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Mar 21, 2009

लोक- संगीत

कबीर को गाते हैं पाँच भाई
बेहद के मैदान में रहा कबीरा सोय
- रमेश शर्मा

आज के दौर में कबीर ही सबसे ज्यादा मौजूं लगते हैं। चारों तरफ धर्म और जातीयता का विषाद है, ऐसे ऊंच-नीच, भेदभाव के माहौल में कबीर के दोहे ही रास्ता बता सकते हैं।

लोक कलाकारों से समृद्ध छत्तीसगढ़ की पहचान देश-दुनिया में पंडवानी की मशहूर गायिका तीजन बाई के कारण तो है ही, भारती बंधुओं ने भी कबीर की रचनाओं को भजन में ढालकर एक अलग पहचान कायम कर ली है। भारती बंधु- अर्थात् पांच भाई, एक साथ एक स्वर में, एक मंच पर बैठकर जब कबीर को गाते हैं तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

सबसे बड़े भाई स्वामी जीसीडी भारती वैसे तो रायपुर नगर निगम में सरकारी नौकरी में हैं लेकिन दफ्तर के बाद उनका पूरा समय रियाज में ही बीतता है। उनका पूरा परिवार कबीरमय है।

कबीर ही क्यों? पूछने पर स्वामी भारती कहते हैं कि आज के दौर में कबीर ही सबसे ज्यादा मौजूं लगते हैं। चारों तरफ धर्म और जातीयता का विषाद है, ऐसे ऊंच-नीच, भेदभाव के माहौल में कबीर के दोहे ही रास्ता बता सकते हैं।

कबीर कहते हैं-

राम रहीमा एक है, नाम धराई दोई
आपस में दोऊ लरि-लरि मुए,
मरम न जाने कोई।

कबीर की सभी रचनाओं में समाज के लिए कोई न कोई शिक्षा जरूर है और आज सैकड़ों साल बाद भी कबीर का महत्व कम नहीं हुआ है इसीलिए हमने कबीर को अपने जीवन का अभीष्ट बना लिया है।

माता सत्यभामा और पिता स्वामी विद्याधर गैना भारती से सभी भारती बंधुओं को प्रेरणा मिली। दरअसल भारती बंधु परिवार में कई पीढिय़ों से भजन गायकी की परंपरा रही है जिसे सहेजने और संगठित करने की प्रेरणा स्वामी जीसीडी भारती ने ग्रहण की और आज वे प्राय: सभी बड़े आयोजनों में शिरकत करने लगे हैं। दिल्ली में त्रिवेणी कला सभागार हो या एनसीआईटी या एनआईटी का कार्यक्रम, भारती बंधु हमेशा बुलाए और सुने जाते हैं, भारती बंधु का अंदाजे-बयां भी गजब है। महफिल की शुरुआत में उनकी गिरीश पंकज द्वारा रचित यह लाइनें हिट रहती हैं-

गिरती है दीवार धीरे-धीरे,
जोर लगाओ यार धीरे-धीरे,
मिलने जुलने में कसर न छोडऩा,
हो जाएगा प्यार धीरे-धीरे।

वैसे कबीर को गाते हुए भारती बंधु इन पंक्तियों का जिक्र जरूर करते हैं-

हद छांडि़ बेहद गया रहा निरंतर होय
बेहद के मैदान में रहा कबीरा सोय।

तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने छत्तीसगढ़ के भारती बंधुओं को 16 जिलों में कबीर गायन के लिए अनुबंधित किया था। अब तक वे पूरे भारतवर्ष में साढ़े पांच हजार से भी अधिक कार्यक्रम दे चुके हैं और 25 हजार स्कूली तथा विश्वविद्यालयीन स्तर के विद्यार्थी उनको सुन चुके हैं।

भारती जी ने बताया कि वे छत्तीसगढ़ की कबीर गायन की इस परंपरा को संरक्षित रखने की दिशा में भी प्रयासरत हैं। अपने परिवार के बच्चों को वे प्रशिक्षण तो दे ही रहे साथ ही बाहर से भी कुछ बच्चे उनके पास सीखने आते हैं।

छत्तीसगढ़ के लिए यह गर्व की बात है कि अभी हाल ही में भारती बंधुओं ने आगरा के विश्वप्रसिद्ध ताज महोत्वसव से अपनी गायन प्रतिभा का लोहा मनवा कर प्रदेश का गौरव बढ़ाया है। भारती बंधु छत्तीसगढ़ की ओर से भाग लेने वाले पहले ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने ताज फेस्टिवल में शिरकत की है।


इनकी अद्भूत कबीर शैली से प्रसन्न होकर मशहूर आलोचन डा. नामवार सिंह भी उनकी तारीफ कर चुके हैं। अशोक वाजपेयी ने तो यहां तक कहा था कि कबीर की मस्ती और फक्कड़पन के बिना सच्चा गायन संभव नहीं। सचमुच भारती बंधु को देखकर अलमस्त फकीर याद आ जाते हैं। तन पर सफेद कुरता और लुंगी, सिर पर हिमाचली टोपी सादगी के साथ जब स्वर लहरियां जुड़ती हैं तो महौल कबीरमय हो उठता है। वे जैसा गाते हैं वैसे ही रहते हैं। रायपुर में मरवाड़ी श्मशान घाट के ठीक सामने भारती बंधु का निवास है। जीसीडी भारती से छोटे विवेकानंद तबले पर संगत देते हैं। अनादि ईश्वर सहायक हैं। अरविंदानंद मंजीरा बजाते हैं और सत्यानंद ढोलक संभालते हैं। भारती बंधु रचना का चयन सधे हुए तरीके से करते हैं। स्वामी जीसीडी भारती मंच पर जब तान छेड़ते हैं-

कबीरा सोई पीर है जो जाने पर पीर,
जो पर पीर न जानई, वो काफिर बेपीर।

तो श्रोता मगन हो जाते हैं। फिर धीरे-धीरे श्रोता कबीर में डूबते चले जाते हैं। भारती बंधुओं को अब तक कोई बड़ा पुरस्कार नहीं मिला है। वे कहते हैं-हमें बड़े-बड़े बुद्धिजीवी आशीर्वाद देते हैं और हजारों श्रोता कबीर को सुनकर परमानंद प्राप्त करते हैं, यही हमारा सबसे बड़ा पुरस्कार है। हम लोग जिंदगी भर कबीर को गाते रहेंगे। हम लोग रीमिक्स या पॉप नहीं गाना चाहते हैं। कबीर को गाना ही पुण्य कमाना है। भारती बंधुओं की शैली में कव्वाली का रस है। हारमोनियम, तबला ढोलक और वाद्ययंत्रों के साथ में वे रोज तीन घंटे रियाज करते हैं।

भारती बंधु गायन कला की जिस सूफीयाना परंपरा का प्रतिनिधित्व करते है वह इस अंचल की खास पहचान बन गई है। यह पहचान एक दिन में नहीं बनती है। इसके लिए घंटों रियाज करना पड़ता है। मिले सुर मेरा तुम्हारा की तर्ज पर पूरी माला गूंथनी पड़ती है।

भारती बंधु को मैंने पहली बार 2002 में आईआईटी, सभागार नई दिल्ली में सुना था। कबीर तो वैसी ही दिमागों में हलचल मचा देते हैं लेकिन सरस गायन के जरिए अंतर्मन को भी प्रभावित किया। संगीत की यह खासियत है कि देश, समाज, भाषा और अपरिचय की सारी दीवारें तोड़ कर श्रोता के दिलों में उतर जाता है।

भाषाओं का एक दायरा हो सकता है और रचनाएं किसी देश-काल खंड में कैद हो सकती हैं लेकिन संगीत की स्वरलहरियां मुक्त गगन को छूती हैं। छत्तीसगढ़ के लोकगीतों और भजनों की व्यापक जनश्रुति परंपरा है जो अलिखित है तथा सदियों से एक कंठ से दूसरे कंठ में प्रवाहित हो रही है। भारती बंधु इस परंपरा को समृद्ध कर रहे हैं। कला राजाश्रयी होने पर ही फलती-फूलती है, ऐसा कहा जाता है। छत्तीसगढ़ में लोकरंग की छटाएं बिखेरने वाले कलाकारों को सतत संरक्षण के लिए सरकारी प्रोत्साहन और अनुसंधान के लिए भारत भवन (भोपाल) सरीखे अधिष्ठान की नितांत जरूरत है।

बिल्लियों की किस्मत

मॉय कम्प्यूटर
संभल जाइए आपकी नौकरी खतरे में है... और वह भी एक बिल्ली के कारण ... जी हां यह बिल्ली कम्प्यूटर चलाना जानती है'। यह 'पढ़ी-लिखी' बिल्ली न्यूयॉर्क में हुए वार्षिक 'कैट शो' में शामिल हुई थी। इस मेले में बिल्लियों के लिए सबसे बड़ा शॉपिंग मॉल और बगीचा भी सजाया
गया था। पालतू जानवरों को टे्रनिंग दे कर बहुत से काम सिखाए जाते हैं, इनमें कुत्ते को सबसे तेज माना जाता है वे बहुत जल्दी इंसानों की सिखाई हुई बातों को सीखता है। बिल्ली भी उसी श्रेणी में आती है। यदि कुत्ते, बिल्ली को इस तरह के काम करना सीखाना शुरु कर देंगे तो इंसान तो बेरोजगार हो ही जाएंगे।

विदेशों में भी शगुन- अपशगुन

विदेशों में भी लोग बिल्ली के रास्ता काट देने को शुभ नहीं मानते। लेकिन कानून तो इन सबसे परे होता है। द हेग में रहने वाले सीस शूरमांस को बिल्ली के रास्ता काटने पर दो मिनट रुकना बहुत मंहगा पड़ा। जब वे अपनी गाड़ी से बाहर जाने के लिए निकले तब टे्रफिक सिग्नल के पास एक बिल्ली ने उनका रास्ता काट दिया, लेकिन वे ग्रीन सिग्नल होने के बाद भी आगे नहीं बढ़े, तब यातायात के नियम तोडऩे के कारण उन पर 75 यूरो (4800 रुपये) का जुर्माना ठोक दिया गया। उनके इस अंधविश्वास ने उनके पीछे चल रहे लोगों को काफी तकलीफ हुई। इसके चलते शूरमांस को 95 डालर (करीब 4500 रुपये) जुर्माना भरना पड़ा। यह खबर उन भारतीयों के लिए खुशखबरी है जो इस तरह की बातों पर विश्वास करते हैं। अब वे यह कह सकते हैं कि हम भारतीय ही अंधविश्वासी नहीं होते।


मूंछों से देखता है चूहा

किन्ही कारणों से जब कोई इंसान अंधा हो जाता है, तो देखने में यह आया है कि मस्तिष्क का वह हिस्सा अन्य कामों में उपयोग होने लगता है। यानी मस्तिष्क का जो हिस्सा सामान्यत: दृष्टि प्रक्रिया के लिए जि़म्मेदार है उसको अन्य संवेदी अंगों से जोड़ दिया जाता है। शायद इसीलिए दृष्टिहीन व्यक्तियों के अन्य संवेदी अंग ज़्यादा पैने हो जाते हैं। अब यह पता चला है कि चूहों के अन्य शारीरिक अंग भी ऐसी स्थिति में स्वयं अनुकूलित हो जाते हैं।

नेशनल ऑटोनामस युनवर्सिटी ऑफ मैक्सिको, मैक्सिको सिटी के गैब्रियल गुटिएरेज़ और उनके सहकर्मियों ने 6 महीने की उम्र के चूहे लिए। इनमें कुछ चूहे नेत्रहीन थे और बाकी आंख वाले थे। शोधकर्ताओं ने इनकी मूंछों की गद्दी (व्हिस्कर पैड) का अध्ययन किया। अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि अंधे चूहों में व्हिस्कर पैड में ऊर्जा का उपयोग बड़ी सावधानी व कार्य क्षमता से किया जाता है और इनके द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्र भी काफी अलग ढंग का होता है। प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइन्सेज़ में प्रकाशित इस परिणाम से लगता है कि इस प्रकार से इन चूहों की मूंछें कहीं अधिक संवेदी हो जाती हैं। इसके परिणास्वरूप ये चूहे छूकर खोजबीन करने में सामान्य से अधिक सक्षम हो जाते हैं।

इस अनुसंधान से इस बात की पुष्टि होती है कि अंधत्व के कारण सिर्फ मस्तिष्क का ही नहीं बल्कि पूरे शरीर का नए ढंग से पुनर्गठन होता है।

समानता का सहस्राब्दी लक्ष्य

सात साल में पूरा होगा?

भारतीय गांव में आज भी लड़कियों को पहली दूसरी या ज्यादा से ज्यादा पांचवी तक पढ़ा कर स्कूल छुड़वा दिया जाता है लेकिन अब ऐसी माताएं अपनी बच्चियों को स्कूल भेजने के लिए अडिग हैं। भारत में इन दिनों औपचारिक स्कूल व्यवस्था को उन क्षेत्रों में सशक्त किया जा रहा है जहां लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा के बाद स्कूल नहीं भेजा जाता।

भारत में महिलाओं की स्थिति बेहतर मानी जाती है लेकिन यह भी सच है कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है। घूंघट में छिपे चेहरों में आज आत्मविश्वास की इतनी ललक है कि हर क्षेत्र में अब पुरूषों के कंधे से कंधा मिला कर चलने में भी उन्हें कोई गुरेज़ नहीं है। आंकड़ों पर यदि नजऱ डाली जाए तो 2001 की जनगणना में भारत में 54 प्रतिशत महिलाएं साक्षर थीं। यदि लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सहस्त्राब्दी लक्ष्यों की बात की जाए तो 2015 में तक प्राथमिक शिक्षा में लड़कों और लड़कियों का अनुपात शत- प्रतिशत होना चाहिए जो 2005 में 91 प्रतिशत पहुंच चुका था।

इसी तरह माध्यमिक शिक्षा में भी लड़के लड़कियों का अनुपात 100 प्रतिशत होना चाहिए और 2003 में यह दर 70 प्रतिशत पहुंच गई थी। राजस्थान में महिला आयोग की अध्यक्षा और राजस्थान विश्वविद्यालय में लंबे समय तक जर्मन भाषा पढ़ा चुकी प्रमुख शिक्षाविद् डॉ. पवन सुराणा का कहना है कि महिलाओं के साक्षर होने से कुछ नहीं होगा बल्कि उन्हें शिक्षित भी होना पड़ेगा। शिक्षा के उच्च स्तर स्तर पर लैंगिक अंतर बढ़ता है और जहां प्राथमिक स्तर पर प्रति 1000 लड़कों की भर्ती पर 95 लड़कियां स्कूलों में प्रवेश लेती हैं वहीं यह अनुपात उच्च प्राथमिक स्तर पर घट कर 88 प्रतिशत रह जाता है।

मानव संसाधन और विकास मंत्रालय के डीआईएसई की रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राथमिक शिक्षा के उद्देश्य को तब तक प्राप्त नहीं किया जा सकता जब तक सभी लड़कियों को शिक्षा व्यवस्था से नहीं जोड़ लिया जाता। भारतीय गांव में आज भी लड़कियों को पहली दूसरी या ज्यादा से ज्यादा पांचवी तक पढ़ा कर स्कूल छुड़वा दिया जाता है लेकिन अब ऐसी माताएं अपनी बच्चियों को स्कूल भेजने के लिए अडिग हैं। भारत में इन दिनों औपचारिक स्कूल व्यवस्था को उन क्षेत्रों में सशक्त किया जा रहा है जहां लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा के बाद स्कूल नहीं भेजा जाता। लड़कियों के लिए स्कूल खोले जाने, महिला अध्यापकों की संख्या बढ़ाने और बड़ी उम्र की लड़कियों को शिक्षा से जोडऩे के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं।

1988 में शुरू किया राष्ट्रीय साक्षरता मिशन बताता है कि कुल अशिक्षित आबादी में महिलाओं की बहुत बड़ी संख्या है। यह मिशन वास्तव में महिलाओं को क्रियाशील साक्षरता प्रदान करने का मिशन है। महिला प्रौढ़ शिक्षा और युवतियों की शिक्षा के लिए भी देश में कई कार्यक्रम संचालित हैं। राष्ट्रीय बालिका शिक्षा कार्यक्रम के अन्तर्गत जहां 31 हज़ार आदर्श विद्यालय विकसित किए गए और दो लाख अध्यापकों को लैंगिक संवेदनशीलता में भी प्रशिक्षित किया गया। सवाल यह भी है कि वो कौन से कारण है जो महिलाओं की कम साक्षरता के लिए जि़म्मेदार हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक भेदभाव और आर्थिक शोषण इसमें प्रमुख भूमिका निभाते हैं। सहस्त्राब्दी लक्ष्य अभी सात साल दूर है फिर भी उन्हें प्राप्त कर पाना अभी एक बड़ी चुनौती है।

संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दी लक्ष्यों में लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण का लक्ष्य रखा गया है। भारत में महिलाएं हर क्षेत्र में पुरूषों की बराबरी कर रही हैं पर शिक्षा के क्षेत्र में समानता लाए जाने के प्रयास जारी हैं। (उदंती फीचर्स)
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पर्यावरण की होली न जलाएँ



पर्यावरण की होली न जलाएँ
एक दिन की मौज- मस्ती के लिए हम कितना
नुकसान कर रहे हैं इसका अंदाजा है ?

- सुजाता साहा
पिछले वर्ष की बात है मैं होली के दो दिन पहले बाजार गई थी मुझे नहीं पता था कि उस इलाके में दो दिन पहले से ही सड़कों पर लोग होली खेलने निकल आते हैं। मैं स्कूटी से घर लौट रही थी तभी पीछे से कुछ शरारती लड़कों ने रंगों से भरा गुब्बारा मेरी ओर फेंका जिससे मेरा सफेद टी शर्ट रंगीन हो गई। होली के दिन रंग गुलाल से खेलना सबको अच्छा लगता है पर बीच सड़क पर इस तरह किसी जरुरी काम से जाते हुए लोगों पर रंग फेंकना कैसे अच्छा लग सकता है। ऐसे में किसे गुस्सा नहीं आएगा। होली की ऐसी शुरुआत हो जाए तो त्यौहार का सारा उत्साह खत्म हो जाता है।
आपको भी इस तरह के कुछ कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा होगा, जिसने आपके भी इस रंग- बिरंगे त्योहार का मजा ही किरकिरा कर दिया होगा। दरअसल समय के साथ-साथ होली मनाने के ढंग में ढेरों बुराईयां आ गई हैं। दोस्ती की जगह दुश्मनी ने ले ली है। असभ्य लोग गुलाल और रंगों की जगह कीचड़, गोबर, मिट्टी, वार्निश जैसे कई खतरनाक रासायनिक रंगों का प्रयोग करने लगे हैं। कुछ लोगों ने होली के दिन हंसी ठिठोली करते हुए रंजोगम को भूल कर उल्लास के साथ मनाने की बजाय गंदे तथा अश्लील हंसी-मजाक के साथ अजब-गजब टाइटल देकर अपने मन की भड़ास निकालने का त्योहार बना दिया है।
रंगों से सराबोर हो जाने वाले त्योहार का सबसे दुखदाई पहलू यह है जब होली जलाने के नाम पर हम अपने पर्यावरण को नष्ट करने पर तुले होते हैं। वैसे तो हमारे देश में पर्यावरण बचाने के लिए हजारो स्लोगन बनाए गए हैं। वृक्ष बचाओ, जल बचाओ। लेकिन होलिका दहन के नाम पर हरे-भरे वृक्षों को काटकर आग की भेंट चढ़ा कर हम किस तरह हम अपने अंदर छुपी बुराईयों को जला पा रहे हैं यह सोचने वाली बात है। राह में पेड़ों को कटते देख कर व्यवस्था को गाली देते हुए निकल तो जाते हैं, पर उस कटते हुए पेड़ को बचाने के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाने के बारे में कभी नहीं सोचते। भले ही सरकार को कोसते हैं कि देखो कैसे अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे चुपचाप पेड़ को कटते हुए देख रहे हैं।
एक दिन की मौज- मस्ती के लिए हम कितना नुकसान कर रहे हैं इसका सबको अंदाजा है पर नहीं फिर भी हम तो भई रंग के नाम पर गैलनों पानी बहायेंगे ही चाहे तो कल को पीने को पानी ही न मिले। सवाल यह है कि क्या पेड़ों को, पानी को बचाने का काम सिर्फ सरकार का है? इन बुराईयों को मिटाने में हम और आप क्यों कोई पहल नहीं करते?
अपनी-अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराने का ही नतीजा है कि इन हुडंदंगियों की वजह से पिछले कुछ वर्षों से शहरों में यह त्यौहार सन्नाटे का त्यौहार बन गया है। आइए हम सब मिलकर इस सन्नाटे को तोड़ें और आनंद के इस रंग में पर्यावरण की होली न जलाए।

Email- sujatasaha11@rediffmail.com

नारी सौन्दर्य का चित्रण

वंदना परगनिहा

उदंती.com का यह अंक वंदना परगनिहा के चित्रों से सज्जित है। रंग और उमंग से भरे फागुन के मौसम में चटख रंगों से सजे वंदना के ये चित्र एक ओर जहां उल्लास से भर देते हैं वहीं छत्तीसगढ़ की नारियों के विभिन्न रुपों को केन्द्र में रख कर बनाए गए चित्र मार्च माह में मनाए जाने वाले अंर्तराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन को भी सार्थक करते हैं।

इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से मास्टर आफ फाईन आर्टस की डिग्री लेने के बाद गुरुकुल पब्लिक स्कूल कवर्धा में आर्ट टीचर के रुप में कार्य करने वाली वंदना परगनिहा के चित्र नारी जीवन को संपूर्ण अभिव्यक्ति देते हैं। वंदना के चित्रों में एक ओर जहां छत्तीसगढ़ की माटी के रंग स्पष्ट नजर आते हैं, वहीं वे अपने चित्रों से जैसे हर नारी की कहानी कहती सी प्रतीत होती हैं।
वंदना कहती हैं कि वे जब किसी दृश्य का चित्रण करती हैं तो वह उस एक पल का चित्रण होता है। लेकिन वह एक पल का चित्रण पूरी कहानी को अभिव्यक्त करती हैं। वंदना अपनी इस बात को अपने पेंटिंग की उस सीरीज से समझाती हैं जो उन्होंने मां और बेटी को लेकर बनाए हैं। मां और बेटी के इस चित्रण के बारे में वंदना का कहना है कि दरअसल मां का रुप इतना विशाल है कि उनके लिए कोई भी केनवास छोटा पड़ता है। वंदना ने इस मां सीरीज में अपने लिए भी एक छोटी सी जगह रखी है, जो मां के साथ बचपन में गुजारे उन हर एक पल को अभिव्यक्त करते हैं, जिसे उसने जिया है।

वंदना के इस मां सीरीज को देखकर ही आभास हो जाता है कि मां का एक बेटी के साथ और बेटी का मां के साथ कितना गहरा नाता होता है। वह मां के साथ अपने आपको हर पल हर जगह पाती है। वह मां की कान की बालियों में, चुडिय़ों में, पायल में, चोटियों में, उसकी बाहों में खेलती हुई , झूलती हुई नजर आती है। मां बेटी की यह सीरीज एक कोमल रिश्ते की ऐसी गहरी अभिव्यक्ति है कि प्रत्योक बेटी और मां इन चित्रों में अपना अक्स देख सकती है।


इस सीरीज के अलावा वंदना ने छत्तीसगढ़ की महिलाओं के जीवनचर्या को तो बसूरती से अपने केनवास पर उतारा है साथ ही छत्तीसगढ़ की महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले जेवर भी वंदना के चित्रों का विषय है। उनके चित्र में छत्तीसगढ़ की महिला कहीं बच्चे को गोद में लिए हुए काम कर रही है तो कहीं वह शंकुंतला के रूप में नजर आती है। शकुंतला के इस रुप के बारे में वंदना का कहना है कि हर नारी के भीतर एक शंकुतला है।

वंदना के इन चित्रों को देखकर कोई भी छत्तीसगढ़ की महिलाओं के साज श्रृंगार और उनके जीवनचर्या के बारे में जान सकता है।

वंदना अमृता शेरगिल के चित्रों से प्रभावित हैं, वंदना का कहना है कि अमृता जब भारत आईं तो उन्होंने ग्रामीण जीवन को अपने चित्रों मे उतारा, यहां के लोगों का रहन सहन खेत खलिहान और यहां काम करने वाले किसान और यहां के स्त्रियों को उन्होंने प्रमुखता दी। मैं चूंकि छत्तीसगढ़ में पली बढ़ी हूं तो जाहिर है मेरे चित्रों में छत्तीसगढ़ की झलक मिलती है। छत्तीसगढ़ की मेहनतकश महिलाओं ने मुझे ज्यादा आकर्षित किया है। सीधी सरल जीवन गुजारने वाली यहां की ग्रामीण महिलाओं का सौंदर्य देखते ही बनता है, यहां के पारंपिरक जेवर में सजा उनका रूप तब और भी निखर आता है।


वंदना अपने को प्रकृति के करीब भी पाती हैं उन्होंने वाटर कलर में प्रकृति को भी अपनी तुलिका से उकेरा है। वंदना अब एक और नए सीरीज पर काम कर रहीं हैं इसमें भी नारी ही उनका प्रमुख पात्र हैं, पर यह नारी अबला या गांव की सीधी सरल नारी नहीं है जो अपने घर और परिवार की चाहरदीवारी में कैद है बल्कि जिस नारी को वंदना अब चित्रित करने वाली है उसमें वह सपनों की उड़ान भरने वाली नारी नजर आ रही है, जो कहीं पक्षी बनकर ऊंची उड़ान भरना चाहती है तो कहीं तितली की तरह पंख लगाकर अपने रंग- बिरंगे सपनों को पूरा करने की चाह रखती है। कुल मिलाकर इस सीरीज के माध्यम से वंदना एक स्वतंत्र, स्वावलंबी और महत्वाकांक्षी नारी को अपने केनवास में उतारने का प्रयास कर रही हैं।

वंदना बचपन में अपने नाना को पेंटिंग बनाते देखा करती थी, उन्हें ही देख- देख कर वह भी उल्टी सीधी रेखाएं खींचने लगी, और उसे चित्र बनाना रूचिकर लगने लगा। उसकी रूचि को देखकर माता- पिता और भाई ने उसे प्रोत्साहित किया और खैरागढ़ भेज दिया चित्रकला में माहरत हासिल करने के लिए। आर्ट टीचर की नौकरी के साथ जब भी वंदना को समय मिलता है वह रंग और ब्रश लेकर कैनवास में अपने सपनों को पूरा करने बैठ जाती है। वंदना की इच्छा है वह अभी और पढ़ाई करे और अपनी कला को और परिपक्व बनाए। (उदंती फीचर्स)

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वंदना परगनिहा

जन्म- 9 अगस्त 1984 में दुर्ग छत्तीसगढ़ में शिक्षा- बीएफए, एमएफए (पेटिंग)इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ आर्ट कैंप- मुज्जफर नगर, खैरागढ़, भोपाल, भुवनेश्वर ग्रुप शो- खैरागढ़, रायपुर, भिलाई एवं रविन्द्र भवन ललित कला अकादमी नई दिल्ली रूचि - पुस्तकें पढऩा, संगीत सुनना

संपर्क- 6/बी, 100 यूनिट, नंदिनी नगर, दुर्ग (छ.ग.) फोन:07821-2577234

E-mail : vandanaparganiha@yahoo.com