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Aug 1, 2025

कविताःरूठ गईं हैं फुर्सतें

 - निर्देश निधि

आधुनिक जीवन से रूठ गई हैं फुर्सतें

उभर आती थीं अक्सर 

खाली कागजों पर खेल- सी

लुओं से भरी दुपहरियों में पड़ी रहती थीं

खस- खस की टाटी वाली खिड़कियों के पास 

लटकती हरी - भरी बेल- सी

सर्द रातों में चारों तरफ अलाव के

सुनती थीं किस्से, कहती थीं कहानियाँ,

कँपकँपाती, ठिठुरती फुर्सतें

गाँव की चौपाल पर गर्मियों की साँझ ढले

हुक्कों की गुड़ - गुड़ के 

सुर में सुर मिलाती पसर जातीं घंटों

बान वाली खाटों पर निठल्ली फुर्सतें

साँझ से भी पहले ही

शिव मंदिर की सीढ़ियों पर

सज जाती थीं सनातनी फुर्सतें

याद है बिरजू को 

कम्मों की आँख में मुसकुराती फुर्सतें

गुड़िया और पप्पू- सी

कंधे चढ़ी, गोद पड़ी, खिलखिलाती फुर्सतें

गारे सनी, गलियों के गात पर

गिल्ली- डंडा खेलतीं अलमस्त फुर्सतें

परिवर्तन की पवन में जाती हैं सामने से

तीव्र गति वाली रेल सी

व्यस्तता के सोने बीच रहती बधेल- सी

फुर्सतों के साथ भी रहतीं फुर्सतें

अक्सर बेमेल- सी

गोधूलि में जीवन की बरसतीं बरसात बन

थकी – माँदी ज़िंदगी को बाढ़ बन डराती हैं

निर्दयी फुर्सते


कहानीःसौगात

  - सुमन कुमावत

राखी के त्योहार के दिन की धुंधली-सी सुबह । अंजना को विस्मय हो रहा था कि तीनों भाइयों में से किसी का भी फोन नहीं आया, पहले तो राखी आने के दो दिन पहले से ही, भाई और भाभियाँ फोन कर जल्दी आने का आग्रह किया करती थी और बच्चों को साथ लेकर आने का भी कहती रहती थीं। लेकिन वह बच्चों को उनके दादा- दादी की देखभाल के लिए घर पर ही छोड़ कर आती थी।

पूरे साल में आखिर एक ही तो दिन होता है जब बहन भाइयों के लिए कुछ करती है, बाकी साल भर तो भाई–भाभी लोग ही अपनी बहनों के लिए कुछ न कुछ करते ही रहते हैं ।

लेकिन अंजना के साथ इसका उल्टा है, वह तो साल भर भाइयों की मदद किसी ना किसी बहाने से करती रहती थी।

माँ कहती है- "अंजना जैसी बहन होना मुश्किल है !"

अंजना दो दिन पहले से ही भाइयों को राखी बांधने की तैयारी बड़े ही प्रेम व उत्साह से कर रही थी। उसने रंग- बिरंगी, चमकीली, मोतियों वाली राखियाँ भाइयों के लिए, चूड़े की राखियाँ भाभियों के लिए, गुड्डे–गुड़ियों व कार्टून वाली राखियाँ बच्चों के लिए ली थीं । भाइयों की पसन्द की मिठाइयों में फीरणी, घेवर, जलेबी के छोटे–छोटे डिब्बे रख लिए थे। इसके अलावा भाइयों के लिए नारियल, बच्चों के लिए सूखा नारियल यानी खोपरा ,और भी बहुत चीजें इकट्ठा करने की अपनी हैसियत से ज्यादा कोशिश कर रही थी।

लेकिन एकदम से उसका मन बुझने लगता है, उसे याद आने लगता है कि पहले  हर साल वह सबके लिए चाँदी की राखियाँ और बच्चों के लिए ढ़ेर सारे खिलौने, कपड़े, घेवर-फीरणी, मिठाइयाँ, मेवे लेकर जाती थी।

पिछले साल बड़ी भाभी बोली थीं "हर साल चाँदी की राखी मत लाया करो अंजना बाई–सा, तुम्हारी पुरानी राखियों से ही डिब्बा भर चांदी इकट्ठी हो गयी हम सबके यहाँ।"

लेकिन इस बार हालात अलग हो गये है, इतना सब कुछ करना अब उसके वश में नहीं हैं।

चाय पीते- पीते उसने सोचा, मेरे भाई बहुत अच्छे हैं, वो मुझसे बहुत स्नेह रखते हैं, अतः वो मेरी मजबूरी अवश्य समझेंगे! उन्हें भी तो पता है, कि भाइयों के प्रेम में डूबे मेरे पति नौकरी छोड़ घाटे में जाते हार्डवेयर के व्यापार को बिना बँटवारा किए ही ऐसा संभाला कि उसे करोड़ों की सरकारी सप्लाई तक पहुँचा दिया था। लेकिन दो साल बाद ही मेरे जेठ व देवर ने सब शर्म-लिहाज छोड़ कर धोखे से जमीन– जायदाद, खेती- बाड़ी यहाँ तक कि जमी-जमाई दुकान सहित सब कुछ अपने नाम करके खड़े- खड़े हम सभी को घर से निकालकर दर- दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया।

अंजना ने एक लम्बी ठंडी साँस ली... ईश्वर का शुक्र था कि मेरे पास कुछ गहने थे, जिससे सिर छिपाने जितनी दो कमरों की छत कर ली और एक छोटी-सी दुकान डाल ली थी, नहीं तो इन तीनों छोटे-छोटे मासूम बच्चों और बूढ़े सास– ससुर को लिए हम कहाँ मारे– मारे फिरते? खैर, जो हुआ उसे बदला नहीं जा सकता! 

अचानक सबसे छोटी छह वर्षीय बेटी रीना, अंजना की गोदी में आकर धप् से बैठ गई, और पूछने लगी- "मम्मा, आज रक्षा- बंधन है?"

"हाँ बेटा।"

"आप हमेशा की जैसे मामा के यहाँ जाओगे ना..?"

"हाँ..हाँ बिटियाँ रानी जाएँगे न! बस अभी थोड़ी देर से, तुम दोनों बहनें पहले भैया के राखी बाँध दो, फिर जाती हूँ, जाओ.. जाओ.. जल्दी से तैयार हो जाओ.."

"लेकिन मम्मा, मुझे भी आपके साथ मामा के यहाँ चलना हैं।"

"नहीं मेरी बच्ची, तुम वहाँ जाकर क्या करोगी..?  मैं शाम तक वापस आ जाऊँगी.. तुम यहाँ दीदी, भैया के साथ खेलना, मैं तुम्हें फिर कभी ले चलूँगी।"

 “नहीं.. नहीं.. मम्मा मुझे तो आज ही चलना है।" इतना कह रीना मचलकर रोने लगी।

माँ से उसका रोना देखा न गया।

"अच्छा चल चुप हो जा, चलना मेरे साथ, मैं तुझे तैयार कर देती हूँ। भैया, के राखी भी तो बाँधना है।"

“हाँ, हाँ” वह खिलखिला कर हँस पड़ी, अंजना ने भी मुस्कुराकर उसे बाँहों में भर लिया और लाड़ से बोली "मेरी गुड़ियाँ रानी!"

रीना, टीना ने अपने भाई रवि को राखी बाँधी, उसके बाद अंजना ने सब बच्चों को खाना परोसा।

टीना बोली,"मम्मा, आप खाना क्यों नहीं खा रहे हो!"

“मैं तो मामा को राखी बाँधने के बाद खाऊँगी, वहाँ मामा भी भूखे होंगे न! वो मेरा इंतजार कर रहे होंगे...!"

चलो, अब मैं तैयार हो जाती हूँ, ऐसा कहकर वह उठी और अलमारी खोलकर सभी साड़ियों को उलट- पलटकर देखने लगी और सोचने लगी इसबार रक्षाबंधन पर वह नई साड़ी नहीं खरीद पाई। खैर जो भी है उसने उन्हीं में से एक सुंदर-सी साड़ी निकाली और झटपट तैयार होकर, रीना के साथ बस स्टॉप की ओर चल पड़ी। हालाँकि, उसका मायका ज्यादा दूर नहीं था, लगभग दस किलोमीटर ही होगा, लेकिन फिर भी वह कहाँ बार-बार मिलने जा पाती थी? हर गृहणी की तरह  उसके घर में भी हजारों काम थे, कभी कोई विशेष काम या किसी कार्यक्रम पर ही आना-जाना हो पाता था। बस में बैठते ही वह अपने मायके की यादों में खोती-सी चली गई!

अंजना के पिता सरकारी ठेकेदार थे, वे दस साल पहले एक एक्सीडेंट में अचानक खत्म हो गए तो घर बरबाद हो गया था, तीनों भाई बेरोजगार थे और फिजूल खर्च भी! छोटी-मोटी प्राइवेट नौकरी पकड़ के उनका गुजारा शुरू हुआ था। अपना फर्ज समझकर और भाइयों के प्रति अत्यधिक स्नेह रखने के कारण अंजना अपने भाइयों की हमेशा मदद करती रहती थी, उसने ही अपने बड़े भाई की एक वेल्डिंग की दुकान, मंझले की भी कपड़ों की और छोटे की किराने की दुकान खुलवाने में मदद की थी।

तीन भाइयों में दो भाई माँ के साथ एक ही मकान में रहते थे, जबकि तीसरा छोटा भाई पास ही दूसरे मकान में रहता था। आपसी विवाद के कारण दोनों बड़े भाई, छोटे भाई से बातचीत नहीं करते थे।

अंजना इन्ही ख्यालों में खोई हुई थी, तभी रीना ने अंजना का हाथ झिंझोड़ते हुए कहा- "मम्मा, मामा का घर आने वाला है, ऊपर से अपना सामान उतार लो!"

"हूँ..."एक संक्षिप्त-सा उत्तर अंजना ने सरका दिया और बाहर की ओर झाँका, वह बुदबुदाई-  "अरे.. सचमुच हम तो पहुँचने वाले हैं।"

खड़ी होकर सीट के ऊपर की ब्रेकेट से वह अपना सामान उतारने लगी।

बस से उतरकर उसने आस-पास नजरें घुमाई, उसे बस स्टॉप पर कोई नहीं दिखा, कभी उसे किसी कारणवश बस से आना पड़ता तो बड़े भैया हमेशा आते थे, चाहे उन्हें कितना ही जरूरी कार्य हो, उसे याद नहीं शायद ही कभी वो अकेली घर गयी हो। जरूर कोई बहुत जरूरी कार्य होगा, तभी तो कोई भी... उसने मन ही मन सोचा। हमेशा वह कार से आती थी तो घर के पास की गली में ही सब इंतजार करते हुए मिल जाते थे।

वैसे तो बस स्टॉप से उसका मायका ज्यादा दूर नहीं था, सो बस से उतरकर, सामान उठाकर वो घर की तरफ पैदल ही चल पड़ी।

बैठक के खुले द्वार से उसने प्रवेश किया तो बड़े भाई ने उसे देखते ही कहा, "आ गई अंजना?"

"हाँ.. भैया" उसने मुस्काते हुए कहा।

"चल यहीं बैठ, मैं सबको बुलाता हूँ।"

फिर भीतर आँगन की ओर मुँह करके वो बोले- "सब लोग नीचे आ जाओ, अंजना आ गई है!"

वह भाई का चेहरा देखती ही रह गई। थोड़ी देर में सब लोग अंजना के आसपास आ गए।

"आ गए दीदी", दोनों भाभियाँ बुझे से स्वर में एक साथ बोली।

"हाँ, भाभी!"

बैठो, चाय पिओगी ना? मैं चाय बना कर लाती हूँ।" बड़ी भाभी ने औपचारिकता वश पूछा,

"भाभी, पहले मैं सबको राखी बाँध देती हूँ, फिर आराम से बैठ कर साथ चाय पिएँगे।"

भाभी कुछ ना बोली। अंजना ने बारी-बारी से सबको राखी बाँध दी।

भाइयों ने कहा "अंजना, तुम अब खाना खा लो।"

"अभी नहीं भैया, पहले छोटे को भी राखी बाँधकर आ जाऊँ, फिर हम सब साथ बैठकर खाना खाएँगे।"

"लेकिन अंजना, हम सभी ने तो खाना खा लिया!"

अंजना ने चौंककर भाई की तरफ देखा, उसने मन ही मन सोचा कि इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था।

भाई ने बोलना जारी रखा- "वो क्या हैं न, तुम्हारा कोई भरोसा नहीं था, कि तुम कब तक आओगी। पहले तो फ़ोन पर बात हो जाती थी, लेकिन अब तुम्हारे घर में फ़ोन तो है नहीं, हम भी कैसे पता करते कि तुम कब तक आ रही हो?" अंजना भाई की बातें चुपचाप सुनती रही।

उसे सबका व्यवहार भी बदला-बदला-सा लग रहा था, छोटी भाभी ने भी ज्यादा बात नहीं की!

अरे...मैं, भी कैसी बुद्धू हूँ, क्या-क्या सोचने लग गई! सही भी तो हैं सब लोग कब तक मेरा इंतजार करते। मन ही मन उसने सोचा।

अंजना ने कहा- "कोई बात नहीं भैया, मैं भी खाना खा कर ही आई थी, अच्छा हुआ, आपने भी खाना खा लिया, वैसे भी, इस बार मुझे देर हो ही गई।"

और उसने धीरे से साड़ी के पल्लू से अपनी पलकें सुखाई।

"अच्छा भैया, मैं छोटे के यहाँ जाकर आती हूँ।"

वह छोटे भाई के यहाँ जाने लगी, तभी दौड़ते हुए रीना आई, और बोली.. "मम्मा, छोटे मामा के यहाँ मुझे भी चलना हैं।"

"मैं तो अभी थोड़ी देर में आ जाऊँगी, सब बच्चे यहीं खेल रहे हैं ना, तुम भी उनके साथ खेलों।"

"नहीं नहीं, मुझे तो आपके साथ ही चलना हैं।"

"रीना, अच्छे बच्चे ऐसे जिद नही करते।"

इतने में ही बड़े भैया, झुंझलाकर बोले - "हाँ, इसे भी ले जा अपने संग, छोटे के यहाँ से भी इसको कुछ ढंग के कपड़े, मिठाई, खिलौने और थोड़े बहुत पैसे मिल जाएँगे, जो तेरे घर खर्च चलाने में काम आएँगे।"

भैया की ये बात सुनकर वह अंदर तक हिल गई, उसकी नम हो गई और दिल एक अजीब-सी भावना से भर गया। उसे अपने आप पर यकीन ही नहीं हुआ कि ये मेरा ही भाई है, जब मेरे पास सब कुछ था, तब मेरी एक आवाज़ से दौड़ा चला आता था और जब आज मेरी ऐसी स्थिति है, तो मेरे अपने भाई, मेरी सहायता करने के बजाय मुझे दुत्कार रहे हैं! क्या खून के रिश्तों से बढ़कर इन लोगों के लिए मेरा पैसा और रुतबा था! "उफ़्फ़... कितनी मूर्ख बनी रही मैं इतने सालों तक। मेरे लिए रक्षाबंधन कभी कोई रस्म नहीं था, न ही सिर्फ़ एक धागा। वह तो एक विश्वास था - उस राखी की परंपरा में छिपा प्यार, अपनापन और सुरक्षा का वादा। एक बहन का विश्वास कि उसका भाई हर मुश्किल में उसके साथ खड़ा रहेगा...।"

लेकिन आज वही त्योहार - भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक - एक नए रूप में उसके सामने आया था। अंजना की आँखों में दर्द की स्याही उतर आई। एक भाई की मूक ममता और एक बहन की निस्वार्थ भावना का भ्रमरूपी पर्दा अब हट चुका था।

क्या आज उसे वास्तव में राखी के त्योहार की असली सौगात मिली थी? वह इसी द्वंद्व में उलझती जा रही थी। अपने भीतर उठते भावनाओं के तूफान को रोकने की कोशिश कर रही थी। उसके चेहरे पर गहरे दुःख की छाया थी, और आँखें भीगने लगी थीं। उसने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछनी चाहीं ही थीं कि अचानक कोमल हथेलियाँ उसके हाथ से छू गई और एक मीठी आवाज उसके कानों में गूँजी।

उसकी चार वर्षीय भतीजी स्वीटी उसका हाथ पकड़कर तोतली आवाज में बोल रही थी.. “बुआ, बुआ, जल्दी घल चलो, पापा, आपका इन्तजाल कल लहे हैं, हमने अभी तक खाना भी नहीं थाया। पापा बोल रहे थे बुआ आ जाएगी तब सब साथ में ही थाएँगे, चलो जल्दी, मुझे भी राखी बँधवाना है।”

अंजना ने अपनी नज़रें कृतज्ञता के भाव से ऊपर उठाई और बोली- “हे ईश्वर तूने भाई-बहन के रिश्तों की लाज रख ली। आज मुझे असली सौगात मिल गई।

उसने अपने कदम छोटे भाई के घर की ओर बढ़ा दिए। अब उसके मन में कोई द्वन्द्व नहीं था।

सम्पर्कः 10 MIG मुखर्जी नगर, बीमा रोड, समर्पण डेंटल क्लिनिक, देवास (म. प्र.) 455001, मो. - 9694533666

कविताः आँखों की बातें

 - अंजू निगम

कुछ आँखों में 

कभी शाम नहीं उतरती

और कुछ आँखों से 

हमेशा रात लिपटी रहती है

सुनो न ऐ जिन्दगी 

तुमने क्यों भर दिया

कुछ आँखों में आषाढ़ का महीना 

या क्यों नहीं टूटती

कुछ आँखों से पूस की रात 

मैं तुमसे बात करूँगी ज़िन्दगी

जब कभी मिलूँगी किसी नुक्कड़ पर

अच्छा लगेगा जब देखूँगी

इन आँखों में खिलते बसंत के फूलों को।


किताबेंः अक्षरलीला- लघु छंद में विराट अनुभूति

 -  रश्मि विभा त्रिपाठी

अक्षरलीला (हाइकु-संग्रह): रमेश कुमार सोनी, पृष्ठ: 112, मूल्य: 340 रुपये, ISBN: 978-93-6423-264-7, प्रथम संस्करण: 2025, प्रकाशक: अयन प्रकाशन, जे- 19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली— 110059

 रमेश कुमार सोनी की लेखनी ने छत्तीसगढ़ी व हिंदी में लेखन के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। रोली अक्षत (2004) तथा पेड़ बुलाते मेघ (2018) के बाद उनका तीसरा हाइकु- संग्रह अक्षरलीला मेरे हाथ में है।
 रमेश कुमार सोनी हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा में हाइकु, ताँका, सेदोका छंद को लोकप्रिय बनाने में अग्रणी रहे हैं। हिंदी हाइकु को पारंपरिक ढाँचे से बाहर निकालकर उसे छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकसंस्कृति से जोड़ने वाले वे पहले रचनाकार हैं। गुरतुर मया उनका छत्तीसगढ़ी हाइकु संग्रह है। उनकी कविताएँ जीवन, प्रकृति, समाज, पर्यावरण जैसे मुद्दों पर संवेदना व्यक्त करती हैं।
रमेश कुमार सोनी की रचनाओं में लघु छंदों के माध्यम से प्रकृति और समाज के साथ ही पारंपरिक और लोकभाषा संगम की अनूठी भूमिका देखने को मिलती है। वे भाषा और शैली में नवाचार लाते हुए विविध भावनात्मक पक्षों को हाइकु की मर्यादा में समेटने में सक्षम रहे हैं।
14 उपशीर्षकों में विभाजित अक्षरलीला लघु छंद में विराट अनुभूति का संग्रह है। सोनी जी का अनुभव संसार कितना व्यापक है, प्रतिष्ठित साहित्यकार रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की सूक्ष्म अंतर्दृष्टि से पता चलता है।
रमेश कुमार सोनी का हाइकु संग्रह ‘अक्षरलीला’ विषयवस्तु की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और विविधता से भरा हुआ है। इस संग्रह में जीवन के अनेक रूपों की सूक्ष्म झलकियाँ है, जो तीन पंक्तियों में हाइकुकार के पूरे अनुभव संसार को समेटने की कला को दर्शाती हैं। लेखक ने गाँव की सादगी और शहर की चहल-पहल, दोनों को संवेदनशील दृष्टि से देखा है—कहीं खेत की हरियाली है, तो कहीं शहरी भीड़ में खोती संवेदना।
प्रकृति, ऋतुएँ, पेड़-पौधे, पक्षी, बारिश, धूप—इन सबको हाइकु के माध्यम से चित्रित करते हुए, सोनी जीवन के हर उस क्षण को पकड़ते हैं जो अक्सर हमारी व्यस्तता में अनदेखा रह जाता है। उनके हाइकु में मौसम की करवटें सिर्फ जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि मन की अवस्था का रूप भी बन जाती हैं।
इन हाइकुओं में जीवन के छोटे-छोटे दृश्य हैं—चूल्हे की आँच, नदी के किनारे की चुप्पी, स्कूली बच्चों की आवाज़, पतझड़ में झरते पत्तों की साँसें—जो पाठक को सीधे अनुभव के केंद्र में ले जाते हैं। ‘अक्षरलीला’ के हाइकु सिर्फ पढ़े नहीं जाते, वे महसूस किए जाते हैं।
इनकी विशेषता यह है कि हर हाइकु एक चित्र है। वह चित्र जीवन की एक पूरी कथा को अपने भीतर समेटे होता है। गाँव से शहर, ऋतु से मनोदशा, और प्रकृति से आत्मा तक की यह यात्रा, ‘अक्षरलीला’ को केवल एक हाइकु संग्रह नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन की लघु लेखनी बना देती है।
भोर का मौन/ पाखी ने मंत्र पढ़ा/ दुनिया जागी (1)
पहला हाइकु ही प्रकृति के माध्यम से प्रात:कालीन जागरण की एक सूक्ष्म, भावपूर्ण छवि रचता है। पहली पंक्ति एक शांत क्षण की स्थापना करती है। भोर का मौन चेतना के जागरण से ठीक पहले का ठहराव है—जहाँ सारा जगत अभी नींद और जागरण के संधि-काल में है। यह मौन बहुत कुछ कहता है।
यहाँ ‘पाखी’ प्रकृति का पहला पुजारी बन जाता है। उसकी चहचहाहट को कवि ने “मंत्र” कहा है, जिससे पक्षी का स्वर एक पवित्र, जाग्रत करने वाला अनुष्ठान बन जाता है।
अंतिम पंक्ति में क्रिया और परिणाम आता है। पक्षी के मंत्र की गूँज से दुनिया जागती है। यह संवेदना और चेतना के स्तर पर भी एक जागरण है।
यह हाइकु प्रकृति और मानव जीवन के अंतर्संबंध को अत्यंत सूक्ष्म, सौंदर्यपूर्ण और प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है। तीन पंक्तियों में एक पूरा दृश्य, एक चेतना और एक संदेश समाहित है। यह कविता पाठक को न केवल सुबह का दृश्य दिखाती है, बल्कि उसे भीतर से जागृत भी करती है।
खेत गा उठे/ बैलों की घंटी संग/ किसान— राग। (5) खेत गा उठे यह मानवीकरण है, जिससे खेत मानो किसान के श्रम के साथ स्वयं संगीत रचने लगते हैं। यहाँ ध्वनि का बिंब अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बैलों के गले में बँधी घंटियाँ केवल संगीत का स्रोत नहीं, बल्कि श्रम के आरंभ की पुकार हैं। यह ध्वनि परिश्रम की पहचान है, एक लोक-ध्वनि, जो केवल कानों में नहीं, मन में गूँजती है। यह खेत, बैल और किसान के बीच की त्रयी को जोड़ती है।
तीसरी पंक्ति इस हाइकु को एक संगीतात्मक और सांस्कृतिक ऊँचाई पर ले जाती है। ‘किसान-राग’ कोई स्थापित शास्त्रीय राग नहीं, बल्कि किसान के श्रम, पसीने, संघर्ष और आशा का राग है। यह राग प्रकृति से उपजता है—जिसमें मिट्टी की सोंधी गंध, बैलों की चाल, और मानवीय श्रम की तपिश शामिल है।
रमेश कुमार सोनी ने अपने संग्रह में नवीन प्रयोग भी किए हैं-
शेखी बघारे/ काँटों बीच गुलाब/ जेड प्लस में। (53)
काँटों के बीच गुलाब ऐसा है, जैसे उसे जेड प्लस सुरक्षा मिली है। 
तितली उड़ी/ ग्लोबल सिटीजन/ प्रकृति जाने। (81)
तितली को कवि ने ग्लोबल सिटीजन कहा है।
कवि ने मृगी को ट्रेनर माना है—
छौने उछले/ मृगी चौकस खड़ी/ ट्रेनर अच्छी। (7)
कवि ने बाज को पैराग्लाइड करते देखा है—
नभ में बाज/ पैराग्लाइड करे/ योग में मग्न। (18)
दर्पण के सामने गौरैया का बच्चों सा ठुमकने का दृश्य मनभावन है—
दर्पण देख/ गौरैया ठुमकती/ बच्चों के जैसी। (46)
आज के युग की भयावह तस्वीर दिखाता यह हाइकु है— फ्रिज सहमा/ चालीस टुकड़ों का/ गवाह बना। (70)
सोनी के इस हाइकु संग्रह के सभी हाइकु भाव भाषा से समृद्ध हाइकु हैं। जीवन, समाज, प्रकृति का कोई भी रंग उनकी लेखनी से छूटा नहीं है। आशा है पाठक को यह संग्रह पसंद आएगा।

जीवन दर्शनः डॉ. अब्दुल कलाम : मानवता की मिसाल

  - विजय जोशी 

 - पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

- ऊँचे व्यक्तित्व की सबसे पहली पहचान है आचरण में सरलता, सादगी, गरिमा एवं गंभीरता. लेकिन होता है इसके सर्वथा विपरीत। पद, प्रतिष्ठा, पैसा उसके चरित्र में पतन का मार्ग का कारण भी बन जाता है, जब व्यक्तित्व पर गुरूर के बादल छा जाते हैं। सारे  प्रसिद्ध व्यक्तियों में एक बात समान दिखाई देती है और वह है उनका निर्मल, निश्चल आचरण, अनासक्त कर्म योगी- सा व्यक्तित्व।
 - डॉ. कलाम का नाम उन राष्ट्रपतियों में गिना जाता है जिनका सम्मान देस- परदेस सब जगह एक समान रहा। उनके सचिव पी. एम. नायर ने उनकी यादों को जिस प्रकार साझा किया है वह हमारी बहुत बड़ी अमानत है एवं उनकी पुस्तक “कलाम इफेक्ट” में संगृहीत किया गया है।
- प्रथम: उन्हें विदेश प्रवास पर राष्ट्राध्यक्षों द्वारा बहुमूल्य भेंट मिला करती थी। लौटने पर कलाम उनकी फोटोग्राफी कर तोषालय में जमा करवा दिया करते थे। आश्चर्य की बात तो यह है कि राष्ट्रपति भवन से जाते समय एक पेंसिल तक अपने साथ नहीं ली।
- दूसरा : वर्ष 2002 में रमज़ान का अवसर आया तब तक राष्ट्रपति भवन में इफ़्तार के परंपरा थी। उन्होंने खर्च की तहकीकात की जो 22 लाख रुपये था। उन्होंने इफ़्तार पार्टी निरस्त करते हुए समस्त राशि अनाथालयों को भोजन, कपड़े आदि प्रदान करने में खर्च की। अनाथालय चुनने का कार्य भवन कर्मचारी समिति द्वारा किया गया। मजेदार बात तो यह थी कि इस कार्य हेतु अपने वेतन में से 1 लाख रुपये की राशि भी पूर्णतः गोपनीय तरीके से दान दी। वे एक सच्चे मुसलमान थे; लेकिन उनके दौर में वहाँ कभी इफ़्तार का आयोजन नहीं हुआ।
- तीसरा: वे ‘सर’ संस्कृति के विरुद्ध थे। एक बार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से चर्चा के दौरान जब उन्हें असहमति के विचार मिले, तो उन्होंने कतई बुरा नहीं माना। अवाक नायर ने बताया कि राष्ट्रपति ने कहा कि उनके विचार यदि सहमति सम्मत हुए तो स्वीकार भी करेंगे।
- चौथा: उन्होंने तमिलनाडु स्थित अपने गृहनगर से 50 रिश्तेदारों को दिल्ली दर्शन हेतु बुलाया। प्राइवेट बस सेवा का खर्च वहन किया। किसी सरकारी वाहन का इस्तेमाल नहीं किया गया। भोजन सहित सारा खर्च उन्होंने उठाया। अनूठी बात तो यह थी कि उनके भाई जो उनके साथ ही ठहरे थे उसका खर्च भी कलाम उठाना चाहते थे। ऐसी सादगी इतिहास में कहाँ मिलेगी। उनकी नम्रता के सामने सारी कर्मचारी नतमस्तक थे।
- पाँचवाँ: विदाई के समय समस्त कर्मचारी सपरिवार उपस्थित थे सिवाय नायर के जिनकी पत्नी एक दुर्घटना के कारण आने में असमर्थ थी। अगले दिन सबने देखा कि नायर के घर पर राष्ट्रपति कलाम उनकी पत्नी का हालचाल जानने पधारे। नायर लिखते है इतिहास में ऐसा दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा जब राष्ट्रपति ने किसी कर्मचारी के परिवार के प्रति इतना संवेदनशील उदाहरण प्रस्तुत किया हो।
- उपर्युक्त केवल कुछ उदाहरण ही हैं पर आज के ऊपरी दिखावे वाले समाज में हर एक के लिए आगत लंबे समय तक एक गहन संदेश के वाहक हैं। ऐसी शख़्सियत परिचय की नहीं; अपितु परिचय उनका मोहताज होता है।