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Nov 27, 2010

झलमला

-पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

मैं अपने कमरे में बैठा जाने क्या सोच रहा था। पास ही कमरे में पड़ोस की कुछ स्त्रियों के साथ दीदी बैठी थीं। कुछ बातें हो रही थीं, इतने में मैंने सुना, दीदी किसी स्त्री से कह रही हैं, 'कुछ भी हो, बहन, मेरी बड़ी बहू घर की लक्ष्मी थी।'
मैं बरामदे में टहल रहा था। इतने में मैंने देखा कि विमला दासी अपने आंचल के नीचे एक प्रदीप लेकर बड़ी भाभी के कमरे की ओर जा रही है। मैंने पूछा, 'क्यों री, यह क्या है ?' वह बोली, 'झलमला।' मैंने फिर पूछा, 'इससे क्या होगा ?' उसने उत्तर दिया, 'नहीं जानते हो बाबू, आज तुम्हारी बड़ी भाभी पंडितजी की बहू की सखी होकर आई हैं। इसीलिए मैं उन्हें झलमला दिखाने जा रही हूं।' तब तो मैं भी किताब फेंककर घर के भीतर दौड़ गया। दीदी से जाकर मैं कहने लगा, 'दीदी, थोड़ा तेल तो दो।' दीदी ने कहा, 'जा, अभी मैं काम में लगी हूं।' मैं निराश होकर अपने कमरे में लौट आया। फिर मैं सोचने लगा- यह अवसर जाने न देना चाहिए, अच्छी दिल्लगी होगी। मैं इधर- उधर देखने लगा। इतने में मेरी दृष्टि एक मोमबत्ती के टुकड़े पर पड़ी। मैंने उसे उठा लिया और एक दियासलाई का बक्स लेकर भाभी के कमरे की ओर गया। मुझे देखकर भाभी ने पूछा, 'कैसे आए, बाबू ?' मैंने बिना उत्तर दिए ही मोमबत्ती के टुकड़े को जलाकर उनके सामने रख दिया।
भाभी ने हंसकर पूछा, 'यह क्या है ?'
मैने गंभीर स्वर में उत्तर दिया, 'झलमला।'
भाभी ने कुछ न कहकर मेरे हाथ पर पांच रुपए रख दिए। मैं कहने लगा, 'भाभी, क्या तुम्हारे प्रेम के आलोक का इतना ही मूल्य है ?'
भाभी ने हंसकर कहा, 'तो कितना चाहिए ?' मैंने कहा, 'कम-से-कम एक गिनी।'
भाभी कहने लगी, 'अच्छा, इस पर लिख दो; मैं अभी देती हूं।'
मैंने तुरंत ही चाकू से मोमबत्ती के टुकड़े पर लिख दिया- मूल्य एक गिनी। भाभी ने गिनी निकालकर मुझे दे दी और मैं अपने कमरे में चला आया। कुछ दिनों बाद, गिनी के खर्च हो जाने पर मैं यह घटना बिलकुल भूल गया।
आठ वर्ष व्यतीत हो गए। मैं बी.ए., एल.एल.बी. होकर इलाहाबाद से घर लौटा। घर की वैसी दशा न थी जैसे आठ वर्ष पहले थी। न भाभी थी और न विमला दासी ही। भाभी हम लोगों को सदा के लिए छोड़कर स्वर्ग चली गई थीं, और विमला कटंगी में खेती करती थी। संध्या का समय था। मैं अपने कमरे में बैठा न जाने क्या सोच रहा था। पास ही कमरे में पड़ोस की कुछ स्त्रियों के साथ दीदी बैठी थीं। कुछ बातें हो रही थीं, इतने में मैंने सुना, दीदी किसी स्त्री से कह रही हैं, 'कुछ भी हो, बहन, मेरी बड़ी बहू घर की लक्ष्मी थी।'
उस स्त्री ने कहा, 'हां बहन ! खूब याद आई, मैं तुमसे पूछने वाली थी। उस दिन तुमने मेरे पास सखी का संदूक भेजा था न ?'
दीदी ने उत्तर दिया, 'हां बहन, बहू कह गई थी कि उसे रोहिणी को दे देना।'
उस स्त्री ने कहा, 'उसमें सब तो ठीक था, पर एक विचित्र बात थी।'
दीदी ने पूछा, 'कैसी विचित्र बात?'
वह कहने लगी, 'उसे मैंने खोलकर एक दिन देखा तो उसमें एक जगह खूब हिफाजत से रेशमी रूमाल में कुछ बंधा हुआ मिला। मैं सोचने लगी, यह क्या है। कौतूहलवश उसे खोलकर मैंने देखा। बहन, कहो तो उसमें भला क्या रहा होगा?'
दीदी ने उत्तर दिया, 'गहना रहा होगा।'
उसने हंसकर कहा, 'नहीं, उसमें गहना न था वह तो एक अधजली मोमबत्ती का टुकड़ा था और उसपर लिखा हुआ था 'मूल्य एक गिनी।'
क्षण भर के लिए मैं ज्ञानशू्न्य हो गया, फिर अपने हृदय के आवेग को न रोककर मैं उस कमरे में घुस पड़ा और चिल्लाकर कहने लगा, 'वह मेरी है; मुझे दे दो।' कुछ स्त्रियां मुझे देखकर भागने लगीं। कुछ इधर- उधर देखने लगीं। उस स्त्री ने अपना सिर ढांकते- ढांकते कहा, 'अच्छा बाबू, मैं कल उसे भेज दूंगी।'
पर मैंने रात को एक दासी भेजकर उस टुकड़े को मंगा लिया। उस दिन मुझसे कुछ नहीं खाया गया।
पूछे जाने पर मैंने कहकर टाल दिया कि सिर में दर्द है। बड़ी देर तक मैं इधर- उधर टहलता रहा। जब सब सोने के लिए चले गए, तब मैं अपने कमरे में आया। मुझे उदास देखकर कमला पूछने लगी, 'सिर का दर्द कैसा है ?' पर मैंने कुछ उत्तर न दिया; चुपचाप जेब से मोमबत्ती को निकालकर जलाया और उसे एक कोने में रख दिया।
कमला ने पूछा, 'यह क्या है ?'
मैंने उत्तर दिया, 'झलमला।'
कमला कुछ न समझ सकी। मैंने देखा कि थोड़ी देर में मेरे झलमले का क्षुद्र आलोक रात्रि के अनंत अंधकार में विलीन हो गया।
झलमला : बख्शी जी की अद्वितीय कहानी
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी छत्तीसगढ़ के पहले हिन्दी साधक हैं जिन्हें राष्ट्रीय ख्याति मिली। सरस्वती जैसी महत्वपूर्ण पत्रिका का उन्होंने संपादन किया। भारत में कला एवं संगीत के तीर्थ स्थल के रूप में विख्यात खैरागढ़ में 1894 में जन्में बख्शी जी की शिक्षा दीक्षा प्रारंभ में खैरागढ़ में ही हुई। पंडित रविशंकर शुक्ल खैरागढ़ में उनके शिक्षक थे। बनारस से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे संस्कृत और अंग्रेजी के शिक्षक भी रहे। कालान्तर में दिग्विजय महाविद्यालय में गजानन माधव मुक्तिबोध के साथ प्राध्यापक हुए।
उन्होंने एमए नहीं किया लेकिन सागर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी लिट् की उपाधि देकर सम्मानित किया। वे हाईस्कूल में पढ़ते थे तभी देवकीनंदन खत्री लिखित चंद्रकांता से कुछ इस तरह जुड़े कि जीवन भर न केवल स्वयं पढ़ते रहे बल्कि बहुतों को उस ग्रंथ के वाचन हेतु उन्होंने उत्प्रेरित किया।
वे मानते थे कि कभी- कभी विशेष युग में साधारण रचना के प्रति भी विज्ञजन अनुराग रखते हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं। पाठक अपनी मानसिक क्षमता के आधार पर ही रस ग्रहण करते हंै। मास्टर जी के रूप में विख्यात बख्शी जी की कहानी झलमला अनोखी कहानी है। बहुतों ने इसे हिन्दी की पहली मौलिक कहानी भी माना है। 1916 में लिखित यह कहानी सरस्वती की हीरक जयंती अंक में प्रकाशित हुई।
बख्शी जी आत्मकथात्मक निबंध लेखन के लिए याद किए जाते हैं। उनके एक निबंध को आधारित कर लोकनाट्य 'कारी' का तानाबाना दाऊ रामचंद्र देशमुख ने बुना। इस मंचीय कृति को पर्याप्त यश मिला। उसी नाम से फिल्म भी बनी। 28 दिसंबर 1971 को रायपुर के डी.के. अस्पताल में बख्शी जी का निधन हुआ। हिन्दी की लोकप्रिय कहानियां में अब तक आप प्रेमचंद की कहानी 'ठाकुर का कुंआ' एवं मुक्तिबोध की कहानी 'ब्रह्मराक्षस का शिष्य' पढ़ चुके हैं। इस अंक में प्रस्तुत है पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की यह चर्चित कहानी झलमला।
संयोजक- डॉ. परदेशीराम वर्मा , एल आई जी-18, आमदीनगर, भिलाई 490009, मोबाइल 9827993494

रिश्वत की पाठशाला

रिश्वत की पाठशाला
-डॉ. अशोक गौतम
आपका लाडला रिश्वत देकर छोटी- मोटी नौकरी पाने के बाद हीनता का शिकार हो। आज देश में माना तेजी से रिश्वत लेने का चलन बढ़ा है पर रिश्वत लेने के ये तरीके बिना पाठ्यक्रम के सुरक्षित नहीं।
हर बच्चे के पिता को ईमानदारी के साथ यह मानकर चलना चाहिए कि जैसे- तैसे उनका बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर भले ही बन जाए लेकिन उसके बाद भी उसके हाथ में रिश्वत लेने का हुनर नहीं हो तो वह आगे परिवार की तो छोडि़ए अपने खर्चे भी पूरे नहीं कर सकता। नतीजा उसके सपने अधूरे रह जाते हैं और वह खुदकुशी की राह पर चल पड़ता है।
हमारे संस्थान ने इसी बात को ध्यान में रख समाज और देश हित में रिश्वत पर विशेष पाठ्यक्रम चलाए हैं ताकि आपका लाडला रिश्वत देकर छोटी- मोटी नौकरी पाने के बाद हीनता का शिकार न हो। आज देश में माना तेजी से रिश्वत लेने का चलन बढ़ा है पर रिश्वत लेने के ये तरीके बिना पाठ्यक्रम के सुरक्षित नहीं। तभी तो जो लोग बिना किसी पाठ्यक्रम के रिश्वत लेने का दुस्साहस कर देश को गौरवान्वित कर भी रहे हैं, देर सबेर पकड़े जा रहे हैं।
इन पाठ्यक्रमों को पूरा करने के बाद तय है कि आपका लाडला उच्च पद पर न रहकर भी रोज शान से वेतन से चार गुणा अधिक रिश्वत लेकर घर आए। हमारे संस्थान के दरवाजे पर कदम भर रखने के बाद ही एक विभाग में तृतीय श्रेणी पर रिश्वत देने के बाद लगे श्री रजत जी का कहना है कि, 'दो साल पहले मैंने नकल मार बोर्ड के आफिस वालों को खिला- पिला कर दसवीं पास की थी, लेकिन उसके बाद मैं किसी ऐसे पाठ्यक्रम की तलाश में था जिसके बल पर मैं अपने असीमित सपनों को पूरा कर सकंू। संस्थानों की सही जानकारी न होने की वजह से मैं दो साल घर में हाथ पर हाथ धरे सपने बुनता रहा। तभी मेरे पापा को मेरे एक खास दोस्त के पापा ने इस संस्थान के बारे में बताया। फिर क्या था, मेरे पापा ने जोड़ तोड़ कर मुझे रिश्वत का सर्टिफिकेट दिलवा दिया और सौभाग्य से इधर पाठ्यक्रम पूरा हुआ और उधर मेरा जुगाड़ भिड़ गया। अब रात को जो सपने देखता हूं अगले दिन बिना किसी डर के उन्हें साकार कर लेता हूं।'
अगर आप भी इसी श्रेणी में शामिल हैं, अगर आप भी चाहते हैं कि आपके पास आपके पद से चार गुना बड़ी कार हो, आपके पास आपके पद से चारगुना बड़ा फ्लैट हो तो आपके लिए हमारे संस्थान द्वारा चलाए जा रहे रिश्वत के विभिन्न पाठ्यक्रमों में से किया रिश्वत का कोई सा भी रोजगार संबंधी पाठ्यक्रम वरदान साबित हो सकता है। हमारा संस्थान देश का एकमात्र ऐसा संस्थान है जो पूरी तरह रिश्वत के विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए
ईमानदारी से समर्पित है। इसके पास पढ़ाने के लिए देश के चुनिंदा अनुभवी रिश्वतखोरों का परिष्कृत स्टाफ है। रिश्वत के क्षेत्र में उनकी अपनी- अपनी दक्षताएं हैं।
यदि आप अपने पद का सदुपयोग कर अथाह धन कमाना और समृद्धि पाना चाहते हैं तो हम आपको दावे के साथ कह सकते हैं कि हमारे संस्थान से किए गए रिश्वत डिप्लोमा से बढ़कर कोई और विकल्प आपके पास नहीं। इसके बारे में हमारी करिअर काउंसलर का कहना है कि 'मेरा तो मानना है कि रिश्वत का पाठ्यक्रम सभी के लिए बहुत आवश्यक है। पढ़े- लिखे तो पढ़े- लिखे अनपढ़ को भी टांगें पसारे सपने देखने का पूरा हक है। रिश्वत लेने का व्यावहारिक ज्ञान न होने की वजह से अनपढ़ तक देश के ऊंचे ओहदों पर काबिज तो हो जाते हैं पर जब मूंछों पर ताव दे रिश्वत लेते हैं तो यों ले बैठते हैं जैसे बाजार में आलू ले रहे हों और नतीजा, दूसरे दिन अखबारों की सुर्खियां बन जाते हैं। असल में ऐसे लोगों को रिश्वत के संबंध में कोई व्यावहारिक शिक्षा या अनुभव नहीं होता।'
यही वजह है कि हमने देश की राजनीति, सरकारी, गैर सरकारी विभागों, उपक्रमों, प्राइवेट क्षेत्र के नौकरी करने वालों के सपनों को ध्यान में रख रिश्वत में कई तरह के लांग टर्म, शार्ट टर्म पाठ्यक्रम इस साल से चलाए जा रहे हैं। हमारे संस्थान से इन सर्टिफिकेट, डिप्लोमा पाठ्यक्रमों को पूरा करने के बाद हम दावे से कह सकते हैं कि कम वेतन पाने वाला भी मजे से अपने सपने पूरे कर सकता है।
जो लोग नौकरी में हैं उनके लिए संस्थान ने पत्राचार कार्यक्रम चलाया है ताकि वे भी इस पाठ्यक्रम के लाभ से वंचित न रहें और देश के विकास में अपने दोनों हाथ सगर्व बंटा सकें। आपको याद दिला दें कि इस पाठ्यक्रम को करने के लिए विभागीय अनुमति की कतई आवश्यकता नहीं। हमारे संस्थान से करवाया जाने वाला रिश्वत का हर पाठ्यक्रम हर सरकार से प्रमाणित है। याद रखिए, रिश्वत लेना भ्रष्टाचार नहीं, लोक व्यवहार है। लोक व्यवहार अपने युग का धर्म होता है। अत: रिश्वत लेने की कला हमसे सीख रिश्वत लीजिए और अपने युग के धर्म का सगर्व पालन कीजिए।
परिचय:
24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गांव में जन्में डॉ अशोक गौतम ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। वे देश के प्रतिष्ठित दैनिक समाचार, पत्र-पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं में निरंतर लिख रहे हैं।
उनका पता है-
गौतम निवास,
अप्पर सेरी रोड,
नजदीक मेन वाटर टैंक,
सोलन-173212 हिमाचल प्रदेश
मोबाइल- 9418070089
ईमेल- a_gautamindia@rediffmail.com

खुशहाली और विकास का काल छत्तीसगढ़

खुशहाली और विकास का काल छत्तीसगढ़
- सुखदेव कोरेटी, प्रकाश पांडेय

किसी क्षेत्र या प्रदेश के लोगों का जीवन स्तर सुधरा है तो इसका अर्थ यही है कि उस क्षेत्र तथा वहां के लोगों का विकास हुआ है। यदि किसी क्षेत्र की जनता खुशहाल है, उनमें संतोष है, भाई चारा है, राज्य में अमन चैन है तो इसका मतलब साफ है कि वहां विकास हुआ है। छत्तीसगढ़ के साथ आज यही बातें लागू हो रही हैं।
दस वर्ष पूर्व 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना से अब तक का काल राज्य में आम जनता की बेहतरी, खुशहाली और विकास का काल कहा जा सकता है। राज्य निर्माण के पूर्व विकास के लिए यह पिछड़ा क्षेत्र देश का 26 वां राज्य, छत्तीसगढ़ के रूप में स्थापित होने के बाद अपनी विशिष्ट उपलब्धियों के कारण न सिर्फ अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में सफल रहा है बल्कि कई क्षेत्रों में देश का अग्रणी राज्य साबित हो रहा है। विशेषकर विगत 7 वर्षों का काल तो जैसे समृद्धि व विकास की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ है।
यदि नक्सली समस्या को छोड़ दिया जाए तो रमन सिंह के मुख्यमंत्रित्व का यह काल राज्य में मानो प्राचीन भारत के गुप्त काल की याद दिलाता है। आज दूसरे प्रांतों से आने वाला हर व्यक्ति छत्तीसगढ़ की खुशहाली व प्रगति की चर्चा करता है। वह यहां के विकास को देखकर 'वाह रमन सिंह-वाह छत्तीसगढ़' कहे बिना नहीं रह पाता।
आज लोगों के बीच बस यही चर्चा है कि राज्य में विगत वर्षों में उल्लेखनीय कार्य हुए हैं, विकास हुए हैं। विकास क्या है ? विकास यानी पहले से बेहतर स्थिति। चाहे वह क्षेत्र शिक्षा का हो या चिकित्सा का, कृषि का हो या उद्योग का या फिर खेल का, महिला सशक्तिकरण की बात हो या पर्यावरण के प्रति जागरूकता की, जीवन स्तर में सुधार की हो या प्रति व्यक्ति आय की।
यदि किसी क्षेत्र या प्रदेश के लोगों का जीवन स्तर सुधरा है तो इसका अर्थ यही है कि उस क्षेत्र तथा वहां के लोगों का विकास हुआ है। यदि किसी क्षेत्र की जनता खुशहाल है, उनमें संतोष है, भाई चारा है, राज्य में अमन चैन है तो इसका मतलब साफ है कि वहां विकास हुआ है। छत्तीसगढ़ के साथ आज यही बातें लागू हो रही हैं। विगत वर्षों में राज्य ने अनेक क्षेत्रों में विकास के नए आयाम स्थापित करने में सफलता पाई है।
वास्तव में छत्तीसगढ़ में हुआ विकास केवल सम्पन्न व समर्थों का विकास नहीं है बल्कि दूर- दराज क्षेत्रों में समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े वंचित व उपेक्षित जनों का विकास है-अनुसूचित जाति, जनजाति व आदिवासियों का विकास है। याने 'सबके साथ सबका विकास'। 'सबके साथ सबका विकास' राज्य सरकार का नारा मात्र नहीं है बल्कि हकीकत में परिणित होता हुआ सपना है जिसे राज्य सरकार ने कभी देखा था। जो उसकी विभिन्न योजनाओं में परिलक्षित होता है।
आम आदमी की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के क्षेत्र में राज्य में प्रशंसनीय कार्य हुए हैं। चाहे वह रोटी, कपड़ा और मकान की बात हो या स्वास्थ्य व शिक्षा में बेहतरी की। खेल सुविधाओं से लेकर रोजगार के अवसर बढ़े हैं। केवल गौरव पथ का निर्माण नहीं हुआ है बल्कि राज्य का गौरव भी बढ़ा है।
शिक्षा का विकास से नजदीकी संबंध है। जहां शिक्षा है वहां विकास है। इस दृष्टि से छत्तीसगढ़ की रफ्तार तेज है चाहे वह स्कूली शिक्षा की बात हो या उच्च शिक्षा की, चिकित्सा शिक्षा की बात हो या तकनीकी शिक्षा की, प्राथमिक शिक्षा की बात हो या माध्यमिक शिक्षा की, बालिका शिक्षा की बात हो या साक्षरता की। राज्य निर्माण के बाद सभी क्षेत्रों में तरक्की हुई है। राज्य निर्माण के पश्चात हजारों स्कूल, आश्रम छात्रावास, कन्या शालाएं खोली गई हैं। प्रत्येक गांव में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था, प्रत्येक 3 कि.मी. में पूर्व माध्यमिक शाला तथा आवश्यकतानुसार हाई व हायर सेकेण्डरी स्कूलों की स्थापना सरकार की प्राथमिकता रही है। फलस्वरूप प्राथमिक कक्षाओं में दर्ज संख्या बढ़ी है। सम्मिलित प्रयासों से राज्य में साक्षरता दर में निरन्तर वृद्धि हुई। स्कूली बालिकाओं को नि:शुल्क कम्प्यूटर शिक्षा प्रदान करने का कार्यक्रम सरकार की महत्वपूर्ण योजना है जिसके तहत वर्ष 2009-2010 में 78,000 छात्राओं को कम्प्यूटर का प्रशिक्षण दिया गया।
बिजली, आधुनिक युग में विकास का एक प्रमुख आधार है, मापदण्ड है। बिजली की आवश्यकता उद्योगों के लिए भी उतनी ही है जितना किसान, विद्यार्थियों व गृहणियों के लिए। राज्य में यदि विद्युत उत्पादन पर्याप्त है, विद्युत की उपलब्धता है तो इसका अर्थ यह माना जायेगा कि राज्य में विकास निरन्तर हो रहा है। उद्योगों तथा किसानों के लिए अनुकूल वातावरण है। एक ओर जहां अन्य प्रदेशों में विद्युत आपूर्ति की स्थिति अत्यंत दयनीय है। इन राज्यों में अनेक क्षेत्रों में दिन-दिनभर तथा अनेक क्षेत्रों में रात में भी विद्युत की आपूर्ति नहीं होती। वहीं छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है जो वर्ष 2008 में ही विद्युत कटौती मुक्त राज्य बन गया है। इतना ही नहीं राज्य में प्रति व्यक्ति विद्युत की खपत बढ़ी है। एक ओर जहां दस वर्ष पूर्व प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 354 यूनिट थी, वर्ष 2009 में बढ़कर 838 यूनिट प्रति व्यक्ति हो गई। इस तरह यहां प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 25 यूनिट राष्ट्रीय स्तर प्रति व्यक्ति खपत से अधिक है। यह राज्य और यहां के रहवासियों के लिए अच्छा संकेत है, संतोष व प्रशंसा का विषय है।
जहां तक स्वास्थ्य सुविधाओं की बात है काफी उपलब्धियां हासिल की है छत्तीसगढ़ ने। इसका एक उदाहरण यह है कि जहां वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ में प्रति हजार शिशु मृत्यु दर 79 थी अब घटकर 57 रह गयी है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत के करीब है। उसी तरह स्वास्थ्य सुविधाओं व बेहतरी के कारण मातृ मृत्यु दर 407 से घटकर 335 रह गई है। राज्य में कुपोषण दर में भी कमी आई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले करीब 10 लाख से अधिक
परिवारों को स्मार्ट कार्ड जारी कर महत्वपूर्ण चिकित्सा सुविधा व बीमारियों से लडऩे के लिए सक्षम बनाने का प्रयास किया गया है।
पीपली लाइव का नत्था छत्तीसगढ़ी जरूर है लेकिन छत्तीसगढ़ में पीपली लाइव जैसे हालात नहीं है। क्योंकि छत्तीसगढ़ देश में सबसे कम 3 प्रतिशत ब्याज दर पर किसानों को ब्याज उपलब्ध कराने वाला पहला राज्य है। 5 हॉर्स पावर तक के प्रदेश के पंपधारी किसानों को एक वर्ष में 6 हजार यूनिट बिजली मुफ्त देने, सिंचाई की कारगर व्यवस्था तथा समर्थन मूल्य पर धान खरीदी के कारण यहां के किसान खुशहाल व समृद्ध हुए हैं।
मुख्यमंत्री खाद्यान्न सहायता योजना राज्य सरकार की अत्यंत महत्वाकांक्षी व कल्याणकारी योजनाओं में से है। जिसके जरिये छत्तीसगढ़ के करीब 36 लाख गरीब परिवारों को 1 व 2 रुपए प्रति किलो की दर से हर माह 35 किलो अनाज तथा 2 किलो नमक मुफ्त दिया जाता है। अब तो जुलाई 2010 से ए.पी.एल. परिवारों को भी क्रमश: 13 व 10 रु. प्रति किलो की दर से हर माह 15-15 किलो चावल व गेहूं उपलब्ध कराया जाता है।
राज्य सरकार की इन योजनाओं के कारण राज्य अब भुखमरी शून्य, राज्य बन गया है। भूख से मुक्ति दिलाने का यह सरकार का भागीरथी प्रयास है।
सकल घरेलू उत्पाद की दृष्टि से विकास दर के मामले में छत्तीसगढ़ ने उड़ीसा, महाराष्ट्र, उत्तराखंड तथा गुजरात जैसे राज्यों को पीछे छोड़ दिया है। केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन के आंकड़ों के अनुसार राज्य का सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 11.49 प्रतिशत है। जबकि वर्ष 09-10 में राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद दर 9.4 प्रतिशत है। यह विकास के प्रति राज्य सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
राज्य सरकार की सर्व जनहितकारी नीतियों व योजनाओं के चलते राज्य में प्रति व्यक्ति आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 10 वर्ष पूर्व जहां प्रति व्यक्ति आय 10,125 रुपए थी वह 2010 में बढ़कर 38,553 रु. हो गई है। यह उल्लेखनीय वृद्धि है। साथ ही राज्य की जनता की बेहतरी का प्रमाण भी।
37वें राष्ट्रीय खेलों के आयोजन तथा इंडिया एवं एशिया रीजन राष्ट्रकुल चतुर्थ संसदीय सम्मेलन जैसे आयोजनों का जिम्मा लेना राज्य के बुलंद हौसले का परिचायक है।

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केले के पेड़ से इको फ्रेंडली हेलमेट
केले के उपयोग से भला कौन नहीं वाकिफ है। केला जितना गुणकारी है उतने ही काम का भी। अब तो केले के पेड़ से कई उपयोगी चीजें भी बनाईं जा सकतीं हैं ।
केरल कोट्टायम के रसायन विज्ञान के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर वी. मैथ्यू ने दावा किया है कि उन्होंने केले के पेड़ के तने और पत्तियों से एक इको- फ्रेंडली हेलमेट, पानी व तेल फिल्टर जैसी कई उपयोगी वस्तुएं बनाई हैं। मैथ्यू पिछले साल ही एक निजी कॉलेज से सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने अपने घर को एक प्रयोगशाला में बदल दिया है, जहां वह और उनके दो इंजीनियर मित्र पिछले आठ सालों से प्रयोग कर रहे हैं। मैथ्यू ने बताया, 'हम केले के तने और पत्तियों को छोटे-छोटे भागों में काटकर उन्हें आपस में मिलाकर और पीसकर उनसे जूस निकालते हैं। इसके बाद इस जूस में एक उत्प्रेरक मिलाया जाता है। फिर इस मिश्रण को गर्म करने के बाद ठंडा होने के लिए रख दिया जाता है। इस तरह एक पेस्ट तैयार हो जाता है, जिससे इको- फ्रेंडली हेलमेट और अन्य वस्तुएं जैसे वाटर- फिल्टर, ऑइल- फिल्टर और एयर- फिल्टर बनाए जा सकते हैं।'
मैथ्यू ने अपने उत्पाद का पेटेंट कराने के लिए आवेदन किया है। वे पेस्ट में मिलाए जाने वाले उत्प्रेरक का नाम नहीं बताते हैं, बल्कि कहते हैं 'यह एक राज है और जब तक हमें पेटेंट नहीं मिल जाता हम इस बारे में खुलासा नहीं करना चाहते।' मैथ्यू द्वारा विकसित किए गए उत्पाद को 'सेल्यूलोज नैनो फाइबर' नाम दिया गया है। 'इस उत्पाद को बनाने के लिए कच्चा पदार्थ केला है और इसकी कोई कमी नहीं होने जा रही है, फल को छोड़कर हम इस पेड़ के हर हिस्से का इस्तेमाल कर सकते हैं। हम देश में और देश से बाहर उद्योगों से संपर्क कर रहे हैं, हमें लगता है कि हमारी खोज का इस्तेमाल होना चाहिए।'

रंग- बिरंगी दुनिया

सबसे नाटा खगेन्द्र पत्नी के हेंडबैग में बैठकर दुनिया की सैर करना चाहता है!
दुनिया के सबसे बौने कद का पुरुष होने का गिनीज विश्व रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके नेपाली युवक की ख्वाहिश लंबी और खूबसूरत लड़की से शादी करने की है। उसका सपना है कि वह अपनी पत्नी के हैंडबैग में बैठकर दुनिया की सैर करे। नेपाल की राजधानी काठमांडू से करीब 125 किलोमीटर दूर स्थित पोखरा का रहने वाला खगेन्द्र थापा मगार आगे चलकर डाक्टर बनने का ख्वाब भी पाले हुए है। खगेन्द्र की 18वीं वर्षगांठ पर दुनिया के सबसे कम कद वाले व्यक्ति के रूप में रिकॉर्ड बुक में दर्ज किया गया है। खगेन्द्र की लम्बाई मात्र 26.4 इंच है। उसने अब तक के सबसे बौने व्यक्ति कोलम्बिया के एडवर्ड निनो हर्नाडीज से बौना होने का खिताब छीन लिया है। हर्नाडीज की लम्बाई 27 इंच है।
खगेन्द्र के पिता रूप बहादुर थापा मगार एक फल विक्रेता हैं। वे अपने पुत्र की 'उपलब्धि' पर बहुत खुश हैं। खगेन्द्र के परिवार वाले काफी पहले से खगेन्द्र को दुनिया का सबसे छोटा इंसान होने का दावा कर रहे थे लेकिन गिनीज बुक में उनका नाम दर्ज करने के लिए उनका 18 साल का होना जरूरी था। गिनीज वल्र्ड रिकॉर्ड के अनुसार वैसे तो दुनिया का सबसे छोटा इंसान भारत में है जिसका नाम गुल मोहम्मद है तथा जिसकी ऊंचाई सिर्फ 22.5 इंच है। लेकिन गुल मोहम्मद सिर्फ रिकॉर्ड धारक के तौर पर अपनी पहचान नहीं बनाना चाहते इसलिए यह खिताब उनके नाम दर्ज नहीं किया गया। अब खगेन्द्र जो दुनिया में सबसे नाटे व्यक्ति के रूप में विख्यात हो गए हैं को नेपाल सरकार ने अगले वर्ष आयोजित होने वाले 'भ्रमण नेपाल वर्ष' के लिए सद्भावना राजदूत नियुक्त किया है। हो सकता है इसी दौरान खगेन्द्र को कोई लंबी और ख्रूबसूरत लड़की मिल जाए जिससे शादी करके वह उसकी जेब में बैठकर दुनिया की सैर कर सके।
अनोखे टॉयलेट्स की अनोखी सैर
क्या कोई सैलानी टॉयलेट्स की सैर करना चाहेगा? आपको कैसा टॉयलेट पसंद है? सुनने में बात कुछ अजीब तो लगती है पर है यह सच। बर्लिन घूमने आने वाले सैलानी टॉयलेट्स की भी सैर करते हैं? बर्लिन में एक यात्रा टॉयलेट्स की सैर के लिए होता है और यह खूब पसंद किया जा रहा है क्योंकि अनोखे टॉयलेट्स की सैर अनोखी है। गाइड अना हासे लोगों को अलग तरह के बर्लिन की सैर कराना चाहती हैं। वह सैलानियों को उन जगहों पर ले जाना चाहती हैं, जहां आमतौर पर लोग नहीं जाते। इसके लिए उन्होंने बर्लिन के सबसे मशहूर टॉयलेट्स को चुना है। इस सैर में दशकों पुराने टॉयलेट्स से लेकर एकदम आधुनिक और तकनीकी टॉयलेट्स शामिल हैं। एक टॉयलेट 19वीं सदी में बनाया गया है, उसकी तकनीक और उसके साफ सफाई का तरीका भी पुराना है लेकिन आज भी चल रहा है। इसी तरह जापान में बना एक ऐसा आधुनिक और ऑटोमेटिक टॉयलेट जिसकी कीमत एक छोटी कार जितनी है? आधुनिक बर्लिन की पहचान बन रहे पोट्सडैमरप्लात्स स्क्वेयर पर मौजूद टॉयलेट भी इस यात्रा का हिस्सा है, जो सबसे आधुनिक तकनीकों पर काम करता है। बर्लिन में आप यह सब देख सकते हैं।
हासे को यह आइडिया 2005 में सालाना इंटरनेशनल टूरिस्ट गाइड डे के मौके पर आया। हासे के अनुसार 'मुझे लगा कि मेरे ज्यादातर सैलानियों को पार्कों और चर्चों में लेकर जाएंगे। लेकिन मैं कुछ अलग करना चाहती हूं। मैं लोगों को बर्लिन में साफ सफाई के इतिहास और टॉयलेट संस्कृति के बारे में बताना चाहती हूं।Ó अपने इस अनोखी यात्रा के जरिए हासे सैलानियों के लिए टॉयलेट्स की कमी की ओर भी ध्यान दिलाना चाहती हैं। वह कहती हैं, 'पहले तो लोग नाक भौं सिकोड़ते हैं, लेकिन जब मैं उन्हें टॉयलेट्स से जुड़ीं अनोखी बातें बताती हूं तो वे हैरान रह जाते हैं।'
दुनिया की सबसे लंबी बिल्ली
अमेरिका के नेवादा में रेनो नाम की इस बिल्ली का नाम गिनीज बुक में दर्ज किया गया है। इस बिल्ली की मालकिन का दावा है कि मेरी रेनो सबसे लंबी घरेलू बिल्ली है। इस बिल्ली की लंबाई 48.5 इंच है।