मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

May 10, 2016

विलुप्ति के कगार पर बारहसिंघा

           विलुप्ति के कगार पर

               बारहसिंघा

                     - देवेन्द्र प्रकाश मिश्र
उत्तर प्रदेश के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क के हरे-भरे मैदानों में कभी विशाल झुण्डों के रूप में पाया जाने वाला अद्वितीय मृग ‘बारहसिंघा’ प्रदेश का राजकीय पशु होने के बावजूद अपने ही गृहराज्य में स्वयं के अस्तित्व को बचाने के लिए बुरी तरह संघर्ष कर रहा है। जबकि कभी दुधवा नेशनल पार्क बारहसिंघों का स्वर्ग इस कारण से कहा जाता था क्योंकि जंगल के मैदानों में चार से सात सौ की संख्या वाले बारहसिंघों के झुण्ड अक्सर दिखाई देते थे जो अब कभी कभार अंगुलियों पर गिनने लायक ही दिखते हैं। प्राकृतिक एवं मानव जनित कारणों के साथ ही दुधवा के अफसरों की निज स्वार्थपरता तथा उदासीनता के कारण खूबसूरत सींगों के लिए पूरे संसार में प्रसिद्ध मृग ‘बारहसिंघा’ तेजी से विलुप्त हो रहे वन्यप्राणियों की श्रेणी में माना जाने लगा है। इसके बाद भी इनकी वंशवृद्धि के प्रयासों का शुरू न किया जाना अपने आप में ही शोचनीय विषय बन गया है।
विश्व की दुर्लभतम वन्यजीवों की प्रजातियों में से एक ‘बारहसिंघा’ पिछली सदी तक उत्तर भारत तथा दक्षिण नेपाल में पाया जाता था। वैसे हिमालय की तलहटी के साथ ही आसाम से लेकर पूर्व में सुन्दरवन व पश्चिम में सिन्धु नदी के दलदल और बाढय़ुक्त मैदानों एवं दक्षिण में गोदावरी तक इनकी उपस्थिति के प्रमाण मिले हैं। भारतीय द्वीप में बारहसिंघों की तीन उप प्रजातियाँ पायी जाती है। जीववैज्ञानिकों में ‘सरबस डुबासोली’ नाम से प्रसिद्ध इस वन्यजन्तु को अंग्रेजी में ‘स्वॉप डियर’ भी कहते हैं। भारत-नेपाल सीमावर्ती उत्तर प्रदेश के जिला लखीमपुर-खीरी के विश्व पर्यटन मानचित्र पर स्थापित विख्यात दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र में ‘सरबस डुबासोली’ तथा मध्यप्रदेश के कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में ‘सरबस ब्राडेरी’ के साथ ही आसाम में रंजीत सिंगी प्रजाति मिलती है। लगभग 180 किलो वजन तथा 54 इंच रुंचे कंन्धे से इस मृग ‘हिरन’ के सींग करीब 5 इंच व्यास तथा 30 इंच तक लम्बे होते हैं। वैसे भारत से सटे नेपाल के दक्षिण भाग में भी कुछ बारहसिंघे दिखाई पड़ जाते हैं। नर बारहसिंघों के सिर पर सींगों का जहाँ खूबसूरत मुकुट होता है वहीं मादा के सिर पर सींग नहीं पाये जाते हैं, नर के सींग प्रत्येक साल प्रजननकाल समाप्त होते ही झड़ जाते हैं लेकिन अगला प्रजनन आने से कुछ सप्ताह पहले ही पूर्ण विकसित सींग फिर से निकल आते हैं। विकसित सींग रक्षा के अलावा प्रजनन के समय मादा को आकर्षित करने के भी काम आते हैं। बारहसिंघे के भूरे शरीर पर घने बाल नज़र आते है। नर की गर्दन पर जरा लम्बे व गहरे भूरे रंग के बाल भी देखे जा सकते हैं। गर्मियों में इस मृग का रंग जरा हल्का व धब्बेदार हो जाता है। एक समय था जब दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र में जहाँ इस मृग के बड़े-बड़े झुण्ड आसानी से नजर आ जाते थे, वहीं अब होने वाले प्राकृतिक परिवर्तन एवं मानवजनित कारणों से ऐसे झुण्ड भी दुर्लभ हो चले हैं, जिसमें पचास बारहसिंघा हो। यद्यपि इस स्थिति के लिए दुधवा नेशनल पार्क के अफसरों की लापरवाही व उदासीनता के साथ उनकी स्वार्थपरता भी कम जिम्मेदार नहीं है। विश्व में पाये जाने वाले बारहसिंघों की कुल संख्या की अपेक्षा दुधवा नेशनल पार्क में ही सर्वाधिक बारहसिंघा पाए जाते हैं। 28 जनवरी 1986 को पार्क आँकड़ों में इनकी संख्या 2750 बतायी गई थी। बीते करीव डेढ़ दशक में 2001 तक इनकी संख्या बढऩे के बजाय घटकर 1808 तक पहुँच गई थी। उसके बाद के समय में घटती संख्या सिमट कर तीन अंकों में रह गई है। अलबत्ता जंतु वैज्ञानिकों की शोध रिपोर्ट और बारहसिंघों की गिरती संख्या इनके लगातार कम होने की चेतावनी दे रही हैं। जबकि गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार बारहसिंघों की संख्या चार-पांच सौ के आसपास बतायी जा रही है। बारहसिंघों के बारे में इस रोचक तथ्य को माना जाता है कि जहाँ-जहाँ भी साल वृक्ष प्रचुरता में पाये जाते हैं वहाँ इनकी संख्या के बढऩे की संभावनाएँ ज्यादा होती है। दुधवा नेशनल पार्क में साखू का विशाल जंगल होने के बाद भी लगातार कम हो रही बारहसिंघों की संख्या चिन्ताजनक है ही साथ में पार्क प्रशासन द्वारा वन्यजीवों के संरक्षण हेतु किए जा रहे कार्यो एवं प्रयासों पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है।
दुधवा नेशनल पार्क का वनक्षेत्र बारहसिंघा सहित हिरन प्रजाति में काकड़, चीतल, पाढ़ा के लिए सर्वाधिक अनुकूल है। इसमें सोठियाना के वनक्षेत्र को बारहसिंघों का स्वर्ग कहा जाता था। जबकि किशनपुर वन्यजीव बिहार के झादी ताल समेत दुधवा वन क्षेत्र के ककराहा ताल, भादी, नगराहा, बाके एवं टाइगर ताल आदि वेटलैंड और मैदानी क्षेत्रों में बारहसिंघों के झुण्ड दिखायी देते थे। इसका कारण था कि मानसून सत्र में 'सुहेली सिंचाई परियोजना’ से पूर्व बाढ़ का पानी अमूमन वनक्षेत्र में एकत्र नहीं होता था अगर पानी रूका भी तो बदलते मौसम के साथ ही सूखकर बनने वाले दलदल में जंगली वनस्पतियाँ घास आदि उगती थीं जो बारहसिंघों के जीवन पोषण एवं प्रजनन को बढ़ावा देती थी। लेकिन ‘सुहेली सिंचाई परियोजना’ के तहत सुहेली नदी पर जब से बाँध बन गया उसके बाद से प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ के द्वारा बरपाए जा रहे कहर एवं विनाशलीला से दुधवा के वन्यजीव-जन्तुओं के अस्तित्व पर सवालिया निशान लग गया है। अदूरदर्शिता से बनाए गए सुहेली बाँध ने पानी के तेज प्रवाह को बाधित कर दिया। इसका परिणाम यह निकला कि पूर्व में बाढ़ के पानी से साथ बहने वाली रेत एवं मिट्टी आदि की सिलटिंग अब जंगल के निचले भागों एवं तालावों में एकत्र होने लगी। जबकि सुहेली नदी में पेड़ आदि गिरने से पानी के बाधित प्रवाह के कारण गहरी सुहेली नदी रेत से भरकर उथली हो गई है। इस तरह वर्षा सीजन में प्रतिवर्ष आने वाली भीषण बाढ़ के कारण नदी का समीपवर्ती हराभरा जंगल सूख रहा है एवं वनस्पतियाँ एक लम्बे समय तक जलमग्न होकर नष्ट होने लगी है। बाध के कारण उत्पन्न जलभराव एवं सिल्टेशन से बारहसिंघों के प्राकृतिक आवास बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। परिणाम स्वरूप प्राकृतिक रूप से मिलने वाले चारा को खाकर जीवित रहने वाले शाकाहारी बारहसिंघा अब चारा तथा आवास के लिए उचे स्थान की तलाश में वनक्षेत्रों से पलायन करने को बिवश हुए। जंगल के बाहर आने पर ग्रामीणों ने इनका अंधाधुंध शिकार करना शुरू कर दिया। गौरतलब यह भी है कि इस तराई क्षेत्र में मानसून का समय एवं बारहसिंघों के प्रजनन का समय लगभग एक ही होता है। बरसात में वनक्षेत्रों में भीषण जलभराव के कारण बारहसिंघों को प्रजनन हेतु अन्य क्षेत्रों की ओर भागने के लिए मजबूर करता है तो गरमी में उन्हें पेयजल की समस्या का सामना करना पड़ता है। उल्लेखनीय है कि सिंचाई के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सुहेली बाँध परियोजना बनी थी इसका कोई लाभ क्षेत्रीय कृषकों को नहीं मिला वरन् इसके विपरीत पूरा वन्यजीवन एवं जंगल बर्बाद हुए जा रहे हैं। वन्यप्राणियों के संरक्षण, पर्यावरण एवं सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण यह तराई क्षेत्र जो दुर्लभ प्रजाति के वन्यजीवों से भरपूर एवं हरे-भरे गगनचुंबी पेड़ों का वनाच्छादित है। निरंतर हो रहे अवैध वन कटान से जंगल के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लग गया है। इसके अलावा नेपाल सीमा से जुड़े वनक्षेत्र पर नेपाली नागरिकों का दबाव बना रहता है। इसमें पेड़ काटना हो या फिर वनपशु का शिकार करना हो , उसमें नेपाली कतई संकोच नहीं करते हैं। जबकि वन संपदा एवं वन्यजीवों के संरक्षण के लिए दुधवा नेशनल पार्क के जंगल को प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल तो दिया गया लेकिन क्षेत्रीय एवं समीपवर्ती नागरिकों के हितों की उपेक्षा की गई। दुधवा नेशनल पार्क बनने से पूर्व ग्रामीणों को जंगल से मिलने वाली वन उपज पर पाबंदी लगा दी गई है। जिसका परिणाम यह निकला कि पार्क की स्थापना से पूर्व जंगल एवं जानवरों से भावात्मक लगाव रखने वाले ग्रामीणजन अब चोरी-छिपे जंगल को भारी क्षति पहुँचाने एवं वन पशुओं का अवैध शिकार करने में भी पीछे नहीं रहते हैं। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि वन्यजीवों की सुरक्षा करने के बजाय अब उनके द्वारा की जाने वाली फसल क्षति, जनहानि एवं पहुँचाए जाने अन्य नुकसानों के कारण ग्रामीणों का स्वभाव वन्यजीवों के प्रति कू्र हो गया है। इसमें मानव को तो कम वरन् सबसे अधिक नुकसान वन्यजीवों को ही पहुँच रहा है।
उत्तर प्रदेश के राजकीय पशु ‘बारहसिंघा’ को मूलरूप से संरक्षण देने के लिए स्थापित किये गये दुधवा नेशनल पार्क के आला अफसर बाघों की वंशवृद्धि के लिए किये जा रहे प्रयासों के अति उत्साह में अपने मूल उद्देश्य से भटक गये हैं। जिसका परिणाम यह निकल रहा है कि सरकारी बजट का बंदरवाट एवं खारु-कमारु नीति के कारण दुधवा नेशनल पार्क में चल रहे ‘टाइगर प्रोजेक्ट’ की असफलता जगजाहिर हो चुकी है। दुधवा नेशनल पार्क में वन्यजीवों की लगातार घटती संख्या का मुख्य कारण है कि यहाँ पर बीते तीन दशक से वन्यजीव संरक्षण के लिए वैज्ञानिक विधि वाले पंचवर्षीय फारेस्ट मैनेजमेंट प्लान के तहत वन प्रबन्धन किया जा रहा है। इसमे बीते करीब बारह साल से केवल मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) रूपक डे द्वारा बनाए गए वैज्ञानिक विधि वाले फारेस्ट मैनेजमेंट प्लान के अनुसार कार्य चल रहे हैं। लेकिन पांच वर्ष के समापन पर उसके गुण और दोषों की समीक्षा किए बिना फिर से उसी प्लान के अन्तर्गत कार्य हो रहे हैं। प्लान अगर अच्छा था, तो उसके परिणाम भी सार्थक निकलने चाहिए थे? लेकिन उसके परिलक्षित हो रहे दुष्परिणामों के फलस्वरूप अब अपने गृह राज्य के संरक्षित दुधवा के जंगल में राजकीय पशु ‘बारहसिंघा’ को वर्तमान में अस्तित्व को बचाने के लिए बुरी तरह संघर्ष करना पड़ रहा है। जबकि दिनों-दिन वनराज बाघ के दर्शन भी दुलर्भ होने लगे हैं। प्राकृतिक परिवर्तन और मानवजनित कारणों से बदली परिस्थितियों में मानव एवं वन्यजीवों में बढ़ रहे संघर्ष के मद्देनजर नए ढंग से फारेस्ट मैनेजमेंट प्लान अभी तक नहीं बनाया जा सका है। इससे लगता है कि विभाग के अधिकारी की नहीं वरन् सरकार भी वन्यजीव संरक्षण और वन प्रबन्धन के प्रति कतई गंभीर नहीं है। जिसके चलते अदूरर्शिता एवं कुप्रबन्धन के कारण दुधवा नेशनल पार्क में पाए जाने वाले 15 प्रजातियों के उभयचर प्राणियों समेत सरीसृपों की 25 प्रजातियों तथा पक्षियों की 411 प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट के बादल लगातार गहराते ही जा रहे हैं। ऐसी दशा में वन्यजीवों की सुरक्षा संरक्षण के लिए दीर्घकालिक नई कार्ययोजना के साथ-साथ समय रहते समीपवर्ती ग्रामीणों में वन्यजीव-जन्तुओं के प्रति दया व प्रेम की भावना जागृत करने के लिए जनजागरण अभियान नहीं चलाया गया, तो वह दिन भी दूर नहीं होगा जब पार्क में स्वच्छंद विचरण कर रहे विलुप्तप्राय दुर्लभ खूबसूरत, अद्वितीय वन्यजीव इतिहास के पन्नों में सिमटने के साथ ही कागजी तस्वीरों में ही दिखायी देने लगेंगे, इस संभावना से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है।           
सम्पर्क-  नगर पालिका काम्पलेक्स पलियाकलाँ, लखीमपुर- खीरी (उ.प्र.)
262902, मो. 9415166103

फ़ूलों की घाटी

                  फ़ूलों की घाटी
          किसने रोपा इन खूबसूरत फूलों को
-                                                                 - गोवर्धन यादव             
 यों तो रंग-बिरंगे पुष्प सर्वत्र पाए जाते हैं, पर नन्दन वन के प्राकृतिक पुष्पोद्दान की छटा ही निराली है. इस उद्दान को लेकर महाभारत में एक प्रसंग आता है. एक बार अर्जुन ने द्रोपदी को कुछ देने की कामना की. कुछ न कुछ लेने के लिए जब अर्जुन जिद करने लगा तो द्रौपदी ने कहा-’ यदि आप कुछ लाकर देने की जिद में ही पड़े हैं तो मुझे नन्दन-वन से पारिजात का पुष्प ला दें, जो जल में नहीं, पत्थरों में पैदा होते हैं, जिनकी सुगन्ध कस्तुरी-मृग से भी मादक होती है, जिसका सौंदर्य दिव्य सौंदर्य की अनुभूति करा देता है.’
अर्जुन चले और नन्दन वन पहुँचे. वहाँ के रक्षक से उन्हें युद्ध लड़ना पड़ा, तब कहीं एक फ़ूल द्रौपदी के लिए ला सके.
महाभारत की यह कथा संभवतः कल्पना अधिक, तथ्य कम जान पड़ता हो, किन्तु यह कल्पना नहीं आश्चर्यजनक रहस्य है कि ऐसा नन्दन वन आज भी इसी भारतभूमि में वैसे ही विद्यमान है जैसी महाभारत में कथा आती है. समुद्र सतह से 13,200 फ़ीट ऊँचा यह हिमालय की गोदी में स्थित आज भी ’फ़ूलों की घाटी’ के नाम से विश्व विख्यात है.
प्रतिवर्ष हजारों देशी-विदेशी पर्यटक यहाँ पहुँचते और जहाँ, वहाँ की मादक छटा को देखकर मुग्ध होते हैं, वहीं यह आश्चर्य भी है कि 10-15 मील क्षेत्र में प्राकृतिक तौर पर उगते आ रहे इन हजारों प्रकार के चित्र-विचित्र पुष्पों को किसने रौंपा ?. सारे संसार में ऎसा कोई भी स्थान नहीं जहाँ प्राकृतिक तौर पर इतने अधिक, इतने सुन्दर, इतने वर्णॊं के पुष्प खिलते हों.
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह फ़ूल प्रकृति की उतनी देन नहीं है जितना इस बात की सम्भावना कि यह पौधे अतीत काल में सुनियोजित तरीके से विकसित किए गए हों. सम्भव है यह जो राजोद्यान रहा हो, यह भी सम्भव है कि यहाँ कभी किसी महर्षि का तपोवन रहा हो. जो भी हो- महाभारत काल के बाद यह स्थान उन सैंकड़ों रहस्यों की तरह छुपा ही रहा जिनके लिए प्रतिवर्ष देश-विदेश के सैकड़ों पर्वतारोही आते और हिमालय के आश्चर्य खोजने का प्रयत्न करते हैं.
जहाँ अनेक धार्मिक व्यक्तियों का यह विश्वास है कि हिमालय में राजाओं द्वारा छिपाए हुए खजाने हैं, यज्ञों के बहुमूल्य पात्र, आभूषण और अस्त्र हैं, वहाँ पर्वतारोहियों का यह कथन है कि हिमालय की प्रत्येक वनस्पति औषधि है. जहाँ धार्मिक अग्नियाँ स्थापित हैं, ऐसे-ऐसे गुप्त आश्रम हैं, जहाँ अर्ध सहस्र आयु के संत-महात्मा समाधिस्थ हैं, वहाँ पर्वतरोहियों ने हिममानव की कल्पना ही हिमालय में नहीं की, उनके पदचिह्न भी देखे हैं. आदि साधना भूमि होने के कारण यह विश्वास है कि हिमालय में अध्यात्म-विज्ञान की वह अदृष्य तरंगे, वह ज्ञान अब भी विद्यमान है जिसे प्राप्त कर इस भौतिक युग की सम्पूर्ण जड़वादी मान्यताओं, परम्पराओं, सिद्धांतों को बालू की दीवार की तरह बदला जा सकता है. ‘पुष्प घाटी’ ऐसे-ऐसे रहस्यों की ही पुष्टि का एक प्रमाण है.
इस स्थान की खोज सबसे पहले ब्रिटिशकालीन भारतीय सेना के एक कप्तान ने की थी. उसने यहाँ के सैकड़ों प्रकार के फ़ूलों के बीज एकत्र कर इंग्लैण्ड भेजे. एक पुस्तक भी लन्दन में प्रकाशित की गई, जिसमें इस फ़ूलों की घाटी को प्रकृति का अद्भुत चमत्कार कहकर पुकारा गया. तब से अनेक विदेशी खोजी आते रहे और भटक-भटक कर लौटते रहे. पर इंग्लैण्ड की श्रीमती जान लेग को दुबारा यह स्थान फ़िर मिल गया. उन्होंने यहाँ से लगभग 500 फ़ूलों के बीज इकट्ठे कर लन्दन भेजे. अब तो वहाँ पहुँचने की तमाम सुविधाएँ हो गई हैं इसलिए कोई भी वहाँ जा सकता है, पर अभी हमारे हिमालय में ऎसा बहुत कुछ है जहाँ तक हम जा सकते. हवाँ जा सके होते और उसके अनन्त रहस्यों में से कुछ का भी पता लगा सके होते तो देखते कि जिन वस्तुओं के लिए हम विदेशों के आश्रित हैं, दूसरों का मुँह ताकते है वह और उनसे श्रेष्ठ वस्तुएँ हम अपने ही भीतर से निकाल सकते हैं.
तीर्थ-यात्रा और आत्मकल्याण के लिए साधनाओं की दृष्टि से अब हिमालय ही एक पुण्य़ स्थान बचा है. वहाँ चित्ताकर्षक शांति है, अतुलित प्राण और सौंदर्य भरा है. उसमें जो एक बार इस पुष्प घाटी को देख आता है, उसे हिमालय का सौंदर्य भूलता नहीं.
पुष्प घाटी तक पहुँचने के लिए जोशीमठ पहुँचना होता है. वहाँ से बद्रीनाथ को जाने वाली सड़क पर मध्य में गोविन्द घाट पर उतरना पड़ता है. यहाँ से पैदल चढ़ाई है और आगे घाघरिया तक की सात मील की दूरी को पार करने के लिए पूरा एक दिन लग जाता है.
घाघरिया से कुल एक घंटे में मुख्य घाटी पहुँच जाते हैं. उसकी दाहिनी ओर ‘कुबेर भण्डार’ पर्वत और आगे ‘कामेट चोटी’ है. बाईं ओर सप्राष्टांग पर्वतों की चोटियाँ हैं. कामेट झरना सामने ही बहता हुआ मिल जाता है. म्यूण्डर ग्राम पर पहुँचते ही यह ‘पुष्प घाटी’ मिल जाती है और अनेक प्रकार के गुलाब, कुमुदिनी, गुलदाऊदी, सिलपाड़ा, जंगली गुलाब, चम्पा, बेला, जुही और कुछ फ़ूल तो ऐसे हैं जिनके नाम वैदिक साहित्य में हैं पर अब उनकी सही जानकारी करना कठिन है. अंग्रेजों ने इनके नाम ‘बड आफ़ पमडाइज, ग्लाडेओली, हिमालयन, आरकिड हिबिस्टकम आदि रख लिए हैं. कथीड के सफ़ेद व बैंगनी फ़ूलों के गुच्छे बड़े मोहक लगते हैं. बुरांस फ़ूल तो गुलाब के सौंदर्य को भी मात कर देता है. जब यह बुरांस पूरी तरह अपनी ऋतु में फ़ूलता है तो यह वन नन्दन वन या स्वर्ग से भी सुहावना प्रतीत होता है. कितना ही देखो-- न तो आँखें थकती हैं और न ही वहाँ से हटने का ही जी करता है. वर्ष भर इसी तरह किसी न किसी फूल की शोभा बनी ही रहती है. 3000 से अधिक विभिन्न फ़ूल विभिन्न समय में फ़ूलते-खिलते ही रहते हैं.
ब्रह्म-कमल
ब्रह्म कमल भी यहीं पाया जाता है. कमल जल में ही हो सकता है पर प्रकृति के संसार में क्या बंधन ?. उसने यहाँ पत्थरों में कमल उगाकर दिखा दिया है कि उसकी सत्ता सर्वशक्तिमान है. यह कमल श्वेत रंग का होता है, इसकी सुगन्ध ऐसी जादू भरी होती है कि हल्की-सी महक से ही अनन्त सुख और शांति का आभास होता है. इसलिए इसका नाम ब्रह्म-कमल पड़ा है. इसे पाकर ही द्रौपदी की इच्छा पूर्ण हुई थी.
फ़ूल कहीं भी हो, वह तो प्रकृति का उन्मुक्त सौंदर्य है. जो लोग अपने घरों के आस-पास थोड़े-से भी फ़ूलों के पौधे लगा देते हैं तो वह स्थान इतना अच्छा और आकर्षक लगने लगता है कि बार-बार वहाँ जाने का मन करता है, फ़िर एक ऎसे प्रदेश में पहुँचकर जहाँ 10 इंच से लेकर 28 इंच ऊँचाई के पौधे केवल फ़ूलों से ही आच्छादित हों, उस स्थान के सौंदर्य का वर्णन ही क्या किया जा सकता है. यह स्थान तो ईश्वर या उस दिव्य आत्मा के समान है, जिसके इस सौंदर्य और आनन्द की अनुभूति तो हो सकती है, अभिव्यक्ति नहीं.
सम्पर्क: 103,कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म.प्र.) 480001, 07162-246651, 09424356400
goverdhanyadav44@gmail.com

दमऊ दहरा

जहाँ रचा गया था
सीताहरण का षडयंत्र
  - प्रो. अश्विनी केशरवानी
मैकल पहाड़ की शृंखला छत्तीसगढ़ को प्रकृति की देन है जो पूर्व में उड़ीसा तक और उत्तर पश्चिम में
अमरकंटक तक फैलकर अनुपम सौंदर्य प्रदान करती है। इसकी हरियाली मन को लुभाने वाली होती है। वैज्ञानिकों ने तो इसके गर्भ में बाक्साइड, कोयला, चूना और हीरा के भंडार को पा लिया है। इसी कारण यह क्षेत्र कदाचित् औद्योगिक नक्शे में आ गया है। विश्व प्रसिद्ध विद्युत नगरी कोरबा, बाल्को और भिलाई छत्तीसगढ़ के प्रमुख औद्योगिक नगर हैं। यही नहीं कोरबा और चिरमिरी में कोयला के बहुत बड़े खदान है। इसके अलावा अनेक इस्पात सयंत्र, सीमेंट फैक्टरियाँ यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रही हैं और प्रकृति प्रदत्त हरियाली को प्रदूषित कर रही है। छत्तीसगढ़ का शांत माहौल अब औद्यौगिक प्रतिष्ठानों की गर्जनाओं से कंपित और प्रदूषित होता जा रहा है। यहाँ के सुरम्य वादियों की चर्चा पुराणों, रामायण और महाभारत कालीन ग्रंथों में मिलती है जिसके अनुसार यहाँ की नदियाँ गंगा के समान पवित्र, मोक्षदायी है। उसी प्रकार पहाड़ों की हरियाली और मनोरम दृश्य देवी देवताओं को यहाँ वास करने के लिए बाध्य करता रहा है। यही कारण है कि यहाँ ऋषि मुनियों ने देवताओं की एक झलक पाने के लिए अपना डेरा यहाँ जमाते रहे लिया हैं। इन जंगलों और पहाड़ों में गुफाएँ आज भी देखने को मिल जायेंगी, जो उस काल के ऋषि मुनियों की याद दिलाते हैं। मैकल पर्वत शृंखला का एक अंश ‘दमऊ दहरा’ है जहाँ प्रकृति की अनुपम छटाएँ हैं और पहाड़ों से गिरती जल की धारा जो पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त हैं। अत: कालेज के विद्यार्थियों ने इस बार पिकनिक जाने के लिए दमऊ दहरा को चुना।
दमऊ दहरा छत्तीसगढ़ की तत्कालीन सबसे छोटी रियासत और जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत दक्षिण पूर्वी रेल्वे के सक्ती स्टेशन से 15 कि.मी., औद्यौगिक नगरी कोरबा से 35 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यहाँ बस, जीप और कार से जाया जा सकता है। यहाँ रूकने के लिए एक धर्मशाला भी है। सक्ती, चांपा और कोरबा में लॉज और लोक निर्माण विभाग का विश्रामगृह भी है जहाँ रुका जा सकता है। यहाँ सितंबर-अक्टूबर से जनवरी तक मौसम बड़ा अच्छा रहता है। सार्वजनिक छुट्टियों और रविवार के दिन पर्यटकों की अच्छी भीड़ होती है।
दमऊ दहरा पिकनिक जाने का प्रोग्राम तय हुआ नहीं कि मैं अपना कैमरा लोड करके वहाँ के मनोरम दृश्यों को कैमरे में कैद करने के लिए तैयार हो गया। मेरे मित्रों ने मुझे यहाँ के बारे में बहुत सी जानकारी दी जो मेरे लिए बहुत उपयोगी थी। दमऊ दहरा का प्राचीन नाम 'गुंजी' है। छत्तीसगढ़ के पुरातत्वविद् और साहित्यकार पंडित लोचनप्रसाद पांडेय के सत्प्रयास से इसे ॠषभतीर्थ नाम मिला। यहाँ पहाड़ों से घिरा एक गहरा कुंड है जिसमें पहाड़ से निरंतर पानी गिरते रहता है। स्थानीय भाषा में गहरे कुंड को ‘दहरा’ कहा जाता है। मान्यता है कि इस दहरा में सक्ती रियासत के संस्थापक राजा आते थे। दहरा का पानी कुछ खारा होता है जो संभवत: पहाड़ से बहकर आने के कारण है। इस पानी को पीने से पेट रोग से मुक्ति मिलती है। यह ग्राम प्राचीन काल में उन्नत सांस्कृतिक केंद्रों में से एक है। यहाँ की पहाड़ी में साधु संतों के रहने के लिए गुफा है और दहरा के पास की पहाड़ी में एक लेख खुदा है जो सातवाहन कालीन है। उस काल का अन्य शिलालेख कोरबा और अड़भार में भी है। इस क्षेत्र में रामायण कालीन अनेक अवशेष मिलते हैं जिससे प्रतीत होता है कि श्रीरामचंद्र जी वनवास काल में यहाँ आये होंगे ?


बहरहाल, हम बस से दमऊ दहरा पहुँचे। सबके पास अपना अपना टिफिन था अत: खाना बनाने का झंझट ही नहीं था। यहाँ की हरियाली और मनोरम दृश्य को देखकर हमारा मन प्रफुल्लित हो उठा। सबका मन जैसे गाना गाने को कर रहा था। विद्यार्थियों की जिज्ञसा को जब तक मैं शांत करता, सब बस से उतरकर एक जगह अपना सामान आदि रखकर इधर उधर चल दिये। कुछ लोग जब कुंड में हाथ मुँह धोने लगे तो कुछ लोग श्री राम लक्ष्मण जानकी और भगवान ऋषभदेव मंदिर चले गये तो कुछ लोग पहाड़ में चढ़कर गुफाओं और प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने लगे। मेरी उँगलियाँ जल्दी जल्दी इस सौंदर्य को अपने कैमरे में कैद करने लगी। हम लोगों ने देखा कि पहाड़ से पानी नीचे गिर रहा है। यहाँ एक गहरा कुंड है और कदाचित् इसी कारण इस स्थान को ‘दमऊ दहरा’ कहा जाता है। वैसे चारों ओर से पहाड़ों से घिरे इस निर्जन वन में जंगली जानवरों की अधिकता रही होगी? स्थानीय कवि श्री कुंजबिहारी शुक्ल के शब्दों में:
दमऊ दहरा का गहरा कुंड, हाथियों का झुंड
सूंड़ से उठाकर जहाँ करता  जल विहार।
डॉ.लोचनप्रसाद शुक्ल ने अपने खंड काव्य 'ऋषभतीर्थ’ में इस कुंड को गुप्त गोदावरी बताते हुए लिखा है-
तीन पर्वत संधियों से अनवरत जल बह रहा
गुप्त गोदवरी निरंतर नीर निर्मल नव भरा।
इससे यहाँ की छटा बड़ा मनोहर होता है। देखिये कवि की एक बानगी-
गोदावरी विमल भूत अजस्र धारा,
देखो छटा जल प्रपात नितान्त रम्या।
है वाह्म रूप उभकुंड उमंगिता से,
धारामयी सलिल माचित मुग्धकारी।।
कोई भी पथिक इधर से गुजरते समय यहाँ की हरियाली और अनुपम सौंदर्य को देखकर पेड़ों के छाँव तले थोड़ी देर विश्राम करने के लिए विवश हो जाता था। पथिक कुंड में हाथ मुँह धोकर अपनी प्यास बुझाकर विश्राम करते थे। ऐसे में मन में जल करने की इच्छा होना स्वाभाविक है मगर जलपान के लिए उनके पास कुछ नहीं होता था। लेकिन आश्चर्य किंतु सत्य, पथिक के मन मुताबिक जलपान एक थाली में सजकर उसके सम्मुख आ जाता था। पथिक कुछ समझ पाता तभी आकाशवाणी होती ‘पथिक ! ये तुम्हारी क्षुधा शांत करने के लिए है, मजे से ग्रहण करो’ पथिक उसे ग्रहण करके थाली को धोकर उस कुंड में रख देता था। ऐसा पता नहीं कब से होता था मगर एक पथिक की नियत खराब हो गयी और वह उस थाली को लेकर अपने घर चला गया। लेकिन घर पहुँचकर मर गया। हालांकि उसके परिवार वालों ने उस थाली को वापस उस कुंड में डाल दिया मगर तब से थाली का निकलना बंद हो गया...। मुझे लगा कि हमें भी ऐसा कुछ खाने को मिल जाता? लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बाद में मुझे मदनपुरगढ़ के नाला, दल्हा पहाड़ के तालाब और भोरमदेव मंदिर के तालाब से ऐसे जादुई थाली निकलने और पथिकों के भूख को शांत करने की जानकारी मिली। छत्तीसगढ़ के ऐसे अनेक किंवदंतियों में से यह भी कोई किंवदंती हो सकती है ?
यहाँ हमने श्रीराम लक्ष्मण और जानकी मंदिर में उनके दर्शन किये। उनके अलावा हमें भगवान ऋषभदेव और वीर हनुमान के दर्शन हुए। मंदिर के बाहर बंदरों के दर्शन किसी सजीव हनुमान से कम नहीं था जो हमारे हाथ से नारियल छीनकर खा गया। पुजारी जी ने हमें बताया कि भगवान ऋषभदेव की यही प्राचीन काल में तपोभूमि थी। कवि भी यही कहता है-
तपोभूमि यह ऋषभदेव की महिमा अमित बखान।
योगी यति मुनि देव निरंतर शाश्वत शांत प्रदान।।
मेरा लेखक मन जैसे सब कुछ समेट लेना चाहता था। घड़ी भी जैसे दौड़ रही थी और हमारे पेट में चूहे उछल कूद कर रहे थे। सभी अपने अपने ग्रुप के साथ कोई पहाड़ी में तो कोई कुंड के समीप खाना खाने लगा। खाना खाकर गाना बजाना चलता रहा। तभी हमने कुछ नंगे बदन व्यक्तियों को पहाडिय़ों में चढ़ते देखा। मैंने उनके बारे में इस पहाड़ी की तराई में रहने वाले लोगों के बारे में जानना चाहा। पहले तो वे हिचके, फिर थोड़ी देर बाद बताने लगे- 'हमारे पूर्वज यहाँ बरसों से निवास करते थे। उस पहाड़ी के तराई में हमारी 8-10 घर की बस्ती है। सब्जी-भाजी उगाकर, कुछ खेती करके और लकड़ी बेचकर हम अपनी जीविका चलाते हैं। सक्ती के राजा ने हमारी बस्ती में बिजली लगवा दी है। मुझे पहाड़ी में कोई बिजली की तार नहीं दिखा। तब मुझे याद आया कि वनों और पहाड़ों में सोलर लाइट लगा होगा।
मेरी उत्सुकता बढ़ी और मैं इतिहास के पन्ने उलटने लगा। अभिलेखों से पता चलता है कि यहाँ देवताओं के दिव्य स्थल ऋषभाश्रम, ऋषभकुंड, ऋषभ सरोवर सीताकुंड, लक्ष्मणकुंड, और पंचवटी के अवशेष मिलते हैं। ऋषभतीर्थ से तीन मील की दूरी पर उत्तर दिशा में एक आश्रम है। इसके ईशान कोण पर जटायु आश्रम है। जिसके कारण इस पहाड़ को ‘गिधवार पहाड़’ कहते हैं। आग्नेय दिशा में राम झरोखा, राम शिला, लक्ष्मण शिला है। वायव्य दिशा में आधा मील की दूरी पर उमा महेश्वर और कुंभज ऋषि का आश्रम है। इसी कारण यहाँ के एक पहाड़ को ‘कुम्हारा पहाड़’ कहते हैं। पश्चिम दिशा में तीन मील की दूरी पर ‘सीता खोलिय’ तथा 10 मील की दूरी पर शूर्पणखा का स्थल था। उसके पास में कबंध राक्षस का स्थल (कोरबा) और खर दूषण की नगरी (खरौद) है। पश्चिम दिशा में ही आधा मील की दूरी पर ‘मारीच खोल’ है। ऐसी मान्यता है कि यहीं पर रावण ने मारीच के साथ मिलकर सीता हरण का षडयंत्र रचा था। यह स्थान रैनखोल कहलाता है। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ में अनेक रामायण कालीन अवशेष मिलते हैं। इससे इस क्षेत्र की प्राचीनता का बोध होता है।
अब शाम होने को आयी और हम सब वापसी के लिए बस में बैठ चुके थे। बस चली तो मन में राहत थी कि हरियाली के बीच जैसे कोई तीर्थयात्रा कर लिये हो ? कवि की एक बानगी पेश है-
तीर्थ सरिता नीर से सम्पर्क साधन कर लिया।
मानुष तन पाकर जिन्होंने सुकृत सब कुछ कर लिया।।
सम्पर्क: 'राघव' डागा कालोनी, चांपा- 495671(छ.ग.), ashwinikesharwani@gmail.com