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Aug 20, 2009

सावन तो फिर भी परेशान करता है जी

सावन तो फिर भी परेशान करता है जी
- आलोक पुराणिक
सावन और मेघों के प्रति सुन्दरियों में सम्मान का भाव नहीं रहा। कई सुन्दरियां आपस में इस तरह की चर्चा करती हैं कि बारिश में मेकअप कितना मुश्किल हो जाता है। कितनी महंगी लिपिस्टिक बारिश में ऐसे ही धुल जाती है। बारिश में सच में बहुत प्रॉब्लम हो जाती है।
कैसा लगता है, आपको सावन में, सावन की बारिश में- मैंने मुम्बई में मिस बाटलीवाला से पूछा।
बैड, वैरी बैड, यू सी, पता है कुछ, बारिश में कितना लोकन टे्रन  कैंसल हो गया, अभी ऑफिस कैसे जाइंगा। एक कैजुअल जाइंगा ना। इकट्ठा कैजुएल रहता, तो इयर एण्ड पर अपुन महाबलेश्वर जाता। सावन-बिवन बौत गड़बड़ करता है- मिस बाटलीवाला एकदम से सावन विरोधी हो गयीं।
पर मिस बाटलीवाला, पुराने टाइम में तो सावन में सुंदरियां अपने साजन को या सम्भावित साजन को याद करती थीं। साजन से सावन चर्चा करती थीं। अब सावन में यह क्यों नहीं होता- मैंने मिसेज बाटलीवाला के सामने फिर जिज्ञासा रखी।
ओह, नो व्हाई। मेरी बायफ्रेंड तो रोज मिलता है, मेरे दफ्तर में ही काम करता है। कायकू याद करना। बौत खडूस है रे वो। अब्बी से मुझ पर रौब जमाता है। कल बोल रहा था कि शादी भले ही दो साल बाद करो, पर नये फ्लैट की आधी किश्त मुझे अभी से देनी पड़ेगी। टुडे इवनिंग इसी पर फाइट करनी है। सावन-बिवन क्या है, मैं तो इस लफड़े से परेशान है। ओह नो, फिर बादल आंगया रे, कैजुएल जायेगा ही।
सावन की बहुत दुर्गति हो गयी है, कैजुएल की चिंता में सावन को कोसा जा रहा है। कैजुएल के हाथों पिटता सावन बहुत दयनीय लग रहा है।
अब कालिदास मेघदूत लिखते, तो उसमें मेघ यह कह रहा होता, हे कालिदास! मुझे तुम कहीं मत भेजो। हे कालिदास! इधर कैसे निष्ठुर बायफ्रेंड हो गये हैं, प्रेमिकाओं को गिफ्ट देने के बजाय उनकी सैलरी में फ्लैट की किश्त धराते हैं। हे कालिदास! क्या जमाना था, जब मुझे देखकर नवयुवक और नवयुवतियां कहीं भ्रमण या पिकनिक का प्रोग्राम बनाते थे। अब सुन्दरियां मुझे देखकर बिग फाइट की सोचती हैं।
हे कालिदास! बारिश, सावन और मेघों के प्रति सुन्दरियों में सम्मान का भाव नहीं रहा। कई सुन्दरियां आपस में इस तरह की चर्चा करती हैं कि बारिश में मेकअप कितना मुश्किल हो जाता है। कितनी महंगी लिपिस्टिक बारिश में ऐसे ही धुल जाती है। बारिश में सच में बहुत प्रॉब्लम हो जाती है। अब जमाने गये पुराने वाले, जब सुन्दरियां मेरा स्वागत करती थीं। अब तो मुझे  देखते ही तमाम सुंदरियां नाना प्रकार की गालियां देने लगती हैं।
ऐसा लगता था कि तमाम सुंदरियों के पास पूरे साल दो ही काम रहते थे। या तो सावन में गाना गाना या फिर गैर-सावनी मौसम में सावन का इंतजार करना। पूरा साल दो भागों में बंट जाता था- सावन का मौसम, सावन के इंतजार का मौसम। पहले बात यह थी कि साजन फुरसत में होते थे। अब देखो, तो सारे कायदे के साजन बहुत बिजी रहते हैं, और क्यों न रहें।
साजन पुरानी कार के कर्जे की किश्त से निपटता भी नहीं है कि नयीं कारें बाजार में आ जाती हैं। इतने तरह के कर्जे हैं, इतनी तरह की किश्तें देनी पड़ती हैं, कि कई साजन दिनभर की नौकरी में बिजी रहने के बाद शाम को भी पार्ट-टाइम नौकरियां तलाशते हैं, हर मौसम में- सावन हो चाहे, बसन्त।
फिर पुराने टाइम के साजन सावन और सुन्दरियों पर कायदे से फोकस रखते थे। था भी पुराने साजनों का काम इतने भर से चल जाता था। एक अनुभवी साजन ने बताया-सारे सीजन एक से हैं, क्या सावन क्या बसन्त। कार, मकान, सोफे, सीडी प्लेयर, फारेन टूर के लोन की किश्तें तो बारहों महीने देनी पड़ती हैं। सावन में क्या खास है जी। क्या सावन में किश्तें नहीं देनी पड़तीं। अगर सावन में किश्तें न देनी पड़ें, तो हम मानें कि सावन सावन है। प्राचीनकाल के साजनों के लिए सावन विशिष्ट तब ही हो पाता था, जब वह किश्त-मुक्त होता था।
और पुराने ग्रंथ पढ़ो, कालिदास, भवभूति, जयदेव के जमाने के, तो...और पुराने ग्रंथ पढ़ो, कालिदास, भवभूति, जयदेव के जमाने के, तो ऐसा लगता है कि उस दौर की तमाम सुन्दरियां भी बहुत फुरसत में होती थीं। इधन सावन आया, उधर वो गाती हुई निकलीं। इधर मामला अलग हो गया है। एक षोडशी सुन्दरी से मैंने पूछा- सुन्दरी सावन के बारे में आपके क्या विचार हैं? उसने जवाब दिया-अभी ट्वेल्थ क्लास के रिजल्ट के बाद परेशान हूं। किसी ढंग के कालेज में एडमीशन नहीं मिला, तो क्या होगा। यू सी, मैं बहुत कनफ्यूज्ड हूं। फैशन डिजाइनिंग करूं के कम्प्यूटर कोर्स।
षोडशी सुन्दरी ने पूछा वैसे, ये सावन-वावन क्या है। हू इज दिस? क्या किसी मंत्री का पीए है। क्या एडमीशन में मेरी हेल्प कर सकता है। क्या सावन कोई कोरियोग्राफर है, जो मेरी हेल्प कर सकता है। नेक्स्ट वीक मुझे उस फैशन शो में कैटवाक करना है। वैसे नाम बहुत फनी है-सावन। बड़ा इथनिक सा नेम है।
एक तीस वर्षीया सुन्दरी से मैंने पूछा कि सावन के बारे में आपके क्या विचार है, तो वह उखड़ गयी। बोली- इधर पूरी दुनिया के बारे में विचार बहुत खराब हैं। मेरा प्रमोशन ड्यू हो गया है, और ये वाला बॉस नहीं दे रहा है। क्या सावन की इस बॉस से कोई सेटिंग है, अगर है, तो सावन के बारे में मेरे बहुत अच्छे विचार हो सकते हैं। बट हू इज दिस सावन। पहले कभी नहीं सुना। अपने दफ्तर में तो नहीं है। पर आप मुझसे सावन के बारे में क्यों पूछ रहे हैं। मैं खाली- पीली में क्यों बताऊं। कल को ये मेरा बॉस बनकर आ गया तो। नो, जी हम तो सेफ चलते है। खराब तो हम उसी को बताते हैं, जिसका पत्ता हमारा ऑफिस से या इस दुनिया से ही साफ हो चुका है। ऐसे किसी से खाली-पीली में क्यों पंगा लेना। पहले सावन के बैकग्राउण्ड के बारे में पूरी जानकारी दो, तब उसके बारे में विचार दूंगी।
एक चालीस वर्षीया खुर्राट लेखिका से मैंने पूछा कि सावन के बारे में आपके क्या विचार है? उन्होंने पूछा- किस गुट का है। अपने गुट का है, तो कहू्गी- सधा हुआ लेखक। विरोधी गुट का है, तो कहूंगी- गधा लेखक और अगर गुट में नहीं है तो, यही कहूंगी कि अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी, क्या पता अपने गुट में आ ही जाये। सावन अगर कोई समीक्षक या सम्पादक है, तो फिर निश्चय ही वो महान है। इसमें पूछने वाली क्या बात है। ये मेरी नयी कविताएं ले जाइए, उसे दे दीजिए।
सावन के बारे में आपके क्या विचार है? अबकी बार मैंने एक थानेदारनी से पूछा।
सावन क्या नया एसपी लगा है, इनके जिले में। कैसा है। खाता है या नहीं। कितना ईमानदार है। इनको वहां के ट्रांसफर तो नहीं कर देगा। भाई साहब बहुत मुश्किल से ये पोस्टिंग मिली है। ऊपर से कहकर पांच लाख खर्च करके यहां आये हैं। अब ये तो सावन की नाइंसाफी ही होगी, जो इन्हें हटा दे।
नहीं, मैं पूछ रहा हूं, सावन के मौसम के बारे में आपके क्या विचार हैं?
देखिए, जी हमारे तो दो ही मौसम हैं। एक, जब बहुत चकचक कमाई होती है। दूसरा मौसम, जब कमाई ढीली हो जाती है। आजकल कमाई कुछ ढीली-सी है। सो मैं तो इसको खराब ही कहूंगी।
सावन के बारे में आपके क्या विचार हैं- मैंने एक ठेकेदार की पत्नी से पूछा।
बहुत खराब, इन दिनों इनकी इमेज चौपट हो जाती है। तमाम अखबार वाले छापते हैं कि फलां ठेकेदार द्वारा बनायी गयी सड़क एक बारिश में गायब। इनके द्वारा बनाया गया पुल दो बारिश में उखड़ा। सावन तो जी हमारा दुश्मन है जैसे। सारे अखबार वाले इनके पीछे पड़ जाते हैं। सच्ची सावन तो हमें परेशान करता है जी। बाहर पानी जोर से बरस रहा है, पर नहीं ये बारिश नहीं है। सावन अपनी इंसल्ट पर रो रहा है।
व्यंग्यकार के बारे में ...
व्यंग्य की पंक्ति में खड़े आलोक पुराणिक चीन्हे जा सकने वालों में फिलहाल अंतिम नाम हैं, और लाइन ना तोड़ते हुए वे पूरी मर्यादा में खड़ें हैं। उनके बाद और भी लोग इस पंक्ति में खड़ें हैं पर उनकी पहचान अभी नहीं बनी है। आलोक पुराणिक की सक्रियता और पहचान को उनकी पत्रकारिता का भी समर्थन मिला है। वे पत्रकारिता की उत्तर आधुनिक परम्परा में खड़े हैं जहां इलेक्ट्रानिक जर्नलिजम और वेब साइट हैं, ब्लाग राइटिंग है जिनमें उनकी संलग्नता उन्हें विशिष्ट स्थान देती है। इन माध्यमों से मुखरित होने वाले और मीडिया विमर्श पर भी कलम चलाने वाले वे फिलहाल अकेले व्यंग्यकार हैं। यह व्यंग्यकार मनोहर श्याम जोशी और सुधीश पचौरी की विरासत है। आलोक पुराणिक की व्यंग्य की भाषा में इन बड़े लेखकों के प्रभाव को देखा जा सकता है पर वे इनके अनुकरण करने के इन्कारी हैं। आलोक विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं में एक साथ लेखन कर रहे हैं। वे टी वी चैनलों से भी जुड़े हैं। उनकी रचनाएं छोटी पर जनरंजक होती हैं। वे युवा हैं और उनकी लेखनी उनके  युवकोचित उत्साह से  तरबतर  हैं। यहां पाठकगण उनकी  प्रस्तुत रचना 'सावन तो फिर भी परेशान करता है जी  में ऐसी ही कुछ तरावट महसूस कर सकते हैं। यह रचना सावन के अन्धों को राह दिखाने का काम भी करती है।  
                                                - विनोद साव
संपर्क- आलोक पुराणिक, फ्लैट नंबर एफ-1 प्लाट नंबर बी-39,
रामप्रस्थ गाजियाबाद- 201011 , www.alokpuranik.com,
मोबाइल: 09810018799, Email- puranika@gmail.com

कथा यूके सम्मान

ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स में आयोजित एक गरिमामय समारोह में हिन्दी के सुपरिचित कलाकार भगवानदास मोरवाल को  उनके नवीनतम उपन्यास 'रेत' (राजकमल प्रकाशन) को ब्रिटेन के सांसद और पूर्व आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री टोनी मैक्नल्टी  ने 15 अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान प्रदान किया गया। ब्रिटेन के हिन्दी लेखकों के लिए स्थापित 'पद्यानंद सम्मान' ब्रिटिश हिन्दी कवि मोहन राणा को उनके ताजा कविता संग्रह 'धूप के अंधेरे में' (सूर्यासेत्र प्रकाशन) के लिए प्रदान किया। इस सम्मान का यह दसवां साल है।
टोनी मैक्नल्टी ने लंदन एवं ब्रिटेन के अन्य क्षेत्रों से बड़ी संख्या में आए एशियाई लेखकों और ब्रिटिश साहित्य प्रेमियों को संबोधित करते हुए कहा कि- भाषा संगीत की तरह होती है। यदि आप किसी दूसरे की भाषा समझते है तो आप जिन्दगी की लय को समझ सकते हैं। दूसरों की भावनाओं को समझ सकते हैं। भाषा में आप सपने रच सकते हैं। इस तरह भाषा के माध्यम से आप मनुष्यता तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने हिन्दी में अपना भाषण शुरु करते हुए कहा कि भाषाओं के माध्यम से हम सभ्याताओं के बीच संवाद स्थापित कर सकते हैं। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि आपकी पहचान होती है। उन्होंने कहा कि कथा यूके पिछले कई वर्षों से ब्रिटेन में बसे एशियाई समुदाय के बीच भाषा और साहित्य के माध्यम से संवाद स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही है।
कथा यूके के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने 15 वर्षों की कथा यात्रा को याद करते हुए कहा कि मुंबई से शुरु हो कर हम ब्रिटेन की संसद तक पहुंचे हैं। अब हम अपनी गतिविधियों को नया विस्तार देना चाहते हैं। कथा यूके आने वाले दिनों में विदेशों में और भारत में हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का आयोजन करने जा रही है। इससे विश्व स्तर पर हो रहे निजि प्रयासों की नई नेटवर्किंग सामने आएगी।
कथा यूके के इस आयोजन में हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, गुजराती एवं अंग्रेजी भाषा के लेखक बड़ी संख्या में शामिल हुए।

विविध रंगी पत्रिका

विविध रंगी पत्रिका
उदंती का मई-जून 2009 अंक मिला। प्रथम स्पर्श में ही  यह प्रकाशन बहुत रोचक व महत्वपूर्ण लगा। साहित्य के अलावा आपने जीवन और समाज से जुड़े अनेक बहुपयोगी विषयों को समाहित करके इस पत्रिका को पठनीय बनाया है। नितिन देसाई का यूनीकोड संबंधी लेख और मुकुंद कौशल के गीत बहुत अच्छे लगे। संपादकीय पारिवारिक संबंधों में जहर! बहुत चिंतनीय है। नए जीवनमूल्यों ने पारिवारिक विघटन की गति को शोचनीय स्थिति में ला खड़ा किया है। इस संदर्भ में समाज को सकारात्मक दिशा में उत्प्रेरित करने वाले लोगों तथा परिस्थितियों को तैयार करने की जरूरत है। विनोद साव का व्यंग्य पर केंद्रित स्तंभ बहुत रोचक है। आपको इतनी विविधरंगी पत्रिका निकालने के लिए बधाई और साधुवाद।               
- कैलाश मण्डेलकर, खण्डवा (मप्र)
मनोरंजक झरोखा 
पत्रिका अपने नाम के अनुरूप साहित्य-संस्कृति के अनेक पहलुओं को मनोरंजक झरोखा प्रस्तुत करती है। इलेक्ट्रानिक मीडिया और प्रिंट मीडिया पर समान रूप से पत्रिका का भविष्य उज्जवल हो यही शुभकामना है।
- राघव चेतन राय,पटपडग़ंज, दिल्ली
यूनीकोड ने दी पहचान 
उदंती के पिछले अंक में प्रकाशित नीतिन जे देसाई के लेख 'यूनीकोड से भारतीय भाषा को मिली विश्व स्तर पर पहचान' को पढ़कर पता चला कि यूनीकोड के प्रयोग से भारतीय भाषाओं की इंटरनेशनल लेवल पर पहचान बनने लगी है। लेख अच्छा लगा और भी ऐसे लेख दें।
- डॉ. जयजयराम आनंद, भोपाल
जहां रैगिंग नहीं होती 
अप्रैल अंक में अनकही के अंतर्गत आपने सही समय पर सही मुद्दा उठाया है। पिछले दिनों एक पुराने मित्र लाल्टू से, जो जाने माने कवि भी हैं, मुलाकात हुई। वे हैदराबाद में ट्रिपल आई टी प्रोफसर हैं। मेरे छोटा बेटा आई आई टी की तैयारी कर रहा है। इस संदर्भ में बात निकली तो उन्होंने बताया कि उनके संस्थान में रैगिंग जैसा कुछ नहीं होता। बल्कि छात्रों को पहले ही साल जीवनविद्या नामक एक कोर्स करवाया जाता है। जिसमें जीवन के विभिन्न तत्वों तथा जीवन मूल्यों का परिचय करवाया जाता है। मुझे लगता है अन्य संस्थानों को इस संस्थान से कुछ सबक लेना चाहिए।
- राजेश उत्साही, बैंगलोर
जूता डे भी मनाएंगे 
अविनाश वाचस्पति के 'जूते की जंग' पर प्रतिक्रिया
फिर देखना, जूते हर महफि़ल की शान बनेगें,
जूतो पर इम्तिहान में प्रश्न भी पूछें जाएंगें,
और साल में एक दिन सब जूता डे भी मनाएंगे।
    - विनोद कुमार पांडेय, बनारस (उत्तर प्रदेश)
खौफ का प्रतीक  
बुराई के खिलाफ अमर्यादित जंग का प्रतीक यह जूता सचमुच आज खौफ का प्रतीक बनता जा रहा है, पर कहीं ना कहीं हमें संयम की आवश्यकता है। और शायद नेताओं को संकेत में अब समझने की भी जरुरत है अन्यथा सवेदनहीनता किसी और स्वरूप में जनता के गुस्से के रूप में प्रगट हो सकती है। बधाई, बेहद शानदार, गद्य के साथ पद्य सा आनन्द।
- राकेश कुमार, rakesh.hirrimine@gmail.com
सदस्यता शुल्क  
उदंती का अंक देखकर खुशी हुई। उसका ठहराव और लिखावट बहुत अच्छी है। फोटोग्राफ भी चुनचुनकर लिये हैं। छत का पानी सालभर रासायनिक या सौर ऊर्जा से संयोजित रखने का तरीका आपको मिला तो जरूर बताना। सदस्यता शुल्क की जानकारी ऐसी जगह दे जहां सबकी नजर पड़ सकें और पत्रिका की सदस्यता लेने की संभावना बढ़ेगी।
- नन्दू अभ्यंकर, sanskrit@cheerful.com

इस अंक के लेखक

डॉ हरि जोशी 
17 नवंबर 1943 ग्राम खूदिया तहसील खिरकिया जिला हरदा में जन्मे मेकेनिकल इंजीनियरिंग के प्राध्यापक डॉ. हरि जोशी ने एम टेक पीएचडी मेकेनिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा के बाद लेखन एवं प्रकाशन। 1959 से हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेखन। पुस्तकें : 2 कविता संग्रह, 13 व्यंग्य संग्रह, 2 उपन्यास- पगडंडियां, महागुरू वर्दी और टोपी टाइम्स। अंग्रजी में 'माइ स्वीट सेवेन्टीन अमेरिका से प्रकाशित व्यंग्य संग्रह तथा ''रिवर एंड अदर पोयम्स', मराठी और अंग्रेजी में कुछ रचनाओं का अनुवाद। मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 'व्यंग्य के रंग' पर 'वागीश्वरी सम्मान'। पता- एमआइजी 377, न्यू सुभाषनगर, रायसेन मार्ग, भोपाल 462023 
रचना गौड़ 'भारती' 
6 मई 1968 राजस्थान कोटा में जन्मी रचना गौड़ एमए, एमजेएमसी हैं। अब तक लगभग 250 कविताएं , 150 शेर, 50 लघुकथाएं, 20 गजल, 25 हाईकु, 15 कहानियां एवं 50 विभिन्न विषयों पर लेखन एवं प्रकाशन। कई वर्षों तक आकाशवाणी कोटा में आकस्मिक कम्पीयर एवं उद्घोषक का कार्य टी.वी. सिटी चेनल कोटा में समाचार वाचन, विभिन्न सरकारी एंव गैर सरकारी कार्यक्रमों में मंच संचालन। पुस्तक- 'आपकी रसोई', पुरुस्कार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता- 2008 में तृतीय पुरस्कार। पता- 'मनस्वी' ए -178, रिद्घि सिद्घि नगर, कुन्हाड़ी, कोटा (राज.) 324008, मो. 94147-46668 फो. 0744-2370001. 
ई मेल- racchu68@yahoo.com, www.rachanabharti.blogspot.com 
भारती परिमल 
13 अगस्त 1970 को जन्मी भारती परिमल हिन्दी में एमए हैं गुजराती स्वास्थ्य पत्रिका आयुष्मान में 7 वर्षों तक अनुवादक एवं संपादन कार्य। पश्चिम मध्य रेलवे समाज कल्याण केन्द्र विद्यालय में तीन वर्ष तक अध्यापन। साहित्यिक अभिरूचि, देशभर की पत्र-पत्रिकाओं में सम- सामियक आलेख एवं कहानियों का प्रकाशन। आकाशवाणी भोपाल में युववाणी में केजुअल कम्पीयर के रूप में कार्य। आकाशवाणी भोपाल से समय-समय पर व्यंग्य वार्ता, कहानी एवं सम-सामियक विषय पर आलेख का प्रसारण। मेहंदी, रंगोली, फ्लॉवर मेकिंग, जूट क्राफ्ट एवं व्यक्तित्व विकास की क्लासेस। पता- 403, भवानी परिसर, इंद्रपुरी, भेल, भोपाल 462022 फोन- 0755 2682258 मो. 099772 76257 
डॉ. वीरेन्द्रसिंह यादव 
शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़े युवा साहित्यकार डॉ.वीरेन्द्रसिंह यादव ने साहित्यिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा पर्यावरर्णीय समस्याओं से सम्बन्धित गतिविधियों को केन्द्र में रखकर अपना सृजन किया है। इसके साथ ही दलित विमर्श के क्षेत्र में 'दलित विकासवाद' की अवधारणा को स्थापित कर उनके सामाजिक, आर्थिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया है। कई लेखों का प्रकाशन राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तर की स्तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। राष्ट्रभाषा महासंघ मुम्बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्व. श्री हरि ठाकुर स्मृति पुरस्कार, बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान 2006, साहित्य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्मान 2008। वर्तमान में भारतीय उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला (हि.प्र.) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियां (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं। पता- वरिष्ठ प्रवक्ता हिन्दी विभाग, दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय उरई- जालौन (उप्र)-285001 मो. 09415924888 
email-virendra_kritika@rediffmail.com 
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जरा सोचें 
मनुष्य इस पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी है। पर जरा सोचें कि एक बेकसूर जीव को मारकर व कष्ट पहुंचाकर वे किस तरह की बुद्धिमत्ता का परिचय देते है?

स्वाइन फ्लू दिमाग से डर निकाल दीजिए

स्वाइन फ्लू दिमाग से डर निकाल दीजिए
मार्च में मैक्सिको में शुरू हुआ स्वाइन फ्लू धीमे - धीमे भारत को अपनी चपेट में लेता जा रहा है। मगर फ्लू से डरने के बजाय जरूरत इसके लक्षणों के बारे में जानने और सावधानी बरतने की है। इस बीमारी से लडऩे के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है दिमाग से डर को निकालना। क्या है एच 1 एन 1 स्वाइन फ्लू इनफ्लुएंजा स्वाइन फ्लू श्वसन तंत्र से जुड़ी एक बीमारी है, जो ए टाइप के इनफ्लुएंजा वायरस से होती है। यह वायरस एच 1 एन 1 के नाम से जाना जाता है। कैसे फैलता है स्वाइन फ्लू जब आप खांसते या छींकते हैं तो हवा में या जमीन पर या जिस भी सतह पर थूक, या मुंह और नाक से निकले द्रव कण गिरते हैं, वह वायरस की चपेट में आ जाता है। ये कण हवा के द्वारा या किसी के छूने से दूसरे व्यक्ति के शरीर में मुंह या नाक के जरिए प्रवेश कर जाते हैं। मसलन, दरवाजे, फोन, की बोर्ड या रिमोट कंट्रोल के जरिए भी ये वायरस फैल सकते हैं, अगर इन चीजों का इस्तेमाल किसी संक्रमित व्यक्ति ने किया है। लक्षण बुखार, बहुत तेज जुकाम, जिसमें नाक से पानी बहता रहता है और गले में खराश, डायरिया, लगातार उबकाई महसूस होना या उलटी होना, सुस्ती और भूख न लगना, कफ और इस वजह से सांस लेने में तकलीफ। कौन रहे ज्यादा सावधान 5 साल से कम उम्र के बच्चे, 65 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं, इसके अलावा जिन लोगों को फेफड़ों, किडनी या दिल से जुड़ी बीमारी, मस्तिष्क संबंधी (न्यूरोलॉजिकल)बीमारी मसलन, पर्किन्सन, कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग- डायबीटीज के रोगी, ऐसे लोग जिनको पिछले 3 साल में कभी भी अस्थमा की शिकायत रही हो या अब भी हो। संदिग्ध मरीजों को सलाह घर में बाकी लोगों से दूर रहें, घर से बाहर न निकलें, मरीज और उसके संपर्क में आने वाले सभी लोग मास्क पहनें, आराम करें और लिक्विड चीजें ज्यादा लें, डॉक्टर की सलाह के मुताबिक दवा आदि लें। स्वाइन फ्लू न हो, इसके लिए क्या करें - बुखार, सर्दी, खांसी और नाक बहने जैसे लक्षण दिखते हैं तो फौरन हॉस्पिटल जाएं। - बीमारी के बाद के पहले तीन दिन काफी महत्वपूर्ण होते हैं। इसी स्टेज पर इलाज शुरू हो जाए तो मरीज के ठीक होने की 100 फीसदी गारंटी रहती है। - मरीज हर समय मास्क पहन कर रखें। - मरीज को खांसते या छींकते समय हमेशा रूमाल का इस्तेमाल करना चाहिए। - मरीज को अच्छी तरह हवादार कमरे में रखें। - वह आराम करे और खुले में न तो थूके, न खांसे और न ही छींके। - अच्छा और न्यूट्रीशियस फूड लें और बाहर और दूसरे के संपर्क में न जाएं। - मरीज को घर के ऐसे कॉमन एरिया में न जाने दें, जहां परिवार के दूसरे सदस्य रहते हैं। - कोशिश करें कि मरीज रूम में अकेला ही सोए। अगर ऐसा नहीं हो सकता है तो ध्यान रखें कि मरीज और रूम शेयर करने वाले दूसरे आदमी का मुंह सोते समय विपरीत दिशा में हो। - अगर मास्क उपलब्ध न हो तो साफ कपड़े के टुकड़े, रूमाल या टिश्यू पेपर से मुंह और नाक को पूरी तरह ढक कर रखें। - इस्तेमाल किए गए मास्क, टिश्यू पेपर आदि को ढक्कनदार और पॉलीथीन से कवर्ड डस्टबिन में ही फेंकें। - अपने हाथ बार- बार साबुन या किसी और हैंडवॉश से साफ करें। कुछ और सावधानियां एक ब्रिटिश स्टडी के मुताबिक 12 साल से कम उम्र के बच्चों को टैमीफ्लू दवा देते समय इसके साइड इफेक्ट्स के बारे में सतर्क रहना चाहिए। स्वाइन फ्लू की गलत डोज लेने से किडनी को नुकसान पहुंच सकता है। 
 मास्क - सिर्फ ट्रिपल लेयर और एन 95 मास्क ही वायरस से बचाव में कारगर हैं। - सिंगल लेयर मास्क की 20 परतें लगाकर भी बचाव नहीं हो सकता है। स्वाइन फ्लू के लिए दो तरह के मास्क हैं। 1. थ्री लेयर सर्जिकल मास्क 2. एन- 95 कितनी देर करता है काम - स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए सामान्य मास्क बिल्कुल कारगर नहीं होता है। लेकिन थ्री लेयर सर्जिकल मास्क को चार घंटे तक और एन- 95 मास्क को आठ घंटे तक लगाकर रख सकते हैं। इसके बाद मास्क को फेंक देना होता है। कितनी रहती है सिक्युरिटी - ट्रिपल लेयर सर्जिकल मास्क लगाने से वायरस से 70 से 80 फीसदी तक बचाव रहता है और एन- 95 से 95 फीसदी तक बचाव संभव है। कब मास्क पहननें - अगर आपको फ्लू नहीं है, तो मास्क पहनना जरूरी नहीं है, लेकिन अगर आप किसी फ्लू पेशेंट की देखभाल कर रहे हैं, किसी ऐसी जगह जा रहे हैं, जहां फ्लू पेशेंट्स की आमद है, या किसी भीड़ वाली जगह जा रहे हैं, तो सावधानी के लिए मास्क लगाना जरूरी हो जाता है। - जब भी किसी फ्लू पीडि़त के संपर्क में आएं तो उससे मुलाकात के फौरन बाद मास्क को फेंक दें और हाथों को धोएं। - अगर यात्रा के दौरान लोग मास्क पहनना चाहें तो यह सुनिश्चित कर लें कि मास्क एकदम सूखा हो। अपने मास्क को बैग में रखें और अधिकतम चार बार यूज करने के बाद इसे बदल दें।