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Jun 1, 2025

दो कविताएँ

- स्वाति बरनवाल 

प्यारी लड़की

प्यारी लड़की!

आकाश में उड़ो

धरती पे उछलो

सपनों में रंग भरो।

 

प्यारी लड़की!

फूलों- सी महको

हवा- सी इतराओ

तितली की मानिंद 

मस्त रहो!

 

किताबों पर विश्वास और

खुद में हौसला रखो।

 

प्यारी लड़की।

थोड़ी- सी जिद्दी,

थोड़ी- सी अड़ियल

थोड़ी- सी दुराग्रही

और थोड़ी- सी मतांध बनो।

 

प्यारी लड़की!

इस मतलबी दुनिया में

तुमको ढेर सारे स्वार्थी,

चापलूस और खुदगर्ज लोग मिलेंगे

तुम्हारा उनसे भी सामना होगा।

 

प्यारी लड़की!

इस दुनिया में तुम 

किसी विशेष उद्देश्य से आई हो।

इससे पहले कि यह दुनिया तुम्हें 

अपने उसूलों के साथ जीना सिखा दे..

तुम दुनिया पलट दो।

2. तेईस के तजुर्बे

गिरी तो रोई, उठी तो लड़खड़ाई

चलने लगी तो फिर

ठोकर खाई

गिरी, उठी, सँभली

फिर चलने लगी।

 

वक्त- बेवक्त चंचलता जाती रही

और गंभीरता आती रही

यूँ कि थोड़ी देर रुक जाने से

जीने में आ जाती कोताही

और माथे मढ़ देती लापरवाही

का तमगा।

 

यूँ कि

उसके पहले ही

अपने ऊपर चढ़ा लिया जाए

कोई ठोस आवरण

और बचा जा सके

उम्र की हर सर्दी,

गर्मी और बरसात से

जिससे कभी होती थी

पैरों में थिरकन

बढ़ जाती थी दिल की धड़कन

और देह में सिहरन!

 

अब जब भी

गिरने को होती हूँ

तजुर्बा हाथ थाम

गिरने से बचा लेता है

बार बार, हर बार।

आलेखः परमाणु हथियार - सुरक्षा के लिए पाकिस्तान हुआ शरणागत

 - प्रमोद भार्गव

आपरेशन सिंदूर के दौरान जब पाकिस्तान के परमाणु संस्थान और आयुध भारतीय मिसाइलों की मार के दायरे में आ गए तो पाकिस्तान ने घुटने टेक दिए और अमेरिका, चीन व इस्लामिक देशों की मदद से संघर्ष विराम कराने में सफल हो गया। इस हेतु अमेरिका और चीन ने कूटनीतिक चालें चलीं और उन्होंने अपेक्षित मंशा पूरी कर ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो इतने बड़े बोल, बोल गए कि उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि मैंने दोनों देशों को धौंस देकर युद्ध विराम कराया है। यदि परमाणु युद्ध हो जाता, तो लाखों लोग बेमौत मारे जाते। यह मानवता के लिए बड़ा संकट होता। यानी ट्रंप ने दादागिरी जताते हुए धमकी भी दे दी और दो देशों के लोगों को बड़ी मानव त्रासदी से बचाने का कथित श्रेय भी ले लिया। हालाँकि अगले दिन ही प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए वैश्विक शक्तियों को जता दिया कि भारत ने अपनी सैन्य सामर्थ्य दिखा दी और युद्ध के नियमों का पालन करते हुए पर्याप्त संयम भी बरता। साथ ही यह चेतावनी भी दे डाली कि भारत किसी भी स्तर पर न्यूक्लियर ब्लैकमेलिंग अर्थात् परमाणु भयादोहन नहीं सहेगा। साफ है, यदि अब पाकिस्तान ने किसी भी प्रकार की आतंकी घटना को अंजाम दिया, तो पाकिस्तान को परमाणु भंडार समेत मिट्टी में मिला दिया जाएगा।

परमाणु भयादोहन का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय फलक पर क्यों उठा? और वैश्विक ताकतों की चूलें क्यों हिल गईं, इसे भारतीय सेना के पराक्रम से समझ लेते हैं। दरअसल हमारी सेना द्वारा दागी गईं  मिसाइलों की अचूक मारक क्षमता के दायरे में पाकिस्तान के परमाणु भंडार और संयंत्र आ गए थे। इससे न केवल पाक के पसीने छूट गए; बल्कि अमेरिका, चीन और तुर्किये भी बेचैन हो गए। चीन और तुर्किये के हथियारों की साख पर भी सवाल उठ खड़े हुए कि वे कितने उपयोगी हैं ? पाकिस्तानी सेना का मुख्यालय रावलपिंडी में है। इसी के निकट चकलाता में नूर खान एयरबेस के पास परमाणु कमान केंद्र है। पाक के पंजाब में सरगोधा हवाई पट्टी के पास परमाणु आदान-प्रदान केंद्र है। भारतीय वायुसेना ने ब्रह्मोस मिसाइलें सटीक निशाने पर दाग कर नूर खान और सरगोधा की हवाई पट्टियाँ पूरी तरह ध्वस्त कर दी थीं। हमारी मिसाइलें मछली की आँख पर अर्जुन के तीर की तरह लक्षित निशाने पर सटीक बैठीं। वस्तुतः नूर खान एवं सरगोधा हवाई अड्डों को भारी तबाही झेलनी पड़ी। 

 इन अचूक हमलों से पाकिस्तान के सेना अध्यक्ष जनरल असीम मुनीर और उनके अधीन सेना को दिन में तारे दिखाई देने लगे। सेना समेत पाक के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। जिस परमाणु शक्ति के बूते पाक के जिन बुजदिल नायकों को अपनी परमाणु शक्ति पर गर्व था और इसी ताकत के बूते ये भारत पर परमाणु हमला कर देने की धमकियाँ दिया करते थे, उन्हें अहसास हो गया कि उनके परमाणु हथियार भारतीय मिसाइलों के निशाने पर हैं। मसलन पाक ने समझ लिया कि भारत ने हमले नहीं रोके, तो उसके परमाणु हथियार एक-दो दिन के भीतर नेस्तनाबूद कर दिए जाएँगे। इस आशंका से भयभीत पाकिस्तान के लाचारी में आए आका अमेरिका के आगे नतमस्तक हुए और गिड़गिड़ाकर गुहार लगाई कि हर हाल में भारत के हमलों को रुकवाएँ। दरअसल, चौतरफा मात खाया पाकिस्तान चाहता था कि तत्काल संघर्ष विराम हो ? 

 कुल मिलकर युद्ध विराम से तत्काल तो अमेरिका, चीन और पाकिस्तान के मंसूबे सध गए, लेकिन भारत के मंसूबे पाक घोषित आतंक को पूरा सबक सिखाने से अधूरे रह गए।

  बावजूद आपरेशन सिंदूर प्रधानमंत्री मोदी और उनके सहयोगियों के नेतृत्व व हमारी तीनों सेनाओं के पराक्रम से जिस सीमा तक पहुँच गया था, उससे एक तो पाकिस्तान का यह मिथक टूट गया कि वह परमाणु हमला करने में सक्षम है ? दूसरे चीन और तुर्किये के हथियारों की औकात दुनिया के सामने आ गई कि वे कितने थोथे और अविश्वसनीय हैं। अतएव कालांतर में भारत की फौज से कोई भी प्रत्यक्ष युद्ध की स्थिति में सामना करने से कतरएगा; क्योंकि इस लड़ाई में चीन के जेट विमानों और वायु सुरक्षा प्रणाली की पोल खुल गई है। अब तक पाकिस्तानी संसद में भारत को यह कहते हुए धमकाया जाता रहा है कि हमारे परमाणु बम नुमाइश के लिए नहीं हैं। इसी धमकी को जम्मू- कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती भी दोहराती रही हैं कि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार दिखावे के लिए नहीं रखे हुए हैं। कुछ कांग्रेसी नेता भी इस भय को जताकर आतंकवाद का पोषण और मुस्लिम तुष्टीकरण करने में लगे रहे हैं। आपरेशन सिंदूर के तहत हमारी तीनों सेनाओं के संयुक्त अभियान ने पाक की कथित शक्ति को तिनकों की तरह बिखेर कर, इस झूठ का ही पर्दाफाश कर दिया कि पाक के पास भारत से प्रत्यक्ष लड़ाई लड़ने का न तो कोई मनोबल है और न ही दृष्टि है।

  यहाँ भी समझने की जरूरत है कि परमाणु हमला कोई बंदूक का ट्रिगर नहीं है कि दबाया और गोली छूट गई। परमाणु हमले के लिए इसकी अलग-अलग स्थलों पर रखी इकाइयों को एक जगह लाकर जोड़ना होता है। इस प्रक्रिया में कम से कम आठ-दस घंटे लगते हैं। शत्रु देश यदि इस प्रक्रिया को अंजाम तक पहुँचाने के प्रयास में आता है, तो यह गतिविधि तुरंत अंतरिक्ष में स्थापित हमारे युद्ध संबंधी उपग्रहों की पकड़ में आ जाएँगे और सेना कमांड स्टेशनों को इस हरकत की खबर लग जाएगी। हम अपनी मिसाइलों की निशानदेही इस युद्ध में देख चुके हैं। इसके मायने हैं कि यदि पाक परमाणु हमले का प्रयास करता है तो उसके कथित मंसूबे पर अविलंब पानी फेर दिया जाएगा। इस समय हमारे पास थल, जल और वायु से मार करने वाली कई प्रकार की मिसाइलें उपलब्ध हैं। अतएव यह जानना भी जरूरी है कि परमाणु बम बनाना एक बार आसान है, लेकिन उसे चलाना उतना ही कठिन है। वरना अब तक रूस यूक्रेन पर और इजरायल फिलिस्तीन पर परमाणु हमले कर चुके होते ? हालांकि इजरायल को आमतौर पर परमाणु शक्ति संपन्न देश तो माना जाता है, परंतु इजराइल इस सच्चाई को न तो स्वीकारता है और न ही नकारता है। इजराइल की यह रणनीतिक अस्पष्टता उसकी ताकत को पुख्ता किए हुए है।

    भारत ने पहला परमाणु परीक्षण 1974 में किया था। इस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं और देश आपातकाल के दौर से गुजर रहा था। इसके बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में 1998 में दूसरा परमाणु परीक्षण हुआ था। इसे आपरेशन ‘शक्ति’ नाम दिया था, जबकि पहले परीक्षण को ‘बुद्ध मुस्कराए’ (स्माइलिंग बुद्धा) नाम दिया गया था। इन प्रतीकार्थों के अर्थ हैं, शक्ति से ही मानवता मुस्कुरा सकती है। ये दोनों ही परीक्षण राजस्थान के पोखरण क्षेत्र में किए गए थे। दूसरे परीक्षण के बाद दुनिया ने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश मान लिया था। भारत के पहले परमाणु परीक्षण के बाद ही पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने परमाणु बम बनाने का निश्चय करते हुए कहा था, ‘हम घास खा लेंगे, भूखे रह लेंगे, परंतु परमाणु बम अवश्य बनाएँगे।’ भुट्टो ने इसे मुसलमानों के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में प्रस्तुत किया। और फिर भौतिक एवं धातु विज्ञानी अब्दुल कादिर खान की मदद से परमाणु शक्ति संपन्न देश बना। कालांतर में 28 मई 1998 को बलूचिस्तान के चगाई जिले की रसकोह पहाड़ी पर चगाई-1 भूमिगत परमाणु परीक्षण किया। इसमें चीन ने भी मदद की थी। लेकिन आतंकवाद के पोशक पाकिस्तान को यह परमाणु क्षमता अपनी बौद्धिक कौशल दक्षता से कहीं ज्यादा यूरेनियम की चोरी से प्राप्त हुई थी। बहरहाल पाकिस्तान के पास इस वक्त 170 परमाणु हथियार होने के अनुमान हैं। इसी के समतुल्य भारत के पास 172 परमाणु हथियार बताए जाते हैं। यानी पाक  अपनी अनैतिकता की आदत से कभी बाज नहीं आया; इसीलिए एक बार फिर मोदी ने साफ किया है कि हमने ऑपरेशन सिंदूर रोका नहीं है, केवल स्थगित किया है। साफ है, पाक ने अब दोगली हरकत की तो पाक के परमाणु ठिकानों पर ही भारत की अचूक मिसाइलें गरजकर गिरेंगी।  उसके कथित परमाणु मुखौटे का मिथक भी उजागर हो गया है।

पर्यावरणः विरासत को संजोकर रखने वाला अनूठा गाँव पिपलांत्री !

  - सुनील कुमार महला

पेड़ हमारे पर्यावरण, हमारे पारिस्थितिकी तंत्र, मानव व धरती के समस्त प्राणियों, वनस्पतियों को बनाए रखने के लिए बहुत आवश्यक है। कहना ग़लत नहीं होगा कि पेड़ जीवन का मुख्य आधार हैं। यही कारण भी है कि हमारी सनातन भारतीय संस्कृति में पेड़ों को युगों -युगों से बहुत ही अहम् और महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यहाँ तक कि हमारे यहाँ तो पेड़ों की पूजा करने तक का प्रावधान रहा है। हिंदू धर्म में तो पीपल, बरगद, केला, और नीम जैसे पेड़ों को अत्यंत पवित्र माना गया है।

 हमारी सनातन भारतीय संस्कृति में तो यहाँ तक माना जाता है कि पेड़ों में मनुष्यों के समान चेतना होती है। सच तो यह है कि भारतीय संस्कृति में पेड़ों को अपने पुत्रों से बढ़कर माना गया है। पाठकों को बताता चलूँ कि भारतीय संस्कृति को अरण्य अर्थात वृक्ष की संस्कृति भी कहा जाता है। बहरहाल, आज जंगल कम हो रहे हैं। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। विकास के नाम पर, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के नाम पर वनों का अतिक्रमण हो रहा है।

हाल ही में आई केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13,056 वर्ग किमी वन क्षेत्र पर अतिक्रमण हुआ है, जो दिल्ली के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक है, यह चिंताजनक है। जानकारी मिलती है कि मध्य प्रदेश में सबसे अधिक 5,460.9 वर्ग किमी वन भूमि पर कब्जा है, जबकि 409 वर्ग किमी भूमि अतिक्रमण मुक्त की जा चुकी है।

कहना ग़लत नहीं होगा कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण को सौंपी गई रिपोर्ट कहीं न कहीं देश में वनों के अतिक्रमण की भयावह स्थिति को उजागर करती है; लेकिन वहीं देश में कुछ ऐसे भी स्थान हैं,जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में देश और समाज के समक्ष एक मिसाल प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को बताता चलूँ कि राजस्थान के राजसमंद ज़िले का पिपलांत्री गाँव,  पर्यावरण संरक्षण के साथ साथ ही लड़कियों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण के लिए जाना जाता है। जानकारी के अनुसार यहाँ हर नवजात बेटी के जन्म पर 111 पौधे लगाए जाते हैं और इस अनोखी पहल की वजह से यह गाँव हमारे देश में ही नहीं अपितु पूरी दुनिया में मशहूर है।

गाँव की खास बात यह है कि इस गाँव में हर तरफ हरियाली नजर आती है तथा यह पहाड़ियों से घिरा हुआ है। बहुत कम ही लोगों को यह जानकारी होगी कि गौचर भूमि संरक्षण,जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण में इस गाँव का स्थान विश्व में प्रमुखता से लिया जाता है। इस गाँव में हजारों पेड़ लगाए गए हैं और यहाँ आप पक्षियों की चहचहाहट सुन सकते हैं। इस गाँव में पेड़ों को भाई मानकर पेड़ों के राखी बांधने की परंपरा आज भी कायम है। कहना ग़लत नहीं होगा कि पिपलांत्री मॉडल हमारे देश व समाज ही नहीं अपितु पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है।

वास्तव में यह बालिकाओं को बचाने और हमारे पर्यावरण व पारिस्थितिकी की रक्षा की नींव पर निर्मित यह पर्यावरण-नारीवाद मॉडल कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। राजस्थान के इस गाँव की कहानी वर्ष 2005 में राजस्थान के इस गाँव के सरपंच (पिपलांत्री गाँव के पूर्व सरपंच/पंचायत प्रमुख) श्री  श्याम सुंदर पालीवाल के साथ शुरू हुई। उन्होंने बालिकाओं को बचाने,जल संरक्षण करने तथा पेड़ लगाने का बीड़ा उठाया। 

उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्ष 2000 से पहले, पिपलांत्री गाँव में संगमरमर की खदानों और खदानों की भरमार थी, जैसा कि राजसमंद इनके लिए प्रसिद्ध रहा है। यहाँ पानी का स्तर 700- 800 फीट तक नीचे चला गया था और पीने तक के लिए पानी नहीं बचा था। गाँव में सामान्य बुनियादी ढांचे (बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर) जैसे कि सड़क, सिंचाई और कृषि का अभाव था। श्री पालीवाल को वर्ष 2007 में निर्जलीकरण(डिहाइड्रेशन) के कारण अपनी 17 वर्षीय बेटी किरण की मृत्यु का सामना करना पड़ा। इससे पिपलांत्री को बदलने का उनका जुनून और बढ़ गया। अपनी बेटी किरण की मृत्यु के बाद, उन्होंने अपनी बेटी किरण की याद में पहला पेड़ लगाया।

इससे पिपलांत्री गाँव में क्रांति का विचार आया। पालीवाल इस बात से वाकिफ थे कि किस प्रकार से एक लड़की को जन्म से पहले ही मार दिया जाता था, श्री पालीवाल ने बेटी जन्म पर एक पेड़ लगाने के विचार को बढ़ाकर 111 पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा, इससे एक सामाजिक बदलाव की शुरुआत हुई। उनकी इस पहल के कारण अब तक 3 लाख से अधिक पेड़ लगाए गए हैं और 700-800 फीट से नीचे का जल स्तर मात्र 5 वर्षों में 15 फीट ऊपर उठ गया है। इतना ही नहीं,पेड़ों को दीमक से बचाने और फलों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए उनके चारों ओर 2.5 मिलियन से अधिक एलोवेरा के पौधे भी लगाए गए हैं। एलोवेरा उत्पादों से आर्थिक बदलाव भी आएँ हैं, लोगों को रोजगार मिला है।

पाठकों को बताता चलूं कि गाँव में ‘किरण निधि’ योजना की शुरुआत की गई, जिसमें पंचायत द्वारा बालिका के नाम पर बैंक खाता खोला जाता था और उसमें 21,000 रुपये की शुरुआती राशि जमा की जाती थी। माता-पिता (जो शेष 11000 रुपये का योगदान करते हैं) को एक हलफनामे पर हस्ताक्षर करना होता है, जिसमें वादा किया जाता है कि वे कन्या- भ्रूण हत्या नहीं करेंगे या अपनी बेटी की शादी 18 वर्ष की आयु से पहले नहीं करेंगे, और वे उसे शिक्षित करेंगे। इससे यह सुनिश्चित होता है कि कोई भी बालिका शिक्षा से वंचित न रहे और उसके पास अपने भविष्य के लिए पर्याप्त धन हो।

इतना ही नहीं, श्री पालीवाल ने खदान प्रबंधन का मुद्दा अपने हाथों में ले लिया, क्योंकि मार्बल का फेंका गया कचरा एक बड़ी समस्या के रूप में उभर रहा था और इससे गाँव की जमीनें बंजर हो रहीं थीं। श्री पालीवाल को निर्मल ग्राम पंचायत पुरस्कार मिला और पुरस्कार स्वरूप 5 लाख रुपये  मिले। श्री पालीवाल के कारण आज पिपलांत्री अपने प्राकृतिक संसाधनों पर एक आत्मनिर्भर और समृद्ध गाँव है। इतना ही नहीं, महिला व्यवसाय और शिक्षा के विकास से बालिका सशक्तीकरण का मुख्य लक्ष्य पूरा हुआ है। वन्य जीवन में वृद्धि देखी गई है, जल संरक्षण हुआ है और गाँव के लोग समृद्ध और खुशहाल हैं। श्री पालीवाल की उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें वर्ष 2021 में प्रतिष्ठित पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि बेटी के जन्म को इस गाँव में एक बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है। आज भी बेटी के जन्म पर यहाँ 111 पौधे लगाने की परंपरा जारी है। कहना ग़लत नहीं होगा कि राजस्थान के राजसमंद जिले का यह गाँव लैंगिक समानता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सामुदायिक भागीदारी का एक अनोखा, नायाब व खूबसूरत मॉडल प्रस्तुत कर रहा है।

सच तो यह है कि इस गाँव की यह परंपरा महज एक रस्म नहीं; बल्कि आज एक सामाजिक आंदोलन बन चुकी है, जो समाज की मानसिकता को बदलने का कार्य कर रही है। गाँव में हर नवजात बेटी के जन्म के साथ 111 पौधे लगाए जाते हैं, जो यह दर्शाता है कि यदि संकल्प सच्चा हो, तो इस दुनिया में कोई भी कार्य असंभव नहीं है। वास्तव में, गाँव की यह अनूठी प्रथा न सिर्फ़ जीवन के उत्सव का प्रतीक है; बल्कि पर्यावरण और लड़कियों दोनों के पोषण और सुरक्षा की शपथ भी है।

आज पौधारोपण के संकल्प से पूरे गाँव की बयार बदल चुकी है। हर तरफ हरितिमा का आवरण आज नजर आता है। आज गाँव में नीम, शीशम, आम और आँवला समेत अनेक प्रजातियाँ विद्यमान हैं। जल संरक्षण, वनस्पतियों का संरक्षण और साथ ही बेटियों की रक्षा का अनूठा संगम इसी गाँव में देखने को मिलता है। मुहिम का असर इस कदर हुआ है कि आज बेटियों को बोझ नहीं, बल्कि गौरव का प्रतीक माना जाने लगा है। बहरहाल, कहना चाहूंगा कि पिपलांत्री का यह मॉडल लैंगिक समानता, जलवायु अनुकूलन, जैव-विविधता और टिकाऊ विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) का अनूठा प्रतीक बन चुका है।

वास्तव में, पर्यावरण संरक्षण और लैंगिक समानता के प्रति गाँव के ऐसे समग्र दृष्टिकोण ने गाँव को सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक प्रगति के प्रतीक में बदल दिया है। अंत में, यही कहूंगा कि राजस्थान के राजसमंद के पिपलांत्री की यह कहानी महिला सशक्तीकरण, जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जमीनी पहल को दिखाती है। हमें यह चाहिए कि हम राजसमंद के इस गाँव से प्रेरणा लें और अपनी युवा पीढ़ी को इसके बारे में जानकारी दें ताकि वे पर्यावरण संरक्षण के साथ ही जल संरक्षण और बेटियों की सुरक्षा व संरक्षण के प्रति कृतसंकल्पित हों सकें। (indiaclimatechange से साभार)

प्रदूषणः हमारे पास ई-कचरा प्रबंधन की क्षमता नहीं है

 - कुमार सिद्धार्थ

भारत में ई-कचरे (इलेक्ट्रॉनिक कचरा यानी पुराने लैपटॉप और सेल फोन, कैमरा और एसी, टीवी और एलईडी लैंप वगैरह) के  प्रबंधन की तेज़ी से बढ़ती चुनौती से जुड़े पर्यावरणीय कानूनों को मज़बूती प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (नेशनल ग्रीन ट्रायबूनल, NGT) प्रतिबद्ध है। हाल ही में अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव के नेतृत्व में एनजीटी ने ई-कचरा प्रबंधन रिपोर्टिंग की वर्तमान स्थिति पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है। एनजीटी ने अपने पूर्व आदेशों का पालन न करने का दावा करने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक कचरे के उत्पादन और निस्तारण पर एक नई रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। वहीं ई-कचरा (प्रबंधन) नियमों का पालन न करने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के खिलाफ की गई कार्रवाई का भी उल्लेख करने को कहा है। 

यह पहल ई-कचरे से निपटने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य और पारिस्थितिक अखंडता के लिए एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दा है।

देश में ई-कचरा प्रबंधन से जुड़े नियमों को लागू कराने में सीपीसीबी की भूमिका अहम है। ई-कचरा (प्रबंधन) नियमों के पालन की निगरानी के साथ-साथ ई-कचरा प्रबंधन और निपटारा सम्बंधी जागरूकता कार्यक्रमों हेतु भी सक्रिय पहल करने की ज़िम्मेदारी सीपीसीबी की है। एनजीटी ने सीपीसीबी को यह नई रिपोर्ट तैयार करने और प्रस्‍तुत करने के लिए 12 दिसंबर तक का वक्‍त दिया है, जिसमें समस्त राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ई-कचरे के उत्पादन, उपचार सुविधाओं, और मौजूदा खामियों पर विस्तृत डैटा शामिल होना चाहिए। 

देश में बढ़ते ई-कचरे पर एनजीटी ने 7 नवंबर, 2022 को निर्देश दिए थे कि ई-कचरे के मामले में सभी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रदूषण नियंत्रण समितियाँ, सीपीसीबी द्वारा जारी रिपोर्ट का पालन करें। लेकिन तमाम ज़िम्मेदार संस्‍थाओं द्वारा इन निर्देशों का अनुपालन ठीक से न करने पर एनजीटी ने असंतोष व्‍यक्‍त किया है। 

ई-कचरा जहाँ पर्यावरण के लिए खतरनाक होता है, वहीं मानव स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। ई-कचरे के निपटान और तोड़फोड़ से पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है। इनसे निकलने वाले तरल और रसायन सतही जल, भूजल, मिट्टी और हवा में मिल सकते हैं। इनके ज़रिए ये जानवरों और फसलों में प्रवेश कर सकते हैं। ऐसी फसलों के इस्तेमाल से मानव शरीर में घातक रसायन पहुँचने का खतरा होता है। इलेक्ट्रॉनिक सामान में लेड, कैडमियम, बैरियम, भारी धातुएँ व अन्य घातक रसायन होते हैं।

सीपीसीबी द्वारा दिसंबर, 2020 में जारी एक रिपोर्ट बताती है कि 2019-20 में भारत में 10,00,000 लाख टन से अधिक इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा हुआ था। 2017-18 में यह 25,325 टन और 2018-19 में 78,281 टन था। एक तथ्य यह भी है कि 2018 में केवल 3 फीसदी ई-कचरा एकत्र किया गया था, जबकि 2019 में यह आँकड़ा 10 फीसदी था। मतलब साफ है कि देश में ई-कचरे को री-सायकल करना तो दूर, इस कचरे की एक बड़ी मात्रा एकत्र ही नहीं की जा रही है। एक अन्‍य रिपोर्ट के आँकड़े दर्शाते हैं कि देश में 2022 के दौरान 413.7 करोड़ किलोग्राम इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा हुआ था। 

भारत में अभी तक राज्य सरकारों द्वारा मान्यता प्राप्त व पंजीकृत ई-कचरा री-सायक्लर 178 ही हैं। लेकिन भारत के ज़्यादातर ई-कचरा री-सायक्लर ई-कचरे का रीसायक्लिंग नहीं कर पा रहे हैं और कुछ तो इसे खतरनाक तरीके से संगृहीत कर रहे हैं। इनमें से कई री-सायक्लर के पास ई-कचरा प्रबंधन की क्षमता भी नहीं है।

आँकड़े बताते हैं कि खतरनाक ई-कचरे को सुरक्षित रूप से संसाधित करने के लिए नए नियम आने के बावजूद, लगभग 80 प्रतिशत ई-कचरा अनौपचारिक सेक्टर द्वारा गलत तरीके से निपटान किया जा रहा है, जिससे प्रदूषण और स्वास्थ्य सम्बंधी खतरे कई गुना बढ़ने की आशंका है। इतना ही नहीं इससे भूजल और मिट्टी भी प्रदूषित हो रही है।

गौरतलब है कि दुनिया भर में प्रति वर्ष 2 से 5 करोड़ टन ई-कचरा पैदा होता है। जबकि वर्तमान में सिर्फ 12.5 फीसदी ई-कचरा रिसाइकल हो रहा है। मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान में बड़ी मात्रा में सोना या चांदी जैसी कीमती धातुएँ होती हैं। अमेरिका में प्रति वर्ष फेंके गए मोबाइल फोन में 3.82 अरब रुपये  का सोना या चाँदी होता है। ई-कचरे के रीसायक्लिंग से ये धातुएँ प्राप्त की जा सकती हैं। 10 लाख लैपटॉप के रीसायक्लिंग से अमेरिका के 3657 घरों में प्रयोग होने वाली बिजली जितनी ऊर्जा मिलती है।

विश्व भर में ई-कचरे का वार्षिक उत्पादन 2.6 करोड़ टन प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है, जो 2030 तक 8.2 करोड़ टन तक पहुँच जाएगा। रीसायक्लिंग की कमी वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक उद्योग पर भारी पड़ती है, और जैसे-जैसे उपकरण अधिक संख्या में, छोटे और अधिक जटिल होते जाते हैं, समस्या बढ़ती जाती है। वर्तमान में, कुछ प्रकार के ई-कचरे का रीसायक्लिंग और धातुओं को पुनर्प्राप्त करना एक महँगी प्रक्रिया है।

हमें इस बढ़ती समस्या के बारे में गंभीरता से सोचना होगा। इससे निपटने के लिए सबके साथ की आवश्यकता है। राष्ट्रीय प्राधिकरणों, प्रवर्तन एजेंसियों, उपकरण निर्माताओं, रीसायक्लिंग में जुटे लोगों, शोधकर्ताओं के साथ उपभोक्ताओं को भी इनके प्रबंधन और रीसायक्लिंग में योगदान देने की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

स्मृति शेषः पर्यावरण कार्यकर्ता समाज सुधारक विमला बहुगुणा

- भारत डोगरा

बहुत ही कम उम्र में महात्मा गांधी का मार्ग अपनाकर जीवन जीने वाली विमला बहुगुणा ने 14 फरवरी 2025 को देहरादून स्थित अपने घर पर अंतिम साँस ली। वे 92 वर्ष की थीं। अपने पीछे वे बेटी मधु पाठक और बेटे राजीव व प्रदीप को छोड़ गईं। उनके पति सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा का 2021 में 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया था।

अक्सर लोग विमला बहुगुणा को सुंदरलाल बहुगुणा के साथ मिलकर किए गए कामों के लिए याद करते हैं। लेकिन वे स्वतंत्र रूप में एक महान समाज सुधारक, न्याय की पैरोकार और पर्यावरण कार्यकर्ता थीं। उन्होंने स्वयं दूर-दराज़ के जंगलों में चिपको आंदोलन (पेड़ों को बचाने के लिए उनका आलिंगन करना) के साथ-साथ शराब-विरोधी और अन्य समाज सुधार आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया।

भूमिहीन लोगों के अधिकारों में दृढ़ विश्वास रखने वाली विमला बहुगुणा ने सरला बहन के मार्गदर्शन में ‘भूदान’ कार्यकर्ता के रूप में अपना सामाजिक काम शुरू किया था। वे भूमिहीन लोगों को भूमि दिलाने के लिए दूर-दराज़ के गाँवों में जाती थीं।

भूदान आंदोलन के प्रसिद्ध नेता विनोबा भावे ने इन शुरुआती दिनों में विमला बहुगुणा के काम करने के तरीके और दूर-दराज़ के गाँवों में उनके प्रभाव को करीब से देखा था: दूर-दराज़ के गाँवों में, और कई बार तो बहुत ही प्रतिकूल परिस्थितियों में, वे पहली बार भूदान का संकल्प दिलाने के लिए जाती थीं। विनोबा भावे के सचिव ने सरला बहन को (विनोबा भावे की भावनाएँ व्यक्त करते हुए) लिखा था, “मैंने उसके जैसी लड़की कार्यकर्ता नहीं देखी। वह सिर्फ पहाड़ों की लड़की नहीं है, वह पहाड़ों की देवी है।”

सरला बहन ने इन गाँवों से मिली प्रतिक्रिया के आधार पर बताया है कि एक नए क्षेत्र में काम करने के बावजूद, विमला को अक्सर अपने से अनुभवी स्थानीय पुरुष सदस्यों वाले समूह में नेतृत्व की भूमिका मिलती थी।

विमला बहुगुणा का दृढ़ विचार था कि महिलाओं को समानता का अधिकार मिले। उन्होंने उस समय प्रांतीय राजनीति के उभरते सितारे सुंदरलाल बहुगुणा के विवाह प्रस्ताव के समय यह शर्त रखी थी कि यदि सुंदरलाल राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ने और महात्मा गांधी के मार्ग पर चलकर स्वयं लोगों की सेवा करने का मार्ग अपनाने के लिए सहमत होते हैं, तभी वे विवाह के लिए राज़ी होंगी।

उन्होंने अपनी राह चुन ली थी और उसी पर चलीं। सुंदरलाल बहुगुणा ने सभी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को त्याग दिया। शादी के तुरंत बाद युवा जोड़े ने टिहरी गढ़वाल के एक सुदूर गाँव सिलयारा में खुद के लिए एक बहुत ही साधारण-सा आश्रम बनाने के लिए कड़ी मेहनत की।

यहाँ वे सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए एक सहारा और प्रेरणादायक शख्सियत बन गईं, जिन्होंने नदियों और जंगलों की रक्षा के लिए, दलितों के समान अधिकारों के लिए, शराब की बढ़ती समस्याओं के खिलाफ काम किया और कई रचनात्मक गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया।

जब भूकंप ने सिलयारा आश्रम के एक बड़े हिस्से को नष्ट कर दिया था, तब विमला बहुगुणा ने आश्रम का पुनर्निर्माण कार्य आरंभ होने तक बड़ी हिम्मत से इस मुश्किल घड़ी का सामना किया।

उनका सबसे कठिन और लंबा संघर्ष टिहरी बाँध परियोजना के खिलाफ था। इस संघर्ष में सुंदरलाल ने बाँध स्थल के पास नदी के किनारे एक झोंपड़ी में रहने की प्रतिज्ञा ली थी। उनके इस संघर्ष में वे दूर कैसे रह सकती थीं, तो विमला जी भी वहीं उनके साथ रहीं।

मैं 1977 के आसपास विमला जी से पहली बार मिला था। तब मैं 22 वर्षीया पत्रकार के रूप में चिपको आंदोलन और उससे जुड़े मुद्दों पर लिखने के लिए सिलयारा आश्रम गया था। बहुत जल्द ही वे हमारे परिवार के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गईं। उनके अंतिम दिनों तक हम फोन पर बात करते रहे और जब मैं उन्हें अपनी नई किताब भेंट करने गया, तो वे बहुत खुश हुई थीं।

मैं जब-जब उनके घर या आश्रम गया, तब-तब मैं न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में उनकी गहरी रुचि से प्रभावित हुआ। वे हाल के घटनाक्रमों से अवगत होने के साथ-साथ इन मुद्दों पर मेरी राय जानने में बहुत रुचि रखती थीं, और बेशक इन पर वे अपनी टिप्पणियाँ और नज़रिया भी साझा करती थीं।

वे एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए प्रतिबद्ध थीं। चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किलें आईं, वे कभी अपने मार्ग से विचलित नहीं हुईं।

उनके काम को विस्तार से इन दो किताबों - प्लेनेट इन पेरिल (Planet in Peril) और विमला एंड सुंदरलाल – चिपको मूवमेंट एंड स्ट्रगल अगेंस्ट टिहरी डैम प्रोजेक्ट (Vimla and Sunderlal Bahuguna—Chipko Movement and Struggle against Tehri Dam Project in Garhwal Himalaya) - में पढ़ा जा सकता है।

विमला जी सदैव एक प्रेरणा स्रोत रहेंगी। (स्रोत फीचर्स)