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Sep 1, 2023

कहानीः मेरी बगिया

  - निर्देश निधि

आज बड़े ही दिनो बाद तुम्हें पत्र लिख रही हूँ आली,  शायद पिछले बरस इन्हीं दिनों लिखा होगा तब जब देहरी पर बसंत की दस्तक हुई होगी, इस कोकिला का गाना शुरू हुआ होगा और इसने समय से पूर्व ही मुझे जगा दिया होगा। और तुम बरबस मुझे याद आ गए होगे । कैसा विचित्र है तुमसे ये रिश्ता मैं समझ पाने में सर्वथा असमर्थ ही रहूँगी । मेरा कोई सुख तुमसे बताए बगैर पूर्णता नहीं ले पाता और  मेरा कोई दुःख तुम तक पहुंचे बगैर हल्का नहीं हो पाता आली । और तुम कैसे मेरे सारे  सुखों - दुखों को अपना सा अनुभव कर मुझे अपनेपन की अबूझ डोर से बाँध लेते हो। बताओ न आली तुम ऐसा कैसे कर पाते हो ? कहते हैं किसी स्त्री का साथ देने में पुरुष के कुछ विशेष स्वार्थ होते हैं । मैं तुम्हारा कौन सा स्वार्थ पूर्ण कर सकती हूँ आली तब जबकि मैं और तुम उस एक बार के बाद कभी मिले ही नहीं । याद तो तुम्हें भी ज़रूर ही होगी वो मुलाक़ात जब मैं  पहली बार तीव्रगामी शताब्दी से सफर करने निकली थी लखनऊ, अपनी पहली पोस्टिंग जॉइन करने के लिए और मुझे अपना कोच, अपनी सीट कुछ भी तो खोजना नहीं आता था । तुमने बिना मांगे ही मेरी मदद की थी । तुम जैसे मेरे  एक कस्बे की लड़की होने और मेरे घबराहट भरे हाव-भाव को पूरी तरह पढ़ गए थे । कैसा आत्मीय चेहरा लगा  था मुझे तुम्हारा कि इस समाज की भयानक चालबाजियों से पूर्णतः परिचित होने के बावजूद  बिना किसी संशय के तुम्हारे पीछे चल पड़ी थी मैं । और तुमने मुझे मेरी सीट तक लाकर छोड़ ही नहीं दिया था बल्कि मेरे साथ वाली सीट के यात्री से विनती कर अपनी सीट भी बदलकर मेरे पास वाली सीट ले ली थी । और तुम्हारे पूछे बगैर ही कैसे बताना शुरू कर दिया था मैंने कि भैया का अपना इंटरव्यू आन पड़ा था दिल्ली में ऐन उसी दिन जिस दिन मुझे जॉइन करना था लखनऊ में, जिस वजह से मुझे अकेले आना पड़ा, बचपन में पापा की पोस्टिंग कहाँ - कहाँ रही और हमारी पढ़ाई उनके आए दिन होने वाले स्थानांतरण से कैसे – कैसे प्रभावित हुई और  माँ हमें लेकर हमारे छोटे से कस्बे में रहने लगीं , कैसे छोटे भैया से बात - बात में मेरी टशल चलती, बड़ी जीजी को कॉलेज जाने की आज़ादी नहीं मिली, जब मैं देर रात तक जाग – जाग कर पढ़ती तो माँ कैसे सुबह मेरे  देर तक सोने के जतन करतीं  और भी न जाने क्या – क्या बता डाला था मैंने उन चार पाँच घंटों में ही तुम्हें और तुम ऐसे सुनने लगे थे जैसे उस वक्त सबसे ज़रूरी तुम्हारे लिए वही सुनना था । उसी दिन से शुरू हुआ था सिलसिला मेरे सुखों और दुखों का तुम तक पहुँचने का । पर आली आज मैं न तो तुम्हें अपने किसी सुख- सपन में ले जा रही हूँ और न कोई दुःख सुनाकर तुम्हारी उदारता को उदासी में डुबो रही हूँ । आज न तुम सुनो, मेरी बगिया का मेरे घर के लोगों के व्यवहार में विलय ।

देखो ना आली आज फिर इस कोकिला की बच्ची ने मुझे सुबह – सुबह  पाँच बजने से भी पहले ही जगा दिया है और हमेशा की तरह सुबह उठकर मुझे तुम याद आ गए । पता है आली ये कोकिला ना माँ के बिल्कुल उलट है । जब मैं पढ़ाई कर, थक कर देर से सोती माँ दिन निकलने से पहले ही मेरे कमरे में दबे पाँव आतीं और धीरे से पर्दे सरकातीं कि कहीं से भी उसूल का पक्का और निर्दयता तक समय का पाबंद सूरज अपनी कोई मरियल सी किरण भी ना फेंक पाये मुझ तक । पर ये कोकिला है ना आली  हमेशा जामुन के पेड़ के घने छत्ते में दुबक कर बैठती है और कुहु - कुहु - कुहु - कुहु । एक ही बात कहते - कहते थकती भी तो नहीं, मैं कितनी भी देर से क्यों न सोई होऊँ उसकी इस मीठी मनुहार पर बिस्तर छोड़कर लॉन में आए बगैर रह ही नहीं पाती । इसे नहीं पता आली अगर माँ यहाँ होतीं तो शायद इसे भी उड़ा देने की कोशिश किया करतीं, मेरी नींद पूरी होने देने के लिए । अब भी कुहु - कुहु ? अरे अब तो चुप हो जा अब तो मैं आ गई । पर नहीं, शायद अब वो सूरज को बुला रही है। और देखो न आली वह भी उसका आज्ञाकारी सा आसमान के पूर्वी कोने में गुलाबी रंग लुढ़काकर अपने आगमन की सूचना देने लगा, मान गई मैं तो इसे। इसके लिए क्या सूरज क्या और क्या बसंत जिसे चाहे उसे कान पकड़ कर अपने साथ ले आती है । इस बसंत के झूमते यौवन को देख तो जैसे मदन सब प्राणियों को बोरा देने पर तुल आया हो । शिव मंदिर के घंटों की ध्वनि दूर से आकर कानों से टकरा रही है जैसे बता रही हों कि महादेव हैं न इस कलियुग के बेलगाम बसंत की मादकता पर नकेल कसने के लिए । बसंत के दिनों में तो जब तक ख़ासी धूप न चढ़ आए, तब तक अंदर जाने का तो मन ही नहीं होता ।

मैं डॉक्टर साहब से हमेशा यही कहती हूँ कि बाबू जी कितने दूरदर्शी रहे होंगे ना जो इतने बरसों पहले ही गाँव से आकर शहर में बस गए । उस समय कौड़ियों में उनके द्वारा खरीदी जमीन आज करोड़ों की हो गई है, कितना अच्छा किया था न उन्होंने तुम सब भाइयों के लिए । इतनी बड़ी जगह के कारण ही तो हम इतना लंबा ट्रेक बनवा सके जॉगिंग और वॉकिंग के लिए । ये पेड़ पौधों की घनी कतारें कहाँ हाथ आती हैं आम आदमी के जो हमारे परिसर में हैं ।

घर से निकलते ही जिस जामुन के दर्शन होते हैं उसे बाबूजी ने अपने हाथों से रोपा था । मैंने बाबूजी को कभी देखा तो नहीं, पर सच कहूँ तो इस जामुन के माध्यम से हजारों बार साक्षात्कार हो चुका है उनसे और अब मैं भी उतनी ही परिचित हूँ उनसे जितने उनके बेटे और बेटियाँ। सुबह जल्दी जागने वाले बाबूजी जैसे रोज कहते हैं- सिद्धु बिटिया तू बड़ी रानी है । सब सो रहे हैं बस एक  तू ही जग रही है मेरी सेवा में। इस जामुन के रूप में इतने डेने पसार लिए हैं उन्होने, जैसे कह रहे हों बच्चों मैं हूँ तुम्हारे सिर पर साया आज भी, तुम जियो निश्चिंत होकर । ये जामुन साया ही नहीं फल भी मीठे और बेशुमार देती है। माँ बताती थीं कि  ये अगेती जामुन है जब तक दूसरी जामुनों पर फल आने शुरू ही होते हैं ये उन्हें पकाकर टपाटप बरसाना भी शुरू कर देती है, जैसे बाबूजी अपने बच्चों को सबसे पहले बाँट देना चाहते हैं मीठे – मीठे, मधुर फल । तुम मानते नहीं हो आली पर सच मानना, एक बार बोगनवीलिया इसकी जड़ों से होकर फुनगियों तक जोंक की तरह चिपक गई थी । गुलाबी फूलों की दमक से अलग काँटों की कसक से लहूलुहान हो गई थी जामुन की काया । तभी एक दिन बाबूजी मेरे स्वप्न में आए और कहने लगे सिद्धू बिटिया मुझे दूसरे कपड़े ला दे मेरे पूरे शरीर में कांटे से चुभ रहे हैं, मैं सो नहीं पा रहा हूँ बच्ची । सुबह उठकर न जाने क्यों सबसे पहले मैं जामुन की तरफ ही तो भागी थी । ध्यान से देखा तो उसके कांतिहीन पात त्राहि - त्राहि कर मेरी ओर देख रहे थे जैसे बाबूजी काँटों में लिपटे खड़े थे । मैंने उसी दिन अपने माली चन्दन को बुलाकर जामुन को उन भयानक काँटों से निजात दिलाने की प्रक्रिया आरंभ कर दी थी । कई दिन लगे कई लड़कों ने मिलकर हटाया था बोगनवीलिया को । लड़के भी सारे छिल गए थे पर कितने फल आए थे उस बरस। लॉन की घास भी उनके लगातार टपकने से पीली पड़ गई थी । उसी बरस तो हुआ था शिशु का सलेक्शन भी आई आई टी में। जैसे बाबूजी ने अँजुरियाँ भर- भर निरंतर आशीर्वाद बरसाया था घर पर । तब से तो इस जामुन के सामने से गुजरते समय मेरी ओढ़नी रोज खुद - बख़ुद सिर पर जाने लगी थी ।   

पिछले बरस माँ भी कूच कर गईं बाबू जी का साथ देने के लिए और जामुन की ही तरह अब माँ के रोपे नीम से भी मैं माँगने लगी हूँ आशीर्वाद । और सच कहूँ तो माँ भी जरा कंजूसी नहीं करतीं उसे देने में । कितनी समानता है माँ और नीम में जैसे नीम की कड़वी - कड़वी पत्तियाँ और उसके कड़वे फल, पर कोई खाए तो उसके शरीर के सब विकार खत्म । ऐसी ही थीं माँ की बातें भी कड़वी लगने वाली, पर मीठा फल देने वाली । उनकी बातों का भी कोई मर्म समझ जाए तो जीवन सुधर जाये । मैं बच्चों और डॉक्टर साहब से रोज यही कहती हूँ । वे बताते हैं कि बाबूजी अपने पेड़ पौधों को रोज संगीत सुनवाते थे । सुबह ही हाथ में ट्रांज़िस्टर लेते और पहुँच जाते लॉन में और गर्मियों की छुट्टियों में सारे बच्चों को भी बुला लेते, घास निकलवाते, निराई करवाते उसके बदले सबको चवन्नी देते । वे भी पेशे से डॉक्टर थे। कई बार तो माली की अनुपस्थिति में तहमद ऊपर पलटकर क्यारियों में इस तरह जुटे रहते कि रोगी उन्हीं से पूछ बैठता, “माली भैया डॉक्टर साब हैं क्या ?” बाबूजी हल्का सा मुसकुराते और थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के लिए कहते फिर हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलते और दवाखाने आ जाते, न रोगी उनपर माली होने का शक कर पाता, ना वो खुद कुछ बताते।

जेठ जी भारतीय सेना में थे, उन्हें भी तो मैंने कभी नहीं देखा, हाँ इतना जरूर पता है की वो थे बेहद सज्जन, सुंदर, हट्टे – कट्टे, उदारमना और अपने छोटे बहन - भाइयों के साथ - साथ अपने परिवार सहित अपने समाज और अपने देश तक को बेहद प्यार करने वाले। कहते हैं कि उनकी मृत्यु के लगभग छह माह पूर्व से उनके  लगाए दो पाम में से एक सूखना शुरू हो गया था तब किसी ने नहीं सोचा था क्या अनहोनी होने जा रही थी । नहीं पता था कि बार्डर पर पड़ोसी सेना इस तरह घुसपैठ करेगी कि अकस्मात हमारा घर अपनी सबसे बड़ी संतान खो बैठेगा, कहते हैं कि वो हारे नहीं थे उन्होंने दुश्मन की पूरी चौकी उड़ा दी थी । पर हाँ एक पाम पूरी तरह सूख गया था, फिर भी ये बचा हुआ पाम उनकी याद दिलाने के लिए पर्याप्त है । सुबह - सुबह इसके पास से गुजरना हेंडसम जेठ जी का आशीर्वाद लेने से कम तो नहीं । जैसे सतर खड़े हों वो अद्यतन देश की सीमा पर मुस्तैद और हम नगर बाशिंदों को कोई डर पालने की जरूरत ही न हो । इस लंबे - तड़ंगे पाम की काया पर बने घेरे जैसे जेठ जी को वीरता के लिए मिले अनेक तमगे हो । शायद जानते थे जल्दी जाना है इसी लिए विवाह में इतनी आनाकानी करते रहे । उस बार बाबूजी ने लगभग तय ही कर दिया था पर, उस बार तो आनाकानी करने के लिए भी जीते - जागते वापस नहीं लौटे । कहते थे कि मैं अपने भाइयों के लिए काजू बादाम कि बोरियाँ डलवा दिया करूँगा माँ, तुम देखना तो । कैसी मन से इच्छा की कि समय से पहले ही मरकर भी तमाम मुआवजे दिला गए घर को । माँ ने किसी से बिना पूछे कहे डॉक्टर साहब और देवर जी के लिए तमाम सारे मेवे मँगा दिए थे और जीवित बचे पाम की बड़ी- बड़ी पत्तियों का रंग कुछ गहरा सा गया था । उस बार नई पत्तियाँ समय से कुछ पहले ही फूट पड़ीं थीं उस पर । आज तक भी जेठ जी के बारे में जो भी बात करता है बस उनकी प्रशंसा ही करता रह जाता है । यहाँ तक कि रिश्ते नाते वाले, आस पड़ोसी, रिक्शे वाले, जूते वाले सब । पिछले बरस तब जबकि उन्हें शहीद हुए कम से कम अड़तीस बरस हो गए मैं जूते खरीदने गई तो दुकानदार भाई साहब का जिक्र करके आँखों में आँसू ले आया । छोटे शहर की वजह से सब आपस में एक - दूसरे को जानते हैं और अभी तो महानगरों की एक - दूसरे को ना पहचानने वाली महामारी से थोड़े - बहुत बचे रह गए हैं। उस दिन मैं भाई साहब के व्यक्तित्व की जादूगरी मान गई थी । सेना में देर से गए थे न; इसलिए अपने शहर के लोगों के दिलों में भी खूब रच बस कर गए। कहते हैं आत्मा कभी मरती नहीं सिर्फ शरीर बदलती है । हो न हो भाई साहब ने इस पाम को ही अपना नया शरीर चुना हो।

डॉक्टर साहब भी पेड़ों के घने शौकीन हैं, किसी बच्चे का जन्मदिन हो या मेरा, पौधों का उपहार देना कभी नहीं भूलते । मेरे तीस बसंत पार कर लेने पर तीसा खीसा की निर्मम कहावत को सिरे से खारिज कर देने के लिए इन्होंने मेरा वह जन्मदिन कुछ विशेष ही रोमांटिक होकर मुझे हरसिंगार भेंट करके उत्सव की तरह मनाया था, मेरा सुगंधियों से प्रेम अच्छी तरह जानते हैं ना । अब इस हारसिंगार की छतरी घनी पत्तियों और उनसे भी अधिक लदे और महकते फूलों से ऐसी झूमती है कि ये तो इसे देखकर फूले नहीं समाते हैं। खुद की तरह ही है ना, दिन भर काम में मशगूल अपने मरीजों की सेवा में जुटे जैसे घर में किसी को जानते ही ना हो, कोई अपनी महक ही न हो परंतु रात के आते ही काम से अवकाश और सुबह तक का सारा समय पूरी हंसी - खुशी के साथ परिवार का। ऐसा ही ये हरसिंगार है, दिन भर खड़ा रहेगा चुपचाप एक - एक कली को बंद कर खरखरे पत्तों में समेटे, साँझ होते ही ऐसी सुगंधियाँ बिखेरगा की सँभालो खुद को मदहोश होने से । और कहीं इसके नीचे खड़े हो गए तो प्रेमी बन ऐसी झड़ी लगाएगा जोगिया डंडी वाले सफ़ेद फूलों की कि मन मोहित हुए बगैर रह ही ना पाए । डंडी भी जोगिया यूँ रख ली होंगी कि कहीं खड़े होने वाला अपनी पूरी सुधबुध ही ना खो दे । खूब सोच समझ कर दिया था इन्होंने मुझे उस समय ये उपहार, हरसिंगार की ख़ुशबुओं में लिपटी मैं और मुझसे समाया इनका अनंत प्रेम, सचमुच ही बेजोड़ ।

और मेरे स्टाइलिश देवर जी का रोपा हुआ ये खूबसूरत अरिकेरिया लॉन के सारे पौधों मे न्यारा ही दिखाई देता है जैसे उनके करीने से काढ़े हुए बाल और सजा - संवारा व्यक्तित्व । चारों तरफ फैली उसकी शाखाएँ, उन पर नन्ही - नन्ही कुछ नरम से काँटों वाली एक - एक पत्ती सजी – सँवरी जैसे अपनी राजसी शान के साथ खड़े हों स्वयं देवर जी । और ननद जी का रोपा हुआ ये लाल गुलाब , वाह इसके तो क्या कहने जैसे वो खुद लिपटी रहतीं सुगंधियों में वैसा ही है उनका ये गुलाब । खुद तो ससुराल चली गईं परंतु अपना प्रतिनिधि छोड़ गईं, इसके रूप में । जैसे खुद मेरी साड़ी का पल्लू पकड़ कर खींच लेती थीं न ठीक ऐसा ही बिगड़ैल है ये भी, जरा सा इसके पास आँचल लहराया नहीं  कि बस उलझा लेगा अपने काँटों में पर न जाने क्यों इसके कांटे भी मुझे काँटे नहीं लगते बल्कि ननद जी का अपने मुलायम हाथों से मेरा आँचल थाम लेना सा लगता है। 

पता है आली मेरे बच्चों ने क्या रोपा है । वे दोनों तो चमन के साथ नर्सरी जाते हैं और जिस पौधे पर फूलों के खिलने का सीजन होता है न उसी को लाकर रोप देते हैं हर बार । प्रतीक्षा का समय ही कहाँ है इन बुलेट ट्रेन से भागते बच्चों के पास । पर ये संतोष का विषय है कि कम से कम रोपते तो हैं । ये नहीं पूछोगे आली कि मैंने वहाँ क्या रोपा ? मैंने लॉन में तो कुछ नहीं रोपा, पर घर के पिछले हिस्से में बीचो - बीच एक गुलमोहर और दोनों बाहरी सिरों पर दो शीशम रोपी हैं। जब - जब गुलमोहर पर बहार आएगी वो नयनाभिराम सौंदर्य से लदा रहेगा ही अन्यथा उसकी घनी छाँव तो घर पर हमेशा बनी ही रहेगी और शीशम उनको तो मैंने धरती माँ को समर्पित किया है उसके स्वास्थ्य का ध्यान रखेंगी वो दोनों ।

तुम्हें याद है आली या तुम भूल गए कि तुम भी तो मुझे कोई पौधा देने वाले थे, वादा किया था तुमने बरसों पहले । बताओ न कब दोगे ? मेरे लॉन में तुम्हारे वाले पौधे की जगह अभी तक रिक्त है आली.........       

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email – nirdesh.nidhi@gmail.com  


तीन लघुकथाएँः 1. मेट्रो लाइफ, 2. प्रॉमिस, 3. आईना

 - अर्चना राय

1. मेट्रो लाइफ 

महानगरीय जीवन शैली की चाल से चाल मिलाने की कोशिश में लगे, दोनों पति- पत्नी रात के नौ बजते- बजते, थके- हारे अपने -अपने ऑफिस से निकल पड़े। घंटे भर बाद, आलीशान बहुमंजिला इमारत के सामने पहुँचकर कार से उतरे और- 

"हैलो डियर।"- एक दूसरे को देखकर फीकी मुस्कान के साथ पति ने कहा।

"हाय"- पत्नी ने भी थकी हुई आवाज में कहा।

"हैलो सर, .... योर डिनर पार्सल।"-  फेमस फूड कंपनी के डिलीवरी ब्वाय ने पार्सल का पैकेट देते हुए कहा।

"ओके, थैंक्स।" - पति ने पार्सल लेकर कहा।

"हेव ऐ नाइस डिनर, सर एण्ड मैम।"- कहता हुआ बॉय चला गया।

रोज की तरह, ऑफिस से निकलते समय ही उन्होंने  ऑॅनलाइन खाना आर्डर कर दिया। जो उनके घर पहुँचने के पहले ही डिलीवरी बाय लेकर खड़ा था।

 लिफ्ट से, पच्चीसवे माले पर, पहुँचकर उन्होंने अपने फ्लैट का ताला खोला। पति वहीं ड्राइंग रूम में पड़े सोफे पर ढेर हो गया और टीवी ऑॅन कर लिया। पत्नी ने फ्रेश होकर, पार्सल का खाना प्लेट में निकालकर, पति को आवाज लगाई-"डियर,... डिनर इज रेडी।"

"ओके...डार्लिंग कमिंग।"- पति कहते हुए बाथरूम में फ्रेश होने घुस गया।

दोनों ने टीवी  से नजरें हटाए बिना, जल्दी- जल्दी अपना खाना खत्म किया और अपनी- अपनी प्लेट्स को धोकर, जगह पर व्यवस्थित रख दी।  बिस्तर पर अपनी- अपनी साइड पर लेटकर, मोबाइल पर दिन भर आईं,  सोशल मीडिया की खबरों को देखने में मशगूल हो गए। व्हाट्सएप, इन्स्टा, फेसबुक  पर आई  पोस्टों पर अपनी प्रतिक्रिया  दी। साथ ही अपने फेवरेट सिलेब्रिटी, स्पोर्ट्स प्लेयर,  दोस्तों और रिश्तेदारों की जन्मदिन, पार्टी, वेकेशन आदि की आई पोस्टों पर आधी रात तक लाइक और कमेंट कर, अपने आप को अपडेट किया। जब नींद से उनकी पलकें भारी होने लगी तो

" गुड नाइट डियर। " - कहकर दोनों,  एक- दूसरे की तरफ पीठ कर सो गए।

2. प्रॉमिस

सुबह से वे कितनी बार फोन लगा चुके थे, पर फिर भी पोते से बात नहीं हो पा रही थी। अब तो धीरे-धीरे उनकी प्रसन्नता, उदासी में बदलने लगी थी। कितने उत्साह से  सुबह  पोते से बात करने फोन हाथ में लिया ही था कि "अरे!  बावले हो गए हो क्या? जो इतनी सुबह- सुबह फोन लगाने बैठ गए। वो आपका गाँव नहीं, शहर है, वहाँ सभी लोग अभी सो रहे होंगे, परेशान हो जाएँगे, बाद में बात करना।"- पत्नी की बात सुनकर वे मन मसोसकर रह गए और फोन रख दिया।

थोड़ी देर बाद फिर दोबारा फोन लगाया तो बहू ने बताया - "राहुल तो स्कूल चला गया जब आएगा तो बात करा दूँगी।" 

 पर इंतजार करते-करते शाम के चार बज गए, फोन नहीं आया, तो उन्होंने फिर फोन किया तो बहू ने बताया - "राहुल कोचिंग पढ़ने चला गया है, वहाँ से आएगा तब ही बात हो पाएगी।" 

अब तो रात के आठ बज गए, पोता घर आ चुका होगा- सोचकर उन्होंने फिर फोन लगाया, पर इस बार बहू ने कहा- "बाबूजी वह स्पोर्ट्स क्लब से अभी तक नहीं आया है। पिछले महीने टेबिल टेनिस के  स्टेट लेवल सिलेक्शन में एक स्टेप रह गया था। तो इस बार हम कोई गलती नहीं करना चाहते। आप  परेशान न हों, आएगा तो मैं आपसे जरूर बात करा दूँगी।"

"अच्छा बहू! "- कहकर उन्होंने उदास होकर फोन रख दिया।

 इंतजार करते- करते रात के बारह बज गए पर फोन न आया। एक आखरी बार, बात करने की गरज से उन्होंने हिचकते हुए फिर फोन लगा ही लिया, इस बार फोन  बेटे ने उठाया-" क्या बात है? बाबूजी, इतनी रात गए फोन किया?"

"राहुल से बात करनी थी।"

"पर वह तो सो गया है।"

"अच्छा!. ...बेटा अगर न सोया हो, तो थोड़ा मेरी बात करा दे।"

" बाबूजी उसके शेड्यूल के हिसाब से वह सो गया है।"

" बेटा ...आज उसका जन्मदिन है, तो. ."

" हाँ बाबूजी जन्मदिन था, सुबह स्कूल चॉकलेट्स और गिफ्ट्स लेकर गया था, बच्चों के साथ मनाया होगा, आप कल बात कर लेना।"- सपाट शब्दों में बोलकर बेटे ने फोन रख दिया।

" दादाजी.... प्रॉमिस कीजिए मेरे बर्थडे पर सबसे पहले आप ही मुझे विश करेंगे।" - छुट्टियों में गाँव आए, पोते की बात याद कर उनका दिल जार- जार रो उठा।

3. आईना

शहर की  पाश कॉलोनी के आलीशान गार्डन में, दो छोटे बच्चे खेलते हुए बोले, 

 "बच्चों को फ्रूट खाना सबसे अच्छा होता है।" पहले बच्चे ने कहा।

"नहीं, ग्रीन वेजिटेबल खाना अच्छा होता है।" दूसरे ने कहा।

" मेरी टीचर ने मुझे बताया है, फ्रूट खाने से ताकत आती है।" पहले ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा।

"मेरी मॉम कहती हैं, अगर मैं रोज ग्रीन वेजिटेबल खाऊँगा, तो कभी बीमार नहीं पड़ूँगा।" 

दूसरे ने भी अपनी बात रखी। "फ्रूट खाना गुड होता है....."

 "नहीं ग्रीन वेजिटेबल......।"

दोनों बच्चे अपनी बात पर अड़े थे, तथा कोई भी हार मानने तैयार न था।

"अये लड़के सुनो!" वही गार्डन में अपने पिता की सफाई में मदद कर रहे माली के छोटे बच्चे को बुलाते हुए कहा।

"जी।" माली का बेटा सकुचाते हुए पास आकर बोला।

"तुम बताओ फ्रूट खाना अच्छा है कि ग्रीन वेजिटेबल?" पहले बच्चे ने कहा।

 कुछ देर तक सोचने के बाद, अपने दिमाग पर जोर देते हुए माली के बेटे ने कहा "रोटी! "

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सम्पर्कः भेड़ाघाट जबलपुर म. प्र.




लेखकों की अजब गज़ब दुनियाः उम्रदराज वाले लेखक - सूरज प्रकाश

संत कवि सूरदास
  - सूरज प्रकाश

ऐसे बहुत से लेखक रहे जिन्‍होंने जीवन का शतक तो पूरा किया ही, सौ बरस पार कर लेने के बाद भी पढ़ने -लिखने में लगे रहे और उनकी किताबें छपकर आती रहीं। संयोग से विभिन्‍न देशों में अलग- अलग  भाषाओं के ऐसे लेखक भी डेढ़ सौ से अधिक हैं। इनमें से कई तो अभी भी जीवित हैं और या तो अपनी अगली किताब की पांडुलिपि तैयार करने में लगे हैं या पिछली किताब के प्रूफ देख रहे हैं। बलिहारी है ऐसे लिक्‍खाड़ों की। ऐसे कर्मयोगियों के लिए सौ बरस जीओ वाला जुमला भी पुराना पड़ गया है।

• इस सूची में पहले भारतीय हैं संत कवि सूर दास। उनके जन्‍मस्‍थान और जन्‍म की तारीख के बारे में मतभेद हैं; लेकिन ये माना जाता है कि वे 104 या 105 बरस जीये। उनका काल 1478–1583 माना जाता है।

• के डी सेठना (26 नवंबर 1904 – 29 जून 2011) सौ का आँकड़ा पार करने वाले दूसरे भारतीय लेखक, कवि,  दार्शनिक और समीक्षक माने जाते हैं। वे श्रीअरविंदो आश्रम की पत्रिका मदर इंडिया के 51 बरस तक संपादक रहे। उन्‍हें अमल किरण के नाम से भी जाना जाता है। वे 106 बरस की उम्र पाने वाले आधुनिक लेखक माने जाते हैं।

• नीरद चंद्र चौधरी (23 नवंबर 1897 – 1 अगस्‍त 1999) बांग्‍ला और अंग्रेजी के लेखक थे जिन्‍होंने 102 बरस  की उम्र पाई। वे The Autobiography of an Unknown Indian के लिए खास तौर पर जाने जाते हैं। उनकी किताबों की संख्‍या अच्‍छी खासी है।

• जैसा कि मैंने बताया, सौ बरस से अधिक की उम्र पाने वाले लेखकों की संख्‍या 150 के करीब है। मजे की बात इनमें से एक तिहाई यानी लगभग 44 लेखक केवल अमेरिका के हैं। अर्जेंटिना से दो, आस्ट्रेलिया में जन्‍मे अमेरिकी लेखक एक, भारत से कुल मिला कर तीन, चीन से दो, कैनेडा से 7, चिली से एक, क्रोशिया से एक, ब्रिटेन से 7, ब्राजील से एक, अंग्रेजी के लेखक 7, फ्रांस के तीन, जर्मनी के सात, हंगरी से एक, विएतनाम से एक, स्‍कॅाटलैंड से एक, तुर्की से एक, स्‍वीडन से दो, स्‍पेन से चार, स्‍लोवाक से एक, जापान से सात, ईरान से एक, पुर्तगाल से एक और इस तरह से ये सूची आगे बढ़ती है। 

• इस सूची में भी टॉप पर रहने वाली रूस की कवयित्री साशा क्रासनी (1882–1995) हैं जिन्‍होंने 112 बरस की उम्र पाई। इनसे निचली पायदान पर रहे इतालवी निबंधकार और कवि कार्ला पोर्टा मूसा (1902–2012) जो 110 बरस की उम्र पाकर उम्र दराज लेखकों की सूची में दूसरे नंबर पर आते हैं। 109 बरस की उम्र पाने वाले आइरिश कवि कोम दे भाइलिस (1796–1906) और अमेरिकी लेखक साराह लुइस डेलानी (1889–1999) आते हैं। 108 बरस तक एक लेखक जीये और 106 बरस की उम्र पाने वाले 6 लेखक रहे।

अच्‍छा लगता है जब हम पाते हैं कि इतनी अधिक उम्र पाकर भी लेखक अपने कर्म में लगे रहे और दुनिया को साहित्‍य का अमूल्‍य उपहार देते रहे।

कम उम्र के लेखक

ये सूची सांकेतिक है। दुनिया भर में अलग- अलग भाषाओं में ऐसे अनेक मामले रहे होंगे जब बाल लेखकों ने कमाल कर दिखाये होंगे। 

• क्रिस्‍टोफर पाओलिनी ने पंद्रह बरस की उम्र में Inheritance नाम की  बेस्‍ट सेलर फेंटेसी सीरीज लिखना शुरू कर दी थी। लेकिन उनसे कम उम्र के भी कई लेखक ये कारनामा कर चुके हैं।  

• पिछले दशक में फ्रांस में रहने वाली रोमानिया की फ्लेविया बुजो ने अपनी पहली किताब The Prophecy of the Stones बारह बरस की उम्र में लिख ली थी और जब वह चौदह बरस की हुई तो ये किताब हार्पर कॉलिंस से छपकर आ चुकी थी। इसका 23 भाषाओं में अनुवाद हुआ और कुल 20000 प्रतियाँ बिकीं।

• 1993 में चीन में जन्‍मी चीनी-अमेरिकी नैंसी वाई फैन सात बरस की उम्र में न्‍यू यार्क चली गयी थी। वहां उसने ग्‍यारह बरस की उम्र में अपना पहला उपन्‍यास Swordbird लिखना शुरू किया और एक बरस में पूरा होने पर अपने खुद के बलबूते पर हार्पर कॉलिंस के सीईओ को ईमेल कर दिया। उपन्‍यास 2007 में छपा। बाद में 2008 में Sword Quest और 2012 में Sword Mountain भी छपे। ये न्‍यू यार्क टाइम्‍स के बेस्‍ट सेलर रहे।

• जेक मार्सियोनेट ने 2012 की गर्मी की छुट्टियों में 12 बरस की उम्र में आत्‍मकथात्‍मक उपन्‍यास जस्‍ट जेक लिख डाला, इंटरनेट पर इसे छपवाने की टिप्‍स की जानकारी तलाशी, दो ही दिन में एजेंट भी खोज लिया और जब उपन्‍यास छपा, तो यह न्‍यू यार्क टाइम्‍स की बेस्‍ट सेलर लिस्‍ट में जगह बना चुका था। जेक इस उपन्‍यास को लिखे जाने के पीछे अपनी माँ से मिली प्रेरणा मानता है। वह आगे भी लिखते रहना चाहता है।

एलेक्जेंडर पोप
• सन 1700 में जब एलेक्‍जेंडर पोप ने अपनी पहली कविता Ode to Solitude लिखी थी, तो वे बारह बरस के थे। वे तब भी तरह तरह की बीमारियों से घिरे हुए थे। बीच बीच में पढ़ाई छूटती रही। 1709 में लिखी गयी Pastorals ने उन्‍हें आशातीत प्रसिद्धि दिलाई। 1711 में छपे An Essay on Criticism ने उन्‍हें और ख्‍याति दिलाई।  वे अंग्रेजी के बहुत बड़े कवि हुए। शेक्‍सपीयर और टेनिसन के बाद  एलेक्‍जेंडर पोप की ही सबसे ज्‍यादा कोटेशन दी जाती हैं।

• ज्‍योति और सुरेश गुप्‍तारा जुड़वाँ भाई हैं। जब वे ग्‍यारह बरस के थे तो 700 पेज की फेंटेंसी Conspiracy of Calaspia लिख मारी। इसे छपने लायक बनाने के लिए इसे दस बार लिखा। भारत में ये बेस्‍ट सेलर रही। इसके इतालवी संस्‍करण के अधिकार  €60,000 में बिके जबकि जर्मन भाषा के अधिकार भी उन्‍हें 6 अंकों की एडवांस राशि दिला गए।

• दोनों भाइयों ने तीन बरस की उम्र में लिखना पढ़ना सीख लिया था। 2007 में ज्‍योति जब 18  बरस के हुए तो वे दुनिया के सबसे कम उम्र के पूर्ण कालिक उपन्‍यासकार थे। इससे पहले वे पंद्रह बरस  की उम्र में द वाल स्‍ट्रीट लिख कर हंगामा कर चुके थे।

• मैट्टी स्‍टेपानेक अजीब अजीब बीमारियों के साथ पैदा हुआ था और चौदह बरस की उम्र में मरने तक आक्‍सीजन गैस के टैंक और व्‍हील चेयर से ही बँधा रहा। इसके बावजूद वह 2002 से 2004 के बीच कविता की पाँच बेस्‍ट सेलर किताबों का लेखक बना। उसने तीन  बरस की उम्र में लिखना शुरू कर दिया था। उसकी माँ भी असाध्‍य रोगों की मरीज थी और उसके तीन बड़े भाई अकाल मौत से मर चुके थे। 2001 में कविता की उसकी पहली किताब ने उसे हीरो बना दिया था। उसने अमेरिका के राष्‍ट्रपति जिमी कार्टर से शांति के मसलों पर बात भी की थी।

• अलेक ग्रेवान ने नौ बरस की उम्र में How to Talk to Girls लिख दिया था। वह टीवी शो में भी नजर आया। वहीं उसे प्रकाशक मिल गया। इस बाल सुलभ उपन्‍यास में वह किशोरों को प्‍यार करने के टिप्‍स देता है। बाद में अलेक ने How to Talk to Moms, How to Talk to Dads and How to Talk to Santa भी लिखीं। सारी किताबें हार्पर कॉलिंस से छपीं।

• डेज़ी ऐशफोर्ड ने 1890 में नौ बरस की उम्र में The Young Visiters लिख ली थी लेकिन ये किताब 1919 में ही छप पाई थी। इस किताब की एक मजेदार बात ये रही कि उसने किताब छपने पर भी बचपन में लिखने में की गयी गलतियों को जस का तस रहने दिया। यहाँ तक कि शीर्षक भी गलत ही जाने दिया। इससे पहले वह चार बरस की उम्र में अपने पिता को The Life of Father McSwiney की कहानी की डिक्‍टेशन दे चुकी थी।

•  क्रिस्‍टोफर बील 6 बरस की उम्र में रोज लंच के बाद अपने कमरे में एक कहानी लिखा करता था। धीरे- धीरे उसने शब्‍द संख्‍या 1500 तक बढ़ाई। This and Last Season’s Excursions नाम की यह किताब लंदन में 2006 में छपी। उस समय उसकी उम्र 6 बरस और 118 दिन थी। वह सबसे कम उम्र का लेखक है। उससे 42 दिन बड़ा ब्राजील का Dragon Island का लेखक माना जाता है।

• डोरोथी स्‍ट्रेट सबसे कम उम्र की प्रकाशित कृति  की लेखिका मानी जाती है। चार बरस  की उम्र में उसने अपनी दादी के लिए कहानी लिखी। उसके माता पिता ने ये कहानी Pantheon Books को भेज दी। जब कहानी छपी तो डोरोथी 6 बरस की थी।  (क्रमशः)

किताबें - प्रकृति के विविध रंगों में डूबी कविताएँ

  - डॉ. उपमा शर्मा

समय के साथ, साहित्य में परिवर्तन अवश्यंभावी है। मनुष्य के रुझान समय- समय पर बदलते हैं। साहित्यिक रुझान बदलना भी कोई आश्चर्य का कारण नहीं। छंदों के माधुर्य और सम्मोहन से निकल हिंदी में नई कविता का अवतरण हुआ। किसी भी भाषा में नई विधा का आविर्भाव अर्थात् किसी विधा में नए रूपों का उद्भव एक शुभ संकेत है। यह उस भाषा के निरंतर सृजनशील सामर्थ्य का परिचायक है। हिंदी कविता भी इसका अपवाद नहीं। यह सत्य है कि अनुशासन में रहकर प्रायः उत्तम कार्य संभव है; परंतु उतना ही बड़ा सच यह भी है कि कठोर अनुशासन की मर्यादा- सीमा को लांघकर ही कुछ नया कुछ आश्चर्यजनक रचा जा सके।

नई कविता के साहित्य- जगत् में आगमन से ऐसा ही हुआ। पाठकों को इस नई अतुकांत कविता का तीखा- कसैला स्वाद रुचिकर लगा। एक के बाद एक अनेक रचनाकारों की रचनाओं ने पाठक वर्ग को अपनी और खींचा। अनुपमा त्रिपाठी की कविताओं में पाठकों को गीत का माधुर्य और अतुकांत का तीखापन दोनों ही बखूबी मिलते हैं। उनकी प्रत्येक कविता अनुभव की तपती भट्टी से गुजरी हुई प्रतीत होती है। कवयित्री को प्रकृति से बेहद प्रेम है। उन्होंने अपनी कविताओं में बारिश,बादल ,सागर और पर्यावरण पर खुलकर कलम चलाई है। वे मानव के विभिन्न आडम्बरों पर भी कटाक्ष करती हैं। 

कभी पूजा

कभी इबादत कभी आराधन

जब भी मिलती है मुझे, 

भेस नया रखती क्यूँ है

ए बंदगी तू मुझे

नित नए रूप में मिलती क्यों है।

यूँ तो इस संग्रह की सभी कविताएँ दिल को छूती हैं। कवयित्री की कलम ने जिंदगी के कोमल और तीखे दोनों एहसासों को बड़ी कुशलता से पृष्ठों पर उकेरा है। कविता का बुनियादी उसूल है कि आपबीती को जगबीती और जगबीती को आपबीती बनाकर किसी भाव को पन्नों पर उतारा जाता है। लेकिन अनुपमा त्रिपाठी ने जगबीती को बहुत कुशलता से शब्दों में ढाला है। जीवन के हर रंग उनकी कविता में द्रष्टव्य होते हैं। उनकी रचनाएँ सीधी सरल भाषा में हैं जो सीधे मन को छूती हैं- 

उठती हुई पीड़ा हो, 

या हो 

गिरता हुआ, 

मुझ पर अनवरत बरसता हुआ

सुकूँ।

उनकी कविता 'चमेली के क्षुप को' पाठक के मन को सीधे छूती है-

कुछ प्रयत्न ऐसे भी होते हैं

समूचे जीवन को जो गढ़ते हैं, 

कुछ आशाएँ ऐसी भी होती हैं

नित सूर्य संग उठती हैं।

 कवयित्री की कविता की भाषा सहज परिमार्जित है। अतुकांत कविता की विशेषता यही होती है कि इसमें सिर्फ भावनाओं को महत्त्व दिया जाता है। इस कविता में कोई नियम की पाबंदी नहीं होती; लेकिन लिखने का तरीका महत्व रखता है। अतुकांत कविता छंदमुक्त कविता के अंतर्गत आती है। अतुकांत कविता हमेशा सरल शब्दों में लिखी जाती है, जिसमें रचनाकार सीधी सरल भाषा में अपने भाव रखता है। इस कविता को पढ़ते-पढ़ते पाठक जब अंत में आते हैं, तो अंत का हिस्सा पढ़कर उन्हें इस कविता के पूर्ण होने का अहसास हो जाता है। यही अतुकांत कविता की बहुत बड़ी विशेषता होती है। अनुपमा की कविताओं में यह विशेषता स्पष्ट द्रष्टव्य है। अंत तक आते- आते पाठक पूरी तरह कविता के भाव में खो जाता है। यथा

सुबह से शाम होती हुई जिंदगी को

लिख भी डालो लेकिन

रात तलक सूर्योदय न हो हृदय का

रात की सियाही को

उजाले से जोड़ोगे कैसे… . . ?

 हाइकु  एक ऐसी कविता है जिसमें अर्थ ,गंभीरता एवं भावों का सम्प्रेषण इतना गहन एवं तीव्र होता है कि वह पाठक के सीधे दिल में उतर जाता है। तीन पंक्तियों की पाँच सात पाँच के वर्णक्रम में लिखी जाने वाली इस कविता में भावों की उच्चतम सम्प्रेषण क्षमता एवं अति स्पष्ट बिम्बात्मकता स्थापित होती है। 

हाइकु केवल तीन पंक्तियों और कुछ अक्षरों की कविता नहीं है; बल्कि कम से कम शब्दों में लालित्य के साथ लाक्षणिक पद्धति में विशिष्ट बात करने की एक प्रभावपूर्ण कविता है।’

जिस हाइकु में प्रतीक खुले एवं बिम्ब स्पष्ट हों वह हाइकु सर्वश्रेष्ठ की श्रेणी में रखा जाता है। हाइकु अपने आकर में भले ही छोटा हो किन्तु ‘घाव करे गंभीर’ चरितार्थ करता है। यह अनुभूति का वह परम क्षण है जिसमें अभिव्यक्ति ह्रदय को स्पर्श कर जाती है।कवयित्री के हाइकु इस कसौटी पर खरे उतरते हैं-

खिली लालिमा//देती अब संदेश/मिटी कालिमा

पर्यावरण को/दूषित नहीं करो/सचेतो जन

कुसुम खिले/पँखुड़ियाँ बोलतीं/खिलता मन

महके मन/भीगी सी है पवन /गुनगुनाऊँ

प्रेम जगाए /अनछुई भावना/सुनो तो सही

ये जिजीविषा/साथ नहीं छोड़ती/जियो तो सही

चाहे मनवा/आस घनेरी जैसी/शीतल छाँव

तपन बढ़े/कैसे दुखवा सहूँ/जियरा जले

सुनो न तुम/मेरी मन बतियाँ/नैना बरसे

ढलक जायें/आँसू रुक न पाएँ /छलके पीर

कविता का पूर्ण माधुर्य समेटे इन हाइकु में अनेक संकेत और बिम्ब छुपे हैं जो कवयित्री की प्रांजल काव्य-भाषा में मार्मिक ढंग से ध्वनित और अभिव्यक्त हुए हैं। पुस्तक में संग्रहित सारे ही हाइकु में , उसकी काव्यात्मक, मार्मिकता के साथ महत्ता उजागर हुई है । प्रथम हाइकु प्रकृति-बोधक है। यह सूरज, रोशनी और अँधेरी रात के अंतर्संबंध और प्रकृति-सौंदर्य का सुन्दर चित्र है । कवयित्री ने फूलों के खिलने पर मन प्रसन्नता को सुंदरता से बिम्बित किया है। प्रकृति मानव मन को आह्लादित करती है । कवयित्री इसे यूँ कहती हैं कि सुगंधित पवन से महका मन गुनगुना रहा  है । इन हाइकु से सिर्फ प्रकृति चित्रण के नहीं अपितु इससे अधिक के संकेत ध्वनित होते हैं - गहरे मानवीय संबंध जन्य दुःख-सुखानुभूति भी बिम्बित होती है। वियोगाकुल डबडबाई आँखों विरह वेदना दीख पड़ती है। इन हाइकु के तीनों पद अलग-अलग होकर भी एकार्थ केंद्रित हैं,  साथ ही, प्रथम और तृतीय पद ईकारांत होने के कारण अतिरिक्त भाषागत लय का सुख भी देते हैं। इसी प्रकार अन्य उद्धृत हाइकु भी कवयित्री की क्षण की अनुभूति में गहरे और व्यापक सत्य के दर्शन कराते हैं। कवयित्री पर्यावरण सहेजने पर भी भरपूर ध्यान दिलाती हैं।उनके ये हाइकु निर्विवाद रूप से उत्तम हाइकु कविता की कोटि में आते हैं। स्थानाभाव के कारण सबका विश्लेषण यहाँ सम्भव नहीं है, फिर भी उद्धृत छठे हाइकु से ध्यान नहीं हटता जिसमें कवयित्री जिजीविषा का सुंदर बिम्ब उकेरती हैं।

अनुपमा त्रिपाठी के संग्रह 'अनुगूँज' की कविताओं में अभिव्यक्ति के मुखर स्वर हैं।इन कविताओं में समय का एक तीखा बोध भी है। कविताओं में निहित प्रश्नों की आकुलता, संवाद, आश्चर्य और विस्मय की खूबियां उन्हें बार- बार पढ़ने और सोचने पर मजबूर करती हैं।

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सम्पर्कः बी-1/248, यमुना विहार, दिल्ली- 110053


प्रेरकः चाय के कप

  - निशांत

वर्षों पहले एक ही कॉलेज में एक ही कक्षा में एक साथ पढ़ने वाले पाँच युवक अब अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में स्थापित हो चुके थे। वे अपनी कक्षा की री-यूनियन में मिलने के लिए एकत्र हुए। उन सभी ने यह तय किया कि वे अपने पुराने प्रोफ़ेसर से मिलने जायेंगे जो अपनी कक्षा में हमेशा ही उन्हें ज़िंदगी के ज़रूरी सबक बताते थे।

वे सभी प्रोफ़ेसर के घर गए। प्रोफ़ेसर भी अपने इतने सारे प्रिय शिष्यों से मिलकर बहुत खुश थे। सभी ने अपने जीवन की घटनाओं को बाँटना शुरू किया। ज्यादातर युवक अब प्रौढ़ हो चुके थे और उनके जीवन में अनेक व्यक्तिगत, नौकरीपेशा या कारोबारी समस्याएँ थी। एक दूसरे की तनावग्रस्त और मुश्किल ज़िंदगी का हाल सुनकर खुशनुमा माहौल खामोश उदासी में बदल गया।

उन सबके वर्तमान जीवन की उलझनों को सुनने के बीच ही प्रोफेसर ने स्वयं उठकर उनके लिए चाय बनाई। प्रोफेसर बड़ी सी प्लेट में एक केतली में चाय और आठ-दस खाली कप लेकर रसोईघर से आए। प्लेट में रखे सारे खाली कप एक जैसे नहीं थे। उनमें मिट्टी के कुल्हड़ से लेकर साधारण चीनी मिट्टी के कप, चाँदी की परत चढ़े कप, काँच, धातु, और क्रिस्टल के सुन्दर कप शामिल थे। कुछ कप बहुत सादे और अनगढ़ थे और कुछ बहुत अलंकृत और सुरुचिपूर्ण थे। निश्चित ही उनमें कुछ कप बहुत सस्ते और कुछ राजसी थे।

प्रोफ़ेसर ने अपने ग्लास में चाय ली और सभी शिष्यों से कहा कि वे भी अपने लिए चाय ले लें। जब सभी चाय पीने में मशगूल थे तब प्रोफ़ेसर ने उनसे कहा –“बच्चो!, क्या तुम सभी ने इस बात पर ध्यान दिया कि तुम सभी ने महँगे और दिखावटी कप में चाय परोसी और प्लेट में सस्ते और सादे कप ही बचे रह गए? शायद तुम्हारे इस चुनाव का सम्बन्ध तुम्हारे जीवन में चल रहे तनाव और तकलीफों से भी है। क्या तुम इस बात से इंकार कर सकते हो कि कप के बदल जाने से चाय की गुणवत्ता और स्वाद प्रभावित नहीं होती। तुम्हें चाय का जायका और लज्ज़त चाहिए लेकिन अवचेतन में तुम सबने दिखावटी कप ही चुने।”

“ज़िंदगी इस चाय की तरह है। नौकरी-कारोबार, घर-परिवार, पैसा और सामाजिक स्थिति कप के जैसे हैं। इनसे तुम्हारी ज़िंदगी की असलियत और उसकी उत्कृष्टता का पता नहीं चलता। जीवन के उपहार तो सर्वत्र मुफ्त ही उपलब्ध हैं, यह तुमपर ही निर्भर करता है कि तुम उन्हें कैसे पात्र में ग्रहण करना चाहते हो।” (हिन्दी ज़ेन से) ■■