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May 2, 2025

प्रेरकः रेगिस्तान में दो मित्र

 - निशांत

दो मित्र रेगिस्तान में यात्रा कर रहे थे। सफर में किसी मुकाम पर उनका किसी बात पर वाद-विवाद हो गया। बात इतनी बढ़ गई कि एक मित्र ने दूसरे मित्र को थप्पड़ मार दिया। थप्पड़ खाने वाले मित्र को इससे बहुत बुरा लगा ; लेकिन बिना कुछ कहे उसने रेत में लिखा – “आज मेरे सबसे अच्छे मित्र ने मुझे थप्पड़ मारा”।

वे चलते रहे और एक नखलिस्तान में आ पहुँचे जहाँ उनहोंने नहाने का सोचा। जिस व्यक्ति ने थप्पड़ खाया था वह रेतीले दलदल में फंस गया और उसमें समाने लगा ; लेकिन उसके मित्र ने उसे बचा लिया। जब वह दलदल से सही-सलामत बाहर आ गया तब उसने एक पत्थर पर लिखा – “आज मेरे सबसे अच्छे मित्र ने मेरी जान बचाई”।

उसे थप्पड़ मारने और बाद में बचाने वाले मित्र ने उससे पूछा – “जब मैंने तुम्हें मारा तब तुमने रेत पर लिखा और जब मैंने तुम्हें बचाया तब तुमने पत्थर पर लिखा, ऐसा क्यों?”

उसके मित्र ने कहा – “जब हमें कोई दुःख दे तब हमें उसे रेत पर लिख देना चाहिए ताकि क्षमाभावना की हवाएं आकर उसे मिटा दें ; लेकिन जब कोई हमारा कुछ भला करे तब हमें उसे पत्थर पर लिख देना चाहिए ताकि वह हमेशा के लिए लिखा रह जाए।” (हिन्दी ज़ेन से) ■

प्रकृतिः म्यांमार का भूकंप शहरी विकास के लिए एक चेतावनी है

  - प्रमोद भार्गव

म्यांमार में आए 7.7 तीव्रता के ताकतवर भूकंप ने 1700 से भी ज्यादा लोगों की जान ले ली और 2500 से भी ज्यादा लोग घायल हैं। भूकंप के प्रभाव में आकर जिस तरह से बहुमंजिला इमारतें ढहीं, सड़कें, पुल और बाँध टूटे, बिजली और इंटरनेट सेवाएँ ठप हो गईं, यह प्रकृति की एक ऐसी नजीर है, जो बढ़ते शहरीकरण के लिए चेतावनी है। थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में आए कुछ पलों के झटकों ने ही दुनिया के इस सुंदर शहर को थर्रा दिया। इसी बीच अमेरिका की भू- गर्भीय सर्वेक्षण एजेंसी ने आशंका जताई है कि मरने वालों की संख्या 10 हजार से भी अधिक पहुँच सकती है। इस भूकंप के झटके भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल में भी अनुभव किए गए। चीन, वियतनाम, ताइवान, लाओस और श्रीलंका में भी भूकंप की तरंगें अनुभव की गई। याद रहे भारत के भुज में 24 साल पहले आया भूकंप भी 7.7 तीव्रता का था, जिसमें 20 हजार लोगों की मौतें हुई थीं और डेढ़ लाख लोग घायल हुए थे। तीन लाख से ज्यादा घरों को नुकसान हुआ था। म्यांमार का भूकंप काफी उथला था। इस भूकंप का केंद्र भूमि के 10 किमी नीचे था। भूकंप के केंद्र वाला म्यांमार का क्षेत्र संवेदनशील क्षेत्र के रूप में पूर्व से ही चिन्हित है। बावजूद यहाँ आवास और उद्योगों के लिए आलीशान अट्टालिकाएँ खड़ी की जा रही हैं। भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के टकराने का परिणाम इस भूकंप को माना जा रहा है।   

 दिल्ली राजधानी क्षेत्र में 17 फरवरी 2025 की सुबह 5.36 बजे रिक्टर स्केल पर चार तीव्रता वाले भूकंप के झटके और धमाकों जैसी आवाज सुनी गईं थी। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के अनुसार भूकंप का केंद्र दिल्ली के धौला कुआँ के झील पार्क क्षेत्र में 5 किमी की गहराई में था। इस कारण इसकी तीव्रता भूगर्भ में ही कमजोर पड़ गई और सतह पर नहीं आने पाई। बिहार में भी भूकंप के झटके अनुभव किए गए। इसका केंद्र धरती की सतह से 10 किमी नीचे था। इसलिए असर केवल अनुभव हुआ। बावजूद भविष्य में भूकंप का यह संकेत दिल्ली के लिए विनाश की चेतावनी है। क्योंकि दिल्ली, हरिद्वार और महेंद्रगढ़ देहरादून के ऐसे पठारनुमा टीले पर बसा हुआ है, जहाँ से भूकंप की भ्रंश रेखा गुजरती है। अतएव यहाँ हमेशा भूकंप का खतरा बना रहता है।

 यह संकट इसलिए भी है; क्योंकि यमुना नदी के मैदानी क्षेत्र में भूमि की परत नरम है। हालांकि इस भूकंप को विवर्तनिक परत (टेक्टोनिक्स प्लेट) में किसी बदलाव के कारण आना नहीं माना गया था। इसके आने का कारण स्थानीय भू-गर्भीय विविधता को माना जा रहा है। याद रहे हिमालय के उत्तरी तलहटी में स्थित चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र शिगात्से के निकट तिंगरी काउंटी में 7 जनवरी 2025 को 7.1 तीव्रता का भूकंप आया था। इसमें 126 लोग मारे गए थे। पड़ोसी देश नेपाल और भारत में भी इसके झटके महसूस किए गए थे। भूकंप का केंद्र तिंगरी काउंटी में था, जो हिमालय की चोटी माउंट एवरेस्ट क्षेत्र का उत्तरी द्वार माना जाता है। अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण ने इस भूकंप की तीव्रता 7.1 आँकी थी। भूकंप से तिब्बत में किसी बाँध या जालाशय को हानि नहीं पहुँची थी, गौरतलब है कि भूकंप ने भारतीय सीमा के निकट तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर दुनिया का सबसे बड़ा बांध बनाने की योजना ने भारत और बांग्लादेश को चिंता में डाल दिया है ; क्योंकि यह पूरा क्षेत्र भारत और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों में टकराव के कारण चीन के दक्षिण-पश्चिम हिस्से नेपाल और उत्तर-भारत में अकसर भूकंप आते रहते हैं।

भूकंप की चेतावनी संबंधी प्रणालियाँ अनेक देशों में  संचालित हैं; लेकिन वह भू-गर्भ में हो रही दानवी हलचलों की सटीक जानकारी समय पूर्व देने में लगभग असमर्थ हैं। क्योंकि प्राकृतिक आपदाओं की जानकारी देने वाले अमेरिका, जापान, भारत, नेपाल, चीन और अन्य देशों में भूकंप आते ही रहते हैं। इसलिए यहाँ लाख टके का सवाल उठता है कि चाँद और मंगल जैसे ग्रहों पर मानव बस्तियाँ बसाने का सपना और पाताल की गहराइयों को नाप लेने का दावा करने वाले वैज्ञानिक आखिर पृथ्वी के नीचे उत्पात मचा रही हलचलों की जानकारी प्राप्त करने में क्यों असफल हैं ; जबकि वैज्ञानिक इस दिशा में लंबे समय से कार्यरत हैं। अमेरिका एवं भारत समेत अनेक देश मौसम व भू-गर्भीय हलचल की जानकारी देने वाले उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित कर चुके हैं।

 दरअसल दुनिया के नामचीन विशेषज्ञों व पर्यावरणविदों की मानें तो सभी भूकंप प्राकृतिक नहीं होते, बल्कि उन्हें विकराल बनाने में मानवीय हस्तक्षेप शामिल है। इसीलिए इस भूकंप को स्थानीय भू-गर्भीय विविधता का कारण माना गया है। दरअसल प्राकृतिक संसाधनों के अकूत दोहन और फिर शहरीकरण और औद्योगिकी करण के लिए शैतानी निर्माण से छोटे स्तर के भूकंपों की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है। भविष्य में इन्हीं भूकंपों की व्यापकता और विकरालता बढ़ जाती है। यही कारण है कि भूकंपों की आवृत्ति बढ़ रही है। पहले 13 सालों में एक बार भूकंप आने की आशंका बनी रहती थी; लेकिन अब यह घटकर 4 साल हो गई है। यही नहीं आए भूकंपों का वैज्ञानिक आकलन करने से यह भी पता चला है कि भूकंपीय विस्फोट में जो ऊर्जा निकलती है, उसकी मात्रा भी पहले की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली हुई है। 25 अप्रैल 2015 को नेपाल में जो भूकंप आया था, उनसे 20 थर्मोन्यूक्लियर हाइड्रोजन बमों के बराबर ऊर्जा निकली थी। यहाँ हुआ प्रत्येक विस्फोट हिरोशिमा- नागासाकी में गिराए गए परमाणु बमों से भी कई गुना ज्यादा ताकतवर था। जापान और फिर क्वोटो में आए सिलसिलेवार भूकंपों से पता चला है कि धरती के गर्भ में अँगड़ाई ले रही भूकंपीय हलचलें महानगरीय आधुनिक विकास और आबादी के लिए अधिक खतरनाक साबित हो रही हैं। ये हलचलें भारत, पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश की धरती के नीचे भी अँगड़ाई ले रही हैं। इसलिए इन देशों के महानगर भूकंप के मुहाने पर खड़े हैं।

 भूकंप आना कोई नई बात नहीं है। पूरी दुनिया इस अभिशाप को झेलने के लिए जब-तब विवश होती रही है। बावजूद हैरानी इस बात पर है कि विज्ञान की आश्चर्यजनक तरक्की के बाद भी वैज्ञानिक आज तक ऐसी तकनीक ईजाद करने में असफल रहे हैं, जिससे भूकंप की जानकारी आने से पहले मिल जाए। भूकंप के लिए जरूरी ऊर्जा के एकत्र होने की प्रक्रिया को धरती की विभिन्न परतों के आपस में टकराने के सिद्धांत से आसानी से समझा जा सकता है। ऐसी वैज्ञानिक मान्यता है कि करीब साढ़े पांच करोड़ साल पहले भारत और आस्ट्रेलिया को जोड़े रखने वाली भूगर्भीय परतें एक-दूसरे से अलग हो गईं और वे यूरेशिया परत से जा टकराईं। इस टक्कर के फलस्वरूप हिमालय पर्वतमाला अस्तित्व में आई और धरती की विभिन्न परतों के बीच वर्तमान में मौजूद दरारें बनीं। हिमालय पर्वत उस स्थल पर अब तक अटल खड़ा है, जहाँ पृथ्वी की दो अलग-अलग परतें परस्पर टकराकर एक-दूसरे के भीतर घुस गई थीं। परतों के टकराव की इस प्रक्रिया की वजह से हिमालय और उसके प्रायद्वीपीय क्षेत्र में भूकंप आते रहते हैं। इसी प्रायद्वीप में ज्यादातर एशियाई देश बसे हुए हैं।

    वैज्ञानिकों का मानना है कि रासायनिक क्रियाओं के कारण भी भूकंप आते हैं। भूकंपों की उत्पत्ति धरती की सतह से 30 से 100 किमी भीतर होती है। इससे यह वैज्ञानिक धारणा भी बदल रही है कि भूकंप की विनाशकारी तरंगें जमीन से कम से कम 30 किमी नीचे से चलती हैं। ये तरंगे जितनी कम गहराई से उठेगी, उतनी तबाही भी ज्यादा होगी और भूकंप का प्रभाव भी कहीं अधिक बड़े क्षेत्र में दिखाई देगा। लगता है अब कम गहराई के भूकंपों का दौर चल पड़ा है। मैक्सिको में सितंबर 2017 में आया भूकंप धरती की सतह से महज 40 किमी नीचे से उठा था। इसलिए इसने भयंकर तबाही का तांडव रचा था। तिब्बत में आए भूकंप की गहराई तो मात्र 10 किमी आँकी गई है। 

      दरअसल सतह के नीचे धरती की परत ठंडी होने व कम दबाव के कारण कमजोर पड़ जाती है। ऐसी स्थिति में जब चट्टानें दरकती हैं तो भूकंप आता है। कुछ भूकंप धरती की सतह से 100 से 650 किमी के नीचे से भी आते हैं; लेकिन तीव्रता धरती की सतह पर आते-आते कम हो जाती है, इसलिए बड़े रूप में त्रासदी नहीं झेलनी पड़ती। दरअसल इतनी गहराई में धरती इतनी गर्म होती है कि एक तरह से वह द्रव रूप में बदल जाती है। इसलिए इसके झटकों का असर धरती पर कम ही दिखाई देता है। बावजूद इन भूकंपों से ऊर्जा बड़ी मात्रा में निकलती है। धरती की इतनी गहराई से प्रगट हुआ सबसे बड़ा भूकंप 1994 में बोलिविया में रिकॉर्ड किया गया है। पृथ्वी की सतह से 600 किमी भीतर दर्ज इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 8.3 मापी गई थी। इसीलिए यह मान्यता बनी है कि इतनी गहराई से चले भूकंप धरती पर तबाही मचाने में कामयाब नहीं हो सकते हैं, क्योंकि चट्टानें तरल द्रव्य के रूप में बदल जाती हैं।

     प्राकृतिक आपदाएँ अब व्यापक व विनाशकारी साबित हो रही हैं; क्योंकि धरती के बढ़ते तापमान के कारण वायुमंडल भी परिवर्तित हो रहा है। अमेरिका व ब्रिटेन समेत यूरोपीय देशों में दो शताब्दियों के भीतर बेतहाशा अमीरी बढ़ी है। औद्योगिकी करण और शहरीकरण इसी अमीरी की उपज है। यह कथित विकास वादी अवधारणा कुछ और नहीं, प्राकृतिक संपदा का अंधा- धुंध दोहन कर, पृथ्वी को खोखला करने के ऐसे उपाय हैं, जो ब्रह्मांड में फैले अवयवों में असंतुलन बढ़ा रहे हैं। इस विकास के लिए पानी, गैस, खनिज, इस्पात, ईंधन और लकड़ी जरूरी हैं। नतीजतन जो कार्बन गैस बेहद न्यूनतम मात्रा में बनती थीं, वे अब अधिकतम मात्रा में बनने लगी हैं। न्यूनतम मात्रा में बनी गैसों का शोषण और समायोजन भी प्राकृतिक रूप से हो जाता था, किंतु अब वनों का विनाश कर दिए जाने के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है, जिसकी वजह से वायुमंडल में इकतरफा दबाव बढ़ रहा है। इस कारण धरती पर पड़ने वाली सूरज की गर्मी प्रत्यावर्तित होने की बजाय, धरती में ही समाने लगी है। गोया, धरती का तापमान बढ़ने लगा, जो जलवायु परिवर्तन का कारण तो बना ही, प्राकृतिक आपदाओं का कारण भी बन रहा है। ऐसे में सीमेंट, लोहा और कंक्रीट के भवन जब गिरते हैं, तो मानव त्रासदी ज्यादा होती है। जैसे कि हमें अमेरिका के लॉस एंजिल्स शहर में लगी आग में देखने में आ रहा है।  ■

स्वास्थ्यः कटहल के लाभ


  - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

यदि आम को फलों का राजा कहा जाता है, तो कटहल को सभी फलों में डॉक्टर कहा जा सकता है। भारत और मध्य-पूर्व के लोग कटहल (Artocarpus heterophyllus) से बहुत पहले से परिचित हैं। कटहल का उपयोग आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्धति में स्वास्थ्यवर्धक के रूप में किया जाता रहा है। तमिल में ‘पला’, बंगाली में ‘कटहल’ और मलयालम में ‘चक्का’ कहलाने वाला कटहल भारत के दक्षिणी और पूर्वोत्तर राज्यों में अधिकतर भोजन का हिस्सा है, जबकि अन्य क्षेत्रों में यह फल की तरह अधिक खाया जाता है। मलेशिया जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में यह प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, और यहाँ से इसे मध्य पूर्व क्षेत्रों में निर्यात किया जाता है।
कटहल का पेड़ विशाल और घना) होता है। इसके फल पेड़ की पतली शाखाओं पर नहीं लगते बल्कि तने और मोटी शाखाओं के जोड़ के आसपास लगते हैं। यहाँ लगने से इसे बहुत बड़े आकार में बढ़ने में मदद मिलती है; केरल में 42 किलोग्राम का एक कटहल अब तक एक रिकॉर्ड है। कटहल का पका हुआ फल मीठा और स्वादिष्ट होता है। और कच्चे कटहल से कई तरह के व्यंजन बनते हैं। इसे मांस के विकल्प के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इसमें वसा और कोलेस्ट्रॉल कम होता है ।
सुपरफूड कटहल
इन सभी खूबियों के साथ-साथ, कटहल एक सुपरफूड के रूप में विश्वभर में लोकप्रिय हो रहा है। क्लीवलैंड युनिवर्सिटी की एक व्यापक समीक्षा बताती है कि कटहल प्रोटीन, विटामिन, खनिज और पादप रसायनों, के अलावा पोटेशियम, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस जैसे तत्त्वों से भरपूर है। ड्यूक युनिवर्सिटी की वेबसाइट पर वैज्ञानिक ब्रायना इलियट ने कटहल के पोषण सम्बंधी लाभों पर प्रकाश डाला है। वे बताती हैं कि पोषण की दृष्टि से कटहल की फांकें सेब और आम की तुलना में बेहतर हैं। कई संदर्भों का हवाला देते हुए वे बताती हैं कि कटहल का फल रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करता है; यकृत से लेकर अन्य अंगों में जमा वसा को घटाता है; और इसमें मौजूद कैरोटीनॉइड्स टाइप-2 डायबिटीज़ और हृदय रोगों के जोखिम को कम करते हैं। इसमें मौजूद विटामिन ‘ए’ और ‘सी’ वायरल संक्रमण के जोखिम को कम करते हैं।
WebMed वेबसाइट भी इसके कई लाभ बताती है। इसके अनुसार, “कटहल ज़रूरी विटामिनों और खनिज से सराबोर है, विशेष रूप से यह विटामिन ‘बी’, पोटेशियम और विटामिन ‘सी’ का एक अच्छा स्रोत है।” कटहल मधुमेह के रोगियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। भारत में लगभग 21.5 करोड़ लोग मधुमेह से पीड़ित हैं। 2021 में, आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम स्थित गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज के ए. गोपाल राव और उनके साथियों ने न्यूट्रिशन एंड डायबिटीज़ जर्नल में एक रैंडम क्लीनिकल परीक्षण के नतीजे प्रकाशित किए हैं। इसमें बताया गया है कि कच्चे कटहल का आटा (जिसे कच्चे कटहल के गूदेदार हिस्से को सुखाकर, पीसकर बनाया जाता है) ग्लाइसेमिक नियंत्रण में कुशल है और चावल या गेहूँ जैसे मुख्य आहार का विकल्प बन सकता है। कटहल का आटे के रूप में इस्तेमाल उत्तरी राज्यों में विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है, जहाँ कटहल की खेती नहीं होती। इस शोधपत्र के एक लेखक जेम्स जोसेफ एक कंपनी (jackfruit 365) चलाते हैं जो पूरे भारत में कटहल का आटा बेचती है।
कटहल मधुमेह रोगियों और स्वस्थ लोगों, दोनों के लिए दैनिक आहार का एक वांछनीय हिस्सा है। तो सब्ज़ी, अचार, फल या आटे किसी भी रूप में इसे इस्तेमाल करें और स्वस्थ रहें! (स्रोत फीचर्स) ■

कविताः पिता, तुम सच में चले गए?

  -  डॉ. पूनम चौधरी 

जब मैं विदा हुई थी,  

छलक गई थी तुम्हारी आँखें,  

पर छुपा कर सारा दर्द,  

ओढ़कर मुस्कान, थमाया था धीरज-

‘‘जा, यह नया संसार तेरी प्रतीक्षा कर रहा है।  

पर तेरा छूटा हुआ सब तेरा ही है।’’

 

मैंने बाँध लिये थे शब्द,  

आँचल में गाँठ लगाकर।  

पर अब वह गाँठ खुल गई।  

तुम सच में चले गए?  

और साथ में ले गए मेरा छूटा हुआ सब- 

आँगन, घर, मायका।  

 

अब लौटती हूँ तो घर  

वैसा नहीं लगता।  

खुले दरवाजे के पीछे तुम नहीं होते,  

तुम्हारी कुर्सी की जगह नहीं बदली,  

पर अब वो किसी को नहीं बुलाती।  

 

अब आती हूँ तो  

रास्ते भर फोन नहीं खटकता—  

"कहाँ पहुँची? कब आएगी?"  

तुम्हारी आतुरता और मेरा चिड़चिड़ाना—  

"पहले आ जाऊँ, फिर कर लूँगी बात!"  

अब बस एक भावुक स्मृति है।  

 

अब घर में बस तुम्हारी तस्वीर है।  

माँ चुपचाप तस्वीर पर फूल रख देती है,  

और मैं बिना बोले छू लेती हूँ तुम्हारा चेहरा,  

जो अब बस एक कागज़ में क़ैद है।  

 

पिता, तुम सच में चले गए हो? 

 

अब वह आँगन खाली है,  

जिसमें गूँजती थी हँसी।  

जिस पर हर बार लौटने पर  

तुम पहले खड़े मिलते थे।  

अब घर की दीवारें सुनसान हैं,  

जैसे कोई अपना बहुत कुछ कहकर  

अचानक मौन हो गया हो।  

 

‘‘पिता, तुम सच में चले गए?’’  

 

अब जब अपने संसार में उलझती हूँ,  

दिल बोझिल हो जाता है।  

सुनना चाहती हूँ तुम्हारी आवाज़—  

‘‘भरोसा रख, वह सब सही करेगा।’’ 

पर अब सन्नाटा है।  

अब कुछ अपने आप सही नहीं होता।  

 

अब कोई अधिकार से नहीं पूछता—  

‘‘सब ठीक है ना, बेटा?’’  

सब कहते हैं, ‘‘तुम्हें तो मज़बूत होना चाहिए’’ 

पर जब पिता नहीं रहते,  

तो बेटियाँ अचानक से छोटी और कमजोर हो जाती हैं।  

और माँ भी...  

पिता के बिना अधूरी-सी लगती है।  

 

पिता, तुम सच में चले गए?

 

अब मायका बस अतीत में झाँकने जैसा है।  

तुम थे, तो वह घर था,  

घोंसला था, हर समस्या का समाधान था।  

मेरा रुकना बिना प्रश्न स्वीकार था।  

अब सब बदल गया है।  

 

माँ की आँखों की नमी दिल को चीरती है।  

उनकी आँखों का खालीपन,  

जो कभी नहीं भर पाएगा।  

अब वहाँ लौटना खुद को दो हिस्सों में बाँटने जैसा है-  

एक हिस्सा जो कहता है, "यह मेरा ही घर था।" 

दूसरा जो चिल्लाता है, "यह सब छलावा है,  

सारे अधिकार तो पिता के साथ ही विदा हो गए!"  

 

अब यहाँ रहने से ज़्यादा  

यहाँ से लौटना कठिन हो गया है।  

अब मायका सिर्फ़ चारदीवारी का नाम है,  

जिसकी छत अभी सलामत है,  

पर जिसका आसमान खो गया है।  

 

पिता, तुम सच में चले गए? 

 

सुना है, पिता कभी नहीं जाते।  

वह बेटियों की आत्मा में बस जाते हैं।  

अगर यह सच है,  

तो किसी शाम जब तेज़ हवा चले,  

तो ज़रा मेरी पीठ थपथपा देना।  

फिर रख देना सिर पर हाथ।  

 

किसी भूले-बिसरे गीत की धुन में  

बस इतना कह देना—  

‘‘बेटा, मैं यहीं हूँ!’’

 

कि यह दिल फिर से धड़कने लग जाए,  

यह जीवन फिर से मुस्कुरा उठे,  

यह आँखें फिर से रोशन हो जाएँ,  

और यह तसल्ली हो जाए  

कि अब भी मेरा कोना सलामत है।


रचनाकार के बारे में
-  शिक्षा- एम.ए. (हिंदी) पी-एच.डी (शैलेश मटियानी के कथा साहित्य की संवेदना), एम. एड, एल. एल. बी (आगरा विश्वविद्यालय ),  नन्हे ईश्वर (कहानी संग्रह )
 विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, साहित्य परिक्रमा, वाग्प्रवाह व समाचार पत्रों राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला, स्वदेश आदि में कहानियाँ व आलेख प्रकाशित, निरंतर आलोचनात्मक व रचनात्मक विमर्श में सक्रिय। संप्रति -अध्यापिका ( उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद), ईमेल- poonam.singh12584@gmail.com
सम्पर्कः  98, पुष्पांजलि नगर फेज -3, अवधपुरी आगरा ( उत्तर प्रदेश) 282010

निबंधः मेरी पहली रचना

 - प्रेमचंद 

उस वक्त मेरी उम्र कोई 13 साल की रही होगी। हिन्दी बिल्कुल न जानता था। उर्दू के उपन्यास पढऩे- लिखने का उन्माद था। मौलाना शहर, पं. रतननाथ सरशार, मिर्जा रुसवा, मौलवी मोहम्मद अली हरदोई निवासी, उस वक्त के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे। इनकी रचनाएँ जहाँ मिल जाती थीं, स्कूल की याद भूल जाती थी और पुस्तक समाप्त करके ही दम लेता था। उस जमाने में रेनाल्ड के उपन्यासों की धूम थी। उर्दू में उनके अनुवाद धड़ाधड़ निकल रहे थे और हाथों- हाथ बिकते थे। मैं भी उनका आशिक था। स्व. हजरत रियाज ने जो उर्दू के प्रसिद्ध कवि थे और जिनका हाल में देहांत हुआ है, रेनाल्ड की एक रचना का अनुवाद ‘हरम सरा’ के नाम से किया था। उसी जमाने में लखनऊ के साप्ताहिक ‘अवध-पंच’ के सम्पादक स्व. मौलाना सज्जाद हुसैन ने, जो हास्यरस के अमर कलाकार हैं, रेनाल्ड के दूसरे उपन्यास का ‘धोखा’ या ‘तिलिस्मी फानूस’ के नाम से अनुवाद किया था। ये सारी पुस्तकें मैंने उसी जमाने में पढ़ीं। और पं. रतननाथ सरशार से तो मुझे तृप्ति ही न होती थी। उनकी सारी रचनाएँ मैंने पढ़ डालीं। उन दिनों मेरे पिता गोरखपुर में रहते थे और मैं भी गोरखपुर के ही मिशन स्कूल में आठवीं में पढ़ता था, जो तीसरा दर्जा कहलाता था। रेती पर एक बुकसेलर बुद्धिलाल नाम का रहता था। मैं उसकी दुकान पर जा बैठता था और उसके स्टाक से उपन्यास ले- लेकर पढ़ता था। मगर दुकान पर सारे दिन तो बैठ न सकता था, इसलिए मैं उसकी दुकान से अंग्रेजी पुस्तकों की कुंजियाँ और नोट्स लेकर अपने स्कूल के लड़कों के हाथ बेचा करता था और इसके मुआवजे में दुकान से उपन्यास घर लाकर पढ़ता था। दो-तीन वर्षों में मैंने सैंकड़ों उपन्यास पढ़ डाले होंगे। जब उपन्यासों का स्टाक समाप्त हो गया, तो मैंने नवलकिशोर प्रेस से निकले हुए पुराणों के उर्दू अनुवाद भी पढ़े, और ‘तिलिस्मी होशरूबा’ के कई भाग भी पढ़े। इस वृहद तिलस्मी ग्रंथ के सत्रह भाग उस वक्त निकल चुके थे और एक- एक भाग बड़े सुपररायल आकार के दो- दो हजार पृष्ठों से कम न होगा और इन सतरह भागों के उपरांत उसी पुस्तक के अलग- अलग प्रसंगों पर पचीसों भाग छप चुके थे। इनमें से भी मैंने कई पढ़े। जिसने इतने बड़े ग्रंथ की रचना की, उसकी कल्पना शति कितनी प्रबल होगी, इसका केवल अनुमान लगाया जा सकता है। कहते हैं कि ये कथाएँ मौलाना फैजी ने अकबर के विनोदार्थ फारसी में लिखी थीं। इनमें कितना सत्य है, कह नहीं सकता; लेकिन इतनी वृहद् कथा शायद ही संसार की किसी भाषा में हो। पूरी एंसाइक्लोपीडिया समझ लीजिए। एक आदमी तो अपने साठ वर्ष के जीवन में उनकी नकल भी करना चाहे, तो नहीं कर सकता। रचना तो दूसरी बात है।

उसी जमाने में मेरे एक नाते के मामू कभी- कभी हमारे यहाँ आया करते थे। अधेड़ हो गए थे; लेकिन अभी तक बिन-ब्याहे थे। पास में थोड़ी सी जमीन थी, मकान था; लेकिन धरती के बिना सब कुछ सूना था। इसलिए घर पर जी न लगता था। नातेदारियों में घूमा करते थे और सबसे यही आशा रखते थे कि कोई उनका ब्याह करा दे। इसके लिए सौ दो सौ खर्च करने करो भी तैयार रहते। क्यों उनका ब्याह नहीं हुआ, यह आश्चर्य था। अच्छे खासे हृष्ट-पुष्ट आदमी थे, बड़ी-बड़ी मूँछें, औसत कद, साँवला रंग। गाँजा पीते थे, इसमें आँखें लाल रहती थीं। अपने ढंग के धर्मनिष्ठ भी थे। शिवजी को रोजाना जल चढ़ाते थे और मांस- मछली नहीं खाते थे।

आखिर एक बार उन्होंने भी वही किया, जो बिन-ब्याहे लोग अक्सर किया करते हैं। एक चमारिन के नयन- बाणों से घायल हो गए। वह उनके यहाँ गोबर पाथने, बैलों को सानी-पानी देने और इसी तरह के दूसरे फुटकर कामों के लिए नौकर थी। जवान थी, छबीली थी और अपने वर्ग की अन्य रमणियों की भांति प्रसन्नमुख और विनोदिनी थी। ‘एक समय सखि सुअरि सुंदरि’-वाली बात थी। मामू साहब का तृषित हृदय मीठे जल की धारा देखते ही फिसल पड़ा। बातों-बातों में उससे छेड़छाड़ करने लगे। वह इनके मन का भाव ताड़ गई। ऐसी अल्हड़ न थी और नखरे करने लगी। केशों में तेल भी पड़ने लगा, चाहे सरसों का ही क्यों न हो। आँखों में काजल भी चमका, ओठों पर मिस्सी भी आई और काम में ढिलाई भी शुरू हुई। कभी दोपहर को आई और झलक दिखलाकर चली गई, कभी साँझ को आई और एक तीर चलाकर चली गई। बैलों को सानी-पानी मामू साहब खुद दे देते, गोबर दूसरे उठा ले जाते, युवती से बिगड़ते क्योंकर? वहाँ तो अब प्रेम उदय हो गया था। होली में उसे प्रथानुसार एक साड़ी दी, मगर अबकी गजी की साड़ी न थी। खूबसूरत- सी हवा दो रुपये की चुंदरी थी। होली की त्योहारी भी मामूल से चौगुनी थी। और यह सिलसिला यहाँ तक बढ़ा कि वह चमारिन ही घर की मालकिन हो गई।

एक दिन संध्या-समय चमारों ने आपस में पंचायत की। बड़े आदमी हैं तो हुआ करें, क्या किसी की इज्जत लेंगे? एक इन लाला के बाप थे कि कभी किसी मेहरिया की ओर आँख उठाकर न देखा, (हालांकि यह सरासर गलत था) और यह एक हैं कि नीच जाति की बहू- बेटियों पर भी डोरे डालते हैं!  समझाने- बुझाने का मौका न था। समझाने से लाला मानेंगे तो नहीं, उल्टे और कोई मामला खड़ा कर देंगे। इनके कलम घुमाने की तो देर है। इसलिए निश्चय हुआ कि लाला साहब को ऐसा सबक देना चाहिए कि हमेशा के लिए याद हो जाए। इज्जत का बदला खून ही चुकाता है; लेकिन मुरम्मत से भी कुछ उसकी पुरौती हो सकती है।

दूसरे दिन शाम को जब चम्पा मामू साहब के घर में आई तो उन्होंने अंदर का द्वार बंद कर दिया। महीनों के असमंजस और हिचक और धार्मिक संघर्ष के बाद आज मामू साहब ने अपने प्रेम को व्यवहारिक रूप देने का निश्चय किया था। चाहे कुछ हो जाए, कुल- मरजाद रहे या जाय, बाप- दादा का नाम डूबे या उतराय!

उधर चमारों का जत्था ताक में था ही। इधर किवाड़ बंद हुए, उधर उन्होंने खटखटाना शुरू किया। पहले तो मामू साहब ने समझा, कोई आसामी मिलने आया होगा, किवाड़ बंद पाकर लौट जाएगा ; लेकिन जब आदमियों का शोरगुल सुना तो घबराए। जाकर किवाड़ों की दराज से झांका। कोई बीस- पचीस चमार लाठियाँ लिए, द्वार रोके खड़े किवाड़ों को तोड़ने की चेष्टा कर रहे थे। अब करें तो क्या करें? भागने का कहीं रास्ता नहीं, चम्पा को कहीं छिपा नहीं सकते। समझ गए कि शामत आ गई। आशिकी इतनी जल्दी गुल खिलाएगी, यह क्या जानते थे, नहीं इस चमारिन पर दिल को आने ही क्यों देते। उधर चम्पा इन्हीें को कोस रही थी- तुम्हारा क्या बिगड़ेगा, मेरी तो इज्जत लुट गई। घर वाले मूड़ ही काटकर छोड़ेंगे, कहती थी, कभी किवाड़ बंद न करो, हाथ-पाँव जोड़ती थी। मगर तुम्हारे सिर पर तो भूत सवार था। लगी मुँह में कालिख कि नहीं?

मामू साहब बेचारे इस कूचे में कभी न आए थे। कोई पक्का खिलाड़ी होता तो सौ उपाय निकाल लेता ; लेकिन मामू साहब की तो जैसे सिट्टी-पिट्टी भूल गई। बरौठे में थर-थर काँपते ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करते हुए खड़े थे। कुछ न सूझता था।

और उधर द्वार पर कोलाहल बढ़ता जा रहा था। यहाँ तक कि सारा गाँव जमा हो गया। बाम्हन, ठाकुर, कायस्थ सभी तमाशा देखने और हाथ की खुजली मिटाने के लिए आ पहुँचे। इससे ज्यादा मनोरंजक और स्फूर्तिवर्धक तमाशा और क्या होगा कि एक मर्द और एक औरत को एक साथ घर में बंद पाया जाए। फिर वह चाहे कितनी ही प्रतिष्ठित और विनम्र क्यों न हो, जनता उसे किसी तरह क्षमा नहीं कर सकती। बढ़ई बुलाया गया, किवाड़ फाड़े गए और मामू साहब भूसे की कोठरी में छिपे हुए मिले। चम्पा आँगन में खड़ी रो रही थी। द्वार खुलते ही भागी। कोई उससे नहीं बोला। मामू साहब भागकर कहाँ जाते! वह जानते थे उनके लिए भागने का रास्ता नहीं है। मार खाने के लिए तैयार बैठे थे। मार पड़ने लगी और बेभाव की पड़ने लगी। जिसके हाथ जो कुछ लगा, जूता, छड़ी, छात, लात, घूंसा और अस्त्र चले। यहाँ तक कि मामू साहब बेहोश गए और लोगों ने उन्हें मुर्दा समझ कर छोड़ दिया। अब इतनी दुर्गति के बाद वह बच भी गए, तो गाँव में नहीं रह सकते और उनकी जमीन पट्टेदारों के हाथ आएगी।

इस दुर्घटना की खबर उड़ते-उड़ते हमारे यहाँ भी पहुँची। मैंने भी उसका खूब आनंद उठाया। पिटते समय उनकी रूपरेखा कैसी रही होगी, इसकी कल्पना करके मुझे खूब हंसी आई। एक महीने तक तो वह हल्दी और गुड़ पीते रहे। ज्यों ही चलने- फिरने लायक हुए, हमारे यहाँ आए। यहाँ अपने गाँववालों पर डाके का इस्तगासा दायर करना चाहते थे।

अगर उन्होंने कुछ दीनता दिखाई होती तो शायद मुझे हमदर्दी हो जाती ; लेकिन उनका वही दमखम था। मुझे खेलते या उपन्यास पढ़ते देखकर बिगड़ना और रोब जमाना और पिताजी से शिकायत करने की धमकी देना, यह अब मैं क्यों सहने लगा था। अब तो मेरे पास उन्हें नीचे दिखाने के लिए काफी मसाला था।

आखिर एक दिन मैंने यह सारी दुर्घटना एक नाटक के रूप में लिख डाली और अपने मित्रों को सुनाई। सब-के-सब खूब हंसे। मेरा साहस बढ़ा। मैंने उसे साफ- साफ लिखकर वह कापी मामू साहब के सिरहाने रख दी और स्कूल चला गया। दिल में कुछ डरता भी था, कुछ खुश भी था और कुछ घबराया हुआ भी था। सबसे बड़ा कुतूहल यह था कि ड्रामा पढ़कर मामू साहब क्या कहते हैं। स्कूल में जी न लगता था। दिल उधर ही टंगा हुआ था। छुट्टी होते ही घर चला गया। मगर द्वार के समीप पाकर पाँव रुक गए। भय हुआ, कहीं मामू साहब मुझे मार न बैठें ; लेकिन इतना जानता था कि वह एकाध थप्पड़ से ज्यादा मुझे मार न सकेंगे, क्योंकि मैं मार खाने वाले लड़कों में से न था।

मगर यह मामला क्या है! मामू साहब चारपाई पर नहीं हैं, जहाँ वह नित्य लेटे हुए मिलते थे। क्या घर चले गए? आकर कमरा देखा वहाँ भी सन्नाटा। मामू साहब के जूते, कपड़े, गठरी सब लापता। अंदर जाकर पूछा। मालूम हुआ, मामू साहब किसी जरूरी काम से घर चले गए। भोजन तक न किया। मैंने बाहर आकर सारा कमरा छान मारा, मगर मेरा ड्रामा- मेरी वह पहली रचना कहीं न मिली। मालूम नहीं, मामू साहब ने उसे चिरागअली के सुपुर्द कर दिया या अपने साथ स्वर्ग ले गए?  ■