- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन
May 2, 2025
स्वास्थ्यः कटहल के लाभ
- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन
कविताः पिता, तुम सच में चले गए?
जब मैं विदा हुई थी,
छलक गई थी तुम्हारी आँखें,
पर छुपा कर सारा दर्द,
ओढ़कर मुस्कान, थमाया था धीरज-
‘‘जा, यह नया संसार तेरी प्रतीक्षा कर रहा है।
पर तेरा छूटा हुआ सब तेरा ही है।’’
मैंने बाँध लिये थे शब्द,
आँचल में गाँठ लगाकर।
पर अब वह गाँठ खुल गई।
तुम सच में चले गए?
और साथ में ले गए मेरा छूटा हुआ सब-
आँगन, घर, मायका।
अब लौटती हूँ तो घर
वैसा नहीं लगता।
खुले दरवाजे के पीछे तुम नहीं होते,
तुम्हारी कुर्सी की जगह नहीं बदली,
पर अब वो किसी को नहीं बुलाती।
अब आती हूँ तो
रास्ते भर फोन नहीं खटकता—
"कहाँ पहुँची? कब आएगी?"
तुम्हारी आतुरता और मेरा चिड़चिड़ाना—
"पहले आ जाऊँ, फिर कर लूँगी बात!"
अब बस एक भावुक स्मृति है।
अब घर में बस तुम्हारी तस्वीर है।
माँ चुपचाप तस्वीर पर फूल रख देती है,
और मैं बिना बोले छू लेती हूँ तुम्हारा चेहरा,
जो अब बस एक कागज़ में क़ैद है।
पिता, तुम सच में चले गए हो?
अब वह आँगन खाली है,
जिसमें गूँजती थी हँसी।
जिस पर हर बार लौटने पर
तुम पहले खड़े मिलते थे।
अब घर की दीवारें सुनसान हैं,
जैसे कोई अपना बहुत कुछ कहकर
अचानक मौन हो गया हो।
‘‘पिता, तुम सच में चले गए?’’
अब जब अपने संसार में उलझती हूँ,
दिल बोझिल हो जाता है।
सुनना चाहती हूँ तुम्हारी आवाज़—
‘‘भरोसा रख, वह सब सही करेगा।’’
पर अब सन्नाटा है।
अब कुछ अपने आप सही नहीं होता।
अब कोई अधिकार से नहीं पूछता—
‘‘सब ठीक है ना, बेटा?’’
सब कहते हैं, ‘‘तुम्हें तो मज़बूत होना चाहिए’’
पर जब पिता नहीं रहते,
तो बेटियाँ अचानक से छोटी और कमजोर हो जाती हैं।
और माँ भी...
पिता के बिना अधूरी-सी लगती है।
पिता, तुम सच में चले गए?
अब मायका बस अतीत में झाँकने जैसा है।
तुम थे, तो वह घर था,
घोंसला था, हर समस्या का समाधान था।
मेरा रुकना बिना प्रश्न स्वीकार था।
अब सब बदल गया है।
माँ की आँखों की नमी दिल को चीरती है।
उनकी आँखों का खालीपन,
जो कभी नहीं भर पाएगा।
अब वहाँ लौटना खुद को दो हिस्सों में बाँटने जैसा है-
एक हिस्सा जो कहता है, "यह मेरा ही घर था।"
दूसरा जो चिल्लाता है, "यह सब छलावा है,
सारे अधिकार तो पिता के साथ ही विदा हो गए!"
अब यहाँ रहने से ज़्यादा
यहाँ से लौटना कठिन हो गया है।
अब मायका सिर्फ़ चारदीवारी का नाम है,
जिसकी छत अभी सलामत है,
पर जिसका आसमान खो गया है।
पिता, तुम सच में चले गए?
सुना है, पिता कभी नहीं जाते।
वह बेटियों की आत्मा में बस जाते हैं।
अगर यह सच है,
तो किसी शाम जब तेज़ हवा चले,
तो ज़रा मेरी पीठ थपथपा देना।
फिर रख देना सिर पर हाथ।
किसी भूले-बिसरे गीत की धुन में
बस इतना कह देना—
‘‘बेटा, मैं यहीं हूँ!’’
कि यह दिल फिर से धड़कने लग जाए,
यह जीवन फिर से मुस्कुरा उठे,
यह आँखें फिर से रोशन हो जाएँ,
और यह तसल्ली हो जाए
कि अब भी मेरा कोना सलामत है।
निबंधः मेरी पहली रचना
- प्रेमचंद
उस वक्त मेरी उम्र कोई 13 साल की रही होगी। हिन्दी बिल्कुल न जानता था। उर्दू के उपन्यास पढऩे- लिखने का उन्माद था। मौलाना शहर, पं. रतननाथ सरशार, मिर्जा रुसवा, मौलवी मोहम्मद अली हरदोई निवासी, उस वक्त के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे। इनकी रचनाएँ जहाँ मिल जाती थीं, स्कूल की याद भूल जाती थी और पुस्तक समाप्त करके ही दम लेता था। उस जमाने में रेनाल्ड के उपन्यासों की धूम थी। उर्दू में उनके अनुवाद धड़ाधड़ निकल रहे थे और हाथों- हाथ बिकते थे। मैं भी उनका आशिक था। स्व. हजरत रियाज ने जो उर्दू के प्रसिद्ध कवि थे और जिनका हाल में देहांत हुआ है, रेनाल्ड की एक रचना का अनुवाद ‘हरम सरा’ के नाम से किया था। उसी जमाने में लखनऊ के साप्ताहिक ‘अवध-पंच’ के सम्पादक स्व. मौलाना सज्जाद हुसैन ने, जो हास्यरस के अमर कलाकार हैं, रेनाल्ड के दूसरे उपन्यास का ‘धोखा’ या ‘तिलिस्मी फानूस’ के नाम से अनुवाद किया था। ये सारी पुस्तकें मैंने उसी जमाने में पढ़ीं। और पं. रतननाथ सरशार से तो मुझे तृप्ति ही न होती थी। उनकी सारी रचनाएँ मैंने पढ़ डालीं। उन दिनों मेरे पिता गोरखपुर में रहते थे और मैं भी गोरखपुर के ही मिशन स्कूल में आठवीं में पढ़ता था, जो तीसरा दर्जा कहलाता था। रेती पर एक बुकसेलर बुद्धिलाल नाम का रहता था। मैं उसकी दुकान पर जा बैठता था और उसके स्टाक से उपन्यास ले- लेकर पढ़ता था। मगर दुकान पर सारे दिन तो बैठ न सकता था, इसलिए मैं उसकी दुकान से अंग्रेजी पुस्तकों की कुंजियाँ और नोट्स लेकर अपने स्कूल के लड़कों के हाथ बेचा करता था और इसके मुआवजे में दुकान से उपन्यास घर लाकर पढ़ता था। दो-तीन वर्षों में मैंने सैंकड़ों उपन्यास पढ़ डाले होंगे। जब उपन्यासों का स्टाक समाप्त हो गया, तो मैंने नवलकिशोर प्रेस से निकले हुए पुराणों के उर्दू अनुवाद भी पढ़े, और ‘तिलिस्मी होशरूबा’ के कई भाग भी पढ़े। इस वृहद तिलस्मी ग्रंथ के सत्रह भाग उस वक्त निकल चुके थे और एक- एक भाग बड़े सुपररायल आकार के दो- दो हजार पृष्ठों से कम न होगा और इन सतरह भागों के उपरांत उसी पुस्तक के अलग- अलग प्रसंगों पर पचीसों भाग छप चुके थे। इनमें से भी मैंने कई पढ़े। जिसने इतने बड़े ग्रंथ की रचना की, उसकी कल्पना शति कितनी प्रबल होगी, इसका केवल अनुमान लगाया जा सकता है। कहते हैं कि ये कथाएँ मौलाना फैजी ने अकबर के विनोदार्थ फारसी में लिखी थीं। इनमें कितना सत्य है, कह नहीं सकता; लेकिन इतनी वृहद् कथा शायद ही संसार की किसी भाषा में हो। पूरी एंसाइक्लोपीडिया समझ लीजिए। एक आदमी तो अपने साठ वर्ष के जीवन में उनकी नकल भी करना चाहे, तो नहीं कर सकता। रचना तो दूसरी बात है।
उसी जमाने में मेरे एक नाते के मामू कभी- कभी हमारे यहाँ आया करते थे। अधेड़ हो गए थे; लेकिन अभी तक बिन-ब्याहे थे। पास में थोड़ी सी जमीन थी, मकान था; लेकिन धरती के बिना सब कुछ सूना था। इसलिए घर पर जी न लगता था। नातेदारियों में घूमा करते थे और सबसे यही आशा रखते थे कि कोई उनका ब्याह करा दे। इसके लिए सौ दो सौ खर्च करने करो भी तैयार रहते। क्यों उनका ब्याह नहीं हुआ, यह आश्चर्य था। अच्छे खासे हृष्ट-पुष्ट आदमी थे, बड़ी-बड़ी मूँछें, औसत कद, साँवला रंग। गाँजा पीते थे, इसमें आँखें लाल रहती थीं। अपने ढंग के धर्मनिष्ठ भी थे। शिवजी को रोजाना जल चढ़ाते थे और मांस- मछली नहीं खाते थे।आखिर एक बार उन्होंने भी वही किया, जो बिन-ब्याहे लोग अक्सर किया करते हैं। एक चमारिन के नयन- बाणों से घायल हो गए। वह उनके यहाँ गोबर पाथने, बैलों को सानी-पानी देने और इसी तरह के दूसरे फुटकर कामों के लिए नौकर थी। जवान थी, छबीली थी और अपने वर्ग की अन्य रमणियों की भांति प्रसन्नमुख और विनोदिनी थी। ‘एक समय सखि सुअरि सुंदरि’-वाली बात थी। मामू साहब का तृषित हृदय मीठे जल की धारा देखते ही फिसल पड़ा। बातों-बातों में उससे छेड़छाड़ करने लगे। वह इनके मन का भाव ताड़ गई। ऐसी अल्हड़ न थी और नखरे करने लगी। केशों में तेल भी पड़ने लगा, चाहे सरसों का ही क्यों न हो। आँखों में काजल भी चमका, ओठों पर मिस्सी भी आई और काम में ढिलाई भी शुरू हुई। कभी दोपहर को आई और झलक दिखलाकर चली गई, कभी साँझ को आई और एक तीर चलाकर चली गई। बैलों को सानी-पानी मामू साहब खुद दे देते, गोबर दूसरे उठा ले जाते, युवती से बिगड़ते क्योंकर? वहाँ तो अब प्रेम उदय हो गया था। होली में उसे प्रथानुसार एक साड़ी दी, मगर अबकी गजी की साड़ी न थी। खूबसूरत- सी हवा दो रुपये की चुंदरी थी। होली की त्योहारी भी मामूल से चौगुनी थी। और यह सिलसिला यहाँ तक बढ़ा कि वह चमारिन ही घर की मालकिन हो गई।
एक दिन संध्या-समय चमारों ने आपस में पंचायत की। बड़े आदमी हैं तो हुआ करें, क्या किसी की इज्जत लेंगे? एक इन लाला के बाप थे कि कभी किसी मेहरिया की ओर आँख उठाकर न देखा, (हालांकि यह सरासर गलत था) और यह एक हैं कि नीच जाति की बहू- बेटियों पर भी डोरे डालते हैं! समझाने- बुझाने का मौका न था। समझाने से लाला मानेंगे तो नहीं, उल्टे और कोई मामला खड़ा कर देंगे। इनके कलम घुमाने की तो देर है। इसलिए निश्चय हुआ कि लाला साहब को ऐसा सबक देना चाहिए कि हमेशा के लिए याद हो जाए। इज्जत का बदला खून ही चुकाता है; लेकिन मुरम्मत से भी कुछ उसकी पुरौती हो सकती है।
दूसरे दिन शाम को जब चम्पा मामू साहब के घर में आई तो उन्होंने अंदर का द्वार बंद कर दिया। महीनों के असमंजस और हिचक और धार्मिक संघर्ष के बाद आज मामू साहब ने अपने प्रेम को व्यवहारिक रूप देने का निश्चय किया था। चाहे कुछ हो जाए, कुल- मरजाद रहे या जाय, बाप- दादा का नाम डूबे या उतराय!
उधर चमारों का जत्था ताक में था ही। इधर किवाड़ बंद हुए, उधर उन्होंने खटखटाना शुरू किया। पहले तो मामू साहब ने समझा, कोई आसामी मिलने आया होगा, किवाड़ बंद पाकर लौट जाएगा ; लेकिन जब आदमियों का शोरगुल सुना तो घबराए। जाकर किवाड़ों की दराज से झांका। कोई बीस- पचीस चमार लाठियाँ लिए, द्वार रोके खड़े किवाड़ों को तोड़ने की चेष्टा कर रहे थे। अब करें तो क्या करें? भागने का कहीं रास्ता नहीं, चम्पा को कहीं छिपा नहीं सकते। समझ गए कि शामत आ गई। आशिकी इतनी जल्दी गुल खिलाएगी, यह क्या जानते थे, नहीं इस चमारिन पर दिल को आने ही क्यों देते। उधर चम्पा इन्हीें को कोस रही थी- तुम्हारा क्या बिगड़ेगा, मेरी तो इज्जत लुट गई। घर वाले मूड़ ही काटकर छोड़ेंगे, कहती थी, कभी किवाड़ बंद न करो, हाथ-पाँव जोड़ती थी। मगर तुम्हारे सिर पर तो भूत सवार था। लगी मुँह में कालिख कि नहीं?
मामू साहब बेचारे इस कूचे में कभी न आए थे। कोई पक्का खिलाड़ी होता तो सौ उपाय निकाल लेता ; लेकिन मामू साहब की तो जैसे सिट्टी-पिट्टी भूल गई। बरौठे में थर-थर काँपते ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करते हुए खड़े थे। कुछ न सूझता था।
और उधर द्वार पर कोलाहल बढ़ता जा रहा था। यहाँ तक कि सारा गाँव जमा हो गया। बाम्हन, ठाकुर, कायस्थ सभी तमाशा देखने और हाथ की खुजली मिटाने के लिए आ पहुँचे। इससे ज्यादा मनोरंजक और स्फूर्तिवर्धक तमाशा और क्या होगा कि एक मर्द और एक औरत को एक साथ घर में बंद पाया जाए। फिर वह चाहे कितनी ही प्रतिष्ठित और विनम्र क्यों न हो, जनता उसे किसी तरह क्षमा नहीं कर सकती। बढ़ई बुलाया गया, किवाड़ फाड़े गए और मामू साहब भूसे की कोठरी में छिपे हुए मिले। चम्पा आँगन में खड़ी रो रही थी। द्वार खुलते ही भागी। कोई उससे नहीं बोला। मामू साहब भागकर कहाँ जाते! वह जानते थे उनके लिए भागने का रास्ता नहीं है। मार खाने के लिए तैयार बैठे थे। मार पड़ने लगी और बेभाव की पड़ने लगी। जिसके हाथ जो कुछ लगा, जूता, छड़ी, छात, लात, घूंसा और अस्त्र चले। यहाँ तक कि मामू साहब बेहोश गए और लोगों ने उन्हें मुर्दा समझ कर छोड़ दिया। अब इतनी दुर्गति के बाद वह बच भी गए, तो गाँव में नहीं रह सकते और उनकी जमीन पट्टेदारों के हाथ आएगी।
इस दुर्घटना की खबर उड़ते-उड़ते हमारे यहाँ भी पहुँची। मैंने भी उसका खूब आनंद उठाया। पिटते समय उनकी रूपरेखा कैसी रही होगी, इसकी कल्पना करके मुझे खूब हंसी आई। एक महीने तक तो वह हल्दी और गुड़ पीते रहे। ज्यों ही चलने- फिरने लायक हुए, हमारे यहाँ आए। यहाँ अपने गाँववालों पर डाके का इस्तगासा दायर करना चाहते थे।
अगर उन्होंने कुछ दीनता दिखाई होती तो शायद मुझे हमदर्दी हो जाती ; लेकिन उनका वही दमखम था। मुझे खेलते या उपन्यास पढ़ते देखकर बिगड़ना और रोब जमाना और पिताजी से शिकायत करने की धमकी देना, यह अब मैं क्यों सहने लगा था। अब तो मेरे पास उन्हें नीचे दिखाने के लिए काफी मसाला था।
आखिर एक दिन मैंने यह सारी दुर्घटना एक नाटक के रूप में लिख डाली और अपने मित्रों को सुनाई। सब-के-सब खूब हंसे। मेरा साहस बढ़ा। मैंने उसे साफ- साफ लिखकर वह कापी मामू साहब के सिरहाने रख दी और स्कूल चला गया। दिल में कुछ डरता भी था, कुछ खुश भी था और कुछ घबराया हुआ भी था। सबसे बड़ा कुतूहल यह था कि ड्रामा पढ़कर मामू साहब क्या कहते हैं। स्कूल में जी न लगता था। दिल उधर ही टंगा हुआ था। छुट्टी होते ही घर चला गया। मगर द्वार के समीप पाकर पाँव रुक गए। भय हुआ, कहीं मामू साहब मुझे मार न बैठें ; लेकिन इतना जानता था कि वह एकाध थप्पड़ से ज्यादा मुझे मार न सकेंगे, क्योंकि मैं मार खाने वाले लड़कों में से न था।
मगर यह मामला क्या है! मामू साहब चारपाई पर नहीं हैं, जहाँ वह नित्य लेटे हुए मिलते थे। क्या घर चले गए? आकर कमरा देखा वहाँ भी सन्नाटा। मामू साहब के जूते, कपड़े, गठरी सब लापता। अंदर जाकर पूछा। मालूम हुआ, मामू साहब किसी जरूरी काम से घर चले गए। भोजन तक न किया। मैंने बाहर आकर सारा कमरा छान मारा, मगर मेरा ड्रामा- मेरी वह पहली रचना कहीं न मिली। मालूम नहीं, मामू साहब ने उसे चिरागअली के सुपुर्द कर दिया या अपने साथ स्वर्ग ले गए? ■
प्रसंगः एक भावुक दृश्य
ऐसे बिना अनुमति के किसी तस्वीर नही खींचनी चाहिए; पर मैं रोक नही पाई और मेट्रो रेल मे बैठे एक यात्री परिवार की फोटो सबसे नज़र बचाकर खींच ली। पिता की वात्सल्यमयी गोद में बहुत सुकून से सोता हुआ बचपन... बहुत देर तक मैं उस, निश्चिन्त पितृ-अंक में सोए बालक को निहारती रही। शायद बच्चे की तबीयत खराब थी। मेट्रो के वातानुकूलित परिवेश में उसे ठंड लग रही थी। इसी कारण एक शॉल में किसी कंगारू के शावक- सा वह अपने पिता के गोद में सिकुड़कर सो रहा था। बीच-बीच में ट्रेन के अनाउंसमेंट से चौंककर इधर-उधर ताकती उसकी भोली मासूम आँखें वापस खुद को गुड़मुठियाकर पुनः अपने सुरक्षित, संरक्षित घेरे में सो जा रही थीं। जेहन में एक ख्याल का अकस्मात् अनाउंसमेंट हो गया... आह्लादित मुस्कान, भाव विभोर हो खुद के लिए भी ऐसे वात्सल्यमयी सुरक्षित अंक के लिए तड़प उठी। वयस्क होकर हम कितना कुछ पाते हैं - आत्मनिर्भरता, स्वनिर्णय की क्षमता, अपनी मनमर्ज़ी को पूरा करने की क्षमता; पर सब कुछ एक असुरक्षा के भय के आवरण के साथ। उस निश्चिंतता का शायद अभाव रहता है कि यदि असफल हुए या ठोकर लगने को हुए, तो एक सशक्त संरक्षण पहले ही अपना हाथ आगे बढ़ा उसे खुद पर सह लेगा; पर हमें कुछ नही होने देगा।
जब शिशु पलटी मारना सीखते हैं, तो अभिभावक बिस्तर के चारो तरफ़ तकिए लगा देते हैं; ताकि वे नीचे ना गिर जाएँ। जब चलना सीखते हैं, तो हर पल की चौकसी बनाए रखते हैं, कहीं टेबल का कोन न लग जाए, कहीं माथा न ठुक जाए। मुझे याद है- मेरे घर के बिजली के कुछ स्विच बोर्ड नीचे की ओर लगे थे और बड़े वाले बेटे ने घुटनों के बल चलना सीखा था। वह बार-बार उन स्विच के प्लग प्वांइट के छेदों में उँगली डालने को दौड़ता था। मुझे सारे बोर्ड ऊपर की तरफ़ करवाने पड़े। और भी बहुत कुछ रहता है... जिन पर भरपूर चौकसी रखनी पड़ती है अभिभावकों को, जिससे शिशु का बचपन निश्चिंतता के परिवेश में पोषित और पल्लवित हो। ऐसा बहुत कुछ हम वयस्क होने के बाद खो देते हैं।
इस दृश्य को देखकर आँखें भर आईं ... लगा जैसे पृथ्वी के विलुप्त होते सुरक्षा आवरण ' ओज़ोन'- सा मेरा या हम सभी वयस्क हो चुके हैं, जो आत्मनिर्भर हो चुके हैं, उनकी वह 'अभिभावकीय ओज़ोन लेयर' विलुप्त होती जा रही है। हम अब स्वयं अभिभावक बन चुके हैं। अब हमें अपने बच्चों को सुरक्षित एंव निश्चिंतता का वात्सल्यमयी आवरण प्रदान करना है। उन्हें उसी तरह जीवन- पथ की ऊष्णता और आर्द्रता सहने के काबिल बनाना है, जैसे हमारे अभिभावकों ने हमें बनाया।
माँ-बाबा तो सशरीर इस जगत् में नहीं; पर एक आभासी विश्वास मन में सशक्तता से आसीन है- वे जिस लोक में हैं , अपने आशीर्वाद से आज भी अपना वात्सल्यमयी घेरा बनाकर हर बाधा, दुरूहता, चुनौतियों, कठिनाइयों से निपटने का सम्बल दे रहे हैं और मैं इसी फोटो वाले बालक- सी अपने अभिभावक की गोद में गुड़मुठियाए निर्विकार निश्चिंतता से सो रही हूँ। ■
- फरीदाबाद हरियाणा
दो लघुकथाः
- डॉ. सुषमा गुप्ता
1. संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण
2 मार्च 2021
पिताजी बहुत बीमार हैं। आप सभी की दुआओं की बहुत ज़रूरत है।
(अस्पताल में लेटे बीमार पिता जी की फोटो के साथ उसने फेसबुक पर स्टेटस अपडेट किया।)
3 मार्च 2021
पिताजी की हालत लगातार बिगड़ रही है। तन, मन,धन से जितना कर सकता हूँ, सब कर रहा हूँ।”
(इस बार उसने अपने थके निराश चेहरे की फोटो के साथ स्टेटस अपडेट किया।)
5 मार्च 2021
पिताजी नहीं रहे। मैं अपनी सब कोशिशें करके भी हार गया। मेरा संसार लुट गया।
(श्मशान से पिता की चिता के आगे अपने आँसुओं से भरे चेहरे के साथ उसने स्टेटस एक बार फिर अपडेट किया)
16 मार्च 2021
पिताजी की आत्मा की शांति के लिए बहुत बड़ी पूजा रखी और 51 पंडितों को भोज कराया।
(हार चढ़ी पिताजी की फोटो के सामने कुछ पंडित खाना खा रहे हैं और उन्हें खुद खाना परोसते हुए की फोटो के साथ इस बार का स्टेटस अपडेट हुआ।)
शाम ढले वह अपनी प्रोफाइल पर आए ढेरों कमेंट पढ़ रहा था, जिनमें उसे एक बेहद संवेदनशील आज्ञाकारी बेटे के खिताबों से नवाज़ा गया था।
साथ वाले कमरे में माँ खाँस-खाँस के दोहरी होती हुई अब भी इंतज़ार कर रही है कि बेटा खत्म हुई दवाइयाँ फिर से कब लाकर देगा। पति के खाली बिस्तर की तरफ देखते हुए उसकी आँखें भीग गई हैं।
काँपती आवाज़ में माँ ने बेटे को आवाज़ दी, दवाइयों की गुहार की। बेटे ने मुँह बनाया और झिड़कते हुए कहा-“बहुत व्यस्त हूँ मैं। पापा के मरने के बाद जो इतना तामझाम फैला है अभी वह तो समेट लूँ। समय मिलता है तो लाकर दूँगा।”
कहकर एक बार फिर से वह फोन में व्यस्त हो गया। पाँच मिनट में नया स्टेटस अपडेट हुआ।
“पिताजी के बाद अब माँ की हालत बिगड़ने लगी है। हे ईश्वर! मुझ पर रहम करो। मुझ में अब, और खोने की शक्ति नहीं बची है।”2. ज़िंदाका
बोझ
वह शराब के नशे में धुत जब भी घर आता ज़ोर से चिल्लाता, “अरी कहाँ मर गई?”
भागती-सी गुलाबो जाती और कमरे का दरवाज़ा बंद हो जाता।
बहुत बड़ा नाम था पीर साहब का पूरे इलाके में । लोगों ने अल्लाह का दर्ज़ा तक दे डाला था और गुलाबो को पीर रानी का। पीर साहब वैसे तो डेरे पर ही रहते थे पर महीने में दो-चार बार घर भी आ जाते। जिस रात वह घर आते, बच्चियों को रात भर, रह-रह के कमरे से माँ की दर्दनाक चीखें सुनाई देती। अगले दिन माँ के शरीर पर ज़ख्म दिखते तो बच्चियाँ अपनी उम्र के हिसाब से सवाल पूछती और गुलाबो उनकी उम्र के हिसाब से ही जवाब देकर उन्हें समझा भी देती।
आज गुलाबो को सुबह से ही तेज़ बुखार था। रात गए फिर पीर साहब की गरज सुनाई दी, “गुलाबो......”
तेरह साल की जूही भागकर गई, “जी बाबा”
पीर साहब ने उसे पर ऊपर से नीचे तक भरपूर नज़र डाली फिर बेहद प्यार से बोले,
“अरे तू इतनी बड़ी कब हो गई? आ ...अंदर आ.. बैठ मेरे पास।”
दरवाजा फिर बंद होने ही वाला था कि गुलाबो दौड़ती हाँफती पहुँची। पल भर में सब समझ गई। खींचकर जूही को कमरे से बाहर कर दिया और ख़ुद अंदर होकर दरवाज़ा बंद कर लिया। पीर साहब का चिल्लाना और माँ की दर्दनाक चीखें बाहर तक सुनाई देने लगी। अचानक चीखों का स्वर बदल गया।
सुबह दालान में ज़माने भर का मजमा लगा था। पीर साहब नहीं रहे। पीर रानी की सबसे विश्वस्त नौकरानी ने सबको खबर पहुँचाई , कोई लूट के इरादे से घर में घुसा और हाथापाई में पीर साहब का गला रेत गया।
लोगों ने ख़ूब कोसा उस अनजान लुटेरे को। दोज़ख रसीद करने की बद्दुआएँ दे डालीं। औरतों के झुंड के झुंड आ रहे थे। खूब प्रलाप हो रहा था ।
छाती-पीटती अम्मा बोली, “हाय गुलाबो! कैसे उठाएगी तू बेवा होने का बोझ!”
गुलाबो मन ही मन बुदबुदाई....“इसके तो ज़िंदा का बोझ ज़्यादा था अम्मा। इसकी लाश में बोझ कहाँ ... ” ■








