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Oct 27, 2012

राम-रावण का अपराजेय समर



         दशहरा
 राम-रावण का अपराजेय समर
- परिचय दास
(कवि एवं सचिव, मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली)
 उत्सवों का मौसम है। बिल्कुल कविता की तरह। इसमें कोई शक नहीं कि कविता कल्पतरु है। कविता से जो माँगोगे मिलेगा। कविता एक उत्सव है, जो आपको नित नूतन नवोन्मेषी बनाए रखती है। कविता दशहरा है, जो नौ दिन की आंतरिक तपस्या के बाद आपको सात्विक अवकाश देती है। कविता उत्सव रचती है, तो उत्सव भी कविता की सृष्टि करते हैं। विजयदशमी मात्र एक उत्सव नहीं, कविता है। कविता को 'पाठÓ की तरह लेने वाले उसकी जो व्याख्या करें, विजयदशमी के कुछ मांगलिक 'पाठÓ हैं, जो सदियों से हमें अनुप्राणित किए हुए हैं। 'रह गया राम-रावण का अपराजेय समर’- निराला। राम की लड़ाई हर युग में, हर समय में बनी रहती है, यह निश्चित है। ऐसा हो नहीं सकता कि एक बार आपने रण जीत लिया, तो बात खत्म। रण बना रहता है, जीतने के बाद भी। प्रवृत्तियाँ अमूमन नष्ट नहीं होतीं। उन्हें हटाने का संघर्ष जारी रहता है। यह एक जिद है। बगैर जिद के भी कोई जिंदगी होती है! यह संघर्ष, यह जिद एक निश्चय है। यही 'निश्चयकहलवाता है- 'काल तुझसे होड़ है मेरी।काल की छाती पर सृजन करना ही कविता है, दशहरा है। समय के विरुद्ध सोचना एक बात है, धारा से समांतरित होकर अपने तरह से गतिशील होना दशहरा है।
वर्षों से कवि-लेखक रावण को खलनायक बताते रहे हैं। रावण खलनायक नहीं, प्रतिनायक है। राम की दूसरी ओर बैठा हुआ। आप उससे असहमत हैं, उसकी अनेक प्रवृत्तियाँ ऐसी हैं, जिनसे आपको गुरेज है। आपको स्त्री-हरण, भाई के अपमान, अनेक शक्तियों को स्वकेंद्रित करने की बात तो याद है, लेकिन मृत्यु के समय रावण द्वारा लक्ष्मण को दिया ज्ञान भी आपके स्मरण में है? हमारी परंपरा कीचड़ से भी कमल खिला लेती है। वर्जना से भी हम सृजन कर लेते हैं। इसी परंपरा के कारण धतूरे से भी गुण ले लेते हैं।
विरोधों, विद्वानों के समुच्चय भरे इस कोलाहल में सफेद कुर्ता-पाजामा पहने सफेदपोशों द्वारा रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद के पुतलों को आग लगाने मात्र से उत्सव नहीं आ सकता। बल्कि इन्हें खुद में पहचानना होगा। कोई भी समाज सिर्फ ताकत, पैसे या राज की दबंगई से बेहतर नहीं हो सकता। वह व्यक्ति के बेहतर संबंधों, लोकतांत्रिक स्वभावों, मनुष्य की पक्षधरता के कारण अच्छा होता है। आत्मीयता के तंतु ही उसकी बनावट करते हैं। भीनी- भीनी चदरिया स्नेह के तांत से ही बुनी जानी चाहिए। यदि हमें मुग्ध होना है, तो अपनी मानवीय तकनीक, भाषायी संपन्नता, सांस्कृतिक विविधता पर मुग्ध हों। अपने देश की छह ऋतुओं पर विभोर हों, जो स्वयं ललित निबंध का विषय हैं। भारत समूची पृथ्वी को अपना मानता रहा है। यह 'वसुंधराहै। इसके पास शक्ति की उपासना की एक आंतरिक शक्ति है, जो साधनापूर्वक अर्जित की जाती है, जहाँ नौ दिन अंत:प्रज्ञा व शुद्धि के होते हैं। यह अंतरात्मा के नर्तन से संबद्ध है। गरबा में सिर्फ देह नहीं नाचती, आत्मा भी आलाप लेती है। कहीं प्रेम के कोण उभरते हैं, कहीं कसक का विस्तार है।
दुर्गा के विविध रूप हमारी मनुष्यता के विविध रूप हैं। मातृ, शक्ति, क्षमा आदि अनेक कोणों से उसे हम देख पाते हैं। हम क्षमा को प्रणाम करते हैं, हम शक्ति को प्रणाम करते हैं। प्रणाम करने से यही ताकत हमें वापस मिलती है। हम धरती की तरह क्षमाशील होते हैं। हमारे पास केवल दशरथ के राम नहीं हैं। हमारे पास कबीर के राम भी हैं। हम अपना राम स्वयं बना सकते हैं। राममनोहर लोहिया राम को यों ही अपना पुरखा नहीं कहते थे। शंबूक प्रकरण राम को कोई मोहलत नहीं देता। सीता का वनवास राम को यों ही छोड़ नहीं देता। राम का आकलन हम ही कर सकते हैं, क्योंकि हम एक लोकतांत्रिक समाज हैं। हम आलोचना को घृणा की वस्तु नहीं मानते। समालोचना तो हमारी धमनियों में है। समालोचना का संतुलन हमें विवेक देता है। यही संतुलन हमारे भीतर कुछ रचता है। यही सम्यकता हमारे साहित्य का मेरु है। यही हमें विश्वसनीय बनाता है। उत्सवों के इस मौसम में, जबकि न गरमी है, न सर्दी, जीने का मजा ही कुछ और है। यह मौसम हमें अतिरेक से रोकता है। विचारों के अतिरेक से, दबावों के अतिरेक से, गरमी के अतिरेक से, सर्दी के अतिरेक से -इन सबसे अलग, हम स्वायत्त होकर जी सकते हैं, सोच सकते हैं। यही कल्पनाशील स्वायत्तता इन उत्सव भरे दिनों का प्राण है। हम प्रसन्नता को साझा करें, दुख को भी। यदि दोनों को साझा कर लें, तो वे उत्सव बन जाते हैं। दुख बाँटना भी उत्सव है। हम इन त्योहारों से यह समझ सकते हैं कि अपने का विस्तार करना ही मनुष्यता है। केवल पाना लालच है। देना विस्तार है। यदि लालच ही करना है, तो बड़े होने का लोभ पालें। जो परंपरा व समाज से प्राप्त हो, उसे बाँट दें। सबके भले में ही अपना भला समझना त्योहार है। आज अपने भले पर ही सबका ध्यान केंद्रित है। इससे इतर सारी मनुष्यता को सरस आकृति दीजिए।
उत्सव वृक्ष की तरह होते हैं। उनमें छाया है, शीतलता है। शाखाएँ हैं। ऊपर उठने और आकाश में देखने का माद्दा है। धरती से जुड़े रहना इनकी जड़ों से कोई सीखे। वृक्ष में फूल है, इनमें फल है, इनमें गंध है। इनसे पर्यावरण बनता है। इन पर मैना बैठती है। इन पर कोयल कूकती है। ये हमसे संवाद करते हैं। ये हमारे स्वजन हैं। ये हमारे साथी हैं, कुटुंबी हैं।
मनुष्य का मन दशहरे की तरह उत्सवधर्मी है। बच्चों के लिए बिकने वाला धनुष, गदा वगैरह भी उनके लिए अहिंसक जैसा है। बच्चों ने दशहरे में अस्त्र-शस्त्रों को भी आत्मीय बना लिया है, हिंसाहीन बना लिया है। वे हमें सीख देते हैं। सीख लेना सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें हम झुकते हैं और झुकना हमें विनम्र बनाता है। विनम्रता में हमारी वास्तविक उपस्थिति होती है।
हम स्वयं के अंदर छिपे उत्सव-विरोध को उसी तरह निहारें जैसे अपने अंदर छिपे उत्सव को देखते हैं। आप देखेंगे, उसमें नए-नए संवादी-विसंवादी स्वर मिलते हैं। अपना राम स्वयं सृजित करें, जैसे अपना गति-पथ स्वयं निर्धारित करते हैं। वर्णहीन, सत्ता निरपेक्ष राम। सीता के लिए गद्दी छोडऩे वाले राम। परंपराओं की व्याख्या से लेकर नई परंपराओं के सृजन तक की यात्रा करें। यह एक ऐसा समीकरण होगा, जिसमें शब्द, रूपनिर्मिति व भाषा- तीनों का समंजन होगा।

फिलेटली



सभ्यता, संस्कृति एवं विरासत का प्रतिबिम्ब-

 फिलेटली 
- कृष्ण कुमार यादव

डाक-टिकटों का व्यवस्थित संग्रह अर्थात 'फिलेटलीमानव के लोकप्रिय शौकों में से एक है । 'शौकों का राजाऔर 'राजाओं का शौककहे जाने वाली इस विधा ने आज सामान्य जनजीवन में भी उतनी ही लोकप्रियता प्राप्त कर ली है। सामान्यत: डाक टिकटों का संग्रह ही फिलेटली माना जाता है पर बदलते वक्त के साथ फिलेटली डाक टिकटों, प्रथम दिवस आवरण, विशेष आवरण, पोस्ट मार्क, डाक स्टेशनरी एवं डाक सेवाओं से सम्बन्धित साहित्य का व्यवस्थित संग्रह एवं अध्ययन बन गया है। रंग-बिरंगे डाक टिकटों में निहित सौन्दर्य जहाँ इसका कलात्मक पक्ष है, वहीं इसका व्यवस्थित अध्ययन इसके वैज्ञानिक पक्ष को प्रदर्शित करता है। डाक टिकट संग्रह के सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध संस्मरण भी है कि इंग्लैण्ड के भूतपूर्व सम्राट जार्ज पंचम को किसी डाक टिकट विक्रेता के यहाँ से डाक टिकट खरीदते उनके रिश्तेदार ने देख लिया और इसकी शिकायत उनकी पत्नी महारानी मेरी से की। इसके उत्तर में महारानी मेरी ने कहा -'मुझे पता है कि मेरे पति शौक हेतु डाक टिकट खरीदते हैं और यह अच्छा  भी है, क्योंकि यह शौक उन्हें अन्य बुरी प्रवृतियों से दूर रखता है।नोबेल पुरस्कार प्राप्त प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने कहा था कि 'All Science is either physics or  stamp collecting.'
''फिलेटलीशब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द  'फिलोस  'एटलिया  से हुई। सन् 1864 में 24 वर्षीय फ्रांसीसी व्यक्ति जार्ज हॉर्पिन ने ''फिलेटलीशब्द का इजाद किया। इससे पूर्व इस विधा को ''टिम्बरोलॉजीनाम से जाना  जाता था। फ्रेंच भाषा में टिम्बर का अर्थ टिकट होता है। एडवर्ड लुइन्स पेम्बर्टन को 'साइन्टिफिक फिलेटलीका जनक माना जाता है। सामान्यत: डाक टिकट एक छोटा सा कागज का टुकड़ा दिखता है, पर इसका महत्त्व  और कीमत दोनों ही इससे काफी ज्यादा है। डाक टिकट वास्तव में एक नन्हा राजदूत है, जो विभिन्न देशों का भ्रमण करता है एवम् उन्हें अपनी सभ्यता, संस्कृति और विरासत से अवगत कराता है। यह किसी भी राष्ट्र के लोगों, उनकी आस्था व दर्शन, ऐतिहासिकता, संस्कृति, विरासत एवं उनकी आकांक्षाओं व आशाओं का प्रतीक है। यह मन को मोह लेने वाली जीवन शक्ति से भरपूर है।
फिलेटली अर्थात डाक-टिकटों के संग्रह की भी एक रोचक कहानी है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में यूरोप में एक अंग्रेज महिला को अपने श्रृंगार-कक्ष की दीवारों को डाक टिकटों से सजाने की सूझी और इस हेतु उसने सोलह हजार डाक-टिकट परिचितों से एकत्र किए और शेष हेतु सन् 1841 में  'टाइम्स ऑफ लंदनसमाचार पत्र में विज्ञापन देकर पाठकों से इस्तेमाल किए जा चुके डाक टिकटों को भेजने की प्रार्थना की। तब से डाक-टिकटों का संग्रह एक शौक के रूप में परवान चढ़ता गया। दुनिया में डाक टिकटों का प्रथम एलबम 1862 में फ्रांस में जारी किया गया। आज विश्व में डाक-टिकटों का सबसे बड़ा संग्रह ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के पास है। भारत में भी करीब पचास लाख लोग व्यवस्थित रूप से डाक-टिकटों का संग्रह करते हैं। भारत में डाक टिकट संग्रह को बढ़ावा देने के लिए प्रथम बार सन् 1954 में प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। उसके पश्चात से अनेक राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रदर्शनियों का आयोजन होता रहा है। वस्तुत: इन प्रदर्शनियों के द्वारा जहाँ अनेकों समृद्ध संस्कृतियों वाले भारत राष्ट्र की गौरवशाली  परम्परा को डाक टिकटों के द्वारा चित्रित करके विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सन्देशों को प्रसारित किया जाता है, वहीं  दूसरी तरफ  यह विभिन्न राष्ट्रों के मध्य सद्भावना एवं मित्रता में उत्साहजनक वृद्धि का परिचायक है। इसी परम्परा में भारतीय डाक विभाग द्वारा 1968 में डाक भवन नई दिल्ली में 'राष्ट्रीय फिलेटली संग्रहालयकी स्थापना की और 1969 में मुम्बई में प्रथम फिलेटलिक ब्यूरो की स्थापना की गई। डाक टिकटों के अलावा मिनिएचर शीट, सोवीनियर शीट, स्टैम्प शीटलैट, स्टैम्प बुकलैट, कलैक्टर्स पैक व थीमेटिक पैक के माध्यम से भी डाक टिकट संग्रह को रोचक बनाने का प्रयास किया गया है।
सामान्यत: लोग डाक विभाग द्वारा जारी नियत डाक टिकटों के बारे में ही जानते हैं। ये डाक टिकट विशेष रूप से दिन-प्रतिदिन की डाक-आवश्यकताओं के लिए जारी किए जाते हैं पर इसके अलावा डाक विभाग किसी घटना, संस्थान, विषय-वस्तु, वनस्पति व जीव-जन्तु तथा विभूतियों के स्मरण में भी डाक टिकट जारी करता है, जिन्हें स्मारक/विशेष डाक टिकट कहा जाता है। सामान्यतया ये सीमित संख्या मे मुद्रित किये जाते हैं और फिलेटलिक ब्यूरो/काउन्टर/प्राधिकृत डाकघरों से सीमित अवधि के लिये ही बेचे जाते हैं। नियत डाक टिकटों के विपरीत ये केवल एक बार मुद्रित किये जाते हैं ताकि पूरे विश्व में चल रही प्रथा के अनुसार संग्रहणीय वस्तु के तौर पर इनका मूल्य सुनिश्चित हो सके।
जहाँ नियमित डाक टिकटों की छपाई बार-बार होती है, वहीं स्मारक डाक टिकट सिर्फ  एक बार छपते हैं। यही कारण है कि वक्त बीतने के साथ अपनी दुर्लभता के चलते वे काफी मूल्यवान हो जाते हैं। भारत में सन् 1852 में जारी प्रथम डाक टिकट (आधे आने का सिंदे डाक) की कीमत आज करीब ढाई लाख रुपये आँकी जाती है। कभी-कभी कुछ डाक टिकट डिजाइन में गड़़बड़ी पाये जाने पर बाजार से वापस ले किये जाते हैं, ऐसे में उन दुर्लभ डाक टिकटों को फिलेटलिस्ट मुँहमाँगी रकम पर खरीदने को तैयार होते हैं। विश्व का सबसे मँहगा और दुर्लभतम  डाक-टिकट ब्रिटिश गुयाना द्वारा  सन् 1856 में जारी किया गया एक सेण्ट का डाक-टिकट है। गुलाबी कागज पर काले रंग में छपे, विश्व में एकमात्र उपलब्ध इस डाक-टिकट को ब्रिटिश गुयाना के डेमेरैरा नामक नगर में सन् 1873 में एक अंग्रेज बालक एल.वॉघान ने रद्दी में पाया और छ: शिलिंग मे नील मिककिनॉन नामक संग्रहकर्ता को बेच दिया । अन्तत: कई हाथों से गुजरते हुए इस डाक-टिकट को न्यूयार्क की रॉबर्ट सैगल ऑक्शन गैलेरीज इन्क द्वारा सन् 1981 मे 9,35,000  अमेरिकी डॉलर (लगभग चार करोड़ रुपये) में नीलाम कर दिया गया। खरीददार का नाम अभी भी गुप्त रखा गया है, क्योंकि विश्व के इस दुर्लभतम डाक टिकट हेतु उसकी हत्या भी की जा सकती है। इसी प्रकार भारत  के डाक टिकटों में भी सन् 1854 में जारी चार आने वाले लिथोग्राफ में एक शीट पर महारानी विक्टोरिया का सिर टिकटों में उल्टा छप गया, इस त्रुटि के चलते इसकी कीमत आज पाँच लाख रुपये से भी अधिक है। इस प्रकार के कुल चौदह-पन्द्रह त्रुटिपूर्ण डाक टिकट ही अब उपलब्ध हैं। स्वतन्त्रता के बाद सन् 1948 में महात्मा गाँधी पर डेढ़ आना, साढ़े तीन आना, बारह आना और दस रुपए के मूल्यों में जारी डाक टिकटों पर तत्कालीन गर्वनर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने गवर्नमेण्ट हाउस में सरकारी काम में प्रयुक्त करने हेतु 'सर्विसशब्द छपवा दिया। इन आलोचनाओं के बाद कि किसी की स्मृति में जारी डाक टिकटों के ऊपर 'सर्विसनहीं छापा जाता, उन टिकटों को तुरन्त नष्ट कर दिया गया। पर इन दो-तीन दिनों में जारी सर्विस छपे चार डाक टिकटों के सेट का मूल्य आज तीन लाख रुपये से अधिक है। एक घटनाक्रम में ब्रिटेन के न्यू ब्रेंजविक राज्य के पोस्टमास्टर जनरल ने डाक टिकट पर स्वयं अपना चित्र छपवा दिया। ब्रिटेन में डाक टिकटों पर सिर्फ वहाँ के राजा और रानी के चित्र छपते हैं, ऐसे में तत्कालीन महारानी विक्टोरिया ने यह तथ्य संज्ञान में आते ही डाक टिकटों की छपाई रुकवा दी पर तब तक पचास डाक टिकट जारी होकर बिक चुके थे। फलस्वरूप दुर्लभता के चलते इन डाक टिकटों की कीमत आज लाखों में है।
कई देशों ने तो डाक टिकटों के क्षेत्र में नित नये अनूठे प्रयोग करने की पहल की है। स्विटजरलैण्ड द्वारा जारी एक डाक-टिकट से चॉकलेट की खुशबू आती है तो भूटान ने त्रिआयामी, उभरे हुये रिलीफ टिकट, इस्पात की पतली पन्नियों, रेशम, प्लास्टिक और सोने की चमकदार पन्नियों वाले डाक टिकट भी जारी किये हैं। यही नहीं, भूटान ने सुगन्धित और बोलने वाले (छोटे रिकार्ड के रूप में) डाक टिकट भी निकालकर अपना सिक्का जमाया है। सन् 1996 में विश्व के प्रथम डाक टिकट 'पेनी ब्लैकÓ के सम्मान में भूटान ने 140 न्यू मूल्य वर्ग में 22 कैरेट सोने के घोल के उपयोग वाला डाक टिकट जारी किया था, जो अब दुलर्भ टिकटों की श्रेणी में आता है। 10 अक्टूबर 1985 को भारतीय डाक विभाग ने अपना प्रथम त्रिकोणीय डाक टिकट जारी किया तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की शताब्दी पर 28 दिसम्बर 1985 को एक ऐसा डाक टिकट जारी किया जिसमें कुल 61 विभूतियों  के चित्र अंकित हैं। 20 अगस्त 1991 को भारतीय डाक विभाग ने अब तक का सबसे बड़ा डाक टिकट पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी पर जारी किया। भारतीय डाक विभाग ने 13 दिसम्बर 2006 को चन्दन, 7 फरवरी 2007 को गुलाब और 26 अप्रैल 2008 को जूही की खुशबू वाले सुगंधित डाक टिकट जारी किये हैं, जो कि साल भर तक सुगन्धित रहेंगे। भारत से पहले मात्र चार देशों ने सुगन्धित डाक टिकट जारी किये हैं। इनमें स्विटजरलैण्ड, थाईलैण्ड व न्यूजीलैण्ड ने क्रमश: चाकलेट, गुलाब व जैस्मीन की सुगन्ध वाले डाक टिकट जारी किये हैं तो भूटान ने भी सुगन्धित डाक टिकट जारी किये हैं। एक  रोचक घटनाक्रम में सन् 1965 में एक सोलह वर्षीय किशोर ने गरीबी खत्म करने हेतु अमेरिका के पोस्टमास्टर जनरल को सुझाव भेजा कि कुछ  डाक-टिकट जानबूझ कर गलतियों के साथ छापे जायें और उनको गरीबों को पाँच-पाँच सेण्ट में बेच दिया जाय। ये गरीब इन टिकटों को संग्रहकर्ताओं को  मुँहमाँगी कीमतों पर बेचकर अपना जीवन सुधार सकेंगे। एक ब्रिटिश कहावत भी है- 'फिलेटली टिकट एक ऐसे शेयर की भाँति हैं, जिनके मूल्य में कभी गिरावट नहीं आती वरन् वृद्धि ही होती है।
यदि हम डाक टिकटों के इतिहास का अध्ययन करें तो पेशे से अध्यापक सर रोलैण्ड हिल (1795-1879) को डाक टिकटों का जनक कहा जाता है। जिस समय पत्रों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने का शुल्क तय किया गया और वह गंतव्य पर लिखा जाने लगा तो उन्हीं दिनों इंगलैण्ड के एक स्कूल अध्यापक रोलैण्ड हिल ने देखा कि बहुत से पत्र पाने वालों ने पत्रों को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया और पत्रों का ढेर लगा हुआ है, जिससे कि सरकारी निधि की क्षति हो रही है। यह सब देख कर उन्होंने सन् 1837 में 'पोस्ट आफिस रिफार्मनामक पत्र के माध्यम से बिना दूरी के हिसाब से डाक/टिकटों की दरों में एकरूपता लाने का सुझाव दिया। उन्होंने चिपकाए जाने वाले 'लेबिलकी बिक्री का सुझाव दिया ताकि लोग पत्र भेजने के पहले उसे खरीदे और पत्र पर चिपका कर अपना पत्र भेजें। इन्हीं के सुझाव पर 6 मई 1840 को विश्व का प्रथम डाक टिकट 'पेनी ब्लैकब्रिटेन द्वारा जारी किया गया। भारत में प्रथमत: डाक टिकट 01 जुलाई 1852 को सिन्ध के मुख्य आयुक्त सर बर्टलेफ्र्रोरे द्वारा जारी किए गए। आधे आने के इस टिकट को सिर्फ  सिन्ध राज्य हेतु जारी करने के कारण 'सिंदे डाककहा गया एवं मात्र बम्बई-कराची मार्ग हेतु इसका प्रयोग होता था। सिंदे डाक को एशिया में जारी प्रथम डाक टिकट एवं विश्व स्तर पर जारी प्रथम सर्कुलर डाक टिकट का स्थान प्राप्त है । 01 अक्टूबर 1854 को पूरे भारत हेतु महारानी विक्टोरिया के चित्र वाले डाक टिकट जारी किये गये। 1926  में इण्डिया सिक्यूरिटी प्रेस नासिक में डाक टिकटों की छपाई आरम्भ होने पर 1931 में प्रथम चित्रात्मक डाक टिकट नई दिल्ली के उद्घाटन पर जारी किया गया। 1935 में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम की रजत जयन्ती के अवसर पर प्रथम स्मारक डाक टिकट जारी किया गया। स्वतन्त्रता पश्चात 21 नवम्बर 1947 को प्रथम भारतीय डाक टिकट साढ़े तीन आने का 'जयहिन्दजारी किया गया।  21 फ रवरी 1911 को विश्व की प्रथम एयरमेल सेवा भारत द्वारा इलाहाबाद से नैनी के बीच आरम्भ की गयी। राष्ट्रमण्डल देशों मे भारत पहला देश है जिसने सन् 1929 में हवाई डाक टिकट का विशेष सेट जारी किया।
सभ्यता के बढ़ते कदमों के साथ फिलेटली मात्र एक भौतिक तथ्य नहीं रहा बल्कि आज फिलेटली किसी भी राष्ट्र की सभ्यता, संस्कृति एवं विरासत का प्रतिबिम्ब है। जिसके माध्यम से वहाँ के इतिहास, कला, विज्ञान, व्यक्तित्व, वनस्पति, जीव-जन्तु, राजनयिक सम्बन्ध एवं जनजीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी मिलती है। वर्षों से फिलेटली महत्त्व पूर्ण घटनाओं के विश्वव्यापी प्रसार, महान विभूतियों को सम्मानित करने एवं प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करने हेतु कार्य कर रही है। इसने विभिन्न राष्ट्रों के बीच मैत्री की सेतु तैयार करने के साथ-साथ परस्पर एक दूसरे को समझने में सहायता प्रदान की है और आज भी इस दिशा में यह एक मील का पत्थर है।
फिलेटली को यूँ ही शौकों का राजा नहीं कहा जाता। वस्तुत: यह चीज ही ऐसी है। एक तरफ फिलेटली के माध्यम से अपनी सभ्यता और संस्कृति के गुजरे वक्त को आईने में देखा जा सकता है, वहीं इस नन्हें राजदूत का हाथ पकड़ कर नित नई-नई बातें भी सीखने को मिलती हैं। निश्चितत: आज के व्यस्ततम जीवन एवं प्रतिस्पर्धात्मक युग में फिलेटली से बढ़कर कोई भी रोचक और ज्ञानवद्र्धक शौक नहीं हो सकता। व्यक्तित्व परिमार्जन के साथ-साथ यह ज्ञान के भण्डार में भी वृद्धि  करता है।
संपर्क: निदेशक, डाक सेवाएँ, इलाहाबाद परिक्षेत्र,  इलाहाबाद (उ. प्र.) 211001, मोबाइल-08004928599, Email- kkyadav.y@rediffmail.com

बिखरे मोती


बिखरे मोती
- मुमताज टी. एच. खान
1
देश की छाती
सहती खूब भाले
रोज घोटाले
2
सच्चे ये दोस्त
अनमोल खजाने
नि:स्वार्थ भरे।
3
प्राण- बेटियाँ
घरौंदे ये बसाएँ
लोभी जलाएँ।
4
हृदय दुखी
दुनिया के मेले में
ढूँढ़ता खुशी।
5
काँटों में पला
सब की शोभा बन
सदा गुलाब।
6
फैले उजाला
साथ बाँटेंगे जब
एक निवाला।
7
ममता रोती-
कोई पिरो दे मेरे
बिखरे मोती।
8
देखते आज
सिकुड़ता आँगन
दुखी है फूल।
9
ओ पापी पेट!
और कितनी दूँ मैं
तुझको भेंट।
10
माँ तेरी याद
मन में हर पल
रही है साथ
11
पूस की रातें
माँ की गोद के लिए
दौड़ लगाते।
12
पल वो याद
पिता का अचानक
छूटा था साथ।
13
भैया के साथ
टिफिन था जो बाँटा
भूले न स्वाद।
14
नीम की डाल
न कभी हम भूले
थे जहाँ झूले।
15
रस्सी का झूले
मस्ती की पेंग बढ़ा
खुशी से फूले।
16
गाँव की नदी
थी लहर जो आती
पाँव छू जाती।
17
टूट चुका है
वो प्यारा-सा बसेरा
था जहाँ डेरा।
18
सुख-दुख में
ऐसा निभाया साथ
सदा हैं पास।
संपर्क- द्वारा/ श्री बाबर मिर्जा, 111/2, काँकर टोला,  पुराना शहर, बरेली-243001 फोन- 0581-2520547