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Sep 18, 2016

आपातकाल- जेल डायरी के अंश

चुनाव के समर में
राजनीतिक जीवन में उथल-पुथल
और पिताजी की बीमारी
-बृजलाल वर्मा (संपादन- डॉ. रत्ना वर्मा) सेंट्रल जेल रायपुर १६ जुलाई १९७५
१९५२ का चुनाव और मेरी जीत
कांग्रेस में अनिवार्य रूप से पहले खादी पहनना तथा सूत कातना जरूरी था। जब मैं कांग्रेस का पदाधिकारी बना, उससे पहले कुछ प्रमुख नेता ऐसे थे, जो खादी नहीं पहनते थे; पर फिर भी विभिन्न पदों पर बने रहे थे। मैंने इसका विरोध किया और चाहा कि कांग्रेस के विधान के अनुसार कार्य हो। ग्रामीण क्षेत्र के लोग तो इसका पालन करते थे, पर शहर के कुछ प्रमुख नेता इसका पालन नहीं करते थे। मैंने बलौदाबाजार क्षेत्र में इसका विरोध किया ,जो बहुतों को बुरा लगा। जनपद तथा लोक कल्याण बोर्ड के चुनावों में भी इसी कारण से मेरा विरोध होता रहा। अन्त में मुझे जनपद से इस्तीफा देना पड़ा और आचार्य कृपलाणी की नई पार्टी किसान मजदूर प्रजा पार्टी में १९५१ में शामिल हो गया। सन् १९५२ में मैंने विधानसभा का चुनाव लड़ा और अपनी इच्छा के विरुद्ध ऐसे व्यक्ति के खिलाफ लड़ा; जिन्हें मैं बचपन से जानता था, उनका बड़ा आदर करता था, उन्हीं के कारण बलौदाबाजार तहसील में कांग्रेस का अस्तित्व था। वे सन् १९३० से लगातार जेल गए, पूरे जिले व तहसील में जाने माने नेता थे। वे थे मेरे विरोधी वकील लक्ष्मी प्रसाद जी तिवारी। उन्होंने ही मुझे तहसील का अध्यक्ष बनाया था। वे हमारे पारिवारिक मित्र भी थे। पर मुझे पार्टी का आदेश खासतौर से ठा. प्यारेलाल सिंह की बात मानते हुए उनके विरुद्ध चुनाव लडऩा पड़ा। तब वे प्रांत में किसान मजदूर प्रजा पार्टी (के.एम.पी.पी.) के सर्वेसर्वा थे। उस चुनाव में मेरी लगभग १००० वोट से जीत हुई। तिवारी जी का बड़प्पन देखिए, वे चुनाव के बाद मेरे पास आए और मुझे आशीर्वाद दिया। उनके इस व्यवहार से पता चलता है कि चुनाव में हार -जीत को वे आपसी सम्बन्धों के आगे बहुत छोटा समझते थे।
इन चुनाव में मुझे सबसे ज्यादा जिनका सहयोग मिला वे मेरे साथी थे- हरिप्रेम बघेल, बद्रीप्रसाद बघेल, गुलाबराम धुरंधर, सरहूराम, पांडे, सुंद्रावन के हरिजन उम्मीदवार, चोखे लाल कश्यप, पं. बद्रीप्रसाद तिवारी, जरवे के अग्रवाल, लहौद का साहू समाज, मोतीलाल मिश्र व जगदीश प्रसाद मिश्र कसडोल आदि।
इस चुनाव में मुझे पलारी क्षेत्र से बहुत ही ज्यादा मदद मिली। इस क्षेत्र का कोई भी गाँव ऐसा नहीं था ,जहाँ किसान मजदूर प्रजा पार्टी के लिए काम करने वाला झोपड़ी छाप का कार्यकर्ता न हो, इतना ही नहीं वे सब अपने ही बूते पर दिन रात कार्य करते थेे। मुझसे इस क्षेत्र के किसी भी कार्यकर्ता ने कभी चुनावी खर्च के लिए पैसा नहीं मांगा। जिसके पास आने जाने का साधन नहीं था सिर्फ उसके लिए सायकल की व्यवस्था करनी पड़ी। इसी क्षेत्र ने ही मुझे १९५२ के चुनाव में जीत दिलाई।
यह क्षेत्र कोसमंदी कसडोल क्षेत्र कहलाता था तथा डबल मेम्बर क्षेत्र था। लेकिन कसडोल का दूसरा हिस्सा जो नदी के उस पार जंगल के हिस्से में आता है, से कांग्रेस की तुलना में मुझे १० प्र.श. मत ही मिल पाया, पलारी क्षेत्र में कांग्रेस के मुकाबले ८० प्र.श. मत मिला, लेकिन हमारा हरिजन उम्मीदवार हार गया।
मेरी जीत का कारण हमारे वे कार्यकर्ता थे जो, लगातार कई वर्षों से जगह- जगह सभाएं लेते आ रहे थे। इन सभाओं में डॉ. प्यारेलाल सिंह, डॉ. खूबचंद बघेल, ताम्रकरजी, डॉ. ज्वालाप्रसाद तथा डॉ. छेदीलाल आदि आते थे। एक समय तो बहुत बड़ा सम्मेलन बलौदा बाजार में हुआ वहाँ  सभी बड़े नेता तो पंहुचे ही साथ में डॉ. निरंजन सिंह और सिहौरा के काशी प्रसाद पांडे जो विधानसभा के सबसे पुराने सदस्य थे भी पहुंचे उन्होंने ही इस सम्मेलन की अध्यक्षता की। यह एक सफल आयोजन था जिसका प्रभाव न केवल बलौदा बाजार तहसील में पड़ा बल्कि रायपुर जिले में भी पड़ा। इस तरह की सक्रियता के कारण ही मैं अपने पहले चुनाव में एक बहुत कर्मठ नेता पं. लक्ष्मीप्रसाद तिवारी को मात दे सका।
अविभाजित मध्यप्रदेश में मंत्री पद की
शपथ दिलाते हुए राज्यपाल के. सी.  रेड्डी
इस चुनाव के बाद मैं राजनीति में काफी सक्रिय हो गया तथा पूरे जिले में डॉ. खूबचंद बघेल तथा ठा. प्यारेलाल के आदर्शों के अनुसार संगठन के कार्यों में लग गया। जिले में मैंने सबसे पहले अपने ही क्षेत्र पलारी में विकास योजना का ब्लाक बनवाया। जिले के इस पहले ब्लाक का उद्घाटन मैंने डां. बघेल सेकरवाया। कांग्रेस के कई नेता इससे नाराज हो गए  और इसकी रिपोर्ट पं. रविशंकर शुक्ला से की गई। दरअसल पंडितजी विधानसभा के दो चुनाव इसी पलारी बलौदा बाजार क्षेत्र से लड़ चुके थे- सन् १९३७ तथा सन् १९४५ का। दोनों चुनाव में हम लोगों ने उन्हें भरपूर सहयोग दिया था।
१९५७ में दूसरी जीत
 इस प्रकार जिले के इस पहले ब्लाक के जरिये तथा साथ में पार्टी के दूसरे सभी कार्यकर्ता की मदद से मैंने १९५७ में फिर प्रजा सोसलिस्ट पार्टी ( पी. एस. पी.) से चुनाव लड़ा इस चुनाव में मुझे ज्यादा सफलता मिली और मैं ८-९ हजार मतों से कांग्रेस से जीता। मेरा हरिजन उम्मीदवार इस बार भी ४०-५० मतों से हार गया इसका मुझे बड़ा रंज रहा और जो खुशी चुनाव के  जीत की थी वह सब जाती रही। हमने इस बार नहीं सोचा था कि हमारा हरिजन उम्मीदवार हार जाएगा इस बार भी यह डबल मेंबर क्षेत्र था।

...और १९६२ की हार
फिर तीसरा चुनाव १९६२ का आया। १९५७ तथा १९६२ के बीच मेरा कार्यक्षेत्र बढ़ जाने के कारण मैं विधानसभा व पार्टी कार्य में प्रांतीय स्तर पर ज्यादा समय देने लगा था, जिससे मेरा अधिकतर समय जिले और क्षेत्र के बाहर ही बीतता था। इसी  कारण आम जनता से मेरा सिम्पर्क कुछ कम हो गया था, परिणाम यह हुआ कि १९६२ के चुनाव में मैं १५० से २०० मतों से हार गया। दु:ख तो हुआ; पर मैंने अपनी गलती भी महसूस की। कार्यकर्तागण बहुत निराश हुए। बाद में मुझे पता चला कि इतने कम मतों से चुनाव हारने का क्या कारण था। दरअसल चुनाव के ८-१० दिन पहले हमारे ३ या ४ सबसे अच्छे कार्यकर्ताओं को कांग्रेस ने लालच देकर अपनी तरफ मिला लिया था।
इस चुनाव के ४ माह बाद मेरे प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार का देहान्त हो गया और १९६२ में ही उपचुनाव का फिर से मौका आ गया। लोग मुझे फिर से चुनाव के लिए कहने लगे । ठा. निरंजन सिंह और डॉ. खूबचंद बघेल ने बहुत जोर डाला कि चुनाव तो लडऩा ही पड़ेगा; क्योंकि सबको ऐसा अंदाज था कि पं. द्वारका प्रसाद मिश्र को इस चुनाव के लिए कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार मान लिया है। मैं चुनाव लडऩे के पक्ष में नहीं था; इसलिए नहीं कि पं. द्वारका प्रसाद मिश्र मेरे तिद्वंद्वी होंगे ;बल्कि इसलिए कि उस दौरान मेरे पिताजी (कलीराम) का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। पिताजी ने मेरे १९६२ के चुनाव की हार पर कुछ भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी। जब हार के बाद मैं उनसे मिला ,तो उन्होंने मुझसे कुछ अधिक ही प्रेम से बात की और काम भी बतलाया ,जिससे मेरा मन खराब न हो और मैं व्यस्त हो जाऊँ । 
पिता कलीराम 

पिताजी के निधन से मैं अकेला हो गया
जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ मेरे लिए १९६२ बहुत ही खराब साल था ;इसलिए नहीं कि चुनाव हार गया था, बल्कि इसलिए क्योंकि पिताजी बहुत अधिक कमजोर हो गए  थे। उनकी मुझे बड़ी चिंता रहती थी। वे इलाज के लिए अधिकतर बलौदा बाजार रहते थे बीच- बीच में पलारी भी आ जाया करते थे।
सन् १९६२ के चुनाव के बाद डॉ. खूबचंद बघेल बलौदाबाजार आए और मुझे फिर चुनाव में खड़ा होने के लिए कहने लगे कि ठा. निरंजन सिंह तथा सभी साथियों तथा उनकी भी इच्छा है कि मैं चुनाव लड़ूँ। उन्होंने कई बार इस बात का वादा किया हम सब इस चुनाव की पूरी जिम्मेदारी लेते हैं। इस चुनाव में डॉक्टर साहब भी एम.पी. का चुनाव हार गए  थे और विद्याचरण शुक्ल के खिलाफ उनकी चुनाव याचिका चल रही थी। उस केस को मैं भी देखता था। उन्हें मुझ पर विश्वास कुछ ज्यादा ही था, कोई भी पेशी ऐसी नहीं थी जिसमें वे मुझे न ले जाते हों। लेकिन पिताजी की हालत देखकर मैंने चुनाव लडऩे से मना कर दिया। डॉक्टर बघेल बड़े निराश हुए फिर भी उन्होंने मेरा पीछा नहीं छोड़ा, वे पिताजी के पास गए । पिताजी डॉक्टर साहब को बहुत मानते थे। गत ३० वर्षों का उन दोनों का सामाजिक तथा राजनैतिक कार्यों में साथ था, खासतौर से स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान वे हमेशा पं. रविशंकर शुक्ल जी के साथ पलारी आया करते थे। जब पिताजी की तबियत कुछ ठीक हुई तो डॉ. बघेल ने चुनाव की बात पुन: छेड़ दी। पिताजी ने कहा डॉक्टर साहब 'तुम दूनो झन त हार गे हवज् ( तुम दोनों तो हार गए हो) तब डॉक्टर साहब ने कहा कि चुनाव में उतार-चढ़ाव होता ही रहता है क्या हुआ हार गए  तो। तब पिताजी ने भी कहा 'ठीक कहते हो हार- जीत तो लगे रहता है, पर मैंने सुना है कि वकील (जब से मैंने वकालत शुरू की थी तब दूसरों के साथ बात करते समय पिताजी मुझे वकील ही कहकर बुलाते थे) से जिसने चुनाव जीता है, उसका निधन हो गया है। यह बात सुनकर डॉक्टर साहब को बात करने का अच्छा मौका मिल गया, कहने लगे कि मैं उन्हीं की खातिर तो आया हूँ, पर वकील (डॉ. बघेल भी मुझे वकील ही कहा करते थे) चुनाव में खड़े होने को राजी नहीं है। फिर पिताजी ने प्रश्न किया कि वकील चुनाव क्यों नहीं लडऩा चाहते? डॉक्टर साहब मेरे चुनाव न लडऩे की बात पिताजी को बताने में हिचक रहे थे, पर बार-बार पूछने पर बोले कि वे आपकी तबियत को लेकर चिंतित हैं और आपकी देखभाल करना चाहते। यह सुनकर पिताजी कुछ नाराज हो गए और बोले - बला त वकील ला बड़ा मोर अउ घर के फिकर वाला होगे, कहाँ हे (बुलाओ तो वकील को बड़ा मेरा और घर का फिक्र वाला बनता है) मैं बाहर खड़ा सुन रहा था, एक दो बार पुकारने के बाद मैं अंदर गया और मैंने अपनी बात फिर दोहरा दी कि मेरी चुनाव लडऩे की इच्छा नहीं है। १० साल से तो विधायक बनते आ रहा हूँ, अब और दूसरे काम करूँगा। पिताजी को मेरी बात ठीक नहीं लगी, उन्होंने मुझे लगभग हुक्म सा दिया- 'तोला का बात के फिकर हे मोर राहत, खरचा के बारे में सोचत होवे त में देहूँ  । मोर तबियत के बारे में सोचत होबे त ईश्वर सब ठीक करही, तोला इंहा रहेच के जरूरत नहीं है, आवत- जावत तो रहिबे करथस। खड़ा हो, नहीं झन का, डाक्टर के कहे ला मान ले, हम जानत हन डॉक्टर ला बहुत जिद्दी आदमी हावय, जोन काम में भिड़ जाथे वोला पूरा करके रहिथे, तैं फिकर झन कर चुनई में खड़े हो जा।ज् (तुम्हें किस बात की फिक्र है मेरे रहते, खर्च के बारे में सोच रहे हो ,तो वह मैं दूँगा। मेरी तबियत के बारे में सोच रहे हो तो ईश्वर सब ठीक करेंगे। तुम्हें यहाँ मेरे पास ही रहने की जरूरत नहीं। तुम आते- जाते तो रहते ही हो। चुनाव में खड़े हो जाओ मना मत करो, डॉ. को हम बहुत दिन से जानते हैं ।वह बहुत जिद्दी आदमी हैं, जिस काम में भिड़ जाते हैं उसे पूरा करके ही मानते हैं, तुम फिक्र मत करो खड़े हो जाओ)
उनकी बात सुनकर मेरी आँखों में आँसू आ गए  मैं बिना कुछ बोले कमरे से बाहर हो गया। मैं सोचने लगा कि पिताजी बिस्तर से उठ नहीं पाते और मुझसे ऐसी बात कर रहे हैं। आखिर उनके दिल में क्या था, क्या वे हार का बदला लेना चाहते थे? क्या उन्हें खराब लगा था कि मैं हार गया। उस दिन मैंने महसूस किया कि वे मुझे हमेशा ऊँचा उठाने की सोचा करते थे, उस हालत में भी मुझे जोश से कह रहे हैं कि क्यों पीछे हटते हो। यह सब सुनकर डॉक्टर साहब ने कहा मैं भोपाल पत्र लिख देता हूँ  कि तुम चुनाव में हमारे उम्मीदवार होगे। चाहे तुम्हारे खिलाफ पं. द्वारका प्रसाद मिश्र ही क्यों न खड़े हों। वह घड़ी मेरे लिए परीक्षा की घड़ी थी ।क्या करूँ क्या न करूँ । फिर भी मैं चुप रहा।
कार्यवाहक राष्ट्रपति बासप्पा दानप्पा जत्ती
 मंत्री पद की शपथ दिलाते हुए- १९७७

थोड़े दिनों के बाद पिताजी की तबियत और भी ज्यादा खराब हो गई। उन्होंने बलौदाबाजार से पलारी चलने के लिए कहा मैं उन्हें पलारी ले गया, फिर उनकी तबियत देखकर उन्हें रायपुर ले आया। रायपुर के बड़े अस्पताल के एक पेइंग वार्ड में उन्हें भर्ती कर दिया। वहाँ के एक्सपर्ट डॉक्टरों की सलाह से उन्हें दवाई देना शुरू किया गया पर ३ या ४ दिनों बाद उनकी तबियत ज्यादा खराब दिखने लगी, डॉक्टरों ने दवाई बदली पर कुछ भी असर होते नहीं दिखा। एक दिन मैं किसी काम से थोड़ी देर के लिए बाहर निकला था कि उन्होंने अपना सारा समान उठाया और रायपुर के पुराने घर में आ गए , मैं दंग रह गया कि यह क्या हो गया। उन्होंने मुझसे इतना ही कहा मैं अस्पताल में नहीं रहना चाहता, अच्छा नहीं लग रहा है यहाँ। कोई वैद्य बुलावो। तब मैंने वैद्य भी बुलाया लेकिन बीमारी में कोई सुधार के लक्षण नहीं थे। उन्होंने पलारी जाने की इच्छा जताई। मैं उन्हें पलारी ले आया। वहाँ भी दवाई चलती रही पर उनकी हालत खराब ही होती गई। मैं वह पूरी रात इधर से उधर आँगन में पागल -सा घूमता रहा। एकादशी की सुबह लगभग ८-९ बजे उनका प्राणांत हो गया। बाद में लोगों ने मुझे बताया कि एकादशी की सुबह कोसमंदी से मिलने आए कुछ बुजुर्गों ने जब उनकी तबियत के बारे में पूछा था ,तब उन्होंने कहा था कि मैं अब नहीं बचूँगा। मुझे वह सब कुछ मिल गया जो मुझे चाहिए, अपनी जिंदगी से मैं पूर्ण संतुष्ट  हूँ। मेरी इच्छा के अनुकूल पलारी के बालसमुंद के सिद्धेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार भी मेरे बेटे ने कर दिया है। मुझे अपनी दोनों बहुओं तथा बेटे पर पूरा विश्वास है कि वे मेरे घर की प्रतिष्ठा को और आगे बढ़ाएँगे। अब तो मेरे पोता- पोती भी हो गए  हैं । अब मुझे किसी भी बात की जरा भी चिंता नहीं।
आज जब यह सब लिख रहा हूँ, मुझे फिर उनकी कुछ बातें याद आ रहीं है। मैंने उनका उत्साह तथा प्रसन्नता जीवन में दो बार सबसे ज्यादा देखा था- जब मेरा पहला लड़का पैदा हुआ तब उन्होंने गाँव में भव्य- भागवत कथा का आयोजन किया था और खुले दिल से हजारों लोगों को निमंत्रण देकर बुलाया और उन्हें भोजन कराया। दूसरी बार उनकी खुशी तो देखते ही बनती थी, जब राजू (दूसरा बेटा) पलारी में पैदा हुआ। उस दिन बलीराम काका जी के घर शादी थी, पर तबियत खराब होने के कारण पिताजी पैदल आना- जाना नहीं करते थे। जबकि शादी वाले घर की दूरी बहुत कम थी, अत: वे मोटर- गाड़ी से आते- जाते थे। शादी वाले घर में जब उन्होंने पोता होने का समाचार सुना ,तो वे यह भी भूल गए कि वे तो मोटर गाड़ी से आते- जाते हैं। वे सीधे उठे और लम्बे- लम्बे डग भरते पैदल ही घर आ गए । मैं उनकी वह खुशी भूल नहीं पाता।
 पिताजी के स्वर्गवास के बाद मैं कुछ दिनों तक शून्य सा हो गया अपने को अनाथ महसूस करने लगा था। मित्रों ने मुझे दिलासा दी। पिताजी के श्राद्ध कार्यक्रम में बहुत लोग आए। उनका क्षेत्र में बड़ा प्रभाव था। उनके चाहने वालों की भारी संख्या थी। रायपुर, दुर्ग तथा बिलासपुर से लोग दूर- दूर से आये थे। जो नहीं आ पाए उनके ढेरों पत्र आए।
डॉ. बघेल और विद्याचरण शुक्ल की चुनावी लड़ाई
पिताजी के देहान्त के बाद मैं कुछ दिनों तक पलारी में ही रहा। फिर बलौदाबाजार चला गया वहीं ज्यादा समय बिताने लगा; क्योंकि बच्चे बलौदाबाजार में ही पढ़ते थे। इसी बीच डॉक्टर खूबचंद बघेल पिताजी के श्राद्ध कार्यक्रम होने के १ माह बाद बलौदाबाजार आए और मुझे सांत्वना देते हुए बोले- जो होना था सो तो हो गया अब ज्यादा उदास मत रहो, चुनाव की तैयारी करनी है चलो रायपुर। मेरी( बघेल जी की) चुनाव याचिका की पेशी भी है उसमें भी तुम्हें रहना है। इस तरह मैं डॉक्टर साहब के साथ रायपुर आ गया। डॉक्टर साहब ने बताया कि दुर्ग वाले ताम्रकर वकील जो मेरी चुनाव याचिका को लेकर जिम्मेदारी से लड़ रहे थे, उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली है और अब वे याचिका की पैरवी नहीं करेंगे। इस पर मैंने कहा कि किसी सीनियर वकील से बात कर लेते हैं। तब डॉक्टर साहब ने कहा मैं सभी बड़े वकीलों के पास जा चुका हूँ, सबने इंकार कर दिया है और फिर एक- दो दिनों में गवाही होनी है क्या करें? मैं सोचने लगा कि क्या किया जा सकता है। मैंने वकालत सन् ५७ से बंद कर दी है अत: मैंने कहा कि जी.एच. अग्रवाल वकील को कानून एवं दरखास्त आदि के लिए रख लेते हैं, बाकी गवाहों की जिरह मैं कर लूँगा। डॉक्टर साहब राजी हो गए  और अग्रवाल वकील के यहाँ बैठकें होने लगी कि गवाहों से कैसे-कैसे जिरह करना है। हमारी ओर से एक के बाद एक गवाही होने लगी। इस केस में तिवारी जी जज थे, वे मिलिटरी से आए थे तथा बहुत ज्यादा सख्त थे। केस के दौरान जब मैं विद्याचरण शुक्ल से जिरह कर रहा था, तब शुक्ल जी ने एक कागज पेश किया कि डॉक्टर साहब तो उनके पिताजी (पं. रविशंकर शुक्ल) के समय से अनाप-शनाप कुछ न कुछ इल्जाम लगाते रहते हैं। और इसके बाद उन्होंने एक पर्चा छपा हुआ पेश किया जिसमें मेरे, डॉक्टर साहब के तथा ठाकुर रामकृष्ण के दस्तखत थे। उसमें हम तीनों ने उस वक्त अर्थात सन् १९५७ के पहले जब शुक्ल जी मध्यप्रदेश के चीफ मिनिस्टर थे, 'तब चीफ मिनिस्टर जवाब देंज् कहकर उन पर उनके गलत कार्यों तथा गलत ढंग से पैसा कमाने आदि को लेकर १०-१५ इल्जाम लगाए थे। लेकिन जज ने उस पर्चे को पेश करने से इंकार कर दिया । इस पर मैंने कहा हम लोग मंजूर करते हैं कि यह पर्चा हम लोगों ने ही छपवाया है और बाँटा है, आप फाइल में रख लें। फिर भी जज ने कहा कि इस मौके पर हम इसे रखने का इजाजत नहीं दे सकते, तब मैंने उनसे प्रार्थना की, कि आप इस पेपर को फाइल में रख लें और आर्डरसीट में लिख दें कि इस पर विचार नहीं किया जाएगा। मेरी बात जज ने मान ली। लीफलेट रख लिया गया। मैंने क्रास क्यूश्चन में इस लीफलेट के बारे में पूछा पर जज ने उसे नामंजूर किया, तब मैंने कहा आप मेरा प्रश्न लिख लीजिए और उसे इंकार करते जाइये मुझे कोई एतराज नहीं है कि आप मेरे प्रश्न का जवाब देने के लिए इन्हें मजबूर करते है या नहीं। जज ने ऐसा ही किया। फैसले में जज ने हमारे विरूद्ध फैसला दिया। इस पर मैंने जज को धन्यवाद देते हुए कहा कि आप ने अच्छा किया मुझे खुशी है। यह सुनकर जज ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा- आपको हारकर भी खुशी है। मैंने कहा आपने हमारी सभी बातें मान ली हैं। सिर्फ कानून में हमारे खिलाफ फैसला है; इसलिए हम आगे जीत जाएँगे। और हाईकोर्ट में ऐसा ही हुआ हम जीत गए । इस तरह आगामी ६ साल तक विद्याचरण शुक्ल। चुनाव में नहीं खड़े हो सकते वाली हमारी अपील मंजूर हुई। इस बड़ी जीत पर हम सबने खुशी मनाई। पर विद्याचरण ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की वहाँ भी उसकी हार हुई। हाई कोर्ट का फैसला मान लिया गया पर इस हाईकोर्ट के फैसले में एक बात फिर विद्याचरण ने एक अलग से और दरखास्त लगाई कि उनके पिता पं. रविशंकर शुक्ल के ऊपर फैसले में जज ने लिखा है कि 'पं. रविशंकर शुक्ल लाखों रुपये तो भले ही न खाए हों ,पर हजारों जरूर खाए है।ज् उसे फैसले से अलग कर दें। आखिर इससे उनका क्या सम्बन्ध  है। पर उनकी वह दरखास्त भी नामंजूर हो गई। मैंने जिस लीफलेट का उल्लेख ऊपर किया है, जिसमें हम लोगों के दस्तखत थे, तथा जिसे जज से कहकर फाइल में रखवा दिया था, उसी पर यह ऊपर का रिमार्क हुआ। मुझे खुशी हुई की उन्हीं का पेश किया कागज, उन्हीं के खिलाफ गया। उस दिन मैंने जज से प्रार्थना करके उसे फाइल में रखवा लिया वही काम आया।
(आपातकाल १९७५-७६ के दौरान जेल में लिखे गए बृजलाल वर्मा की डायरी के अंश)

आपातकाल- जेल डायरी के अंश

आजादी के बाद
...तो कश्मीर का वह
हिस्सा भी हमारे पास होता
- बृजलाल वर्मा ( डॉ. रत्ना वर्मा )
सिवनी जेल १५-२-१९७६
सन् १९४५ से १९४७ तक स्वतंत्रता मिलने के दिनों में कांग्रेस नेताओं तथा अन्य पार्टियों, खास तौर से मुस्लिम लीग की नीति की गतिविधियों के बारे में मेरे कुछ विचार-
सन् १९४५ में सारे हिन्दुस्तान में आम चुनाव हुए जिसमें प्रदेश और दिल्ली के लिए भी विधानसभा तथा पार्लियामेन्ट दोनों के चुनाव एक साथ हुए। परंतु इस बार सन् १९३६ के चुनाव में जिस तरह से  कई राज्यों में कांग्रेस के मंत्रिमंडल बने थे तथा कई में मिश्रित मंत्रिमंडल या मुस्लिम लीग का मंत्रिमंडल बना था वैसा इस बार नहीं हुआ। दिल्ली व अन्य प्रान्तों में जो मंत्रिमंडल बना वह कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा अकाली दल को मिलाकर मिश्रित मं मंत्रिमंडल बना था। प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू थे, उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल, तथा फाइनेन्स मिनिस्टर थे मुस्लिम लीग के लियाकत अली खाँ।
 सन् १९२६-२७ का एक समय वह भी था जब कांग्रेस में दो दल हो गए  थे। अधिक्तर कांग्रेस प्रमुख तब चुनाव लड़कर संसद या विधानसभा में जाना पसंद नहीं करते थे, या यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वे सब चुनाव का बहिष्कार करने पर उतारू थे, परंतु पं. मोतीलाल नेहरू तथा सी.आर. दास आदि नेता चुनाव लडऩे के पक्ष में थे। वे वहाँ पर भी संसद के माध्यम से भी अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई उसकी सीमा के अंदर रहकर ही करना चाहते थे; परंतु सन् १९४५ के चुनाव या सन् १९४७ के चुनाव में यह बात नहीं थी। चुनाव लड़ा गया और कांग्रेस को सफलता मिली। मेरे कहने का तात्पर्य यही है कि सन् १९३७ से ३९ के दौर से जो कांग्रेसी सत्ता में जाकर  सत्ता का मजा ले चुके थे, वे किसी न किसी तरीके से अपने को हमेशा आगे रखते थे। इस तरह वे सत्ता में पहुँचने के ही इरादे से सारी राजनीति करते थे तथा कांग्रेस के अंदर- बाहर अपना प्रभुत्व बनाये रखने में उन्होंने बेईमानी करना शुरू कर दिया था।  इस तरह क्रांग्रेस के अंदर काफी गुटबाजी हो गई थी और गुटों के सहारे सारी राजनीति चलने लगी थी।  गाँधी जी का महत्त्व कांग्रेस में धीरे-धीरे कम होता जा रहा था। सत्ता के लिए तथा चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने गाँधीजी का उपयोग शुरू कर दिया था; लेकिन वे गाँधी जी के सिद्धांतों पर आस्था नहीं रखते थे, सिर्फ उनके व्यक्तित्त्व का ही उपयोग करना चाहते थे। जैसे १९४५ में ऑल इंडिया नेतागण ने गाँधीजी का उपयोग खुलकर किया और अपना मतलब साधा।  प्रान्तीय नेताओं ने तो सन् १९३७ से ही उनका उपयोग अपने निजी स्वार्थ तथा सत्ता में आने के लिए करना शुरू कर दिया था।
गाँधी एक युग पुरूष थे उनका निहित स्वार्थ कभी भी राजनीति में नहीं रहा, उनने जब भी और जहाँ भी जन- आंदोलन किया जनहित व राष्ट्र के सभी वर्गों को ध्यान में रखकर किया ;परंतु  कांग्रेस सिर्फ उनकी बात सुनता था और अपना मतलब साधता था, उनके विचारों पर अमल करने की उनकी नियत कभी भी नहीं रहती थी। इसी कारण से हम स्वतंत्रता के बाद उनकी रक्षा नहीं कर सके और एक वीर सेनानी की मौत अपने ही देश के आदमी द्वारा कर दी गई। उनकी मौत पर चर्चिल ने इंग्लैंड में कहा था- 'कि जितने वर्षों तक हमने गाँधी जी की रक्षा की, उतने दिनों तक भी भारतवासी अपने गाँधी की रक्षा नहीं कर सकेज्  स्वतंत्रता के पहले भी चर्चिल ने  पार्लियामेन्ट में कहा था कि भारतवासी अभी इस लायक नहीं है कि उन्हें आजादी दी जाए।
 १९४६-४७ में चर्चिल प्रधानमंत्री नहीं थे लड़ाई खत्म होने पर एटली  प्राइम मिनिस्टर बन गए  थे। उस समय भारतवर्ष में जैसी परिस्थितियाँ  थी ,उसके अनुसार उन्होंने सोचा कि भारत को  स्वतंत्रता  दे दी जानी चाहिए; क्योंकि सन् १९४२ में गाँधी  जी के 'भारत छोड़ोज् आंदोलन ने चारों ओर क्रांति पैदा कर दी थी तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस जिन्होंने सन् १९४० में ही भारत जापान से मिल कर, एक बहुत बड़ी हिंदुस्तानियों की सेना बनाकर बरमा देश पर लड़ाई छेड़ दी थी तथा उसे अपने हाथों में लेकर असाम के नजदीक के सभी इलाकों पर कब्जा कर लिया था। तब सेना में भी खलबली मच गई थी, असंतोष बढ़ गया था तथा इंग्लैंड की भी हालत द्वितीय लड़ाई में खराब हो गई थी। इस प्रकार भारत के अंदर कुछ हिस्सों पर नेताजी के आजाद हिन्द फौज का कब्जा हो गया था और उनकी शक्ति बढ़ती रही थी। ऐसी हालत में प्राइम मिनिस्टर एटली ने सोच लिया कि बिना लड़ाई के भारत को आजादी देने में ज्यादा भलाई है। यद्यपि उनका इरादा भारत को छिन्न-भिन्न करने का
था ;क्योंकि वे राजाओं तथा मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना से अपना सम्बन्ध  जोड़कर भारत को कई टुकड़ों में बाँट देना चाहते थे। जिसमें उन्हें कुछ तो सफलता मिली ,पर सरदार वल्लभ भाई पटेल के कारण पूरी सफलता नहीं मिल सकी।  राजाओं को सरदार पटेल की नीति के सामने झुकना पड़ा।  स्वतंत्रता के पहले गाँधी जी भी इस बात पर अड़े थे और कहते रहे कि 'भारत के टुकड़े करने के पहले मेरे शरीर के टुकड़े करने होंगे।' लेकिन गाँधी  जी की बात की किसी भी कांग्रेसी नेताओं, खासतौर से जवाहरलाल नेहरू ने जरा भी परवाह नहीं की। उन्हें तो किसी भी कीमत पर सत्ता चाहिए, चाहे देश के टुकड़े ही क्यों न हों जाएँ।  ऐसे खास मौके पर, जब वाइसराय लार्ड माउन्टबेटन के साथ गाँधी जी को पाकिस्तान हिन्दुस्तान के मामले पर बातचीत करनी थी बड़ी चालाकी से उनको (गाँधीजी को) पाकिस्तान में नोवाखाली की ओर भेज दिया गया । उनकी गैरहाजरी में कांग्रेस नेताओं ने जिन्ना के साथ मिलकर, हिन्दुस्तान के दो टुकड़े करने वाला, माउन्टबेटन का प्रस्ताव  मान लिया। सन् १९४६ का यह वह समय था जब देशभर में चारों ओर हिन्दू -मुसलमान घोर दुश्मन बनकर  एक दूसरे का गला काट रहे थे, एक दूसरे के घरों को लूट रहे थे, आगजनी कर रहे थे। नेहरू इस स्थिति को सम्हाल नहीं सके और माऊन्टबेटन से प्रार्थना करते रहे कि किसी प्रकार से इस परिस्थिति को सम्भालिए आपको हम पूर्ण अधिकार देते हैं। जिस अंग्रेज वाइसराय के शासन के विरुद्ध कांग्रेस ने स्वतंत्रता की लड़ाई छेड़ी थी तथा जिन अंग्रेज शासकों से लोग घृणा करते थे, गाँधी जी ने 'भारत छोड़ोज् का आंदोलन उन्हें ही भगाने के लिए छेड़ा था, आज  नेहरू उनकी ही खुशामद करते फिर रहे थे और पूरा अधिकार देकर भारत वर्ष की स्थिति को सँभालने की प्रार्थना कर रहे थे, जबकि वे खुद प्राइम मिनिस्टर थे ।
दूसरी ओर जिन्ना क्या कहते थे इसे भी इस संदर्भ में बता देना जरूरी है- उनकी कितनी हिम्मत थी और कितना साहस था- सीधी कार्यवाही की धमकी पाकिस्तान बनाने के सिलसिले में वे दे ही चुके थे, जिससे सारे मुसलमान एक होकर अपना कार्य कर रहे थे और पाकिस्तान बनाने के लिए जोर दे रहे थे । जिन्ना को जब वाइसराय पूछते थे तो वे कहते थे कि 'भारत के मुसलमान एक अलग कौम हैं, जिसकी अलग संस्कृति, अलग सभ्यता, अलग भाषा और साहित्य, अलग कला और स्थापत्य, अलग कानून, अलग आचार संहिता, अलग प्रथाएँ, अलग संवत (हिजरी) अलग इतिहास और परम्परा है, भारत कभी भी सही में एक राष्ट्र नहीं रहा है। नक्शे में सिर्फ वह वैसा  दिखाई देता है। दोनों में सिर्फ एक समानता है वह  है 'अंग्रेजों की गुलामीज्।  बाद में जब स्वतंत्रता मिल गई तो कहा- 'मिलकर लिए पाकिस्तान और लड़ के लेंगे हिन्दुस्तानज् इस प्रकार से नेहरू और जिन्ना के विचारों में अंतर था। जिन्ना ने पद पाने की जरा भी परवाह नहीं की वह निष्ठा से पाकिस्तान बनाने में लगा रहा, न केबिनेट में आया और न कभी अंग्रेजों से अपनी पाकिस्तान की व्यवस्था के लिए भीख माँगी या सलाह ली। पर भारत में नेहरू आजादी के बाद भी उन्हीं पर निर्भर रहे।
लेकिन सरदार पटेल (वल्लभ भाई) ने, राजाओं को भड़काने की जो चाल अंग्रेजों ने चली थी उसे पूरा होने नहीं दिया।  एक लौह पुरुष की भांति इसका दिलेरी से सामना किया और सभी राजाओं को अपनी तरफ मिला लिया, जो समझदारी से माना उसे समझदारी से मनवाया । जिसने समझदारी नहीं दिखाई, जैसे निजाम और जूनागढ़ के राजा उसे बल प्रयोग करके मनवा लिया। अगर कश्मीर भी पटेल के हाथ में होता, जिसे जवाहरलाल ने अपने पास रख लिया था ,तो वह भी आज हमारे लिए सिर दर्द नहीं रहता, जो हिस्सा पाकिस्तान ने लिया है वह भी आज अपने पास ही होता।
सिवनी जेल ता. १६-२-७६
हमने अपना राष्ट्रपिता को खो दिया
स्वतंत्रता के बाद ३० जनवरी को  हमने अपने राष्ट्रपिता को खो दिया। गाँधी रामराज्य के उपासक थे। वे भारतवर्ष की संस्कृति पर ज्यादा विश्वास रखते थे। वे ग्राम स्वराज्य, सत्ता के विकेन्द्रीकरण, ग्राम उद्योग, हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने  तथा शराबबंदी पर जोर देते थे। दूसरा सवाल था शासन का था। गाँधी जी दूसरे नंबर के कार्यकर्ताओं के हाथ में शासन की बागडोर देना चाहते थे तथा पहले नंबर के नेताओं का उन पर सिर्फ  नियंत्रण रहे, वे दिशा देने वाले रहें जिससे शासन सुचारु रूप से चले, भ्रष्टïचार न हो, ऐसा वे चाहते थे।
तीसरा महत्त्वपूर्ण सवाल था- जो कांग्रेस संस्था, स्वतंत्रता  संग्राम के लिए बनी थी, उसे वे स्वतंत्रता के बाद खत्म कर देना चाहते थे,  क्योंकि इस संस्था में सभी वर्ग, विचार तथा अलग-अलग सिद्धांतों के लोग थे, राष्ट्र की स्वतंत्रता में सब एक थे,  उनने 'लोक सेवक दलज् का सुझाव भी दिया। पर कांग्रेस की जो धाक जनता में थी, उसका प्रचार था, उसके कार्य करने वाले थे, वे इस ट्रेडमार्क को अपने  स्वार्थ के लिए  छोडऩा नहीं चाहते थे। और आज स्थिति यह है कि कांग्रेस आजादी के आंदोलन के इस ट्रेडमार्क का फायदा आज भी उठा रही है। पहले नेहरू ने यही किया अब उनकी बेटी इंदिरा गाँधी  कर रही हैं। दिल्ली की गद्दी को वे अपना पुस्तैनी व पारिवारिक पद बनाकर एक बादशाह के समान भारत पर राज्य करना चाहती हैं। आज आपातकालीन स्थिति कामय करके पूरा अधिकार अपने हाथों में लेकर तानाशाह बन गर्इं हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को भी निर्बल बना दिया है। लोग गुलामी की जिंदगी बिता रहे हैं। नागरिकों के मूलभूत अधिकारों को खत्म कर दिया गया है  एक पार्टी का शासन लागू कर तानाशाही राज कायम हो गया है।
इसी संदर्भ में मैं यह कहने में जरा भी संकोच नहीं करता कि जवाहरलाल जी के देहान्त के बाद १८ माह तक एक महान व्यक्ति श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को इस देश का प्रधानमंत्री बनाया गया था, जिनने हमें पाकिस्तान से मुक्ति दिलाई, देश को बचाया,  दुनिया के सामने एक शक्तिशाली देश के रूप में साबित किया, वे एक साजिश के शिकार हुए और उनकी मौत हो गई।  उसके बाद इंदिरा जी रूस के ही रास्ते पर चलते हुए उसी के सहयोग से अपना सारा काम कर रही हैं।  रूस में जिस तरह एक पार्टी का ही शासन रहता है, वैसा ही वे भारत में भी कर रही हैं।
अब देखें आगे वे क्या करती हैं। ईश्वर इस देश के जनता को सदबुद्धि दे। गुलाम भारत को हजारों लाखों लोगों ने अपना बलिदान देकर आजाद किया, उनकी त्याग, तपस्या, बलिदान आज कहीं बेकार न चला जाय। अत: जरूरी है कि हम अब भी चेत जाएं और अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए प्रजातंत्र को कायम रख सकें।
(आपातकाल १९७५-७६ के दौरान जेल में लिखे गए बृजलाल वर्मा की डायरी के अंश)

जीवन परिचय

                बृजलाल वर्मा

         पलारी गाँव से दिल्ली तक की यात्रा

पिता-  कलीराम वर्मा
जन्म- १६ मार्च १९१६, ग्राम पलारी जिला- बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़
मृत्यु- २० जुलाई १९८७
शिक्षा- प्राइमरी शिक्षा-  गृहग्राम- पलारी, जिला बलौदाबाजार (छ.ग.)
८वीं- पं. माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा संचालित सेवा सदन, हिरनखेड़ा, होशंगाबाद (म. प्र.)
मिडिल बोर्ड परीक्षा- गवरमेंट हाई स्कूल खंडवा (म. प्र.)
मेट्रिक-  पं. मदनमोहन मालवीय द्वारा संचालित सेंट्रल हिन्दू स्कूल बनारस (उ.प्र.),
(बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी)
इंटरमीडिएट- सिटी कॉलेज, जबलपुर (म. प्र.),
बी. ए., एल. एल बी.- मॉरिस कॉलेज, नागपुर, महाराष्ट्र (नागपुर विश्वविद्यालय)
सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन-
-१९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब वे मॉरिस कॉलेज, नागपुर में कानून की पढ़ाई कर रहे थे तब आंदोलन की गतिविधियों मे संलग्न रहने के कारण एक वर्ष परीक्षा से वंचित किया गया था।
-१९४४ से बलौदा बाजार में वकालत शुरू की। उन्होंने वकालत को पेशे के रूप में कभी नहीं अपनाया, इसे शोषण के विरूद्ध लड़ाई का माध्यम बनाया।
-इसी दौरान वे सहकारी आंदोलन से जुड़े और उन्होंने किसानों में जागृति लाने का बीड़ा उठाया। इस आंदोलन के नेतृत्व के दौरान वे जेल भी गए।
-पलारी को जिले का पहला विकास खंड ब्लाक बनाने का श्रेय।
-सुभाष सहकारी विपणन संस्था पलारी की स्थापना।
-किसान राइस मिल पलारी की स्थापना एवं मिल हेतु जमीन दान।
-अपनी पुश्तैनी सम्पत्ति- बालसमुंद जलाशय पलारी को किसानों के हित में राज्य शासन को सौंपा।
-सिद्धेश्वर मंदिर पलारी (८वीं शताब्दी) का जीर्णोद्धार एवं बालसमुंद जलाशय का घाट निर्माण।
-पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कहि देबे संदेश (१९६५) के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान, गृह ग्राम पलारी में फिल्मांकन।
विधानसभा, लोकसभा सदस्य-
-१९५२ से १९७२ तक विधानसभा सदस्य एवं केबिनेट मंत्री
-१९५२ आजादी के बाद प्रथम आम चुनाव में विधानसभा पलारी क्षेत्र से चुने गए।
-१९५७ दूसरे आम चुनाव में भी विधायक चुने गए।
-१९६२ तीसरे आम चुनाव में भी अपने क्षेत्र से जीत हासिल की।
-१९६७ से १९६८ - संविद शासन मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए नाम प्रस्तावित किया गया जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया। तब अविभाजित मध्यप्रदेश के आठ विभिन्न विभागों के केबिनेट मंत्री रहे - सिंचाई, विधि, योजना, विकास, कानून, जेल एवं अन्य विभाग।
-१९७४ से १९७७ तक प्रदेश अध्यक्ष, जनसंघ- मध्य प्रदेश
-१९७५ में आपातकाल के दौरान वे २२ माह तक राजनैतिक मीसाबंदी के रूप में रायपुर, सिवनी, जबलपुर तथा तिहाड़ जेल दिल्ली में रहे।
-१९७७ के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी से महासमुंद से संसद सदस्य चुने गए।
-१९७७ से १९७९ -  भारत सरकार में उद्योग एवं संचार विभाग के केन्द्रीय केबिनेट मंत्री रहे।

मेरे बाबूजी -असली छत्तीसगढिय़ा वही जो शोषण के विरुद्ध आवाज उठाए

मेरे बाबूजी
असली छत्तीसगढिय़ा 
वही जो शोषण के 
विरुद्ध आवाज उठाए 
-डॉ. रत्ना वर्मा
 धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के लिए सदा संघर्षरत रहे सपूतों में मेरे बाबूजी (बृजलाल वर्मा) का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वे डॉ. खूबचंद बघेल तथा ठा. प्यारेलाल सिंह से प्रभावित ऐसे नेता थे जिनके मन में अंचल के किसानों, श्रमिकों पर होने वाले शोषण के प्रति पीड़ा थी, उनके लिए उन्होंने सदैव संघर्ष किया, उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ के वासियों की पहचान के संदर्भ में उनके अपने मापदंड थे, उनका कहना था- 'यहाँ की मिट्टी से जिसे प्यार हो, यहाँ के रहने वालों के प्रति जिनके दिल में दुलार हो, यहाँ की अस्मिता विरोधी लोगों के खिलाफ जिनकी भावना में प्रबल प्रतिकार हो, फिर चाहे वह कितना भी सशक्त सत्ताधारी क्यों न हो, वह शोषण करने वालों के विरुद्ध आवाज उठाने वाला हो, तथा वह बिना किसी स्वार्थ के छत्तीसगढ़ के हित के लिए बात करता हो, उसके सामने चाहे उसका हिमायती हो चाहे आलोचक वह अपनी बात पर दृढ़ता से डटा रहे वही असली छत्तीसगढ़ी है।'
एक सम्पन्न कृषक परिवार से होने के बाद भी बाबूजी छल-कपट से दूर ग्रामीण प्रकृति के नेता थे। उन्हें छत्तीसगढ़ के कृषक पुत्र होने पर गर्व था, वे छत्तीसगढ़ी में बोलकर स्वाभिमान का अनुभव करते थे, उनके इन्हीं सरल प्रकृति का ही परिणाम था कि वे अपने क्षेत्र में जनता के प्रिय जननेता थे। उनकी इसी लोकप्रियता के चलते वे भारतीय जनसंघ, जनता पार्टी और लोक दल के प्रदेशाध्यक्ष बनाये गए  थे।
वे छात्र जीवन से ही आजादी के आंदोलन से जुड़ गए  थे। नागपुर में विधि की शिक्षा की दौरान भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें एक वर्ष, परीक्षा में बैठने नहीं दिया गया था। विधि की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने रायपुर और बलौदाबाजार में वकालत आरंभ की। उन्होंने इसे पेशे के रूप में कभी नहीं अपनाया, इसे शोषण के विरूद्ध लड़ाई का माध्यम बनाया, इसी दौरान वे सहकारी आंदोलन से जुड़े और उन्होंने किसानों में जागृति लाने का बीड़ा उठाया। इस आंदोलन के नेतृत्व के दौरान वे जेल भी गए ।
उनके राजनैतिक जीवन की शुरुवात कृषक मजदूर प्रजा पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने के साथ हुई। १९५२ में व वे पहली बार सोशलिस्ट पार्टी के बैनर तले विधायक चुने गए । बाद में वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गए , १९६५ में  कांग्रेस में शामिल जरूर हुए पर ज्यादा दिन यहाँ न रह सके। १९६७ में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र के विरुद्ध बगावती बिगुल बजाने वालों में वे सबसे आगे थे। ३६ विधायकों के साथ मिलकर उनके  नेतृत्व में मिश्र की सरकार गिरा दी गई थी; फिर संयुक्त विधायक दल की सरकार में बाबूजी का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया गया, जिसे उन्होंने उदारता से इंकार कर दिया और गोविंद नारायण सिंह को मुख्यमंत्री के पद पर आसीन किया गया, लेकिन संविद सरकार में मंत्री के रूप में उन्होंने सिंचाई, विधि योजना विकास, कानून और जेल जैसे आठ विभागों को कुशलतापूर्वक सँभालकर अपनी कर्मठता का परिचय दिया। १९७० में आप जनसंघ में आ गए , १९७४ में मध्यप्रदेश जनसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए, इस पद पर वे जनता पार्टी के उदय होने तक आसीन रहे। १९७५ में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में सहयोग के कारण २७ जून को वे 'मीसाज् के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिए गए। २२ माह की मीसा बंदी के दौरान वे रायपुर, सिवनी, जबलपुर तथा दिल्ली के जेलों में रखे गए ।
१९७७ के चुनाव में अविभाजित मध्यप्रदेश की महासमुंद संसदीय क्षेत्र में अपने प्रतिद्वंदी को हराकर उन्होंने बहुमत से विजयश्री हासिल की और भारत सरकार में उन्हें पहले उद्योग मंत्री फिर संचार मंत्री बनाया गया।
संचार मंत्री के रूप में उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जो कुछ भी किया वह एक सच्चा ग्रामीण हितैषी दृढ़ निश्चयी व्यक्ति ही कर सकता था। छोटे-छोटे गाँवों में पब्लिक कॉल ऑफिस खोलकर उनकी व्यवस्था गाँव के ही गैर सरकारी व्यक्ति को सौंपा जाना, उनकी कार्यशैली का अनुपम उदाहरण है। देश, प्रदेश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ में भी उन्होंने अनेक डाक एवं तार घर का निर्माण किया पहले डाक घर की जिम्मेदारी गाँव के किसी शिक्षक को सौंपी जाती थी, परंतु बाबूजी ने किसी ग्रामीण को ही इसकी जिम्मेदारी सौंपकर, रोजगार के नए आयाम खोले, जो उनकी स्वतंत्र व क्रांतिकारी सोच का परिणाम है।
स्वाधीनता के समर के एक समर्पित सेनानी के नाते उनके सामने आजादी के नये लक्ष्य, आदर्श और उद्देश्य थे, वही उनके बाद के सार्वजनिक जीवन की तलाश भी बने। बाबूजी को सत्ता और अधिकार के ऊंचे पद मिले, परंतु वह संतोष नहीं जो उनकी राजनीतिक सक्रियता का परम उद्देश्य था। राजनीति में आये गिराव ने उन्हें दुखित कर दिया था संभवत: इसीलिए उन्होंने अपने अंतिम दिनों में अपने को राजनीति से पूर्णत: विलग कर लिया था,  लेकिन समाज व किसानों के लिए कुछ कर पाने की उनकी तड़प तब भी कम नहीं हुई थी। वे अंतिम समय तक उनके लिए लड़ते रहे।
 छत्तीसगढ़ अंचल की शोचनीय स्थिति और यहाँ के लोगों की व्यथा को दूर करने के लिए वे सदैव प्रयासरत रहे, छत्तीसगढ़ के प्रति हो रही उपेक्षा के प्रति उनके मन में आक्रोश था। पृथक छत्तीसगढ़ के लिए भी उन्होंने जनता पार्टी में रहते हुए आवाज उठाना शुरू कर दिया था और अंत तक वे इसके लिए प्रयास करते रहे थे। उन्होंने पृथक छत्तीसगढ़ का सपना देखा था, और इसके लिए निरंतर संघर्षरत भी रहे। यह सपना उनके जीवन काल में तो पूरा न हो सका पर इस प्रयास में उनकी भागीदारी को छत्तीसगढ़ वासी भूला नहीं सकते।
वे चाहे सत्ता में रहे हों या विपक्ष में बैठे हों उन्होंने अपना ध्यये जनता की सच्ची सेवा ही रखा- छत्तीसगढ़ अंचल उनके अवदान को उनकी सेवा को कभी भुला नहीं सकता। वे छत्तीसगढ़ के सच्चे माटी पुत्र थे।