध करते हैं या कुछ मजदूरी की तलाश कर लेते हैं। ये स्थितियाँ बाल-विकास के लि बाधक होती हैं और इससे बालकों तथा आगे चल कर देश का भविष्य प्रभावित होता है। देखरेख के अभाव में ऐसे बच्चे गलत संगत में पड़ जाते हैं और बड़ा होने पर समाज और देश में तरह-तरह की विसंगतियाँ फैलाते हैं। बच्चों का जन्म और समयानुसार उनका बड़ा हो जाना उनका विकास नहीं है। ऐसे विकास के कारण भी समाज अथवा देश में अपराध, उग्रवाद और आतंक फैला हुआ है।
देश की आधी आबादी गरीबी के कारण न्यूनतम कैलोरी और प्रोटीन ले पाने में सक्षम नहीं है। आबादी का दसवाँ हिस्सा कुपोषण के कारण किसी न किसी बीमारी से पीडि़त है। इसमें बालक भी शामिल हैं। बल्कि बालकों को ही कैलोरी, प्रोटीन और पोषण की अत्यधिक आवश्यकता है ; लेकिन पोषण की कमी बालकों के लिये बहुत बाधक और उनके विकास के लि घातक है।
बालकों के विकास में माँ का सबसे अधिक हाथ होता है. यदि माँ चाहे तो उसका बालक चरित्रवान बन सकता है। सवाल उठता है कि कोई माँ अपने बालक को चरित्रवान बनाना क्यों नहीं चाहेंगी ; लेकिन कुछ माताएँ हैं, जो अपने बालक को चरित्रवान बनाने में मदद नहीं कर पा रही हैं। ऐसी माताएँ अपने बालक द्वारा जायज-नाजायज ढंग के उपार्जन को भी चुपचाप स्वीकार कर लेती हैं। इसका कारण गरीबी और लालच दोनों है। ऐसी माँ सोचती है कि उनका बेटा कमा हो गया है। अपनी आवश्यकताओं को कम कर और सृजनात्मक बुद्धि देकर ऐसी माताएँ भी अपने बालकों को सही दिशा दे सकती हैं। इस दिशा में सात्विक मार्गदर्शन अधिक कारगर हो सकता है।
मनुष्य का पिताकहलाने वाले बालक भावी राष्ट्र की पीढ़ी हैं। आज जो बालक हैं, उन्हीं के हाथ में कल का देश होगा; इसलि बालकों में राष्ट्रीय भावना भरना किसी भी राष्ट्र का पहला कर्तव्य होना चाहि। यदि बालकों का सर्वांगीण विकास हो तो देश में अनेक समस्याएँ पैदा ही नहीं लें।
अपराध और भष्टाचार किसी भी राष्ट्र के लिये सर्वाधिक बाधक और घातक है। इन दोनों की स्थिति के अनुसार ही किसी राष्ट्र का विकास संभव है। सारी योजनाओं की सफलता उसके कार्यान्वयन पर निर्भर करती है। जब कार्यान्वयन में ही भ्रष्टाचार आ जा तो अपराधियों का वर्चस्व हो जाना अस्वाभाविक नहीं है। यहीं से सारी प्रगति बाधित हो जाती है।
विश्व बाल वर्ष-1979 में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने नारा दिया था- बच्चे की मुस्कान, राष्ट्र की शान।आज के बच्चे कल के भविष्य हैं। मगर इस भविष्य का वर्तमान बहुत बुरा है। अशिक्षा और बेरोजगारी के कारण बाल मजदूरों, बाल भिखारियों और बाल अपराधियों की संख्या में कमी नहीं आ पा रही है। कागजी आँकड़ेबाजी की बात दीगर है। मगर वास्तविकता देश के कोने-कोने में मुखर है।
बच्चे रोज बड़े हो रहे हैं। विश्व बाल वर्ष के समय जन्मे बच्चे जल्द ही दादा बन जाएँगे। मगर उस अवसर पर दिया गया नारा सिर्फ नारा ही रह गया है। बच्चों के चेहरे पर फैली लेमनचूसी मुस्कान से उनकी छवि की छाप को सुधार कर दिखाया भले जा सकता है, मगर इससे राष्ट्र की शान की बात नहीं सोची जा सकती।
सम्पर्क: सिदरौल, प्रेस कॉलोनी, पोस्ट बॉक्स 28, नामकुम, राँची- 834 010

जल रहा अलाव

जल रहा अलाव 
- शशि पाधा
(वर्जिनियायू एस )

जल रहा अलाव आज
लोग भी होंगे वहीं
मन की पीर-भटकनें
झोंकते होंगे वहीं।

कहीं कोई सुना रहा
विषाद की व्यथा कथा
कोई काँधे हाथ धर
निभा रहा चिर प्रथा

उलझनों की गाँठ सब
खोलते होंगे वहीं।

गगन में जो चाँद था,
कल रा घट जाएगा
कुछ दिनों की बात है
आएगा, मुस्काएगा

एक भी तारा दिखे तो
और भी होंगे वहीं।

दिवस भर की विषमता
ओढ़ कोई सोता नहीं
अश्रुओं का भार कोई
रात भर ढोता नहीं

पलक धीर हो बँधा
स्वप्न भी होंगे वही।

एक सेकंड देर से आया 2017

    एक सेकंड देर से आया 2017
                     - नवनीत कुमार गुप्ता
धरती की रफ़्तार से तालमेल बिठाए रखने के लिए दिल्ली स्थित सीएसआईआर की राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला में भारत की आणविक घड़ी को पल भर के लिए रुकना पड़ा। नए साल की शुरुआत से ठीक पहले यानी रात ग्यारह बजकर उनसठ मिनट उनसठ सेकंड पर लीप सेकंड जोडऩे के लिए आणविक घड़ी एक सेकंड के लिए रोक दी गई। धरती के घूर्णन से तालमेल बिठाने के लिए रविवार की सुबह पाँच बजकर उनतीस मिनट उनसठ सेकंड पर लीप सेकंड जोड़ा गया।
2017 में एक अतिरिक्त सेकंड जोडऩे का मकसद धरती के घूर्णन से तालमेल रखने के अलावा रात और दिन के आधिकारिक समय को भी सही बनाए रखना है। एक अतिरिक्त सेकंड का जुड़ाव एक दिलचस्प वैज्ञानिक अवधारणा है। दरअसल अपने अक्ष पर धरती का घूर्णन एक समान नहीं है। विभिन्न कारणों से कभी इसकी गति तेज़ हो जाती है, तो कभी धीमी। इन कारणों में भूकम्प और समुद्री लहरों पर चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव भी शामिल है। नतीजा यह निकलता है कि औसत सौर समय का आणविक समय या वैश्विक समय के साथ तालमेल लडख़ड़ा जाता है। लिहाज़ा जब औसत सौर समय और वैश्विक समय के बीच फर्क 0.9 सेकंड तक पहुँच जाता है तो आणविक घडिय़ों के ज़रिए वैश्विक समय में लीप सेकंड के नाम से एक अतिरिक्त सेकंड जोड़ दिया जाता है।
सटीक वक्त बताने के लिए लीप सेकंड पूरी दुनिया की घडिय़ों में जोड़ा जाता है। दुनिया भर के कंप्यूटरों में लीप सेकंड 1972 से जोड़े जा रहे हैं और इस बार 27वीं बार लीप सेकंड जोड़ा गया है। एक अतिरिक्त सेकंड के जुडऩे से हमारी रोज़मर्रा की किान्दगी पर तो फर्क नहीं पड़ता, लेकिन उपग्रह संचालन, अंतरिक्ष विज्ञान और संचार जैसे क्षेत्रों के लिए यह काफी महत्त्वपूर्ण है, जहाँ हर कार्रवाई में बिलकुल सटीक वक्त की ज़रूरत पड़ती है। भारतीय घडिय़ों में लीप सेकंड जोडऩे का काम सीएसआईआर की राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला ने किया, जहाँ विश्व की 300 आणविक घडिय़ों में से पाँच मौजूद हैं। आणविक घडिय़ाँ सबसे सटीक वक्त बताने का ज़रिया है, जिनका संचालन सीज़ियम या अमोनिया के परमाणु कंपन से होता है। इनकी सटीकता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इनसे 10 करोड़ साल में सिर्फ एक सेकंड की गलती होती है। (स्रोत फीचर्स)

मन का संदूक

          मन का संदूक 
                  - रश्मि प्रभा

अँधेरी कोठरी मिट्टी की
लकड़ी का संदूक
मुड़े-तुड़े पुराने कपड़ों में नेफ्थालिन की महक
खुलते ही
और क्या है? देखने की इच्छा बलवती होती है
...
ये चिट्ठी पापा की है
तब की
जब मैं पहली बार घर से गई थी
महाविद्यालय में पढ़ने
ये चिट्ठी- एक घरेलू इतिहास-सी
अम्मा की
...
क्या अंदाज था उस समय का
हम सकुशल है
आशा है वहाँ भी ईश्वर की कृपा से
सब कुशल होगा
समय कंधे पर हाथ रखकर पूछता है
सबकुछ अभी अभी यहीं था न?’
समय की हथेली थामकर
दबी रुलाई उसे सौंपती हूँ
समय कभी पापा
कभी अम्मा बनकर
सर सहलाता है ...
और क्या है ? फिर ढूँढने लगती हूँ
पुराना
बहुत पुराना एल्बम
फोटो पर धब्बे आ गए हैं
थोड़ी सलवटें
सीधा करती हूँ
आँचल से साफ़ करती हूँ
बच्चों से कहूँगी
स्कैन करके दे दें
...
भले ही कभी-कभी देखना होगा
पर देख तो लूँगी !
अंकू कहती है,
नाना के बारे में जब तुम बताती हो
तो वह छवि मुझे बहुत प्रभावित करती है
टुकड़ों में सुना है सब कुछ
मन करता है
एक शॉर्ट मूवी बनती
हूबहू वैसी- जैसे नाना थे ...
बीती और कहानियों के लिए
खोलती हूँ मन का संदूक
सोंधी सी खुशबू फैलती है
खिलखिलाते प्रश्न, जवाब मिलते हैं
न कोई दाग
न सलवटें
रख लेती हूँ सँजोके
थोड़ी सी सोंधी खुशबू डालके ...
आगे के लिए

559, ground floor, 4th block, 8th main road, koramanagala, banglore – 560034