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Jan 19, 2009

आओ तुम्हें चांद पे ले जाएँ

आओ तुम्हें चांद पे ले जाएँ
- प्रवीण कुमार

चांद पर कोई वायुमंडल नहीं है, मगर क्लिमेंटाइन अंतरिक्ष यान (1994) से प्राप्त सूचनाओं से पता चलता है कि वहां पानी हो सकता है। यह पानी चांद के दक्षिण ध्रुव के पास मौजूद गर्तों में बर्फ के रूप में हो सकता है। संभवत: भविष्य में अंतरिक्ष यात्री इस पानी का उपयोग पीने के लिए और ऑक्सीजन प्राप्त करने हेतु कर सकेंगे।

नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने 20 जुलाई 1969 के दिन चांद पर पहला कदम रखने के साथ कहा था कि ये 'मानव जाति के लिए एक बड़ी छलांग' है। यह संभवत: एक विनम्र वक्तव्य साबित हो।

22 अक्टूबर को प्रक्षेपित भारत का अपना चांद मिशन चंद्रयान-1 बढिय़ा काम कर रहा है। 8 नवंबर को यान चांद की कक्षा में प्रवेश कर चुका है।

बताते हैं कि जब एडमंड हिलेरी से पूछा गया था कि 'एवरेस्ट पर क्यों चढ़ेंÓ तो उनका जवाब था, 'क्योंकि वह है।Ó मगर चांद के बारे में बात इससे कुछ अधिक है क्योंकि हमारा यह निकटतम पड़ोसी इससे कहीं ज़्यादा का वायदा करता है। चांद अक्सर लोक कथाओं और मायथॉलॉजी में प्रमुखता से नजऱ आता है। एच.जी. वेल्स और आर्थर सी. क्लार्क जैसे विज्ञान कथा लेखकों ने अपनी कहानियों में ऐसी कल्पनाएं की हैं कि लोग चांद पर बस्तियां बनाकर रहने लगे हैं। कई संस्कृतियों में चांद की कलाओं के आधार पर कैलेंडर बनाए जाते हैं जिन्हें चंद्र कैलेंडर कहते हैं। दरअसल माह या महीना शब्द की उत्पत्ति ही चांद के लिए फारसी शब्द माहताब से हुई मानी जाती है। चांद हमसे औसतन 3,84,000 किलोमीटर की दूरी पर है। हमारा यही उपग्रह जब पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाए, तो सूर्य के प्रकाश को रोक लेता है और सूर्य ग्रहण का कारण बनता है। हालांकि आमतौर पर माना जाता है कि चांद पृथ्वी के आसपास चक्कर काटता है, मगर हकीकत यह है कि ये दो पिण्ड (चांद और पृथ्वी) किसी एक साझा गुरुत्व केंद्र के इर्द -गिर्द चक्कर काट रहे हैं। चांद का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी के दो तरफ के समुद्रों में दिन में दो बार ज्वार पैदा करता है। दूसरी ओर, करोड़ों वर्षों में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से चांद की कक्षीय गति धीमी हो गई है।

चांद की उत्पत्ति के जिस सिद्धांत को आमतौर पर माना जाता है, वह कहता है कि किसी समय कोई बड़ा पिण्ड (पृथ्वी से लगभग आधे आकार का) पृथ्वी से टकराया था, उस समय पृथ्वी से ढेर सारा पदार्थ छिटककर एक वलय बना। उसी वलय से चांद का निर्माण हुआ है। यह सिद्धांत सबसे पहले डॉ. विलियम के. हार्टमैन और डोनाल्ड आर. डेविस ने आइकेरस नामक पत्रिका में 1975 में प्रस्तुत किया था।

चांद पर उतरने वाले प्रथम मनुष्य (जुलाई 1969) नासा द्वारा भेजे गए अपोलो यान के अंतरिक्ष यात्री थे। 1960 के मध्य दशक से 1970 के मध्य दशक के बीच चांद पर 65 लैण्डिंग हुए थे। मगर 1976 में ल्यूना-24 के बाद इन्हें अचानक रोक दिया गया था। सोवियत संघ ने शुक्र ग्रह पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया था और यू.एस. ने मंगल और उससे दूर के ग्रहों पर। नासा की योजना वर्ष 2020 में एक बार फिर चांद पर इन्सानों को भेजने की है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) 2015 में दो यात्रियों को एक सप्ताह के लिए अंतरिक्ष में भेजने की योजना पर काम कर रहा है। इसके बाद 2020 तक देश का पहला इन्सानी चंद्रमा मिशन हाथ में लिया जाएगा।

चांद पर मनुष्यों को भेजने का काम चांद की चुंबकीय पूंछ की वजह से रुक सकता है। चुंबकीय पूंछ दरअसल सूर्य से निकलने वाले आवेशित कणों की बौछार को कहते हैं, जो सूर्य से आकर पृथ्वी के पार जाते हैं। ये कण पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के साथ घुल-मिल जाते हैं। इसकी वजह से एक लंबी सी पूंछ निर्मित हो जाती है जो चांद की कक्षा तक पहुंचती है। प्रति माह चांद छ: दिन के लिए चुंबकीय पूंछ में रहता है।

करेंगे क्या चांद पर?

चांद पर एक काम तो यह करना है कि वहां हीलियम-3 नामक तत्व की खोज करना है। यह हीलियम का एक अपेक्षाकृत हल्का, गैर-रेडियोसक्रिय आइसोटोप है। इसमें दो प्रोटॉन व एक न्यूट्रॉन होते हैं जबकि साधारण हीलियम में दो न्यूट्रॉन होते हैं। हीलियम का यह हल्का आइसोटोप पृथ्वी पर दुर्लभ है और इसकी ज़रूरत नाभिकीय संलयन रिएक्टर के लिए होती है। यह एक स्वच्छ, कार्यक्षम व सस्ता नाभिकीय र्इंधन है। पृथ्वी पर स्वच्छ र्इंधन के बढ़ते अभाव को देखते हुए यह एक महत्वपूर्ण चीज़ हो सकती है। ऐसा माना जाता है कि हीलियम-3 चांद पर प्रचुरता में उपलब्ध है। यह वहां की ऊपरी चट्टानों में सौर पवन के अरबों वर्षों के प्रभाव से बनी है। बताते हैं कि चीन के चांद कार्यक्रम में भी हीलियम-3 की खोज शामिल है।

चांद की पथरीली, उबड़-खाबड़ सतह पर यात्रा करना शायद एक समस्या साबित हो। दूसरी समस्या वायुमंडल का अभाव होगी क्योंकि आपको एयर-टाइट वाहन में ही यात्रा करनी होगी। नासा ने इस तरह के एक वाहन का परीक्षण भी किया है मगर वह अधिकतम 1000 किलोमीटर तक ही ले जा सकता है। लंबी यात्राओं के लिए चुंबकीय उत्थान या मेग्नेटिक लेविटेशन (मेग-लेव) की बात सोची जा रही है। इसमें पटरियों पर एक डिब्बा चुंबकीय शक्ति से ऊपर उठा रहता है। इस तरह के तंत्र जापान व जर्मनी में कार्यरत हैं। फिर पहाड़ों को पार करने के लिए सुरंगें या बोगदे बनाने होंगे, जैसे पृथ्वी पर बनाए जाते हैं। चूंकि चांद पर तापमान में बहुत परिवर्तन होता है इसलिए वहां 10-10 फीट की पटरियों के बीच 1-1 इंच की जगह छोडऩा होगी ताकि गर्म होकर पटरियां फैलें तो काफी जगह मिले।

चांद रेडियो खगोल शास्त्रीय अध्ययनों के लिए भी बढिय़ा जगह हो सकती है। चांद के दूरस्थ हिस्से (जिसे हम कभी नहीं देख पाते) पर रेडियो दूरबीनें लगाई जाएं तो वे पृथ्वी पर पैदा होने वाले भारी रेडियो तरंग शोर से बची रहेंगी। ऐसे शांत वातावरण में वे ब्राहृांड का अवलोकन ऐसी न्यून आवृत्तियों पर कर सकेंगे, जिन्हें पृथ्वी का वायुमंडल रोक देता है। इस न्यून आवृत्ति का झरोखा खुलने से कई रोमांचक खोजें होने की उम्मीद की जा सकती है।

चूंकि चांद पर कोई वायुमंडल नहीं है, इसलिए वहां अपरदन नहीं होता। लिहाज़ा यहां का रेगोलिथ (बाहरी चट्टानी व धूलभरी परत) सूरज से आने वाले कणों का अच्छा रिकॉर्ड प्रस्तुत करता है। इससे हमें सूरज पर होने वाली प्रक्रियाओं के अलावा ब्राहांड के दूरस्थ हिस्सों से आने वाले कॉस्मिक विकिरण का अध्ययन करने में भी मदद मिलेगी। इस तरह के अध्ययन से हम समझ पाएंगे कि सूर्य पर अतीत में घटी घटनाओं ने हमारी पृथ्वी के कैसे प्रभावित किया है और जब हम तारों की ओर कदम बढ़ाएंगे तो शायद चांद हमारे लिए पहले पड़ाव का काम करेगा। (स्रोत फीचर्स)

एक फोन से पूरी होती है मुराद ...

                                    एक फोन से पूरी होती है मुराद ...


मनुष्य अपनी मुरादें पूरी करने के लिए लम्बी लम्बी यात्राएं कर भगवान के द्वार जाता है, लेकिन हाईटेक होती इस दुनिया में ईश्वर तक अपनी फरियाद पहुंचाने के लिए भक्तों ने फोन का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। अब तक इंदौर के जूना चिंतामन गणेश मंदिर में भक्त पत्रों के जरिए अपनी बात भगवान तक पहुंचाते ही थे, लेकिन अब तो पत्र लिखना पुराने जमाने की बात हो गई है सो उनके भक्त अब उन्हें फोन के जरिए अपनी मुराद पूरी करने की मन्नते मांगने लगे हैं।

मान्यता है कि इंदौर के जूना चिंतामन के गणेश जी से मांगी गई मन्नत जरूर पूरी होती है। इस मंदिर के पुजारी मदन लाल पाठक देश विदेश से प्राप्त भक्तों के पत्रों में लिखी समस्याओं को पढक़र गणेशजी को सुनाते हैं। जिन भक्तों की परेशानियां दूर हो जाती हैं वे धन्यवाद पत्र भी लिखते हैं। लेकिन हाई टेक के इस युग में अब भगवान को अपनी मुराद या परेशानी सुनाने के लिए पुजारी जी ने मोबाइल का इस्तेमाल शुरू कर दिया है।

पुजारी अपना मोबाइल गणेशजी के कान में लगा देते हैं और भक्त अपनी बात उनसे कह डालते हैं। गणेश जी तो संकट मोचन हैं ही, लेकिन लगता है गणेश जी ने कम्प्यूटर का इस्तेमाल करना शुरू नहीं किया है, नहीं तो वे अब तक इमेल से अपने भक्तों की समस्याएं सुनते और एक इमेल से ही अपने भक्तों की मन्नते पूरी होने का अर्शीवाद देते। तो जागिए गणेश जी जमाना ईमेल का है आप कब तक उन्नीसवीं सदी में अटके रहेंगे, आपके भक्त तो 21वीं सदी के पार जा चुके हैं।


                                     बूढ़े बिल्ले ने पहने कांटैक्ट लेंस

पालतू जानवर पालना आसान नहीं होता, क्योंकि उनकी देखभाल मनुष्य के बच्चे से भी ज्यादा करनी पड़ती है। और यदि आपका कुत्ता या बिल्ली बीमार पड़ जाए तब तो चिंता और भी ज्यादा बढ़ जाती है। पालतू जानवरों के संदर्भ में अक्सर यह देखा गया है कि जब तक वह स्वस्थ होता है मालिक का दुलारा बना रहता है बीमार होते ही उसकी उपेक्षा होने लगती है, लेकिन अर्नेस्ट नाम के 15 साल के बिल्ले की किस्मत कुछ ज्यादा ही अच्छी है, जब अर्नेस्ट की आंखे उम्र बढऩे के साथ कमजोर होने लगीं तो वह उदास सा रहने लगा और पहले की तरह भाग दौड़ करने में अपने को असहाय महसूस करने लगा। अर्नेस्ट के मालिक पाल उसकी इस परेशानी से दुखित हो गए और उन्होंने उसका इलाज कराने की सोची। अर्नेस्ट की आंखों की रोशनी कम होने पर उन्होंने उसकी आंखों में कांटैक्ट लेंस लगवाना उचित समझा, क्योंकि बुढ़ापे में आपरेशन काफी जोखिम भरा हो सकता था।

अर्नेस्ट भी आंखों में लेंस लगाए जाने के बाद बेहद खुश है। अर्नेस्ट कांटैक्ट लेंस पहनने से पहले ठीक से देख नहीं पाता था। यहां तक कि उसे यह पता भी नहीं चलता था कि वह किधर जा रहा है। कांटैक्ट लेंस लगाने के बाद तो चमत्कार ही हो गया। अब अर्नेस्ट न सिर्फ अपनी आंखे पूरी तरह खोल सकता है बल्कि अच्छे से देख भी पाता है। पर कांटैक्ट लेंस के कुछ फायदे हैं तो दिक्कतें भी कम नहीं है। इसे लगाने वाले व्यक्ति को काफी सावधानी और सतर्कता बरतनी होती है। ऐसे में किसी बिल्ले का कांटैक्ट लेंस लगाने की बात आपको अजीब लग सकती है। लेकिन जिसके पाल जैसे मालिक हों उन्हें इसकी क्या चिंता। अर्नेस्ट तो कांटैक्ट लैंस लगाकर बूढ़ापे में जवान महसूस कर रहा है और फिर से भाग- दौड़ करके अपने मालिक के प्रति आभार व्यक्त कर रहा है।

इन्हें क्यों नहीं आती शर्म?

इन्हें क्यों नहीं आती शर्म?
-वी. एन. किशोर

हमारे बड़े बुजूर्ग कहते हैं कि अपने गुस्से को काबू में रखना चाहिए। लेकिन उस समय आप क्या करेंगे जब राह चलते हुए कोई पच्च से थूक दें और उसके छींटे आपके ऊपर पड़े।

मेरी आपबीती सुनकर हो सकता है आपको भी लगे कि हां ऐसा तो मेरे साथ भी हुआ है - घर से ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर निकलते निकलते देर हो ही गई। जल्दी से अपनी स्कूटर निकाला और ऑफिस की ओर चल पड़ा। रास्ते में भीड़ थी, कार, स्कूटर, सीटी बस, आटो रिक्शा रफ्तार से धूल उड़ाते दौड़ रहे थे। तभी मेरे आगे चल रहे एक मोटर साईकिल सवार ने पान की पीक यूं शान से थूकी मानों वह कोई नवाब हो और सडक़ उसकी शाही पीकदान। मेरे कपड़ों में छींटे तो पड़े ही साथ ही मेरे हाथों व चेहरे पर भी। जाहिर है मुझे गुस्सा आया, एक तो देर हो रही थी ऊपर से यह नई मुसीबत, मैंने तुरंत अपनी स्कूटर की स्पीड बढ़ाई और उसके बराबर चलते हुए गुस्से से उबलते हुए बोला 'सडक़ को आपने पीकदान समझ रखा है क्या? आपके थूक के छींटे जो मेरे चेहरे और कपड़ों पर पड़ें हैं उसका क्या?' इतना सुनकर जनाब ने मुझे घूर कर ऐसे देखा मानों मैंने उसकी शान में कोई गुस्ताखी कर दी हो। उस पर मेरे गुस्से का कोई असर ही नहीं हुआ। मैंने उसकी इस ठंडी प्रतिक्रिया पर फिर कहा मैं आपसे ही कह रहा हूं जनाब, आपने सुना नहीं। तब उसने सॉरी शब्द ऐसे कहा मानो अहसान कर रहा हो और अपनी गाड़ी भगा दी।

मेरी हालत खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे वाली सी हो गई थी, क्योंकि मेरे आस- पास चलने वाले लोग मुझे इस तरह देख रहे थे जैसे मैंने उस थूकने वाले पर आपत्ति करके कोई गुनाह कर दिया हो। कुछ तो ऐसे मुस्कुरा रहे थे मानों कह रहे हों -बेकार ही फालतू सी बात पर उलझ गया।

दो पहिया वाहन पर चलने वालों के साथ अक्सर इस तरह के कडुवे अनुभव होते हैं। पान और गुटका खाने की लत वाले सडक़ पर चलते हुए चाहे वे कार में सफर कर रहे हों या बस में या फिर दोपहिया वाहन में, थूकना उनकी आदत में शुमार होता है। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि राह चलते थूकते हुए वह लोगों के कपड़े खराब करते हुए, गंदगी तो फैलाता ही है साथ ही असंख्य कीटाणु भी छोड़ते हुए चलता है। कई लोगों की तो बिना पान गुटका खाए ही थूकते रहने की आदत होती है कुछ अपनी बीमारी के चलते कफ निकाल कर सडक़ पर ही थूकते चलते हैं। जो भी हो है तो यह बहुत ही बुरी आदत।

अब सवाल यह उठता है कि इनके साथ ऐसा क्या करें कि वे थूकना बंद कर दें?

हमारी सरकारें बीच- बीच में पान- गुटका का ठेला लगाने वालों पर प्रतिबंध तो लगाती है, पर इन थूकने वालों पर कब सख्ती बरती जाएगी? थूकने वालों ने तो अस्पताल जैसी जगह को भी नहीं छोड़ा है। आप किसी भी सरकारी अस्पताल में चले जाईए सीढिय़ों के कोने पान की पीक से भरे हुए मिलेंगे। इसी तरह दफ्तरों के क्या हाल रहते हैं बताने की जरूरत नहीं। आखिर सरकारी संपत्ति हमारी अपनी संपत्ति जो ठहरी। जहां जहां थूकना मना है लिखा होता है वहीं पान- गुटका के दाग उस सूचना पटल का मुंह चिढ़ाते से प्रतीत होते हैं।

तो क्या हम इस बात पर सिर्फ गुस्सा करके ही चुप बैठ जाएं या कि इससे छुटकारा पाने के लिए भी कुछ सोचें। मैं तो सडक़ पर चिल्ला कर ऐसा करने वालों पर गुस्सा करता हूं और दो बात भी सुनाता हूं। लेकिन अपने आपको सभ्य, पढ़ा- लिखा कहने वाले, जो कहीं भी, कभी भी, बिना आगा-पीछा देखे थूक देना अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते है को, क्या कभी अपनी इस असभ्यता पर शर्म आएगी?

-कॉटन मार्केट नागपूर से

इस अंक के रचनाकार

परितोष चक्रवर्ती


जन्म तिथि - 7 अप्रैल 1951, सक्ती छत्तीसगढ़ शिक्षा - एमए, बीजे, प्रमुख कृतियां - अंधेरा समुद्र, कोई नाम न दो (प्यार की कहानियां), घर बुनते हुए, सडक़ नं. 30 (सभी कहानी संग्रह), आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा (व्यंग्य संग्रह) अक्षरों की नाव, ऊंचाइयों वाला बौनापन (कविता संग्रह), अभिशप्त दाम्पत्य (लघु उपन्यास) मुखौटे (पुरस्कृत नाटक), नक्सलवाद एवं छत्तीसगढ़ पर दो पुस्तिकाएं। स्ट्रइकर, स्ट्रापर एवं कोनी- मति नंदी के बांग्ला उपन्यासों, हरीघास पर नंगे पांव- गौतम कुमार झा एवं मदर टेरेसा- ए.के.गुप्ता की बांग्ला कविताओं का हिन्दी अनुवाद। 20 वर्षों तक सार्वजनिक क्षेत्रों के उद्योगों में अफसरी, 25 वर्ष से पत्रकारिता, अंतिम नौकरी जनसत्ता रायपुर में। संप्रति- कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय के अंतर्गत स्थापित माधव राव सप्रे राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोधपीठ में अध्यक्ष। कुछ पुरस्कार, ढेर से मित्र, स्थानीय व राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लेखन। पता - सी-29 आकृति, सेक्टर-3, देवेन्द्र नगर, रायपुर (छ.ग.) 492001 मोबाइल 092292 59201
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प्रो. राधाकांत चतुर्वेदी


वनस्पति शास्त्र के प्रोफेसर। प्राचार्य के पद से सेवानिवृत्त। कई पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों पर लेख प्रकाशित। अध्ययन में विशेष रूचि। पता - डी - 38 आकृति गार्डेन्स, नेहरु नगर, भोपाल (मप्र)

महावीर अग्रवाल


जन्म - 25 मई 1946 कुरुद रायपुर छत्तीसगढ़ शिक्षा- एम काम, पीएचडी। प्रमुख कृतियां- लाल बत्ती जल रही है, गधे पर सवार 21वीं सदी (व्यंग्य संग्रह), श्वेत कपोत की वसीयत, कुष्ठ और सामाजिक चेतना (रिर्पोताज), न्याय के लिए लड़ता हुआ जटायु (भाऊ समर्थ पर), आखिर कब तक, काशी का जुलाहा (नाटक), छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य नाचा, तीजन की कहानी, पंडवानी की खुशबू, ऋतु वर्मा (बाल साहित्य), हबीब तनवीर का रंग संसार आदि कई पुस्तकों का संपादन। पिछले 23 वर्षों से साहित्यिक पत्रिका सापेक्ष का प्रकाशन। पता- संपादक 'सापेक्ष' ए-14, आदर्श नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़) 491003, फोन 0788-2210234

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आलोक सातपुते


शिक्षा - एम काम, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ हंस, कथादेश, कादांबिनी, कथाक्रम और समरलोक में लघुकथाओं का निरंतर प्रकाशन तथा आकाशवाणी से कहानियों का प्रसारण। अपने-अपने तालिबान (लघु कथा संग्रह) संप्रति- कार्यकारी संपादक पंचमन (पंचायत ग्रामीण विकास की पत्रिका) पता- झंडा चौक, बजरंग नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)

मोबाइल 9827406575, Email-satputealok@rediffmail.com
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गोविन्द मिश्र


जन्म तिथि-1 अगस्त 1939, अतर्रा बांदा उत्तरप्रदेश में, शिक्षा- हिन्दी साहित्य सम्मेन प्रयाग की विशारद परीक्षा उत्तीर्ण, अंग्रेजी साहित्य में एमए। प्रमुख कृतियां- वह अपना चेहरा, उतरती हुई धूप, लाल पीली जमीन, हुजूर दरबार, तुम्हारी रोशनी में, धीर समीरे, पांच आंगनों वाला घर, फूल, इमारतें और बन्दर, कोहरे में कैद रंग, धूल पौधों पर (उपन्यास) - नये पुराने मां-बाप, अंत:पुर, धांसू, रगड़ खाती आत्महत्यायें मेरी प्रिय कहानियां, अपाहिज, खुद के खिलाफ, खाक इतिहास, पगला बाबा, आसमान कितना नीला, स्थितियां रेखांकित (कहानी संग्रह), धुंध भरी सुर्खी, दर$ख्तों के पार ... शाम, झूलती जड़ें, परतों के बीच और यात्राएं (यात्रा वृत्तान्त ), साथ में कई साहित्यिक निबंध, बाल साहित्य, कविता, एवं साक्षात्कारों का संकन। सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन।

पता- एच एक्स 94, ई-7, अरेरा कॉलोनी, भोपाल-462016 (म.प्र.)

फोन नं. 0755- 2467060, मोबाइल 9827560110

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मधु अरोड़ा


कविताओं और लेखों में विशेष रुचि. कई साहित्यकारों के साक्षात्कार लिये जो विभिन्न पत्रिकाओं और नेट पत्रिकाओं में प्रकाशित। पता-एच1/101 रिद्धि गार्डन फिल्म सिटी रोड, मालाड पूर्व मुंबई - 400097

मोबाइल 0983395921

Email-shagunjiyxz@gmail.com

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देवमणि पांडेय


जन्म- 4 जून 1958 को सुलतानपुर (उ.प्र.) शिक्षा - एमए- हिन्दी और संस्कृत, अखिल भारतीय स्तर पर लोकप्रिय कवि और मंच संचालक के रूप में सक्रिय प्रमुख कृतियां- दिल की बातें और खुशबू की लकीरें (काव्य संग्रह)। फि़ल्म पिंजर, हासिल और कहां हो तुम के अलावा कुछ सीरियलों में भी गीत लिखे। 'पिंजर' के गीत 'चरखा चलाती माँ...' को वर्ष 2003 के लिए 'बेस्ट लिरिक आफ दि इयर' पुरस्कार से सम्मानित। संपादित सांस्कृतिक निर्देशिका 'संस्कृति संगम' के द्वारा मुम्बई के रचनाकारों को एकजुट करने में अह्म भूमिका। संप्रति- मुम्बई में एक केंद्रीय सरकारी कार्यालय में कार्यरत। पता- ए-2, हैदराबाद एस्टेट, नेपियन सी रोड, मालाबार हिल, मुम्बई - 400 036

मोबाइल 099210-82126 फोन 022-23632727

आपके पत्र

एक कहानी को भी स्थान दें

नवंबर माह की उदंती.com । पत्रिका की सुन्दर कलात्मक छपाई उसका प्रस्तुतीकरण बहुत सुन्दर है मेरी बधाई स्वीकार करें। इस का कलापक्ष सोनाबाई की कलाकृतियां, फीचर, लेख सभी पठनीय हैं। छत्तीसगढ़ का इतना अच्छा प्रस्तुतीकरण अब तक नहीं देखा। मेरी कामना है उदंती इसी प्रकार उन्नत होती रहे एक सुझाव है यदि हो सके तो एक कहानी को भी स्थान दे।

-आशा भाटी, इंदिरा नगर, लखनऊ

पहल तो करनी होगी

सही कहा आपने पहल तो करनी ही होगी। सबसे अच्छी पहल वही होती जो खुद से की जाएं। जिस व्यवहार से हमें तकलीफ होती है वो व्यवहार हमें नहीं करना है। बस हो गई पहल। ट्रेफिक रुल्स का पालन करना खुद से की शुरु करें।

-अंजीव पांडे, रायपुर से

0 आपने सही कहा किसी को तो पहल करनी होगी । यह एक अच्छा प्रयास है और ऐसी बत्तमीजियां मैंने भी देखी है आपका गुस्सा जायज है !!

-दीपक, कुवैत से
मन को मोह लेता है

मेरे पास इस समय नेट पत्रिका और प्रकाशित दोनों पत्रिका सामने है। ऐसी पत्रिका मैंने कम से कम भारत में और अपने जीवन में नहीं देखी। साज- सज्जा तो मन को मोह लेता है, सामग्री का चयन साबित करता है। मुझे दुख होता रहेगा कि क्योंकर मैं इसमें पहले नहीं छपा। साधुवाद।

- जयप्रकाश मानस, संपादक सृजनगाथा, रायपुर से


मुस्कुराता हुआ गुलाब का फूल

नवंबर अंक का मुख पृष्ठ अपने कला पक्ष के लिए अद्वीतीय तो है ही, पत्रिका को हाथ में लेते ही ताजे खिले मुस्कुराते हुए गुलाब के फूल का अहसास होता है। भीतर के पृष्ठों में अंक संयोजन काबीले तारीफ है। रचनाएं इस बात की ओर इंगित करती हैं कि किसी कलाकार ने पूरी पत्रिका को मन से गढ़ा है। बधाई।

- रोशनी मेहता, दिल्ली से

छत्तीसगढ़ की संस्कृति और तहजीब

धन्य है वो माटी

सर्वप्रथम आप को बधाई इतनी सुंदर पत्रिका के प्रकाशन के लिए! नवंबर अंक में सोनाबाई से लिया गया साक्षात्कार पढ़ा ! धन्य है वो माटी जिसमें उस जैसी कलाकारा पैदा हुई जिसकी माटी ने उसकी माटी को भी बदल डाला! किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति, उसकी रहन-सहन उसके रीति रिवाज होते हैं!

छत्तीसगढ़ तो अपने आप में अपनी ही नहीं बल्कि भारत की संस्कृति उसके तहजीब के लिए पूरे संसार में जानी जाती है! आप का वार्तालाप जिस तरह से और जिन बारिकियों को उभार के लाया है साथ में बड़े सरल एवम् मार्मिक तरीके से जिन अनछुए पहलुओं को आप ने छुवा वह भी तारीफे काबिल है। यह लेख आनेवाली पीढ़ी के लिए एक रचनात्मक काम करेगा! बहुत अच्छा लगा पत्रिका को पढक़र। आभार ।

-पराशर गौर, कनाडा से