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Mar 10, 2013

समाज को नया दृष्टिकोण अपनाना होगा



समाज को नया दृष्टिकोण अपनाना होगा
- डॉ. प्रीत अरोड़ा
आज भारत विश्व के विकासशील देशों में अग्रणी माना जाता है। जहाँ औद्योगिक क्षेत्र से लेकर सामाजिक क्षेत्र की दशा व दिशा दोनों में ही अत्यधिक परिवर्तन हुआ है। परन्तु प्रश्न उठता है कि आज भी समाज की संकीर्ण सोच में आखिर कितना परिवर्तन आया है? विडम्बना तो यह है कि आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक स्त्री पीडि़त, शोषित, प्रताड़ित एवं काम-वासना का शिकार बनती हुई आई है। यह सत्य है कि पितृसत्तात्मक सत्ता के वर्चस्व के कारण नारी का जीवन सदैव प्रतिबंधित रहा है। पितृसत्तात्मक समाज में नारी का मनोबल कानून व व्यवस्था आदि पर पुरुषों का कब्जा होता है जहाँ वह नियम, कायदे, कानून, परम्परा, नैतिकता, आदर्श, न्याय एवं सिद्धांत द्वारा नारी- जीवन को नियत्रिंत करने की प्रक्रिया का निर्माण करते हैं और इस तरह वे नियंत्रण करके नारी- वर्ग पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहते हैं जिसके फलस्वरूप शुरू होता है-शोषण का घिनौना सिलसिला।
 शोषण ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा पितृसत्तात्मक समाज विजयी घोषित होकर नारी को अबला, पददलित व पराश्रित बना सकता है। इसलिए आज समाज में नारी के साथ होने वाला दैहिक, मानसिक, आर्थिक व शैक्षणिक शोषण का सिलसिला दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। आज कहने को तो नारी ने जीवन की सभी परिभाषाएँ बदल दी हैं। वह जीवन में निरर्थक से सार्थक बनकर परीक्षाओं व प्रतियोगिताओं में स्वयं को सशक्त भी सिद्ध कर रही है। यहाँ तक कि वह अपने पाँवों पर खड़ी होकर स्वाभिमानी जीवन भी व्यतीत कर रही है इसी कारण वर्ष 2001 को नारी सशक्तीकरण के नाम से भी घोषित किया गया है परन्तु इतिहास गवाह है कि नारी- समाज का अत्याचारों द्वारा प्रताडि़त होने के सिलसिले में तेजी से इज़ाफा हो रहा है। आज की स्वतंत्र नारी भारतीय समाज की संकीर्ण सोच के समक्ष हर नजरिये से परतंत्र बना दी जाती है। जहाँ उस नारी द्वारा अपने अधिकारों के लिए चलाई गई हर मुहिम भी दम तोड़ती नज़र आती है।
 आज भी महिला पढ़ी लिखी हो अथवा अनपढ़, गृहकार्य में दक्ष गृहस्वामिनी हो या चहारदीवारी लाँघकर अपने कन्धों पर दोहरा भार उठाने वाली परन्तु उसके प्रति समाज का दृष्टिकोण क्रूर ही नज़र आता है। ऐसे में उसे पुरुष सन्दर्भ के द्वारा ही पत्नी, माँ, बहन व बेटी का दर्जा ही प्राप्त होता है, इसके अतिरिक्त उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं माना जाता।
 आज की नारी चाहे घर की चारदीवारी के भीतर हो या घर से बाहर कार्यक्षेत्र में, शोषण का दबदबा हर जगह कायम होता जा रहा है। दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार किसी सभ्य समाज का उदाहरण प्रस्तुत नहीं करता। इस घिनौनी घटना ने पूरे भारतवर्ष को दहला कर रख दिया। न जाने अभी और कितनी मासूमों की जान ली जाएगी। आज समाज में नारी को बुरी दृष्टि से देखना, छेड़छाड़, यौन-उत्पीडऩ व अपहरण जैसी दर्दनाक घटनाएँ अखबारों व टी.वी. चैनलों पर चर्चा का विषय बनती जा रही हैं। पर क्या कहीं इन बढ़तीं वारदातों को विराम मिल रहा है? दु:ख तो इस बात का है कि नारी- शोषण की असहनीय पीड़ा को मूक साधिका बनकर सहन करने को विवश हो जाती है। कई बार हिम्मत करके वह कानून के कटघरे में इन्साफ के लिए गुहार तो लगाती है परन्तु  पितृसत्तात्मक समाज में कानून व्यवस्था कमजोर होने के कारण अत्याचारी दरिंदे सरेआम रिहा हो जाते हैं और शोषण का अगला इतिहास रचते हैं।
कहीं न कहीं नारी के साथ होने वाले शोषण के पीछे एक बड़ा कारण परिवार में ही लिंग- भेदभाव करना, लड़कियों की पराया धन के रूप में मान्यता इत्यादि मानसिकता भी है। फलस्वरूप उसे वह सारे सुअवसर प्राप्त नहीं होते जिससे उसका बौद्धिक व नैतिक विकास सुचारू रूप से हो सके। आज भी पारिवारिक परिवेश के अन्तर्गत ऐसे कई हजारों उदाहरण मिल जाएँगे जहाँ पुरुष कदम-कदम पर नारी से सहयोग की अपेक्षा करता है जिसके कारण नारी की अपनी खुशियाँ, इच्छायें  और अभिव्यक्तियाँ पारिवारिक कल्याण और सुख शान्ति के नाम पर गौण हो जाती हैं। आज भी आए दिन लड़की के ससुराल वालों की अतृप्त माँगों के पूरे न होने पर विवाहिता को जलाने या आत्महत्या करने की कोशिश जैसी घटनाएँ सुनी- सुनाई जाती हैं परन्तु प्रताडऩा का यह सिलसिला कहीं थमता नज़र नहीं आता। जहाँ आज अत्याचारों से पीडि़त घरेलू नारी की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है वहीं कार्यक्षेत्र में कामकाजी नारी भी शोषण के चक्रव्यूह में फँसी नज़र आ रही है। कई बार कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत भी नारी पुरुष के निर्भीक वर्चस्व, स्वार्थपरता व पितृसत्तात्मक शक्ति के कारण भयावह जीवन व्यतीत करती है। उसे कार्यक्षेत्र में प्रतियोगी, सहयोगी व बॉस जैसे पुरुषों के व्यग्यं- उपहास एवं बदनाम व्यवहार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यदि हम एक नज़र पिछड़े इलाकों और ग्रामीण समाज पर भी डालें तो वहाँ नारी की स्थिति और भी दयनीय है। पिछड़े इलाकों और ग्रामीण समाज में नारी को प्रत्येक क्षेत्र में कमज़ोर मानकर मानसिक रूप से विखंडित किया जाता है। आज भी वहाँ नारी को घर की दासी, विलासिता की वस्तु और सन्तान पैदा करने का यंत्र माना जाता है। नारी को पुरुष के समान स्वतंत्र चिन्तन की छूट नहीं दी जाती है इसका प्रमुख कारण है कि भारतीय समाज कुण्ठाओं और वर्जनाओं से भरपूर समाज है जहाँ आज भी अनेकानेक प्रकार की सामाजिक कुरीतियाँ व रूढिय़ाँ बरकरार है।                
 पितृसत्तात्मक समाज नारी के अधिकारों पर विविध वर्जनाओं व निषेधों का पहरा बिठा चुका है। जहाँ समाज की रूढ़िवादी परम्पराओं से मुक्ति पाना इतना आसान नहीं दिखता। अगर हम आज के पढ़े-लिखे व सभ्य समाज की संकुचित अवधारणा से मुक्ति पाने के लिए शिक्षा को एक मात्र हथियार माने तो वह भी किस हद तक सफल सिद्ध हुआ है? मैं मानती हूँ कि शिक्षा के अभाव में नारी असभ्य, अदक्ष, अयोग्य एवं अप्रगतिशील बन जाती है। परन्तु सच तो यह भी है कि आज सबसे ज्यादा कामकाजी व पढ़ी- लिखी नारी के साथ ही शोषण के हादसे हो रहे हैं। शिक्षित होकर भी नारी खुलेआम प्रताडऩा का शिकार होती है।
हर साल आठ मार्च को 'महिला दिवसकी दुहाई देकर अनेक सम्मेलन , सगोष्ठियाँ व जलसे निकाले जाते हैं। अखबारों व पत्रिकाओं में नारी- विशेषांक निकाले जाते हैं परन्तु समाज की सोच में कितने प्रतिशत परिवर्तन होता है। इसका अन्दाज़ा दिनदहाड़े होने वाली वारदातों से लगाया जा सकता है, चूंकि  सबके पीछे एक बड़ा कारण हमारे समाज की संकीर्ण सोच है और जब तक सोच में बदलाव नहीं आएगा तब तक ऐसे ही शोषण का चक्र अपने भीतर न जाने कितनी नारियों की दासता को समेटता चला जाएगा। हम सिर्फ और सिर्फ कठपुतली बनकर टी.वी. चैनलों, अखबारों व किताबों में वारदातों के किस्से पढ़ते एवं देखते रहेंगें। इसलिए आज आवश्यकता है समाज को अपनी संकीर्ण सोच में बदलाव लाकर एक नया दृष्टिकोण अपनाने की जिससे भारतीय सामाजिक व्यवस्था में भी बदलाव आएगा और नारी अपने समस्त अधिकारों से परिचित होकर समाज व परिवार में सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सकेगी।



लेखक के बारे मेः जन्म- 27 जनवरी, शिक्षा- एमए हिंदी पंजाब विश्वविद्यालय से। मृदुला गर्ग के कथा-साहित्य में नारी-विमर्श पर शोध-कार्य। अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखन व अनुवाद। आकाशवाणी व दूरदर्शन के कार्यक्रमों तथा साहित्य उत्सवों में भागीदारी, हिंदी से पंजाबी तथा पंजाबी से हिंदी अनुवाद। देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं व समाचार-पत्रों में नियमित लेखन।


 संपर्क: मकान नम्बर- 405, गुरूद्वारे के पीछे, दशमेश नगर,खरड़, जिला- मोहाली, पँजाब-140301,फोन नं. 08054617915
Email- arorapreet366@gmail.com

व्यंग्य


सोशल मीडियाई और गॅजेटियाई होली

- रवि रतलामी

दद्दू यादों में खोए थे और अपने पोते मुन्नू को, जो अपने नए नवेले, एकदम ताज़ातरीन स्मार्टफ़ोन, ब्लैकबेरीएक्स 01 को हैक कर उसमें कस्टम रोमइंस्टाल करने की बेतरह कोशिश कर रहा था, अपने बचपन के दिनों में खेली गई होली के बारे में बता रहे थे...
आह! बेटा! वो दिन भी क्या दिन थे! आई मीन, वो होली के दिन भी क्या दिन थे, और क्या रंगीन दिन थे.
महीनों से होली की हुलक मन में रहती थी, और पखवाड़े भर पहले से फाग मंडली के साथ गाने और होली के लिए लकड़ी का जुगाड़ लगाने के साथ अर्धरात्रि जागरण का प्रकल्प पूरा करते फिरते थे. पड़ोसी की परछत्ती और बरसाती से पुराने फर्नीचर को होली की लकड़ी के नाम पर चुराने का अपना मजा रहता था. ये तुम फ्लैट और कवर्डकैंपस में रहने वाले क्या जानो! और, होली जल जाने के बाद भी उसकी आग हफ्तों तक चले ऐसा जुगत लगाते फिरते थे और मन में ये संताप भी यदा कदा आ जाता था कि बाजू मोहल्ले की होली में इस बार जलाया गया लट्ठ बड़ा भारी है जो पंद्रह दिन तक तो सुलगता रहेगा.
और, बेटा! धुलेंडी की तो बात ही मत पूछो. अपने राम को रत्ती भर रंग न लगे, मगर सामने वाले को भीतर तक रंग देने के तमाम मंसूबे हफ़्तों पहले से बनाते थे और उस हिसाब से तैयारी भी पूरे तन-मन-धन, होशो-हवास और जोश-उल्लास से करते थे. ऐसे भरपूर रंगने वालों की सूची में कई दोस्त भी शामिल रहते थे तो कई दुश्मन भी. मिठाई और नमकीन में भाँग मिलाकर खिलाने और फिर उसके मजे लेने के तो मजे ही मजे रहते थे. बेटा! तुम्हें उन दिनों के किस्से डिटेल में सुनाने जाएँ, तो हर होली के किस्से तीन सौ पन्नों में भी न निपटे....
और इधर दद्दू की बात सुनी-अनसुनी करते हुए मुन्नू अपने मोबाइल में कस्टम रोमइंस्टाल करने में सफल हो गया था और अपने दोस्तों को एसएमएस करने तथा फ़ेसबुक में स्टेटस चेंपने के साथ-साथ वो दद्दू की बात काटते हुए बोला -
अरे,दद्दू, रहने भी दो. हमारे भी दिन हैं और क्या रंगीन दिन हैं!
होली की हुलक हमें भी महीनों पहले से होने लगती है.होली के महीने भर पहले से होलियाना कविताओं का दौर तमाम फ़ोरमों और समूहों में चलने लगता है उसका मजा आपके सैकड़ों घंटों के फाग से कई गुना अधिक होता है, उसे आप क्या जानो! ब्लॉग और ट्विटर पर होली-होली खेलने का अपना अलग मज़ा है. फ़ेसबुक-मित्रों, ब्लॉग-प्रशंसकों, ट्विटर-फ़ॉलोअरों के सैकड़ों-हजारों स्टेटस-अपडेटों, ब्लॉगों और ट्वीटों में छपे तमाम अगले-पिछले वर्षों के होली के फोटू और वीडियो देख-देख अपनी होली और रंगीन हो जाती है – ऐसी रंगीन कि सैमसुंग गैलेक्सी के 64 मिलियन कलर भी शरमाजाएँ!.
होली के चार दिन पहले से चार दिन बाद तक ईमेल और एसएमएस-एमएमएस से होली के सैकड़ों-हजारों बधाई संदेश और शुभकामना के संदेश तो दद्दू तुम्हें क्या मिले होंगे कभी. होली के दिन, दिन भर में कभी दस पाँच दोस्तों और उनकी मंडली के बीच होली खेल-खाल लिया होगा, गले-वले मिल लिये होगे, रंग-वंग लगा लिया होगा और बहुत हुआ तो अपने ऑफ़िस या व्यवसाय की बिरादरी में बीस-पच्चीस के साथ हुल्लड़ मस्ती कर ली होगी बस्स. इधर देखो– हम तो होली का ईमेल  संदेश फारवर्ड ही तीन हजार को मारने जा रहे हैं, और फ़ेसबुक में तो हम अपने पूरे पाँच हज्जार फ्रेंड को स्टेटस टिकाएँगे कि देखो हम्मारी होली! ट्विटर में होली-ट्वीट मारेंगे तो बारह हज्जार फ़ॉलोअर हमारे संग ट्विटरियाना होली खेलेंगे. और अभी तो मोबाइल एसएमएस की शुरूआत ही नहीं हुई है. हमने तो इस दफ़ा होली के लिए अनलिमिटेड फ्री टाकटाइम और एसएमएस का प्लान लिया है. बैलेंस खत्म होने की चिंता ही नहीं रहेगी.
और, आप और आपके समय का समाज तो वातावरण, पर्यावरण की चिंता ही नहीं करता था. सैकड़ों टन लकड़ी फालतू आग के हवाले कर देते थे. करोड़ों लीटर पानी रंग में बहा देते थे, जिसे बदन से हटाने के लिए अरबों लीटर पानी की जरूरत होती थी. ऊपर से रंगों की वजह से स्किन की समस्या अलग होती थी. हमें देखो– होली में पूरे दिन अपने बेडरूम में जमे रहकर हम अपने कंप्यूटर और मोबाइल के जरिए अपने मित्रों के फोटुओं में रंग लगाते हैं और शेयर करते हैं. होली का एनीमेटेड फ्लैश वीडियो बना कर और उसे मित्र मंडली में साझा करके प्रतीकात्मक होली जलाते हैं. और, मोबाइल, कंप्यूटर और इंटरनेट से चिपके रहने, फ़ेसबुक में जमे रहने के जैसा नशा तो भाँग की दस गोलियों से भी नहीं आ सकता! और अगर हम भी अपनी पिछली होली की डिटेल बताने लगें तो कंप्यूटर के दस डिस्क भर जाएँ!
मुन्नू की बहुत सी बातें दद्दू के पल्ले नहीं पड़ीं. जैसे दद्दू कला के विद्यार्थी हों और गलती से मुन्नू के विज्ञान की कक्षा में आ गए हों, और इसीलिए झपकियाँ मारने लगे थे.
बहरहाल, यदि आपको ये होलियाना किस्सा पढ़कर झपकी नहीं आई हो तो कृपया बताएं कि दद्दू की होली भली थी कि मुन्नू की है, और, इस बार की आपकी अपनी होली कैसी रहेगी–दद्दूटाइप या मुन्नू टाइप?
संपर्क: रविशंकर श्रीवास्तव, 101, आदित्य एवेन्यू, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462032,
 E-mail- raviratlami@gmail.com

परम्परा

छत्तीसगढ़ में फाग की परम्परा
- जी.के.अवधिया
फागुन महीने में रक्तवर्ण पुष्पों से सुसज्जित पलाश के पत्रविहीन वृक्ष, आम्रमंजरियों से सुशोभित आम्रवृक्ष, पीले मखमल सदृश दृष्टिगत होते सरसों के खेत, गेहूँ की लहलहाती बालियाँ, मादक सुगंध लिए हुए शीतल मंद बयार किसी भी व्यक्ति के रसिक मन को मदमस्त बना देते हैं, रसिकता जाग उठती है, कोमल भावनाएँ उद्दीप्त होने लग जाती हैं और उसके कंठ से अनायास ही स्वरलहरी फूट निकलती है। शायद यही कारण है कि सम्पूर्ण उत्तर भारत में फागुन के महीने में फाग गाने की परम्परा है। इन फाग गीतों में कहीं प्रथम देव गणेश को मनाया जाता है तो कहीं अन्य देवताओं को, कहीं भगवान राम की रामलीला होती है तो कहीं कृष्ण-मुरारी की रासलीला एवं गोपी प्रेम। भक्ति रस और शृंगार रस के अनोखे संगम हैं ये फाग गीत!
फागुन में फाग गीत गाने की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। शायद इस परम्परा का आरंभ तब से हुआ होगा जब से मानव मन के भीतर रसिकता का प्रादुर्भाव हुआ। झांझ, मंजीरे, ढोल, डफ, नगाड़े आदि के ताल धमाल पर गाये जाने वाले फाग गीत अनायास ही पाँवों को थिरकाने लगते हैं और आदमी झूम उठता है।
छत्तीसगढ़ में फाग गीत गाने का आरम्भ वसन्त पंचमी के दिन से ही हो जाता है जो कि रंग पंचमी तक चलते रहता है। पहला फाग शुरू होता है प्रथम पूज्य देव को मनाने से -

गणपति को मनाय प्रथम चरण गणपति को मनाय
एक दंत गज मुख लम्बोदर
सेन्दुर तिलक बरनि ना जाय
प्रथम चरण गणपति को मनाय
माँगत हौं बर दुइ कर जोरे
देहु सिद्धि कछु बुधि अधिकाय
प्रथम चरण गणपति को मनाय
राजीवलोचन के छत्तीसगढ़ के प्रमुख देव होने के कारण गणपति को मनाने के बाद उनका भजन किया जाता है -
भजु राजिम लोचन नाथ हमारे पतित उधारन तुम आए
लोक लोक के भूपति आए
तोरे चरन में सिर नाए
पतित उधारन तुम आए
इत पैरी उत महानदी है
बीच कुलेसर नाथ सुहाए
पतित उधारन तुम आए
फाग गीत में भगवान श्री रामचंद्र जी की रामलीला का भी अनेक प्रकार से वर्णन किया जाता है जैसे कि -
निकल चले दोनों भाई बन को निकल चले दोनों भाई
आगे-आगे राम चलत हैं पीछे लछमन भाई
माँझ-मँझोलन सिया जानकी चित्रकूट बन जाई
बन को निकल चले दोनों भाई
रिमझिम रिमझिम मेघा बरसे पवन चले पुरवाई
कौन बिरिछ तरी ठाढ़े होइहैं राम-लखन दोनों भाई
बन को निकल चले दोनों भाई
राम बिना मोरी सूनी अयोध्या लखन बिना ठकुराई
सीता बिना मोरी सूनी रसोई कौन करे चतुराई?
बन को निकल चले दोनों भाई
माता कौसल्या घर में रोवे बाहर में भरत भाई
राजा दशरथ प्राण तजत हैं कैकेयी पछताई
बन को निकल चले दोनों भाई
रावण मार राम घर आये घर-घर बजत बधाई
माता कौसल्या आरती उतारैं शोभा बरनि ना जाई
बन को निकल चले दोनों भाई
श्री कृष्ण की रासलीला के वर्णनों से तो फाग गीत अँटे पड़े हुए हैं -
कालीदह जाय, कालीदह जाय
छोटे से श्याम कन्हैया
छोटे-मोटे रुखवा कदंब के
भुइयाँ लहसै डार, भुइयाँ लहसै डार
ता पर बइठे कन्हैया
मुख मुरली बजाय, मुख मुरली बजाय
छोटे से श्याम कन्हैया
सब सखियन गोकुल के
दही बेचन जाय, दही बेचन जाय
बीच में मिल गै कन्हैया
दही लुट -लुट खाय, दही लुट- लुट-खाय
छोटे से श्याम कन्हैया
साँखुर खोल गोकुल के
राधा पनिया जाय, राधा पनिया जाय
बीच में मिल गै कन्हैया
गले लियो लिपटाय, गले लियो लिपटाय
छोटे से श्याम कन्हैया
ऐसा नहीं है कि फाग गीत के विषय सिर्फ भक्ति-भाव ही हों, एक फाग में, जिसे बारहमासी के नाम से जाना जाता है, विरहिन की व्यथा का सुन्दर वर्णन किया गया है -
नींद नहिं आवै पिया बिना नींद नहिं आवै
मोहे रहि रहि मदन सतावै पिया बिना नींद नहिं आवै
सखि लागत मास असाढ़ा मोरे प्रान परे अति गाढ़ा
अरे वो तो बादर गरज सुनावै परदेसी पिया नहि आवै
पिया बिना नींद नहिं आवै
सखि सावन मास सुहाना सब सखियाँ हिंडोला ताना
अरे तुम झूलव संगी सहेली मैं तो पिया बिना फिरत अकेली
पिया बिना नींद नहिं आवै
सखि भादों गहन गंभीरा मोरे नैन बहे जल नीरा
अरे मैं तो डूबत हौं मँझधारै मोहे पिया बिना कौन उबारै
पिया बिना नींद नहिं आवै
सखि क्वाँर मदन तन दूना मोरे पिया बिना मंदिर सूना
अरे मैं तो का से कहौं दु:ख रोई मैं तो पिया बिना सेज न सोई
पिया बिना नींद नहिं आवै
सखि कातिक मास देवारी सब दियना अटारी बारी
अरे तुम पहिरौ कुसुम रंग सारी मैं तो पिया बिना फिरत उघारी
पिया बिना नींद नहिं आवै
सखि अगहन अगम अंदेसू मैं तो लिख लिख भेजौं संदेसू
अरे मैं तो नित उठ सुरुज मनावौं परदेसी पिया को बुलावौं
पिया बिना नींद नहिं आवै
सखि पूस जाड़ अधिकाई मोहे पिया बिना सेज ना भाई
अरे मोरे तन मन जोबन छीना परदेसी गवन नहिं कीना
पिया बिना नींद नहिं आवै
सखि माघ आम बौराये चहुँ ओर बसंत बिखराये
अरे वो तो कोयल कूक सुनावै मोरे पापी पिया नहिं आवै
पिया बिना नींद नहिं आवै
सखि फागुन मस्त महीना सब सखियन मंगल कीन्हा
अरे तुम खेलव रंग गुलालै मोहे पिया बिना कौन दुलारै
पिया बिना नींद नहिं आवै
एक फाग में कर्म की गति के बारे कहा है -
गति तुम्हरो नहि जानी रे माधव गति तुम्हरो नहि जानी
सतजुग में हरिश्चन्द्र भये राजा सत्य ही सत्य बखानी
नित उठि दान लेत मरघट में भरत डोम घर पानी
गति तुम्हरो नहि जानी
त्रेता में रावन भये राजा सोने की लंका बनानी
इक लख पुत्र सवा लख नाती कोऊ न लकड़ी लानी
गति तुम्हरो नहि जानी
द्वापर में दुर्योधन राजा छत्र चले अगुवानी
कौरव पाण्डव युद्ध करत भये मिट गया वंश निशानी
गति तुम्हरो नहि जानी
आल्हा-ऊदल की वीरता का बखान करते हुए वीर रस के अनेक फाग हैं।
पहले पूरे एक महीने तक नित्य फाग गाने का प्रचलन था, रात्रि भोजन के पश्चात् लोग एक स्थान पर जुटते थे और घंटों दौर चलता था फाग गाने का। पर आज के व्यस्त जमाने में होली के दो-चार रोज पूर्व से लेकर होली तक ही फाग गाने का रिवाज रह गया है। हो सकता है कि आने वाले कुछ सालों के बाद फाग गाने की परम्परा भी दम तोड़ दे और फाग गीतों को लोग पूरी तरह से भुला बैठें।
संपर्क: अवधिया पारा चौक, पीपल झाड़ के पास रायपुर (छ.ग.)492001, E-mail- gkawadhiya@gmail.com