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Nov 2, 2025

लघुकथाः सहानुभूति

- सतीशराज पुष्करणा

कहीं से स्थानान्तरण होकर आए नए-नए अधिकारी एवं वहाँ की वर्कशाप के एक कर्मचारी रामू दादा के मध्य अधिकारी के कार्यालय में गर्मागर्म वार्तालाप हो रहा था।

अधिकारी किसी कार्य के समय पर पूरा न होने पर उसे ऊँचे स्वर में डाँट रहे थे-"तुम निहायत ही आलसी और कामचोर हो।"

"देखिए सर! इस तरह गाली देने का आपको कोई हक नहीं है।"

"क्यों नहीं है? "

"आप भी सरकारी नौकर हैं, और मैं भी।"

"चोप्प! "

"दहाड़िए मत! आप। ट्रांसफर से ज्यादा मेरा कुछ भी नहीं कर सकते।"

"और वही मैं होने नहीं दूँगा।"

"आपको जो कहना या पूछना हो, लिखकर कहें या पूछें। मैं जवाब दे लूँगा। किन्तु इस प्रकार आप मुझे डाँट नहीं सकते। वरना…"

"मैं लिखित कार्रवाई करके तुम्हारे बीवी-बच्चों के पेट पर लात नहीं मारूँगा। गलती तुम करते हो। डाँटकर प्रताड़ित भी तुम्हें ही करूँगा। तुम्हें जो करना हो….कर लेना। समझे?"

निरुत्तर हुआ-सा रामू इसके बाद चुपचाप सिर झुकाए कार्यालय से निकल आया।

बाहर खड़े साथियों ने सहज ही अनुमान लगाया कि आज घर जाते समय साहब की खैर नहीं। दादा इन्हें भी अपने हाथ जरूर दिखाएगा, ताकि फिर वे किसी को इस प्रकार अपमानित न कर सकें।

इतने में से उन्हीं में से कोई फूटा-"दादा! लगता है इसे भी सबक सिखलाना ही पड़ेगा।"

"नहीं रे! सबक तो आज उसने ही सिखा दिया है मुझे। वह सिर्फ अपना अफसर ही नहीं, बाप भी है, जिसे मुझसे भी ज्यादा मेरे बच्चों की चिन्ता है।"

इतना कहकर वह अपने कार्यस्थल की ओर मुड़ गया।

कविताः अपने आप से

  - विजय जोशी 

याद है

उस दिन तुमने कहा था

कि मन नहीं भरा आपका

दुनिया से, जीवन से

इस सारी उहापोह और उलझन से

जो अब भी, करते हैं कविता

जीवन में भरते हैं, रंगों की सरिता

और यह भी कहा था

जिसे आप प्यार कहते हैं

महज एक स्वार्थ है

जहाँ हम

केवल अपने आप से प्यार  करते हैं

और दूसरे

हमारी इच्छाओं का घट भरते हैं

 

तुम्हारी बात ने

मुझे अंदर तक हिलाया

मैं अंदर ही अंदर कुलबुलाया

फिर खुद ही खुद से बोला

अपना अंतरपट खुद ही खोला

हाँ तुम ठीक कहती हो

आम भाषा में

जिसे सब प्यार कहते हैं

सिर्फ एक स्वार्थ है, जहाँ हम

केवल अपने आप से प्यार करते हैं

और दूसरे

न चाहते हुए भी

हमारी मंशाओं को ढोते हैं

पर मेरे लिए तो

प्यार है

एक रंगों भरा विस्तृत आकाश

जिसमें समाया है निश्चल विश्वास

मुझे याद आ रहा है

बचपन में कभी, मैंने कहीं पढ़ा था

कि किसी जन्म में, हम जाने- अनजाने

जिन्हें तकलीफ पहुँचा देते हैं

वे ही अगले जन्म में

हमारे बनकर, फिर मिलने आते हैं

ताकि हम रिश्तों की अहमियत को

फिर से समझ सकें

और इस तरह

अपने पूर्व जन्म के कर्मों को

न सिर्फ धो सकें

बल्कि आगे के सफर में

स्नेह की फसलें भी बो सकें

कहा भी तो गया है कि

हम पूर्व जन्म के ऋण

इस जन्म में चुकाते हैं

और जन्म जन्मांतर के रिश्तों को निभाने

फिर से आते हैं

जिस दिन से

यह भेद मेरी समझ में आ गया

मेरा पूरा सोच ही बदल गया

और आगे का जीवन

फिर से सँवर गया

 

शायद वही दिन था

हाँ वही दिन था कि

मेरे लिए प्यार के मायने बदल गए

संशय के बादल नेपथ्य में फिसल गए

अब तो मैं, सभी को प्यार करता हूँ

हर अच्छाई पर, पूरे मन से मरता हूँ

अपने स्वार्थी मन को भी

अब नहीं पहचानता

कैसा होता है मतलबी जहाँ

यह भी नहीं जानता

रिश्तों में अब है मेरा गहरा यकीन

और मेरे इरादों के नीचे है ठोस जमीन

 

सच कहूँ तो

इतना जीवन जीने के बाद

बहुत कुछ खोने और पाने के उपरांत

मैं यह भी जान गया हूँ

समग्र सत्य को पहचान गया हूँ

कि उम्र के इस दौर में मुझे

व्यक्तिगत नहीं

समष्टिगत होकर जीना होगा

खुद की न सोचकर

दूसरों के दुखों को

शिव- सा पीना होगा

तभी तो कुछ होगा सार्थक

वरना यह तथाकथित

पद- प्रतिष्ठा, धन- दौलत, मान- सम्मान

ओहदों का गुमान

सब कुछ है निरर्थक

 

यही तो है

हाँ केवल यही तो है

जन्म- जन्मांतर से चला आ रहा

हम सबका शाश्वत धर्म

जिसे निभाना ही होगा

और शेष जीवन

दूसरों के लिए

पूरी शिद्दत की साथ

बिताना ही होगा

                आमीन !


प्रेरकः क्रोध का उपचार कैसे करें?

  - निशांत

हमारे भीतर क्रोध तब उपजता है, जब हम स्वयं से तथा क्रोध उपजानेवाले दीर्घकालिक और तात्कालिक कारणों से अनभिज्ञ होते हैं। इस अनभिज्ञता के कारण ही क्रोध जैसे अप्रिय मनोभाव का उदय होता है। लालसा, अभिमान, उत्तेजना, ईर्ष्या और संदेह भी क्रोध का मूल हैं। चूँकि क्रोध हमारे भीतर ही जन्म लेता है; इसलिए हम ही इसके प्राथमिक कारक हैं। अन्य व्यक्ति तथा परिवेश आदि सदैव गौण होते हैं। प्रकृति के प्रलयंकारी विप्लव यथा भूकंप अथवा बाढ़ आदि द्वारा घटित विनाश एवं हानि का आकलन करना हमारे लिए कठिन नहीं है और उन्हें हम किंचित सहनशीलता से स्वीकार भी कर लेते हैं; लेकिन जब कोई व्यक्ति हमें क्षति पहुँचाता है , तो हमारा धैर्य चुक जाता है। हमें इस पर विचार करना चाहिए कि जिस प्रकार भूकंप अथवा बाढ़ आदि के सुनिश्चित कारण होते हैं, उसी प्रकार हमारे भीतर क्रोध भड़कानेवाले व्यक्ति के भीतर भी हमें क्रुद्ध करने के लिए दीर्घकालिक एवं तात्कालिक कारण मौजूद होते हैं। ठीक वही कारक हमारे भीतर भी अवस्थित हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए, यह संभव है कि हमसे दुर्व्यवहार करने वाले व्यक्ति के साथ एक दिन पहले किसी ने बुरा बर्ताव किया हो या उसके पिता ने उसपर बचपन में क्रूरता बरती हो। ये घटनाएँ उसके भीतर क्रोध उपजाने वाले तात्कालिक या सुषुप्त कारक हो सकतीं हैं। यदि हम इन कारणों या कारकों को अंतर्दृष्टि के साथ और बोधपूर्वक समझने लगेंगे तो क्रोध से मुक्ति सहज हो जाएगी। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे ऊपर घातक प्रहार करने वाले व्यक्ति को यूँ ही जाने दिया जाए, उसे अनुशासित करना अति आवश्यक है ; लेकिन इसके पहले यह ज़रूरी है कि हम अपने भीतर से नकारात्मकता को बाहर निकाल फेंकें। किसी व्यक्ति की सहायता करने अथवा उसे सही मार्ग पर लाने के लिए हमारे भीतर करुणा होनी चाहिए। जब तक हम अन्य व्यक्तियों के दुःख की समानुभूति नहीं करेंगे, तब तक हम इस योग्य नहीं बन सकते कि उसे दुःख और भ्रान्ति के दलदल से बाहर निकाल सकें। क्रोध के उपचार के लिए इन बिन्दुओं पर भी मनन करना उपयोगी होगा:

किसी कष्टदायक परिस्थिति का सामना करने पर हमारे भीतर प्रतिरोध की भावना जन्म लेती है और हमारा क्रोध बढ़ने लगता है। हमारे क्रोध की अभिव्यक्ति सामनेवाले व्यक्ति के भीतर खलबली मचाती है और वह अपनी पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए फिर कुछ ऐसा कहता या करता है, जिससे हमारा क्रोध उग्र हो जाता है। यह एक चक्र की भांति है। इसलिए यह कहा जाता है कि ऐसी दशा में उस परिस्थिति से बाहर निकाल जाना ही सबसे उचित उपाय है; लेकिन ऐसे भी कुछ अवसर हो सकते हैं, जब यह उपाय कारगर न हो। यह और कुछ नहीं; बल्कि पलायन ही है।

हमारे अंगों की भांति ही क्रोध भी हमारी काया का ही एक भाग है। अंतस् में क्रोध उपजने पर हम इससे यह नहीं कह सकते- “दूर चले जाओ, क्रोध! मैं तुम्हें नहीं चाहता!” जब हमारे पेट में दर्द होता है तब हम यह नहीं कहते - “दूर हट जाओ, पेट! मत दुखो!” इसके उलट हम उसका उपचार करते हैं। ऐसा ही हमें क्रोध के साथ भी करना होता है। क्रोध और घृणा की उपस्थिति प्रेम और स्वीकरण के अभाव की द्योतक नहीं होती। प्रेम सदैव भीतर रहता है। उसकी खोज करनी पड़ती है।

क्रोध उपजने की दशा में कुछ सँभलें और अपने ग्रहणबोध का अवलोकन करें। यह कुछ कठिन है पर साधने पर सध जाता है। हम सभी बहुधा ही अनुभूतियों के संग्रहण में तत्परता दिखाते हैं और अनुचित भावनाओं को प्रश्रय देते हैं , जबकि हमारे भीतर करुणा और शांति का इतना विराट संचय होना चाहिए कि हम अपने विरोधियों से भी प्रेम कर सकें।

जब आपको किसी व्यक्ति पर क्रोध आये तो यह नहीं दर्शाएँ कि आप क्रुद्ध नहीं हैं। यह भी नहीं दिखाएँ कि आपको बिलकुल पीड़ा नहीं हुई है। यदि सामनेवाला व्यक्ति आपका प्रिय है, तो आपको उसे यह जताना चाहिए कि आपको उसके वचनों या कर्मों से दुःख पहुँचा है। उसे यह प्रेमपूर्वक बताएँ।

प्रारंभ में आप यह समझ नहीं पाएँगे कि आपके भीतर क्रोध कैसे उपजता है और यह भरसक प्रयत्न करने के बाद भी क्यों नहीं गलता। यदि आप अपने मनोभावों के प्रति जागरूक बनें और क्षण-प्रतिक्षण सजग एवं सचेत रहने का अभ्यास करेंगे, तो आप क्रोध की प्रकृति को पहचान जाएँगे और इससे छुटकारा पाना सरल हो जाएगा।

किसी भी व्यक्ति में क्रुद्ध होने के संस्कार अल्पवय में पड़ते हैं। इसका संबंध दिन-प्रतिदिन घटनेवाली घटनाओं से है। यदि आप भेदभाव किये बिना स्वयं की देखभाल करेंगे और मन में नकारात्मकता को हावी नहीं होने देंगे, तो आपकी सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होगी। गीता में कहा गया है - “भुने बीजों में कामना का अंकुर नहीं फूट सकता”, इस बात को मैं क्रोध पर भी लागू करता हूँ।

क्रोध और हताशा का प्रवाह बहुधा बहा ले जाता है, फिर भी मानव मन के किन्हीं कोटरों में प्रेम और क्षमा बची रह जातीं हैं। क्रोध प्रत्येक प्राणी को आता है पर मनुष्यों में यह योग्यता है कि वे दूसरे व्यक्ति से सार्थक संवाद स्थापित कर सकते हैं। हम मनुष्य क्षमाशील हैं। हम करुणावश अपना सर्वस्व भी न्योछावर करने की शक्ति व संकल्प रखते हैं। हम केवल क्रोध एवं दुःख का समुच्चय नहीं हैं। अपने क्रोध का अवसान करने शांति प्राप्त कर सकते हैं। केवल क्रोध को दूर करने के प्रयोजन के लिए ही नहीं; बल्कि स्वयं के भीतर उतरकर देखने के अभ्यास के फलस्वरूप हम अन्य मनोविकारों से भी छुटकारा पा सकते हैं। हम क्रोध के बीज को अंकुरण की प्रतीक्षा करते भी देख सकते हैं। वास्तविकता का भान होने पर हम यह जान जाते हैं कि क्रोध का मूल कारण हमारे भीतर ही निहित होता है और वह व्यक्ति निमित्त मात्र है, जिसपर क्रोध किया जा रहा है। वह हमारे क्रोध का पात्र नहीं है। क्रोध हमारे भीतर है; अतः हम ही उसका पात्र हैं।

यदि आपके घर में आग लग जाए, तो आप सबसे पहले क्या करेंगे? आप आग बुझाने का जतन करेंगे या आग लगानेवाले व्यक्ति-वस्तु की खोज करेंगे? उस घड़ी में यदि आप आग लगने के कारणों का अनुसंधान करने लगेंगे, तो आपका घर जलकर ख़ाक हो जाएगा। ऐसे में सर्वप्रथम आग बुझाना ही श्रेयस्कर है। अतः क्रोध की अवस्था में आपका अन्य व्यक्ति से वाद-विवाद जारी रखना उचित नहीं होता।

क्रोध आने की दशा में पानी पी लेना, सौ तक की गिनती गिनना, मुस्कुराना, या उस स्थान से दूर हट जाना समस्या का समाधान नहीं है। यह एक प्रकार का दमन ही है इसलिए मैं ऐसे उपायों का समर्थन नहीं करता। क्रोध एक आतंरिक समस्या है और इसका कोई बाहरी समाधान नहीं है।

तिक न्यात हंह की एक पुस्तक से एक कथा उद्घृत करना चाहूँगा:

एक धर्मावलम्बी महिला अमिताभ बुद्ध की नियमित आराधना करती थी। दिन में तीन बार घंटी बजाकर- ‘नमो अमिताभ बुद्ध’ मन्त्र का एक घंटा जप करना उसकी दिनचर्या में शामिल था। मन्त्र का एक हज़ार जप करने पर वह पुनः घंटी बजाती। यह आराधना करते उसे दस वर्ष हो रहे थे; पर उसके व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन नहीं आया। उसके भीतर क्रोध और अहंकार भरपूर था और वह लोगों पर चिल्लाती रहती थी।

उस महिला का मित्र उसे सबक सिखाना चाहता था। एक दिन महिला जब अगरबत्तियाँ जलाकर और तीन बार घंटी बजाकर ‘नमो अमिताभ बुद्ध’ मन्त्र का जप करने के लिए तैयार हुई तब उसके मित्र ने दरवाज़े पर आकर कहा, “श्रीमती नगुयेन, श्रीमती नगुयेन!” यह सुनकर महिला को बहुत गुस्सा आया; क्योंकि वह जप करनेवाली ही थी। वह मित्र दरवाजे पर खड़ा रहा और उसका नाम पुकारता रहा। महिला ने सोचा, मुझे अपने क्रोध पर विजय पानी है, मैं उसके पुकारने पर ध्यान ही नहीं दूँगी। वह ‘नमो अमिताभ बुद्ध’ का जप करने लगी।

वह व्यक्ति दरवाजे पर खड़ा था और बार-बार उसे पुकार रहा था, दूसरी ओर महिला का क्रोध बढ़ता जा रहा था। वह क्रोध से लड़ रही थी। उसके मन में आया, क्या मुझे जप रोककर उठ जाना चाहिए? लेकिन उसने जप करना जारी रखा। भीतर क्रोध की आग धधकती जा रही थी और बाहर जप चल रहा था, ‘नमो अमिताभ बुद्ध’। उसका मित्र उसकी दशा भाँप रहा था; इसलिए वह दरवाज़े पर खड़ा पुकारता रहा, “श्रीमती नगुयेन, श्रीमती नगुयेन!”

महिला और अधिक बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसने अपने घंटी और आसनी फेंक दी, भड़ाम से दरवाजा खोला और मित्र से चीखती हुई बोली, “तुम ऐसा क्यों कर रहे थे? बार-बार मेरा नाम लेने की क्या ज़रूरत थी?

उसका मित्र मुस्कुराता हुआ बोला, “मैंने सिर्फ दस मिनट ही तुम्हारा नाम लिया और तुम इतना क्रोधित हो गईं! ज़रा सोचो, दस साल से तुम बुद्ध का नाम ले रही हो, वे कितना क्रोधित हो गए होंगे।?” (हिन्दी जेन से)


लघुकथाः गुब्बारा

 - श्यामसुन्दर 'दीप्ति'

गली में गुब्बारेवाला रोज गुजरता। वह बाहर खड़े बच्चे को गुब्बारा पकड़ा देता और बच्चा माँ-बाप को दिखाता। फिर बच्चा खुद ही पैसे दे जाता था । इसी तरह एक दिन मेरी बेटी से हुआ। मैं उठकर बाहर गया और गुब्बारे का एक रुपया दे आया। दूसरे दिन फिर बेटी ने वैसा ही किया। मैंने कहा, "बेटे, क्या करना है गुब्बारा? रहने दो न!" पर कहाँ मानती थी, रुपया ले ही गई। तीसरे दिन जब रुपया दिया तो लगा कि भई रोज-रोज तो यह काम ठीक नहीं। एक रुपया रोज महज दस मिनट के लिए। अभी फट जाएगा।

मैंने आराम से बैठकर बेटी को समझाया,"बेटे! गुब्बारा कोई खाने की चीज है? नहीं न! एक मिनट में ही फट जाता है। गुब्बारा अच्छा नहीं होता। अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते। हम बाजार से कोई अच्छी चीज लेकर आएँगे।"

वह सिर हिलाती रही।

अगले दिन जब गुब्बारेवाले की आवाज गली में आई, तो बेटी बाहर न निकली और मेरी तरफ देखकर कहने लगी, "गुब्बारा अच्छा नहीं होता न। भैया रोज ही आ जाता है। मैं उसे कह आऊँ कि वह चला जाए।"

"वह आप ही चला जाएगा।" मैंने कहा। वह बैठ गई।

उससे अगले दिन गुब्बारेवाले की आवाज सुनकर वह बाहर जाने लगी, तो मुझे देख कहा, "मैं गुब्बारा नहीं लूँगी" और जब वह वापस आई, तो फिर कहा, "अच्छे बच्चे गुब्बारे नहीं लेते न? राजू तो अच्छा बच्चा नहीं है। गुब्बारा तो एक मिनट में फट जाता है।" और कहती हुई मम्मी के पास रसोई में चली गई और मम्मी से कहने लगी, "मम्मी जी, मुझे गुब्बारा ले दो न!"

पिछले दिनों - सुनीता आर्ट गैलरी में लोक कलाकारों का भावनात्मक संगम

 दाऊ रामचंद्र देशमुख जयंती

भिलाई प्रगति नगर रिसाली में स्थित सुनीता आर्ट गैलरी एवं म्यूज़ियम में पिछले दिनों छत्तीसगढ़ की लोक सांस्कृतिक चेतना के प्रेरणास्रोत कला ऋषि दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के जन्मदिवस 25 अक्टूबर के अवसर पर एक गरिमामय सांस्कृतिक एवं कलात्मक समागम का आयोजन हुआ।

इस आयोजन में चंदैनी, गोंदा और कारी से जुड़े कई वरिष्ठ कलाकार शामिल हुए जिन्होंने रामचंद्र देशमुख जी के साथ कार्य किया था। इस अवसर पर सभी कलाकारों ने अपने अनुभव साझा करते हुए दाऊ जी की स्मृतियों और उनके  छत्तीसगढ़ के प्रति लोककला के योगदान को भाव विभोर होकर याद किया। ज्ञात हो कि 70 के दशक में गाँव - गाँव में प्रदर्शित रामचंद्र देशमुख के लोक नाट्य चंदैनी गोंदा और कारी ने छत्तीसगढ़ की संस्कृति में नए प्रतिमान स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

कार्यक्रम का शुभारंभ दाऊ जी के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन करके किया गया। तदुपरांत आर्ट गैलरी की संस्थापक डॉ. सुनीता वर्मा ने सभी सम्मानित अतिथियों का स्वागत और  अभिनंदन करते हुए कहा - आज के इस आत्मीय और भावनात्मक आयोजन से मेरी आर्ट गैलरी को आप सभी वरिष्ठजन का आशीर्वाद मिल गया है। मैं अभीभूत हूँ और हृदय से आप सभी का स्वागत करती हूँ।  

इसके पश्चात् प्रो. सुरेश देशमुख, जो दाऊ जी के साथ उनकी कला यात्रा में आरंभ से साथ रहे, ने आयोजन के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा - दाऊ जी ने छत्तीसगढ़ की लोककला को जन-जन तक पहुँचाने के साथ समाज में व्याप्त भेद-भाव की रूढ़ परंपराओं में बदलाव लाने का दायित्व बखूबी निभाया है।  उस दौर के साथी कलाकार चूँकि एक के बाद एक साथ छोड़ते चले जा रहे हैं, अतः उन कलाकारों की स्मृतियों और अनुभवों को संरक्षित करना अब जरूरी हो गया है, जिन्होंने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को सँजोया और गढ़ा है।

कार्यक्रम में उपस्थित सम्मानित कलाकारों में प्रमुख रहे - प्रो. शैलजा ठाकुर, अनुराग ठाकुर चौहान, साधना यादव,  संतोष झाँझी, डॉ. मीनाक्षी दुबे, कविता वासनिक, विवेक वासनिक, प्रो. सुरेश देशमुख, मदन शर्मा, विजय मिश्रा, प्रमोद यादव, विनायक अग्रवाल, कृष्ण कुमार चौबे, अग्नू, अरुण निगम और विजय वर्तमान। अन्य आमंत्रित अतिथि थे- डॉ. रत्ना वर्मा, डॉ. तरुण नायक, राजेन्द्र वर्मा, आयुश चंद्रवंशी और धनंजय ।

सुनीता आर्ट गैलरी में आयोजित इस कार्यक्रम में  भोजनोपरांत सभी वरिष्ठ कलाकारों का शॉल और श्रीफल भेंट कर सम्मान किया गया। लोक कलाकारों की उपस्थिति में  सुनीता आर्ट गैलरी का यह परिसर सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक भूली- बिसरी यादों से गुंजायमान रहा।