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Oct 29, 2011

बदला

- अज्ञेय
अंधेरे डिब्बे में जल्दी- जल्दी सामान ठेल, गोद के आबिद को खिड़की से भीतर सीट पर पटक, बड़ी लड़की जुबैदा को चढ़ा कर सुरैया ने स्वयं भीतर घुस कर गाड़ी के चलने के साथ- साथ लम्बी सांस ले कर पाक परवरदीगार को याद किया ही था कि उसने देखा, डिब्बे के दूसरे कोने में चादर ओढ़े जो दो व्यक्ति आकार बैठे हुए थे, वे अपने मुसलमान भाई नहीं सिख थे! चलती गाड़ी में स्टेशन की बत्तियों से रह- रह कर जो प्रकाश की झलक पड़ती थी, उस में उसे लगा, उन सिखों की स्थिर अपलक आंखों में अमानुषी कुछ है। उन की दृष्टि जैसे उसे देखती है पर उस की काया पर रुकती नहीं, सीधी भेदती हुई चली जाती है, और तेज धार- सा एक अलगाव उनमें है, जिसे कोई छू नहीं सकता, छुएगा तो कट जाएगा! रोशनी इसके लिए काफी नहीं थी, पर सुरैया ने मानो कल्पना की दृष्टि से देखा कि उन आंखों में लाल- लाल डोरे पड़े हैं, और... और... वह डर से सिहर गयी। पर गाड़ी तेज चल रही थी, अब दूसरे डिब्बे में जाना असम्भव था। कूद पडऩा एक उपाय होता, किन्तु उतनी तेज गति में बच्चे- कच्चे लेकर कूदने से किसी दूसरे यात्री द्वारा उठा कर बाहर फेंक दिया जाना क्या बहुत बदत्तर होगा? यह सोचती और ऊपर से झूलती हुई खतरे की चेन के हैंडिल को देखती हुई वह अनिश्चित- सी बैठ गयी... आगे स्टेशन पर देखा जाएगा... एक स्टेशन तक तो कोई खतरा नहीं है कम से कम अभी तक तो कोई वारदात इस हिस्से हुई नहीं...
'आप कहां तक जाएंगी?'
सुरैया चौंकी। बड़ा सिख पूछ रहा था। कितनी भारी उस की आवाज थी! जो शायद दो स्टेशन के बाद उसे मार कर ट्रेन से बाहर फेंक देगा, वह यहां उसे 'आप' कह कर सम्बोधन करे, इस की विडम्बना पर वह सोचती रह गयी और उत्तर में देर हो गयी। सिख ने फिर पूछा, 'आप कितनी दूर जाएंगी?'
सुरैया ने बुरका मुंह से उठा कर पीछे डाल रखा था, सहसा उसे मुंह पर खींचते हुए कहा, 'इटावे जा रही हूं।'
सिख ने क्षण- भर सोच कर कहा, 'साथ कोई नहीं है?'
उस तनिक- सी देर को लक्ष्य करके सुरैया ने सोचा, हिसाब लगा रहा है कि कितना वक्त मिलेगा मुझे मारने के लिए... या रब, अगले स्टेशन पर कोई और सवारियां आ जाएं... और साथ कोई जरूर बताना चाहिए उससे शायद यह डरा रहे! यद्यपि आज- कल के जमाने में वह सफर में साथ क्या जो डिब्बे में साथ न बैठे...कोई छुरा भोंक दे तो अगले स्टेशन तक बैठी रहना कि कोई आ कर खिड़की के सामने खड़ा हो कर पूछेगा, 'किसी चीज की जरूरत तो नहीं...'
उस ने कहा, 'मेरे भाई हैं... दूसरे डिब्बे में...'
आबिद ने चमक कर कहा, 'कहां मां? मामू तो लाहौर गये हुए हैं।'
सुरैया ने उसे बड़ी जोर से डपट कर कहा, 'चुप रह!'
थोड़ी देर बाद सिख ने फिर पूछा 'इटावे में आप के अपने लोग हैं?'
'हां।'
सिख फिर चुप रहा। थोड़ी देर बाद बोला, 'आपके भाई को आप के साथ बैठना चाहिए था, आज- कल के हालात में कोई अपनों से अलग बैठता है?'
सुरैया मन ही मन सोचने लगी कि कहीं कम्बख्त ताड़ तो नहीं गया कि मेरे साथ कोई नहीं है!
सिख ने मानो अपने- आप से ही कहा, 'पर मुसीबत में किसी का कोई नहीं है, सब अपने ही अपने हैं...'
गाड़ी की चाल धीमी हो गयी। छोटा स्टेशन था। सुरैया असमंजस में बैठी थी कि उतरे या बैठी रहे? दो आदमी डिब्बे में और चढ़ आये सुरैया के मन ने तुरन्त कहा, 'हिन्दू' और तब वह सचमुच और भी डर गयी, और थैली- पोटली समेटने लगी।
सिख ने कहा, 'आप क्या उतरेंगी?'
'सोचती हूं भाई के पास जा बैठूं...' क्या जीव है इंसान कि ऐसे मौके पर भी झूठ की टट्टी की आड़ बनाए रखता है...और कितनी झीनी आड़, क्योंकि डिब्बा बदलवाने भाई स्वयं न आता? आता कहां से, हो जब न?...
सिख ने कहा, 'आप बैठी रहिये। यहां आपको कोई डर नहीं है। मैं आप को अपनी बहन समझता हूं और इन्हें अपने बच्चे...आप को अलीगढ़ तक ठीक- ठीक मैं पहुंचा दूंगा। उस से आगे खतरा भी नहीं है, और वहां से आप के भाई- बंधु भी गाड़ी में आ ही जाएंगे।'
एक हिन्दू ने कहा, 'सरदारजी, जाती है तो जाने दो न, आप को क्या?'
सुरैया न सोच पायी कि सिख की बात को, और इस हिन्दू की टिप्पणी को किस अर्थ में ले, पर गाड़ी ने चल कर फैसला कर दिया। वह बैठ गयी।
हिन्दू ने पूछा, 'सरदार जी, आप पंजाब से आये हो?'
'जी।'
'कहां घर है आप का?'
'शेखपुरे में था। अब यहीं समझ लीजिए...'
'यहीं? क्या मतलब?'
'जहां मैं हूं, वही घर है! रेल के डिब्बे का कोना।'
हिन्दू ने स्वर को कुछ संयत कर, जैसा गिलास में थोड़ी- सी हमदर्दी उड़ेल कर सिख की ओर बढ़ाते हुए कहा, 'तब तो आप शरणार्थी हैं...'
सिख ने मानो गिलास को 'जी, मैं नहीं पीता' कह कर ठेलते हुए, एक सूखी हंसी हंस कर कहा, जिसकी अनुगूंज हिन्दू महाशय के कान नहीं पकड़ सके, 'जी।'
हिन्दू महाशय ने तनिक और दिलचस्पी के साथ कहा, 'आपके घर के लोगों पर तो बहुत बुरी बीती होगी...'
सिख की आंखों में एक पल के अंश- भर के लिए अंगार चमक गया, पर वह इस दाने को भी चुगने न बढ़ा। चुप रहा। हिन्दू ने सुरैया की ओर देखते हुए कहा, 'दिल्ली में कुछ लोग बताते थे, वहां उन्होंने क्या- क्या जुल्म किये हैं हिन्दुओं और सिक्खों पर। कैसी- कैसी बातें वे बताते थे, क्या बताऊं, जबान पर लाते शर्म आती है। औरतों को नंगा करके...'
सिख ने अपने पास पोटली बन कर बैठे दूसरे व्यक्ति से कहा, 'काका, तुम ऊपर चढ़ कर सो रहो।' स्पष्ट ही वह सिख का लड़का था, और जब उसने आदेश पा कर उठ कर अपने सोलह- सत्रह बरस के छरहरे बदन को अंगड़ाई में सीधा कर ऊपरी बर्थ की ओर देखा, तब उसकी आंखों में भी पिता की आंखों का प्रतिबिम्ब झलक आया। वह ऊपरी बर्थ पर चढ़ कर लेट गया, नीचे सिख ने अपनी टांगें सीधी की और खिड़की से बाहर की ओर देखने लगा।
हिन्दू महाशय की बात बीच में रुक गयी थी, उन्होंने फिर आरम्भ किया, 'बाप- भाइयों के सामने ही बेटियों- बहनों को नंगा कर के...'
सुरैया ने मानो कल्पना की दृष्टि से देखा कि उन आंखों में लाल- लाल डोरे पड़े हैं, और... और... वह डर से सिहर गयी। पर गाड़ी तेज चल रही थी, अब दूसरे डिब्बे में जाना असम्भव था। कूद पडऩा एक उपाय होता, किन्तु उतनी तेज गति में बच्चे- कच्चे लेकर कूदने से किसी दूसरे यात्री द्वारा उठा कर बाहर फेंक दिया जाना क्या बहुत बदतर होगा?
सिख ने अपने पास पोटली बन कर बैठे दूसरे व्यक्ति से कहा, 'काका, तुम ऊपर चढ़ कर सो रहो।' स्पष्ट ही वह सिख का लड़का था, और जब उसने आदेश पा कर उठ कर अपने सोलह- सत्रह बरस के छरहरे बदन को अंगड़ाई में सीधा कर ऊपरी बर्थ की ओर देखा, तब उसकी आंखों में भी पिता की आंखों का प्रतिबिम्ब झलक आया। वह ऊपरी बर्थ पर चढ़ कर लेट गया, नीचे सिख ने अपनी टांगें सीधी की और खिड़की से बाहर की ओर देखने लगा।
हिन्दू महाशय की बात बीच में रुक गयी थी, उन्होंने फिर आरम्भ किया, 'बाप- भाइयों के सामने ही बेटियों- बहनों को नंगा कर के...'
सिख ने कहा, 'बाबू साहब, हमने जो देखा है वह आप हमीं को क्या बताएंगे...' इस बार वह अनुगूंज पहले से ही स्पष्ट थी, लेकिन हिन्दू महाशय ने अब भी नहीं सुनी। मानो शह पा कर बोले, 'आप ठीक कहते हैं...हम लोग भला आप का दु:ख कैसे समझ सकते हैं! हमदर्दी हम कर सकते हैं, पर हमदर्दी भी कैसी जब दर्द कितना बड़ा है यही न समझ पाएं! भला बताइए, हम कैसे पूरी तरह समझ सकते हैं कि उन सिखों के मन पर क्या बीती होगी जिन की आंखों के सामने उन की बहू- बेटियों को...'
सिख ने संयम से कांपते हुए स्वर में कहा, 'बहू- बेटियां सब की होती हैं, बाबू साहब।'
हिन्दू महाशय तनिक- से अप्रतिभ हुए कि सरदार की बात का ठीक आशय उनकी समझ में नहीं आ रहा। किन्तु अधिक देर तक नहीं बोले, 'अब तो हिन्दू- सिख भी चेते हैं। बदला लेना बुरा है, लेकिन कहां तक कोई सहेगा! इस दिल्ली में तो उन्होंने डट कर मोर्चे लिए हैं, और कहीं कहीं तो ईंट का जवाब पत्थर से देने वाली मसल सच्ची कर दिखाई है। सच पूछो तो इलाज ही यही है। सुना है करोलबाग में किसी मुसलमान डॉक्टर की लड़की को...'
अब की बार सिख की वाणी में कोई अनुगूंज नहीं थी, एक प्रकट और रड़कनेवाली रुखाई थी। बोला, 'बाबू साहब, औरत की बेइज्जती सब के लिए शर्म की बात है। और बहिन...' यहां सिख सुरैया की ओर मुखातिब हुआ, 'आप से माफी मांगता हूं कि आप को यह सुनना पड़ रहा है।'
हिन्दू महाशय ने अचकचा कर कहा, 'क्या- क्या- क्या- क्या? मैंने इनसे कुछ थोड़े ही कहा है?' फिर मानो अपने को कुछ संभालते हुए, और ढिठाई से कहा, 'ये आप के साथ हैं?'
सिख ने और भी रुखाई से कहा, 'जी। अलीगढ़ तक मैं पहुंचा रहा हूं।'
सुरैया के मन में किसी ने कहा, 'यह बेचारा शरीफ आदमी अलीगढ़ जा रहा है! अलीगढ़- अलीगढ़...' उस ने साहस कर पूछा, 'आप अलीगढ़ उतरेंगे?'
'हां।'
'वहां कोई हैं आप के?'
'मेरा कहां कौन है? लड़का तो मेरे साथ है।'
'वहां कैसे जा रहे है? रहेंगे?'
'नहीं, कल लौट आऊंगा।'
'तो...तफरीहन जा रहे हैं!'
'तफरीह!' सिख ने खोये- से स्वर में कहा, 'तफरीह?' फिर संभल कर, 'नहीं, हम कहीं नहीं जा रहे अभी सोच रहे हैं कि कहां जाएं और जब टिकाऊ कुछ न रहे तब चलती गाड़ी में ही कुछ सोचा जा सकता है...'
सुरैया के मन में फिर किसी ने कोंच कर कहा, 'अलीगढ़...अलीगढ़...बेचारा शरीफ है...'
उसने कहा, 'अलीगढ़...अच्छी जगह नहीं है। आप क्यों जाते हैं?'
हिन्दू महाशय ने भी कहा, जैसे किसी पागल पर तरस खा रहे हों, 'भला पूछिए...'
'मुझे क्या अच्छी और क्या बुरी!'
'फिर भी आप को डर नहीं लगता? कोई छुरा ही मार दे रात में...'
सिख ने मुस्करा कर कहा, 'उसे कोई नजात समझ सकता है, यह आप ने कभी सोचा है?'
'कैसी बातें करते हैं आप!'
'और क्या! मारेगा भी कौन? या मुसलमान, या हिन्दू। मुसलमान मारेगा, तो जहां घर के और सब लोग गये हैं, वहीं मैं भी जा मिलूंगा; और अगर हिन्दू मारेगा, तो सोच लूंगा कि यही कसर वाकी थी देश में जो बीमारी फैली है वह अपने शिखर पर पहुंच गयी और अब तन्दुरुस्ती का रास्ता शुरू होगा।'
'मगर भला हिन्दू क्यों मारेगा? हिन्दू लाख बुरा हो, ऐसा काम नहीं करेगा...'
सरदार को एकाएक गुस्सा चढ़ आया, उसने तिरस्कारपूर्वक कहा, 'रहने दीजिए, बाबू साहब! अभी आप ही जैसे रस ले- ले कर दिल्ली की बातें सुना रहे थे अगर आप के पास छुरा होता और आप को अपने लिए खतरा न होता, तो आप क्या अपने साथ बैठी सवारियों को बंख्श देते? इन्हें या मैं बीच में पड़ता तो मुझे?' हिन्दू महाशय कुछ बोलने को हुए पर हाथ के अधिकारपूर्ण इशारे से उन्हें रोकते हुए सरदार कहता गया, 'अब आप सुनना ही चाहते हैं तो सुन लीजिए कान खोल कर। मुझसे आप हमदर्दी दिखाते हैं कि मैं आपका शरणार्थी हूं। हमदर्दी बड़ी चीज है, मैं अपने को निहाल समझता, अगर आप हमदर्दी देने के काबिल होते। लेकिन आप मेरा दर्द कैसे जान सकते हैं, जब आप उसी सांस में दिल्ली की बातें ऐसे बेदर्द ढंग से करते हैं? मुझसे आप हमदर्दी कर सकते होते उतना दिल आप में होता तो जो बातें आप सुनाना चाहते हैं, उनसे शर्म के मारे आपकी जबान बन्द हो गयी होती, सिर नीचा हो गया होता! औरत की बेइज्जती औरत की बेइज्जती है, वह हिन्दू या मुसलमान की नहीं, वह इंसान की मां की बेइज्जती है। शेखपुरे में हमारे साथ जो हुआ सो हुआ मगर मैं जानता हूं कि उसका मैं बदला कभी नहीं ले सकता हूं क्योंकि उसका बदला हो ही नहीं सकता। मैं बदला दे सकता हूं और वह यही, कि मेरे साथ जो हुआ है, वह और किसी के साथ न हो। इसीलिए दिल्ली और अलीगढ़ के बीच इधर और उधर लोगों को पहुंचता हूं, मेरे दिन भी कटते हैं और कुछ बदला चुका भी पाता हूं, और इसी तरह, अगर कोई किसी दिन मार देगा तो बदला पूरा हो जाएगा चाहे मुसलमान मारे, चाहे हिन्दू! मेरा मकसद तो इतना है कि चाहे हिन्दू हो, चाहे सिख हो, चाहे मुसलमान हो, जो मैंने देखा है वह किसी को न देखना पड़े, और मरने से पहले मेरे घर के लोगों की जो गति हुई, वह परमात्मा न करे किसी की बहू- बेटियों को देखनी पड़े।'
इस के बाद बहुत देर तक गाड़ी में बिलकुल सन्नाटा रहा। अलीगढ़ के पहले जब गाड़ी धीमी हुई, तब सुरैया ने बहुत चाहा कि सरदार से शुक्रिया के दो शब्द कह दे, पर उसके मुंह से भी बोल नहीं निकला।
सरदार ने ही आधे उठ कर ऊपर के बर्थ की ओर पुकारा, 'काका, उठो, अलीगढ़ आ गये है।' फिर हिन्दू महाशय की ओर देख कर बोला, 'बाबू साहब, कुछ कड़ी बात कह गया हूं तो माफ करना, हम लोग तो आप की सरन हैं!'
हिन्दू महाशय की मुद्रा से स्पष्ट दिखा कि वहां वह सिख न उतर रहा होता तो स्वयं उतर कर दूसरे डिब्बे में जा बैठते।
***

अज्ञेय का बदला
हिन्दी की यादगार कहानियां शृंखला में इस बार प्रस्तुत है अज्ञेय की विशिष्ट कहानी....। कहानी, कविता, उपन्यास एवं निबंध विधाओं को समृद्ध करने वाले यशस्वी रचनाकार हीरानंद सच्चिदानंद वास्यामन अज्ञेय ने तारसप्तक संपादित कर आने वाले समय के बेहद महत्वपूर्ण कवियों को रेखांकित कर इतिहास रचा, अल्पभाषी अज्ञेय जी वादो विवादों की सीमारेखा से ऊपर उठकर प्रतिभा को पहचानने वाले उदार और अत्यंत गुणी संपादक माने जाते हैं। उन्होंने दिनमान जैसी पत्रिका के माध्यम से समकालीन प्रतिभाओं को मंच दिया। उनसे प्रोत्साहन और संरक्षण पाकर तब से संघर्षशील लेखकों में से अनेकों ने विस्तृत आकाश में उडऩे का हौसला पाया। अरे यायावर रहेगा याद, शेखर एक जीवनी, एक बूंद सहसा उछली, जैसी कृतियों के सर्जक के रूप में चर्चित अज्ञेय की कहानी बदला प्रस्तुत है।
संयोजक- डॉ. परदेशीराम वर्मा, एलआईजी-18, आमदीनगर, हुडको, भिलाईनगर 490009, मो. 9827993494

विजयी मंत्र


- रश्मि प्रभा
मैं नन्हा गाँधी
इस बार कोई सत्याग्रह नहीं करूँगा
अपनी पदयात्रा भी अकेले करूँगा
परायों से युद्ध जटिल होकर भी आसान था
पर अपने घर में ...
बाल सुलभ हठ हर उम्र में एक सुख देता है
पर जब अपने षडय़ंत्र करते हैं
एक दूजे को नीचा दिखाने का
हर संभव प्रयास करते हैं
तो भूख यूँ ही मर जाती है ...
फिर कैसा अनशन
और किससे क्या पाना।
जो मद के गुमां में होते हैं
उनके लिए तो प्रेम ही वर्जित है ...
न घर न देश .... सिर्फ मैं
तो इस मैं का हश्र मैं देखना चाहता हूँ
अपने नन्हें कदमों से वहाँ तक जाना चाहता हूँ
जहाँ 'मैं' स्तब्ध होता है
दिशाएं मौन होती हैं
अपना साया भी पीछे रह जाता है
वहाँ उस सन्नाटे में अपनी हथेली बढ़ाना चाहता हूँ
इस लम्बी यात्रा को वसुधैव कुटुम्बकम्
का विजयी मंत्र देना चाहता हूँ
मैं नन्हा गाँधी
पीछे आने वाली आहटों पर ध्यान लगाए
आज से अपनी यात्रा शुरू करता हूँ
तुम्हारी नजरें जहाँ- जहाँ जाती हैं
वहाँ वहाँ से तुम्हारा आह्वान करता हूँ
याद रखना मैं एक देश हूँ तुम्हारा
कोई पार्टी नहीं ...

Email : rasprabha@gmail.com

गांधी, अंडा और मुर्गा

- विनोद साव
'अब तुमको नवरात्रि पर्व का बहाना मिल गया ... फिर कहोगी उसके बाद दशहरा है, दीवाली है, उसके बाद भाईदूज है... ऐसा करते- करते गांधी पुण्यतिथि आ आएगी।' मैंने गांधीजी की जन्मतिथि से शुरु हुई बात का खात्मा उसकी पुण्यतिथि में करते हुए कहा- 'किसी की पुण्यतिथि में मुर्गा खाने से तो अच्छा है उसकी जन्मतिथि में खाना।'
'लाओ तो झोला देना।' मैंने पत्नी से कहा।
'अब सबेरे- सबेरे झोले की क्या जरूरत आ पड़ी।' उसने बात काटते हुए अपना पत्नी धर्म निभाया।
'पोल्ट्री फार्म से ड्रेस करवाकर मुर्गा लाना है।' मैंने मुर्गे की तरह जोर से बांग लगाई।
'आप भी सब्र नहीं कर सकते। आज ही आपको मुर्गा खाने की सुझी है।' उसने मुर्गी की तरह तुनकते हुए कहा।
'आज संडे है ना। आज मुर्गा नहीं खाएंगे तो क्या लाल भाजी खाएंगे।' मैं उसे लाल भाजी के साथ चना दाल भिगाते देखकर सहम गया। सोचा कि इन बीवियों को आखिर चना दाल से इतना प्रेम क्यों। जब भी सब्जी बनाती है उसमें चना दाल मिलाती हैं। हर भाजी के साथ चना दाल, कुम्हड़ा, कुंदरू, तोरई, लौकी, टिण्डा, जरी सबके साथ चना दाल। मसालेदार सब्जी के साथ चना दाल तो खट्टी सब्जी के साथ चना दाल। ज्यादातर बीवियों का पाकशास्त्र बस चना दाल मिलाने तक सीमित रह गया है।
जल्दी करो... मुझे थैला दो। 'आज का संडे मैं मुर्गा खाकर बिताना चाहता हूं।'
'संडे है तो क्या हुआ। आज गांधी जयंती है और आपको मुर्गा खाने की सूझी है।'
'यार... तुम परेशान मत करो। हरदम कोई न कोई अंडग़ा डालने की कोशिश करती हो।' मैं मुर्गे की तरह गर्दन हिलाकर तनते हुए बोला।
'अंडग़ा मैंने लगाया कि गांधीजी ने।' उसने पंख फडफ़ड़ाती मुर्गी की तरह तुनकते हुए कहा। मैंने उसके अंडग़ा लगाने के धारावाहिक कार्यक्रम की ओर ध्यनाकर्षण करते हुए कहा- 'पिछले संडे मुर्गा लाने की बात मैंने कही थी। तुमने नहीं लाने दिया और कहा था कि पितृपक्ष चल रहा है।'
'ठीक ही तो कहा था- पितृपक्ष में अपने स्वर्गवासी पिता का श्राद्ध खीर पूड़ी की जगह क्या तंदूरी और मुर्गे से करते।'
'लेकिन पिताजी तो मुर्गा खाते थे। अगर मुर्गे से श्राद्ध कर भी देते तो क्या हो जाता।' मैंने अपना पितृप्रेम दिखाया।
'पिताजी मुर्गा तब खाते थे जब इस नर्क में रहते थे और अब वे स्वर्गवासी हो चुके हैं।' पत्नी बोली।
'इस संडे को गांधी जयंती आ गई। ठीक है अब अगले संडे को सही।' मैंने किसी हारे हुए योद्धा की तरह पस्त होते हुए कहा।
'अगला संडे नवरात्रि पर्व है।' उसने किसी पस्त होते योद्धा पर अंतिम और निर्णायक वार करने की मुद्रा में जवाब दिया।
मैं बोखला उठा- 'अब तुमको नवरात्रि पर्व का बहाना मिल गया ... फिर कहोगी उसके बाद दशहरा है, दीवाली है, उसके बाद भाईदूज है... ऐसा करते- करते गांधी पुण्यतिथि आ आएगी।' मैंने गांधीजी की जन्मतिथि से शुरु हुई बात का खात्मा उसकी पुण्यतिथि में करते हुए कहा- 'किसी की पुण्यतिथि में मुर्गा खाने से तो अच्छा है उसकी जन्मतिथि में खाना।' यह विचार आते ही मैं गुनगुना उठा ... हैप्पीऽऽ बर्थ-डे टू यू ऽऽ
'अरे आप समझते क्यों नहीं। ये किसी मामूली आदमी का बर्थडे नहीं है। गांधी का बर्थ-डे है और एक तुम हो कि मुर्गे के पीछे पड़े हो।' पत्नी समझौता करने के लिए तैयार नहीं थी।
'... तो क्या मुर्गी के पीछे पडू। अब किसी मुर्गी के पीछे भागने की उम्र नहीं रही। एक के पीछे पड़ा था तो सात- फेरे लेने पड़े और आज तक मेरे गले में पड़ी को ... को... को... कर रही है। यह सुनकर पत्नी ने 'हट... आप बड़े वो हैं' वाली निगाह से देखा तो मैं मुर्गे की तरह गरम हो उठा। मैंने उसे प्यार से समझाया- 'देखो। तुम हर बार मेरे और मुर्गे के बीच में मत आया करो।' मैंने उसे बताया- 'तुम जानती हो कि हमारे एक दुकानदार मित्र के सुखद दाम्पत्य जीवन का आधार एक मुरगा है।'
'लो... आदमी के सुखद दाम्पत्य जीवन से भला मुर्गे का क्या संबंध।' उसने मुर्गी की तरह टांग अड़ाते हुए कहा।
'संबंध है मेरी जान। क्योंकि उसकी बीवी मुर्गा बहुत अच्छा बनाती है। जिस दिन उसकी बीवी लजीज मुर्गा बनाती है उनके दाम्पत्य संबंध मधुर हो उठते हैं। मुर्गा बनाने में देरी हुई या मुर्गा ठीक नहीं बना तो तनातनी बढ़ जाती है और दोनों के बीच मुर्गा लड़ाई शुरु हो जाती है। मुर्गे के बिना उनकी मेहमाननवाजी पूरी नहीं होती। उनके घर जब कोई मेहमान आता है तो वे मुर्गा कटवाकर स्वागत करते हैं। वे जब किसी के यहां मेहमान बनकर जाते हैं तब वे मुर्गे के लिए किसी को मुर्गा बनाकर ही दम लेते हैं। वे हर त्योहार के दूसरे दिन मुर्गा खाते हैं। उनके घर किसी बच्चे का छठी समारोह या मुंह जुठाई या मुंडन संस्कार हो मामला मुर्गे में ही निपटता है। वह हर शाम दो मील दौड़ लगाते हंै ताकि उन्हें भूख लगे और वे ज्यादा से ज्यादा मुर्गा खा सकें। उनके व्यापारिक जीवन का मुख्य उद्देश्य मुर्गा फंसाना, मुर्गा बनाना और मुर्गा खाना है। वे घर में जैसे मुर्गे की गर्दन हलाल करते हैं... अपनी दुकान में वैसे ही ग्राहकों की जेब हलाल करते हैं।'
'क्या ख्याल है... आज मुर्गा हो ही जाए।' मैंने फिर गुहार लगाई वैसे ही जैसे कोई नेता अपनी पार्टी के पक्ष में लम्बा भाषण देने के बाद केवल वोट मांगता है।
'लेकिन जब सारा राष्ट्र गांधी जी की वर्षगांठ मनाने में लगा है... ऐसे में आप...।' पत्नी अपनी बात पर गांठ बांधे खड़ी थी।
'कौन गांधी?' मेरे इस सवाल से पत्नी ऐसे चौंकी जैसे कोई शरीफ आदमी अचानक किसी के नंगई में उतर जाने पर चौंकता है।
'क्या। तुम कौन गांधी कह रहे हो। एक मुर्गे की बात क्या उठी कि अब तुम गांधीजी को भूलने लग गए। मैं नहीं जानती थी कि तुम इस हद तक नीचे उतर जाओगे। इसलिए ये सब मांस, मछली खाना बंद करो। इससे दिमाग भ्रष्ट होता है। तुम गांधी को भूल गए... मतलब शाकाहार को भूल गए। सत्य- अहिंसा- परमोधर्म: को भूल गए। एक दिन मुझे भी भूल जाओगे। पीने खाने वाले आदमी का क्या भरोसा।' पत्नी रुआंसी हो उठी।
'अरे... अरे... मैंने तो केवल इतना ही पूछा है कि कौन-सा गांधी। इस देश में एक गांधी हो तो कोई कहना माने। यहां तो कई गांधी है और हर गली में गांधीवादी पैदा हो गए है। इनमें कई ऐसे हैं कि जिनके केवल शाकाहारी होने और मांसाहारी नहीं होने में संदेह है। ये सारे देशवासियों को मुर्गा बनाने पर तुले हुए हैं। इनका वश चले तो देश को ही मुर्गमुसल्लम की तरह खा जाएं। अपनी सफेद कलगी के नीचे वाले मुंह से जब भी बांग लगाते है तो राष्ट्र के नाम एक संदेश जारी हो जाता है। जिससे वे जनता से त्याग करने की अपील करते है। अब तुम्हीं बताओ... जनता बपुरी जिसे दो वक्त की दाल- रोटी नसीब होती है उसमें से किसको त्यागे दाल को या रोटी को। त्याग करना चाहिए इन गद्दी पर बैठे मुर्गों को लेकिन ये त्याग की कामना करते है जमीन पर बैठे चूजों से।' मैंने लम्बी हांकी।
'अच्छा बाबा जाओ... मुर्गा तो नहीं लेकिन अंडे लेते आओ।' पत्नी ने रियायत करते हुए मुर्गे के उद्गम स्थल को ही हजम कर जाने का सुझाव दिया।
'तुम भी कमाल करती हो, अंडा खाने को कहती हो लेकिन अंडे से बने मुर्गे को खाने से मना करती हो। क्या यही तुम्हारा गांधीवाद है?'
'बिल्कुल।' पत्नी ने अखबार दिखाते हुए कहा 'यह देखो राष्ट्रीय अंडा उत्पाद निगम का विज्ञापन- संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे। विज्ञापन के साथ यह संदेश भी - 'महात्मा गांधी ने कहा है कि अंडा शाकाहारी पदार्थ है।'
मैं अंडे लेने निकल पड़ा क्योंकि गांधीजी के बहाने पत्नी ने एक बार फिर मुझे मुर्गा बना दिया था। चलो, इस बहाने गांधीजी की बात तो हमने रखी।
संपर्क - मुक्तनगर, दुर्ग 491001 मो. 9407984014 Email- vinod.sao1955@gmail.com

आपको भी पसंद है चॉकलेट आईसक्रीम?


चॉकलेट से बच्चों में ग्लूकोज की मात्रा भी बढ़ जाती है, जो एक तरह से कम उम्र में मधुमेह को न्यौता देने जैसा है। हालांकि सप्ताह में एकाध बार चॉकलेट आईसक्रीम का स्वाद लेने में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन इसकी ज्यादा मात्रा मोटापे और वजन बढऩे के लिए भी जिम्मेदार हो सकती है।
बच्चों को यूं तो आईसक्रीम हर मौसम में अच्छी लगती है, लेकिन गर्मियों में उनके लिए इसका मजा दोगुना हो जाता है। और फिर यदि बात चॉकलेट आइसक्रीम की हो तो कहने ही क्या। लेकिन, विशेषज्ञों की मानें तो इसके फायदे कम नुकसान ज्यादा हैं।
बाल रोग विशेषज्ञ बच्चों की चॉकलेट आईसक्रीम खाने की आदत को उनके लिए खतरनाक मानते हैं।
बाल चिकित्सक डॉ. संजीव सूरी कहते हैं कि चॉकलेट आईसक्रीम की आदत बच्चों में लत का रूप ले लेती है, क्योंकि इसमें कैफीन जैसे रासायनिक तत्व होते हैं, जिससे दिमाग को इसकी आदत पड़ जाती है। ऐसे में बार- बार इसे खाने का मन
करता है।
उन्होंने बताया कि चॉकलेट से बच्चों में ग्लूकोज की मात्रा भी बढ़ जाती है, जो एक तरह से कम उम्र में मधुमेह को न्यौता देने जैसा है। हालांकि सप्ताह में एकाध बार चॉकलेट आईसक्रीम का स्वाद लेने में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन इसकी ज्यादा मात्रा मोटापे और वजन बढऩे के लिए भी जिम्मेदार हो सकती है।
शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. विद्या साहू कहती हैं कि चॉकलेट आईसक्रीम के सेवन से मस्तिष्क की कार्यक्षमता धीमी हो सकती है। इसका अधिक सेवन सिरदर्द का कारण भी बन सकता है। इसमें कृत्रिम चीनी होने की वजह से मोटापा भी बढ़ता है और मधुमेह, रक्तचाप, धमनियों का कड़ा होना जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।
डॉ. विद्या ने बताया कि बच्चों में चॉकलेट आईसक्रीम के ज्यादा सेवन से एकाग्रता न हो पाने की समस्या हो जाती है। इसके अलावा, स्वाद और ताजगी के लिए इसमें मिलाए जाने वाले कई तत्व और रसायन जिगर तथा गुर्दे के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं।
हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर रामेन्द्र सिंह ने कहा कि चॉकलेट खाना सेहत के लिए फायदेमंद कम और नुकसानदायक अधिक होता है। चॉकलेट आईसक्रीम को इससे अलग नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि बहुत ज्यादा तनाव में होने पर थोड़ी चॉकलेट खाना बहुत अच्छा होता है। इससे तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन का स्राव नियंत्रित होता है। मगर तनाव में सिर्फ सादी चॉकलेट ही फायदेमंद होती है। इसमें आइसक्रीम चॉकलेट की कोई भूमिका नहीं होती।
बहरहाल, डॉ. सिंह ने कहा कि स्वाद की वजह से अक्सर बच्चे चॉकलेट आईसक्रीम पसंद करते हैं पर इससे उनको नुकसान हो सकता है। कैफीन तत्व सेहत के लिए हानिकारिक होता है और चॉकलेट आईसक्रीम में कैफीन होता है। जाहिर है कि बच्चों को इससे नुकसान होगा। इसीलिए अभिभावकों को सतर्क रहना चाहिए।

प्रेरक

मिरेकल वूमेन

मेक्सिको में कार्ला फ्लोर्स को 'मिरेकल वूमेन' कहकर पुकारा जाता है और इनकी तस्वीर देखकर आप भी अंदाजा लगा सकते हैं कि क्यों इन्हें 'मिरेकल वूमेन' कहा जाता है।
इनके साथ घटित हुआ हादसा बेहद दर्दनाक था। तीन बच्चों की मां कार्ला सिनोलोआ के कलिआकन में सड़क पर स्ट्रीटफूड बेच रही थी। अचानक एक तेज धमाका हुआ और उनके मुंह से कुछ चीज काफी तेजी से टकराया। कार्ला को उस जगह काफी तेज जलन और दर्द महसूस हुआ। कुछ ही देर में कार्ला बेहोश हो गई। जब कार्ला को होश आया तो उन्होंने खुद को कलिआकन के एक अस्पताल में पाया। डॉक्टरों ने जब उसके चेहरे का एक्स- रे किया तो वे चकित रह गए कि चेहरे में एक जिंदा ग्रेनेड धंसा हुआ था, जो किसी भी वक्त फट सकता था। बमुश्किल सांस ले पा रही कार्ला के जबड़े के बीच फंसे हुए ग्रेनेड को निष्क्रिय किया गया। कई घण्टों की अथक मेहनत और सूझबूझ के बाद डॉक्टर कार्ला को बचाने में कामयाब हो गए। कार्ला ने अपने आधे से अधिक दांतों को खो दिया है, लेकिन उसे खुशी है कि वह जिंदा बच गई।

शांति का नोबेल तीन महिलाओं के नाम

प्रसन्नता की बात है कि इस बार शांति का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से तीन महिलाओं के नाम घोषित किया गया है। तीनों महिलाओं को यह पुरस्कार महिलाओं की सुरक्षा और महिला अधिकारों के लिए उनके अहिंसक संघर्ष के लिए दिया जाएगा। इन तीनों महिलाओं में पहली हैं लाइबेरिया की राष्ट्रपति एलेन जॉन्सन सरलीफ जो लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित अफ्रीका की पहली महिला राष्ट्रपति हैं। उन्होंने लाइबेरिया में शांति स्थापना में, आर्थिक एवं सामाजिक विकास को बढ़ावा देने में, और महिलाओं की स्थिति मजबूत करने में योगदान दिया है।
दूसरी महिला हैं अफ्रीकी सामाजिक कार्यकर्ता लेमाह जीबोवी जिन्होंने लाइबेरिया में लम्बे समय से जारी लड़ाई के अंत के लिए तथा चुनावों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित कराने के लिए सभी जाति एवं धर्म की महिलाओं को संगठित एवं एकजुट किया।
और तीसरी हैं यमन की तवाक्कु ल करमान जिन्होंने यमन में लोकतंत्र एवं शांति तथा महिला अधिकारों के लिए संघर्ष में एक प्रमुख भूमिका निभाई है।
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बाँस की तरह लचीला बनो

जेन गुरु जंगल की पथरीली ढलान पर अपने एक शिष्य के साथ कहीं जा रहे थे शिष्य का पैर फिसल गया और वह लुढ़कने लगा। वह ढलान के किनारे से खाई में गिर ही जाता लेकिन उसके हाथ में बाँस का एक छोटा वृक्ष आ गया और उसने उसे मजबूती से पकड़ लिया बाँस पूरी तरह से मुड़ गया लेकिन न तो जमीन से उखड़ा और न ही टूटा शिष्य ने उसे मजबूती से थाम रखा था और ढलान पर से गुरु ने भी मदद का हाथ बढ़ाया वह सकुशल पुन: मार्ग पर आ गया।
आगे बढ़ते समय गुरु ने शिष्य से पूछा 'तुमने देखा गिरते समय तुमने बाँस को पकड़ लिया था वह बांस पूरा मुड़ गया लेकिन फिर भी उसने तुम्हें सहारा दिया और तुम बच गए।'
'हाँ' शिष्य ने कहा।
गुरु ने बाँस के एक वृक्ष को पकड़कर उसे अपनी ओर खींचा और कहा 'बाँस की भांति बनो' फिर बाँस को छोड़ दिया और वह लचककर अपनी जगह लौट गया।
बलशाली हवाएं बाँसों के झुरमुट को पछाड़ती हैं लेकिन यह आगे- पीछे डोलता हुआ मजबूती से धरती में जमा रहता है और सूर्य की ओर बढ़ता है। वही इसका लक्ष्य है। वही इसकी गति है, इसमें ही उसकी मुक्ति है, तुम्हें भी जीवन में कई बार लगा होगा कि तुम अब टूटे तब टूटे ऐसे कई अवसर आये होंगे जब तुम्हें यह लगने लगा होगा कि अब तुम एक कदम भी आगे नहीं जा सकते अब जीना व्यर्थ है।
'जी ऐसा कई बार हुआ है।' शिष्य बोला
'ऐसा तुम्हें फिर कभी लगे तो इस बाँस की भांति पूरा झुक जाना, लेकिन टूटना नहीं। यह हर तनाव को झेल जाता है, बल्कि यह उसे स्वयं में अवशोषित कर लेता है और उसकी शक्ति का संचार करके पुन: अपनी मूल अवस्था पर लौट जाता है।'
जीवन को भी इतना ही लचीला होना चाहिए।
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