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Jun 14, 2016

सूखे पहाड़ पर फिर हरियाली छा गई

      सूखे पहाड़ पर फिर हरियाली छा गई
                               - बाबा मायाराम

जो काम सरकार और वन विभाग नहीं कर पाया वह लोगों ने कर दिखाया। उन्होंने पहाड़ पर उजड़ और सूख चुके जंगल को फिर हरा भरा कर लिया और वहाँ के सूख चुके जलस्रोतों को फिर सदानीरा बना लिया। यह गाँव अब पारिस्थितिकी वापसी का अनुपम उदाहरण बन गया है।
और यह है उत्तराखंड की हेंवलघाटी का जड़धार गाँव। सीढ़ीदार पहाड़ पर बसे लोगों का जीवन कठिन है। अगर पहाड़ी गाँव के आसपास पानी न हो तो जीवन ही असंभव है। और शायद इसी अहसास ने उन्हें अपने पहाड़ पर उजड़े जंगल को फिर से पुनर्जीवित करने को प्रेरित किया। यह ग्रामीणों की व्यक्तिगत पहल और सामूहिक प्रयास का नतीजा है। अब यह प्रेरणा का प्रतीक बन गया है।
हाल ही मुझे इस सुंदर जंगल को देखने का मौका मिला। जंगल और पहाड़ को नजदीक से देखने का आनंद ही अलग होता है। ये हमें आज के भागमभाग और तनावपूर्ण माहौल में सदा आकर्षित करते हैं। जहाँ एक तरफ देश के अन्य इलाके में जंगल कम हुए हैं, उत्तराखंड इसका अपवाद कहा जा सकता है।  
मैं पिछले दिनों चिपको आंदोलन से जुड़े रहे और इसी गाँव के निवासी विजय जड़धारी के साथ इस जंगल को देखने गया था। पारंपरिक खेती, जंगल, नदी और पर्यावरण पर उनकी जानकारी व ज्ञान विस्तृत है। उन्होंने अपने अनुभव व पारम्परिक ज्ञान के आधार पर कई किताबें लिखी हैं, जिनकी सराहना अकादमिक दुनिया में भी हुई है।
वे मुझे पेड़ों, वनस्पतियों, लताओं और फूलों के बारे में ऋषि-मुनियों की तरह बता रहे थे। मैं जंगल के सौंदर्य को अपनी आंखों में सदा बसा लेने का प्रयास कर रहा था।
जड़धारी बता रहे थे कि बांज का पेड़ न सिर्फ चारा, पत्ती व खाद का काम करता है बल्कि मिट्टी को बाँधने एवं जलस्रोतों की रक्षा का काम भी अन्य पेड़ों के मुकाबले ज्यादा करता है। इसका जंगल ही पानी का सदानीरा स्रो है। गर्मी के मौसम में भी इसका ठंडा जल रहता है।
वे एक पेड़ के पास जाकर रुगए, बोले-इन दिनों जंगल में इसी पेड़ में सफेद फूल खिले हैं, यह है पदम का पेड़। इसे देववृक्ष भी कहा जाता है। ठंड में ही इसके फूल खिलते हैं, सफेद फूलों के कारण इसे पहचानना मुश्किल नहीं है। इसी फूल के पराग से मधुमक्खी मधु संचय करती है। और हमें मधुमक्खी मंडराते हुए भी दिख गई। मेंहल पेड़ की लकड़ी से बैलों को जोतने के लिए जुआ बनता है, जो हल में लगता है। उसमें बैलों को गर्दन रखने में सुविधा होती है, क्योंकि वह बहुत हल्का होता है। इसका जंगली फल भी खाते हैं।
जंगल में जाने से पहले मैं सोच रहा था क्या जंगल को फिर से जीवित किया जा सकता है। इस शंका का कारण कुछ और नहीं वृक्षारोपण का पुराना अनुभव था। लेकिन जब मैंने यह जंगल देखा, गाँव के लोगों से बात की, चौकीदार से जंगल की पूरी कहानी सुनी तो मैं आश्वस्त हो गया कि अगर आपसी सहयोग और मिलकर काम किया जाए तो जंगलों को नया जीवनदान दिया जा सकता है।
80 के दशक में यह जंगल पूरी तरह उजड़ और सूख चुका था। ईंधन, पानी और लकड़ी की कमी हो गई थी; लेकिन टिहरी-गढ़वाल की चम्बा-मसूरी पटटी में पहले अच्छा और सुंदर जंगल था। इस गाँव में भी था।
पहाड़ के ढलानों से हरियाली की चादर हटने से बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बना रहता है। जलस्रोतों का प्रवाह अस्थिर हो जाता है। साथ ही लोगों की दैनंदिन जरूरत के लिए लकड़ी-चारे का अभाव हो जाता है।
 जब लोगों को इसका गहरा अहसास हुआ कि हमारा बांज-बुरास का जंगल उजड़ रहा है। और उसके कई सदाबहार जलस्त्रोत सूख गए हैं, तब वे चिंतित हो उठे, इकट्ठे बैठकर सोचने लगे और मिलकर कुछ करने के लिए खड़े हो गए और वनों के जतन में जुट गए।
जंगल बचाने के इस सार्थक और उपयोगी काम के पीछे चिपको आंदोलन की प्रेरणा रही है। अदवानी, सलेत के  जंगलों को लोगों ने बचाने में लोगों ने महती भूमिका निभाई थी। जब इन जंगलों की काटने के लिए जंगल ठेकेदारों के लोग आए तो लोगों ने पेड़ से चिपक कर अनूठा सत्याग्रह किया था। इस आंदोलन की देश-दुनिया में कीर्ति फैली थी। जड़धार गाँव में  में स्वयं चिपको के कार्यकर्ता रहे विजय जड़धारी का निवास है। जंगल को फिर से पुनर्जीवित करने में उनकी प्रमुख भूमिका है।
जड़धार गाँव के लोगों ने मिलकर तय किया कि जंगल को बचाया जाए। इसके लिए एक वन सुरक्षा समिति बनाई गई। जंगल से किसी भी तरह के हरे पेड़, ठूँ, यहाँ तक कि कटीली हरी -झाड़ियों को काटने पर रोक लगाई गई। कोई भी व्यक्ति यदि अवैध रूप से हरी टहनी या झाड़ी काटता है तो उसे दंडित किया जाएगा।
पशु चरने पर रोक लगाई गई। कोई व्यक्ति वनों को किसी प्रकार नुकसान न पहुँचाए, यह सुनिश्चित किया गया। अनुशासन और आपसी समझ से यह काम किया गया।  यह काम गाँव की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया जिसमें जरूरत पडऩे पर थोड़ा बहुत फेरबदल किया जा सके।
जंगल की रखवाली के लिए वन सुरक्षा समिति ने दो चौकीदार नियुक्त किए, जिन्हें गाँव वाले पैसे एकत्र करके कुछ आंशिक वेतन देने लगे। जो पैसा जुर्माने से एकत्र होता, उसे चौकीदारों को वेतन के रूप में दे दिया जाता। हालाँकि बहुत कम है, फिर भी वनसेवकों ने यह काम अपना समझकर किया है।
 यहाँ वृक्षारोपण व पेड़ लगाने का काम भी हुआ है लेकिन वनों को फिर से हरा-भरा करने में महती भूमिका वनों को विश्राम देने की है। उन्हें उसी हाल में छोड़ दिया जाए, जिसमें वह है।  सिर्फ उनकी रखवाली की जाए और उसे पनपने दिया जाए। बढऩे, पल्ववित-पुष्पित होने दिया जाए।
लोग जैसे अपने खेतों की देखभाल करते हैं उसी तरह जंगल की देखभाल करने लगे। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी। दो-तीन सालों में ही सूखे जंगलों में फिर से हरियाली लौटने लगी। बांज, बुराँ, काफल के पुराने ठूँठों पर फिर नई शाखाएँ फूटने लगीं। अंयार, बंमोर, किनगोड हिंसर, सेकना, धवला, सिंसाआरू, खाकसी आदि पेड़- पौधे दिखाई देने लगे। आज ये पेड़ लहलहा रहे हैं।  
पिछले तीन दशक से हरियाली लौटाने के इस प्रेरणादायी काम का नतीजा यह हुआ कि जंगल में चारों तरफ हरियाली आच्छादित हो गया। हजारों पेड़ जंगल में सौंदर्य की छटा बिखेर रहे हैं। पानी के स्रो फिर से जी उठे हैं। वे सदानीरा हो गए हैं। यहाँ के कुलेगाड, मूलपाणी, लुआरका पाणी, सांतीपुर पाणी,  नागुपाणी, खुलियो गउ पाणी, रांता पाणी और द्वारछुलापाणी हैं। ये सदाबहार जलस्रोतों से ही साल भर गाँवों को पीने का पानी मिलता है।
पहाड़ में आजीविका का प्रमुख आधार खेती और पशुपालन है;लेकिन उन्हें जंगल से कई गैर-खेती भोजन प्राप्त होता है। कई तरह के कंद-मूल, फल, फूल, पत्ते, मशरूम और शहद से उनकी भोजन की जरूरतें भी पूरी होती है। बच्चों के पोषण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण फल, फूल, शहद आदि मिलते हैं
गोविन्द बल्लभ पंत हिमालयी पर्यावरण व विकास संस्थान (श्रीनगर, गढ़वाल) के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में इसे पुनर्जीवित सर्वश्रेष्ठ जंगलों में एक बताया है। पुणे के पक्षी विषेषज्ञ डा. प्रकाश गोले ने यहाँ कुछ ही घंटों में पक्षियों की 95 प्रजातियों की गिनती की। जो जंगल बढ़ाने में सहायक हुए हैं। जड़धारी कहते हैं कि दूर-दूर से यह पक्षी बीज लाकर इस जंगल के अवैतनिक सेवक बन गए हैं।
इसके अलावा, कई वन्य प्राणियों ने भी इस जंगल को अपना आशियाना बना लिया है। भालू, तेंदुआ, हिरण, जंगली सुअर आदि यहाँ प्राय: दिखते हैं।
वन सुरक्षा समिति का चौकीदार हुकुमसिंह बताते हैं कि हमने आग लगने से भी जंगल को बचाया है। जहाँ कहीं भी धुआँ देखा,हाँ तुरंत पहुँच जाते और आग बुझाते। गाँव वालों की भी मदद लेते। आग बुझाने में गाँववासी बहुत मेहनत और साहस का परिचय देते हुए आग पर काबू पाते।
जलवायु बदलाव के इस दौर में जंगल को फिर से पुनर्जीवन प्रदान करने के इस काम का महत्त्व बढ़ जाता है। इस इलाके में पहले भी कुड़ी व पिपलेत गाँवों में किया जा चुका है। कुल मिलाकर, इस पूरे काम से यह निष्कर्ष निकलता है कि  गाँवों की आपसी समझ, एकता और मेहनत से उजड़ रहे वनों को नया जीवनदान मिल सकता है। यह जड़धार के गाँव के लोगों ने कर दिखाया है, जो सराहनीय होने के साथ-साथ अनुकरणीय है।
सम्पर्कः पचमढ़ी नाके के पास, राम नगर कॉलोनी, पिपरिया, होशंगाबाद- ४६१७७५, babamayaram@gmail.com

प्रकृति


        प्रकृति में ही बसे हैं परमात्मा
                                                          - ज्योत्स्ना प्रदीप
 हमारे चारों ओर जो विराट प्राकृतिक परिवेश व्याप्त है उसे ही हम पर्यावरण कहते हैं। सूरज के आगमन पर  सुनहरे परिधान में लिपटी भोर रूपसी, अनदेखी हवा की सजीव रखने की प्रत्यक्ष उदारता, वृक्षों का हरा- भरा यौवन, पर्वतों की कुंदन सी दमकती देह, कभी शुद्ध तो कभी कोमल व मीठे रागों को गाते पक्षी , नदियों तथा सागर की अल्हड़ लहरों की नटखट  ठखेलियाँ...
ये सभी तो प्राकृतिक परिवेश के सुन्दर आभरण  हैं, जो हमारे जीवन को जगमगाते हैं। हमारे प्राणों के तार की  चमक तथा खनक इन सभी का स्पर्श या दर्शन हैं। कुदरत ने प्रकृति और मानव का एक अटूट सम्बन्ध बनाया हैं जो जन्म -जन्मांतर का है।
भारतीय दर्शन यह मानता है कि इस देह की रचना पर्यावरण के महत्त्वपूर्ण घटकों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से ही हुई है। ऐसा माना जाता है कि केवल पृथ्वी ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक मात्र ऐसा गृह है जहाँ जीवन है। 
 स्वच्छ पर्यावरण पृथ्वी पर स्वस्थ जीवन का अस्तित्व बनाये रखने में एक बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पर्यावरण का प्रकृति से आत्मिक सम्बन्ध है। इसके बिना जीवन की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। इसलिए हमें भविष्य में जीवन की संभावना सुनिश्चित करने के    लिए अपनें पर्यावरण को स्वस्थ्य और सुन्दर रखना चाहिए। यह पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है। एक स्वच्छ वातावरण शांतिपूर्ण और स्वस्थ जीवन जीने के लिए बहुत आवश्यक है।
भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को विशेष महत्त्व दिया गया है। वैदिककाल में हमारे जीवन का विभाजन भी प्रकृति पर ही आधारित था। हमारे- ऋषि मुनि प्रकृति में परमात्मा के दर्शन करते थे। उन्हें ये सत्य ज्ञात था कि प्रकृति ही हमारी जननी है।
 वैदिककाल में  जीवन  चार आश्रमों में  विभाजित था उनमें  से तीन तो पूरी तरह से प्रकृति माँ की  गोद में ही व्यतीत होते थे।  ब्रह्मचर्य आश्रम के अन्तर्गत प्राकृतिक सौंदर्य से खिले हुए गुरुकुल अक्सर नदी के तट पर हुआ करते थे। ये सौंदर्य भी विद्यार्थियों के जीवन को निखारनें में बहुत सहयोगी हुआ करता था। प्राकृतिक सौंदर्य का तन, मन और आत्मा से गहरा नाता है। ये आत्मिक सौंदर्य ही हमारे हर कर्म को एक प्रकाश की तरफ ले जाता है।  वानप्रस्थ आश्रम में भी व्यक्ति वन प्रदेशों में रहकर आत्मचिंतन तथा  लोगों की भलाई के लिए ही  कार्य  करता था। संन्यास आश्रम में तो व्यक्ति समग्र उत्तरदायित्वों को अपनी संतानों को सौंपकर, निर्जन वन  तथा गिरि कन्दराओं में रह कर आत्मकल्याण करनें में बाकी जीवन बिता देता था।
 गृहस्थ आश्रम भी इससे  अछूता  कहाँ रहा? लोग रीति- रिवाजों तथा त्योहारों व विवाह आदि के अवसरों पर प्रकृति का आशीर्वाद पा ही लेते थे। पीपल के वृक्ष, वट- वृक्ष  साथ ही आँवले तथा केले के पेड़ को पूजा जाता था। तुलसी का पौधा तो हर घर में होता था। नारियों का तुलसी का सिंचन करना कहीं न कहीं शुद्धता को बनाए रखना था ताकि रोगाणुओं जनित बिमारियों का संक्रमण न हो।
 अब हमारी  लापरवाही से हमारा पर्यावरण दिन- ब -दिन दूषित  होता जा रहा है, जिससे प्राकृतिक असंतुलन पैदा हो गया है। सम्पूर्ण वातावरण ही अशुद्ध हो गया है। यही तो प्रदूषण है। आज के मशीनी युग में हम ऐसी स्थिति से गुर रहे हैं  कि प्रदूषण एक अभिशाप के रूप में सम्पूर्ण पर्यावरण को नष्ट  कर रहा है। पर्यावरण में कॉर्बनडाइ ऑक्साइड के बढ़ते स्तर के कारण धरती के सतह का तापमान लगातार बढऩा ग्लोबल वार्मिंग है। ये विश्व के लिए  चिंता का विषय  है। विश्व  के सभी देशों को इसके समाधान के लिए  सकारात्मक कदम उठाने  चाहिए। नियमित बढ़ते धरती के तापमान से कई सारे खतरों का जन्म होगा जो इस ग्रह पर जीवन के अस्तित्व को कठिन बना देगा। ये धरती के आबोहवा में नियमित और स्थायी परिवर्तन को बढ़ा देगा और इससे प्रकृति का संतुलन बिगडऩे लगेगा। 
 धरती पर कॉर्बनडाई ऑक्साइड के बढऩे से मनुष्य के जीवन पर इसका बुरा  प्रभाव होगा, इससे  तूफ़ा, अप्रत्याशित चक्रवात, ओजोन परत में क्षरण, बाढ़, सुनाम, सूखा, खाद्य पदार्थों की कमी, महामारी, और मौंते आदि में बढ़ौतरी होगी। ऐसा शोध में पाया गया है कि कॉर्बनडाई ऑक्साइड के अधिक उत्सर्जन का कारण जीवाश्म ईंधनों के प्रयोग, खाद का  उपयोग, पेड़ों की कटाई, फ्रिज और ए सी से निकलने वाली गैस, अत्यधिक बिजली के इस्तेमाल आदि है।  कॉर्बनडा ऑक्साइड का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। 2020 तक ग्लोबल वार्मिंग से धरती पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
धरती पर ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव बढऩे का कारण  कॉर्बनडा ऑक्साइड के स्तर   का  बढऩा है, सभी ग्रीनहाउस गैस (जलवाष्प, कॉर्बनडा ऑक्साइड , मीथेन, आदि) गर्म किरणों की पात को सोखता है ,जिसके बाद सभी दिशाओं में दुबारा से विकीकरण होता है और धरती पर वापस आकर तापमान में वृद्धि करता है जो हमें ग्लोबल वार्मिंग के रुप में दिखाई देता है। ग्लोबल वार्मिंग के जीवन से सम्बन्धित दुष्प्रभावों को रोकने के लिए , हमें कॉर्बनडा ऑक्साइड  और ग्रीनहाउस गैसों के प्रभावों को बढ़ाने वाले सभी कारकों को हमेशा के लिए  त्यागना पड़ेगा।
प्रदूषण को बढ़ाने में कल-कारखाने, वैज्ञानिक साधनों का अधिक उपयोग, फ्रिज, कूलर, वातानुकूलन, ऊर्जा संयंत्र आदि दोषी हैं। प्राकृतिक संतुलन का बिगड़ना भी मुख्य कारण है।  वृक्षों को अंधा-धुंध काटने से मौसम का चक्र बिगड़ा है।  घनी आबादी वाले क्षेत्रों में हरियाली न होने से भी प्रदूषण बढ़ा है। ये हमारे शरीर के  रोगों से लडऩे की क्षमता को क्षीण कर रहा  है। एक शिशु पर भी जन्म लेते ही   कई रोगों के चपेट में आनें की संभावना बनी रहती है। इन रोगों में प्रमुख रूप से फेफड़ो का कैंसर, तथा समस्त श्वास सम्बन्धिरोग हैं।
विश्व तथा भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए विभिन्न परियोजनाएँ  चलाई जा रही हैं इस कार्य में भारत दशकों से प्रयत्नशील रहा है,जिन्हें विभिन्न वर्गों में  विभाजित किया जा सकता हैं। हमारे देश में पर्यावरण संरक्षण कार्य नदियों पेड़- पौधों व जीव जंतुओं की लुप्त होती प्रजातियों  पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री मेनका गाँधी ने  पशु- पक्षियों के संरक्षण के लिए कई प्रशंसनीय कार्य कि हैं।
इसके आलावा वर्तमान  समय में माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र दामोदर मोदी के नेतृत्व में 1500 लोगों के मौजूदगी में  2 अक्टूबर 2014 को राष्ट्रपति भवन में स्वच्छ भारत अभियान के कार्यक्रम को आयोजित किया गया। परिणामस्वरूप उल्लेखनीय सुधारों की प्रक्रिया  आज तक भी जारी है। अत: इस विषय में हमारे देश में सरकारी स्तर पर भी योगदान प्रदान किया जा रहा है। भारत में इसका सूत्रपात सामाजिक स्तर पर हुआ  है। इन विषयों पर हाल  ही में विभिन्न परियोजनाओं का शुभारम्भ  किया गया जिनके सकरात्मक परिणाम धीरे-धीरे सामनें आ रहे हैं।
हम सभी इस क्षेत्र में बहुत योगदान कर सकते हैं। प्लास्टिक की थैली के स्थान पर कपड़े की थैली  उपयोग में  ला सकते हैं।  बिजली के बिल में कटौती करने वाले उपाय  को अपना सकते हैं। घर में एल ई डी बल्ब लगाने चाहि। फ्रिज के पानी के बजाय मटके का ठंडा पानी ज्यादा बेहतर है। घर के सारे बिजली से चलने वाले उपकरणों  का कम से कम उपयोग करें। घर से बाहर जाते हुए मेन स्विच बंद करें। इस तरह बिजली के बिल में भी थोड़ी कटौती होगी और ज्यादा बिजली बनाने के लिए कोयला भी नहीं जलाना पड़ेगा। पृथ्वी का तापमान भी कुछ कम पड़ेगा। घर में ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाने चाहि। इससे हम अपनें पर्यावरण को स्वस्थ व शुद्ध बना सकते हैं।
सम्पर्क: मकान नंबर- 32, गली नंबर-9, न्यू गुरु नानक नगर, गुलाब देवी रोड, जालंधर, पंजाब -144013

मनमानी मानव करे, कुदरत है बेहाल



मनमानी मानव करेकुदरत है बेहाल


समाधान
- मंजु गुप्ता
मनमानी मानव करे,  कुदरत है बेहाल
मानव द्वारा निर्मित प्रदूषित पर्यावरण और उससे पैदा हुई ग्लोबल वार्मिंग का जिम्मेदार स्वयं मानव ही है। आज यह प्रदूषित पर्यावरण की समस्या विकराल हो गई है। हम सब और सरकार इस समस्या के समाधान के लिए  सचेत नहीं हुए तो प्रलय निश्चित है। हमारे देश में पर्यावरण के मुद्दे उसी तरह से गौण हो जाते हैं ,जैसे महिला सशक्तीकरण, कुपोषण, गरीबी हटाओ आदि। पर्यावरण तो सरकार के लिए एकतरफा कागजी योजना ही है।
अगर हम पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ करें तो चारों ओर का परिवेश अर्थात जिसमें वायु, जल, भू , आकाश, सारी वनस्पतियाँ, सभी प्राणी यानि जीव- जन्तु , मनुष्य सभी इसमें शामिल हैं। 
आज मानव को विज्ञान ने नई- नई तकनीक दी हैं.  जिसने मानव को भौतिक सुख म्पदा  से म्पन्न किया है।  जिससे वे अपनी सुख सुविधा के लिए ग्ज़री सामान का उपयोग बड़े पैमाने पर कर रहा है, जिनको बनाने काम विकसित देश विकासशील देशों को दे रहे हैं। जिससे विकसित देश में प्रदूषण न हो। वैaज्ञानिक सर्वेक्षण से पता लगा  है कि सन् 1992 से ले कर अब तक वायुमंडल में कार्बन- डा- आक्साइड का 50 प्रतिशत का ज़ाफ़ा हुआ है। इस का कारण फैक्टरियों, चिमनियों, वाहनों से निकलने वाला जहरीला, गहराता काला धुआँ जो वायु प्रदूषण को बढ़ावा दे रहा है। ज़ोन परत में छेद हो गया है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है। जिससे जीवन जीना प्राणियों के लिए मुश्किल हो रहा है। 
 समुद्र का जल स्तर घट रहा है। पूरा विश्व पानी के संकट से जूझ रहा है। कहा  भी जा रहा है कि अगला युद्ध जल के लिए ही होगा। जल है तो कल है। मराठवाड़ा के 1500 गाँव और बुन्देलखण्ड सूखे से बेहाल हैं। जनसंख्या के विस्फोट से प्राकृतिक सम्पदा का दोहन हो रहा है। वनों को काट क काँक्रीटीकरण हो रहा है। जिससे जल स्रो सूख रहे हैं। नदियों में कल कारखानों का रासायनिक पदार्थ पानी को दूषित करता है। जल प्रदूषण से नदियों के किनारे बसे गाँव- शहर तबाह हो रहे हैं।
खेतों में रसायनिक खादों, कीड़े मारने के लिए पेस्टिसाइड आदि के प्रयोग से 50 से 70 लाख हेक्टयर जमीन बंजर हो रही है। मिट्टी की खराबी से विकासशील देशों की उत्पादक क्षमता 29 प्रतिशत  कम हो गई है और पैदावार, फसल। सब्जी, अन्न, फल आदि खाद्यान्न विषाक्त हो रहे हैं। स्वास्थ्य से खिलवाड़ हो रहा है।  रासायनिक उर्वरकों का स्तेमाल पर्यावरण को प्रदूषित करता है.
नित्य नए- नए वैज्ञानिक उपकरणों का निर्माण,  उनके दुरुपयोग ने, एस यू बी से निकला प्रदूषण मानव जीवन को खतरे में डाल दिया है। पोखरन में परमाणु विस्फोट हो या युद्धों में मिसाइलों, जैविक शस्त्र को प्रयोग, बमों के निर्माण परिक्षण या फिर खनन माफियाओं का भू दोहन से खिलवाड़ करने पर आ बैल मुझे मारकी कहावत चरितार्थ हो रही है। जिसका परिणाम प्राकृतिक आपदाएँ जैसे वक्त- वेवक्त की बारिश, बाढ़ , सुनामी, अकाल, ओले,आँधी, तूफ़ान, सूखा, अति गर्मी आदि। उत्तराखंड में बादल का फटने से केदारनाथ का जल मगन, कश्मीर, चेन्नई की बाढ़, अभी हाल ही में भोपाल के सिंहस्थ कुंभ मेले में लाल, काली आधी, वर्षा के उत्पात ने कई श्रद्धालुओं की जान लील ली।
  आज पर्यावरण हमारी स्वार्थी वृतियों, अर्थ-लोलुपता, गलतियों, कमियों के कारण प्रदूषित हो रहा है। अत: पर्यावरण बचाने के लिए  हम सब का सामूहिक नैतिक दायित्व होना चाहिए, सरकार को सकारात्मक प्रयास करने होंगे। जनता को जागरूक होना होगा। सरकार पर दवाब पड़ेगा। जिससे वे अपने सांसदों को जनता के बीच भेज कर समस्याओं को जानें, जिससे वे  प्रदूषित परिवेश , स्थितियों को सुधारें। सभी प्रकार के प्रदूषणों के कारणों को रोकना होगा। जनसंख्या वृद्धि पर  रोक लगानी होगी। रासायनिक उर्वरको से पर्यावरण बिगड़ रहा है। ऐसे में किसानों को शत प्रतिशत जैविक खेती के लाभ का ज्ञान दिया जाए और  जैविक तन्त्र के बारे में बताया जाए। किसानों को कृषि विशेषज्ञों से जैविक प्रशिक्षण दिलाया जाए। जल स्रोतों  का सही नियोजन हो, बारिश के पानी का संचयन किया जाए, पानी की बर्बादी न करें। नदियों में कचरा, रासायनिक पदार्थों न डालें। प्राकृतिक सम्पदा का दोहन, लूट न करें। जल स्रोतों जलाशयों को पुनर्जीवित करना होगा।
 नदियाँ प्रदूषित न करें। इन्हें भारतीय, वैदिक संस्कृति का गौरव देना होगा। वेद, पुराणों में पर्यावरण का संरक्षण, प्रकृति संतुलन का आध्यात्मिक ज्ञान मिलता है। हमें उनकी शरण में जा कर धर्म का पालन करना होगा। अनादि काल से चल रहे धार्मिक अनुष्ठानों को हम व्यवहार लाए। नदियों को माँ मान कर  पूजें, उनकी पवित्रता, स्वच्छता बनाए रखे। अभी हाल ही में मध्यप्रदेश में सिंहस्थ कुंभ में क्षिप्रा नदी में एक तरफ जाल बिछा दिया था। भक्तों, श्रद्धालुओं ने फूल, प्लास्टिक की थैलियाँ आदि कचरा डाला था। सब कचरा उस जल में जमा हो गया। इस तरह के प्रयोग से हम नदियों की स्वच्छता बनाए रख सकते हैं। पंच तत्वों जल, वायु, अग्नि, भू, आकाश के साथ पेड़ - पौधे हमारे जीवन के रक्षक हैं। इन्हें पूजे। इनसे  आत्मीय रिश्ता बनाना होगा।
हमारे पूर्वजों ने वृक्षों- वनस्पतियों  पर प्रेम किया था, उनमें ईश दर्शन किए थे,  उन्हें सहोदर मान कर स्नेह से सिंचन किया था। शकुन्तला वृक्षों को सगे भाई मान कर पानी पिलाती थी। आज भी भारतीय स्त्रियों का वट सावित्री का व्रत पति की दीर्घायु की कामना करते हुए वट की पूजा करती हैं। पेड़- पोधे वर्षा का कारण बन कर पर्यावरण की रक्षा करते हैं और कार्बन- डाइ- आक्साइड जैसी विषैली गैस का शोषण कर शुद्ध वायु आक्सीजन का निर्माण करती है। हमें वनों को अंधाधुंध काटना नहीं चाहिए बल्कि वनों का संरक्षण करें। वन हैं तो नदियाँ जीवित रहेंगी, नदियों के किनारे वृक्ष लगाएँ। तभी नदियाँ पहले की तरह हो जाएंगी। मानवीय सभ्यता, संस्कृति नदियों के किनारे जन्मी है।
वृक्षारोपण करना हमारा सांस्कृतिक दायित्व है, नहीं तो बिना वृक्षों के मानव का अस्तित्व ही नहीं रहेगा। तभी संसार को भावी प्राकृतिक, दैवीय विनाश लीला जैसे सूखा, अकाल, सुनामी, केटरीना, भूकम्प आदि  से बचाया जा सकता है। प्रकृति के साथ संतुलन  बनाए  रखना होगा। भारत की कालजयी संस्कृति  सब के हित, ‘सर्वे सुखानी भवन्तुकी बात करती है।
सभी विद्यालयों, कालिजों में विद्यार्थियों को प्रार्थना सभा, जल बचाने की, जल के सदुपयोग , स्वच्छ परिवेश, वृक्षारोपण की शपथ दिलवाने का संकल्प लेना  चाहिए। इससे नई पीढ़ी में इनके रक्षण का दायित्व आएगा। तभी देश में हरियाली- खुशहाली आएगी।
 विकसित देशों से हमारी सरकार पर्यावरण  विशेषज्ञों से पर्यावरण बचाने की नई तकनीक सीखे। आर्थिक मदद मिले। ग्रीन क्लीन एनर्जीकी तकनीक ले कर वायुमंडल में विद्यमान  कार्बन-डाई -आक्साइड  के 50 प्रतिशत के जहरीले लेबल को कम कर सकें। नित्य हवन, यज्ञ से वायुमंडल  के कीटाणुओं को मार स्वस्थ, शुद्ध, कर सकते हैं। मन- वचन- कर्म से हम सबको को अपने- अपने स्तर पर पर्यावरण रक्षण का निर्वाह में जुट जाना होगा। तभी हमारी भावी पीढी जि़ंदा रह सकेगी। 
सम्पर्क: 19, द्वारका, प्लॉट 31, सेक्टर  9, वाशी, नवी मुम्बई - 400703, मो. 9833960213