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Sep 3, 2021

लघुकथा- जहाँ जागे वहीं सवेरा

-डॉ. विभा रंजन (कनक)

जानकी का दर्द जब असहनीय हो गया, तब उसने अपनी बहू श्वेता को आवाज दी।
आपने बुलाया मम्मी जी.!
‘हाँ, मेरे घुटने दर्द से ऐंठ रहें है, जरा दराज से मूव निकालकर मालिश कर दो, और गरम पानी की थैली से सिंकाई भी कर दो।
मम्मी जी, मुझे मूव की बदबू से उल्टी आती है,
मैं मालिश तो नहीं कर पाऊँगी, हाँ , गरम पानी की थैली लाती हूँ, उससे तो आप खुद भी सिंकाई कर सकती हैं।
  बहू का टका सा जवाब पाकर जानकी कुछ बोल नहीं पाई, आँखों के कोरों से आँसू निकल पड़े, उसके अपने किये कर्म सामने आ रहे हैं, जानकी ने अपनी सास की कभी इज्ज़त नहीं की। जानकी को अपने स्वर्गीय पति की बात याद आ गई, अपने कर्मो का फल यहीं मिलता है, उसका मन पछतावा से भर गया। श्वेता पानी ले आई, जानकी स्वयं ही सिंकाई करने लगी, गठिया के कारण हाथ थोडे़ टेढे़ हो गये थे सो, दिक्कत हो रही थी,
तभी कॉलबेल बजा। श्वेता ने दरवाजा खोला, 
ओह मम्मा, आओ न, कितने दिनों के बाद आई हो,
उधर हाँ जा रही हो? 
तेरी सास से मिलने!
वो सो रही हैं, बाद में मिल लेना,
चलो मेरे साथ! 
श्वेता उन्हें अपने कमरे में ले गई।
दर्द ज्यादा है क्या?’
हाँ , मुझसे बोली, मूव से मालिश कर दो, फिर गरम पानी की थैली से सिंकाई कर दो, मैंने तो बोल दिया, मुझे मूव से उल्टी आती है और सिंकाई तो आप खुद भी कर सकती हैं!
यह तो गलत बात है श्वेता, एक बीमार और लाचार को इस तरह से जवाब देना! 
तुम नहीं जानती मम्मा, इन्होंने अपनी सास को बहुत सताया है, मुझे बुआ जी ने सब बता दिया! 
तू क्या उनका बदला ले रही है, फिर तो यह कहानी कभी खत्म ही नहीं होगी!
मतलब?’
उन्होंने अपनी सास को सताया, तू अपनी सास को सता, तेरी बहू तूझे सतायेगी!
मेरी बहू, क्यों?’
क्यों उसे बताने वाला कोई नहीं होगा क्या, और फिर कोई बता
ये या न बता, बच्चे तो घर में जो देखेंगे वही सीखेंगे न!
श्वेता सोचने लगी।

अपनी बात का प्रभाव होते देख, उसकी माँ ने कहा,
मैंने तुझे ऐसे संस्कार तो नहीं दिये हैं, कल को अगर तेरी भाभी मेरे साथ ऐसा करे, तब तुझे कैसा लगेगा?’
सॉरी मम्मा,
मुझसे गलती हो गई, अब से मैं उनका ध्यान, एकदम अपनी माँ की  तरह रखूँगी !
कोई बात नहीं,
जागे तभी सवेरा, बस इतना याद रख किसी को दंड देने का अधिकार हमें नहीं है, वो पर बैठा है न वही न्याय करता है।

B/37 Ground floor
, Soami nager
South Delhi 110017
. New Delhi 9911809003

किताबें- कैटवॉक वह भी कबूतर की!!!

-अरुण शेखर

पुस्तकः कबूतर का कैटवॉक, लेखिकाःसमीक्षा तेलंग

प्रकाशनः प्रभात प्रकाशन दिल्ली, मूल्यः 150/-

साहित्य की बहुत सी विधाएँ हैं जिसपर खूब लिखा जा रहा है कविता, कहानी, उपन्यास और व्यंग्य तो बराबर लिखे जा रहे हैं तथा छप भी खूब रहे हैं ; परंतु यात्रा वृतांत वह भी किस्सागोई के अंदाज में बहुत कम पढ़ने को मिलते हैं। अभी हाल ही में मैंने व्यंग्यकार समीक्षा तैलंग की एक पुस्तक पढ़ी कबूतर का कैटवॉक पुस्तक के आवरण के एक कोने में लिखा है किस्सागोई। तो पहले बात करते हैं पुस्तक के शीर्षक के विषय में, क्योंकि किसी भी कहानी या पुस्तक का शीर्षक भी महत्त्वपूर्ण होता है, उससे पुस्तक के मज़मून का पता चलता है जो आपके अंदर उसे पढ़ने का कौतूहल जागता है।  इसके 3 शब्द हैं बल्कि चार एक हिंदी दो अंग्रेजी के कबूतर के अलावा कैटवॉक।

कैटवॉक आपने खूब सुना होगा यह फैशन से जुड़ा शब्द है। यहाँ एक तो कबूतर और उसकी विरोधी कैट यानी बिल्ली है और उसकी वॉक यानी चाल है कबूतर की चाल के अंदाज में। यहीं पर व्यंग्य है यानी लेखक ने अपने लेखों में भी इसे  बरकरार रखा है। दूसरी बात जो महसूस हुई मुझे कि कबूतर हो या कैट इन सबसे महत्त्वपूर्ण है वॉक, चाल, आप की गति और यह वॉक केवल धरती की नहीं है यह  मानसिक है, रिश्तों की है, समय की है। इस वॉक के बहाने समीक्षा ने देश-विदेश के पशु-पक्षी, वातावरण, रिश्ते-नाते और दैनिक जीवन की सामान्य से सामान्य घटना को विशेष बना दिया। जहाँ वह आबू धाबी के जीवन को आपके लिए प्रस्तुत करती हैं वहीं भारतीय जीवन के रिश्तों को जस का तस परोस देती है,  विशेष बात यह कि इस यात्रा में उनके साथ कबूतर और बिल्लियों का खासा स्थान है मज़े की बात है कि हर चित्रण में उनके व्यंग्य की छौंक लगती रहती है। जैसे भौ भौ कुत्ता आपका स्वागत करता है एक लेख है उसका एक अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ-

इन कुत्तों को आजकल घर की जगह बैंकों में होना चाहिए आम आदमी का पैसा तो बचेगा आजकल आगे वह लिखती हैं- कुछ घर ऐसे भी होंगे जो इन बैंकों को लूट कर बने हैं उनकी सुरक्षा के लिए कुत्ते को रखना और पालना जरूरी है क्योंकि यह काम केवल वही कर सकते हैं।

 आबू धाबी की यात्रा के दौरान मेरी शुक्रवार यात्रा दो में एक जगह लिखती हैं कि कम से कम यहाँ का ओपन भ्रष्टाचार खुली आँखों से तो नहीं दिखता, अंदर की बातें कोई नहीं जानता, जानना चाहता भी नहीं ज्यादा अंदर घुसने की कोशिश में कहीं अंदर ही न कर दें। कानून कड़क हैं यहाँ। फिर भी जेल हैं, कोर्ट है, पुलिस है, वकील है मतलब अपराध तो होते ही हैं लेकिन ख़बर किसी को नहीं लगती, न उसके बारे में गॉसिप कर सकते हैं, न लिख सकते हैं और अखबारों में इस तरह की खबरें ढूँढते रह जाओगे। इसलिए कोई पड़ता नहीं इन बातों में। आसान जिंदगी को क्यों उलझाना! अरे भाई रहना है यहाँ...। नियम क़ायदे में रहेंगे तो ही रहने को मिलेगा। वरना देश के बाहर का रास्ता बहुतों को दिखा दिया जाता है।

बहुत ही सुंदर है, आप सबने कबूतर देखे होंगे पर कैटवॉक करते हुये केवल यहीं पर मिलेंगे-कबूतर जब चलता है जब चलता है तो किसी सुंदरी या मॉडल से कम नहीं लगता। गर्दन ऐसे मटकाता है, जैसे कथक नृत्य कर रहा हो। उसकी सुंदर नीली आँखें जैसे उसकी सुंदरता का बखान करते नहीं थकती। वो पत्थरों में खुशियों के रंग समेटती हैं।

प्रकृति प्रेमी समीक्षा किसी को भी लॉकडॉउन में रखने की पक्षधर नहीं हैं भले ही वह पालतू ही क्यों न हों। क्योंकि उन्होंने इस लॉकडॉउन को खूब अच्छी तरह महसूस किया है।

कहने का मतलब यह की  कबूतर का कैटवॉक एक पठनीय पुस्तक है, जिसमें कई जगहों की सैर है और इससे उपजा जीवन दर्शन है।


प्रेरक- ज़िन्दगी जीने में और जीवित रहने में बहुत बड़ा अंतर है

-निशांत

ज़िन्दगी लम्बी नहीं, गहरी होनी चाहिए – रौल्फ वाल्डो इमर्सन

क्योंकि ज़िन्दगी जीने में और जीवित रहने में बहुत बड़ा अंतर है

* जब तक जियें तब तक सीखते रहें – हमेशा नया कुछ सीखने और पढ़ने में हम जितना समय और ऊर्जा लगाते हैं वह हमारे जीवन को रूपांतरित करता रहता है। हम सभी हमारे ज्ञान का ही प्रतिबिम्ब हैं। जितना अधिक हम ज़िन्दगी से सीखते हैं उतना अधिक हम इसपर नियंत्रण रख पाते हैं।

* अपने शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा करें – हमारा शरीर हमारे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण यन्त्र या औजार है। हम जो कुछ भी सही-गलत करते हैं उसका हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। हमें अपने शरीर को पोषण, व्यायाम, और आराम देना चाहिए और स्वास्थ्य की रक्षा करनी चाहिए।

* प्रियजनों के साथ अधिकाधिक समय व्यतीत करना – हम सभी भावुक प्राणी हैं। हमें सदैव अपने परिजनों और मित्रों के सहारे की ज़रुरत होती है। जितना अधिक हम उनका ध्यान रखते हैं उतना ही अधिक वे हमारी परवाह करते हैं।

* अपने विश्वासों के प्रति समर्पण रखें – कुछ लोग अपने सामजिक परिवेश में सक्रीय होते हैं, कुछ लोग धार्मिक आस्था से सम्बद्ध हो जाते हैं, कोई व्यक्ति लोगों का जीवन सुधरने की दिशा में प्रयास करता है, अधिकांश लोग अपने काम और नौकरी के प्रति समर्पण भाव रखते हैं। प्रत्येक स्थिति में उन्हें एक समान मनोवैज्ञानिक परिणाम मिलता है। वे स्वयं को ऐसी गतिविधि में लिप्त रखते हैं जिससे उन्हें मानसिक शांति और संतुष्टि मिलती है। इससे उनके जीवन को मनोवांछित अर्थ मिलता है।

* जो भी करें सर्वश्रेष्ठ करें – यदि आप कोई काम बेहतर तरीके से नहीं कर सकते तो उसे करने में कोई तुक नहीं है। अपने काम और अपनी अन्य गतिविधियों जैसे रूचियों आदि में सबसे बेहतर साबित होकर निखरें। लोगों में अपनी धाक जमायें कि आप जो कुछ भी करते हैं वह सदैव सर्वश्रेष्ठ ही होता है।

* अपने पैर चादर के भीतर ही रखें – अच्छी ज़िन्दगी जियें लेकिन किसी तरह का अपव्यय न करें। दूसरों को दिखाने के लिए पैसा न उडाएँ। याद रखें कि वास्तविक संपत्ति दुनियावी चीज़ों में निहित नहीं होती। अपने धन का नियोजन करें, धन को अपना नियोजन न करने दें। अपने से कम आर्थिक हैसियत रखनेवाले को देखकर जिएँ।

* संतोषी जीवन जिएँ– स्वतंत्रता सबसे बड़ा वरदान है। संतोष सबसे बड़ी स्वतंत्रता है।

* अपना प्रेमाश्रय बनाएँ – घर वहीं है, ह्रदय है जहाँ। आपका घर कैसा भी हो, उसे प्यार के पलस्तर से बाँधे रखें। याद रखें, घर और परिवार एक दुसरे के पूरक हैं।

* स्वयं और दूसरों के प्रति ईमानदार रहें – ईमानदारी भरा जीवन मानसिक शांति की गारंटी है और मानसिक शांति अनमोल होती है।

* दूसरों का आदर करें – बड़ों का आदर करें, छोटों का भी सम्मान करें। ऐसी कोई श्रेणी नहीं होती जो किसी मानव को दूसरे मानव से पृथक कर सकती हो। सभी को एक समान इज्ज़त बख्शें। जितना धैर्य आप अपने नवजात शिशु के प्रति दिखाते हैं उतने ही धैर्य से अपने वृद्ध पिता से भी व्यवहार करें।

* नया करते रहें – अपने प्रियजनों के साथ आप भांति-भांति प्रकार के अनुभव साझा करें। आपकी जीवन गाथा विस्तृत अनुभवों की लड़ी ही तो है! जितने अच्छे अनुभव आप उठाएँगे, आपका जीवन उतना ही अधिक रोचक बनेगा।

* अपने कर्मों की जिम्मेदारी से न बचें – आप कुछ भी करें, भले ही वह सही हो या गलत, उसकी जिम्मेदारी उठाने से न कतराएँ। यदि आप स्वयं जिम्मेदारी ले लेंगे तो आपको जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा।

* अपने वायदों को हद से भी ज्यादा पूरा करें – बहुत सारे लोग दूसरों से बिना सोचविचार किये ही वायदे कर बैठते हैं और उन्हें निभा नहीं पाते। वे वादा करते हैं काम पूरा करने का लेकिन काम शुरू भी नहीं करते। यदि आप लोगों की दृष्टि में ऊँचा उठना चाहते हैं तो इसका ठीक उल्टा करें। अपनी योग्यताओं कों यदि आप कम प्रदर्शित करेंगे तो आप सदैव लोगों की दृष्टि में वांछित से अधिक उपयोगी साबित होंगे। लोगों में आपकी कर्तव्यनिष्ठ और कार्यकुशल व्यक्ति की छवि बनेगी।

* सुनें ज्यादा, बोलें कम – ज्यादा सुनने और कम बोलने से आप ज्यादा सीखते हैं और आपका ध्यान विषय से कम भटकता है।

* अपना ध्यान कम विषयों पर केन्द्रित करें – कराटे के बारे में सोचें, ब्लैक बैल्ट कम सुन्दर दिखती है बनिस्पत ब्राउन बैल्ट के। लेकिन क्या एक ब्राउन बैल्ट किसी रेड बैल्ट से अधिक सुन्दर दिखती है? बहुत से लोग ऐसा नहीं सोचेंगे। हमारा समाज प्रबुद्ध और महत्वपूर्ण लोगों कों बहुत ऊंची पदवी पर बिठाता है। परिश्रम बहुत मायने रखता है लेकिन इसे केन्द्रित होना चाहिए। अपना ध्यान अनेक विषयों में लगाकर आप किसी एक में पारंगत नहीं हो पायेंगे। एक को साधने का विचार ही सर्वोत्तम है।

* उपलब्ध साधनों का भरपूर दोहन करें – साधारण व्यक्ति जब किसी बहुत प्रसन्नचित्त अपाहिज व्यक्ति कों देखते हैं तो उन्हें इसपर आर्श्चय होता है। ऐसी शारीरिक असमर्थता की दशा में भी कोई इतना खुश कैसे रह सकता है!? इसका उत्तर इसमें निहित है कि वे ऐसे व्यक्ति अपने पास उपलब्ध सीमित शक्ति और क्षमता का परिपूर्ण दोहन करने में सक्षम हो जाते हैं। अश्वेत गायक स्टीवी वंडर देख नहीं पाते लेकिन अपनी सुनने और गाने की प्रतिभा को विकसित करने के परिणामस्वरूप उन्होंने 25 ग्रैमी पुरस्कार जीत लिए हैं।

* छोटी-छोटी खुशियों से ज़िन्दगी बनती है – मैं यह हमेशा ही कहता हूँ कि जीवन में जो कुछ भी सबसे अच्छा है वह हमें मुफ्त में ही मिल जाता है। वह सब हमारे सामने नन्हे-नन्हे पलों में मामूली खुशियों के रूप में जाने-अनजाने आता रहता है। प्रकृति स्वयं उन क्षणों कों हमारी गोदी में डालती रहती है। अपने प्रियजन के साथ हाथों में हाथ डालकर बैठना और सरोवर में डूब रहे सूर्य के अप्रतिम सौन्दर्य कों देखने में मिलनेवाले आनंद का मुकाबला और कोई बात कर सकती है क्या? ऐसे ही अनेक क्षण देखते-देखते रोज़ आँखों से ओझल हो जाते हैं और हम व्यर्थ की बातों में खुशियों की तलाश करते रहते हैं।

* लक्ष्य पर निगाह लगायें रखें – लक्ष्य की दिशा में न चलने से और भटकाव में पड़ जाने से कब किसका भला हुआ है! आप आज जहाँ हैं और कल आपको जहाँ पहुँचना है इसपर सतत मनन करते रहने से लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है और नई दिशाएं सूझने लगती हैं। इससे आपमें स्वयं कों सम्भालकर पुनः शक्ति जुटाकर नए हौसले के साथ चल देने की प्रेरणा मिलती है।

* अवसरों कों न चूकें – कभी-कभी अवसर अत्प्रश्याशित समय पर हमारा द्वार खटखटाता है। ऐसे में उसे पहचानकर स्वयं कों उसके लिए परिवर्तित कर लेना ही श्रेयस्कर होता है। सभी बदलाव बुरे या भले के लिए ही नहीं होते।

* इसी क्षण में जीना सीखें – जो पल इस समय आपके हाथों में है वही पल आपके पास है। इसी पल में ज़िन्दगी है। इस पल कों जी लें। यह दोबारा लौटकर नहीं आएगा। (हिन्दी  ज़ेन)

सेहत- तनाव की पहचान और बचाव

- मंजूषा मन

वर्तमान समय में तनाव हम सबके जीवन में घुसपैठ किए हुए है। यह किसी उम्र विशेष की समस्या नहीं है। हर उम्र में तनाव देखा जाता है। चाहे वह बच्चे हो या बड़े। हर व्यक्ति को हर समय किसी न किसी प्रकार का तनाव या चिंता रहती है। तनाव एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, पर तब तक, जब तक यह कुछ हद तक हो। जब तक यह हमारे कार्य में सहायक हो, जिसे हम सावधानी रखना या पूर्व नियोजन कह सकते हैं। लेकिन जब यही तनाव बढ़ने लगता है, तो यह धीरे-धीरे अवसाद का रूप ले लेता है, तब यह एक गंभीर समस्या के रूप में उभरकर सामने आता है। तनाव यदि हद से अधिक बढ़ जाए, तो किसी व्यक्ति के लिए उससे बाहर निकलना बहुत मुश्किल हो जाता है। अत: तनाव की पहचान करना और समय रहते उस पर नियंत्रण करना अति आवश्यक है।

एक बड़ी समस्या यह है कि तनाव बढ़ रहा है इसकी पहचान कैसे की जाए? कैसे पता चले कि तनाव सामान्य से अधिक हो रहा है? जब तनाव का स्तर बढ़ता है तो इसके कुछ शारारिक बदलाव दिखाई देते हैं। आइए समझते हैं यह बदलाव कैसे होते हैं-

 सिरदर्द होना- तनाव का सबसे पहला लक्षण है, बार-बार सिरदर्द होना। किसी बात को बार-बार, लगातार सोचते रहने से सिरदर्द होने लगता है  अगर बार-बार सिरदर्द होता है, तो यह समझना चाहिए कि यह तनाव का कारण हो सकता है।

 दाँत और जबड़े में दर्द- तनावग्रस्त व्यक्ति अक्सर अपने जबड़ों में जकडऩ महसूस करता है। साथ ही दाँत में दर्द की समस्या होने लगती है। तनावग्रस्त व्यक्ति बार- बार दाँत पीसता रहता है जिससे उसके दाँतों में दर्द होने लगता है।

पाचन संबंधी समस्याएँ- तनाव में व्यक्ति का पाचन प्रभावित होता है जिससे कब्ज़, पेट फूलना, पेट दर्द, सीने में जलन जैसी समस्याएँ होती है। यदि बार- बार इस तरह की समस्या हो, तो उसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।

शरीर में अकडऩ या कमजोरी- तनावग्रस्त व्यक्ति अक्सर थकान महसूस करता है। उसे शरीर में कंपकंपाहट, ऐंठन, गर्दन एवं पीठ में दर्द महसूस होता है। अत्यधिक तनाव में व्यक्ति को चक्कर आना या बेहोशी भी हो सकती है।

नींद ना आना या अधिक नींद आना- नींद न आना तनावग्रस्त की निशानी है। तनावग्रस्त व्यक्ति हर समय चिंता करता है जिससे उसे नींद नहीं आती; किन्तु अगर व्यक्ति अधिक सोता है, तो यह भी तनाव का लक्षण हो सकता है। कभी- कभी व्यक्ति आँख बंद करके सोने का नाटक करता है, जबकि वह किसी विषय पर चिंता कर रहा होता है। किसी काम में मन न लगने पर व्यक्ति सोने का प्रयास करने लगता है।

धड़कन तेज होना- तनावग्रस्त व्यक्ति की धड़कन अचानक तेज हो जाती है। साँस फूलने लगती है। साँस तेज चलने लगती है। अत्यधिक चिंता के कारण या उदासी महसूस होने कारण ऐसा होता है।

उदास होना- बिना किसी कारण के उदास रहना तनाव के निशानी है। यदि बिना किसी उचित कारण के उदासी महसूस हो तो यह एक समस्या है।

वजन कम होना या तेजी से बढऩा- वजन में अचानक बदलाव तनाव की निशानी हो सकती है। तनाव में व्यक्ति भोजन ठीक से नहीं करता जिससे वजन कम हो जाता है या तनाव में व्यक्ति बहुत ज्यादा भोजन ग्रहण करने लगता है जिससे उसका वजन तेजी से बढऩे लगता है।

यदि किसी व्यक्ति में उपर्युक्त लक्षण या इनमें से कुछ लक्षण दिखाई दें, तो सावधान हो जाना आवश्यक है। ऐसे लक्षणों को पहचानकर समय पर उनका उपचार किया जाना आवश्यक है।

तनाव से कैसे बचें- आइए देखते हैं कि तनाव से बचने के लिए क्या किया जाना चाहिए।

सकारात्मक रहें-  अपनी सोच को सकारात्मक रखें। सोच को सकारात्मक रखना आवश्यक है, सकारात्मक सोच से हम बड़ी से बड़ी समस्या हल कर सकते हैं। अपनी कमजोरियों को सकारात्मकता से स्वीकार करना और उन्हें सुधार कर बेहतर बनाना चाहिए। सकारात्मकता आपमें नई ऊर्जा का संचार करती है।

सही जीवन शैली का चुनाव- नियमित दिनचर्या अपनाएँ। नियमित समय पर सोना- उठना एवं भोजन का समय नियमित होना चाहिए। प्रतिदिन अपने कार्यों की योजना बनाकर योजना के अनुसार अपने कार्य करना चाहिए।

मित्रों एवं संबंधियों के साथ रहें-  अपनों के साथ रहने से हमारी खुशी दुगनी हो जाती है और दु:ख -तनाव आधे हो जाते हैं; अत: जितना अधिक हो सके अपने संबंधियों और मित्रों के साथ रहें। उनसे बातचीत करें। फोन पर बात करें। किसी प्रकार का तनाव होने पर अपनों को बताएँ। अपनों के साथ रहने से आप अकेलापन महसूस नहीं करेंगे।

व्यायाम एवं योग करें- संपूर्ण विश्व ने योग के महत्त्व को स्वीकार किया है। अत: अपनी दिनचर्या में योग एवं व्यायाम को शामिल करें। इससे तनाव मुक्त होने में मदद मिलती है। शरीर के अंग अपना कार्य सुचारू रूप से करते हैं। व्यायाम एवं योग से रक्त का संचार बढ़ता है एवं मांसपेशियों को आराम मिलता है। व्यायाम एवं योग से अच्छी नींद आती है।

पौष्टिक आहार एवं गहरी नींद लें- स्वस्थ तन- मन के लिए संतुलित एवं पौष्टिक आहार लेना आवश्यक है। कहा भी गया है – जैसा खाया अन्न, वैसा बना तन। तनाव की अवस्था में पाचन क्रिया बिगड़ जाती है। ऐसे में संतुलित आहार लेने से पाचन क्रिया सुचारू हो जाएगी। साथ ही गहरी नींद लेना भी आवश्यक है। हर व्यक्ति को कम से कम 8 घंटे की नींद लेनी चाहिए। नींद की कमी से चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ जाता है।

अपने शौक एवं पसन्द के कार्य करें- हमारे शौक हमारे अंदर सकारात्मक एवं प्रसन्नता लाते हैं। ये कभी हमें अकेला नहीं रहने देते। अपने शौक को पहचानें जैसे- संगीत सुनना, पेंटिंग करना, बागवानी, खेलकूद, गायन-नृत्य आदि को बढ़ावा दें। उन्हें जाग्रत करें। ऐसा करने से आप व्यस्त रहेंगे एवं आपको मानसिक खुशी मिलेगी। आप शिक्षाप्रद और प्रेरक किताबें भी पढ़ सकते हैं।

डॉक्टरी सलाह लें एवं दवा लें- उक्त कार्यों को करते हुए भी यदि आपको लगता है कि आप तनाव का शिकार हो रहे हैं तो इसे नजरअंदाज ना करें अपने परिवार को बताएँ किसी अच्छे डॉक्टर से सलाह लें। डॉक्टर द्वारा दी गई दवाइयाँ का नियमित सेवन करें। अपने मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दें। सही समय पर उचित सलाह लें।

हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे समाज में मानसिक तनाव को गंभीरता से नहीं लिया जाता। अकसर ऐसी समस्याओं को मजाक में लिया जाता है। कभी-कभी इन्हें पागलपन का नाम दे दिया जाता है। ऐसे में तनावग्रस्त व्यक्ति अपनी समस्याओं को किसी को नहीं बताता। जिससे इनका इलाज नहीं हो पाता। जरूरी है कि हम स्वयं तनाव की अवस्था को पहचानें। हम अपने परिवार के सदस्यों एवं मित्रों में यह पहचान करें कि कहीं कोई तनावग्रस्त तो नहीं है। उन्हें सही सलाह दें। तनावग्रस्त व्यक्ति को अकेला ना छोड़ें। उन्हें उचित सलाह उपलब्ध करवाएँ जिससे वे मानसिक तनाव से बच सकते हैं।

सम्पर्कः अम्बुजा सीमेंट फाउंडेशन- भाटापारा , ग्राम - रवान (Rawan), जिला- बलौदा बाजार (Baloda Bazar), राज्य- छत्तीसगढ़ , पिन- 493331 , मोबाइल – 09826812299, E mail – Manjusha.mann9@gmail.com

जीवन दर्शन- टाटा संस्कृति से साक्षात्कार

  -विजय जोशीपूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

   जीवन में आगमन से पूर्व एवं पश्चात दो आयाम ऐसे हैं जो आदमी के जीवन की दशा और दिशा दोनों निर्धारित करते हैं। इनमें से पहला है विरासत जिसे आप संस्कार या मूल्यों की थाती कह सकते हैं तथा दूसरा है आपकी मानसिकता जो आपके आचरण का आधार है। पहला ईश्वर प्रदत्त है जबकि दूसरा आपके अपने हाथ में है और इसका आपकी पदप्रतिष्ठापैसे से कोई लेना देना नहीं। यह आवरण के अंदर अंतस की खोज का सफरनामा है। इसके साकार स्वरूप को स्वीकार कर संस्था हितार्थ उपयोग का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत होता है टाटा समूह के सोच में जो इस प्रकार है :

26/11 को ताज होटल में घटित आतंकी हमले के दौरान कर्मचारियों ने कर्तव्य का जो उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया उसकी सराहना हावर्ड विश्वविद्यालय तक में एक केस स्टडी रूप में समाहित की गई यह जानने के लिए कि क्यों टाटा कर्मचारियों ने डरकर भाग जाने के बजाय कार्यस्थल पर ही रहकर अतिथियों की रक्षा करने के लिये अपनी जान तक की बाजी लगा दी। उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने के जोखिमयुक्त काम को बखूबी अंजाम दिया। यह वह पहेली थी जिसे मनोवैज्ञानिक तक समझ पाने में असफल थे। और अंतत: जो निष्कर्ष निकले वे इस प्रकार थे।

-   ताज समूह ने बड़े शहरों से अपने कर्मचारी चुनने के बजाय उन छोटे- छोटे शहरों पर ध्यान केन्द्रित किया जहाँ पर पारंपरिक संस्कृति आज भी दृढ़तापूर्वज सहेजी गई है।

-   टाटा ने चुनने की प्रक्रिया में केवल टापर्स को वरीयता न प्रदान करते हुए उनके शिक्षकों से यह जानना चाहा कि उनके छात्रों में से कौन- कौन अपने अभिभावकोंवरिष्ठ जनोंशिक्षकों तथा अन्य के साथ आदरपूर्ण व्यवहार करते हैं

-   भर्ती के पश्चात उन्होंने नवागत नौजवान कर्मचारियों को यह पाठ पढ़ाया कि कंपनी के मात्र कर्मचारी बनाने के बजाय वे कंपनी के सामने अपने अतिथियों के सांकृतिक राजदूतशुभचिंतक तथा हितचिंतक बनाकर पेश हों।

   और इस तरह मूल्य परक प्रशिक्षण का ही प्रभाव यह रहा कि टाटा समूह आज सारे संसार के सामने एक मिसाल बनाकर खड़ा है जहाँ होटलिंग एक प्रोफेशन या व्यवसाय न होकर एक मिशन अर्थात विचार के पर्याय की भांति स्थापित है। यह सोच पूरे संसार के सामने पर्यटन उद्योग के लिये सीखकर अनुपालन के लिए अब तक का सबसे बड़ा उदाहरण है।  

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com