मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

May 2, 2025

प्रसंगः एक भावुक दृश्य

 - लिली मित्रा 

ऐसे बिना अनुमति के किसी तस्वीर नही खींचनी चाहिए; पर मैं रोक नही पाई और मेट्रो रेल मे बैठे एक यात्री परिवार की फोटो  सबसे नज़र बचाकर खींच ली। पिता की वात्सल्यमयी गोद में बहुत सुकून से सोता हुआ बचपन... बहुत देर तक मैं उस, निश्चिन्त पितृ-अंक में सोए बालक को निहारती रही। शायद बच्चे की तबीयत खराब थी। मेट्रो के वातानुकूलित परिवेश में उसे ठंड लग रही थी। इसी कारण एक शॉल में किसी कंगारू के शावक- सा वह अपने पिता के गोद में सिकुड़कर सो रहा था।  बीच-बीच में ट्रेन के अनाउंसमेंट से चौंककर  इधर-उधर ताकती उसकी भोली मासूम आँखें वापस खुद को गुड़मुठियाकर पुनः अपने सुरक्षित, संरक्षित घेरे में सो जा रही थीं। जेहन में एक ख्याल का अकस्मात् अनाउंसमेंट हो गया... आह्लादित मुस्कान, भाव विभोर हो खुद के लिए भी ऐसे वात्सल्यमयी सुरक्षित अंक के लिए तड़प उठी।   वयस्क होकर हम कितना कुछ पाते हैं - आत्मनिर्भरता, स्वनिर्णय की क्षमता, अपनी मनमर्ज़ी को पूरा करने की क्षमता; पर सब कुछ एक असुरक्षा के भय के आवरण के साथ। उस निश्चिंतता का शायद अभाव रहता है कि यदि असफल हुए या ठोकर लगने को हुए, तो एक सशक्त संरक्षण पहले ही अपना हाथ आगे बढ़ा उसे खुद पर सह लेगा; पर हमें कुछ नही होने देगा।   

 जब शिशु पलटी मारना सीखते हैं, तो अभिभावक बिस्तर के चारो तरफ़ तकिए लगा देते हैं; ताकि वे नीचे ना गिर जाएँ। जब चलना सीखते हैं, तो हर पल की चौकसी बनाए रखते हैं, कहीं टेबल का कोन न लग जाए, कहीं माथा न ठुक जाए। मुझे याद है- मेरे घर के बिजली के कुछ स्विच बोर्ड नीचे की ओर लगे थे और बड़े वाले बेटे ने घुटनों के बल चलना सीखा था। वह बार-बार उन स्विच के प्लग प्वांइट के छेदों में उँगली डालने को दौड़ता था। मुझे सारे बोर्ड ऊपर की तरफ़ करवाने पड़े। और भी बहुत कुछ रहता है... जिन पर भरपूर चौकसी रखनी पड़ती है अभिभावकों को, जिससे शिशु का बचपन निश्चिंतता के परिवेश में पोषित और पल्लवित हो। ऐसा बहुत कुछ हम वयस्क होने के बाद खो देते हैं।     

 इस दृश्य को देखकर आँखें भर आईं ... लगा जैसे पृथ्वी के विलुप्त होते सुरक्षा आवरण ' ओज़ोन'- सा मेरा या हम सभी वयस्क हो चुके हैं, जो आत्मनिर्भर हो चुके हैं, उनकी वह 'अभिभावकीय ओज़ोन लेयर' विलुप्त होती जा रही  है।   हम अब  स्वयं अभिभावक बन चुके हैं। अब हमें अपने बच्चों को सुरक्षित एंव निश्चिंतता का वात्सल्यमयी आवरण प्रदान करना है। उन्हें उसी तरह जीवन- पथ की ऊष्णता और आर्द्रता सहने के काबिल बनाना है, जैसे हमारे अभिभावकों ने हमें बनाया।          

 माँ-बाबा तो सशरीर इस जगत् में नहीं; पर एक आभासी विश्वास मन में सशक्तता से आसीन है- वे जिस लोक में हैं , अपने आशीर्वाद से आज भी अपना वात्सल्यमयी घेरा बनाकर हर बाधा, दुरूहता, चुनौतियों, कठिनाइयों से निपटने का सम्बल दे रहे हैं और मैं इसी फोटो वाले बालक- सी अपने अभिभावक की गोद में गुड़मुठियाए निर्विकार निश्चिंतता से सो रही हूँ।   ■

- फरीदाबाद हरियाणा 

दो लघुकथाः

- डॉ. सुषमा गुप्ता

1. संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण

2 मार्च 2021

पिताजी बहुत बीमार हैं। आप सभी की दुआओं की बहुत ज़रूरत है।

(अस्पताल में लेटे बीमार पिता जी की फोटो के साथ उसने फेसबुक पर स्टेटस अपडेट किया।)

3 मार्च 2021

पिताजी की हालत लगातार बिगड़ रही है। तन, मन,धन से जितना कर सकता हूँ, सब कर रहा हूँ।”

(इस बार उसने अपने थके निराश चेहरे की फोटो के साथ स्टेटस अपडेट किया।)

5 मार्च 2021

पिताजी नहीं रहे। मैं अपनी सब कोशिशें करके भी हार गया। मेरा संसार लुट गया।

(श्मशान से पिता की चिता के आगे अपने आँसुओं से भरे चेहरे के साथ उसने स्टेटस एक बार फिर अपडेट किया)

16 मार्च 2021

पिताजी की आत्मा की शांति के लिए बहुत बड़ी पूजा रखी और 51 पंडितों को भोज कराया।

(हार चढ़ी पिताजी की फोटो के सामने कुछ पंडित खाना खा रहे हैं और उन्हें खुद खाना परोसते हुए की फोटो के साथ इस बार का स्टेटस अपडेट हुआ।)

शाम ढले वह अपनी प्रोफाइल पर आए ढेरों कमेंट पढ़ रहा था, जिनमें उसे एक बेहद संवेदनशील आज्ञाकारी बेटे के खिताबों से नवाज़ा गया था।

साथ वाले कमरे में माँ खाँस-खाँस के दोहरी होती हुई अब भी इंतज़ार कर रही है कि बेटा खत्म हुई दवाइयाँ फिर से कब लाकर देगा। पति के खाली बिस्तर की तरफ देखते हुए उसकी आँखें भीग गई हैं।

काँपती आवाज़ में माँ ने बेटे को आवाज़ दी, दवाइयों की गुहार की। बेटे ने मुँह बनाया और झिड़कते हुए कहा-“बहुत व्यस्त हूँ मैं। पापा के मरने के बाद जो इतना तामझाम फैला है अभी वह तो समेट लूँ। समय मिलता है तो लाकर दूँगा।”

कहकर एक बार फिर से वह फोन में व्यस्त हो गया। पाँच मिनट में नया स्टेटस अपडेट हुआ।

“पिताजी के बाद अब माँ की हालत बिगड़ने लगी है। हे ईश्वर! मुझ पर रहम करो। मुझ में अब, और खोने की शक्ति नहीं बची है।”

2. ज़िंदा 

    का 

   बोझ

वह शराब के नशे में धुत जब भी घर आता ज़ोर से चिल्लाता, “अरी कहाँ मर गई?”

भागती-सी गुलाबो जाती और कमरे का दरवाज़ा बंद हो जाता।

बहुत बड़ा नाम था पीर साहब का पूरे इलाके में । लोगों ने अल्लाह का दर्ज़ा तक दे डाला था और गुलाबो को पीर रानी का। पीर साहब वैसे तो डेरे पर ही रहते थे पर महीने में दो-चार बार घर भी आ जाते। जिस रात वह घर आते, बच्चियों को रात भर, रह-रह के कमरे से माँ की दर्दनाक चीखें सुनाई देती। अगले दिन माँ के शरीर पर ज़ख्म दिखते तो बच्चियाँ अपनी उम्र के हिसाब से सवाल पूछती और गुलाबो उनकी उम्र के हिसाब से ही जवाब देकर उन्हें समझा भी देती।

आज गुलाबो को सुबह से ही तेज़ बुखार था। रात गए फिर पीर साहब की गरज सुनाई दी, “गुलाबो......”

तेरह साल की जूही भागकर गई, “जी बाबा”

पीर साहब ने उसे पर ऊपर से नीचे तक भरपूर नज़र डाली फिर बेहद प्यार से बोले,

“अरे तू इतनी बड़ी कब हो गई? आ ...अंदर आ.. बैठ मेरे पास।”

दरवाजा फिर बंद होने ही वाला था कि गुलाबो दौड़ती हाँफती पहुँची। पल भर में सब समझ गई। खींचकर जूही को कमरे से बाहर कर दिया और ख़ुद अंदर होकर दरवाज़ा बंद कर लिया। पीर साहब का चिल्लाना और माँ की दर्दनाक चीखें बाहर तक सुनाई देने लगी। अचानक चीखों का स्वर बदल गया।

सुबह दालान में ज़माने भर का मजमा लगा था। पीर साहब नहीं रहे। पीर रानी की सबसे विश्वस्त नौकरानी ने सबको खबर पहुँचाई , कोई लूट के इरादे से घर में घुसा और हाथापाई में पीर साहब का गला रेत गया।

लोगों ने ख़ूब कोसा उस अनजान लुटेरे को। दोज़ख रसीद करने की बद्दुआएँ दे डालीं। औरतों के झुंड के झुंड आ रहे थे। खूब प्रलाप हो रहा था ।

छाती-पीटती अम्मा बोली, “हाय गुलाबो! कैसे उठाएगी तू बेवा होने का बोझ!”

गुलाबो मन ही मन बुदबुदाई....“इसके तो ज़िंदा का बोझ ज़्यादा था अम्मा। इसकी लाश में बोझ कहाँ ... ”   ■

हाइबनः प्रवासी पक्षियों का आश्रय चिल्का झील

  - अंजू निगम 

उड़ीसा के चंद्रभागा तट से टकराती समुद्र की उत्कट लहरें। कतार में लगे, हवा के साथ दौड़ लगाते नारियल के विशालकाय वृक्ष। इन वृक्षों के समानांतर चलती सीधी-सपाट सड़क, चिल्का झील तक पहुँचती है। चिल्का का विहंगम दृश्य मन को सम्मोहित कर गया। सैलानियों का जमावड़ा और जल- क्रीड़ा करते प्रवासी पक्षी। ईश्वर ने मानो किसी कुशल चितेरे- सा प्रकृति को अनंत तक कैद कर रखा हो। दूर तक फैला जल- क्षेत्र और क्षितिज से मानो होड़ करता, धुँधला- सा नजर आता एशिया का सबसे बड़ा लैगून।

लैगून देखने की उत्सुकता लगभग हर सैलानी को थी। हम भी इतनी दूर लैगून को पास से देखने की इच्छा लेकर ही आए थे। नीली, साफ, स्वच्छ चिल्का झील और  समुद्र के पानी का खारापन आपस में मिल, जीवन का एक सुदंर संदेश दे रहे थे। मीठा और खारा भी आपसी सामंजस्य स्थापित कर एक- दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार कर, साथ साथ प्रवाहित हो रहे थे।

चिल्का की झील

प्रवासी पक्षियों को

देती आश्रय     ■


कहानीः ग़ैर-ज़रूरी सामान

  - नमिता सिंह 'आराधना'

पत्नी के निधन के पश्चात हरीश बाबू बेटे के पास मुंबई रहने आ गए थे। उन्होंने सोचा था कि बेटे-बहू के पास रहने से समय अच्छा कट जाएगा और अकेलापन भी नहीं सताएगा ; लेकिन अब यहाँ आकर उन्हें महसूस होने लगा कि उनसे निर्णय लेने में भूल हो गई है। उन्हें लगा था कि बेटा-बहू दोनों वर्क फ्रॉम होम करते हैं सो दिन भर दोनों घर पर ही रहेंगे तो उनका साथ रहेगा और बातचीत होती रहेगी ; लेकिन घर पर होते हुए भी दोनों दिन भर अलग-अलग कमरों में बंद रहते। 

कुक भोजन बनाकर रख जाता। घर के अन्य कामों के लिए भी घरेलू सहायक आकर अपना काम कर जाते। हरीश बाबू अकेले ही भोजन करते। दोपहर के भोजन के बाद जब वह कमरे में आराम कर रहे होते तो इस बीच बेटा और बहू अपने-अपने समय से कमरे से निकल कर भोजन ग्रहण कर लेते। शाम की चाय भी हरीश बाबू को अकेले ही पीनी पड़ती। 

शाम को अपार्टमेंट के गार्डन में जाते। पहले-पहल उन्हें लगा था कि यहाँ कुछ अच्छे दोस्त बन जाएँगे और उनका अकेलापन कुछ कम हो जाएगा ; लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यहाँ भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। किसी से बात करने की कोशिश करते तो वह हाँ... हूँ... करके आगे बढ़ जाता। इसका कारण वह कभी समझ नहीं पाए।

बेटे ने एक कुत्ता पाल रखा था। कभी वह बिना वज़ह भौंकना शुरू कर देता तो बेटा फौरन कमरे से निकल कर उसे प्यार से पुचकारता, "क्या हुआ बोन्जो? (कुत्ते का नाम), भूख लगी है मेरे बच्चे को? अकेले मन नहीं लग रहा? अच्छा बता, कौन सा बिस्कुट खाएगा?" मानो कुत्ता अभी बोल पड़ेगा। उधर हरीश बाबू यह देखकर बेटे के बचपन में चले जाते। वह भी तो बेटे के रोने या उदास होने पर उसे ऐसे ही पुचकारा करते थे। उनका मन करता कि बेटा उनसे भी ऐसे ही प्यार से बात करे जैसे कुत्ते से करता है; लेकिन वह कुत्ता तो बन नहीं सकते थे और बतौर पिता बेटे के लिए अनुपयोगी हो चुके थे। सो मन मसोसकर रह जाते।

"ठीक है, शाम को तुम्हें घुमाने ले जाऊँगा। डिनर में तुझे चिकन भी खिलाऊँगा।" इत्यादि आश्वासन देते हुए बेटा कुत्ते को दुलारता, सहलाता, चूमता। फिर उसके चुप होने पर वापस कमरे में चला जाता ; लेकिन हरीश बाबू कभी कोई गाना बजा देते या फोन पर जरा ऊँची आवाज में किसी से बात करते तो बेटा कमरे से बाहर आकर उनके ऊपर गुर्राता, "पापा, आपको ब्लूटूथ दिया है न, आप उसे कान में लगाकर गाना सुनिए।" या फिर, "जरा धीमी आवाज में बात कीजिए।" वह कुछ कहना चाहते, इससे पहले ही बेटे के कमरे का दरवाजा बंद हो जाता। कहाँ वह अपना अकेलापन दूर करने के ख्याल से यहाँ आए थे ; लेकिन अकेलापन दूर होना तो दूर की बात थी, उनके दैनिक क्रियाकलाप पर भी बंदिशें लग रही थीं। उन्हें महसूस होने लगा कि वह कुत्ता उनसे बेहतर स्थिति में है। उसके भौंकने पर उसे पुचकार मिलती थी ; लेकिन उनके बोलने पर दुत्कार नहीं तो गुर्राहट अवश्य मिलती थी। कुत्ते से उसकी फरमाइशें पूछी जातीं ; लेकिन उनसे बेटे ने कभी उनकी ज़रूरतें भी नहीं पूछीं।

डिनर के समय भी शायद ही कभी बेटा या बहू में से कोई साथ होता। शनिवार और रविवार के दिन दोनों अपने दोस्तों के साथ कहीं बाहर घूमने चले जाते। एक बार उन्होंने भी साथ जाने की इच्छा जाहिर की तो बेटे ने कहा, "आप हमारे साथ जाकर क्या करेंगे? बोर हो जाएँगे और दिन भर घूम भी तो नहीं पाएँगे। थक जाएँगे।" हरीश बाबू मन मसोसकर रह गए। उनके घर पर मौजूद होने की वजह से वे दोनों अपने दोस्तों को भी घर पर नहीं बुलाते थे। वह घर में ऐसे पड़े रहते, जैसे घर का कोई ग़ैर-ज़रूरी सामान। 

अपनी स्थिति में उन्हें सुधार की कोई उम्मीद दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही थी। इसीलिए उन्होंने वापस अपने घर लौटने का फैसला कर लिया। एक दिन अपना सामान पैक किया और जा बैठे रेलगाड़ी में। टिकट तो पहले ही बुक कर लिया था। जाने से पहले उन्होंने बेटे को व्हाट्सएप पर एक मैसेज कर दिया कि वह वापस अपने शहर जा रहे हैं, क्योंकि बेटे का स्पष्ट निर्देश था कि काम के समय उसे डिस्टर्ब न किया जाए। दो दिनों से वह उन दोनों को बताने की कोशिश तो कर रहे थे, पर एक घर में रहकर भी आमना-सामना बहुत कम ही होता था। जब सामने होते, उस दौरान भी वे दोनों अपने-अपने मोबाइल पर व्यस्त रहते। इसीलिए कभी बताने का मौका ही नहीं मिला। जब भी वह कुछ बोलने के लिए मुँह खोलने की कोशिश करते, बेटा हाथ के इशारे से उन्हें चुप रहने का इशारा कर देता; क्योंकि वह मोबाइल पर किसी से बातें कर रहा होता था। यहाँ भी वह कुत्ता उनसे बेहतर स्थिति में था क्योंकि भौंकने के लिए उसे किसी से परमिशन लेने की आवश्यकता नहीं थी। अलबत्ता अगर बेटा उसके भौंकने पर उस पर ध्यान न दे तो वह गुर्राने लगता और उसकी गुर्राहट पर बेटे को प्यार आ जाता। इसीलिए अपनी स्थिति को भाँपते हुए उन्होंने अपनी रवानगी की सूचना बेटे को व्हाट्सएप पर संदेश भेजकर ही देना उचित समझा। 

उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें सामान सहित घर से बाहर जाता देख वह कुत्ता अवश्य भौंकेगा और उसकी भौंक सुनकर बेटा कमरे से अवश्य बाहर आएगा। तब वह बेटे का मुखड़ा देख उससे विदाई ले लेंगे।  पर यहाँ भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। शायद उस कुत्ते की नजर में भी उनकी कोई अहमियत नहीं थी। वह अधखुली आँखों से उन्हें देखते हुए सोने का नाटक करता रहा। मजबूरन वह निकल पड़े। दरवाजे पर स्मार्ट लॉक था सो किसी के आकर दरवाजा बंद करने का झंझट भी नहीं था।

उनका मैसेज भी बेटे ने तब देखा जब ट्रेन उनके अपने शहर में प्रवेश कर रही थी ; लेकिन तब भी बेटे ने फोन करना जरूरी नहीं समझा। उसका मैसेज आया, "पापा, आपने बताया भी नहीं कि आप जा रहे हैं।" हरीश बाबू जानते थे कि उनके उत्तर का इंतजार बेटा नहीं करेगा। इसीलिए उन्होंने मन ही मन अपने-आप को ही उत्तर दे दिया, "तुम्हें मुझसे बात करने की फुर्सत ही कहाँ थी।"  ■


सम्पर्कः
बी.401, सानिध्य रॉयल, 100 फीट त्रागड़ रोड, न्यू चाँदखेड़ा, अहमदाबाद, गुजरात -82470, mail- nvs8365@gmail.com

व्यंग्यः दास्तान-ए-सांड

  - डॉ. मुकेश असीमित

जन्म दिवस मेरा अभी दूर है। परिवार में एक महीने पहले ही चर्चा शुरू हो गई है कि इस दिवस को कैसे अनूठा बनाया जाए। इस बार गायों को चारा और गुड़ खिलाकर मनाने का फैसला हुआ है। शहर में भी देखा-देखी कई गौ आश्रम खुल गए हैं। जब से हमारे आयुर्वेदिक प्रचारक योग गुरु बाबा ने हर सौंदर्य प्रसाधन, खानपान, दवा-दारू में गाय का तड़का लगाया है, देश में गायों के प्रति प्रेम उच्च कोटि का जाग्रत हो गया है। गाय और गाय के सभी उत्पाद, जैसे गौमूत्र, दूध, दही, घी, योगर्ट, गोबर, पनीर- सब ५-स्टार रैंकिंग वाले शो रूम में सज गए हैं। देसी गाय की पहुँच अब देशवासियों के लिए अपनी औकात से बाहर की बात हो गई है।

यूँ तो बचपन से ही गाय हमारे पाठ्यक्रम में थी। गाय पर निबंध से लेकर, बगल में भूरी काकी की काली गाय के गोबर से थापे उपले, होली पर बनी बालुडीयाँ, और सुबह-सुबह गाय के दूध के जमाए दही को बिलोकर निकाले जाने वाले मक्खन से बाजरे की रोटी चुपड़कर खाने तक, गाय से हमारा नाता जुड़ गया है। सुबह-सुबह गाय को रोटी देने का काम हम बच्चों से ही करवाया जाता। गाँव में गाय को दरवाजे पर नहीं बुलाया जाता, बल्कि गाय को रोटी खिलाने के लिए जहाँ गाय बँधी होती थी, वहीं जाते थे। आजकल गायों ने शहर के परिवारों को आलसी बना दिया है और खुद अपनी रोटी के जुगाड़ में घर-घर जाकर दरवाजे की साँकल खटखटाती मिलती हैं।

पंडित जी के कर्मकांडों की दक्षिणा स्वरूप गौदान जहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण दान होता था, उसकी जगह अब पंडित जी हाई-टेक सुविधा से दक्षिणा की राशि UPI से अपने मोबाइल में ट्रांसफर करवा लेते हैं। गायें पंडित जी के आँगन से निकलकर अब गौ आश्रम में हाँक दी गई हैं। मेरे जैसे लोग, जिन्हें अपना जन्म दिवस यादगार बनाना है, इन्हीं आश्रमों में जाकर गायों को घास चराने वाले हैं। साथ ही फोटो खींचकर फेसबुक पर डालकर अपने गौ प्रेम की असीम झलक प्रदर्शित करने वाले हैं।

बचपन में हमें दो ही माताएँ बताई गई थीं—एक, हमें चप्पलों से पीटकर संस्कार भरने वाली हमारी मम्मी, और दूसरी गाय माता। पिताजी भी दो हैं, यह भी बचपन में ही जान लिया। एक, हमारे खाल उधेड़ने की गाहे- बगाहे धमकी देने वाले पिताजी, और दूसरे, महात्मा गांधी जी, जिन्हें हमारे स्कूल के मास्साब ने बेंत की सुताई से आखिरकार रटा ही दिया था; लेकिन इसी बीच गायों के भाई, बाप, खसम स्वरूप बैल और साँड से भी बचपन से जुड़ाव रहा। पापा के मुँह से कभी-कभार हमें “बनिया का बैल ही रहेगा तू" सुनने को मिल जाता। उस समय हम नहीं समझते थे कि पापा का मतलब हमें बेकार, निकम्मा, निठल्ला साबित करने का था। बैल की दुर्दशा उस समय इतनी दिखती नहीं थी, जितना पापा हमें “बनिया का बैल” कहकर उसकी महिमा को कम आँकते थे।

सुबह-सुबह गाँव की कच्ची सड़कों की गंडारों में बैल गाड़ी खींचने वाले ये बैल, किसान की चाबुक की मार और पूँछ मरोड़कर बैलगाड़ी को एक्सेलरेटर देने का काम करते। बैल के गले में बंधी घंटियों की मधुर आवाज़ सुबह-शाम गाँव की गलियाँ गुंजायमान करती। गाँव के बाहर खेतों में ये बैल हल में जुते जुताई करते, तेली के कोल्हू में तेल निकालते, धुनिया की रुई धुनते, और इक्के-दुक्के पक्के मकान बनाने में गारे-चूने के मिश्रण की चिनाई करते।

धीरे-धीरे मशीनीकरण ने पैर पसार लिए। किसानों को मशीनों का चस्का लग गया। ट्रैक्टर आने लगे, बैलों के काम को मशीनें खा गईं। बैल निरीह प्राणी बनकर बेकार हो गए। विसंगति यह है कि जहाँ गाय हिंदू धर्म में पूजनीय है, वहीं बैलों के लिए किसी ने नहीं सोचा। अगर गाय को माता माना गया, तो बैल को भी छोटा-मोटा बाप बना दिया जाता; लेकिन इंसान है न, गधे को तो बाप बना सकता है, पर बैल को नहीं।

आज ये बैल शहर की हर गली-मोहल्ले में दयनीय हालत में पड़े हैं। गौ आश्रम वाले गायों को पकड़-पकड़कर आश्रम में ढकेल रहे हैं। संस्था के सदस्यों को गाय और बैल में अंतर पहचानने की विशेष ट्रेनिंग दी गई है। कई बार कुछ नए, अतिउत्साहित सदस्य गलती से बैल को पकड़ लाते हैं। गौ आश्रम के चालक उन्हें बैलों को लौटाने का आदेश देते हैं, और ऐसे सदस्यों को संस्था से बाहर कर दिया जाता है।

जहाँ स्टॉक मार्केट बुल और बेयर के भँवरजाल को कवरेज देता है, वहीं असल में जो वास्तविक बुल (बैल) सड़क पर पड़ा है, उसके लिए कोई कवरेज नहीं। स्कूल में बुलिंग किए जाने वाले बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाता है; लेकिन सड़क पर बुलिंग का शिकार होने वाले इस निरीह बैल पर किसी का ध्यान नहीं। अपनी दुर्दशा से पीड़ित यह बैल कभी-कभी साँड का उग्र रूप धारण करके सड़क पर कुंठापूर्वक लड़ते हैं। उस समय क्षणिक रूप से बाजार और शहर के नागरिकों का ध्यान उनकी ओर जरूर जाता है; लेकिन वह भी गाली-गलौज और उनके जीवन को धिक्कारने के रूप में ही मिलता है।

बैल अपनी दुर्दशा पर आँसू बहाता हुआ शहर की गलियों, सड़कों और नालों पर पड़ा मिल जाएगा। शहर वाले सड़क और नाली की दुर्दशा पर आँसू बहाएँगे। न्यूज़पेपर वाले नगर पालिका को गालियाँ देते नजर आएँगे कि फलां जगह साँड नाली में पड़ा हुआ तीन दिन हो गया, नालियाँ अवरुद्ध हो गईं, नालियों का पानी सड़क पर आ गया। नगर पालिका ने शहर की नालियों की सुध नहीं ली ; लेकिन कहीं भी यह शिकायत सुनने को नहीं मिलेगी कि नगर पालिका ने साँड की सुध नहीं ली।

नगर पालिका भी क्या करे! सरकार ने गायों के संरक्षण और संवर्धन के लिए तो विभिन्न मदों में बजट दे रखा है ; लेकिन इन साँडों के लिए कोई बजट है ही नहीं। तो खर्च कैसे करें? साँडों के लिए न कोई यूनियन है, न चुनावी वादों में इनका नाम लिया जाता है। कई बार नेताओं की रैली में ये घुसकर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करते हैं; लेकिन नेताजी इसे रैली की सुरक्षा व्यवस्था में हुई लापरवाही बताते हुए विरोधी पार्टी की मिलीभगत पर ठीकरा फोड़ देते हैं और इसे एक और चुनावी मुद्दा बना लेते हैं।

बरसात में जब जमीन गीली हो जाती है, तो ये साँड सूखी जमीन की तलाश में  बीच सड़क पर आश्रय लेने लगते हैं। लोग अपने वाहनों की चिल्लपों मचाते हुए, इनके अज्ञात मालिकों को गालियाँ देते हुए निकल जाते हैं। बेचारे साँड करें भी तो क्या? इनकी यही कुंठा कई बार उन्हें रोटी खिलाने वाले धर्मप्रेमी बुजुर्गों और महिलाओं पर भी निकल जाती है।

कारण? हर कोई अपनी-अपनी नजर से बताएगा। कुछ दबी जुबान में यह भी कहते हैं कि "हड्डी जोड़ने वाले डॉक्टरों ने इन्हें खासतौर पर सब्जी मंडियों में छोड़ रखा है, ताकि ये हमारे लिए मरीज निर्माण करें।" खैर, जितने मुँह उतनी बातें ; लेकिन वजह साफ है। जो भी रोटी खिलाने जाता है, वह आशा करता है कि गाय को खिलाएगा। जब गाय नहीं मिलती, तो मजबूरी में साँड को खिलाना पड़ता है, और शायद यही बात उन्हें पसंद नहीं।

जलीकट्टू जैसे पारंपरिक त्योहारों की मान्यता एक बार कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने पर काफी बवाल मचा। व्हाट्सएप ने जमकर ज्ञान फॉरवर्ड किया। ट्विटर ने अपनी चहचहाहट से माहौल गर्माया। फेसबुक और यूट्यूब पर वीडियो की बाढ़ आ गई; लेकिन कुछ दिनों बाद जनता यह भूल गई कि आखिर लड़ाई किसके लिए लड़ी जा रही थी। इंसान बुल फाइट के जरिए अपनी ईगो की भूख शांत करने की फिराक में है और इसमें खुश है। बुल को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी।

अब मुझे बस एक ही आसरा लगता है—उन कथा वाचकों का, जो आजकल समाज सुधारक, मोटिवेटर और प्रेरक का काम संभाले हुए हैं। इनके एक इशारे पर जनता दिन को रात कर देती है। अगर ये इनकी सुध लें और बुल की असलियत को उजागर करें—जो कि पुराणों में अच्छे से वर्णित है, जहाँ यह नंदी, भगवान शिव की सवारी है—तो इसे सार्वजनिक रूप से "नंदी" नाम से पुकारा जाए। कोई इसे बैल या साँड नहीं कहेगा। मुझे लगता है कि धार्मिक प्रवृत्ति के लोग भगवान शिव की इस सवारी को फिर नजरअंदाज नहीं करेंगे। इनके लिए भी "नंदी आश्रम" खुलने लगेंगे।

कम से कम इन कथावाचकों से अनुरोध है कि इस मामले की गंभीरता को पहचानें और अपने चढ़ावे में से कुछ अंश इन नंदियों के कल्याणार्थ अलग रखकर एक अच्छी शुरुआत करें। ■

मेल आईडी: drmukeshaseemit@gmail.com